वैष्णव खण्ड · अध्याय 62
इन्द्रद्युम्न और नारद की ब्रह्मलोक-यात्रा
श्लोक 1 (skanda.2.62.1)
जैमिनिरुवाच । राजाथ तमुवाचेदं निर्लक्ष्य गमनं कथम् । अयं पुष्परथोऽस्त्येव मनसो वेगवान्मुने
jaiminiruvāca rājātha tamuvācedaṁ nirlakṣya gamanaṁ katham ayaṁ puṣparatho'styeva manaso vegavānmune
जैमिनि ने कहा — तब राजा ने, यात्रा के साधन को न समझ पाकर, उससे यह कहा — "हे मुने! मन के समान वेगवान् यह पुष्पक रथ तो विद्यमान ही है।
श्लोक 2 (skanda.2.62.2)
एनमारुह्य यास्यावः क्षणं तावत्प्रतीक्ष्यताम् । यावदेताननुज्ञाप्य प्रासादे ह्यधिकारिणः
enamāruhya yāsyāvaḥ kṣaṇaṁ tāvatpratīkṣyatām yāvadetānanujñāpya prāsāde hyadhikāriṇaḥ
इस पर आरूढ़ होकर हम जाएंगे; तब तक क्षणभर प्रतीक्षा कीजिए, जब तक मैं महल के अधिकारियों से अनुमति लेकर,
श्लोक 3 (skanda.2.62.3)
प्रदक्षिणीकृत्य विभुमायामि मुनिसत्तम । नारदोऽपि वचः श्रुत्वा श्रद्दधानो नृपोक्तिषु
pradakṣiṇīkṛtya vibhumāyāmi munisattama nārado'pi vacaḥ śrutvā śraddadhāno nṛpoktiṣu
— प्रभु की प्रदक्षिणा करके लौट आऊं, हे मुनिश्रेष्ठ।" नारद ने भी यह वचन सुनकर, राजा की बातों पर विश्वास करते हुए,
श्लोक 4 (skanda.2.62.4)
करेण धृत्वा राजानं महावेदीं प्रविश्य च । सहितं रामभद्राभ्यां नत्वा कृष्णं मुहुर्मुहुः । अनुज्ञां प्रार्थयामास ब्रह्मलोकगतिं प्रति
kareṇa dhṛtvā rājānaṁ mahāvedīṁ praviśya ca sahitaṁ rāmabhadrābhyāṁ natvā kṛṣṇaṁ muhurmuhuḥ anujñāṁ prārthayāmāsa brahmalokagatiṁ prati
राजा का हाथ पकड़कर महावेदी में प्रवेश किया, और बलभद्र तथा सुभद्रा सहित कृष्ण को बार-बार प्रणाम करके, ब्रह्मलोक-गमन की अनुमति माँगी।
श्लोक 5 (skanda.2.62.5)
इन्द्रद्युम्नोऽपि वचसा मनसा वपुषा हरिम् । प्रदक्षिणीकृत्य पुनर्नत्वा साष्टांगमुन्मनाः । ब्रह्मलोकगतिं विप्रा याचते स्म कृतांजलिः
indradyumno'pi vacasā manasā vapuṣā harim pradakṣiṇīkṛtya punarnatvā sāṣṭāṁgamunmanāḥ brahmalokagatiṁ viprā yācate sma kṛtāṁjaliḥ
इन्द्रद्युम्न ने भी वाणी, मन और शरीर से हरि की प्रदक्षिणा करके, पुनः साष्टांग प्रणाम करके, हे विप्रो! उत्सुक होकर हाथ जोड़कर ब्रह्मलोक-गमन की याचना की।
श्लोक 6 (skanda.2.62.6)
उभौ तौ दिव्ययानेन जग्मतुर्मुनिभूभृतौ । प्रदक्षिणीकृत्य रविं व्योममण्डलमध्यगम् । उपर्युपरि जग्माते व्यतीत्य ध्रुवमंडलम्
ubhau tau divyayānena jagmaturmunibhūbhṛtau pradakṣiṇīkṛtya raviṁ vyomamaṇḍalamadhyagam uparyupari jagmāte vyatītya dhruvamaṁḍalam
वे दोनों — मुनि और राजा — दिव्य विमान से चले; आकाश-मण्डल के मध्य में स्थित सूर्य की प्रदक्षिणा करके, वे ऊपर ही ऊपर, ध्रुव-मण्डल को लांघते हुए चले गए।
श्लोक 7 (skanda.2.62.7)
जनलोकगतैः सिद्धैः सत्वरावनतोन्मुखैः । वीक्ष्यमाणौ मुदा युक्तौ संलपंतौ परस्परम्
janalokagataiḥ siddhaiḥ satvarāvanatonmukhaiḥ vīkṣyamāṇau mudā yuktau saṁlapaṁtau parasparam
जनलोक में स्थित सिद्धों द्वारा, जो शीघ्रता से नतमुख होकर देख रहे थे, देखे जाते हुए, आनंदयुक्त वे दोनों परस्पर बातचीत करते हुए,
श्लोक 8 (skanda.2.62.8)
भगवच्चरितं विप्रा मनोमलविशोधनम् । जीवन्मुक्तो मुनिश्रेष्ठः सर्वलोकान्भ्रमन्नयम् । यथानुपहतव्रज्यस्तथायं मर्त्यवास्यपि
bhagavaccaritaṁ viprā manomalaviśodhanam jīvanmukto muniśreṣṭhaḥ sarvalokānbhramannayam yathānupahatavrajyastathāyaṁ martyavāsyapi
— हे विप्रो! भगवान् के उन चरित्रों की चर्चा करते रहे, जो मन के मल को शुद्ध करने वाले हैं। यह श्रेष्ठ मुनि जीवन्मुक्त होकर सभी लोकों में स्वच्छन्द विचरण करने वाला था, और यह मर्त्यवासी राजा भी उसी प्रकार बिना किसी बाधा के जा रहा था।
श्लोक 9 (skanda.2.62.9)
भूपतिः प्रययौ शीघ्रं विष्णुभक्तिप्रसादतः । ब्रह्मांडविषये नैतद्दुष्प्राप्यं वस्तु विद्यते
bhūpatiḥ prayayau śīghraṁ viṣṇubhaktiprasādataḥ brahmāṁḍaviṣaye naitadduṣprāpyaṁ vastu vidyate
राजा शीघ्र गति से गया, विष्णु-भक्ति के प्रसाद से। ब्रह्माण्ड के विषय में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो दुष्प्राप्य हो,
श्लोक 10 (skanda.2.62.10)
विष्णुभक्तेन यल्लभ्यमथवा मुक्तिमेति सः । महर्लोकगतैः सिद्धैः सादराभ्यर्चितौ च तौ
viṣṇubhaktena yallabhyamathavā muktimeti saḥ maharlokagataiḥ siddhaiḥ sādarābhyarcitau ca tau
— जो विष्णु-भक्त को प्राप्त न हो सके, अथवा वह मुक्ति ही प्राप्त कर लेता है। महर्लोक में स्थित सिद्धों ने उन दोनों का आदरपूर्वक पूजन किया।
श्लोक 11 (skanda.2.62.11)
इन्द्रद्युम्नो न सस्मार पार्थिवं वासमात्मनः । क्रमादूर्ध्वगतिर्गच्छन्पश्यन्सौख्यैकभाजनान्
indradyumno na sasmāra pārthivaṁ vāsamātmanaḥ kramādūrdhvagatirgacchanpaśyansaukhyaikabhājanān
इन्द्रद्युम्न को अपने पार्थिव निवास का स्मरण भी नहीं रहा; क्रमशः ऊर्ध्वगति से जाते हुए, केवल सुख के आधारभूत स्थानों को देखते हुए,
श्लोक 12 (skanda.2.62.12)
निर्द्वंद्वानभिलाषोत्थ तत्क्षणानेकपौरुषान् । केवलं भगवत्प्रीत्यै कर्मभूमौ चकार यत्
nirdvaṁdvānabhilāṣottha tatkṣaṇānekapauruṣān kevalaṁ bhagavatprītyai karmabhūmau cakāra yat
— जो द्वंद्वों से रहित हैं, कामनाओं के उदय से परे हैं, और जिनमें उसी क्षण अनेक प्रकार का पौरुष प्राप्त होता है; कर्मभूमि पृथ्वी में उसने जो कुछ भी किया था, वह केवल भगवान् की प्रीति के लिए ही किया था।
श्लोक 13 (skanda.2.62.13)
प्रासादं चिंतयामास संपूर्णो वा न वा भवेत् । मय्यागते ब्रह्मलोकं शत्रुभिर्वाभिभूयते
prāsādaṁ ciṁtayāmāsa saṁpūrṇo vā na vā bhavet mayyāgate brahmalokaṁ śatrubhirvābhibhūyate
उसे मंदिर की चिंता होने लगी — कि वह पूर्ण होगा या नहीं; "मेरे ब्रह्मलोक चले जाने पर कहीं शत्रुओं द्वारा वह अभिभूत न हो जाए,
श्लोक 14 (skanda.2.62.14)
श्लथादरा वा भूयासुः सेवका द्रव्यलोभतः । गृहीतवेतनाः शिल्पिवृंदा मंदक्रियास्तथा । न शीघ्रं घटयिष्यंति मयि ब्रह्मक्षयागते
ślathādarā vā bhūyāsuḥ sevakā dravyalobhataḥ gṛhītavetanāḥ śilpivṛṁdā maṁdakriyāstathā na śīghraṁ ghaṭayiṣyaṁti mayi brahmakṣayāgate
अथवा सेवक धन के लोभ से शिथिल-आदर वाले हो जाएंगे? और वेतन ले चुके शिल्पीगण मंदगति से कार्य करते हुए, मेरे ब्रह्मलोक चले जाने पर शीघ्र निर्माण नहीं करेंगे?
श्लोक 15 (skanda.2.62.15)
यावद्गमिष्ये धातारं गृहीत्वाहं चतुर्मुखम् । तावन्न पुनरेव स्यात्प्रासादो मयि दूरगे
yāvadgamiṣye dhātāraṁ gṛhītvāhaṁ caturmukham tāvanna punareva syātprāsādo mayi dūrage
जब तक मैं धाता के पास जाकर चतुर्मुख ब्रह्मा को साथ लेकर लौटूंगा, तब तक कहीं मेरे दूर चले जाने पर मंदिर पुनः अपूर्ण न रह जाए।
श्लोक 16 (skanda.2.62.16)
इहायातास्तु ये पूर्वे न पुनस्ते क्षितिं गताः । मन्वाना मम सामंता इत्थं वा दुष्टमानसाः । राज्यं ममाहरिष्यंति द्विषतः किमु सांप्रतम्
ihāyātāstu ye pūrve na punaste kṣitiṁ gatāḥ manvānā mama sāmaṁtā itthaṁ vā duṣṭamānasāḥ rājyaṁ mamāhariṣyaṁti dviṣataḥ kimu sāṁpratam
जो पहले यहाँ आए, वे पुनः पृथ्वी पर नहीं लौटे; ऐसा सोचकर मेरे सामंत भी दुष्ट मन वाले होकर मेरे राज्य को हड़प लेंगे — फिर शत्रुओं की तो बात ही क्या?"
श्लोक 17 (skanda.2.62.17)
इत्थं सुविग्नमनसा चिंतयानं महीपतिम् । अतीतानागतज्ञाननिधिर्मुनिरुवाच तम्
itthaṁ suvignamanasā ciṁtayānaṁ mahīpatim atītānāgatajñānanidhirmuniruvāca tam
इस प्रकार अत्यंत व्याकुल मन से चिंतन करते हुए राजा से, अतीत और भविष्य के ज्ञान के भंडार उन मुनि नारद ने कहा —
श्लोक 18 (skanda.2.62.18)
किं चिंतयसि राजेंद्र त्वमेवं दीनमानसः । यत्र चाभ्यागतावावां न चिंताविषयो ह्ययम्
kiṁ ciṁtayasi rājeṁdra tvamevaṁ dīnamānasaḥ yatra cābhyāgatāvāvāṁ na ciṁtāviṣayo hyayam
"हे राजेन्द्र! तुम इस प्रकार दीन मन से क्यों चिंता कर रहे हो? जहाँ हम दोनों आए हैं, वहाँ यह चिंता का विषय ही नहीं है।
श्लोक 19 (skanda.2.62.19)
नाधयो व्याधयश्चात्र प्रभवंति कदाचन । न जरा न च वा मृत्युः किमन्यदुःखहेतुकम्
nādhayo vyādhayaścātra prabhavaṁti kadācana na jarā na ca vā mṛtyuḥ kimanyaduḥkhahetukam
यहाँ न कभी मानसिक व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं, न शारीरिक; न जरा है, न मृत्यु — फिर अन्य दुःख का कारण ही क्या है?
श्लोक 20 (skanda.2.62.20)
कृतार्थोऽसि महाभाग यन्मानुषवपुः स्वयम् । ब्रह्मलोकमिहायातः प्रत्यक्षं दृष्टवान्हरिम्
kṛtārtho'si mahābhāga yanmānuṣavapuḥ svayam brahmalokamihāyātaḥ pratyakṣaṁ dṛṣṭavānharim
हे महाभाग! तुम धन्य हो कि मनुष्य-शरीर में ही स्वयं इस ब्रह्मलोक में आकर तुमने साक्षात् हरि का दर्शन किया।
श्लोक 21 (skanda.2.62.21)
इहायाता न शोचंति हेये संसारकल्पके । ब्रुवाणमित्थं भूपालस्तमुवाच मुनीश्वरम्
ihāyātā na śocaṁti heye saṁsārakalpake bruvāṇamitthaṁ bhūpālastamuvāca munīśvaram
जो यहाँ आ जाते हैं, वे त्याज्य संसार-चक्र के लिए शोक नहीं करते।" इस प्रकार कहते हुए मुनीश्वर से राजा ने कहा —
श्लोक 22 (skanda.2.62.22)
शोचामि भगवन्राज्ये स्वजनबन्धुषु । समारब्धो भगवतः प्रासादो यो मयाधुना
śocāmi bhagavanrājye svajanabandhuṣu samārabdho bhagavataḥ prāsādo yo mayādhunā
"हे भगवन्! मुझे राज्य में अपने स्वजनों और बन्धुओं की चिंता है, तथा उस मंदिर की भी जो भगवान् का, अभी मेरे द्वारा आरंभ किया गया है,
श्लोक 23 (skanda.2.62.23)
अत्रागतं मां ते ज्ञात्वा नानुतिष्ठंति सेवकाः । आरब्धस्य प्रतिष्ठा हि कर्तव्या निश्चिता मुने
atrāgataṁ māṁ te jñātvā nānutiṣṭhaṁti sevakāḥ ārabdhasya pratiṣṭhā hi kartavyā niścitā mune
— मुझे यहाँ आया हुआ जानकर सेवक उसे आगे नहीं बढ़ाएंगे; परंतु जो आरंभ किया गया है, हे मुने! उसकी प्रतिष्ठा तो अवश्य ही करनी है।
श्लोक 24 (skanda.2.62.24)
तस्यांतरायं संभाव्य दुःखितं मे मनः प्रभो । तस्य तद्वचं श्रुत्वा प्रहस्य मुनिरब्रवीत्
tasyāṁtarāyaṁ saṁbhāvya duḥkhitaṁ me manaḥ prabho tasya tadvacaṁ śrutvā prahasya munirabravīt
उसमें विघ्न की आशंका से, हे प्रभो! मेरा मन दुःखी है।" उसके इस वचन को सुनकर मुनि हँसकर बोले —
श्लोक 25 (skanda.2.62.25)
प्रजापतिसमत्वं हि न तु सामान्यभूपतिः । केनाप्यपकृतं नैव भूमौ पूर्वैरनुष्ठितम्
prajāpatisamatvaṁ hi na tu sāmānyabhūpatiḥ kenāpyapakṛtaṁ naiva bhūmau pūrvairanuṣṭhitam
"तुम तो प्रजापति के समान हो, कोई सामान्य राजा नहीं। पूर्वजों द्वारा स्थापित किसी भी कार्य को पृथ्वी पर किसी ने कभी हानि नहीं पहुँचाई है,
श्लोक 26 (skanda.2.62.26)
किं पुनस्तव कृत्यं तु यः सृष्टिस्थितिहानिकृत् । ब्रह्मलोकं गतस्याद्य प्रतापयशसा तव
kiṁ punastava kṛtyaṁ tu yaḥ sṛṣṭisthitihānikṛt brahmalokaṁ gatasyādya pratāpayaśasā tava
फिर तुम्हारे कार्य की तो बात ही क्या, जो सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाले भगवान् की कृपा से सुरक्षित है, विशेषतः जब तुम अपने प्रताप और यश के साथ आज ब्रह्मलोक को प्राप्त हो चुके हो?
श्लोक 27 (skanda.2.62.27)
त्रैलोक्ये भ्रमतो नित्यं यथा सूर्यनिशाकरौ । यस्य कार्येषु भगवान्सहायोऽसौ चतुर्मुखः
trailokye bhramato nityaṁ yathā sūryaniśākarau yasya kāryeṣu bhagavānsahāyo'sau caturmukhaḥ
जैसे सूर्य और चंद्रमा नित्य त्रैलोक्य में भ्रमण करते हैं, वैसे ही जिसके कार्यों में स्वयं भगवान् चतुर्मुख ब्रह्मा सहायक हैं,
श्लोक 28 (skanda.2.62.28)
तेषु किं राजशार्दूल विघ्नशंकापि जायते । एष दूरेऽस्ति राजेंद्र प्रत्यक्षं यस्तव द्विषाम्
teṣu kiṁ rājaśārdūla vighnaśaṁkāpi jāyate eṣa dūre'sti rājeṁdra pratyakṣaṁ yastava dviṣām
— उनके कार्यों में, हे राजशार्दूल! विघ्न की आशंका भी कैसे हो सकती है? हे राजेन्द्र! यह तो दूर की बात है — तुम्हारे शत्रु प्रत्यक्ष रूप में,
श्लोक 29 (skanda.2.62.29)
सदोमध्य गतः शक्रः साक्षात्त्रिजगतीपतिः । विशेषतो जगन्नाथप्रासादे कः पुमान्नृप
sadomadhya gataḥ śakraḥ sākṣāttrijagatīpatiḥ viśeṣato jagannāthaprāsāde kaḥ pumānnṛpa
— इन्द्र, जो साक्षात् त्रिलोकी के स्वामी हैं, सभा के मध्य में उपस्थित हैं। विशेषतः जगन्नाथ के मंदिर के विषय में, हे राजन्! कौन पुरुष
श्लोक 30 (skanda.2.62.30)
निहंतुं मनसापीच्छेत्तत्र शंकास्तु मा तव । तदग्रतः पश्य भूप चंद्रकोटिसमत्विषा
nihaṁtuṁ manasāpīcchettatra śaṁkāstu mā tava tadagrataḥ paśya bhūpa caṁdrakoṭisamatviṣā
— मन में भी उसे नष्ट करने की इच्छा कर सकता है? इसलिए तुम्हें इसकी कोई आशंका नहीं होनी चाहिए। अब आगे देखो, हे राजन्, करोड़ों चंद्रमाओं के समान कांतिमान्,
श्लोक 31 (skanda.2.62.31)
परितो ह्लादजनकः सुधासागरकोटिवत् । यश्चायं तेजसां राशिर्जानीहि ब्रह्मसद्मनः
parito hlādajanakaḥ sudhāsāgarakoṭivat yaścāyaṁ tejasāṁ rāśirjānīhi brahmasadmanaḥ
— जो चारों ओर आह्लाद उत्पन्न करने वाला है, करोड़ों अमृत-सागरों के समान है। और यह जो तेज की राशि है, इसे ब्रह्मा के धाम की ही जानो।
श्लोक 32 (skanda.2.62.32)
इत्थमालपतस्तौ तु ब्रह्मलोकांतिकं गतौ । शुश्रुवाते सुदूरात्तौ ब्रह्मर्षीणां मुखोद्गतम्
itthamālapatastau tu brahmalokāṁtikaṁ gatau śuśruvāte sudūrāttau brahmarṣīṇāṁ mukhodgatam
इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों ब्रह्मलोक के समीप पहुँचे; दूर से ही उन्होंने ब्रह्मर्षियों के मुख से निकला हुआ,
श्लोक 33 (skanda.2.62.33)
स्वाध्यायशब्दं सुपदं स्पष्टवर्णक्रमस्वरम् । इतिहासपुराणानि च्छंदः कल्पानि गाथिकाः
svādhyāyaśabdaṁ supadaṁ spaṣṭavarṇakramasvaram itihāsapurāṇāni cchaṁdaḥ kalpāni gāthikāḥ
— स्वाध्याय का शब्द, जिसके पद सुंदर थे, वर्ण-क्रम और स्वर स्पष्ट थे; इतिहास, पुराण, छन्द, कल्प, गाथाएं —
श्लोक 34 (skanda.2.62.34)
असंकीर्णोज्ज्वलपदं श्रूयते प्रविभागशः । अत्रैतद्राजशार्दूल जानीहि ब्रह्मणः पुरम्
asaṁkīrṇojjvalapadaṁ śrūyate pravibhāgaśaḥ atraitadrājaśārdūla jānīhi brahmaṇaḥ puram
— अमिश्रित, उज्ज्वल पदों वाला, विभागपूर्वक सुनाई देता था। हे राजशार्दूल! यहाँ इसे ब्रह्मा की पुरी जानो।
श्लोक 35 (skanda.2.62.35)
सभा हि दृश्यते चैषा यत्र लोकपितामहः । सार्द्धं ब्रह्मर्षिमुख्यैश्च सुखासीनश्चतुर्मुखः
sabhā hi dṛśyate caiṣā yatra lokapitāmahaḥ sārddhaṁ brahmarṣimukhyaiśca sukhāsīnaścaturmukhaḥ
और यह सभा दिखाई दे रही है, जहाँ लोकपितामह चतुर्मुख ब्रह्मा प्रमुख ब्रह्मर्षियों के साथ सुखपूर्वक विराजमान हैं,
श्लोक 36 (skanda.2.62.36)
नाना चैतन्यशबलैर्जीवन्मुक्तैरुपासितः । यत्रागतानि वर्त्तंते न संसाराब्धिसंकटे
nānā caitanyaśabalairjīvanmuktairupāsitaḥ yatrāgatāni varttaṁte na saṁsārābdhisaṁkaṭe
— विविध चेतना वाले अनेक जीवन्मुक्तों द्वारा उपासित हैं; जो यहाँ आ चुके हैं, वे संसार-सागर के संकट में पुनः नहीं पड़ते।
श्लोक 37 (skanda.2.62.37)
सदिति ब्रह्मणो नाम तस्यायं भुवनोत्तमः । सत्यलोक इति ख्यातस्तदूर्ध्वं नास्ति किंचन
saditi brahmaṇo nāma tasyāyaṁ bhuvanottamaḥ satyaloka iti khyātastadūrdhvaṁ nāsti kiṁcana
'सत्' ऐसा ब्रह्मा का नाम है; उनका यह सर्वश्रेष्ठ भुवन सत्यलोक के नाम से प्रसिद्ध है; उससे ऊपर और कुछ भी नहीं है।
श्लोक 38 (skanda.2.62.38)
अस्यैव किंचिदुपरि अधश्चांडकपालतः । वैकुण्ठभुवनं राजन्मुक्ता यत्र वसंति वै
asyaiva kiṁcidupari adhaścāṁḍakapālataḥ vaikuṇṭhabhuvanaṁ rājanmuktā yatra vasaṁti vai
इसी के कुछ ऊपर, और ब्रह्माण्ड-कपाल से नीचे, हे राजन्! वैकुण्ठ-लोक है, जहाँ मुक्त पुरुष निवास करते हैं,
श्लोक 39 (skanda.2.62.39)
यत्र योगीश्वरः साक्षाद्योगिचिंत्यो जनार्दनः । चैतन्यवपुरास्ते वै सांद्रानंदात्मकः प्रभुः
yatra yogīśvaraḥ sākṣādyogiciṁtyo janārdanaḥ caitanyavapurāste vai sāṁdrānaṁdātmakaḥ prabhuḥ
— जहाँ योगियों के ईश्वर, योगियों द्वारा ध्येय, जनार्दन, चैतन्य-स्वरूप, सघन आनंदमय प्रभु स्वयं विराजमान हैं,
श्लोक 40 (skanda.2.62.40)
यं प्राप्य न निवर्त्तंते मृत्युसंसारवर्त्मनि । यमुपास्ते सदा ब्रह्मा जीवन्मुक्तैः स्वमुक्तये
yaṁ prāpya na nivarttaṁte mṛtyusaṁsāravartmani yamupāste sadā brahmā jīvanmuktaiḥ svamuktaye
— जिसे प्राप्त कर लेने पर मनुष्य मृत्यु और संसार के मार्ग में पुनः नहीं लौटते; जिसकी उपासना ब्रह्मा भी सदा जीवन्मुक्तों के साथ अपनी मुक्ति के लिए करते हैं,
श्लोक 41 (skanda.2.62.41)
कल्पितस्यायुषोन्तेऽसावेभिः सार्द्धं प्रपद्यते । स एष स्रष्टा लोकानां मत्स्यकूर्मादिरूपधृक्
kalpitasyāyuṣonte'sāvebhiḥ sārddhaṁ prapadyate sa eṣa sraṣṭā lokānāṁ matsyakūrmādirūpadhṛk
— अपने निर्धारित आयु के अंत में, ये सब उसी की शरण पाते हैं। वही यह लोकों का स्रष्टा, मत्स्य-कूर्म आदि रूप धारण करने वाला,
श्लोक 42 (skanda.2.62.42)
रक्षिता रौद्ररूपेण संहर्त्ता लोकभावनः । इन्द्रद्युम्नं वदन्नित्थं प्राप ब्रह्मनिकेतनम्
rakṣitā raudrarūpeṇa saṁharttā lokabhāvanaḥ indradyumnaṁ vadannitthaṁ prāpa brahmaniketanam
— रक्षक है, और रौद्र रूप में संहारकर्ता तथा लोकों का पालनकर्ता भी है।" इन्द्रद्युम्न से इस प्रकार कहते हुए वे ब्रह्मा के निवास-स्थान पर पहुँचे।
श्लोक 43 (skanda.2.62.43)
क्षणेन च सभाद्वारि प्रकोष्ठे स न्यवर्तत । यत्र तिष्ठन्ति दिक्पालाः शक्राद्याः परितस्तथा
kṣaṇena ca sabhādvāri prakoṣṭhe sa nyavartata yatra tiṣṭhanti dikpālāḥ śakrādyāḥ paritastathā
और क्षणभर में वे सभा-द्वार के प्रकोष्ठ में जा पहुँचे, जहाँ इन्द्र आदि दिक्पाल चारों ओर खड़े रहते हैं,
श्लोक 44 (skanda.2.62.44)
चिरकालं ध्यानपरास्तथा मन्वंतराधिपाः । पृथग्जननिभा द्वाःस्थनिषिद्धांतः प्रवेशनाः
cirakālaṁ dhyānaparāstathā manvaṁtarādhipāḥ pṛthagjananibhā dvāḥsthaniṣiddhāṁtaḥ praveśanāḥ
तथा मन्वंतरों के अधिपति भी दीर्घकाल से ध्यानमग्न रहते हैं; ये सामान्य जनों के समान प्रतीत होते हुए भी द्वारपाल द्वारा भीतर प्रवेश से रोक दिए जाते हैं।
श्लोक 45 (skanda.2.62.45)
इन्द्रद्युम्नेन सहितं नारदं प्रविलोक्य सः । द्वारपालः सविनयं ननामानतकन्धरः
indradyumnena sahitaṁ nāradaṁ pravilokya saḥ dvārapālaḥ savinayaṁ nanāmānatakandharaḥ
इन्द्रद्युम्न सहित नारद को देखकर, उस द्वारपाल ने विनयपूर्वक, ग्रीवा झुकाकर प्रणाम किया,
श्लोक 46 (skanda.2.62.46)
चतुर्दशानां लोकानां भ्रमणे रसिक प्रभो । त्वया विना शोभते नो स्वामिंस्तव पितुः सभा
caturdaśānāṁ lokānāṁ bhramaṇe rasika prabho tvayā vinā śobhate no svāmiṁstava pituḥ sabhā
— "हे प्रभो! चौदहों लोकों में भ्रमण करने के रसिक! हे स्वामिन्! आपके बिना आपके पिता की सभा शोभा नहीं पाती।
श्लोक 47 (skanda.2.62.47)
संत्येव मुनयः श्रेष्ठा ब्राह्मणा ब्रह्मविद्वराः । गौतमाद्यास्तथाप्येषा न रम्या ब्रह्मणः सभा
saṁtyeva munayaḥ śreṣṭhā brāhmaṇā brahmavidvarāḥ gautamādyāstathāpyeṣā na ramyā brahmaṇaḥ sabhā
यद्यपि यहाँ गौतम आदि श्रेष्ठ मुनि, ब्राह्मण और ब्रह्मविद्या में श्रेष्ठ जन विद्यमान हैं, तथापि यह ब्रह्मा की सभा रमणीय नहीं लगती,
श्लोक 48 (skanda.2.62.48)
बहुतारा सुरजनी चंद्रेणेव प्रकाशते । इति स्तुवन्ददौ तस्य प्रवेशं विनयान्वितः
bahutārā surajanī caṁdreṇeva prakāśate iti stuvandadau tasya praveśaṁ vinayānvitaḥ
— जैसे तारों से भरी रात्रि भी चंद्रमा से ही प्रकाशित होती है।" इस प्रकार स्तुति करते हुए उसने विनयपूर्वक उन्हें प्रवेश दिया।