Skip to main content

वैष्णव खण्ड · अध्याय 63

ब्रह्मसभा में इन्द्रद्युम्न और दारुमय प्रभु का रहस्य

अध्याय 62अध्याय-सूचीअध्याय 64

श्लोक 1 (skanda.2.63.1)

नारद उवाच । दौवारिकाय राजर्षिरिंद्रद्युम्नो महायशाः । सार्वभौमो वैष्णवाग्र्यो धातारं द्रष्टुमागतः

nārada uvāca dauvārikāya rājarṣiriṁdradyumno mahāyaśāḥ sārvabhaumo vaiṣṇavāgryo dhātāraṁ draṣṭumāgataḥ

नारद ने कहा — द्वारपाल से कहा — "महायशस्वी राजर्षि इन्द्रद्युम्न, सार्वभौम, वैष्णवों में अग्रणी, ब्रह्मा के दर्शन हेतु आए हैं।

श्लोक 2 (skanda.2.63.2)

यात्वयं पुरतस्तस्य यदि त्वमनुमन्यसे । इत्युक्तस्तं पुनः प्राह नारदं मणिकोदरः

yātvayaṁ puratastasya yadi tvamanumanyase ityuktastaṁ punaḥ prāha nāradaṁ maṇikodaraḥ

यदि तुम अनुमति दो तो यह उसके सम्मुख जाए।" यह कहे जाने पर मणिकोदर ने पुनः नारद से कहा —

श्लोक 3 (skanda.2.63.3)

स्वामिंस्त्वयागतो योऽसौ न सामान्यो हि बुध्यते । यत्र पश्यसि दिक्पालान्पितॄन्मन्वंतराधिपान्

svāmiṁstvayāgato yo'sau na sāmānyo hi budhyate yatra paśyasi dikpālānpitṝnmanvaṁtarādhipān

"हे स्वामिन्! जो आपके साथ आया है, वह सामान्य नहीं समझा जाता — जहाँ आप दिक्पालों, पितरों और मन्वंतराधिपतियों को देखते हैं,

श्लोक 4 (skanda.2.63.4)

तत्रायं मर्त्त्यनिलयस्तिष्ठेदपि हि पौरुषम् । भवान्गत्वा पद्मयोनिं विज्ञाप्यैनं प्रवेशय

tatrāyaṁ marttyanilayastiṣṭhedapi hi pauruṣam bhavāngatvā padmayoniṁ vijñāpyainaṁ praveśaya

— वहाँ यह मर्त्यलोक-निवासी भी पौरुष के बल पर खड़ा हो? आप स्वयं जाकर पद्मयोनि ब्रह्मा को सूचित करके इसे प्रवेश दें।

श्लोक 5 (skanda.2.63.5)

सभाद्वारगतो योऽसौ दिक्पालैः सह यास्यति । एकाग्रचित्तो भगवान्गायने चतुराननः

sabhādvāragato yo'sau dikpālaiḥ saha yāsyati ekāgracitto bhagavāngāyane caturānanaḥ

सभा-द्वार पर खड़ा व्यक्ति दिक्पालों के साथ ही जा सकेगा; भगवान् चतुरानन तो गायन में एकाग्रचित्त हैं,

श्लोक 6 (skanda.2.63.6)

अस्माकं द्वारि युक्तानां प्रतीक्ष्योऽवसरो ध्रुवम् । न क्रोधो मयि कर्त्तव्यो दासे तव पितुश्च ते

asmākaṁ dvāri yuktānāṁ pratīkṣyo'vasaro dhruvam na krodho mayi karttavyo dāse tava pituśca te

— हमें, जो द्वार पर नियुक्त हैं, उचित अवसर की प्रतीक्षा करनी ही होगी। मुझ पर, जो आपके पिता का और आपका दास हूँ, क्रोध न करें।

श्लोक 7 (skanda.2.63.7)

इत्युक्तो नारदो गत्वा ब्रह्माणं जगतां पतिम् । नत्वा साष्टांगपतनं विज्ञप्तो वसुधाधिपः

ityukto nārado gatvā brahmāṇaṁ jagatāṁ patim natvā sāṣṭāṁgapatanaṁ vijñapto vasudhādhipaḥ

यह कहे जाने पर नारद ने जाकर जगत्पति ब्रह्मा को साष्टांग प्रणाम किया, और पृथ्वीपति इन्द्रद्युम्न के विषय में सूचित किया।

श्लोक 8 (skanda.2.63.8)

कटाक्षेणादिशत्सोऽथ इन्द्रद्युम्नप्रवेशनम् । नोवाच किंचिद्भगवान्गाने दत्तावधानतः

kaṭākṣeṇādiśatso'tha indradyumnapraveśanam novāca kiṁcidbhagavāngāne dattāvadhānataḥ

तब उन्होंने कटाक्ष मात्र से इन्द्रद्युम्न के प्रवेश की अनुमति दे दी; भगवान् ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि उनका ध्यान गायन में लगा हुआ था,

श्लोक 9 (skanda.2.63.9)

दिव्यगायनसंगीते कौतुकाविष्टमानसः । ज्ञात्वेंगितं नारदोऽथ इंद्रद्युम्नं नृपोत्तमम् । प्रवेशयामास ततः शक्राद्यैः सुनिरीक्षितः

divyagāyanasaṁgīte kautukāviṣṭamānasaḥ jñātveṁgitaṁ nārado'tha iṁdradyumnaṁ nṛpottamam praveśayāmāsa tataḥ śakrādyaiḥ sunirīkṣitaḥ

— दिव्य गायन-संगीत में कौतूहलपूर्वक लीन थे। तब नारद ने संकेत को समझकर नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्न को भीतर प्रवेश कराया, जिसे इन्द्र आदि ध्यानपूर्वक देख रहे थे।

श्लोक 10 (skanda.2.63.10)

दृष्ट्वा पितामहं दूरात्स्रष्टारं जगतां नृपः । अमन्यत द्विजश्रेष्ठाः साक्षाद्दारुमयं हरिम्

dṛṣṭvā pitāmahaṁ dūrātsraṣṭāraṁ jagatāṁ nṛpaḥ amanyata dvijaśreṣṭhāḥ sākṣāddārumayaṁ harim

दूर से ही पितामह, जगत्-स्रष्टा को देखकर राजा ने, हे द्विजश्रेष्ठो! उन्हें साक्षात् दारुमय हरि ही मान लिया,

श्लोक 11 (skanda.2.63.11)

शनैः शनैर्ययौ भूपः प्रणमंश्च कृतांजलिः । स्तुवन्नमन्प्रणिपतन्साध्वसस्खलितं व्रजन् । किंचिद्दूरे स्थितो भूपो नारदस्य निदेशतः

śanaiḥ śanairyayau bhūpaḥ praṇamaṁśca kṛtāṁjaliḥ stuvannamanpraṇipatansādhvasaskhalitaṁ vrajan kiṁciddūre sthito bhūpo nāradasya nideśataḥ

राजा धीरे-धीरे, हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए, स्तुति करते, नमन करते, प्रणिपात करते, भय-विह्वल होकर डगमगाते हुए चला; और नारद के निर्देश पर राजा कुछ दूरी पर ही खड़ा रह गया।

श्लोक 12 (skanda.2.63.12)

ततः पुण्यं गीयमानं चरितं सिंधुजापतेः । शृण्वंश्चतुर्मुखस्तस्थौ मुहूर्त्तं द्विजपुंगवाः

tataḥ puṇyaṁ gīyamānaṁ caritaṁ siṁdhujāpateḥ śṛṇvaṁścaturmukhastasthau muhūrttaṁ dvijapuṁgavāḥ

तत्पश्चात् लक्ष्मीपति के पवित्र चरित्र का गान सुनते हुए चतुर्मुख ब्रह्मा कुछ क्षण के लिए वहीं ठहर गए, हे द्विजश्रेष्ठो!

श्लोक 13 (skanda.2.63.13)

सावित्रीशारदाभ्यां च वीज्यमानस्तु पार्श्वयोः । शुद्धदेहधरैर्वेदैः स्तूयमानः स्वयंभुवः

sāvitrīśāradābhyāṁ ca vījyamānastu pārśvayoḥ śuddhadehadharairvedaiḥ stūyamānaḥ svayaṁbhuvaḥ

— सावित्री और शारदा द्वारा दोनों ओर से पंखा झलते हुए, तथा शुद्ध देहधारी वेदों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, वे स्वयंभू,

श्लोक 14 (skanda.2.63.14)

कलाकाष्ठानिमेषादि कल्पयन्युगपर्ययम् । न जराजन्ममरणं रूपादिपरिणामनम्

kalākāṣṭhānimeṣādi kalpayanyugaparyayam na jarājanmamaraṇaṁ rūpādipariṇāmanam

— जो काल की गणना — कला, काष्ठा, निमेष आदि — तथा युगों के परिवर्तन की रचना करते हैं, परन्तु जिनके लिए न जरा है, न जन्म, न मृत्यु, न रूप आदि का परिवर्तन,

श्लोक 15 (skanda.2.63.15)

यस्य लोकगतानां वै नाधयो व्याधयस्तथा । मन्वतरादयो यत्र युगावर्त्तादयस्तथा

yasya lokagatānāṁ vai nādhayo vyādhayastathā manvatarādayo yatra yugāvarttādayastathā

— जिनके लोकों में रहने वालों को न आधि है, न व्याधि; जहाँ मन्वंतर आदि और युगों के आवर्तन आदि,

श्लोक 16 (skanda.2.63.16)

कल्पांताद्या न विद्यंते स साक्षात्परमेश्वरः । गीतावसाने तं भूपमुवाच प्रहसन्निव

kalpāṁtādyā na vidyaṁte sa sākṣātparameśvaraḥ gītāvasāne taṁ bhūpamuvāca prahasanniva

— तथा कल्पांत आदि भी नहीं हैं — वे साक्षात् परमेश्वर हैं। गीत की समाप्ति पर उन्होंने राजा से मानो हँसते हुए कहा —

श्लोक 17 (skanda.2.63.17)

इंद्रद्युम्न महासत्त्व साक्षात्त्वं भगवत्प्रियः । अन्यस्य दुर्लभो लोकः सत्याख्यो विदितस्तव

iṁdradyumna mahāsattva sākṣāttvaṁ bhagavatpriyaḥ anyasya durlabho lokaḥ satyākhyo viditastava

"हे इन्द्रद्युम्न! हे महासत्त्व! तुम साक्षात् भगवान् के प्रिय हो। यह सत्य नामक लोक, जो अन्य किसी के लिए दुर्लभ है, तुम्हें ज्ञात हो चुका है।

श्लोक 18 (skanda.2.63.18)

अत्रागतिं हि वांछंतो मुनयः क्षीणकल्मषाः । तपोनिष्ठाश्च तिष्ठंति यावदाभूतसंप्लवम्

atrāgatiṁ hi vāṁchaṁto munayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ taponiṣṭhāśca tiṣṭhaṁti yāvadābhūtasaṁplavam

— यहाँ आने की इच्छा रखने वाले, पापरहित मुनि तपस्या में निष्ठापूर्वक स्थित रहते हैं, यावत् प्रलयकाल तक।

श्लोक 19 (skanda.2.63.19)

चतुर्दशसु लोकेषु सृष्टानां प्राणिनां हि यत् । चैतन्यादिविचित्राणि सर्वेषामाश्रयो ह्यसौ

caturdaśasu lokeṣu sṛṣṭānāṁ prāṇināṁ hi yat caitanyādivicitrāṇi sarveṣāmāśrayo hyasau

चौदह लोकों में उत्पन्न समस्त प्राणियों की जो चेतना आदि विविध विशेषताएं हैं, वे सब उसी के आश्रित हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.63.20)

जानन्नपि हि तत्कार्यं मानयन्नृपसत्तमम् । उवाच परमप्रीत इंद्रद्युम्नं पितामहः

jānannapi hi tatkāryaṁ mānayannṛpasattamam uvāca paramaprīta iṁdradyumnaṁ pitāmahaḥ

यद्यपि पितामह उसका प्रयोजन जानते ही थे, तथापि नृपश्रेष्ठ का सम्मान करते हुए, अत्यंत प्रसन्न होकर उन्होंने इन्द्रद्युम्न से कहा —

श्लोक 21 (skanda.2.63.21)

किमर्थमागतोस्यत्र तद्ब्रूहि हृदयस्थितम् । मयि दृष्टे न दुष्प्रापममृतं किन्नु वांछितम्

kimarthamāgatosyatra tadbrūhi hṛdayasthitam mayi dṛṣṭe na duṣprāpamamṛtaṁ kinnu vāṁchitam

"तुम यहाँ किस प्रयोजन से आए हो? अपने हृदय में जो है, वह कहो। मेरे दर्शन हो जाने पर अमृत भी दुष्प्राप्य नहीं रहता, तो फिर तुमने क्या चाहा है?"

श्लोक 22 (skanda.2.63.22)

इन्द्रद्युम्न उवाच । अंतर्यामिन्हि भगवंस्त्वदज्ञातं कुतो भवेत् । तथापि प्रश्नो यो नाथ मय्यनुक्रोश एव सः

indradyumna uvāca aṁtaryāminhi bhagavaṁstvadajñātaṁ kuto bhavet tathāpi praśno yo nātha mayyanukrośa eva saḥ

इन्द्रद्युम्न ने कहा — हे भगवन्! हे अंतर्यामिन्! आपसे भला क्या अज्ञात हो सकता है? तथापि, हे नाथ! जो यह प्रश्न है, वह मुझ पर आपकी कृपा ही है।

श्लोक 23 (skanda.2.63.23)

मूर्ध्न्याधाय तवानुज्ञां कथितं तव सूनुना । इष्टाः सहस्रं क्रतवस्तदंते दारुदेहभृत्

mūrdhnyādhāya tavānujñāṁ kathitaṁ tava sūnunā iṣṭāḥ sahasraṁ kratavastadaṁte dārudehabhṛt

आपकी आज्ञा को शिरोधार्य करके — आपके पुत्र नारद द्वारा कहा गया वृत्तांत यह है — मैंने सहस्र यज्ञ किए, और उनके अंत में, काष्ठ-शरीरधारी,

श्लोक 24 (skanda.2.63.24)

आविर्बभूव भगवान्भूतभव्यभवत्प्रभुः । त्वदनुग्रहसंपत्तिवशादेवावलोकयन्

āvirbabhūva bhagavānbhūtabhavyabhavatprabhuḥ tvadanugrahasaṁpattivaśādevāvalokayan

भगवान्, जो भूत-भविष्य-वर्तमान के स्वामी हैं, प्रकट हुए — केवल आपकी अनुकम्पा के ऐश्वर्य के कारण ही उन्होंने मुझ पर दृष्टि डाली।

श्लोक 25 (skanda.2.63.25)

तादृशं पुंडरीकाक्षं येन त्वल्लोकमागतः । यस्यारब्धो मया देव प्रासादस्तत्र चेत्स्वयम्

tādṛśaṁ puṁḍarīkākṣaṁ yena tvallokamāgataḥ yasyārabdho mayā deva prāsādastatra cetsvayam

ऐसे उन कमलनयन के कारण ही मैं आपके लोक में आ पाया हूँ; और हे देव! यदि उनके लिए मेरे द्वारा वहाँ आरंभ किया गया मंदिर, स्वयं आप ही,

श्लोक 26 (skanda.2.63.26)

गत्वा देवं जगन्नाथं स्थापयिष्यसि चेत्प्रभो । त्वदनुग्रहस्तु सफलो भवेन्मे लोकभावन

gatvā devaṁ jagannāthaṁ sthāpayiṣyasi cetprabho tvadanugrahastu saphalo bhavenme lokabhāvana

— जाकर भगवान् जगन्नाथ को उसमें प्रतिष्ठित कर दें, हे प्रभो! तो हे लोकभावन! मुझ पर आपकी कृपा सफल हो जाएगी।

श्लोक 27 (skanda.2.63.27)

एतदर्थं जगत्स्वामिन्नारदेन सहाधुना । त्वत्पादपद्मयुगलं द्रष्टुं त्वल्लोकमागतः

etadarthaṁ jagatsvāminnāradena sahādhunā tvatpādapadmayugalaṁ draṣṭuṁ tvallokamāgataḥ

इसी प्रयोजन से, हे जगत्स्वामिन्! नारद के साथ अभी मैं आपके चरण-कमल-युगल के दर्शन हेतु आपके लोक में आया हूँ।

श्लोक 28 (skanda.2.63.28)

प्रसीद मां कुरुष्वेदं जगन्नाथस्त्वमेव हि । त्वमेव स जगन्नाथो न भेदो युवयोर्विभो

prasīda māṁ kuruṣvedaṁ jagannāthastvameva hi tvameva sa jagannātho na bhedo yuvayorvibho

प्रसन्न होकर मुझे यह वर दीजिए — आप ही स्वयं जगन्नाथ हैं। आप ही वह जगन्नाथ हैं, हे विभो! आप दोनों में कोई भेद नहीं है।

श्लोक 29 (skanda.2.63.29)

स्थाप्यः स्थापयिता चासि वेद्यो वेदयिता भवान्

sthāpyaḥ sthāpayitā cāsi vedyo vedayitā bhavān

आप ही स्थाप्य हैं और आप ही स्थापयिता; आप ही वेद्य (जानने योग्य) हैं और आप ही वेदयिता (जानने वाले) हैं।"

श्लोक 30 (skanda.2.63.30)

जैमिनिरुवाच । एवं विज्ञापनांते तु दुर्वासा स महामुनिः । प्रणम्य साष्टांगपातं कृतांजलिरुपस्थितः

jaiminiruvāca evaṁ vijñāpanāṁte tu durvāsā sa mahāmuniḥ praṇamya sāṣṭāṁgapātaṁ kṛtāṁjalirupasthitaḥ

जैमिनि ने कहा — इस निवेदन के अंत में, वे महामुनि दुर्वासा साष्टांग प्रणाम करके, हाथ जोड़कर उपस्थित हुए,

श्लोक 31 (skanda.2.63.31)

प्रोवाच विनयान्नीचो धातारं जगतां गुरुम् । विभो द्वारप्रवेशेऽत्र दौवारिकनिवारिताः

provāca vinayānnīco dhātāraṁ jagatāṁ gurum vibho dvārapraveśe'tra dauvārikanivāritāḥ

और विनम्र होकर जगद्गुरु ब्रह्मा से कहा — "हे विभो! इस द्वार-प्रवेश पर द्वारपाल द्वारा रोके गए,

श्लोक 32 (skanda.2.63.32)

लोकपालाः सपितरस्तथा मन्वंतराधिपाः । तिष्ठंति दीनजनवत्सुचिराल्लोकभावन

lokapālāḥ sapitarastathā manvaṁtarādhipāḥ tiṣṭhaṁti dīnajanavatsucirāllokabhāvana

लोकपाल, पितरगण, तथा मन्वंतराधिपति — हे लोकभावन! ये सब दीनजनों के समान दीर्घकाल से खड़े हैं।

श्लोक 33 (skanda.2.63.33)

तदाज्ञापय पश्यंतु तव पादसरोरुहम् । तच्छ्रुत्वा देवदेवस्तु तदा दुर्वाससो वचः

tadājñāpaya paśyaṁtu tava pādasaroruham tacchrutvā devadevastu tadā durvāsaso vacaḥ

अतः आज्ञा दें कि वे आपके चरण-कमलों का दर्शन कर सकें।" यह सुनकर देवदेव ने तब दुर्वासा के इस वचन को,

श्लोक 34 (skanda.2.63.34)

प्रहस्य वचनं प्राह नैषां प्रस्ताव एव हि । इंद्रद्युम्नेन स्पर्द्धंते किं तु मोहवशानुगाः

prahasya vacanaṁ prāha naiṣāṁ prastāva eva hi iṁdradyumnena sparddhaṁte kiṁ tu mohavaśānugāḥ

— मुस्कुराते हुए यह वचन कहा — "यह तो इनका विषय ही नहीं है। क्या ये मोहवश इन्द्रद्युम्न से स्पर्धा करते हैं?

श्लोक 35 (skanda.2.63.35)

जीवन्मुक्तोऽयं नृपतिः क्षीणकर्माघसंहतिः । मत्संततेः पंचमोऽयं वैष्णवो विष्णुतत्परः

jīvanmukto'yaṁ nṛpatiḥ kṣīṇakarmāghasaṁhatiḥ matsaṁtateḥ paṁcamo'yaṁ vaiṣṇavo viṣṇutatparaḥ

यह राजा जीवन्मुक्त है, इसके कर्म और पाप की राशि क्षीण हो चुकी है; यह मेरी ही संतान में पांचवां है, विष्णु में तत्पर वैष्णव है।

श्लोक 36 (skanda.2.63.36)

एते हि सुखभोगाय कर्मणा प्राप्तपौरुषाः । अत्रागतिं प्रार्थयंतस्तपस्तप्त्वा हि देवताः

ete hi sukhabhogāya karmaṇā prāptapauruṣāḥ atrāgatiṁ prārthayaṁtastapastaptvā hi devatāḥ

ये अन्य देवगण तो कर्म द्वारा सुखभोग के निमित्त पद प्राप्त किए हुए हैं; यहाँ आने की कामना करते हुए, तप करके,

श्लोक 37 (skanda.2.63.37)

ममानुग्रहत एते आयाता मदुपासने । तथापि त्वदनुज्ञाता आयांतु मम दर्शने

mamānugrahata ete āyātā madupāsane tathāpi tvadanujñātā āyāṁtu mama darśane

— मेरी कृपा से ये मेरी उपासना में यहाँ आए हैं। तथापि, तुम्हारी अनुमति से, ये मेरे दर्शन के लिए आ सकते हैं।"

श्लोक 38 (skanda.2.63.38)

ततः प्रविष्टास्ते देवा दुर्वासोवचनेन वै । दूरात्प्रणेमुर्ब्रह्माणं गायनानां समीपतः

tataḥ praviṣṭāste devā durvāsovacanena vai dūrātpraṇemurbrahmāṇaṁ gāyanānāṁ samīpataḥ

तब दुर्वासा के वचन से वे देवगण भीतर प्रविष्ट हुए, और गायकों के समीप, दूर से ही ब्रह्मा को प्रणाम किया,

श्लोक 39 (skanda.2.63.39)

इंद्रद्युम्नं नरपतिं संलपंतं कृतांजलिम् । ताँल्लोकपालान्प्रणतान्कटाक्षेण जगत्प्रभुः

iṁdradyumnaṁ narapatiṁ saṁlapaṁtaṁ kṛtāṁjalim tāṁllokapālānpraṇatānkaṭākṣeṇa jagatprabhuḥ

तथा हाथ जोड़े बातचीत करते राजा इन्द्रद्युम्न को भी प्रणाम किया। जगत्प्रभु ने प्रणत उन लोकपालों को कटाक्ष मात्र से,

श्लोक 40 (skanda.2.63.40)

अनुजग्राह कथयन्निंद्रद्युम्नं ससादरम् । राजन्कृतस्त्वया सत्यं प्रासादो भगवत्स्थितौ

anujagrāha kathayanniṁdradyumnaṁ sasādaram rājankṛtastvayā satyaṁ prāsādo bhagavatsthitau

— कृपापूर्वक अनुगृहीत किया, और आदरपूर्वक इन्द्रद्युम्न से कहने लगे — "हे राजन्! यह सत्य है कि तुमने भगवान् के निवास हेतु मंदिर बनवाया है,

श्लोक 41 (skanda.2.63.41)

नायं कालस्तथा राज्यं न वा त्वत्संततिर्नृप । गीतगानावसरतो भूयान्कालो गतस्तव

nāyaṁ kālastathā rājyaṁ na vā tvatsaṁtatirnṛpa gītagānāvasarato bhūyānkālo gatastava

परन्तु न वह काल रहा, न वह राज्य, न ही तुम्हारे वंशज हैं, हे राजन्! इस गीत-गान के अवसर मात्र में तुम्हारा बहुत काल बीत चुका है।

श्लोक 42 (skanda.2.63.42)

मन्वंतरो हि दिव्यानां युगानामेकसप्ततिः । तव वंशोऽपि विच्छिन्नः कोटिशः क्षितिपा गताः

manvaṁtaro hi divyānāṁ yugānāmekasaptatiḥ tava vaṁśo'pi vicchinnaḥ koṭiśaḥ kṣitipā gatāḥ

क्योंकि एक मन्वंतर दिव्य युगों की इकहत्तर संख्या का होता है; तुम्हारा वंश भी विच्छिन्न हो चुका है — करोड़ों राजा बीत चुके हैं।

श्लोक 43 (skanda.2.63.43)

देवोंऽतिमश्च प्रासादो द्वयमत्रावशिष्यते । द्वितीयस्य मनोरादियुगं स्वारोचिषस्य तु

devoṁ'timaśca prāsādo dvayamatrāvaśiṣyate dvitīyasya manorādiyugaṁ svārociṣasya tu

यहाँ केवल दो वस्तुएं ही शेष रह गई हैं — देवता और अंतिम मंदिर; अभी दूसरे मनु स्वारोचिष के आदियुग का समय है,

श्लोक 44 (skanda.2.63.44)

ममांतिकेऽत्र वसतोमृत्युर्वा न जरा तथा । विपर्ययमृतूनां वा न कालपरिणामता

mamāṁtike'tra vasatomṛtyurvā na jarā tathā viparyayamṛtūnāṁ vā na kālapariṇāmatā

— और मेरे समीप यहाँ रहते हुए न मृत्यु है, न जरा, न ऋतुओं का विपर्यय, और न ही काल का परिणमन।

श्लोक 45 (skanda.2.63.45)

तद्गच्छ भूमौ राजेंद्र देवं प्रासादमेव च । आत्मसंबंधिनं कृत्वा पुनरायाहि वेगवान्

tadgaccha bhūmau rājeṁdra devaṁ prāsādameva ca ātmasaṁbaṁdhinaṁ kṛtvā punarāyāhi vegavān

अतः हे राजेन्द्र! पृथ्वी पर जाओ, तथा देवता के मंदिर को अपने से संबंधित करके, फिर वेगपूर्वक लौट आओ —

श्लोक 46 (skanda.2.63.46)

अथवाहं प्रयास्यामि तवानुपदमेव हि । त्वमग्रतो धरां गत्वा यावत्संभारमृद्धिमत्

athavāhaṁ prayāsyāmi tavānupadameva hi tvamagrato dharāṁ gatvā yāvatsaṁbhāramṛddhimat

— अथवा मैं स्वयं ही तुम्हारे पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए आऊंगा। तुम पहले पृथ्वी पर जाओ, और जब तक तुम समृद्ध सामग्री जुटाओगे,

श्लोक 47 (skanda.2.63.47)

करिष्यसि महाभाग तावदेव व्रजाम्यहम् । इत्याज्ञाप्येंद्रद्युम्नं तं भगवान्स पितामहः

kariṣyasi mahābhāga tāvadeva vrajāmyaham ityājñāpyeṁdradyumnaṁ taṁ bhagavānsa pitāmahaḥ

— हे महाभाग! उतने ही समय में मैं भी वहां पहुंच जाऊंगा।" इस प्रकार इन्द्रद्युम्न को आज्ञा देकर उन भगवान् पितामह ने,

श्लोक 48 (skanda.2.63.48)

देवान्पुरःस्थितानाह विनयानतकंधरान् । बद्धांजलीन्साध्वसांस्तांस्तत्पादन्यस्तवीक्षणान्

devānpuraḥsthitānāha vinayānatakaṁdharān baddhāṁjalīnsādhvasāṁstāṁstatpādanyastavīkṣaṇān

सामने खड़े, विनम्रता से झुकी हुई ग्रीवा वाले, हाथ जोड़े, भयविह्वल, उनके चरणों पर दृष्टि टिकाए हुए देवगणों से कहा —

श्लोक 49 (skanda.2.63.49)

उवाच भगवान्स्निग्धगंभीरवचसा द्विजाः । किमर्थमागताः सर्वे युगपत्तु दिवौकसः

uvāca bhagavānsnigdhagaṁbhīravacasā dvijāḥ kimarthamāgatāḥ sarve yugapattu divaukasaḥ

भगवान् ने स्नेहपूर्ण, गंभीर वाणी में कहा, हे द्विजो! — "हे देवगणो! तुम सब एक साथ किस प्रयोजन से आए हो?

श्लोक 50 (skanda.2.63.50)

जैमिनिरुवाच । यत्कार्यं वो मया कार्यं विज्ञापयत मा चिरम् । इति श्रुत्वा वचो धातुस्त्रिदशा विगतज्वराः

jaiminiruvāca yatkāryaṁ vo mayā kāryaṁ vijñāpayata mā ciram iti śrutvā vaco dhātustridaśā vigatajvarāḥ

जैमिनि ने कहा — "जो भी कार्य तुम्हें मुझसे है, बिना विलंब के बताओ।" ब्रह्मा के इस वचन को सुनकर, चिंतारहित हुए त्रिदेव,

श्लोक 51 (skanda.2.63.51)

प्रत्यूचुर्हर्षिताः सर्वे भगवंतं पितामहम् । देवा ऊचुः । उपासितः पुरास्माभिर्यो नीलाद्रौ मणीमयः

pratyūcurharṣitāḥ sarve bhagavaṁtaṁ pitāmaham devā ūcuḥ upāsitaḥ purāsmābhiryo nīlādrau maṇīmayaḥ

सभी हर्षित होकर भगवान् पितामह को उत्तर देने लगे। देवों ने कहा — पहले हमने नीलाचल पर जिस मणिमय देव की उपासना की थी,

श्लोक 52 (skanda.2.63.52)

अन्तर्हितः कथं देव इदानीं दारुदेहधृक् । आविर्भूतः क्रतोरंत इन्द्रद्युम्नस्य भूपतेः

antarhitaḥ kathaṁ deva idānīṁ dārudehadhṛk āvirbhūtaḥ kratoraṁta indradyumnasya bhūpateḥ

वह देव अब कैसे अन्तर्हित हो गए, और दारु-शरीर धारण कर राजा इन्द्रद्युम्न के यज्ञ के अंत में क्यों प्रकट हुए?

श्लोक 53 (skanda.2.63.53)

एतस्य कारणं ज्ञातुं भवतः पादपंकजम् । आराधितुमिहायाताः प्रसीद कथयस्व तत्

etasya kāraṇaṁ jñātuṁ bhavataḥ pādapaṁkajam ārādhitumihāyātāḥ prasīda kathayasva tat

इसका कारण जानने के लिए, आपके चरण-कमलों की आराधना करने हम यहाँ आए हैं; प्रसन्न होकर हमें वह बताइए।

श्लोक 54 (skanda.2.63.54)

इत्युक्ते त्रिदशैर्देवो भगवान्पंकजासनः । रहस्यमेतद्भो देवाः कस्यचिन्नोदितं पुरा

ityukte tridaśairdevo bhagavānpaṁkajāsanaḥ rahasyametadbho devāḥ kasyacinnoditaṁ purā

देवगणों द्वारा ऐसा कहे जाने पर, कमलासन भगवान् बोले — "हे देवो! यह रहस्य पहले किसी से नहीं कहा गया था।

श्लोक 55 (skanda.2.63.55)

सर्वे समुदिता यस्मादपृच्छत चिरागताः । ततो वः कथयिष्यामि सुराणां गुह्यमुत्तमम्

sarve samuditā yasmādapṛcchata cirāgatāḥ tato vaḥ kathayiṣyāmi surāṇāṁ guhyamuttamam

चूंकि तुम सब दूर से आकर एकत्रित होकर पूछ रहे हो, अतः अब मैं तुम्हें देवताओं के इस परम गुह्य रहस्य को बताऊंगा।

श्लोक 56 (skanda.2.63.56)

पूर्वे परार्द्धे भो देवाः क्षेत्रं श्रीपुरुषोत्तमम् । नीलाश्मवपुरास्थाय न तत्याज जनार्दनः

pūrve parārddhe bho devāḥ kṣetraṁ śrīpuruṣottamam nīlāśmavapurāsthāya na tatyāja janārdanaḥ

हे देवो! पूर्वार्ध में श्रीपुरुषोत्तम-क्षेत्र में जनार्दन नीलाश्म-शरीर में स्थित रहकर उसे नहीं त्यागा,

श्लोक 57 (skanda.2.63.57)

सांप्रतं मे द्वितीयं तु परार्द्धं समुपस्थितम् । मनुः स्वायम्भुवो नाम श्वेतवाराहकल्पके

sāṁprataṁ me dvitīyaṁ tu parārddhaṁ samupasthitam manuḥ svāyambhuvo nāma śvetavārāhakalpake

अब मेरा द्वितीय परार्ध उपस्थित हो चुका है; यह श्वेतवाराह कल्प में स्वायम्भुव नामक मनु का काल है,

श्लोक 58 (skanda.2.63.58)

प्रवर्त्ततेऽयं कालो वै प्रातराद्यदिनस्य च । दारुमूर्तिरयं देवो भुवनानां हि मध्यमे

pravarttate'yaṁ kālo vai prātarādyadinasya ca dārumūrtirayaṁ devo bhuvanānāṁ hi madhyame

— जो मानो सृष्टि के दिन की प्रातःकाल के समान है। यह देव, दारु-मूर्ति में, समस्त भुवनों के मध्य में,

श्लोक 59 (skanda.2.63.59)

ममायुषः प्रमाणं तु स्थास्यते मानयन्प्रभुः । ममात्मा एष भगवानहमेतन्मयः सुराः

mamāyuṣaḥ pramāṇaṁ tu sthāsyate mānayanprabhuḥ mamātmā eṣa bhagavānahametanmayaḥ surāḥ

— मेरे आयु के प्रमाण तक स्थित रहेंगे, यह मान देते हुए वे प्रभु। यह भगवान् मेरी आत्मा ही है; हे देवो! मैं भी इसी से बना हूँ।

श्लोक 60 (skanda.2.63.60)

नावयोर्विद्यते किंचिदस्मिन्स्थावरजंगमे । क्षीरोदार्णवमध्ये हि श्वेतद्वीपे हि तल्पके

nāvayorvidyate kiṁcidasminsthāvarajaṁgame kṣīrodārṇavamadhye hi śvetadvīpe hi talpake

इस चराचर जगत् में हम दोनों के बीच कुछ भी भेद नहीं है। क्षीरसागर के मध्य में, श्वेतद्वीप की शय्या पर,

श्लोक 61 (skanda.2.63.61)

यः शेते योगनिद्रां तां मानयन्पुरुषोत्तमः । स मूलं जगतामादिस्तस्य रोमाणि यानि वै । तानि कल्पद्रुमाख्यानि शंखचक्रांकितानि वै

yaḥ śete yoganidrāṁ tāṁ mānayanpuruṣottamaḥ sa mūlaṁ jagatāmādistasya romāṇi yāni vai tāni kalpadrumākhyāni śaṁkhacakrāṁkitāni vai

— जो योगनिद्रा में शयन करते हैं, वे पुरुषोत्तम ही जगत् का मूल और आदि हैं; और उनके जो रोम हैं, वे ही शंख-चक्र से अंकित कल्पवृक्ष कहलाते हैं।

श्लोक 62 (skanda.2.63.62)

तन्मध्यस्थो ह्ययं वृक्षश्चैतन्याधिष्ठितः सुराः । स्वयमुत्पतितः सिंधोः सलिले सत्यपूरुषः

tanmadhyastho hyayaṁ vṛkṣaścaitanyādhiṣṭhitaḥ surāḥ svayamutpatitaḥ siṁdhoḥ salile satyapūruṣaḥ

उन्हीं के मध्य में स्थित यह वृक्ष, हे देवो! चैतन्य से अधिष्ठित है; सत्य-पुरुष स्वयं ही समुद्र के जल से उत्पन्न हुए,

श्लोक 63 (skanda.2.63.63)

भोगान्भोक्तुं त्रिलोकस्थान्दारुवर्ष्मा जनार्दनः । अनेकजन्मसाहस्रैर्भक्तियोगेन भावितः

bhogānbhoktuṁ trilokasthāndāruvarṣmā janārdanaḥ anekajanmasāhasrairbhaktiyogena bhāvitaḥ

— त्रिलोक में स्थित भोगों को भोगने हेतु, दारु-शरीरधारी जनार्दन, अनेक सहस्र जन्मों की भक्ति-साधना से प्रेरित होकर,

श्लोक 64 (skanda.2.63.64)

घोरसंसारनाशाय मया पूर्वं प्रयाचितः । पुनः पुनः सृष्टिलीनपालनोद्विग्नचेतसा

ghorasaṁsāranāśāya mayā pūrvaṁ prayācitaḥ punaḥ punaḥ sṛṣṭilīnapālanodvignacetasā

— घोर संसार के नाश हेतु, मेरे द्वारा पूर्वकाल में याचना किए गए; बार-बार सृष्टि, संहार और पालन से उद्विग्नचित्त होकर,

श्लोक 65 (skanda.2.63.65)

अशेषकर्मनाशाय जगतां सर्वमुक्तये । धारणाध्यानयोगानां दुष्कराणां विनापि सः

aśeṣakarmanāśāya jagatāṁ sarvamuktaye dhāraṇādhyānayogānāṁ duṣkarāṇāṁ vināpi saḥ

सम्पूर्ण कर्मों के नाश हेतु, जगत् की सर्वथा मुक्ति हेतु, वे दुष्कर धारणा, ध्यान और योग के बिना ही,

श्लोक 66 (skanda.2.63.66)

मोक्षाय भगवानाविर्बभूव पुरुषोत्तमः । प्रच्छन्नं वपुरेतस्य क्षेत्रं नास्य विचारयेत्

mokṣāya bhagavānāvirbabhūva puruṣottamaḥ pracchannaṁ vapuretasya kṣetraṁ nāsya vicārayet

— मोक्ष के लिए भगवान् पुरुषोत्तम प्रकट हुए। यहाँ उनका रूप गुप्त है; इस क्षेत्र में उनके विषय में तर्क-वितर्क नहीं करना चाहिए —

श्लोक 67 (skanda.2.63.67)

धर्मिग्राहप्रमाणेन यादृग्दृष्टः स एव सः । चतुर्वर्गप्रदो देवो यो यथा तं विभावयेत्

dharmigrāhapramāṇena yādṛgdṛṣṭaḥ sa eva saḥ caturvargaprado devo yo yathā taṁ vibhāvayet

जिसकी जैसी धार्मिक ग्रहण-शक्ति है, उसे वे उसी रूप में दिखते हैं; जो जिस प्रकार उनकी भावना करता है, वह देवता उसे उसी प्रकार चतुर्वर्ग प्रदान करता है।

श्लोक 68 (skanda.2.63.68)

तद्दर्शनपरिक्षीणपापसंघाः क्रमाद्भुवि । भवन्ति निर्मलात्मानः पुरुषा मुक्तिभाजनम्

taddarśanaparikṣīṇapāpasaṁghāḥ kramādbhuvi bhavanti nirmalātmānaḥ puruṣā muktibhājanam

उसके दर्शन से जिनके पापों का समूह क्षीण हो जाता है, वे मनुष्य पृथ्वी पर क्रमशः निर्मल आत्मा वाले होकर मुक्ति के अधिकारी बनते हैं।

श्लोक 69 (skanda.2.63.69)

जैमिनिरुवाच । एतच्छ्रुत्वा तु ते देवाः पद्मयोनेर्वचोमृतम् । हृष्टाः संचिंतयामासुः प्रहृष्टेनांतरात्मना

jaiminiruvāca etacchrutvā tu te devāḥ padmayonervacomṛtam hṛṣṭāḥ saṁciṁtayāmāsuḥ prahṛṣṭenāṁtarātmanā

जैमिनि ने कहा — पद्मयोनि ब्रह्मा के इस अमृततुल्य वचन को सुनकर, वे देवगण हर्षित होकर, प्रसन्न अंतरात्मा से विचार करने लगे —

श्लोक 70 (skanda.2.63.70)

अचिरस्थायि देवत्वं विहायैतद्भुवं गताः । अस्मिन्क्षेत्रवरे देवमाराध्यामः सुसंयताः

acirasthāyi devatvaṁ vihāyaitadbhuvaṁ gatāḥ asminkṣetravare devamārādhyāmaḥ susaṁyatāḥ

"इस अस्थायी देवत्व को त्यागकर, इस पृथ्वी पर जाकर, संयमपूर्वक इस श्रेष्ठ क्षेत्र में उस देव की आराधना करें।"

श्लोक 71 (skanda.2.63.71)

हर्षप्रफुल्लवदनान्सुरान्दृष्ट्वा पितामह । इन्द्रद्युम्नानुग्रहाय यः प्रकाशं गतः प्रभुः

harṣapraphullavadanānsurāndṛṣṭvā pitāmaha indradyumnānugrahāya yaḥ prakāśaṁ gataḥ prabhuḥ

हर्ष से खिले हुए मुख वाले देवगणों को देखकर पितामह ने — और वह प्रभु, जो इन्द्रद्युम्न पर अनुग्रह हेतु प्रकट हुए थे,

श्लोक 72 (skanda.2.63.72)

याताऽत्र प्रतिमा त्वस्य स्वयमेव वदिष्यति । वरान्प्रदास्यति बहून्भगवान्भक्तवत्सलः

yātā'tra pratimā tvasya svayameva vadiṣyati varānpradāsyati bahūnbhagavānbhaktavatsalaḥ

"— यहाँ आई हुई यह प्रतिमा स्वयं ही बोलेगी; भक्तवत्सल भगवान् अनेक वर देंगे।

श्लोक 73 (skanda.2.63.73)

प्रासादमिन्द्रद्युम्नस्य प्रतिष्ठापयितुं विभुम् । अहं चापि गमिष्यामि यूयं तत्र प्रयात वै

prāsādamindradyumnasya pratiṣṭhāpayituṁ vibhum ahaṁ cāpi gamiṣyāmi yūyaṁ tatra prayāta vai

इन्द्रद्युम्न के मंदिर में उस विभु की प्रतिष्ठा करने हेतु, मैं भी वहाँ जाऊंगा; तुम भी वहाँ चलो।

श्लोक 74 (skanda.2.63.74)

इन्द्रद्युम्नोऽग्रतो यातु प्रतिष्ठावस्तुसंभृतौ । सहायास्तत्र भवत यूयं क्षीणाधिकारिणः

indradyumno'grato yātu pratiṣṭhāvastusaṁbhṛtau sahāyāstatra bhavata yūyaṁ kṣīṇādhikāriṇaḥ

इन्द्रद्युम्न प्रतिष्ठा की सामग्री जुटाने हेतु आगे जाएं; तुम, जिनका अधिकार-काल क्षीण हो चुका है, वहाँ उसके सहायक बनो।

श्लोक 75 (skanda.2.63.75)

मन्वन्तरं व्यतीतं वै प्रथमं सांप्रतं सुराः । इन्द्रद्युम्नेन सहितास्तत्र गत्वा सुरोत्तमाः

manvantaraṁ vyatītaṁ vai prathamaṁ sāṁprataṁ surāḥ indradyumnena sahitāstatra gatvā surottamāḥ

हे सुरो! पहला मन्वंतर बीत चुका है; इन्द्रद्युम्न के साथ वहाँ जाकर, हे सुरश्रेष्ठो!

श्लोक 76 (skanda.2.63.76)

प्रासादप्रतिमानां च विधर्ता स्वाम्यमस्य वै । तस्मात्संभृतसंभारः ससहायोऽधुना ह्यसौ

prāsādapratimānāṁ ca vidhartā svāmyamasya vai tasmātsaṁbhṛtasaṁbhāraḥ sasahāyo'dhunā hyasau

— वे ही मंदिर और मूर्तियों के विधाता तथा इसके स्वामी हैं। अतः अब सामग्री एकत्र करके, सहायकों सहित,

श्लोक 77 (skanda.2.63.77)

अस्य संततिसंबन्धस्मरणादपि भूतले । मदाज्ञया पद्मनिधिः सह यास्यति भूतलम्

asya saṁtatisaṁbandhasmaraṇādapi bhūtale madājñayā padmanidhiḥ saha yāsyati bhūtalam

— इसके वंश-संबंध का स्मरण करके ही, मेरी आज्ञा से पद्मनिधि (विश्वकर्मा) भी उसके साथ पृथ्वी पर जाएंगे,

श्लोक 78 (skanda.2.63.78)

प्रतिष्ठायै भगवतः संयतौ सर्ववस्तुनः । इन्द्रद्युम्नोऽपि हृष्टात्मा दृष्ट्वा ब्राह्मीं श्रियं द्विजाः

pratiṣṭhāyai bhagavataḥ saṁyatau sarvavastunaḥ indradyumno'pi hṛṣṭātmā dṛṣṭvā brāhmīṁ śriyaṁ dvijāḥ

— दोनों संयमपूर्वक भगवान् की प्रतिष्ठा हेतु समस्त सामग्री की व्यवस्था करेंगे। हे द्विजो! इन्द्रद्युम्न भी ब्राह्मी शोभा देखकर हर्षित मन से,

श्लोक 79 (skanda.2.63.79)

महदाश्चर्यसंपन्नः प्रणिपत्य जगद्गुरुम् । तदाज्ञां शिरसा धृत्वा देवैः क्षीणाधिकारिभिः

mahadāścaryasaṁpannaḥ praṇipatya jagadgurum tadājñāṁ śirasā dhṛtvā devaiḥ kṣīṇādhikāribhiḥ

— महान् आश्चर्य से युक्त होकर, जगद्गुरु को प्रणाम कर, उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करके, अधिकार-रहित हुए देवों के साथ,

श्लोक 80 (skanda.2.63.80)

आजगाम भुवं विप्रा विधिना चानुमोदिताः

ājagāma bhuvaṁ viprā vidhinā cānumoditāḥ

हे विप्रो! विधिपूर्वक अनुमोदित होकर पृथ्वी पर आ गए।

अध्याय 62अध्याय-सूचीअध्याय 64