वैष्णव खण्ड · अध्याय 64
पुरुष-सूक्त-स्तवन और नीलाचल पर पूर्व-निर्मित मंदिर
श्लोक 1 (skanda.2.64.1)
जैमिनिरुवाच । आगत्य च जगन्नाथं चिरादुत्कंठमानसः । दंडवत्प्रणनामासौ घनरोमांचकंचुकः
jaiminiruvāca āgatya ca jagannāthaṁ cirādutkaṁṭhamānasaḥ daṁḍavatpraṇanāmāsau ghanaromāṁcakaṁcukaḥ
जैमिनि ने कहा — दीर्घकाल से उत्कंठित मन वाले उस राजा ने जगन्नाथ के समक्ष आकर, रोमांच से आवृत होकर, दण्डवत् प्रणाम किया।
श्लोक 2 (skanda.2.64.2)
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । प्रणतार्तिविनाशाय चतुर्वर्गैकहेतवे
namo brahmaṇyadevāya gobrāhmaṇahitāya ca praṇatārtivināśāya caturvargaikahetave
"ब्रह्मण्यदेव को नमस्कार, गौ और ब्राह्मणों के हितकारी को, शरणागतों की पीड़ा नष्ट करने वाले को, चतुर्वर्ग के एकमात्र हेतु को नमस्कार —
श्लोक 3 (skanda.2.64.3)
हिरण्यगर्भपुरुषप्रधानव्यक्तरूपिणे । ॐ नमो वासुदेवाय शुद्धज्ञानस्वरूपिणे
hiraṇyagarbhapuruṣapradhānavyaktarūpiṇe oṁ namo vāsudevāya śuddhajñānasvarūpiṇe
— हिरण्यगर्भ, पुरुष और प्रधान के व्यक्त रूप वाले को; ॐ, शुद्ध ज्ञान-स्वरूप वासुदेव को नमस्कार।
श्लोक 4 (skanda.2.64.4)
इत्युच्चरन्स्तुतिं भूपः सानंदाश्रुविलोचनः । प्रदक्षिणं पुनः कुर्वन्ननाम च पुनःपुनः
ityuccaranstutiṁ bhūpaḥ sānaṁdāśruvilocanaḥ pradakṣiṇaṁ punaḥ kurvannanāma ca punaḥpunaḥ
इस स्तुति का उच्चारण करते हुए राजा, आनंद के आँसुओं से भरे नेत्रों वाला, पुनः प्रदक्षिणा करते हुए बार-बार प्रणाम करने लगा।
श्लोक 5 (skanda.2.64.5)
ततोऽन्या देवता या वै तत्रागच्छन्मुदान्विताः । तुष्टुवुः प्रणता देवं कृतांजलिपुटा मुदा
tato'nyā devatā yā vai tatrāgacchanmudānvitāḥ tuṣṭuvuḥ praṇatā devaṁ kṛtāṁjalipuṭā mudā
तत्पश्चात् वहाँ आए हुए अन्य देवगण भी आनंदपूर्वक, प्रणत होकर, हर्षपूर्वक हाथ जोड़कर देव की स्तुति करने लगे।
श्लोक 6 (skanda.2.64.6)
देवा ऊचुः । सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं सर्वतो व्याप्य अध्यतिष्ठद्दशांगुलम्
devā ūcuḥ sahasraśīrṣā puruṣaḥ sahasrākṣaḥ sahasrapāt sa bhūmiṁ sarvato vyāpya adhyatiṣṭhaddaśāṁgulam
देवों ने कहा — पुरुष सहस्र शिरों वाला, सहस्र नेत्रों वाला, सहस्र चरणों वाला है; वह पृथ्वी को चारों ओर से व्याप्त करके भी दस अंगुल शेष रहकर स्थित है।
श्लोक 7 (skanda.2.64.7)
यः पुमान्परमं ब्रह्म परमात्मेति गीयते । भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं पुरुष एव तत्
yaḥ pumānparamaṁ brahma paramātmeti gīyate bhūtaṁ bhavyaṁ bhaviṣyaṁ ca sarvaṁ puruṣa eva tat
जो पुरुष परम ब्रह्म, परमात्मा कहलाता है — जो कुछ हो चुका है, जो कुछ होगा, वह सब कुछ यह पुरुष ही है।
श्लोक 8 (skanda.2.64.8)
एतावानस्य महिमा ज्यायानेष पुमान्प्रभुः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि
etāvānasya mahimā jyāyāneṣa pumānprabhuḥ pādo'sya viśvā bhūtāni tripādasyāmṛtaṁ divi
उसकी महिमा इतनी है, फिर भी यह पुरुष प्रभु उससे भी महान् है; समस्त प्राणी उसका एक चरण मात्र हैं, तीन चरण तो स्वर्ग में अमृतरूप हैं।
श्लोक 9 (skanda.2.64.9)
छन्दांसि जज्ञिरे त्वत्तस्त्वत्तो यज्ञपुमानपि । त्वत्तोऽश्वाश्च व्यजायंत गावो मेषादयस्तथा
chandāṁsi jajñire tvattastvatto yajñapumānapi tvatto'śvāśca vyajāyaṁta gāvo meṣādayastathā
तुझसे छन्द उत्पन्न हुए, तुझसे ही यज्ञ-पुरुष भी; तुझसे अश्व उत्पन्न हुए, तथा गौ, भेड़ आदि भी।
श्लोक 10 (skanda.2.64.10)
ब्राह्मणा मुखतो जाता बाहुजाः क्षत्रियास्तव । विशस्तवोरुजा पद्भ्यां तथा शूद्राः समागताः
brāhmaṇā mukhato jātā bāhujāḥ kṣatriyāstava viśastavorujā padbhyāṁ tathā śūdrāḥ samāgatāḥ
तेरे मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए, बाहुओं से क्षत्रिय; जंघाओं से वैश्य, तथा चरणों से शूद्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 11 (skanda.2.64.11)
मनसश्चंद्रमा जातश्चक्षुषस्ते दिवाकरः । कर्णाभ्यां श्वसनः प्राणैर्जिह्वाया हव्यवाडपि
manasaścaṁdramā jātaścakṣuṣaste divākaraḥ karṇābhyāṁ śvasanaḥ prāṇairjihvāyā havyavāḍapi
तेरे मन से चंद्रमा उत्पन्न हुआ, नेत्र से सूर्य; कानों से वायु, तथा जिह्वा और प्राणों से अग्नि भी उत्पन्न हुआ।
श्लोक 12 (skanda.2.64.12)
नाभितो गगनं द्यौश्च मूर्ध्नस्ते समवर्त्तत । पादाभ्यां ते धरा जाता दिशश्चाष्टौ श्रुतेर्गताः
nābhito gaganaṁ dyauśca mūrdhnaste samavarttata pādābhyāṁ te dharā jātā diśaścāṣṭau śrutergatāḥ
तेरी नाभि से अंतरिक्ष, तेरे सिर से द्युलोक उत्पन्न हुआ; तेरे चरणों से पृथ्वी उत्पन्न हुई, और श्रवण से आठों दिशाएं उत्पन्न हुईं।
श्लोक 13 (skanda.2.64.13)
सप्तासन्परिधयस्त्वत्त एकविंशत्समिच्च वै । चराचराः सर्वभावास्त्वत्त एव हि जज्ञिरे
saptāsanparidhayastvatta ekaviṁśatsamicca vai carācarāḥ sarvabhāvāstvatta eva hi jajñire
तुझसे ही सात परिधियाँ हुईं, तथा इक्कीस समिधाएं भी; समस्त चराचर भाव तुझसे ही उत्पन्न हुए।
श्लोक 14 (skanda.2.64.14)
त्वमेव जगतां नाथस्त्वमेव परिपालकः । उग्ररूपश्च संहर्ता त्वमेव परमेश्वर
tvameva jagatāṁ nāthastvameva paripālakaḥ ugrarūpaśca saṁhartā tvameva parameśvara
तू ही जगत् का स्वामी है, तू ही पालनकर्ता है; और उग्र रूप में संहारक भी तू ही है, हे परमेश्वर!
श्लोक 15 (skanda.2.64.15)
त्वमेव यज्ञो यज्ञांशस्त्वं यज्ञेशः परात्परः । शब्दब्रह्मपरं त्वं हि शब्दब्रह्मासि विश्वराट्
tvameva yajño yajñāṁśastvaṁ yajñeśaḥ parātparaḥ śabdabrahmaparaṁ tvaṁ hi śabdabrahmāsi viśvarāṭ
तू ही यज्ञ है, यज्ञ का अंश है, तू ही यज्ञेश, परात्पर है; तू ही शब्द-ब्रह्म से परे है, और तू ही शब्द-ब्रह्म भी है, हे विश्वराट्!
श्लोक 16 (skanda.2.64.16)
स्वराट् सम्राड्जगन्नाथ विराडसि जगत्पते । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्त्वं त्वया व्याप्तं जगन्मय
svarāṭ samrāḍjagannātha virāḍasi jagatpate adhaścordhvaṁ ca tiryaktvaṁ tvayā vyāptaṁ jaganmaya
तू स्वराट्, सम्राट्, हे जगन्नाथ! तू ही विराट् है, हे जगत्पते! नीचे, ऊपर और आड़े-तिरछे — सर्वत्र तूने ही इस जगत् को व्याप्त कर रखा है, हे विश्वस्वरूप!
श्लोक 17 (skanda.2.64.17)
प्राप्नुवंति परं स्थानं त्वां यजंतश्च याज्ञिकाः । भोज्यं भोक्ता हविर्होता हवनं त्वं फलप्रदः
prāpnuvaṁti paraṁ sthānaṁ tvāṁ yajaṁtaśca yājñikāḥ bhojyaṁ bhoktā havirhotā havanaṁ tvaṁ phalapradaḥ
तुझे यजने वाले याज्ञिक परम स्थान को प्राप्त करते हैं; तू ही भोज्य है, भोक्ता है, हवि है, होता है, हवन है, और फलदाता भी तू ही है।
श्लोक 18 (skanda.2.64.18)
समस्तकर्मभोक्ता त्वं सर्वकर्मात्मकः प्रभो । सर्वकर्मोपकरणं सर्वकर्मफलप्रदः
samastakarmabhoktā tvaṁ sarvakarmātmakaḥ prabho sarvakarmopakaraṇaṁ sarvakarmaphalapradaḥ
तू ही समस्त कर्मों का भोक्ता है, हे प्रभो! सर्वकर्मात्मक है; सर्वकर्मों का साधन तथा सर्वकर्मों का फलदाता भी तू ही है।
श्लोक 19 (skanda.2.64.19)
कर्मप्रेरयिता त्वं हि धर्मकामार्थसिद्धिदः । त्वामृते मुक्तिदः कोऽन्यो हृषीकेश नमोऽस्तु ते
karmaprerayitā tvaṁ hi dharmakāmārthasiddhidaḥ tvāmṛte muktidaḥ ko'nyo hṛṣīkeśa namo'stu te
तू ही कर्मों का प्रेरक है, धर्म, अर्थ, काम की सिद्धि देने वाला है; तेरे बिना और कौन मुक्ति देने वाला है, हे हृषीकेश! तुझे नमस्कार हो।
श्लोक 20 (skanda.2.64.20)
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्त्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे । सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः
namo'stvanantāya sahasramūrttaye sahasrapādākṣiśirorubāhave sahasranāmne puruṣāya śāśvate sahasrakoṭīyugadhāriṇe namaḥ
अनंत को नमस्कार, सहस्र मूर्तियों वाले, सहस्र चरण-नेत्र-शिर-जंघा-बाहु वाले को; सहस्र नामों वाले, शाश्वत, सहस्रकोटि युगों को धारण करने वाले पुरुष को नमस्कार।
श्लोक 21 (skanda.2.64.21)
वयं च्युताधिकारास्त्वां प्रपन्नाः शरणं प्रभो । त्राहि नः पुंडरीकाक्ष अगतीनां गतिर्भव
vayaṁ cyutādhikārāstvāṁ prapannāḥ śaraṇaṁ prabho trāhi naḥ puṁḍarīkākṣa agatīnāṁ gatirbhava
हम, अपने अधिकार से च्युत होकर, हे प्रभो! तेरी शरण में आए हैं; हे पुण्डरीकाक्ष! हमारी रक्षा कर, अगतियों की गति बन।
श्लोक 22 (skanda.2.64.22)
संसारपतितस्यैको जन्तोस्त्वं शरणं प्रभो । त्वत्सृष्टौ त्वादृशो नास्ति यो दीनपरिपालकः
saṁsārapatitasyaiko jantostvaṁ śaraṇaṁ prabho tvatsṛṣṭau tvādṛśo nāsti yo dīnaparipālakaḥ
संसार में गिरे हुए प्राणी की तू ही एकमात्र शरण है, हे प्रभो! तेरी सृष्टि में तेरे समान दीनों का पालक कोई और नहीं है।
श्लोक 23 (skanda.2.64.23)
दीनानाथैकशरणं पिता त्वं जगतः प्रभो । पाता पोष्टा त्वमेवेश सर्वापद्विनिवारकः
dīnānāthaikaśaraṇaṁ pitā tvaṁ jagataḥ prabho pātā poṣṭā tvameveśa sarvāpadvinivārakaḥ
तू ही दीन-अनाथों की एकमात्र शरण है, जगत् का पिता है, हे प्रभो! तू ही रक्षक, पोषक और समस्त आपत्तियों का निवारक है, हे ईश!
श्लोक 24 (skanda.2.64.24)
त्राहि विष्णो जगन्नाथ त्राहि नः परमेश्वर । त्वामृते कमलाकांत कः शक्तः परिरक्षणे
trāhi viṣṇo jagannātha trāhi naḥ parameśvara tvāmṛte kamalākāṁta kaḥ śaktaḥ parirakṣaṇe
रक्षा कर, हे विष्णो! हे जगन्नाथ! रक्षा कर, हे परमेश्वर! हे कमलाकान्त! तेरे बिना और कौन रक्षा करने में समर्थ है?
श्लोक 25 (skanda.2.64.25)
अन्तर्यामिन्नमस्तेऽस्तु सर्वतेजोनिधे नमः
antaryāminnamaste'stu sarvatejonidhe namaḥ
हे अंतर्यामिन्! तुझे नमस्कार हो; हे समस्त तेज के भंडार! तुझे नमस्कार हो।
श्लोक 26 (skanda.2.64.26)
इति स्तुवंतस्ते देवाः प्रणिपत्य पुनःपुनः । इंद्रद्युम्नेन सहिता बहिर्भूय द्विजोत्तमाः
iti stuvaṁtaste devāḥ praṇipatya punaḥpunaḥ iṁdradyumnena sahitā bahirbhūya dvijottamāḥ
इस प्रकार स्तुति करते हुए वे देवगण बार-बार प्रणाम करके, इन्द्रद्युम्न के साथ, हे द्विजोत्तमो! बाहर आ गए,
श्लोक 27 (skanda.2.64.27)
क्षेत्रं श्रीनरसिंहस्य गत्वा तं प्रणिपत्य च । नमस्कृत्य परां भक्तिं कृत्वाभ्यर्च्य नृकेसरिम्
kṣetraṁ śrīnarasiṁhasya gatvā taṁ praṇipatya ca namaskṛtya parāṁ bhaktiṁ kṛtvābhyarcya nṛkesarim
और श्रीनृसिंह के क्षेत्र में जाकर, उन्हें प्रणाम करके, परम भक्तिपूर्वक नमस्कार और पूजन करके,
श्लोक 28 (skanda.2.64.28)
नीलाचलाद्रेः शिखरं यत्र प्रासाद उत्तमः । ययुस्ते पद्मनिधिना सार्द्धं संभारकारणात्
nīlācalādreḥ śikharaṁ yatra prāsāda uttamaḥ yayuste padmanidhinā sārddhaṁ saṁbhārakāraṇāt
— नीलाचल पर्वत के उस शिखर पर, जहाँ श्रेष्ठ मंदिर था, वे पद्मनिधि के साथ सामग्री जुटाने के हेतु गए।
श्लोक 29 (skanda.2.64.29)
ददृशुस्ते महाप्रांशुं व्याप्तं गगनमण्डले । उत्तिष्ठंतं विंध्यगिरिं रोद्धुं भानोर्गतिं किमु
dadṛśuste mahāprāṁśuṁ vyāptaṁ gaganamaṇḍale uttiṣṭhaṁtaṁ viṁdhyagiriṁ roddhuṁ bhānorgatiṁ kimu
उन्होंने उसे देखा — अत्यंत ऊँचा, आकाश-मंडल में व्याप्त, मानो सूर्य की गति को रोकने के लिए उठता हुआ विंध्य पर्वत ही हो!
श्लोक 30 (skanda.2.64.30)
व्यश्नुवानं दिशः सर्वा विचित्रघटनोज्ज्वलम् । बहुकालव्यतिक्रांतस्वस्तिभंगिविचित्रकम्
vyaśnuvānaṁ diśaḥ sarvā vicitraghaṭanojjvalam bahukālavyatikrāṁtasvastibhaṁgivicitrakam
— जो समस्त दिशाओं में व्याप्त था, विचित्र रचना से उज्ज्वल था, दीर्घकाल से संचित विविध शिल्प-रचनाओं से विचित्र था।
श्लोक 31 (skanda.2.64.31)
ततश्च चिंतयामास इन्द्रद्युम्नः स वैष्णवः । घटनार्थे मया यातः सत्यलोकमितः पुरा
tataśca ciṁtayāmāsa indradyumnaḥ sa vaiṣṇavaḥ ghaṭanārthe mayā yātaḥ satyalokamitaḥ purā
तब उस वैष्णव इन्द्रद्युम्न ने विचार किया — "मैं यहाँ से रचना के प्रयोजन से पहले सत्यलोक गया था —
श्लोक 32 (skanda.2.64.32)
सुचिराद्दृष्टिपथगः पूर्णः प्रासाद उत्तमः । अनुग्रहाद्वै देवस्य नात्र मानुषपौरुषम्
sucirāddṛṣṭipathagaḥ pūrṇaḥ prāsāda uttamaḥ anugrahādvai devasya nātra mānuṣapauruṣam
— और इतने दीर्घकाल के बाद ही यह श्रेष्ठ मंदिर दृष्टिगोचर होकर पूर्ण हुआ है। यह तो देव की कृपा से ही हुआ है; इसमें मानवीय पुरुषार्थ नहीं है।
श्लोक 33 (skanda.2.64.33)
मन्वंतरसमाप्तिः क्व सूर्यचन्द्रेंद्ररोधिका । तथापि तिष्ठते चायं प्रासादो ह्येष दुर्लभः
manvaṁtarasamāptiḥ kva sūryacandreṁdrarodhikā tathāpi tiṣṭhate cāyaṁ prāsādo hyeṣa durlabhaḥ
कहाँ तो एक मन्वंतर की समाप्ति, जो सूर्य, चंद्र और इंद्र को भी अवरुद्ध कर देती है, और कहाँ यह दुर्लभ मंदिर, जो अभी भी खड़ा है!
श्लोक 34 (skanda.2.64.34)
वल्मीकसदृशा ह्येते प्रासादा मानुषैः कृताः । शीर्यंति रोहणैर्वृक्षैः स्वल्पकालगतायुषः
valmīkasadṛśā hyete prāsādā mānuṣaiḥ kṛtāḥ śīryaṁti rohaṇairvṛkṣaiḥ svalpakālagatāyuṣaḥ
मनुष्यों द्वारा बनाए गए मंदिर तो वल्मीक के समान हैं; अल्पजीवी होकर वे उग आए वृक्षों से जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं।
श्लोक 35 (skanda.2.64.35)
मदनुक्रोशबुद्ध्या तु रक्षितं भवनं हरेः । ततस्तान्स सहायान्वै जगाद प्रश्रयं वचः
madanukrośabuddhyā tu rakṣitaṁ bhavanaṁ hareḥ tatastānsa sahāyānvai jagāda praśrayaṁ vacaḥ
परंतु हरि के इस भवन की रक्षा तो मुझ पर उनकी कृपा-बुद्धि से ही हुई है।" तब उसने अपने उन सहायकों से विनम्र वचन कहे —
श्लोक 36 (skanda.2.64.36)
जानीत जगदीशस्य प्रासादं कारितं मया । आविर्बभूव भगवान्दारुरूपवपुः स्वयम् । तदांतरिक्षगा वाणी मामुवाचाशरीरिणी
jānīta jagadīśasya prāsādaṁ kāritaṁ mayā āvirbabhūva bhagavāndārurūpavapuḥ svayam tadāṁtarikṣagā vāṇī māmuvācāśarīriṇī
"जानो कि मैंने ही जगदीश का यह मंदिर बनवाया था। भगवान् स्वयं दारु-रूप में प्रकट हुए, और तब आकाशवाणी ने अशरीरी रूप में मुझसे कहा —
श्लोक 37 (skanda.2.64.37)
सहस्रपाणिसंमितं नीलाद्रेः शिखरोपरि । प्रासादं कारयस्वेति स्थितये जगदीशितुः
sahasrapāṇisaṁmitaṁ nīlādreḥ śikharopari prāsādaṁ kārayasveti sthitaye jagadīśituḥ
— 'नीलाचल के शिखर पर सहस्र हाथ प्रमाण का मंदिर बनवाओ, जगदीश्वर के स्थायी निवास हेतु।'
श्लोक 38 (skanda.2.64.38)
एतत्प्रतिष्ठानविधौ स्वयमत्रागमिष्यति । पद्मयोनिः स्वयं सार्द्धं सिद्धब्रह्मर्षिदैवतैः
etatpratiṣṭhānavidhau svayamatrāgamiṣyati padmayoniḥ svayaṁ sārddhaṁ siddhabrahmarṣidaivataiḥ
'इसकी प्रतिष्ठा-विधि में स्वयं पद्मयोनि ब्रह्मा सिद्धों, ब्रह्मर्षियों और देवताओं के साथ यहाँ पधारेंगे।'
श्लोक 39 (skanda.2.64.39)
तदत्र क्रियते को वा संभारो ज्ञायते कथम् । इत्युक्तवंतं ते प्रोचुर्देवा भग्नाधिकारिणः
tadatra kriyate ko vā saṁbhāro jñāyate katham ityuktavaṁtaṁ te procurdevā bhagnādhikāriṇaḥ
'तो यहाँ यह किया किसके द्वारा हो रहा है, और सामग्री का ज्ञान कैसे हो?'" इस प्रकार कहने पर, अधिकार-रहित हुए देवों ने कहा —
श्लोक 40 (skanda.2.64.40)
देवा ऊचुः । न जानीमो वयमपि तदस्माकं गुरुर्गुरुः । इदानीं न वशेऽस्माकं स हि स्वर्गपरो हितः
devā ūcuḥ na jānīmo vayamapi tadasmākaṁ gururguruḥ idānīṁ na vaśe'smākaṁ sa hi svargaparo hitaḥ
देवों ने कहा — "हम भी नहीं जानते; वह तो हमारे गुरु के भी गुरु का विषय है; अब वह हमारे वश में नहीं है, क्योंकि वह तो स्वर्ग से भी परे हित वाला है।
श्लोक 41 (skanda.2.64.41)
पद्मनिधिरुवाच । स्वामिन्विधेरनुज्ञानादागतोऽस्मि त्वया सह । कर्तव्यं किं मया चात्र किं वा वस्तु प्रतीक्ष्यते
padmanidhiruvāca svāminvidheranujñānādāgato'smi tvayā saha kartavyaṁ kiṁ mayā cātra kiṁ vā vastu pratīkṣyate
पद्मनिधि ने कहा — "हे स्वामिन्! विधाता की अनुज्ञा से मैं आपके साथ यहाँ आया हूँ; अब मुझे यहाँ क्या करना है, अथवा किस वस्तु की प्रतीक्षा करनी है?"
श्लोक 42 (skanda.2.64.42)
जैमिनिरुवाच । इति ह्यालप्यमानानां नारदः पुरतः स्थितः । ब्रह्मणा प्रेषितः पूर्वं सर्वशास्त्रविशारदः
jaiminiruvāca iti hyālapyamānānāṁ nāradaḥ purataḥ sthitaḥ brahmaṇā preṣitaḥ pūrvaṁ sarvaśāstraviśāradaḥ
जैमिनि ने कहा — इस प्रकार बातचीत करते हुए उनके सामने, ब्रह्मा द्वारा पहले ही भेजे गए, सर्वशास्त्रविशारद नारद उपस्थित हुए,
श्लोक 43 (skanda.2.64.43)
सर्वसंभारवस्तूनि यथाशास्त्रं मुने कुरु । संपादयिष्यति तव शासनात्पद्मको निधिः
sarvasaṁbhāravastūni yathāśāstraṁ mune kuru saṁpādayiṣyati tava śāsanātpadmako nidhiḥ
— और कहा — "हे मुने! शास्त्रानुसार समस्त सामग्री जुटाओ; तुम्हारी आज्ञा से पद्मक निधि उसे संपादित करेंगे।"
श्लोक 44 (skanda.2.64.44)
तं दृष्ट्वा ते मुदा युक्ता उत्तस्थुर्ब्रह्मणः सुतम् । षडर्घ्यपूजया तस्य पूजां चक्रे नृपोत्तमः
taṁ dṛṣṭvā te mudā yuktā uttasthurbrahmaṇaḥ sutam ṣaḍarghyapūjayā tasya pūjāṁ cakre nṛpottamaḥ
उन्हें देखकर वे हर्षपूर्वक ब्रह्मपुत्र नारद के सम्मान में उठ खड़े हुए; नृपश्रेष्ठ ने षडर्घ्य-पूजा से उनकी पूजा की।
श्लोक 45 (skanda.2.64.45)
प्रणेमुस्तेऽपि तं देवा मनुष्याकारधारिणः । ऊचे तमिंद्रद्युम्नोऽपि प्रतिष्ठाविधिवस्तुनि
praṇemuste'pi taṁ devā manuṣyākāradhāriṇaḥ ūce tamiṁdradyumno'pi pratiṣṭhāvidhivastuni
मनुष्य-रूपधारी देवगण भी उन्हें प्रणाम करने लगे; इन्द्रद्युम्न ने भी प्रतिष्ठा-विधि की सामग्री के विषय में उनसे कहा —
श्लोक 46 (skanda.2.64.46)
नाहं वेद्मि मुनिश्रेष्ठ चिरात्त्यक्तः पुरोधसा । आदेशय क्रमाद्ब्रह्मन्संपाद्यं यद्यदेव हि
nāhaṁ vedmi muniśreṣṭha cirāttyaktaḥ purodhasā ādeśaya kramādbrahmansaṁpādyaṁ yadyadeva hi
"हे मुनिश्रेष्ठ! मैं नहीं जानता; मुझे पुरोहित ने दीर्घकाल पूर्व त्याग दिया था। हे ब्रह्मन्! जो कुछ भी संपादित करना है, वह क्रमशः बताइए।"