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वैष्णव खण्ड · अध्याय 65

तीन रथों का निर्माण और प्रतिष्ठा-विधि

अध्याय 64अध्याय-सूचीअध्याय 66

श्लोक 1 (skanda.2.65.1)

जैमिनिरुवाच । इत्युक्ते नारदः सोऽथ यथाशास्त्रं विचार्य वै । आलेख्य क्रमशः पत्रे राज्ञे तस्मै न्यवेदयत्

jaiminiruvāca ityukte nāradaḥ so'tha yathāśāstraṁ vicārya vai ālekhya kramaśaḥ patre rājñe tasmai nyavedayat

जैमिनि ने कहा — यह कहे जाने पर नारद ने शास्त्रानुसार विचार करके, क्रमशः पत्र पर लिखकर उस राजा को निवेदन किया।

श्लोक 2 (skanda.2.65.2)

राजापि पत्रं तच्छुत्वा सोऽवधार्य पुनःपुनः । प्रददौ पद्मनिधये लिखितान्यत्र यानि वै

rājāpi patraṁ tacchutvā so'vadhārya punaḥpunaḥ pradadau padmanidhaye likhitānyatra yāni vai

राजा ने भी उस पत्र को सुनकर, बार-बार विचार करके, जो कुछ भी उसमें लिखा था, वह पद्मनिधि को सौंप दिया —

श्लोक 3 (skanda.2.65.3)

संपादय पद्मनिधे शालां स्वर्णमयीं कुरु । ब्रह्मणः सदनं दिव्यं ब्रह्मर्षीणां च निर्मलम्

saṁpādaya padmanidhe śālāṁ svarṇamayīṁ kuru brahmaṇaḥ sadanaṁ divyaṁ brahmarṣīṇāṁ ca nirmalam

"हे पद्मनिधे! इसे संपन्न करो; स्वर्णमयी शाला बनाओ — ब्रह्मा के लिए दिव्य निवास, और ब्रह्मर्षियों के लिए निर्मल निवास,

श्लोक 4 (skanda.2.65.4)

इंद्रादीनां सुराणां च सिद्धानां मर्त्यवासिनाम् । मुनींद्राणां निवासाय राज्ञां पातालवासिनाम्

iṁdrādīnāṁ surāṇāṁ ca siddhānāṁ martyavāsinām munīṁdrāṇāṁ nivāsāya rājñāṁ pātālavāsinām

— इंद्र आदि देवों के लिए, तथा मर्त्यलोक-वासी सिद्धों के लिए, मुनीन्द्रों के निवास हेतु, तथा पाताल-निवासी राजाओं के लिए,

श्लोक 5 (skanda.2.65.5)

तथा च नागराजानां निधे त्रैलोक्यवासिनाम् । यथायोग्यासनैर्युक्तं गृहं गृहमतंद्रितः

tathā ca nāgarājānāṁ nidhe trailokyavāsinām yathāyogyāsanairyuktaṁ gṛhaṁ gṛhamataṁdritaḥ

— और, हे निधे! त्रैलोक्य में निवास करने वाले नागराजों के लिए भी, यथोचित आसनों से युक्त भवन-दर-भवन, बिना किसी आलस्य के,

श्लोक 6 (skanda.2.65.6)

कारयाशु निधे द्रव्यसंभारं यावदेव तु । विश्वकर्मापि च तव साहाय्यं रचयिष्यति

kārayāśu nidhe dravyasaṁbhāraṁ yāvadeva tu viśvakarmāpi ca tava sāhāyyaṁ racayiṣyati

— शीघ्र बनवाओ, हे निधे, जब तक तुम सामग्री जुटाते हो; विश्वकर्मा भी तुम्हारी सहायता करेंगे।"

श्लोक 7 (skanda.2.65.7)

इत्यादिशंतं स मुनिरिंद्रद्युम्नमुवाच वै । संभारान्पृथगेतद्धि कर्त्तव्यं व्यवधानतः

ityādiśaṁtaṁ sa muniriṁdradyumnamuvāca vai saṁbhārānpṛthagetaddhi karttavyaṁ vyavadhānataḥ

इस प्रकार आदेश देते हुए उस मुनि नारद ने इन्द्रद्युम्न से कहा — "यह कार्य पृथक्-पृथक् सामग्री द्वारा, क्रमपूर्वक करना होगा —

श्लोक 8 (skanda.2.65.8)

स्वर्णैः सुघटितं साधुरथत्रयमलंकृतम् । दुकूलरत्नमालाद्यैर्बहुमूल्यैर्दृढं महत्

svarṇaiḥ sughaṭitaṁ sādhurathatrayamalaṁkṛtam dukūlaratnamālādyairbahumūlyairdṛḍhaṁ mahat

— स्वर्ण से सुगठित, तीन उत्तम रथों को अलंकृत करते हुए, बहुमूल्य दुकूल और रत्नमालाओं आदि से युक्त, दृढ़ और विशाल।

श्लोक 9 (skanda.2.65.9)

श्रीवासुदेवस्य रथो गरुडध्वजचिह्नितः । पद्मध्वजः सुभद्राया रथमूर्द्धनि धार्यताम्

śrīvāsudevasya ratho garuḍadhvajacihnitaḥ padmadhvajaḥ subhadrāyā rathamūrddhani dhāryatām

श्रीवासुदेव का रथ गरुड़-ध्वज से चिह्नित हो; सुभद्रा के रथ के शिखर पर पद्म-ध्वज धारण किया जाए।

श्लोक 10 (skanda.2.65.10)

रथः षोडशचक्रस्तु विष्णोः कार्यः प्रयत्नतः । चतुर्दश बलस्यैव सुभद्रायास्तु द्वादश

rathaḥ ṣoḍaśacakrastu viṣṇoḥ kāryaḥ prayatnataḥ caturdaśa balasyaiva subhadrāyāstu dvādaśa

विष्णु का रथ सोलह चक्रों वाला, विशेष प्रयत्न से बनाया जाए; बलभद्र का चौदह चक्रों वाला, और सुभद्रा का बारह चक्रों वाला।

श्लोक 11 (skanda.2.65.11)

हस्तषोडशविस्तारो रथश्चक्रधरस्य तु । चतुर्दश बलस्यैव सुभद्रायास्तु द्वादश

hastaṣoḍaśavistāro rathaścakradharasya tu caturdaśa balasyaiva subhadrāyāstu dvādaśa

चक्रधारी के रथ का विस्तार सोलह हाथ का हो; बलभद्र का चौदह हाथ, और सुभद्रा का बारह हाथ।

श्लोक 12 (skanda.2.65.12)

आसनं जगतां भूयः स्वयं स्वासनविग्रहः । तद्याने जगतां नाशस्ततो यानं न विद्यते

āsanaṁ jagatāṁ bhūyaḥ svayaṁ svāsanavigrahaḥ tadyāne jagatāṁ nāśastato yānaṁ na vidyate

वे स्वयं जगत् के आसन-स्वरूप हैं, स्वयं ही अपने आसन के विग्रह हैं; उनके संचरण से जगत् का नाश हो जाएगा, अतः उनके लिए पृथक् यान नहीं है।

श्लोक 13 (skanda.2.65.13)

पश्येच्चराचरं विश्वं ज्ञानादथ सुनिर्मले । स्थितो हस्ततले नित्यं निर्मलस्तस्य दर्पणः

paśyeccarācaraṁ viśvaṁ jñānādatha sunirmale sthito hastatale nityaṁ nirmalastasya darpaṇaḥ

वे ज्ञान द्वारा चराचर विश्व को उस अत्यंत निर्मल दर्पण में देखते हैं; उनके हाथ की हथेली में सदा स्थित उनका निर्मल दर्पण,

श्लोक 14 (skanda.2.65.14)

तलस्थत्वादसौ तालः सदा तेनांकितः प्रभुः । ततः स एव शेषस्य बलभद्रावतारिणः

talasthatvādasau tālaḥ sadā tenāṁkitaḥ prabhuḥ tataḥ sa eva śeṣasya balabhadrāvatāriṇaḥ

— और हथेली में स्थित होने के कारण वह ताल कहलाता है; प्रभु सदा उसी से चिह्नित रहते हैं। वे शेषनाग ही बलभद्र के रूप में अवतरित हुए हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.65.15)

अथवा सीरिणः कार्यं सीरमेव ध्वजोत्तमम् । ध्वजः सुनिर्मलः कार्यस्तस्मात्तालध्वजो मतः

athavā sīriṇaḥ kāryaṁ sīrameva dhvajottamam dhvajaḥ sunirmalaḥ kāryastasmāttāladhvajo mataḥ

अथवा हलधर होने के कारण हल ही उनका श्रेष्ठ ध्वज होना चाहिए; ध्वज अत्यंत निर्मल बनाया जाए, इसलिए वह तालध्वज माना गया है।

श्लोक 16 (skanda.2.65.16)

न वासितव्यो देवोऽसावप्रतिष्ठे रथे नृप । प्रासादे मंडपे वापि पुरे तन्निष्फलं भवेत्

na vāsitavyo devo'sāvapratiṣṭhe rathe nṛpa prāsāde maṁḍape vāpi pure tanniṣphalaṁ bhavet

हे राजन्! उस देव को अप्रतिष्ठित रथ पर नहीं बिठाना चाहिए, न ही अप्रतिष्ठित मंदिर, मंडप या नगर में — वह निष्फल होगा।

श्लोक 17 (skanda.2.65.17)

तस्मात्प्रतिष्ठा प्रथमं हरेः कार्या रथस्य वै । संभारः क्रियतां तस्य ह्यनुष्ठेया मया तु सा

tasmātpratiṣṭhā prathamaṁ hareḥ kāryā rathasya vai saṁbhāraḥ kriyatāṁ tasya hyanuṣṭheyā mayā tu sā

अतः पहले हरि के रथ की प्रतिष्ठा करनी चाहिए; उसकी सामग्री तैयार की जाए — और वह विधि मेरे द्वारा संपन्न की जाएगी।

श्लोक 18 (skanda.2.65.18)

इत्याज्ञां मत्पितुर्लब्ध्वा शीघ्रमायाम्यहं नृप । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा घटितं स्यंदनत्रयम्

ityājñāṁ matpiturlabdhvā śīghramāyāmyahaṁ nṛpa tasya tadvacanaṁ śrutvā ghaṭitaṁ syaṁdanatrayam

मेरे पिता की यह आज्ञा प्राप्त कर मैं शीघ्र लौटूंगा, हे राजन्।" उनके इस वचन को सुनकर, तीनों रथ बनाए गए —

श्लोक 19 (skanda.2.65.19)

निधिसंपादितैर्द्रव्यैरेकाह्नाद्विश्वकर्मणा । स्वक्षं सुचक्रं सुस्तंभं सुविस्तीर्णं सुतोरणम्

nidhisaṁpāditairdravyairekāhnādviśvakarmaṇā svakṣaṁ sucakraṁ sustaṁbhaṁ suvistīrṇaṁ sutoraṇam

— निधि द्वारा जुटाई गई सामग्री से, एक ही दिन में विश्वकर्मा द्वारा — सुंदर धुरी, सुंदर पहिये, सुंदर स्तंभ, विस्तृत, सुंदर तोरण वाले,

श्लोक 20 (skanda.2.65.20)

सुध्वजं सुपताकं च नानाचित्रमनोहरम् । विचित्रबंधमिथुनपुत्तलीवलयान्वितम्

sudhvajaṁ supatākaṁ ca nānācitramanoharam vicitrabaṁdhamithunaputtalīvalayānvitam

— सुंदर ध्वज-पताका वाले, विविध चित्रों से मनोहर, विचित्र-बद्ध युगल पुतलियों और वलयों से युक्त,

श्लोक 21 (skanda.2.65.21)

अर्द्धहाटकनिर्व्यूढं साक्षाद्रविरथोपमम् । मेघगंभीरनिर्घोषं दृष्ट्वा कर्षगुणैर्युतम् । वातरंहोहयैर्युक्तं शतसंख्यैः सितप्रभैः

arddhahāṭakanirvyūḍhaṁ sākṣādravirathopamam meghagaṁbhīranirghoṣaṁ dṛṣṭvā karṣaguṇairyutam vātaraṁhohayairyuktaṁ śatasaṁkhyaiḥ sitaprabhaiḥ

— आधे स्वर्ण से निर्मित, साक्षात् सूर्य के रथ के समान, मेघ-गर्जन के समान गंभीर घोष वाला, खींचने की रस्सियों से युक्त, वायु के समान वेगवान्, श्वेत-कांतिमान् सौ अश्वों से जुते हुए।

श्लोक 22 (skanda.2.65.22)

यथाशास्त्रविधानेन नारदेन प्रतिष्ठितम् । सुलग्ने सुमुहूर्ते च सुतिथौ ज्योतिषोदिते

yathāśāstravidhānena nāradena pratiṣṭhitam sulagne sumuhūrte ca sutithau jyotiṣodite

— इसे नारद ने शास्त्रोक्त विधान के अनुसार, शुभ लग्न, शुभ मुहूर्त और ज्योतिष द्वारा निर्दिष्ट शुभ तिथि में प्रतिष्ठित किया।

श्लोक 23 (skanda.2.65.23)

मुनय ऊचुः । भगवञ्जैमिने ब्रूहि सर्वज्ञोसि मतो हि नः

munaya ūcuḥ bhagavañjaimine brūhi sarvajñosi mato hi naḥ

मुनियों ने कहा — हे भगवन् जैमिने! बताइए, आप तो हमारे मत में सर्वज्ञ हैं —

श्लोक 24 (skanda.2.65.24)

विधिना केन हि रथः प्रतिष्ठाप्यो हरेरयम् । यथावद्वद नो येन जानीमो विधिविस्तरम्

vidhinā kena hi rathaḥ pratiṣṭhāpyo harerayam yathāvadvada no yena jānīmo vidhivistaram

हरि के इस रथ की प्रतिष्ठा किस विधि से होती है? हमें यथावत् बताइए, जिससे हम विधि का विस्तार जान सकें।

श्लोक 25 (skanda.2.65.25)

जैमिनिरुवाच । यथा प्रतिष्ठितं तेन नारदेन महात्मना । तद्वो वदिष्यामि विधिं यथा दृष्टं पुरा मया

jaiminiruvāca yathā pratiṣṭhitaṁ tena nāradena mahātmanā tadvo vadiṣyāmi vidhiṁ yathā dṛṣṭaṁ purā mayā

जैमिनि ने कहा — जिस प्रकार उस महात्मा नारद ने इसकी प्रतिष्ठा की थी, उसी विधि को मैं तुम्हें बताऊंगा, जैसा कि मैंने पहले देखा था।

श्लोक 26 (skanda.2.65.26)

रथस्येशानदिग्भागे शालां कृत्वा सुशोभनाम् । तन्मध्ये मण्डपं कृत्वा वेदिं तत्र सुनिर्मलाम्

rathasyeśānadigbhāge śālāṁ kṛtvā suśobhanām tanmadhye maṇḍapaṁ kṛtvā vediṁ tatra sunirmalām

रथ की ईशान दिशा में एक सुंदर शाला बनाकर, उसके मध्य में एक मंडप बनाकर, और वहाँ एक अत्यंत निर्मल वेदी बनाकर,

श्लोक 27 (skanda.2.65.27)

चतुरस्रा चतुर्हस्तमितां हस्तोच्छ्रितां द्विजाः । प्रतिष्ठापूर्वदिवसे रात्रावुत्तरतः शुभे

caturasrā caturhastamitāṁ hastocchritāṁ dvijāḥ pratiṣṭhāpūrvadivase rātrāvuttarataḥ śubhe

— चतुष्कोणीय, चार हाथ प्रमाण की, एक हाथ ऊंची, हे द्विजो! प्रतिष्ठा से पूर्व दिन की रात्रि में, उत्तर दिशा की ओर शुभ मुहूर्त में,

श्लोक 28 (skanda.2.65.28)

मुहूर्ते स्वस्ति वाच्याथ कारयेदंकुरार्पणम् । द्वात्रिंशद्देवताभ्यश्च बलिं दत्त्वा यथाविधि

muhūrte svasti vācyātha kārayedaṁkurārpaṇam dvātriṁśaddevatābhyaśca baliṁ dattvā yathāvidhi

— शुभ मुहूर्त में स्वस्ति-वाचन कराकर अंकुरार्पण संस्कार कराएं, तथा बत्तीस देवताओं को विधिपूर्वक बलि अर्पित करके,

श्लोक 29 (skanda.2.65.29)

प्रातस्ततो वेदिकायां मध्ये मण्डलमालिखेत् । पद्मं वा स्वस्तिकं वापि कुम्भं तत्र निधापयेत्

prātastato vedikāyāṁ madhye maṇḍalamālikhet padmaṁ vā svastikaṁ vāpi kumbhaṁ tatra nidhāpayet

— तत्पश्चात् प्रातःकाल वेदी के मध्य में मंडल का आलेखन करें — कमल अथवा स्वस्तिक — और वहाँ एक कलश स्थापित करें,

श्लोक 30 (skanda.2.65.30)

पञ्चद्रुमकषायं च तन्मध्ये पूरयेत्सुधीः । गंगादिपुण्यतोयानि पल्लवान्स समृत्तिकाः

pañcadrumakaṣāyaṁ ca tanmadhye pūrayetsudhīḥ gaṁgādipuṇyatoyāni pallavānsa samṛttikāḥ

— तथा बुद्धिमान आचार्य उसमें पंच वृक्षों का काढ़ा, गंगा आदि के पवित्र जल, पल्लव और मिट्टी भरे,

श्लोक 31 (skanda.2.65.31)

सर्वगंधान्पञ्चरत्नसर्वौषधिगणं तथा । पूरयित्वा विधानेन आचार्यः प्राङ्मुखः शुचिः

sarvagaṁdhānpañcaratnasarvauṣadhigaṇaṁ tathā pūrayitvā vidhānena ācāryaḥ prāṅmukhaḥ śuciḥ

— सभी सुगंधित द्रव्य, पंचरत्न तथा समस्त औषधियां; विधिपूर्वक भरकर, शुद्ध आचार्य पूर्वाभिमुख होकर,

श्लोक 32 (skanda.2.65.32)

विष्णुं स्मरन्पंचगव्यं पश्चादपि प्रपूरयेत् । दुकूलवेष्टितं कण्ठे माल्यैर्गंधैः सुशोभनैः

viṣṇuṁ smaranpaṁcagavyaṁ paścādapi prapūrayet dukūlaveṣṭitaṁ kaṇṭhe mālyairgaṁdhaiḥ suśobhanaiḥ

— विष्णु का स्मरण करते हुए, उसे पंचगव्य से भी भरें; उसके कंठ को दुकूल से वेष्टित करके, माला और सुगंधों से सुशोभित करें,

श्लोक 33 (skanda.2.65.33)

फलपल्लवसंयुक्तं कृतकौतुकमंगलम् । पूरयेत्तत्र देवेशं नरसिंहमनामयम्

phalapallavasaṁyuktaṁ kṛtakautukamaṁgalam pūrayettatra deveśaṁ narasiṁhamanāmayam

— फल-पल्लव से युक्त, कौतुक-मंगल-सूत्र से युक्त उस कलश में, वहाँ देवेश नरसिंह, जो निरामय हैं, उन्हें स्थापित करें,

श्लोक 34 (skanda.2.65.34)

मंत्रराजेनविधिवदुपचारैस्तथांतरैः । प्रार्थयित्वा प्रसादाय तस्मिन्नावाह्य तं हरिम्

maṁtrarājenavidhivadupacāraistathāṁtaraiḥ prārthayitvā prasādāya tasminnāvāhya taṁ harim

— मंत्रराज के द्वारा विधिपूर्वक, तथा आंतरिक उपचारों सहित; कृपा के लिए प्रार्थना करते हुए, उस हरि का उसमें आवाहन करें,

श्लोक 35 (skanda.2.65.35)

बाह्योपचारैर्विविधैः पूजयेद्विधिवद्द्विजाः । वायव्यां तस्य कुम्भस्य समिदाज्यचरुं तथा

bāhyopacārairvividhaiḥ pūjayedvidhivaddvijāḥ vāyavyāṁ tasya kumbhasya samidājyacaruṁ tathā

— और हे द्विजो! विविध बाह्य उपचारों से विधिपूर्वक उनकी पूजा करें; उस कलश की वायव्य दिशा में समिधा, घृत और चरु से,

श्लोक 36 (skanda.2.65.36)

अष्टोत्तरसहस्रं च जुहुयाद्विधिवद्गुरुः । संपातान्प्रापयेत्तत्र कुम्भमध्ये तदन्ततः

aṣṭottarasahasraṁ ca juhuyādvidhivadguruḥ saṁpātānprāpayettatra kumbhamadhye tadantataḥ

— गुरु विधिपूर्वक एक हजार आठ बार हवन करें; और अंत में उन आहुतियों के अवशिष्ट अंश को कलश के मध्य में पहुंचाएं।

श्लोक 37 (skanda.2.65.37)

रथं सुशोभनं कृत्वा पताकागंधमाल्यकैः । सर्वांगं सेचयेत्तस्य गंधचन्दनवारिभिः

rathaṁ suśobhanaṁ kṛtvā patākāgaṁdhamālyakaiḥ sarvāṁgaṁ secayettasya gaṁdhacandanavāribhiḥ

रथ को पताका, सुगंध और मालाओं से सुसज्जित करके, उसके समस्त अंगों को सुगंधित चंदन-जल से सींचें,

श्लोक 38 (skanda.2.65.38)

धूपयेत्कालागुरुणा शंखकाहालनिस्वनैः । ध्वजे तस्य नृसिंहस्य प्रतिष्ठाप्य समीरणम्

dhūpayetkālāguruṇā śaṁkhakāhālanisvanaiḥ dhvaje tasya nṛsiṁhasya pratiṣṭhāpya samīraṇam

— काले अगरु से धूपित करें, शंख और काहल की ध्वनियों के साथ; तथा उस नृसिंह के ध्वज पर समीरण को प्रतिष्ठित करके,

श्लोक 39 (skanda.2.65.39)

पूजयित्वा विधानेन रक्तस्रग्गंधमाल्यकैः । इमं मंत्रं समुच्चार्य सुपर्णं प्रार्थयेत्ततः

pūjayitvā vidhānena raktasraggaṁdhamālyakaiḥ imaṁ maṁtraṁ samuccārya suparṇaṁ prārthayettataḥ

— विधिपूर्वक लाल पुष्पमाला और सुगंधों से उनकी पूजा करके, फिर यह मंत्र उच्चारण करते हुए सुपर्ण गरुड़ से प्रार्थना करें —

श्लोक 40 (skanda.2.65.40)

यो विश्वप्राणहेतुस्तनुरपि च हरेर्यानकेतुस्वरूपोयं संचित्यैव सद्यः स्वयमुरगवधूवर्गगर्भाः पतंति । चंचच्चण्डोरुतुंडत्रुटित फणिवसारक्तपंकांकितास्यं वन्दे छन्दोमयं तं खगपतिममलं स्वर्णवर्णं सुपर्णम्

yo viśvaprāṇahetustanurapi ca hareryānaketusvarūpoyaṁ saṁcityaiva sadyaḥ svayamuragavadhūvargagarbhāḥ pataṁti caṁcaccaṇḍorutuṁḍatruṭita phaṇivasāraktapaṁkāṁkitāsyaṁ vande chandomayaṁ taṁ khagapatimamalaṁ svarṇavarṇaṁ suparṇam

जो विश्व-प्राण के हेतु हैं, जो हरि के वाहन तथा उनके ध्वज-चिह्न के स्वरूप भी हैं — जिनका स्मरण मात्र करते ही नागकन्याओं के गर्भ स्वयं ही तत्काल गिर जाते हैं; जिनका मुख अपनी तीक्ष्ण, वक्र चोंच से विदीर्ण किए गए सर्प-फणों की चर्बी के रक्त-पंक से सना है — उन निर्मल, स्वर्णवर्ण, छन्दोमय खगपति सुपर्ण को मैं वंदन करता हूँ।

श्लोक 41 (skanda.2.65.41)

ब्रह्मघोषैः शंखनादैर्नानावाद्यसुविस्तरैः । रथमूर्ध्नि स्थापयेत्तं चारुसूक्तं समुच्चरन्

brahmaghoṣaiḥ śaṁkhanādairnānāvādyasuvistaraiḥ rathamūrdhni sthāpayettaṁ cārusūktaṁ samuccaran

वेद-घोष, शंखनाद और विविध वाद्यों की विस्तृत ध्वनि के साथ, सुंदर सूक्त का उच्चारण करते हुए उन्हें रथ के शिखर पर स्थापित करें।

श्लोक 42 (skanda.2.65.42)

तस्योपरिष्टात्तं कुम्भं समंतात्प्लावयन्रथम् । त्रिरुच्चरन्मंत्रराजं सेचयेद्ब्रह्मणा सह

tasyopariṣṭāttaṁ kumbhaṁ samaṁtātplāvayanratham triruccaranmaṁtrarājaṁ secayedbrahmaṇā saha

फिर उसके ऊपर उस कलश को उलट कर, रथ को चारों ओर से आप्लावित करते हुए, मंत्रराज का तीन बार उच्चारण करते हुए, ब्रह्मा-आचार्य सहित उसे अभिषिक्त करें।

श्लोक 43 (skanda.2.65.43)

ततः पूर्णाहुतिं दत्त्वा ब्रह्मणे दक्षिणां ददेत् । आचार्यं दक्षिणां दद्याद्येन तुष्यति तद्गुरुः

tataḥ pūrṇāhutiṁ dattvā brahmaṇe dakṣiṇāṁ dadet ācāryaṁ dakṣiṇāṁ dadyādyena tuṣyati tadguruḥ

तत्पश्चात् पूर्णाहुति देकर ब्रह्मा-आचार्य को दक्षिणा दें; आचार्य को इतनी दक्षिणा दें कि वह गुरु संतुष्ट हो जाए।

श्लोक 44 (skanda.2.65.44)

ब्राह्मणान्भोजयेदन्ते पायसैर्मधुसर्पिषा । द्वादशाक्षरमंत्रेण बलभद्रस्य कारयेत्

brāhmaṇānbhojayedante pāyasairmadhusarpiṣā dvādaśākṣaramaṁtreṇa balabhadrasya kārayet

अंत में ब्राह्मणों को खीर, मधु और घृत से भोजन कराएं। द्वादशाक्षर मंत्र से बलभद्र की प्रतिष्ठा करें।

श्लोक 45 (skanda.2.65.45)

लांगलं च पविरवन्मंत्रः स्याल्लांगलध्वजे । अथवा द्विषड्वर्णोपि मूलमन्त्रः प्रकीर्तितः

lāṁgalaṁ ca paviravanmaṁtraḥ syāllāṁgaladhvaje athavā dviṣaḍvarṇopi mūlamantraḥ prakīrtitaḥ

हल उनका चिह्न है, और वज्र के समान मंत्र लांगल-ध्वज पर उच्चारित हो; अथवा द्वादश-वर्ण वाला मंत्र भी मूल मंत्र कहा गया है।

श्लोक 46 (skanda.2.65.46)

लक्ष्मीसूक्तेन भद्रायाः प्रतिष्ठाप्यो रथस्तथा । नाभिह्रदान्मुरारेस्त्वं ब्रह्मांडावलिरूपधृक्

lakṣmīsūktena bhadrāyāḥ pratiṣṭhāpyo rathastathā nābhihradānmurārestvaṁ brahmāṁḍāvalirūpadhṛk

लक्ष्मी-सूक्त से इसी प्रकार भद्रा (सुभद्रा) के रथ की प्रतिष्ठा करें — "हे मुरारि के नाभि-सरोवर से उत्पन्न, ब्रह्मांड-पंक्ति के रूप को धारण करने वाली,

श्लोक 47 (skanda.2.65.47)

आसनं चतुरास्यस्य श्रियो वास स्थिरो भव । इम मन्त्रं समुच्चार्य ध्वजपद्मं समुच्छ्रयेत्

āsanaṁ caturāsyasya śriyo vāsa sthiro bhava ima mantraṁ samuccārya dhvajapadmaṁ samucchrayet

— चतुर्मुख ब्रह्मा के आसन, श्री के निवास-स्थान! स्थिर हो जाओ।" यह मंत्र उच्चारण करते हुए पद्म-ध्वज को ऊंचा उठाएं।

श्लोक 48 (skanda.2.65.48)

इयान्विशेषो हविषा त्रयाणां च पृथक्पृथक् । पंचपंचभिर्होतव्यमेकैकं तु विभागशः

iyānviśeṣo haviṣā trayāṇāṁ ca pṛthakpṛthak paṁcapaṁcabhirhotavyamekaikaṁ tu vibhāgaśaḥ

तीनों रथों के लिए हवि-संबंधी यह पृथक्-पृथक् विशेषता है; प्रत्येक एक-एक देवता के लिए पांच-पांच आहुतियां विभागपूर्वक दी जाएं।

श्लोक 49 (skanda.2.65.49)

इत्थं रथान्प्रतिष्ठाप्य सुवर्णं गां च वस्त्रकम् । धान्यं च दक्षिणां दद्यात्सम्यग्देवस्य भक्तितः

itthaṁ rathānpratiṣṭhāpya suvarṇaṁ gāṁ ca vastrakam dhānyaṁ ca dakṣiṇāṁ dadyātsamyagdevasya bhaktitaḥ

इस प्रकार रथों की प्रतिष्ठा करके, स्वर्ण, गौ, वस्त्र, धान्य आदि दक्षिणा भगवान् के प्रति भक्तिपूर्वक भलीभांति दें।

श्लोक 50 (skanda.2.65.50)

एवं प्रतिष्ठिते तत्र स्यंदनेऽथ सुभूषिते । आरोप्य देवं विधिवद्ब्रह्मघोषपुरःसरम्

evaṁ pratiṣṭhite tatra syaṁdane'tha subhūṣite āropya devaṁ vidhivadbrahmaghoṣapuraḥsaram

इस प्रकार वहाँ रथ के प्रतिष्ठित और सुसज्जित हो जाने पर, वेद-घोष के साथ, विधिपूर्वक देव को उस पर आरूढ़ कराया गया,

श्लोक 51 (skanda.2.65.51)

जयमंगलशब्दैश्च नानावाद्यपुरःसरैः । चामरांदोलनैर्धूपैः पुष्पवृष्टिभिरेव च

jayamaṁgalaśabdaiśca nānāvādyapuraḥsaraiḥ cāmarāṁdolanairdhūpaiḥ puṣpavṛṣṭibhireva ca

— जय-मंगल घोषों के साथ, विविध वाद्यों के साथ, चामर-दुलाव के साथ, धूप और पुष्प-वर्षा के साथ,

श्लोक 52 (skanda.2.65.52)

ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैर्नीयते स्म रथं प्रति । हयैः सुलक्षणैर्दांतैर्बलीवर्दैरथापि वा

brāhmaṇaiḥ kṣatriyairvaiśyairnīyate sma rathaṁ prati hayaiḥ sulakṣaṇairdāṁtairbalīvardairathāpi vā

ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों द्वारा रथ को खींचा गया, सुलक्षण, वश में किए हुए अश्वों द्वारा, अथवा बैलों द्वारा भी,

श्लोक 53 (skanda.2.65.53)

पुरुषैर्विष्णुभक्तैर्वा नेतव्या ह्यप्रमादतः । प्रीणयित्वा जनं सर्वं भक्ष्यभोज्यादिलेपनैः

puruṣairviṣṇubhaktairvā netavyā hyapramādataḥ prīṇayitvā janaṁ sarvaṁ bhakṣyabhojyādilepanaiḥ

— अथवा विष्णु-भक्तों द्वारा, बिना किसी प्रमाद के, समस्त जनसमूह को भक्ष्य-भोज्य आदि तथा उबटन से संतुष्ट करके, खींचा जाना चाहिए।

श्लोक 54 (skanda.2.65.54)

रथस्योपरि देवेभ्यो बलिमन्त्रेण भो द्विजाः । बलिं गृह्णन्तु भो देवा आदित्या वसवस्तथा

rathasyopari devebhyo balimantreṇa bho dvijāḥ baliṁ gṛhṇantu bho devā ādityā vasavastathā

रथ के ऊपर देवताओं के लिए बलि-मंत्र से, हे द्विजो! — "हे देवो! आदित्यगण तथा वसुगण भी यह बलि ग्रहण करें,

श्लोक 55 (skanda.2.65.55)

मरुतश्चाश्विनौ रुद्राः सुपर्णाः पन्नगा ग्रहाः । असुरा यातुधानाश्च रथस्थाश्चैव देवताः

marutaścāśvinau rudrāḥ suparṇāḥ pannagā grahāḥ asurā yātudhānāśca rathasthāścaiva devatāḥ

— मरुद्गण, अश्विनीकुमार, रुद्रगण, सुपर्णगण, नागगण, ग्रहगण, असुरगण, यातुधानगण, तथा रथ पर स्थित समस्त देवगण भी,

श्लोक 56 (skanda.2.65.56)

दिक्पाला लोकपालाश्च ये च विघ्नविनायकाः । जगतः स्वस्ति कुर्वंतु दिव्या महर्षयस्तथा

dikpālā lokapālāśca ye ca vighnavināyakāḥ jagataḥ svasti kurvaṁtu divyā maharṣayastathā

— दिक्पालगण, लोकपालगण, तथा जो भी विघ्न-विनायक हैं, और दिव्य महर्षिगण, जगत् का कल्याण करें;

श्लोक 57 (skanda.2.65.57)

अविघ्नमाचरंत्वेते मा संतु परिपंथिनः । सौम्या भवंतु तृप्ताश्च दैत्या भूतगणास्तथा

avighnamācaraṁtvete mā saṁtu paripaṁthinaḥ saumyā bhavaṁtu tṛptāśca daityā bhūtagaṇāstathā

— ये सब निर्विघ्न आचरण करें, कोई भी विघ्नकारी न बने; दैत्यगण और भूतगण भी सौम्य और तृप्त हों।"

श्लोक 58 (skanda.2.65.58)

ततस्तु नीयते देवः समभूमौ समुच्चरन् । मंत्रं वैष्णवगायत्रीं विष्णोः सूक्तं पवित्रकम्

tatastu nīyate devaḥ samabhūmau samuccaran maṁtraṁ vaiṣṇavagāyatrīṁ viṣṇoḥ sūktaṁ pavitrakam

तत्पश्चात् देव को समतल भूमि पर ले जाया जाता है, वैष्णव गायत्री मंत्र और विष्णु-सूक्त का पवित्र उच्चारण करते हुए,

श्लोक 59 (skanda.2.65.59)

वामदेव्यैः पवित्रैश्च मानस्तोक्यै रथंतरैः । ततः पुण्याहघोषेण कृतवादित्रनिःस्वनम्

vāmadevyaiḥ pavitraiśca mānastokyai rathaṁtaraiḥ tataḥ puṇyāhaghoṣeṇa kṛtavāditraniḥsvanam

— पवित्र वामदेव्य, मानस्तोक्य और रथंतर साम-मंत्रों के साथ; फिर पुण्याह-घोष तथा वाद्यों की ध्वनि के साथ,

श्लोक 60 (skanda.2.65.60)

शनैः शनैरथो नेयो रथः स्नेहात्तु चक्रिणः । तत्रोत्पातान्प्रवक्ष्यामि रथेत्र द्विजसत्तमाः

śanaiḥ śanairatho neyo rathaḥ snehāttu cakriṇaḥ tatrotpātānpravakṣyāmi rathetra dvijasattamāḥ

— रथ को धीरे-धीरे, चक्रधारी के प्रति स्नेहवश, आगे बढ़ाया जाए। हे द्विजसत्तमो! अब मैं इस रथ से संबंधित अपशकुनों को बताऊंगा —

श्लोक 61 (skanda.2.65.61)

ईषाभंगे द्विजभयं भग्नेऽक्षे क्षत्रियक्षयः । तुलाभंगे वैश्यनाशः शम्या शूद्रभयं भवेत्

īṣābhaṁge dvijabhayaṁ bhagne'kṣe kṣatriyakṣayaḥ tulābhaṁge vaiśyanāśaḥ śamyā śūdrabhayaṁ bhavet

यदि ईषा (धुरी-दंड) टूटे तो ब्राह्मणों को भय; अक्ष टूटने पर क्षत्रियों का नाश; तुला टूटने पर वैश्यों का नाश; शमी टूटने पर शूद्रों को भय होता है।

श्लोक 62 (skanda.2.65.62)

धुराभंगे त्वनावृष्टिः पीठभंगे प्रजाभयम् । परचक्रागमं विद्याच्चक्रभंगे रथस्य तु

dhurābhaṁge tvanāvṛṣṭiḥ pīṭhabhaṁge prajābhayam paracakrāgamaṁ vidyāccakrabhaṁge rathasya tu

धुरा टूटने पर अनावृष्टि होती है; पीठ टूटने पर प्रजा को भय होता है; रथ का चक्र टूटने पर परचक्र के आगमन का संकेत समझना चाहिए।

श्लोक 63 (skanda.2.65.63)

ध्वजस्य पतने विप्रा नृपोऽन्यो जायते धुवम् । प्रतिमाभंगतायां तु राज्ञो मरणमादिशेत्

dhvajasya patane viprā nṛpo'nyo jāyate dhuvam pratimābhaṁgatāyāṁ tu rājño maraṇamādiśet

ध्वज गिरने पर, हे विप्रो! निश्चय ही अन्य राजा उत्पन्न होगा; प्रतिमा के टूटने पर राजा की मृत्यु का संकेत समझना चाहिए।

श्लोक 64 (skanda.2.65.64)

पर्यस्ते तु रथे विप्राः सर्वजानपदक्षयः । उत्पन्नेष्वेवमाद्येषु उत्पातेष्वशुभेषु च

paryaste tu rathe viprāḥ sarvajānapadakṣayaḥ utpanneṣvevamādyeṣu utpāteṣvaśubheṣu ca

रथ के उलट जाने पर, हे विप्रो! संपूर्ण जनपद का नाश होता है। इस प्रकार के अशुभ उत्पातों के उत्पन्न होने पर,

श्लोक 65 (skanda.2.65.65)

बलिकर्म पुनः कुर्याच्छांतिहोमं तथैव च । ब्राह्मणान्भोजयेद्भूयो दद्याद्वान्नानि चैव हि

balikarma punaḥ kuryācchāṁtihomaṁ tathaiva ca brāhmaṇānbhojayedbhūyo dadyādvānnāni caiva hi

— पुनः बलिकर्म करना चाहिए, तथा शांति-होम भी करना चाहिए; पुनः ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, तथा अन्न भी देना चाहिए।

श्लोक 66 (skanda.2.65.66)

पूर्वोत्तरे च दिग्भागे रथस्याग्निं प्रकल्पयेत । समिद्भिर्घृतमध्वाज्यमूलाग्राभिश्च होमयेत्

pūrvottare ca digbhāge rathasyāgniṁ prakalpayeta samidbhirghṛtamadhvājyamūlāgrābhiśca homayet

रथ की पूर्वोत्तर दिशा में अग्नि की स्थापना करें, तथा समिधा, घृत, मधु और आज्य से, मूल और अग्रभाग सहित हवन करें,

श्लोक 67 (skanda.2.65.67)

पालाशाभिर्द्विजश्रेष्ठा मंत्रराजेन दीक्षितः । सोमायाग्नये प्रजाभ्यः प्रजानां पतये तथा

pālāśābhirdvijaśreṣṭhā maṁtrarājena dīkṣitaḥ somāyāgnaye prajābhyaḥ prajānāṁ pataye tathā

— पलाश की समिधाओं से, हे द्विजश्रेष्ठो! मंत्रराज से दीक्षित होकर, सोम को, अग्नि को, प्रजाओं को, तथा प्रजापति को भी,

श्लोक 68 (skanda.2.65.68)

ग्रहेभ्यश्च ब्रह्मणे च दिक्पालेभ्यस्तदंततः । यत्र यत्र रथे दोषास्तत्र तत्र च दीक्षितः

grahebhyaśca brahmaṇe ca dikpālebhyastadaṁtataḥ yatra yatra rathe doṣāstatra tatra ca dīkṣitaḥ

— ग्रहों को, ब्रह्मा को, और अंत में दिक्पालों को भी अर्पित करें; तथा रथ में जहाँ-जहाँ भी दोष हों, वहाँ-वहाँ भी, दीक्षित होकर,

श्लोक 69 (skanda.2.65.69)

जुहुयात्प्रतिष्ठामंत्रेण विशेषः सर्वतो भवेत् । ब्राह्मणैः सहितः कुर्याद्धोमांते शांतिवाचनम्

juhuyātpratiṣṭhāmaṁtreṇa viśeṣaḥ sarvato bhavet brāhmaṇaiḥ sahitaḥ kuryāddhomāṁte śāṁtivācanam

— प्रतिष्ठा-मंत्र से हवन करें; सब ओर विशेष ध्यान रखें। ब्राह्मणों सहित, हवन के अंत में शांति-पाठ करें —

श्लोक 70 (skanda.2.65.70)

स्वस्ति भवतु विप्रेभ्यः स्वस्तिराज्ञेऽस्तु नित्यशः । गोभ्यः स्वस्ति प्रजाभ्यस्तु जगतः शांतिरस्तु वै

svasti bhavatu viprebhyaḥ svastirājñe'stu nityaśaḥ gobhyaḥ svasti prajābhyastu jagataḥ śāṁtirastu vai

"ब्राह्मणों का कल्याण हो; राजा का सदा कल्याण हो; गौओं और प्रजाओं का कल्याण हो; जगत् की शांति हो।

श्लोक 71 (skanda.2.65.71)

स्वस्त्यस्तु द्विपदे नित्यं शांतिरस्तु चतुष्पदे । शं प्रजाभ्यस्तथैवास्तु शं तथात्मनि चास्तु नः

svastyastu dvipade nityaṁ śāṁtirastu catuṣpade śaṁ prajābhyastathaivāstu śaṁ tathātmani cāstu naḥ

द्विपदों का सदा कल्याण हो, चतुष्पदों की शांति हो; प्रजाओं का भी कल्याण हो, और हमारी आत्मा का भी कल्याण हो।

श्लोक 72 (skanda.2.65.72)

शांतिरस्तु च देवस्य भूर्भुवः स्वः शिवं तथा । शांतिरस्तु शिवं चास्तु सर्वतः स्वस्तिरस्तु नः

śāṁtirastu ca devasya bhūrbhuvaḥ svaḥ śivaṁ tathā śāṁtirastu śivaṁ cāstu sarvataḥ svastirastu naḥ

देव की शांति हो; भूः, भुवः, स्वः का कल्याण हो; शांति हो, कल्याण हो; सब ओर से हमारा कल्याण हो।

श्लोक 73 (skanda.2.65.73)

त्वं देव जगतः स्रष्टा पोष्टा चैव त्वमेव हि । प्रजाः पालय देवेश शांतिं कुरु जगत्पते

tvaṁ deva jagataḥ sraṣṭā poṣṭā caiva tvameva hi prajāḥ pālaya deveśa śāṁtiṁ kuru jagatpate

हे देव! तू ही जगत् का स्रष्टा और पोषक है; हे देवेश! प्रजाओं की रक्षा कर, हे जगत्पते! शांति प्रदान कर।"

श्लोक 74 (skanda.2.65.74)

यात्राकारणभूतस्य पुरुषस्य च भूपते । दुष्टान्ग्रहांस्तु विज्ञाय ग्रहशांतिं समाचरेत्

yātrākāraṇabhūtasya puruṣasya ca bhūpate duṣṭāngrahāṁstu vijñāya grahaśāṁtiṁ samācaret

और, हे भूपते! यात्रा के कारणभूत पुरुष के लिए, दुष्ट ग्रहों को जानकर, ग्रह-शांति करनी चाहिए।

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