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वैष्णव खण्ड · अध्याय 66

राजा गाल की शरणागति और ब्रह्मा का नीलाचल-अवतरण

अध्याय 65अध्याय-सूचीअध्याय 67

श्लोक 1 (skanda.2.66.1)

जैमिनिरुवाच । निरुत्पातं समे देशे विधिवर्त्तनयापि च । प्रासादनिकटं देवाः प्रापिताः सुमुहुर्त्तके

jaiminiruvāca nirutpātaṁ same deśe vidhivarttanayāpi ca prāsādanikaṭaṁ devāḥ prāpitāḥ sumuhurttake

जैमिनि ने कहा — बिना किसी उत्पात के, समतल भूमि पर, तथा विधि-विधानपूर्वक, देवगण शुभ मुहूर्त में मंदिर के समीप पहुंचाए गए।

श्लोक 2 (skanda.2.66.2)

ततः शालासुमहती रत्नवर्णविनिर्मिता । निदेशादिंद्रद्युम्नस्य निर्मिता विश्वकर्मणा

tataḥ śālāsumahatī ratnavarṇavinirmitā nideśādiṁdradyumnasya nirmitā viśvakarmaṇā

तत्पश्चात् इन्द्रद्युम्न के निर्देश से विश्वकर्मा द्वारा एक अत्यंत विशाल, रत्न-वर्ण से निर्मित शाला बनाई गई,

श्लोक 3 (skanda.2.66.3)

सभार्चनायां वस्तूनि हवींषि च समित्कुशाः । भोज्यं नानाविधं गीतनृत्यांश्च विविधांस्तथा

sabhārcanāyāṁ vastūni havīṁṣi ca samitkuśāḥ bhojyaṁ nānāvidhaṁ gītanṛtyāṁśca vividhāṁstathā

— सभा-पूजन की सामग्री, हवि, समिधा और कुश, नानाविध भोज्य पदार्थ, तथा विविध गीत-नृत्य भी।

श्लोक 4 (skanda.2.66.4)

साम्राज्ये यादृशी पूर्वं संपत्तिरभवत्क्षितौ । ततः श्रेष्ठतरा विप्राः प्रतिष्ठायां बभूव ह

sāmrājye yādṛśī pūrvaṁ saṁpattirabhavatkṣitau tataḥ śreṣṭhatarā viprāḥ pratiṣṭhāyāṁ babhūva ha

पहले उसके साम्राज्य में पृथ्वी पर जैसी संपत्ति थी, हे विप्रो! उससे भी श्रेष्ठतर संपत्ति इस प्रतिष्ठा में हुई।

श्लोक 5 (skanda.2.66.5)

गालोनाम महीपालस्तदा क्षितितलेऽभवत् । सोप्यत्र प्रतिमां कृत्वा माधवाख्यां दृषन्मयीम्

gālonāma mahīpālastadā kṣititale'bhavat sopyatra pratimāṁ kṛtvā mādhavākhyāṁ dṛṣanmayīm

उस समय पृथ्वीतल पर गाल नामक एक राजा था; उसने भी यहाँ माधव नामक प्रतिमा बनवाई, जो पाषाण की थी,

श्लोक 6 (skanda.2.66.6)

स्थापयित्वात्र प्रासादे पूजयामास ऋद्धिमत् । कनीयांसं च प्रासादं निर्माय नृपसत्तमः

sthāpayitvātra prāsāde pūjayāmāsa ṛddhimat kanīyāṁsaṁ ca prāsādaṁ nirmāya nṛpasattamaḥ

— और उसे यहाँ मंदिर में स्थापित करके, समृद्धिपूर्वक उसकी पूजा करता था; उस नृपश्रेष्ठ ने एक छोटा मंदिर बनवाकर,

श्लोक 7 (skanda.2.66.7)

तत्र तां स्थापयामास ततो निष्कृष्य सादरम् । ततोऽस्य नृपतिर्दूतमुखाच्छुत्वास्य कर्म तत्

tatra tāṁ sthāpayāmāsa tato niṣkṛṣya sādaram tato'sya nṛpatirdūtamukhācchutvāsya karma tat

— वहाँ उसे आदरपूर्वक स्थापित किया। तत्पश्चात् राजा इन्द्रद्युम्न ने दूत के मुख से उसके इस कृत्य को सुनकर,

श्लोक 8 (skanda.2.66.8)

गालोऽभ्यागात्ससैन्यः सन्क्रुद्धस्तं नीलपर्वतम् । दृष्ट्वा प्रतिष्ठासंभारं मर्त्यैः स्वप्नेऽपि दुर्लभम्

gālo'bhyāgātsasainyaḥ sankruddhastaṁ nīlaparvatam dṛṣṭvā pratiṣṭhāsaṁbhāraṁ martyaiḥ svapne'pi durlabham

— [इससे पूर्व] गाल क्रोधित होकर सेना सहित उस नीलपर्वत पर आया था; परंतु प्रतिष्ठा की उस सामग्री को देखकर, जो मनुष्यों को स्वप्न में भी दुर्लभ थी,

श्लोक 9 (skanda.2.66.9)

विस्मयाविष्टचेताः स तस्थौ गालो नराधिपः । किमेतदिति वृत्तान्तं को वा कारयतीदृशम्

vismayāviṣṭacetāḥ sa tasthau gālo narādhipaḥ kimetaditi vṛttāntaṁ ko vā kārayatīdṛśam

— गाल, वह राजा, आश्चर्यचकित मन से खड़ा रह गया — "यह क्या है, और यह सब किसके द्वारा कराया जा रहा है?"

श्लोक 10 (skanda.2.66.10)

यत्नाद्दिव्यं स विज्ञाय इन्द्रद्युम्नं नराधिपम् । ब्रह्मलोकादागतं तं कर्त्तारं देववेश्मनः

yatnāddivyaṁ sa vijñāya indradyumnaṁ narādhipam brahmalokādāgataṁ taṁ karttāraṁ devaveśmanaḥ

प्रयत्नपूर्वक उस दिव्य वृत्तांत को जानकर, उसे ज्ञात हुआ कि ब्रह्मलोक से आए हुए राजा इन्द्रद्युम्न ही देव-भवन के निर्माता हैं,

श्लोक 11 (skanda.2.66.11)

प्रतिष्ठापयितुं देवैः सार्द्धं संभारकारकम् । सहितं पद्मनिधिना गुरुणा नारदेन च

pratiṣṭhāpayituṁ devaiḥ sārddhaṁ saṁbhārakārakam sahitaṁ padmanidhinā guruṇā nāradena ca

— जो देवगणों सहित, प्रतिष्ठा-सामग्री के संग्राहक, पद्मनिधि और अपने गुरु नारद के साथ,

श्लोक 12 (skanda.2.66.12)

ब्रह्माणं चागमिष्यन्तं प्रतिष्ठायै सुरोत्तमम् । श्रुत्वा सर्वं च वृत्तान्तं तद्राजा दिव्यचेष्टितम्

brahmāṇaṁ cāgamiṣyantaṁ pratiṣṭhāyai surottamam śrutvā sarvaṁ ca vṛttāntaṁ tadrājā divyaceṣṭitam

— और यह कि ब्रह्मा, सुरश्रेष्ठ, स्वयं प्रतिष्ठा हेतु आने वाले हैं। इस समस्त दिव्य वृत्तांत को सुनकर उस राजा ने,

श्लोक 13 (skanda.2.66.13)

मेने कृतार्थमात्मानं तद्राज्ये परमाद्भुतम् । इतः श्रेयस्करं कर्म न भूतं न भविष्यति

mene kṛtārthamātmānaṁ tadrājye paramādbhutam itaḥ śreyaskaraṁ karma na bhūtaṁ na bhaviṣyati

स्वयं को कृतार्थ माना — "यह मेरे इस राज्य में परम अद्भुत घटना है; इससे बढ़कर श्रेयस्कर कर्म न कभी हुआ है, न होगा;

श्लोक 14 (skanda.2.66.14)

तदस्य निकटे स्थित्वा ज्ञात्वा कर्मक्रमं विधिम् । उत्सवांश्चापि विज्ञाय करिष्ये प्रतिवत्सरम्

tadasya nikaṭe sthitvā jñātvā karmakramaṁ vidhim utsavāṁścāpi vijñāya kariṣye prativatsaram

अतः इसके निकट रहकर, इसके कर्म-क्रम की विधि जानकर, तथा इसके उत्सवों को भी जानकर, मैं प्रतिवर्ष उन्हें संपन्न करूंगा।

श्लोक 15 (skanda.2.66.15)

अमुं दारुमयं साक्षाद्ब्रह्मरूपं जनार्दनम् । अभाग्योपचयादेतावंतं कालं न जानता

amuṁ dārumayaṁ sākṣādbrahmarūpaṁ janārdanam abhāgyopacayādetāvaṁtaṁ kālaṁ na jānatā

इस दारुमय, साक्षात् ब्रह्मस्वरूप जनार्दन को, अपने दुर्भाग्य के संचय के कारण, इतने दीर्घकाल तक न जानते हुए,

श्लोक 16 (skanda.2.66.16)

असेव्यमानेन कृतं जन्मैव विफलं मया । तदेनमिंद्रद्युम्नं वै प्रणिपत्य जगद्गुरुम्

asevyamānena kṛtaṁ janmaiva viphalaṁ mayā tadenamiṁdradyumnaṁ vai praṇipatya jagadgurum

— उनकी सेवा न करके मैंने अपना जन्म ही व्यर्थ कर दिया। अतः अब इस जगद्गुरु इन्द्रद्युम्न को प्रणाम करके,

श्लोक 17 (skanda.2.66.17)

महाभागवतश्रेष्ठं ब्रह्मलोकादिहागतम् । उपेत्य शरणं साक्षाद्दृष्ट्वा नारायणं विभुम्

mahābhāgavataśreṣṭhaṁ brahmalokādihāgatam upetya śaraṇaṁ sākṣāddṛṣṭvā nārāyaṇaṁ vibhum

— जो महान् भागवतों में श्रेष्ठ हैं, और ब्रह्मलोक से यहाँ आए हैं, उनकी शरण में जाकर, साक्षात् नारायण विभु का दर्शन करके,

श्लोक 18 (skanda.2.66.18)

प्रतिष्ठितं वै प्रासादे मुक्तिमेष्यामि निश्चयम् । वैकुण्ठं स प्रतिष्ठाप्य मय्येवारोपयिष्यति

pratiṣṭhitaṁ vai prāsāde muktimeṣyāmi niścayam vaikuṇṭhaṁ sa pratiṣṭhāpya mayyevāropayiṣyati

— मंदिर में प्रतिष्ठित होते हुए, मैं निश्चय ही मुक्ति प्राप्त करूंगा; उन्हें प्रतिष्ठित करके, वे इन्द्रद्युम्न मुझ पर ही वैकुण्ठ का आरोपण करेंगे।

श्लोक 19 (skanda.2.66.19)

ब्रह्मलोकं गतो यो वै किं क्षितौ सोऽवतिष्ठते । उपचारान्समादिश्य कोषं संभृत्य च प्रभोः

brahmalokaṁ gato yo vai kiṁ kṣitau so'vatiṣṭhate upacārānsamādiśya koṣaṁ saṁbhṛtya ca prabhoḥ

जो ब्रह्मलोक को प्राप्त हो चुका है, क्या वह पृथ्वी पर रुका रह सकता है? फिर भी अभी उपचारों का निर्देश देकर, और प्रभु के कोष को एकत्र करके,

श्लोक 20 (skanda.2.66.20)

ब्रह्मणा सहितोऽवश्यं पुनर्यास्यति तत्क्षयम् । विचार्य मंत्रिभिः सार्द्धं ततो गालोऽपि वैष्णवः

brahmaṇā sahito'vaśyaṁ punaryāsyati tatkṣayam vicārya maṁtribhiḥ sārddhaṁ tato gālo'pi vaiṣṇavaḥ

— वे ब्रह्मा सहित अवश्य ही पुनः उस लोक को चले जाएंगे।" अपने मंत्रियों के साथ इस प्रकार विचार करके, वैष्णव गाल भी,

श्लोक 21 (skanda.2.66.21)

इन्द्रद्युम्नस्य निकटं विनीतः प्रययौ मुदा । गत्वा तं दूरतो दृष्ट्वा प्रणिपातपुरःसरम्

indradyumnasya nikaṭaṁ vinītaḥ prayayau mudā gatvā taṁ dūrato dṛṣṭvā praṇipātapuraḥsaram

विनम्रतापूर्वक हर्षित होकर इन्द्रद्युम्न के समीप गया; वहाँ जाकर, दूर से ही उन्हें देखकर, प्रणिपातपूर्वक,

श्लोक 22 (skanda.2.66.22)

बद्धांजलिपुटो राजा मूर्ध्नि वीक्षन्ससाध्वसम् । शनैः शनैर्ययौ तस्य निकटं गालपार्थिवः

baddhāṁjalipuṭo rājā mūrdhni vīkṣansasādhvasam śanaiḥ śanairyayau tasya nikaṭaṁ gālapārthivaḥ

— हाथ जोड़े हुए, भयविह्वल दृष्टि से देखते हुए, राजा गाल धीरे-धीरे उनके समीप गया।

श्लोक 23 (skanda.2.66.23)

देव त्वं राजराजोऽसि मर्त्योऽसि ब्रह्मलोकगः । किं स्तौमि नृपकीटोऽहं त्वां जीवन्मुक्तमीश्वरम्

deva tvaṁ rājarājo'si martyo'si brahmalokagaḥ kiṁ staumi nṛpakīṭo'haṁ tvāṁ jīvanmuktamīśvaram

"हे देव! आप राजाओं के राजा हैं; मर्त्य होते हुए भी आप ब्रह्मलोक-गामी हैं। मैं तुच्छ राजा-कीट, जीवन्मुक्त ईश्वर-स्वरूप आपकी स्तुति कैसे करूं?

श्लोक 24 (skanda.2.66.24)

अज्ञात्वा महिमानं ते सचिवैर्मंत्रयन्मुहुः । योद्धुमभ्यागतो देव दृष्ट्वा ते पौरुषं महत्

ajñātvā mahimānaṁ te sacivairmaṁtrayanmuhuḥ yoddhumabhyāgato deva dṛṣṭvā te pauruṣaṁ mahat

आपकी महिमा को न जानते हुए, मंत्रियों से बार-बार सलाह करके, मैं युद्ध हेतु यहाँ आया था, हे देव! परन्तु आपका महान् पौरुष देखकर,

श्लोक 25 (skanda.2.66.25)

अतिमानुषमाश्चर्यं पदं चापि शचीपतेः । दृष्ट्वैतन्निश्चितं देव ब्रह्मलोकागतस्य हि

atimānuṣamāścaryaṁ padaṁ cāpi śacīpateḥ dṛṣṭvaitanniścitaṁ deva brahmalokāgatasya hi

— जो मनुष्यातीत, आश्चर्यकारी है, और शचीपति इन्द्र का पद भी यहाँ देखा — यह देखकर, हे देव! यह निश्चित हो गया कि आप ब्रह्मलोक से ही आए हैं;

श्लोक 26 (skanda.2.66.26)

ईदृशं हि महत्कर्म यदाज्ञाकृन्महानिधिः । चेतः प्रसादप्रवणं मयि धेहि सुरोत्तम

īdṛśaṁ hi mahatkarma yadājñākṛnmahānidhiḥ cetaḥ prasādapravaṇaṁ mayi dhehi surottama

— क्योंकि ऐसा महान् कार्य तो वही है, जिसकी आज्ञा से महानिधि विश्वकर्मा कार्य करते हैं। हे सुरश्रेष्ठ! मुझ पर कृपा-प्रवण चित्त रखिए,

श्लोक 27 (skanda.2.66.27)

त्रैलोक्यवासिनो देवा यदाज्ञावशवर्तिनः

trailokyavāsino devā yadājñāvaśavartinaḥ

— जिनकी आज्ञा के वशवर्ती त्रैलोक्य-निवासी देवगण भी हैं।"

श्लोक 28 (skanda.2.66.28)

जैमिनिरुवाच । इत्थं विज्ञापयंतं तं गालं नृपतिकुंजरम् । स्मयमान उवाचेदं राजन्किं बहु भाषसे

jaiminiruvāca itthaṁ vijñāpayaṁtaṁ taṁ gālaṁ nṛpatikuṁjaram smayamāna uvācedaṁ rājankiṁ bahu bhāṣase

जैमिनि ने कहा — इस प्रकार निवेदन करते हुए उस नृपश्रेष्ठ गाल से, इन्द्रद्युम्न ने मुस्कुराते हुए कहा — "हे राजन्! तुम इतना अधिक क्यों कहते हो?

श्लोक 29 (skanda.2.66.29)

भवानपि हरेर्भक्तः सार्वभौमो महीपतिः । सामान्यमेतद्राज्ञा वै भूस्वाम्यं भुवि वर्त्तताम्

bhavānapi harerbhaktaḥ sārvabhaumo mahīpatiḥ sāmānyametadrājñā vai bhūsvāmyaṁ bhuvi varttatām

आप भी हरि के भक्त हैं, सार्वभौम, पृथ्वी के स्वामी हैं; राजा द्वारा पृथ्वी का स्वामित्व तो पृथ्वी पर एक सामान्य बात है।

श्लोक 30 (skanda.2.66.30)

सांप्रतं हि भवानत्र पृथिव्यामेकपार्थिवः । नृपायत्ताः क्रियाः सर्वा मर्त्यानां मरुतामपि

sāṁprataṁ hi bhavānatra pṛthivyāmekapārthivaḥ nṛpāyattāḥ kriyāḥ sarvā martyānāṁ marutāmapi

अभी इस पृथ्वी पर आप ही एकमात्र राजा हैं; मनुष्यों की और मरुद्गणों की भी समस्त क्रियाएं राजा पर ही निर्भर करती हैं।

श्लोक 31 (skanda.2.66.31)

अष्टदिक्पालकांशैस्तु ब्रह्मणा निर्मितो नृपः । न ह्यल्पपुण्यकृद्राजा प्रजापालनतत्पर

aṣṭadikpālakāṁśaistu brahmaṇā nirmito nṛpaḥ na hyalpapuṇyakṛdrājā prajāpālanatatpara

राजा को ब्रह्मा ने अष्ट दिक्पालों के अंशों से रचा है; प्रजा-पालन में तत्पर राजा अल्प पुण्य वाला नहीं होता।

श्लोक 32 (skanda.2.66.32)

इह कीर्तिं च धर्मश्च यत्र गच्छन्सुवर्त्मनि । प्राप्नोति राजशार्दूल विशेषात्त्वं तु वैष्णवः

iha kīrtiṁ ca dharmaśca yatra gacchansuvartmani prāpnoti rājaśārdūla viśeṣāttvaṁ tu vaiṣṇavaḥ

यहाँ सुमार्ग पर चलते हुए मनुष्य कीर्ति और धर्म दोनों प्राप्त करता है, हे राजशार्दूल! विशेषतः आप तो वैष्णव हैं।

श्लोक 33 (skanda.2.66.33)

प्रासादे स्थापयेद्यस्तु हरेरर्चां विधानतः । न देहबन्धमाप्नोति याति विष्णोः परं पदम्

prāsāde sthāpayedyastu harerarcāṁ vidhānataḥ na dehabandhamāpnoti yāti viṣṇoḥ paraṁ padam

जो हरि की अर्चा को विधिपूर्वक मंदिर में स्थापित करता है, वह पुनः देह-बंधन को प्राप्त नहीं होता; वह विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 34 (skanda.2.66.34)

माधवप्रतिमामेतां दारवीं शुभलक्षणाम् । साक्षान्मुक्तिप्रदां भूप स्वयं स्थापितवानसि

mādhavapratimāmetāṁ dāravīṁ śubhalakṣaṇām sākṣānmuktipradāṁ bhūpa svayaṁ sthāpitavānasi

इस माधव की प्रतिमा को, जो काष्ठ की, शुभ लक्षणों वाली, तथा साक्षात् मुक्तिप्रदा है, हे भूप! आपने स्वयं स्थापित किया है।

श्लोक 35 (skanda.2.66.35)

निर्विघ्नं कर्म ते जातं मम मन्वंतरं गतम् । भवेद्वा संशयो मेऽत्र न स्वतंत्रश्चतुर्मुखः

nirvighnaṁ karma te jātaṁ mama manvaṁtaraṁ gatam bhavedvā saṁśayo me'tra na svataṁtraścaturmukhaḥ

आपका कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न हुआ है; मेरा मन्वंतर बीत चुका है। इस विषय में मुझे संशय हो सकता है — चतुर्मुख ब्रह्मा भी स्वतंत्र नहीं हैं —

श्लोक 36 (skanda.2.66.36)

प्रतिष्ठायै प्रार्थितोऽयं तदन्यः स्थापयेत्कथम् । साक्षाद्दार्ववतारस्य प्रासादस्य नृपोत्तम

pratiṣṭhāyai prārthito'yaṁ tadanyaḥ sthāpayetkatham sākṣāddārvavatārasya prāsādasya nṛpottama

— उन्हें प्रतिष्ठा के लिए प्रार्थना की गई है; तो फिर कोई अन्य इसे कैसे स्थापित कर सकता है? हे नृपोत्तम! साक्षात् दारु-अवतार के इस मंदिर की,

श्लोक 37 (skanda.2.66.37)

संनिधानेन चेदत्र विधातानुग्रहिष्यति । तदेनं स्थापयित्वा तु चतूरूपं जनार्दनम्

saṁnidhānena cedatra vidhātānugrahiṣyati tadenaṁ sthāpayitvā tu catūrūpaṁ janārdanam

यदि विधाता स्वयं यहाँ अपनी उपस्थिति से अनुग्रह करेंगे, तो इस चतुर्रूप जनार्दन को स्थापित करके,

श्लोक 38 (skanda.2.66.38)

समर्प्य त्वां गमिष्यामि त्वमेवोपचरिष्यसि । नित्योपहारं यात्राश्च उत्सवांश्च जगत्पतेः

samarpya tvāṁ gamiṣyāmi tvamevopacariṣyasi nityopahāraṁ yātrāśca utsavāṁśca jagatpateḥ

— मैं आपको सौंपकर चला जाऊंगा; आप ही उनकी सेवा करेंगे — जगत्पति के नित्य उपहार, यात्राएं और उत्सव।

श्लोक 39 (skanda.2.66.39)

यानेवोपदिशेद्देवः स्वयं वा प्रपितामहः । तांस्तान्प्रयत्नात्कुर्वीत राजा वै धर्मपालकः

yānevopadiśeddevaḥ svayaṁ vā prapitāmahaḥ tāṁstānprayatnātkurvīta rājā vai dharmapālakaḥ

देव स्वयं अथवा प्रपितामह जो कुछ भी निर्देश दें, वे सब कार्य धर्म-पालक राजा को प्रयत्नपूर्वक करने चाहिए।"

श्लोक 40 (skanda.2.66.40)

ततः स गालो नृपतिः श्रुत्वा तच्चिंतितं स्वयम् । इन्द्रद्युम्नादिष्टमेतदिति प्राप परां मुदम्

tataḥ sa gālo nṛpatiḥ śrutvā tacciṁtitaṁ svayam indradyumnādiṣṭametaditi prāpa parāṁ mudam

तब राजा गाल ने, अपने स्वयं के विचार को इन्द्रद्युम्न द्वारा इस प्रकार आदिष्ट सुनकर, परम आनंद प्राप्त किया।

श्लोक 41 (skanda.2.66.41)

तस्थौ तस्यांतिके गाल आज्ञाकार इव स्वयम् । तत्तदाशु करोत्येष इन्द्रद्युम्नो यदादिशत्

tasthau tasyāṁtike gāla ājñākāra iva svayam tattadāśu karotyeṣa indradyumno yadādiśat

गाल उनके समीप स्वयं आज्ञाकारी सेवक के समान खड़ा रहा; इन्द्रद्युम्न जो कुछ भी आदेश देते, वह तुरंत करता।

श्लोक 42 (skanda.2.66.42)

एवं संभृतसंभारः सिंहासनगतः प्रभुः । देवैः परिवृतश्चेंद्रद्युम्नः शक्र इवाबभौ

evaṁ saṁbhṛtasaṁbhāraḥ siṁhāsanagataḥ prabhuḥ devaiḥ parivṛtaśceṁdradyumnaḥ śakra ivābabhau

इस प्रकार सामग्री संगृहीत हो जाने पर, सिंहासन पर विराजमान प्रभु इन्द्रद्युम्न, देवगणों से घिरे हुए, इन्द्र के समान शोभायमान हुए।

श्लोक 43 (skanda.2.66.43)

ततोऽश्रूयंत निनदा दिव्यदुंदुभिजाः शुभाः । मृदंगवेणुवीणादि तालकाहालनिःस्वनाः

tato'śrūyaṁta ninadā divyaduṁdubhijāḥ śubhāḥ mṛdaṁgaveṇuvīṇādi tālakāhālaniḥsvanāḥ

तब दिव्य दुंदुभियों की शुभ ध्वनियां सुनाई देने लगीं, मृदंग, वेणु, वीणा आदि, ताल और काहल की ध्वनियां,

श्लोक 44 (skanda.2.66.44)

ऐरावतादिकरिणां बृंहितानि बहूनि खे । समंताज्जयशब्दाश्च पुष्पवृष्टिविमिश्रिताः

airāvatādikariṇāṁ bṛṁhitāni bahūni khe samaṁtājjayaśabdāśca puṣpavṛṣṭivimiśritāḥ

— आकाश में ऐरावत आदि गजों की अनेक चिंघाड़ें, सब ओर जय-जयकार के शब्द, पुष्पवर्षा के साथ मिश्रित,

श्लोक 45 (skanda.2.66.45)

आकाशगंगासलिलकणा मन्दारमिश्रिताः । दिव्य स्रग्लेपधूपानां गन्धा दिग्व्यापिनस्तथा । वैमानिकानां देवानां किंकिणीजालनिःस्वनाः

ākāśagaṁgāsalilakaṇā mandāramiśritāḥ divya sraglepadhūpānāṁ gandhā digvyāpinastathā vaimānikānāṁ devānāṁ kiṁkiṇījālaniḥsvanāḥ

— आकाश-गंगा के जल-कण, मंदार पुष्पों से मिश्रित, दिव्य माला, लेप और धूप की सुगंधियां सब दिशाओं में व्याप्त हो गईं, तथा देवताओं के विमानों की घंटी-जालों की झंकार सुनाई देने लगी।

श्लोक 46 (skanda.2.66.46)

ततश्च तेजसां राशी रोदसीमध्यपूरकः । आविरासीत्क्षितिगत नयनाच्छादको द्विजाः

tataśca tejasāṁ rāśī rodasīmadhyapūrakaḥ āvirāsītkṣitigata nayanācchādako dvijāḥ

तब तेज की एक राशि, जो आकाश और पृथ्वी के मध्य को भरने वाली थी, प्रकट हुई, हे द्विजो! जो पृथ्वी पर स्थित लोगों के नेत्रों को चकाचौंध कर रही थी,

श्लोक 47 (skanda.2.66.47)

उत्तोलिताक्षिमालाभिः प्रजाभिर्वीक्षितः पुरः । ततः क्रमात्स ददृशे विमानाग्र्यं प्रजापतेः

uttolitākṣimālābhiḥ prajābhirvīkṣitaḥ puraḥ tataḥ kramātsa dadṛśe vimānāgryaṁ prajāpateḥ

— जिसे प्रजाजनों ने ऊपर उठी हुई दृष्टियों की पंक्तियों से आगे देखा; फिर क्रमशः प्रजापति का वह श्रेष्ठ विमान दिखाई देने लगा,

श्लोक 48 (skanda.2.66.48)

स्वर्णहंसशतैः स्कंधेनोह्यमानः समंततः । दिक्पालैश्चामरव्यग्रहस्तैरासेवितः पुरः

svarṇahaṁsaśataiḥ skaṁdhenohyamānaḥ samaṁtataḥ dikpālaiścāmaravyagrahastairāsevitaḥ puraḥ

— जो सब ओर से सौ स्वर्ण-हंसों के कंधों पर ढोया जा रहा था, आगे दिक्पालों द्वारा, जिनके हाथ चंवर डुलाने में व्यस्त थे, सेवित था,

श्लोक 49 (skanda.2.66.49)

जाह्नवीयमुनानीरप्रकीर्णककरेऽभितः । पार्श्वयोश्चन्द्रसूर्याभ्यामुभाभ्यामातपत्रके

jāhnavīyamunānīraprakīrṇakakare'bhitaḥ pārśvayoścandrasūryābhyāmubhābhyāmātapatrake

— जिसके चारों ओर गंगा-यमुना का जल छिड़का जा रहा था, तथा जिसके दोनों पार्श्वों में चंद्र और सूर्य, आतपत्र के रूप में उपस्थित थे,

श्लोक 50 (skanda.2.66.50)

धार्यमाणे शनैर्वायोर्गतिचंचलचोलके । ब्रह्मर्षिभिर्गौतमाद्यैः स्तूयमानो रहस्यकैः

dhāryamāṇe śanairvāyorgaticaṁcalacolake brahmarṣibhirgautamādyaiḥ stūyamāno rahasyakaiḥ

— जिसका आवरण-वस्त्र वायु की गति से धीरे-धीरे फहरा रहा था; गौतम आदि ब्रह्मर्षियों द्वारा गुह्य स्तोत्रों से स्तुति किया जाता हुआ,

श्लोक 51 (skanda.2.66.51)

तन्मध्यस्थः प्रजानाथ इंद्रद्युम्नादिभिः स्तुतः । आलुलोके देवगणैर्जयशब्दैरभिष्टुतः

tanmadhyasthaḥ prajānātha iṁdradyumnādibhiḥ stutaḥ āluloke devagaṇairjayaśabdairabhiṣṭutaḥ

— उसके मध्य में स्थित प्रजापति, इन्द्रद्युम्न आदि द्वारा स्तुत होते हुए, चारों ओर देख रहे थे, देवगणों द्वारा जय-जयकार से अभिनंदित,

श्लोक 52 (skanda.2.66.52)

रंभादिकाभिर्वेश्याभिर्नृत्यते स्म ससाध्वसम् । हाहाहूहूप्रभृतिभिर्गीयमानश्च गायकैः

raṁbhādikābhirveśyābhirnṛtyate sma sasādhvasam hāhāhūhūprabhṛtibhirgīyamānaśca gāyakaiḥ

— जिसके लिए रंभा आदि अप्सराएं भय-मिश्रित भाव से नृत्य कर रही थीं, और हाहा, हूहू आदि गायक गान कर रहे थे,

श्लोक 53 (skanda.2.66.53)

सिद्धविद्याधरगणैः सादरं चोपवीणितः । कृतांजलिपुटैर्दूरात्तपस्विभिरुपासितः

siddhavidyādharagaṇaiḥ sādaraṁ copavīṇitaḥ kṛtāṁjalipuṭairdūrāttapasvibhirupāsitaḥ

— सिद्धों और विद्याधरों के समूहों द्वारा आदरपूर्वक वीणा-वादन किया जाता हुआ, तथा दूर से हाथ जोड़े तपस्वियों द्वारा उपासित,

श्लोक 54 (skanda.2.66.54)

सावित्रीशारदे तस्य वाक्प्रबंधैर्विचित्रकैः । तोषमासादयंत्यौ च कोऽन्यस्तत्तोषणे क्षमः

sāvitrīśārade tasya vākprabaṁdhairvicitrakaiḥ toṣamāsādayaṁtyau ca ko'nyastattoṣaṇe kṣamaḥ

— सावित्री और शारदा उनके लिए विचित्र वाक्-रचनाओं से संतोष उत्पन्न कर रही थीं — भला उन्हें प्रसन्न करने में और कौन समर्थ है?

श्लोक 55 (skanda.2.66.55)

जाह्नवीयमुनानीर प्रकीर्णित कलेवरः । ये च गंधर्वसिद्धाद्या नारदप्रमुखा द्विजाः

jāhnavīyamunānīra prakīrṇita kalevaraḥ ye ca gaṁdharvasiddhādyā nāradapramukhā dvijāḥ

— उनका शरीर गंगा-यमुना के जल से सिंचित था; तथा जो गंधर्व, सिद्ध आदि, नारद-प्रमुख द्विजगण थे,

श्लोक 56 (skanda.2.66.56)

वेत्रहस्ताः सविनया दिव्यसोपानदर्शनाः । संमर्दः स महानासीद्देवानां दिवि गच्छताम्

vetrahastāḥ savinayā divyasopānadarśanāḥ saṁmardaḥ sa mahānāsīddevānāṁ divi gacchatām

— हाथों में छड़ी लिए, विनम्रतापूर्वक, दिव्य सोपान के दर्शन करते हुए चल रहे थे — आकाश में जाते हुए देवताओं की वहाँ बड़ी भीड़ हो गई,

श्लोक 57 (skanda.2.66.57)

न कोऽपि गण्यते देवः को वा केन पथा व्रजेत् । अहंपूर्विकया तेषां व्रजतां त्रिदिवौकसाम्

na ko'pi gaṇyate devaḥ ko vā kena pathā vrajet ahaṁpūrvikayā teṣāṁ vrajatāṁ tridivaukasām

— कोई भी देव पहचाना नहीं जा सकता था, न ही यह पता चलता था कि कौन किस मार्ग से जा रहा है, क्योंकि वे स्वर्गवासी परस्पर आगे निकलने की होड़ में जा रहे थे।

श्लोक 58 (skanda.2.66.58)

संमर्दातिशयात्तेषां विभ्रंशोऽभूत्स्ववाहनैः । स्रष्टा पाता च संहर्त्ता जगतां यो जगन्मयः

saṁmardātiśayātteṣāṁ vibhraṁśo'bhūtsvavāhanaiḥ sraṣṭā pātā ca saṁharttā jagatāṁ yo jaganmayaḥ

उस अत्यधिक भीड़-भाड़ के कारण, कुछ अपने-अपने वाहनों से गिर भी पड़े। जो जगत् के स्रष्टा, पालक और संहारक हैं, जो जगन्मय हैं,

श्लोक 59 (skanda.2.66.59)

साक्षाद्व्रजति तत्रैषां सुराणां महिमा कुतः । तं दृष्ट्वा साध्वसान्नम्रो भक्त्या बद्धांजलिर्नृपः

sākṣādvrajati tatraiṣāṁ surāṇāṁ mahimā kutaḥ taṁ dṛṣṭvā sādhvasānnamro bhaktyā baddhāṁjalirnṛpaḥ

— स्वयं वहाँ साक्षात् जा रहे थे — तो फिर इन देवताओं की महिमा ही क्या रही? उन्हें देखकर, भयविह्वल, विनम्र, भक्तिपूर्वक हाथ जोड़े राजा,

श्लोक 60 (skanda.2.66.60)

तैर्देवैर्गालराजेन नारदप्रमुखेन च । सहितो धरणीं प्रायात्साष्टांगं प्रणिपत्य च

tairdevairgālarājena nāradapramukhena ca sahito dharaṇīṁ prāyātsāṣṭāṁgaṁ praṇipatya ca

— उन देवताओं के साथ, राजा गाल के साथ, तथा नारद-प्रमुख द्विजों के साथ, साष्टांग प्रणाम करके पृथ्वी पर पहुंचा।

श्लोक 61 (skanda.2.66.61)

उत्थाय परया भक्त्या प्रहृष्टेनांतरात्मना । पुलकांकितसर्वांगं स्वं मन्वानः कृतार्थकम्

utthāya parayā bhaktyā prahṛṣṭenāṁtarātmanā pulakāṁkitasarvāṁgaṁ svaṁ manvānaḥ kṛtārthakam

परम भक्ति से उठकर, प्रसन्न अंतरात्मा से, अपने समस्त शरीर को रोमांच से आवृत तथा स्वयं को कृतार्थ मानते हुए,

श्लोक 62 (skanda.2.66.62)

पुरतो जगदीशस्य पश्यञ्छुद्धं पितामहम् । कृतांजलिपुटो राजा ममज्जानंदसागरे

purato jagadīśasya paśyañchuddhaṁ pitāmaham kṛtāṁjalipuṭo rājā mamajjānaṁdasāgare

— जगदीश के सम्मुख शुद्ध पितामह को देखते हुए, हाथ जोड़े हुए राजा आनंद-सागर में डूब गया।

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