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वैष्णव खण्ड · अध्याय 67

ब्रह्मा का अवतरण और देव-प्रतिष्ठा

अध्याय 66अध्याय-सूचीअध्याय 68

श्लोक 1 (skanda.2.67.1)

जैमिनिरुवाच । अथांतरिक्षान्निःश्रेणी रत्नकांचननिर्मिता । संलग्ना पादसंपीठे पद्मयोनेर्विमानगा

jaiminiruvāca athāṁtarikṣānniḥśreṇī ratnakāṁcananirmitā saṁlagnā pādasaṁpīṭhe padmayonervimānagā

जैमिनि ने कहा — तदनन्तर आकाश से रत्नों और स्वर्ण से निर्मित एक सीढ़ी प्रकट हुई, जो नीचे पादपीठ से जुड़ी हुई थी और ब्रह्माजी के विमान तक जाती थी।

श्लोक 2 (skanda.2.67.2)

सा क्षितिस्पृष्टमूला वै विधातुरवरोहणे । चतुर्व्यायामतापीन सोपानश्रेणिसंयुता

sā kṣitispṛṣṭamūlā vai vidhāturavarohaṇe caturvyāyāmatāpīna sopānaśreṇisaṁyutā

वह सीढ़ी पृथ्वी को छूते हुए मूल भाग वाली, विधाता के अवतरण के लिए चार व्यायाम विस्तार वाली तथा सीढ़ियों की पंक्ति से युक्त थी।

श्लोक 3 (skanda.2.67.3)

रथप्रासादयोर्मध्ये शक्रचाप इवांशुमान् । आविर्बभूव सहसा साद्भुतं वीक्षितो जनैः

rathaprāsādayormadhye śakracāpa ivāṁśumān āvirbabhūva sahasā sādbhutaṁ vīkṣito janaiḥ

रथ और प्रासाद के मध्य वह इन्द्रधनुष के समान तेजोमय होकर सहसा प्रकट हुई, और लोगों ने उसे अत्यन्त आश्चर्य से देखा।

श्लोक 4 (skanda.2.67.4)

ततो गंधर्वराजैस्तु रत्नवेत्रकरैर्द्विजाः । एष पंथाः प्रभो ह्येहि इत्यादेशितमार्गकैः

tato gaṁdharvarājaistu ratnavetrakarairdvijāḥ eṣa paṁthāḥ prabho hyehi ityādeśitamārgakaiḥ

तदनन्तर, हे द्विजो, गन्धर्वराजों ने रत्नजड़ित छड़ी हाथ में लिए हुए मार्ग दिखाते हुए कहा — प्रभो, यही मार्ग है, आइए!

श्लोक 5 (skanda.2.67.5)

दुर्वाससो नारदस्य करयोर्दत्तहस्तकः । सोपानैरवतीर्णोऽथ पुनानश्चक्षुषा जगत्

durvāsaso nāradasya karayordattahastakaḥ sopānairavatīrṇo'tha punānaścakṣuṣā jagat

दुर्वासा और नारद के हाथों में अपना हाथ देकर, ब्रह्माजी सीढ़ियों से नीचे उतरे, अपने दर्शनमात्र से संसार को पवित्र करते हुए।

श्लोक 6 (skanda.2.67.6)

स्मयमानो रथान्दृष्ट्वा प्रासादं समलंकृतम् । दिगंतव्यापिनीं शालां रत्नस्तंभोपशोभिताम्

smayamāno rathāndṛṣṭvā prāsādaṁ samalaṁkṛtam digaṁtavyāpinīṁ śālāṁ ratnastaṁbhopaśobhitām

रथों को देखकर मुस्कुराते हुए, सुसज्जित प्रासाद और दिशाओं तक फैली हुई, रत्नस्तम्भों से सुशोभित शाला को देखकर,

श्लोक 7 (skanda.2.67.7)

शक्रस्याप्यद्भुतकरी सर्वसंभारसंभृताम् । अवातरद्विमानात्स देवब्रह्मर्षिराजभिः

śakrasyāpyadbhutakarī sarvasaṁbhārasaṁbhṛtām avātaradvimānātsa devabrahmarṣirājabhiḥ

जो इन्द्र के लिए भी आश्चर्यजनक थी तथा सम्पूर्ण वैभव से परिपूर्ण थी — वे देवताओं, ब्रह्मर्षियों और राजाओं के साथ अपने विमान से उतरे,

श्लोक 8 (skanda.2.67.8)

किरीटदत्तांजलिभिः स्तूयमानः समंततः । कटाक्षेणानुगृह्णाति यां दिशं स पितामहः

kirīṭadattāṁjalibhiḥ stūyamānaḥ samaṁtataḥ kaṭākṣeṇānugṛhṇāti yāṁ diśaṁ sa pitāmahaḥ

मुकुटधारी देवगणों द्वारा चारों ओर से अंजलिबद्ध होकर स्तुति किए जाते हुए; ब्रह्माजी जिस भी दिशा में अपनी कृपादृष्टि डालते थे,

श्लोक 9 (skanda.2.67.9)

तत्रांजलीनां संमर्दाः कोटयः शिरसा धृताः । पादाब्ज प्रणतं दृष्ट्वा इंद्रद्युम्नं प्रजापतिः

tatrāṁjalīnāṁ saṁmardāḥ koṭayaḥ śirasā dhṛtāḥ pādābja praṇataṁ dṛṣṭvā iṁdradyumnaṁ prajāpatiḥ

वहाँ करोड़ों अंजलियों की भीड़ सिर पर धारण की जाती थी। इन्द्रद्युम्न को अपने चरणकमलों में प्रणत देखकर प्रजापति ने

श्लोक 10 (skanda.2.67.10)

उवाच प्रश्रयगिरा स्मितभिन्नोष्ठसंपुटः । अंगुल्या निर्दिशन्देवान्पितॄन्ब्रह्मर्षितापसान्

uvāca praśrayagirā smitabhinnoṣṭhasaṁpuṭaḥ aṁgulyā nirdiśandevānpitṝnbrahmarṣitāpasān

विनम्र वाणी से, मुस्कान से विभक्त अधरोष्ठ लिए, अपनी अंगुली से देवताओं, पितरों, ब्रह्मर्षियों और तपस्वियों की ओर संकेत करते हुए कहा —

श्लोक 11 (skanda.2.67.11)

सिद्धविद्याधरान्यक्षगंधर्वाप्सरसस्तथा । एकत्र मिलितान्सर्वान्युगपन्मोदनिर्भरान्

siddhavidyādharānyakṣagaṁdharvāpsarasastathā ekatra militānsarvānyugapanmodanirbharān

तथा सिद्ध, विद्याधर, यक्ष, गन्धर्व और अप्सराओं की ओर भी, जो सब एक साथ मिलकर एक ही क्षण में आनन्द से परिपूर्ण थे —

श्लोक 12 (skanda.2.67.12)

पश्येंद्रद्युम्न भाग्यं ते सर्वलोकवशीकरम् । त्वदर्थमेकदा सर्वे मां पुरस्कृत्य संगताः

paśyeṁdradyumna bhāgyaṁ te sarvalokavaśīkaram tvadarthamekadā sarve māṁ puraskṛtya saṁgatāḥ

हे इन्द्रद्युम्न, अपने उस सौभाग्य को देखो जो समस्त लोकों को वश में करने वाला है! तुम्हारे ही लिए ये सब एक साथ, मुझे आगे करके, यहाँ एकत्र हुए हैं।

श्लोक 13 (skanda.2.67.13)

इत्युक्त्वा प्रययौ शीघ्रं नारायणरथं ततः । प्रणिपत्य जगन्नाथं त्रिः परीत्य पितामहः

ityuktvā prayayau śīghraṁ nārāyaṇarathaṁ tataḥ praṇipatya jagannāthaṁ triḥ parītya pitāmahaḥ

ऐसा कहकर ब्रह्माजी शीघ्र ही नारायण के रथ की ओर गए; जगन्नाथ को प्रणाम करके तीन बार परिक्रमा की।

श्लोक 14 (skanda.2.67.14)

आनंदसिंधुसंमग्नः सरोमांचवपुः स्वयम् । स्वमात्मानं नुनावाथ प्रत्यक्षं स्वरगद्गदम्

ānaṁdasiṁdhusaṁmagnaḥ saromāṁcavapuḥ svayam svamātmānaṁ nunāvātha pratyakṣaṁ svaragadgadam

आनन्दसागर में डूबे हुए, स्वयं रोमांचित शरीर वाले, उन्होंने साक्षात् स्वरूप के समक्ष गद्गद वाणी में अपने ही आत्मा की स्तुति की।

श्लोक 15 (skanda.2.67.15)

ब्रह्मोवाच । नमस्तुभ्यं नमो मह्यं तुभ्यं मह्यं नमोनमः । अहं त्वं त्वमहं सर्वं जगदेतच्चराचरम्

brahmovāca namastubhyaṁ namo mahyaṁ tubhyaṁ mahyaṁ namonamaḥ ahaṁ tvaṁ tvamahaṁ sarvaṁ jagadetaccarācaram

ब्रह्माजी ने कहा — तुम्हें नमस्कार, मुझे नमस्कार; तुम्हें और मुझे बारम्बार नमस्कार! मैं ही तुम हूँ, तुम ही मैं हो — यह सम्पूर्ण चराचर जगत् भी वही है।

श्लोक 16 (skanda.2.67.16)

महदादि जगत्सर्वं मायाविलसितं तव । अध्यस्तं त्वयि विश्वात्मंस्त्वयैव परिणामितम्

mahadādi jagatsarvaṁ māyāvilasitaṁ tava adhyastaṁ tvayi viśvātmaṁstvayaiva pariṇāmitam

महत्तत्त्व आदि से युक्त यह सम्पूर्ण जगत् तुम्हारी माया की लीला है; हे विश्वात्मन्, यह तुम्हीं में अध्यस्त है और तुम्हारे द्वारा ही परिणत हुआ है।

श्लोक 17 (skanda.2.67.17)

यदेतदखिलाभासं तत्त्वदज्ञानसंभवम् । ज्ञाते त्वयि विलीयेत रज्जुसर्पादिबोधवत्

yadetadakhilābhāsaṁ tattvadajñānasaṁbhavam jñāte tvayi vilīyeta rajjusarpādibodhavat

यह जो सम्पूर्ण आभास है, वह तुम्हारे विषय में अज्ञान से उत्पन्न हुआ है; तुम्हारे ज्ञात होते ही यह वैसे ही विलीन हो जाता है जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम।

श्लोक 18 (skanda.2.67.18)

अनिर्वक्तव्यमेवेदं सत्त्वात्सत्त्वविवेकतः । अद्वितीय जगद्भास स्वप्रकाश नमोऽस्तु ते

anirvaktavyamevedaṁ sattvātsattvavivekataḥ advitīya jagadbhāsa svaprakāśa namo'stu te

यह जगत् सत्-असत् के विवेक से अनिर्वचनीय ही है; हे अद्वितीय, जगत् के प्रकाशक, स्वयंप्रकाश — तुम्हें नमस्कार हो।

श्लोक 19 (skanda.2.67.19)

विषयानंदमखिलं सहजानंदरूपिणः । अंशं तवोपजीवंति येन जीवंति जंतवः

viṣayānaṁdamakhilaṁ sahajānaṁdarūpiṇaḥ aṁśaṁ tavopajīvaṁti yena jīvaṁti jaṁtavaḥ

विषयों का सम्पूर्ण आनन्द तुम्हारे सहज आनन्दस्वरूप का ही अंश है, जिसके सहारे प्राणी जीवित रहते हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.67.20)

निष्प्रपंच निराकार निर्विकार निराश्रय । स्थूलसूक्ष्माणुमहिमन्स्थौल्यसूक्ष्मविवर्जित

niṣprapaṁca nirākāra nirvikāra nirāśraya sthūlasūkṣmāṇumahimansthaulyasūkṣmavivarjita

हे निष्प्रपंच, निराकार, निर्विकार, निराश्रय! हे स्थूल-सूक्ष्म-अणु की महिमा वाले, फिर भी स्थूलता और सूक्ष्मता से रहित!

श्लोक 21 (skanda.2.67.21)

गुणातीत गुणाधार त्रिगुणात्मन्नमोऽस्तु ते

guṇātīta guṇādhāra triguṇātmannamo'stu te

हे गुणातीत, गुणों के आधार, त्रिगुणस्वरूप! तुम्हें नमस्कार हो।

श्लोक 22 (skanda.2.67.22)

त्वन्मायया मोहितोऽहं सृष्टिमात्रपरायणः । अद्यापि न लभे शर्म अंतर्य्यामिन्नमोस्तु ते

tvanmāyayā mohito'haṁ sṛṣṭimātraparāyaṇaḥ adyāpi na labhe śarma aṁtaryyāminnamostu te

तुम्हारी माया से मोहित होकर मैं केवल सृष्टि-कार्य में ही तत्पर रहता हूँ; अब भी मुझे शान्ति नहीं मिलती। हे अन्तर्यामी, तुम्हें नमस्कार हो।

श्लोक 23 (skanda.2.67.23)

त्वन्नाभिपंकजाज्जातो नित्यं तत्रैव संस्तुवन् । नातिक्रमितुमीशोऽस्मि मायां ते कोऽन्य ईश्वरः

tvannābhipaṁkajājjāto nityaṁ tatraiva saṁstuvan nātikramitumīśo'smi māyāṁ te ko'nya īśvaraḥ

तुम्हारी नाभि-कमल से उत्पन्न होकर मैं सदा वहीं तुम्हारी स्तुति करता रहता हूँ; तुम्हारी माया का उल्लंघन करने में मैं समर्थ नहीं हूँ — फिर अन्य कौन ईश्वर हो सकता है?

श्लोक 24 (skanda.2.67.24)

अहं यथांडमध्येऽस्मिन्रचितः सृष्टिकर्मणि । तथानुलोमकलिता ब्रह्मांडे ब्रह्मकोटयः

ahaṁ yathāṁḍamadhye'sminracitaḥ sṛṣṭikarmaṇi tathānulomakalitā brahmāṁḍe brahmakoṭayaḥ

जैसे मुझे इस ब्रह्माण्ड के भीतर सृष्टि-कार्य के लिए रचा गया है, वैसे ही क्रमानुसार ब्रह्माण्ड में करोड़ों ब्रह्मा विद्यमान हैं,

श्लोक 25 (skanda.2.67.25)

सार्द्धत्रिकोटिसंख्यानां विरिंचीनामपि प्रभो । नैकोऽपि तत्त्वतो वेत्ति यथाहं त्वत्पुरः स्थितः

sārddhatrikoṭisaṁkhyānāṁ viriṁcīnāmapi prabho naiko'pi tattvato vetti yathāhaṁ tvatpuraḥ sthitaḥ

हे प्रभो, साढ़े तीन करोड़ ब्रह्माओं में से भी कोई एक भी तत्त्वतः वैसे नहीं जानता जैसे मैं तुम्हारे समक्ष खड़ा होकर जानता हूँ।

श्लोक 26 (skanda.2.67.26)

नमोचिंत्यमहिम्ने ते चिद्रूपाय नमोनमः । नमो देवाधिदेवाय देवदेवाय ते नमः

namociṁtyamahimne te cidrūpāya namonamaḥ namo devādhidevāya devadevāya te namaḥ

तुम्हें, जिनकी महिमा अचिन्त्य है, चिद्रूप को, बारम्बार नमस्कार! देवाधिदेव, देवदेव को नमस्कार!

श्लोक 27 (skanda.2.67.27)

दिव्यादिव्यस्वरूपाय दिव्यरूपाय ते नमः । जरामृत्युविहीनाय मृत्युरूपाय ते नमः

divyādivyasvarūpāya divyarūpāya te namaḥ jarāmṛtyuvihīnāya mṛtyurūpāya te namaḥ

दिव्य से भी दिव्य स्वरूप वाले, दिव्यरूप को नमस्कार! जरा-मृत्यु से रहित, फिर भी मृत्युरूप को नमस्कार!

श्लोक 28 (skanda.2.67.28)

ज्वलदग्निस्वरूपाय मृत्योरपि च मृत्यवे । प्रपन्नमृत्युनाशाय सहजानंदरूपिणे । भक्तिप्रियाय जगतां मात्रे पित्रे नमो नमः

jvaladagnisvarūpāya mṛtyorapi ca mṛtyave prapannamṛtyunāśāya sahajānaṁdarūpiṇe bhaktipriyāya jagatāṁ mātre pitre namo namaḥ

प्रज्वलित अग्निस्वरूप, मृत्यु के लिए भी मृत्युस्वरूप, शरणागतों की मृत्यु के नाशक, सहज आनन्दस्वरूप, भक्तिप्रिय, जगत् के माता-पिता को बारम्बार नमस्कार!

श्लोक 29 (skanda.2.67.29)

प्रणतार्तिविनाशाय नित्योद्योगिन्नमोऽस्तु ते । नमोनमस्ते दीनानां कृपासहजसिंधवे

praṇatārtivināśāya nityodyoginnamo'stu te namonamaste dīnānāṁ kṛpāsahajasiṁdhave

प्रणतजनों की पीड़ा के नाशक, नित्य उद्योगशील को नमस्कार! दीनों के लिए सहज करुणासागर को बारम्बार नमस्कार!

श्लोक 30 (skanda.2.67.30)

पराय पररूपाय परंपाराय ते नमः । अपारपारभूताय ब्रह्मरूपाय ते नमः

parāya pararūpāya paraṁpārāya te namaḥ apārapārabhūtāya brahmarūpāya te namaḥ

परम को, परम रूप वाले को, परम्परा के पार जाने वाले को नमस्कार! अपार के भी पार, ब्रह्मस्वरूप को नमस्कार!

श्लोक 31 (skanda.2.67.31)

परमार्थस्वरूपाय नमस्ते परहेतवे । परंपरा परिव्याप्त परतत्त्वपराय ते

paramārthasvarūpāya namaste parahetave paraṁparā parivyāpta paratattvaparāya te

परमार्थस्वरूप को, परम कारण को नमस्कार! परम्परा में व्याप्त, परतत्त्व से भी परे को नमस्कार!

श्लोक 32 (skanda.2.67.32)

प्रणतार्तिविनाशाय नमः स्वात्मैकभानवे । पुरा यत्प्रार्थितं स्वास्मिन्सृष्टिभारावतारणे

praṇatārtivināśāya namaḥ svātmaikabhānave purā yatprārthitaṁ svāsminsṛṣṭibhārāvatāraṇe

प्रणतजनों की पीड़ा के नाशक, अपनी आत्मा के एकमात्र सूर्य को नमस्कार! पहले जो प्रार्थना अपनी सृष्टि का भार उतारने के लिए की गई थी,

श्लोक 33 (skanda.2.67.33)

तत्कुरुष्व जगन्नाथ सहजाक्तदरूपभाक् । त्वयि प्रसन्ने किं नाथ दुर्लभं मयि विद्यते

tatkuruṣva jagannātha sahajāktadarūpabhāk tvayi prasanne kiṁ nātha durlabhaṁ mayi vidyate

हे जगन्नाथ, वह अब पूर्ण करो, सहज रूप से यह स्वरूप धारण करके। तुम्हारे प्रसन्न होने पर, हे नाथ, मेरे लिए क्या दुर्लभ है?

श्लोक 34 (skanda.2.67.34)

त्वयैवाहं पृथग्लीलाभेदाद्भिन्नः कृपांबुधे । अज्ञानतिमिरच्छन्ने जगत्कारागृहांतरे

tvayaivāhaṁ pṛthaglīlābhedādbhinnaḥ kṛpāṁbudhe ajñānatimiracchanne jagatkārāgṛhāṁtare

तुम्हारे ही द्वारा, हे करुणासागर, विभिन्न लीलाभेदों से मैं पृथक् कर दिया गया हूँ — अज्ञान के अन्धकार से ढके इस संसाररूपी कारागार के भीतर,

श्लोक 35 (skanda.2.67.35)

भ्राम्यन्न द्वारमाप्नोति त्वामृते मुक्तिहेतवे

bhrāmyanna dvāramāpnoti tvāmṛte muktihetave

भटकता हुआ भी, तुम्हारे बिना, हे मुक्तिकारण, कोई द्वार नहीं पाता।

श्लोक 36 (skanda.2.67.36)

नमोनमस्ते जगदेकवन्द्य सुरासुराभ्यर्चितपादपद्म । नमोनमस्तापहरैकचंद्र नमोनमः शर्मसुबोधसांद्र

namonamaste jagadekavandya surāsurābhyarcitapādapadma namonamastāpaharaikacaṁdra namonamaḥ śarmasubodhasāṁdra

हे जगत् के एकमात्र वन्दनीय, देव-असुरों द्वारा पूजित चरणकमल वाले, तुम्हें बारम्बार नमस्कार! हे सन्ताप हरने वाले एकमात्र चन्द्र, हे सुख और सम्यक् ज्ञान के सान्द्ररूप, तुम्हें बारम्बार नमस्कार!

श्लोक 37 (skanda.2.67.37)

नमो नमः कल्पकदूरभूत दुष्प्राप्यकामप्रद कल्पवृक्ष । दीनाशरण्यप्रणतैकदुःखसंघोद्धृतौ नित्यसुबद्धपक्ष

namo namaḥ kalpakadūrabhūta duṣprāpyakāmaprada kalpavṛkṣa dīnāśaraṇyapraṇataikaduḥkhasaṁghoddhṛtau nityasubaddhapakṣa

हे कल्पवृक्ष से भी बढ़कर, दुष्प्राप्य कामनाओं को भी पूर्ण करने वाले, बारम्बार नमस्कार! हे दीन-शरणागतों के एकमात्र दुःखसमूह का उद्धार करने वाले, नित्य सन्नद्ध!

श्लोक 38 (skanda.2.67.38)

प्रसीद जगतां नाथ मग्नानां दुःखसागरे । कटाक्षलीलापातेन त्रायस्व करुणाकर

prasīda jagatāṁ nātha magnānāṁ duḥkhasāgare kaṭākṣalīlāpātena trāyasva karuṇākara

हे जगत् के स्वामी, दुःखसागर में डूबे हुओं पर प्रसन्न होओ; अपनी कटाक्ष-लीला के गिरने मात्र से उनकी रक्षा करो, हे करुणाकर!

श्लोक 39 (skanda.2.67.39)

स्तुत्वेत्थं श्रीजगन्नाथं वेदार्थः स पितामहः । जगाम सीरिणं द्रष्टुमवतीर्णं धराधरम्

stutvetthaṁ śrījagannāthaṁ vedārthaḥ sa pitāmahaḥ jagāma sīriṇaṁ draṣṭumavatīrṇaṁ dharādharam

इस प्रकार श्रीजगन्नाथ की स्तुति करके, वेदार्थस्वरूप ब्रह्माजी, अवतीर्ण पृथ्वीधर सीरी (बलराम) के दर्शन के लिए गए।

श्लोक 40 (skanda.2.67.40)

प्रणम्य परया भक्त्या तुष्टाव बलिनं मुदा । नभः शिरस्ते देवेश आपस्ते विग्रहः प्रभो

praṇamya parayā bhaktyā tuṣṭāva balinaṁ mudā nabhaḥ śiraste deveśa āpaste vigrahaḥ prabho

परम भक्ति से प्रणाम करके, उन्होंने आनन्दपूर्वक बलि की स्तुति की — हे देवेश, आकाश तुम्हारा शिर है, जल तुम्हारा शरीर है, हे प्रभो;

श्लोक 41 (skanda.2.67.41)

पादौ क्षितिर्मुखं वह्निः श्वसितानि समीरणः । मनस्ते ह्योषधीनाथश्चक्षुषी ते दिवाकरः

pādau kṣitirmukhaṁ vahniḥ śvasitāni samīraṇaḥ manaste hyoṣadhīnāthaścakṣuṣī te divākaraḥ

पृथ्वी तुम्हारे चरण हैं, अग्नि मुख है, वायु तुम्हारी श्वासें हैं; चन्द्रमा तुम्हारा मन है, सूर्य तुम्हारे दोनों नेत्र हैं;

श्लोक 42 (skanda.2.67.42)

बाहवः ककुभो नाथ नमस्ते ज्ञानदर्पण । चतुर्दशानां लोकानां मूलस्तंभाय सीरिणे

bāhavaḥ kakubho nātha namaste jñānadarpaṇa caturdaśānāṁ lokānāṁ mūlastaṁbhāya sīriṇe

दिशाएँ तुम्हारी भुजाएँ हैं, हे नाथ, हे ज्ञानदर्पण, तुम्हें नमस्कार! चौदह लोकों के मूल स्तम्भ सीरी को,

श्लोक 43 (skanda.2.67.43)

पदांभोजप्रपन्नानां नमः पापौघदारिणे । अनन्तवक्त्रनयनश्रोत्रपादाक्षिबाहवे

padāṁbhojaprapannānāṁ namaḥ pāpaughadāriṇe anantavaktranayanaśrotrapādākṣibāhave

चरणकमल में शरणागतों के पापसमूह को नष्ट करने वाले को नमस्कार, जो अनन्त मुख, नेत्र, कान, चरण और भुजाओं वाले हैं;

श्लोक 44 (skanda.2.67.44)

नमो नादिमहामूलतमःस्तोमौघभानवे । त्रयीमय त्रिधादोषनाशाय त्र्यवतारिणे

namo nādimahāmūlatamaḥstomaughabhānave trayīmaya tridhādoṣanāśāya tryavatāriṇe

मूल महान अन्धकारसमूह के लिए सूर्यस्वरूप को नमस्कार! त्रयीमय, तीन दोषों के नाशक, त्रिविध अवतार धारण करने वाले को,

श्लोक 45 (skanda.2.67.45)

फणामणिफणाकार क्षितिमण्डलधारिणे । नमः कालाग्निरुद्राय महारुद्राय ते नमः

phaṇāmaṇiphaṇākāra kṣitimaṇḍaladhāriṇe namaḥ kālāgnirudrāya mahārudrāya te namaḥ

सर्पफणाओं के मणियों जैसे रूप वाले, पृथ्वीमण्डल को धारण करने वाले को नमस्कार! कालाग्निरुद्र, महारुद्र को नमस्कार!

श्लोक 46 (skanda.2.67.46)

भोगतल्पफणाच्छत्रमध्यसुप्ताय ते नमः । महार्णवजले वृद्ध एकीभूते जगत्त्रये

bhogatalpaphaṇācchatramadhyasuptāya te namaḥ mahārṇavajale vṛddha ekībhūte jagattraye

भोगशय्या रूपी फणाओं की छत्रछाया में सोए हुए को नमस्कार, जब प्रलयकाल में तीनों लोक महासागर के जल में एक हो जाते हैं;

श्लोक 47 (skanda.2.67.47)

त्वमेव शेषो भगवन्सहस्रफणमंडितः । फणामणिगणव्याजसंभृताखिलभौतिकः

tvameva śeṣo bhagavansahasraphaṇamaṁḍitaḥ phaṇāmaṇigaṇavyājasaṁbhṛtākhilabhautikaḥ

तुम्हीं सहस्रफणों से सुशोभित शेष हो, जो फणामणियों के बहाने सम्पूर्ण भौतिक सृष्टि को धारण करते हो;

श्लोक 48 (skanda.2.67.48)

त्वमेव नाथः सर्वेषां स्रष्टा पालयिता विभो । अत्ता धारयिता नित्यं मदाद्यास्त्वन्निमित्तकाः

tvameva nāthaḥ sarveṣāṁ sraṣṭā pālayitā vibho attā dhārayitā nityaṁ madādyāstvannimittakāḥ

तुम्हीं सबके स्वामी, स्रष्टा और पालक हो, हे विभो; संहारक और नित्य धारणकर्ता भी तुम्हीं हो — मद आदि तुम्हारे ही निमित्त से हैं।

श्लोक 49 (skanda.2.67.49)

एष नारायणो देवो वेदांतेषूपगीयते । त्वत्तो न भिन्नो भगवन्कारणाद्भेदभागसि

eṣa nārāyaṇo devo vedāṁteṣūpagīyate tvatto na bhinno bhagavankāraṇādbhedabhāgasi

यह नारायण देव वेदान्त में गाए जाते हैं; हे भगवन्, तुम उनसे भिन्न नहीं हो — कारणवश ही तुम भेद धारण करते हो।

श्लोक 50 (skanda.2.67.50)

शय्या त्वं शयिता ह्येष छाद्यः संछादको भवान् । यो वै विष्णुः स वै रामो यो रामः कृष्ण एव सः

śayyā tvaṁ śayitā hyeṣa chādyaḥ saṁchādako bhavān yo vai viṣṇuḥ sa vai rāmo yo rāmaḥ kṛṣṇa eva saḥ

शय्या तुम हो, शयनकर्ता वे हैं; आच्छादन तुम हो, आच्छादक भी तुम हो। जो विष्णु हैं वही राम हैं, जो राम हैं वही कृष्ण हैं।

श्लोक 51 (skanda.2.67.51)

युवयोरंतरं नास्ति प्रसीद त्वं जगन्मय । इति स्तवांते बलिनं प्रणम्य परमेश्वरम्

yuvayoraṁtaraṁ nāsti prasīda tvaṁ jaganmaya iti stavāṁte balinaṁ praṇamya parameśvaram

तुम दोनों में कोई भेद नहीं है — प्रसन्न होओ, हे जगन्मय! इस प्रकार स्तुति के अन्त में बलि को प्रणाम करके, परमेश्वर

श्लोक 52 (skanda.2.67.52)

ईश्वरीं जगतां द्रष्टुं सुभद्रास्यन्दनं ययौ । जय देवि जगन्मातः प्रसीद परमेश्वरि

īśvarīṁ jagatāṁ draṣṭuṁ subhadrāsyandanaṁ yayau jaya devi jaganmātaḥ prasīda parameśvari

जगत् की ईश्वरी को देखने के लिए सुभद्रा के रथ की ओर गए — जय हो, हे देवि, जगन्माता! हे परमेश्वरि, प्रसन्न होओ।

श्लोक 53 (skanda.2.67.53)

कार्यकारणकर्त्री त्वं सर्वशक्त्यै नमोऽस्तु ते । सर्वस्य हृदि संविष्टे ज्ञानमोहात्मिके सदा

kāryakāraṇakartrī tvaṁ sarvaśaktyai namo'stu te sarvasya hṛdi saṁviṣṭe jñānamohātmike sadā

तुम कार्य और कारण दोनों की कर्त्री हो, हे सर्वशक्ति, तुम्हें नमस्कार! तुम सर्वदा सबके हृदय में विराजमान हो, ज्ञान और मोह दोनों स्वरूपा;

श्लोक 54 (skanda.2.67.54)

कैवल्यमुक्तिदे भद्रे त्वां नमामि सुरारणिम् । देवि त्वं विष्णुमायासि मोहयन्ती चराचरम्

kaivalyamuktide bhadre tvāṁ namāmi surāraṇim devi tvaṁ viṣṇumāyāsi mohayantī carācaram

हे भद्रे, कैवल्यमुक्ति देने वाली, तुम्हें नमस्कार, हे देवों की शक्ति की उत्पत्ति-स्थान! हे देवि, तुम विष्णुमाया हो, जो चराचर को मोहित करती हो।

श्लोक 55 (skanda.2.67.55)

हृत्पद्मासनसंस्थासि विष्णुभावानुसारिणी । त्वमेव लक्ष्मीर्गौरी च शची कात्यायनी तथा

hṛtpadmāsanasaṁsthāsi viṣṇubhāvānusāriṇī tvameva lakṣmīrgaurī ca śacī kātyāyanī tathā

तुम हृदयकमल के आसन पर विराजमान हो, विष्णु के भाव का अनुसरण करने वाली; तुम्हीं लक्ष्मी, गौरी, शची तथा कात्यायनी भी हो;

श्लोक 56 (skanda.2.67.56)

यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके । तस्य सर्वस्य शक्तिस्त्वं स्तोतुं त्वां कस्तु शक्तिमान्

yacca kiṁcitkvacidvastu sadasadvākhilātmike tasya sarvasya śaktistvaṁ stotuṁ tvāṁ kastu śaktimān

जो भी कहीं कोई वस्तु सत् या असत् रूप में है, हे अखिलात्मिके, उस सबकी शक्ति तुम्हीं हो — तुम्हारी स्तुति करने में कौन समर्थ है?

श्लोक 57 (skanda.2.67.57)

जय भद्रे सुभद्रे त्वं सर्वेषां भद्रदायिनि । भद्राभद्रस्वरूपे त्वं भद्रकालि नमोऽस्तु ते

jaya bhadre subhadre tvaṁ sarveṣāṁ bhadradāyini bhadrābhadrasvarūpe tvaṁ bhadrakāli namo'stu te

जय हो, हे भद्रे, सुभद्रे, तुम सबको कल्याण देने वाली हो! हे भद्र-अभद्र दोनों स्वरूपा, हे भद्रकालि, तुम्हें नमस्कार!

श्लोक 58 (skanda.2.67.58)

त्वं माता जगतां देवि पिता नारायणो हि सः । स्त्रीरूपं त्वं सर्वमेव पुंरूपो जगदीश्वरः

tvaṁ mātā jagatāṁ devi pitā nārāyaṇo hi saḥ strīrūpaṁ tvaṁ sarvameva puṁrūpo jagadīśvaraḥ

हे देवि, तुम जगत् की माता हो, नारायण ही पिता हैं। तुम सम्पूर्ण स्त्रीरूप हो, जगदीश्वर पुरुषरूप हैं।

श्लोक 59 (skanda.2.67.59)

युवयोर्न हि भेदोऽस्ति नास्त्यन्यत्परमेव हि । यथा वयं नियुक्ता हि त्वया वै विष्णुमायया

yuvayorna hi bhedo'sti nāstyanyatparameva hi yathā vayaṁ niyuktā hi tvayā vai viṣṇumāyayā

तुम दोनों में कोई भेद नहीं है, तुमसे परे और कुछ नहीं है। जैसे हम सब, हे विष्णुमाये, तुम्हारे द्वारा नियुक्त होकर

श्लोक 60 (skanda.2.67.60)

निदेशकारिणो नित्यं भ्रमामः परमेश्वरि । वृत्तिः प्रवृत्तिः परमा क्षुधा निद्रा त्वमेव च

nideśakāriṇo nityaṁ bhramāmaḥ parameśvari vṛttiḥ pravṛttiḥ paramā kṣudhā nidrā tvameva ca

सदा तुम्हारे आदेश का पालन करते हुए भटकते रहते हैं, हे परमेश्वरि। वृत्ति, प्रवृत्ति, भूख और निद्रा — ये सब तुम्हीं हो;

श्लोक 61 (skanda.2.67.61)

आशा त्वमाशापूर्णा च सर्वाशा परिपूरिका । मुक्तिहेतुस्त्वमेवेशि बंधहेतुस्त्वमेह हि

āśā tvamāśāpūrṇā ca sarvāśā paripūrikā muktihetustvameveśi baṁdhahetustvameha hi

आशा भी तुम्हीं हो, आशा को पूर्ण करने वाली भी, समस्त इच्छाओं की पूर्ति करने वाली भी। मुक्ति का कारण तुम्हीं हो, हे ईश्वरि, और बन्धन का कारण भी तुम्हीं हो।

श्लोक 62 (skanda.2.67.62)

सर्वज्ञानप्रदे नित्ये भक्तानां कल्पवल्लरी । त्राहि पादाब्जनम्रं मां कृपापांगविलोकनैः

sarvajñānaprade nitye bhaktānāṁ kalpavallarī trāhi pādābjanamraṁ māṁ kṛpāpāṁgavilokanaiḥ

हे नित्य, समस्त ज्ञान देने वाली, भक्तों के लिए कल्पलता स्वरूप! अपनी करुणादृष्टि से चरणकमल में नत मेरी रक्षा करो।

श्लोक 63 (skanda.2.67.63)

स्तुत्वेत्थं भद्ररूपां तां तत्समीपस्थितं रथे । चक्रं सुदर्शनं विष्णोश्चतुर्थं वपुरास्थितम्

stutvetthaṁ bhadrarūpāṁ tāṁ tatsamīpasthitaṁ rathe cakraṁ sudarśanaṁ viṣṇoścaturthaṁ vapurāsthitam

इस प्रकार उस भद्ररूपा की स्तुति करके, रथ के निकट स्थित, विष्णु के चतुर्थ स्वरूप, सुदर्शनचक्र की ओर उन्होंने ध्यान दिया,

श्लोक 64 (skanda.2.67.64)

प्रणम्य परया भक्त्या इमां स्तुतिमुदाहरत् । सुदर्शन महाज्वाल कोटिसूर्यसमप्रभ

praṇamya parayā bhaktyā imāṁ stutimudāharat sudarśana mahājvāla koṭisūryasamaprabha

परम भक्ति से प्रणाम करके यह स्तुति कही — हे सुदर्शन, महाज्वालायुक्त, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी,

श्लोक 65 (skanda.2.67.65)

अज्ञानतिमिरांधानां वैकुण्ठाध्वप्रदर्शकः । नमस्ते नित्यविलसद्वैष्णवस्वनिकेतन

ajñānatimirāṁdhānāṁ vaikuṇṭhādhvapradarśakaḥ namaste nityavilasadvaiṣṇavasvaniketana

अज्ञानान्धकार से अन्धे हुओं के लिए वैकुण्ठ के मार्ग को दिखाने वाले, नित्य विलसित वैष्णव-तेज के निवासस्थान — तुम्हें नमस्कार!

श्लोक 66 (skanda.2.67.66)

अवार्यवीर्यं यद्रूपं विष्णोस्तत्प्रणमाम्यहम् । प्रणम्य स्तुत्वा देवान्स रथेभ्यः परिवृत्य च

avāryavīryaṁ yadrūpaṁ viṣṇostatpraṇamāmyaham praṇamya stutvā devānsa rathebhyaḥ parivṛtya ca

विष्णु के जिस अवाध्य वीर्य वाले रूप को मैं प्रणाम करता हूँ। देवताओं को प्रणाम और स्तुति करके, रथों से परिक्रमा करके,

श्लोक 67 (skanda.2.67.67)

इन्द्रद्युम्ननारदाभ्यामादिष्टपदपद्धतिः । नीलाचलमथारोहत्प्रासादं द्रष्टुमुत्सुकः

indradyumnanāradābhyāmādiṣṭapadapaddhatiḥ nīlācalamathārohatprāsādaṁ draṣṭumutsukaḥ

इन्द्रद्युम्न और नारद द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण करते हुए, वे नीलाचल पर प्रासाद देखने की उत्सुकता से चढ़े।

श्लोक 68 (skanda.2.67.68)

ततः स गत्वा प्रासादसमीपं दैवतैः सह । ददर्श शालां रुचिरां स्वचित्ताभिमता द्विजाः

tataḥ sa gatvā prāsādasamīpaṁ daivataiḥ saha dadarśa śālāṁ rucirāṁ svacittābhimatā dvijāḥ

तब देवताओं के साथ प्रासाद के निकट जाकर, हे द्विजो, उन्होंने अपने मन को प्रिय लगने वाली सुन्दर शाला देखी।

श्लोक 69 (skanda.2.67.69)

तन्मध्ये स्थापयामास दैवतोरगभूपतीन् । ब्रह्मर्षीन्योगिनो विप्रान्वैष्णवांश्च तपस्विनः

tanmadhye sthāpayāmāsa daivatoragabhūpatīn brahmarṣīnyogino viprānvaiṣṇavāṁśca tapasvinaḥ

उसके मध्य में उन्होंने देवताओं, नागराजों, राजाओं, ब्रह्मर्षियों, योगियों, विप्रों, वैष्णवों और तपस्वियों को स्थापित किया।

श्लोक 70 (skanda.2.67.70)

दिव्यसिंहासनवरे नृपेण प्रतिपादिते । स पादपीठे भगवानुपविष्टः स्वयं विभुः

divyasiṁhāsanavare nṛpeṇa pratipādite sa pādapīṭhe bhagavānupaviṣṭaḥ svayaṁ vibhuḥ

राजा द्वारा प्रदान किए गए दिव्य श्रेष्ठ सिंहासन पर, स्वयं वे विभु भगवान् पादपीठ में विराजमान हुए।

श्लोक 71 (skanda.2.67.71)

शांतिकं पौष्टिकं कर्तुं भारद्वाजं महामुनिम् । पितामहाज्ञया भूपो वरयामास ऋद्धिमत्

śāṁtikaṁ pauṣṭikaṁ kartuṁ bhāradvājaṁ mahāmunim pitāmahājñayā bhūpo varayāmāsa ṛddhimat

शान्ति और पुष्टि कर्म करने के लिए, ब्रह्माजी की आज्ञा से, समृद्ध राजा ने महामुनि भारद्वाज को चुना।

श्लोक 72 (skanda.2.67.72)

प्रतिष्ठायां तु ये देवा बलिपूजाविधौ मताः । होमेषु च तथा ते वै ध्यानरूपमुपाश्रिताः

pratiṣṭhāyāṁ tu ye devā balipūjāvidhau matāḥ homeṣu ca tathā te vai dhyānarūpamupāśritāḥ

प्रतिष्ठा में बलि-पूजा-विधि में माने गए जो देवता होते हैं, वे तथा हवनों में भी, ध्यानरूप से आश्रित हुए,

श्लोक 73 (skanda.2.67.73)

आज्ञया पद्मयोनेस्तु चतुर्दिग्भागमाश्रिताः । सुपूजिता गंधपुष्पमालालंकारभूषणैः

ājñayā padmayonestu caturdigbhāgamāśritāḥ supūjitā gaṁdhapuṣpamālālaṁkārabhūṣaṇaiḥ

ब्रह्माजी की आज्ञा से चारों दिशाओं में स्थित होकर, गन्ध-पुष्प-माला-अलंकार-आभूषणों से भलीभाँति पूजित हुए।

श्लोक 74 (skanda.2.67.74)

ततः कर्म प्रववृते भारद्वाजेन धीमता । प्रत्यक्षं देवदेवस्य सर्वेषां च दिवौकसाम्

tataḥ karma pravavṛte bhāradvājena dhīmatā pratyakṣaṁ devadevasya sarveṣāṁ ca divaukasām

तब बुद्धिमान भारद्वाज द्वारा, देवाधिदेव और सभी स्वर्गवासियों के प्रत्यक्ष समक्ष, कर्म प्रारम्भ हुआ।

श्लोक 75 (skanda.2.67.75)

त्रैलोक्यवासिनां पूजां चकार नृपतिर्मुदा । सांगोपांगं समभ्यर्च्य जगत्स्रष्टारमग्रतः

trailokyavāsināṁ pūjāṁ cakāra nṛpatirmudā sāṁgopāṁgaṁ samabhyarcya jagatsraṣṭāramagrataḥ

राजा ने आनन्दपूर्वक त्रैलोक्यवासियों की पूजा की, जगत् के स्रष्टा को अग्रस्थान में सांगोपांग पूजकर।

श्लोक 76 (skanda.2.67.76)

ततः संपूजिताः सर्वे तेन त्रैलोक्यवासिनः । पश्यन्तोऽवस्थितं मध्ये साक्षाद्ब्रह्माणमव्ययम्

tataḥ saṁpūjitāḥ sarve tena trailokyavāsinaḥ paśyanto'vasthitaṁ madhye sākṣādbrahmāṇamavyayam

तब उसके द्वारा पूजित सभी त्रैलोक्यवासी, मध्य में विराजमान साक्षात् अव्यय ब्रह्म को देखते हुए,

श्लोक 77 (skanda.2.67.77)

वपुष्मंतं जगन्नाथं प्रत्यक्षं ब्रह्मरूपिणम् । इन्द्रद्युम्नप्रसादेन जीवन्मुक्तत्वमाप्नुवन्

vapuṣmaṁtaṁ jagannāthaṁ pratyakṣaṁ brahmarūpiṇam indradyumnaprasādena jīvanmuktatvamāpnuvan

जगन्नाथ को साक्षात् ब्रह्मरूप में शरीरधारी देखते हुए, इन्द्रद्युम्न की कृपा से जीवन्मुक्तता को प्राप्त हुए।

श्लोक 78 (skanda.2.67.78)

कलेवरं भगवतः प्रासादं सुमनोहरम् । प्रतिष्ठाय भरद्वाजः समुच्छ्रितमहाध्वजम्

kalevaraṁ bhagavataḥ prāsādaṁ sumanoharam pratiṣṭhāya bharadvājaḥ samucchritamahādhvajam

भगवान् के कलेवर-रूप उस अत्यन्त मनोहर प्रासाद की, ऊँचे महाध्वज सहित, प्रतिष्ठा करके भरद्वाज ने

श्लोक 79 (skanda.2.67.79)

व्यज्ञापयतत्प्रतिष्ठायै जीवस्याथ पितामहम् । समुत्तस्थौ ततो ब्रह्मा कृतस्वस्त्ययनः स्वयम्

vyajñāpayatatpratiṣṭhāyai jīvasyātha pitāmaham samuttasthau tato brahmā kṛtasvastyayanaḥ svayam

जीव-प्रतिष्ठा के लिए ब्रह्माजी से निवेदन किया। तब ब्रह्माजी स्वयं स्वस्त्ययन करके उठे,

श्लोक 80 (skanda.2.67.80)

ऋषिभिर्नारदाद्यैश्च विद्वद्भिर्ब्राह्मणैस्तथा । राजभिः क्षत्रियैर्नागैः सहितः परमर्षिभिः

ṛṣibhirnāradādyaiśca vidvadbhirbrāhmaṇaistathā rājabhiḥ kṣatriyairnāgaiḥ sahitaḥ paramarṣibhiḥ

नारद आदि ऋषियों, विद्वान ब्राह्मणों, राजाओं, क्षत्रियों, नागों तथा परम ऋषियों के साथ,

श्लोक 81 (skanda.2.67.81)

गन्धर्वैर्गायमानेषु दिव्यगानेषु सुस्वरम् । मांगल्योचितरागेषु नृत्यन्तीष्वप्सरःसु च

gandharvairgāyamāneṣu divyagāneṣu susvaram māṁgalyocitarāgeṣu nṛtyantīṣvapsaraḥsu ca

जब गन्धर्व मधुर स्वर में मांगलिक रागों में दिव्य गीत गा रहे थे और अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं,

श्लोक 82 (skanda.2.67.82)

शाकुनेषु च सूक्तेषु पठ्यमानेषु च द्विजैः । शंखकाहालमुरजभेरीवादित्रवैणवे

śākuneṣu ca sūkteṣu paṭhyamāneṣu ca dvijaiḥ śaṁkhakāhālamurajabherīvāditravaiṇave

जब द्विजों द्वारा शकुन-सूक्त पढ़े जा रहे थे और शंख, काहल, मृदंग, भेरी, वाद्य तथा वेणु की ध्वनि

श्लोक 83 (skanda.2.67.83)

शब्दे प्रमूर्च्छति ततः सर्वे ते स्यन्दनोपरि । गत्वावतारयामासू रथात्सोपानवर्त्मनि

śabde pramūrcchati tataḥ sarve te syandanopari gatvāvatārayāmāsū rathātsopānavartmani

उच्च स्वर में गूँज रही थी — तब सब लोग रथों के ऊपर जाकर, सीढ़ियों के मार्ग से उन्हें रथ से नीचे उतारने लगे,

श्लोक 84 (skanda.2.67.84)

सावधानाः समाधिस्था भक्त्या संयमितात्मकाः । पार्श्वयोर्भुजयोर्मूर्ध्नि पादयोर्न्यस्तपाणयः

sāvadhānāḥ samādhisthā bhaktyā saṁyamitātmakāḥ pārśvayorbhujayormūrdhni pādayornyastapāṇayaḥ

सावधानी से, समाधिस्थ, भक्ति से संयमित होकर, बाजू, भुजा, शिर और चरणों पर हाथ रखते हुए,

श्लोक 85 (skanda.2.67.85)

शनैः शनैः सलीलं ते नारायणमनामयम् । वासं वासं तूलिकासु निन्युः प्रासादसन्निधिम्

śanaiḥ śanaiḥ salīlaṁ te nārāyaṇamanāmayam vāsaṁ vāsaṁ tūlikāsu ninyuḥ prāsādasannidhim

वे धीरे-धीरे, लीलापूर्वक, अनामय नारायण को, बार-बार गद्दियों पर विश्राम देते हुए, प्रासाद के समीप ले गए,

श्लोक 86 (skanda.2.67.86)

उपर्युपरि संतानवृष्टिपूत्पतितासु च । जय कृष्ण जगन्नाथ जय सर्वाऽघनाशन

uparyupari saṁtānavṛṣṭipūtpatitāsu ca jaya kṛṣṇa jagannātha jaya sarvā'ghanāśana

जब ऊपर से सन्तान पुष्पों की पवित्र वर्षा हो रही थी — जय हो कृष्ण जगन्नाथ! जय हो सम्पूर्ण पापों के नाशक!

श्लोक 87 (skanda.2.67.87)

जय लीलादारुतनो जय वांछाफलप्रद । जय संसारसंमग्नलीलोद्धार जयाव्यय

jaya līlādārutano jaya vāṁchāphalaprada jaya saṁsārasaṁmagnalīloddhāra jayāvyaya

जय हो लीला से काष्ठतनु धारण करने वाले! जय हो इच्छाओं का फल देने वाले! जय हो संसार में डूबे हुओं का लीलापूर्वक उद्धार करने वाले! जय हो अव्यय!

श्लोक 88 (skanda.2.67.88)

जयानुकंपापाथोधे जय दीनपरायण । जयाच्युत जयानन्त जयेशान नमोऽस्तु ते

jayānukaṁpāpāthodhe jaya dīnaparāyaṇa jayācyuta jayānanta jayeśāna namo'stu te

जय हो करुणासागर! जय हो दीनों के आश्रय! जय हो अच्युत! जय हो अनन्त! जय हो ईशान, तुम्हें नमस्कार!

श्लोक 89 (skanda.2.67.89)

एभिः स्तवैः स्तूयमानो ब्रह्मणा च स्वयंभुवा । तुष्टाव स मुदा युक्तो नारदश्चोपवीणयन्

ebhiḥ stavaiḥ stūyamāno brahmaṇā ca svayaṁbhuvā tuṣṭāva sa mudā yukto nāradaścopavīṇayan

इन स्तुतियों से स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा स्तुत होकर, नारद ने भी वीणा बजाते हुए आनन्दपूर्वक स्तुति की।

श्लोक 90 (skanda.2.67.90)

रत्नच्छत्रयुगे मूर्ध्नि धार्यमाणेऽथ पृष्ठतः । शशिना भास्वता भक्त्या दिव्यधूपेन धूपिता

ratnacchatrayuge mūrdhni dhāryamāṇe'tha pṛṣṭhataḥ śaśinā bhāsvatā bhaktyā divyadhūpena dhūpitā

शिर पर पीछे से रत्नछत्रयुगल धारण किए जाते हुए, चन्द्रमा के समान तेजस्वी, भक्तिपूर्वक दिव्य धूप से धूपित,

श्लोक 91 (skanda.2.67.91)

श्रेणीकृता ह्युभयतः पार्श्वयोश्चामरग्रहाः । सलीलांदोलनव्यग्रा यौवनालंकृतास्तथा

śreṇīkṛtā hyubhayataḥ pārśvayoścāmaragrahāḥ salīlāṁdolanavyagrā yauvanālaṁkṛtāstathā

दोनों ओर पंक्तिबद्ध चामरधारी, यौवन से अलंकृत, लीलापूर्वक चामर हिलाने में तत्पर —

श्लोक 92 (skanda.2.67.92)

एवं च सहिताः सर्वे कौतूहलसमन्विताः । सुदर्शनं सुभद्रां च बलभद्रमनैषिषुः

evaṁ ca sahitāḥ sarve kautūhalasamanvitāḥ sudarśanaṁ subhadrāṁ ca balabhadramanaiṣiṣuḥ

इस प्रकार सब मिलकर, कौतूहल से युक्त होकर, सुदर्शन, सुभद्रा और बलभद्र को ले गए।

श्लोक 93 (skanda.2.67.93)

प्रासादद्वारि रचिते रत्नस्तंभेऽथ मण्डपे । वासयित्वाभिषेकाय संमुखादर्शमण्डले

prāsādadvāri racite ratnastaṁbhe'tha maṇḍape vāsayitvābhiṣekāya saṁmukhādarśamaṇḍale

प्रासाद-द्वार पर बने रत्नस्तम्भयुक्त मण्डप में, अभिषेक के लिए दर्पण-मण्डल के सम्मुख बिठाकर,

श्लोक 94 (skanda.2.67.94)

अधिवासितै रत्नकुंभैस्तीर्थवार्युपसंभृतैः । सूक्ताभ्यां श्रीपुरुषयोरभिषेकं पितामहः । चकार भगवाँल्लोकसंग्रहार्थं द्विजोत्तमाः

adhivāsitai ratnakuṁbhaistīrthavāryupasaṁbhṛtaiḥ sūktābhyāṁ śrīpuruṣayorabhiṣekaṁ pitāmahaḥ cakāra bhagavām̐llokasaṁgrahārthaṁ dvijottamāḥ

तीर्थजल से भरे, अधिवासित रत्नकुम्भों से, दोनों पुरुष-सूक्तों द्वारा श्रीपुरुषों का अभिषेक, हे द्विजोत्तमो, ब्रह्माजी ने लोकसंग्रह के लिए किया।

श्लोक 95 (skanda.2.67.95)

ततो ह्यलंकृतान्देवान्गंधमाल्योपशोभितान् । नीराजयित्वा भगवान्स स्वयं लोकभावनः । रत्नसिंहासने रम्ये स्थापयामास मन्त्रतः

tato hyalaṁkṛtāndevāngaṁdhamālyopaśobhitān nīrājayitvā bhagavānsa svayaṁ lokabhāvanaḥ ratnasiṁhāsane ramye sthāpayāmāsa mantrataḥ

तब गन्ध-माला से सुशोभित, अलंकृत देवताओं की आरती करके, लोकों को रचने वाले भगवान् ने स्वयं उन्हें मन्त्रपूर्वक सुन्दर रत्नसिंहासन पर स्थापित किया।

श्लोक 96 (skanda.2.67.96)

ब्रह्मोवाच । अशेषजगदाधार सर्वलोकप्रतिष्ठित । सुप्रतिष्ठाखिलव्यापिन्प्रासादे सुस्थिरो भव

brahmovāca aśeṣajagadādhāra sarvalokapratiṣṭhita supratiṣṭhākhilavyāpinprāsāde susthiro bhava

ब्रह्माजी ने कहा — हे सम्पूर्ण जगत् के आधार, समस्त लोकों में प्रतिष्ठित, सुप्रतिष्ठित, सर्वव्यापी! इस प्रासाद में सुस्थिर होओ।

श्लोक 97 (skanda.2.67.97)

त्वयि प्रतिष्ठिते नाथ वयं सर्वे प्रतिष्ठिताः । त्वदाज्ञया प्रतिष्ठेयं पूर्णाऽऽस्तां त्वत्प्रसादतः

tvayi pratiṣṭhite nātha vayaṁ sarve pratiṣṭhitāḥ tvadājñayā pratiṣṭheyaṁ pūrṇā''stāṁ tvatprasādataḥ

तुम्हारे प्रतिष्ठित होने पर, हे नाथ, हम सब प्रतिष्ठित होते हैं। तुम्हारी आज्ञा से यह प्रतिष्ठा तुम्हारी कृपा से पूर्ण हो।

श्लोक 98 (skanda.2.67.98)

स्थापयित्वा जगन्नाथं स्पृष्ट्वा तस्य हृदंबुजम् । आनुष्टुभं मंत्रराजं सहस्रं स जजाप ह

sthāpayitvā jagannāthaṁ spṛṣṭvā tasya hṛdaṁbujam ānuṣṭubhaṁ maṁtrarājaṁ sahasraṁ sa jajāpa ha

जगन्नाथ को स्थापित करके, उनके हृदयकमल का स्पर्श करके, उन्होंने अनुष्टुभ छन्द के मन्त्रराज का सहस्र बार जप किया।

श्लोक 99 (skanda.2.67.99)

वैशाखस्यामले पक्षे अष्टम्यां पुष्ययोगतः । कृता प्रतिष्ठा भो विप्राः शोभने गुरुवासरे

vaiśākhasyāmale pakṣe aṣṭamyāṁ puṣyayogataḥ kṛtā pratiṣṭhā bho viprāḥ śobhane guruvāsare

वैशाख की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को, पुष्य योग में, हे विप्रो, शुभ गुरुवार के दिन प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई।

श्लोक 100 (skanda.2.67.100)

तद्दिनं सुमहत्पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् । स्नानं दानं तपो होमः सर्वमक्षय्यमश्नुते

taddinaṁ sumahatpuṇyaṁ sarvapāpapraṇāśanam snānaṁ dānaṁ tapo homaḥ sarvamakṣayyamaśnute

वह दिन अत्यन्त महापुण्यकारी, सम्पूर्ण पापों का नाशक है; उस दिन किया गया स्नान, दान, तप और हवन सब अक्षय फल देता है।

श्लोक 101 (skanda.2.67.101)

तस्मिन्दिने ये पश्यंति मानवा भक्तिभाविताः । कृष्णं रामं सुभद्रां च मुक्तिभाजो न संशयः

tasmindine ye paśyaṁti mānavā bhaktibhāvitāḥ kṛṣṇaṁ rāmaṁ subhadrāṁ ca muktibhājo na saṁśayaḥ

उस दिन जो मनुष्य भक्तिभाव से कृष्ण, राम और सुभद्रा का दर्शन करते हैं, वे निःसंदेह मुक्ति के भागी होते हैं।

श्लोक 102 (skanda.2.67.102)

शुक्लाष्टमी या वैशाखे गुरुपुष्ययुता यदा । तस्यामभ्यर्चनं विष्णोः कोटिजन्माघनाशनम्

śuklāṣṭamī yā vaiśākhe gurupuṣyayutā yadā tasyāmabhyarcanaṁ viṣṇoḥ koṭijanmāghanāśanam

वैशाख की जो शुक्ल अष्टमी गुरुवार और पुष्य से युक्त होती है, उस दिन विष्णु की पूजा करोड़ों जन्मों के पापों का नाश करती है।

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