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वैष्णव खण्ड · अध्याय 68

नृसिंह-दर्शन और मन्त्रराज

अध्याय 67अध्याय-सूचीअध्याय 69

श्लोक 1 (skanda.2.68.1)

जैमिनिरुवाच । ततः स भगवान्मन्त्रमहिम्ना नरकेसरी । इन्द्रद्युम्नादिभिः सर्वैददृशेऽद्भुतदर्शनः

jaiminiruvāca tataḥ sa bhagavānmantramahimnā narakesarī indradyumnādibhiḥ sarvaidadṛśe'dbhutadarśanaḥ

जैमिनि ने कहा — तब मन्त्र की महिमा से भगवान् नृसिंह रूप में इन्द्रद्युम्न आदि सभी को अद्भुत दर्शन के रूप में दिखाई दिए।

श्लोक 2 (skanda.2.68.2)

लेलिहानो जगत्सर्वं समंताज्ज्वलजिह्वया । कालाग्निरुद्रं सकलं ग्रसंतमिव चोत्थितम्

lelihāno jagatsarvaṁ samaṁtājjvalajihvayā kālāgnirudraṁ sakalaṁ grasaṁtamiva cotthitam

वे अपनी प्रज्वलित जिह्वा से सम्पूर्ण जगत् को चारों ओर से चाटते हुए, मानो कालाग्निरुद्र के समान उठकर सबको ग्रसते हुए प्रतीत हो रहे थे।

श्लोक 3 (skanda.2.68.3)

रोदसीकंदरं व्याप्य तेजसा तपता भृशम् । अनेकाक्षिमुखग्रीवाकरपादश्रुतिर्विभुः

rodasīkaṁdaraṁ vyāpya tejasā tapatā bhṛśam anekākṣimukhagrīvākarapādaśrutirvibhuḥ

वे अपने तीव्र तेज से आकाश और पाताल के मध्य के विवर को व्याप्त करके, अनेक नेत्र, मुख, ग्रीवा, हाथ, पैर और कान वाले विभु,

श्लोक 4 (skanda.2.68.4)

सर्वाश्चर्यमयो देवः केवलं तेजसो निधिः । भयत्रस्ताः समुद्विग्ना नेशाः स्तोतुमपि प्रभुम्

sarvāścaryamayo devaḥ kevalaṁ tejaso nidhiḥ bhayatrastāḥ samudvignā neśāḥ stotumapi prabhum

सम्पूर्ण आश्चर्यमय, केवल तेज के भण्डार देव थे। भय से त्रस्त, उद्विग्न हुए सभी, प्रभु की स्तुति करने में भी असमर्थ थे।

श्लोक 5 (skanda.2.68.5)

तं तथाविधमालोक्य नारदः पितरं तदा । पप्रच्छ भगवन्नित्थं कथमेष प्रकाशते

taṁ tathāvidhamālokya nāradaḥ pitaraṁ tadā papraccha bhagavannitthaṁ kathameṣa prakāśate

उन्हें उस रूप में देखकर नारद ने तब अपने पिता ब्रह्मा से पूछा — भगवन्, यह इस प्रकार क्यों प्रकट हो रहे हैं?

श्लोक 6 (skanda.2.68.6)

नारद उवाच । अनुग्रहायावतरत्प्रत्युतैष भयप्रदः । सर्वे भयात्स्थिरतराः प्रलयाशंकिनोऽधुना

nārada uvāca anugrahāyāvataratpratyutaiṣa bhayapradaḥ sarve bhayātsthiratarāḥ pralayāśaṁkino'dhunā

नारद ने कहा — यह अनुग्रह के लिए अवतरित हुए, किन्तु इसके विपरीत यह भयदायक हो गए हैं! भय से सब और भी स्थिर हो गए हैं, अब सब प्रलय की आशंका कर रहे हैं।

श्लोक 7 (skanda.2.68.7)

त्वमेव भगवल्लीलां जानासि जगतां पते

tvameva bhagavallīlāṁ jānāsi jagatāṁ pate

हे जगत् के स्वामी, आप ही भगवान् की इस लीला को जानते हैं।

श्लोक 8 (skanda.2.68.8)

तच्छ्रुत्वा नारदवचः पद्मयोनिः स्मिताननः । उवाच कौतुकं वाक्यं सर्वेषामुपकारकम्

tacchrutvā nāradavacaḥ padmayoniḥ smitānanaḥ uvāca kautukaṁ vākyaṁ sarveṣāmupakārakam

नारद के वचन सुनकर, मुस्कुराते हुए मुख वाले ब्रह्माजी ने सबके लिए हितकर एक आश्चर्यजनक वचन कहा।

श्लोक 9 (skanda.2.68.9)

ब्रह्मोवाच । अवतीर्णं जगन्नाथं दृष्ट्वा दारुवपुर्धरम्

brahmovāca avatīrṇaṁ jagannāthaṁ dṛṣṭvā dāruvapurdharam

ब्रह्माजी ने कहा — जगन्नाथ को काष्ठमय शरीर धारण किए अवतीर्ण देखकर,

श्लोक 10 (skanda.2.68.10)

अवज्ञास्यंति वै लोकाः साक्षाद्ब्रह्मस्वरूपिणम् । अतत्त्ववेदिनो मूढा महिमानं विदंत्विति

avajñāsyaṁti vai lokāḥ sākṣādbrahmasvarūpiṇam atattvavedino mūḍhā mahimānaṁ vidaṁtviti

लोग साक्षात् ब्रह्मस्वरूप को भी अनादर करेंगे, क्योंकि तत्त्व को न जानने वाले मूढ़ लोग उनकी महिमा नहीं जान पाएँगे — इसीलिए, ताकि वे महिमा जान सकें,

श्लोक 11 (skanda.2.68.11)

मंत्रितो मन्त्रराजेन येनासौ परमेष्ठिना । पुराभिमंत्रितो येन विददार महासुरम्

maṁtrito mantrarājena yenāsau parameṣṭhinā purābhimaṁtrito yena vidadāra mahāsuram

जिस मन्त्रराज से उस परमेष्ठी का आवाहन किया गया था, जिससे पहले उन्होंने महान असुर को चीर डाला था, उसी से यह मन्त्रित हुए हैं।

श्लोक 12 (skanda.2.68.12)

तादृग्रूपं सुदुर्दर्शं प्राप्यमेति भयप्रदम् । मूर्तिरेषा परा काष्ठा विष्णोरमिततेजसः

tādṛgrūpaṁ sudurdarśaṁ prāpyameti bhayapradam mūrtireṣā parā kāṣṭhā viṣṇoramitatejasaḥ

वही अत्यन्त दुर्लभ, भयदायक रूप यहाँ प्राप्त हुआ है; यह रूप विष्णु के अपरिमित तेज की परम पराकाष्ठा है,

श्लोक 13 (skanda.2.68.13)

यामभ्यर्च्य गतिं यांति पुनरावृत्तिदुर्लभाम् । नृसिंहाभिमुखः स्तोत्रमिदमाह मुदान्वितः

yāmabhyarcya gatiṁ yāṁti punarāvṛttidurlabhām nṛsiṁhābhimukhaḥ stotramidamāha mudānvitaḥ

जिसकी पूजा करके भक्त पुनरावृत्ति से रहित दुर्लभ गति को प्राप्त करते हैं। नृसिंह की ओर मुख करके, आनन्दपूर्वक इन्द्रद्युम्न ने यह स्तोत्र कहा —

श्लोक 14 (skanda.2.68.14)

नमोऽस्तु ते देववरैकसिंह नमोऽस्तु पापौघगजैकसिंह । नमोऽस्तु दुःखार्णवपारसिंह नमोऽस्तु तेजोमय दिव्यसिंह

namo'stu te devavaraikasiṁha namo'stu pāpaughagajaikasiṁha namo'stu duḥkhārṇavapārasiṁha namo'stu tejomaya divyasiṁha

तुम्हें नमस्कार हो, हे देवश्रेष्ठों में एकमात्र सिंह! तुम्हें नमस्कार हो, हे पापसमूह रूपी गजों के एकमात्र सिंह! तुम्हें नमस्कार हो, हे दुःखसागर के पार पहुँचाने वाले सिंह! तुम्हें नमस्कार हो, हे तेजोमय दिव्य सिंह!

श्लोक 15 (skanda.2.68.15)

नमोऽस्तु सर्वाकृतिचित्रसिंह नमोऽस्तु ते क्लेशविमुक्तिसिंह । नमोऽस्तु ते दिव्यवपुर्नृसिंह नमोऽस्तु ते वीरवरैकसिंह

namo'stu sarvākṛticitrasiṁha namo'stu te kleśavimuktisiṁha namo'stu te divyavapurnṛsiṁha namo'stu te vīravaraikasiṁha

तुम्हें नमस्कार हो, हे समस्त आकृतियों में विचित्र सिंह! तुम्हें नमस्कार हो, हे क्लेश से मुक्ति देने वाले सिंह! तुम्हें नमस्कार हो, हे दिव्यशरीर नृसिंह! तुम्हें नमस्कार हो, हे वीरश्रेष्ठों में एकमात्र सिंह!

श्लोक 16 (skanda.2.68.16)

नमोऽस्तु ते दैत्यविदारसिंह नमोऽस्तु देवेष्वधि देवसिंह । नमोऽस्तु वेदांतवनैकसिंह नमोऽस्तु ते योगिगुहैकसिंह

namo'stu te daityavidārasiṁha namo'stu deveṣvadhi devasiṁha namo'stu vedāṁtavanaikasiṁha namo'stu te yogiguhaikasiṁha

तुम्हें नमस्कार हो, हे दैत्यों को विदीर्ण करने वाले सिंह! तुम्हें नमस्कार हो, हे देवों में भी अधिदेव सिंह! तुम्हें नमस्कार हो, हे वेदान्तवन के एकमात्र सिंह! तुम्हें नमस्कार हो, हे योगियों के हृदयगुहा में विराजित एकमात्र सिंह!

श्लोक 17 (skanda.2.68.17)

नमोऽस्तु ते सिंह वृषैकसिंह नमोऽस्तु नीलाचलशृंगसिंह

namo'stu te siṁha vṛṣaikasiṁha namo'stu nīlācalaśṛṁgasiṁha

तुम्हें नमस्कार हो, हे धर्मरूपी वृष के एकमात्र सिंह! तुम्हें नमस्कार हो, हे नीलाचल के शिखर पर विराजमान सिंह!

श्लोक 18 (skanda.2.68.18)

जैमिनिरुवाच । स्तुत्वेत्थं दिव्यसिंहं तमिंद्रद्युम्नं प्रजापतिः । सिंहयंत्रं समालेख्य तस्योपरि निवेश्य च

jaiminiruvāca stutvetthaṁ divyasiṁhaṁ tamiṁdradyumnaṁ prajāpatiḥ siṁhayaṁtraṁ samālekhya tasyopari niveśya ca

जैमिनि ने कहा — इस प्रकार उस दिव्य सिंह की स्तुति करके, प्रजापति ब्रह्माजी ने इन्द्रद्युम्न के लिए सिंहयन्त्र अंकित करके, उसके ऊपर मन्त्र स्थापित करके,

श्लोक 19 (skanda.2.68.19)

दीक्षयित्वा मन्त्रराजं साक्षादाथर्वणोदितम् । आहुर्वैष्णवनिर्वाणं यं वेदांतपरायणाः

dīkṣayitvā mantrarājaṁ sākṣādātharvaṇoditam āhurvaiṣṇavanirvāṇaṁ yaṁ vedāṁtaparāyaṇāḥ

साक्षात् अथर्ववेद में कहे गए मन्त्रराज की दीक्षा दी, जिसे वेदान्तपरायण लोग वैष्णव-निर्वाण कहते हैं,

श्लोक 20 (skanda.2.68.20)

यत्र वेदाश्च चत्वारः साक्षान्नित्यं प्रतिष्ठिताः । यमधीत्य महामन्त्रं मनुः स्वायंभुवः पुरा

yatra vedāśca catvāraḥ sākṣānnityaṁ pratiṣṭhitāḥ yamadhītya mahāmantraṁ manuḥ svāyaṁbhuvaḥ purā

जिसमें चारों वेद साक्षात् नित्य प्रतिष्ठित हैं; जिस महामन्त्र का अध्ययन करके स्वायम्भुव मनु ने पूर्वकाल में

श्लोक 21 (skanda.2.68.21)

सृष्टिं चकार भगवान्प्राप्तमस्माच्चतुर्मुखात् । अणिमादिगुणा यस्य फलं स्यादानुषंगिकम्

sṛṣṭiṁ cakāra bhagavānprāptamasmāccaturmukhāt aṇimādiguṇā yasya phalaṁ syādānuṣaṁgikam

सृष्टि की, जो इस चतुर्मुख ब्रह्मा से प्राप्त हुआ था; अणिमा आदि सिद्धियाँ जिसका आनुषंगिक फल मात्र हैं।

श्लोक 22 (skanda.2.68.22)

एक एव महामन्त्रः पुरुषार्थचतुष्टयम् । प्राप्तुं कारणभूतो हि किं पुनः क्षुद्रकामनाम्

eka eva mahāmantraḥ puruṣārthacatuṣṭayam prāptuṁ kāraṇabhūto hi kiṁ punaḥ kṣudrakāmanām

यह एक ही महामन्त्र चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का कारण है — फिर तुच्छ कामनाओं की तो बात ही क्या!

श्लोक 23 (skanda.2.68.23)

एक एव महामंत्रः सर्वक्रतुफलप्रदः । सर्वतीर्थप्रदः सर्वदानव्रतफलप्रदः

eka eva mahāmaṁtraḥ sarvakratuphalapradaḥ sarvatīrthapradaḥ sarvadānavrataphalapradaḥ

यह एक ही महामन्त्र समस्त यज्ञों का फल देने वाला, समस्त तीर्थों का फल देने वाला, समस्त दान-व्रतों का फल देने वाला है।

श्लोक 24 (skanda.2.68.24)

यथायं सर्वपापौघतूलराशेर्दवानलः । दिव्यसिंहाकृतिर्देवो मंत्रराज्ञस्तथा ह्ययम्

yathāyaṁ sarvapāpaughatūlarāśerdavānalaḥ divyasiṁhākṛtirdevo maṁtrarājñastathā hyayam

जैसे यह दिव्यसिंहरूपी देव समस्त पापसमूह रूपी रुई के ढेर के लिए दावानल है, वैसे ही यह मन्त्रराज भी है।

श्लोक 25 (skanda.2.68.25)

एनमभ्यस्य यतयो भवरोग त्यजंति हि । यस्य ग्रहणमात्रेण ग्रहापस्मारराक्षसाः

enamabhyasya yatayo bhavaroga tyajaṁti hi yasya grahaṇamātreṇa grahāpasmārarākṣasāḥ

इसका अभ्यास करके यति संसाररूपी रोग को त्याग देते हैं; जिसके मात्र ग्रहण करने से ग्रह, अपस्मार, राक्षस,

श्लोक 26 (skanda.2.68.26)

डाकिन्यो भूतवेतालपिशाचा उरगा ग्रहाः । दूरादेव पलायंते नेशते वीक्षितुं च तम्

ḍākinyo bhūtavetālapiśācā uragā grahāḥ dūrādeva palāyaṁte neśate vīkṣituṁ ca tam

डाकिनी, भूत, वेताल, पिशाच, सर्प और अशुभ ग्रह दूर से ही भाग जाते हैं, और उसे देखने में भी समर्थ नहीं होते।

श्लोक 27 (skanda.2.68.27)

मंत्रराजं ततो लब्ध्वा इन्द्रद्युम्नश्चतुर्मुखात् । नृसिंहं शातवपुषं लक्ष्मीसंश्रितवक्षसम्

maṁtrarājaṁ tato labdhvā indradyumnaścaturmukhāt nṛsiṁhaṁ śātavapuṣaṁ lakṣmīsaṁśritavakṣasam

तब चतुर्मुख ब्रह्मा से मन्त्रराज प्राप्त करके, इन्द्रद्युम्न ने भयंकर शरीर वाले, लक्ष्मी को वक्षस्थल पर धारण किए हुए नृसिंह को देखा,

श्लोक 28 (skanda.2.68.28)

चक्रं पिनाकं दधतं चंद्रसूर्याग्निचक्षुषम् । जानुप्रसारितकरसरोजद्वंद्वमुन्नसम्

cakraṁ pinākaṁ dadhataṁ caṁdrasūryāgnicakṣuṣam jānuprasāritakarasarojadvaṁdvamunnasam

जो चक्र और पिनाक धारण किए हुए, चन्द्र-सूर्य-अग्नि रूपी नेत्रों वाले, घुटनों पर फैले हुए कमल-सदृश हाथों की जोड़ी वाले, उन्नत नासिका वाले थे,

श्लोक 29 (skanda.2.68.29)

योगपट्टासनारूढद्वात्रिंशद्दलपद्मके । मंत्रवर्णमये मध्ये कर्णिकाप्रणवोज्ज्वले

yogapaṭṭāsanārūḍhadvātriṁśaddalapadmake maṁtravarṇamaye madhye karṇikāpraṇavojjvale

योगपट्टासन में बैठे हुए, बत्तीस दलों वाले, मन्त्र-अक्षरों से बने कमल के मध्य में, ॐकार से उज्ज्वल कर्णिका में,

श्लोक 30 (skanda.2.68.30)

सुखासीनं साट्टहासं वीक्षंतं श्रीमुखांबुजम् । सटामंडितवक्त्राब्जं दिव्यरत्नोज्ज्वलाकृति

sukhāsīnaṁ sāṭṭahāsaṁ vīkṣaṁtaṁ śrīmukhāṁbujam saṭāmaṁḍitavaktrābjaṁ divyaratnojjvalākṛti

सुखपूर्वक बैठे हुए, ठहाका लगाते हुए, श्रीमुख कमल की ओर देखते हुए, अयाल से सुशोभित मुखकमल वाले, दिव्य रत्नों से उज्ज्वल आकृति वाले,

श्लोक 31 (skanda.2.68.31)

फणासहस्रं विस्तार्य पश्चाच्छत्राकृतिं विभोः । ददर्श बलभद्रं तं हललांगलधारिणम्

phaṇāsahasraṁ vistārya paścācchatrākṛtiṁ vibhoḥ dadarśa balabhadraṁ taṁ halalāṁgaladhāriṇam

सहस्र फणाओं को छत्र के समान पीछे फैलाए हुए विभु — इन्द्रद्युम्न ने हल-लांगल धारण किए हुए बलभद्र को भी वहाँ देखा।

श्लोक 32 (skanda.2.68.32)

प्रजहर्ष नृपो दृष्ट्वा तादृशं पुरुषोत्तमम् । विस्मयाविष्टचेताश्च पप्रच्छ कमलासनम्

prajaharṣa nṛpo dṛṣṭvā tādṛśaṁ puruṣottamam vismayāviṣṭacetāśca papraccha kamalāsanam

उस प्रकार पुरुषोत्तम को देखकर राजा अत्यन्त हर्षित हुआ, और आश्चर्यचकित मन से कमलासन ब्रह्मा से पूछा —

श्लोक 33 (skanda.2.68.33)

भगवंश्चित्रमेतद्वै चरितं मधुघातिनः । विज्ञातुं कथमस्माभिः शक्यः स्याल्लोकभावन

bhagavaṁścitrametadvai caritaṁ madhughātinaḥ vijñātuṁ kathamasmābhiḥ śakyaḥ syāllokabhāvana

हे भगवन्, मधुसूदन की यह चरित्र अत्यन्त विचित्र है; हे लोकभावन, हम इसे कैसे जान सकते हैं,

श्लोक 34 (skanda.2.68.34)

यज्ञांते तादृशं रूपं बभार दारुनिर्मितम् । रथस्थं भगवानेव प्रासादांतर्न्यवेशयत्

yajñāṁte tādṛśaṁ rūpaṁ babhāra dārunirmitam rathasthaṁ bhagavāneva prāsādāṁtarnyaveśayat

जब यज्ञ के अन्त में उन्होंने काष्ठ से निर्मित उसी रूप को धारण किया, और भगवान् ने स्वयं रथ पर बैठे हुए उसे प्रासाद के भीतर स्थापित करवाया?

श्लोक 35 (skanda.2.68.35)

मामाह पूर्वं वाणी सा गगनांतरिता तदा । अपौरुषेयतरुणा चतुर्मूर्तिर्भविष्यति

māmāha pūrvaṁ vāṇī sā gaganāṁtaritā tadā apauruṣeyataruṇā caturmūrtirbhaviṣyati

पूर्वकाल में मुझे उस आकाशवाणी ने कहा था कि अपौरुषेय वृक्ष से चतुर्मूर्ति उत्पन्न होगी।

श्लोक 36 (skanda.2.68.36)

इदानीमेक एवासौ दृश्यते सुप्रतिष्ठितः । माया वा तत्त्वमथ वा तत्त्वतो मे वद प्रभो

idānīmeka evāsau dṛśyate supratiṣṭhitaḥ māyā vā tattvamatha vā tattvato me vada prabho

अब यह केवल एक ही सुप्रतिष्ठित रूप में दिखाई देते हैं — हे प्रभो, यह माया है या तत्त्व, मुझे तत्त्वतः बताइए,

श्लोक 37 (skanda.2.68.37)

श्रवणे यदि मां वेत्सि भाजनं भवभावन । श्रुत्वैतत्प्रत्युवाचाथ संशयानं नृपोत्तमम्

śravaṇe yadi māṁ vetsi bhājanaṁ bhavabhāvana śrutvaitatpratyuvācātha saṁśayānaṁ nṛpottamam

यदि आप मुझे, हे भवभावन, सुनने योग्य पात्र समझते हैं। यह सुनकर उन्होंने संशययुक्त श्रेष्ठ राजा को उत्तर दिया।

श्लोक 38 (skanda.2.68.38)

ब्रह्मोवाच । आद्या मूर्तिर्भगवतो नारसिंहाकृतिर्नृप । नारायणेन प्रथिता मदनुग्रहतस्त्वयि

brahmovāca ādyā mūrtirbhagavato nārasiṁhākṛtirnṛpa nārāyaṇena prathitā madanugrahatastvayi

ब्रह्माजी ने कहा — हे राजन्, भगवान् का प्रथम रूप नृसिंह-आकृति है, जो मेरे अनुग्रह से नारायण द्वारा तुम्हारे समक्ष प्रकट किया गया।

श्लोक 39 (skanda.2.68.39)

दारवी मूर्तिरेषेति प्रतिमाबुद्धिरत्र वै । मा भूत्ते नृपशार्दूल परं ब्रह्माकृतिस्त्वियम्

dāravī mūrtireṣeti pratimābuddhiratra vai mā bhūtte nṛpaśārdūla paraṁ brahmākṛtistviyam

हे नृपश्रेष्ठ, यह काष्ठमय मूर्ति है, यह मात्र प्रतिमाबुद्धि तुम्हें न हो — यह साक्षात् परब्रह्म का ही रूप है।

श्लोक 40 (skanda.2.68.40)

खंडनात्सर्वदुःखानामखंडानंददानतः । स्वभावाद्दारुरेषो हि परं ब्रह्माभिधीयते

khaṁḍanātsarvaduḥkhānāmakhaṁḍānaṁdadānataḥ svabhāvāddārureṣo hi paraṁ brahmābhidhīyate

सम्पूर्ण दुःखों के खण्डन और अखण्ड आनन्द के दान के स्वभाव के कारण ही यह काष्ठ परब्रह्म कहलाता है।

श्लोक 41 (skanda.2.68.41)

इत्थं दारुमयो देवश्चतुर्वेदानुसारतः । स्रष्टा स जगतां तस्मादात्मानं चापि सृष्टवान्

itthaṁ dārumayo devaścaturvedānusārataḥ sraṣṭā sa jagatāṁ tasmādātmānaṁ cāpi sṛṣṭavān

इस प्रकार चारों वेदों के अनुसार यह काष्ठमय देव जगत् के स्रष्टा हैं, इसीलिए उन्होंने अपने आप को भी सृजित किया है।

श्लोक 42 (skanda.2.68.42)

शब्दब्रह्म परंब्रह्म नानयोर्भेद इष्यते । लये तु एकमेवेदं सृष्टौ भेदः प्रवर्त्तते

śabdabrahma paraṁbrahma nānayorbheda iṣyate laye tu ekamevedaṁ sṛṣṭau bhedaḥ pravarttate

शब्दब्रह्म और परब्रह्म में कोई भेद नहीं माना जाता; प्रलय में यह एक ही है, सृष्टि में भेद प्रवृत्त होता है।

श्लोक 43 (skanda.2.68.43)

अन्योन्यापेक्षिणौ भूप शब्दार्थौ हि परस्परम् । अर्थाभावेन शब्दोऽस्ति शब्दाभावेन बुद्ध्यते

anyonyāpekṣiṇau bhūpa śabdārthau hi parasparam arthābhāvena śabdo'sti śabdābhāvena buddhyate

हे राजन्, शब्द और अर्थ परस्पर एक-दूसरे पर आश्रित हैं; अर्थ के अभाव में शब्द मात्र ध्वनि है, शब्द के अभाव में अर्थ नहीं समझा जा सकता।

श्लोक 44 (skanda.2.68.44)

अर्थस्तस्माच्चतुर्वेदाः शब्दा ह्यर्थाश्च तादृशाः । ऋग्वेदरूपी हलधृक्सामवेदो नृकेसरी

arthastasmāccaturvedāḥ śabdā hyarthāśca tādṛśāḥ ṛgvedarūpī haladhṛksāmavedo nṛkesarī

इसलिए अर्थ चारों वेद हैं, और शब्द भी उसी प्रकार के हैं — हलधर ऋग्वेदस्वरूप हैं, नृकेसरी सामवेद हैं,

श्लोक 45 (skanda.2.68.45)

यजुर्मूर्त्तिस्त्वियं भद्रा चक्रमाथर्वणं स्मृतम् । वेदश्चतुर्द्धा भेदोऽयमेकराशिरभेदतः

yajurmūrttistviyaṁ bhadrā cakramātharvaṇaṁ smṛtam vedaścaturddhā bhedo'yamekarāśirabhedataḥ

यह भद्रा (सुभद्रा) यजुर्वेद की मूर्ति हैं, चक्र को अथर्ववेद कहा गया है; वेद का यह चतुर्विध भेद वस्तुतः अभेद से एक ही राशि है।

श्लोक 46 (skanda.2.68.46)

अतस्ते संशयो मा भूदेकस्तु बहुधा विभुः । अवतारेषु चान्येषु न्यायेनैतेन वर्त्तते

ataste saṁśayo mā bhūdekastu bahudhā vibhuḥ avatāreṣu cānyeṣu nyāyenaitena varttate

इसलिए तुम्हें कोई संशय नहीं होना चाहिए — एक ही विभु बहुधा हो जाता है; अन्य अवतारों में भी इसी न्याय से यह वर्तता है।

श्लोक 47 (skanda.2.68.47)

भेदाभेदौ तथा ख्यातौ जगन्नाथस्य ते नृप । येन ते मनसस्तुष्टिस्तेन भक्त्या समाचर

bhedābhedau tathā khyātau jagannāthasya te nṛpa yena te manasastuṣṭistena bhaktyā samācara

हे राजन्, इस प्रकार जगन्नाथ के भेद और अभेद दोनों प्रसिद्ध हैं; जिससे तुम्हारे मन को सन्तोष हो, उसी भाव से भक्तिपूर्वक आचरण करो।

श्लोक 48 (skanda.2.68.48)

सर्वरूपमयो ह्येष सर्वमंत्रमयः प्रभुः । आराध्यते यथा येन तथा तस्य फलप्रदः

sarvarūpamayo hyeṣa sarvamaṁtramayaḥ prabhuḥ ārādhyate yathā yena tathā tasya phalapradaḥ

यह प्रभु सर्वरूपमय और सर्वमन्त्रमय हैं; जिस प्रकार जिसके द्वारा आराधना की जाती है, उसी प्रकार वे फल देने वाले हैं।

श्लोक 49 (skanda.2.68.49)

यथा सुशुद्धं कनकं स्वेच्छया घटितं नृप । तत्तत्संज्ञामवाप्येह तत्तत्संतोषकारकम्

yathā suśuddhaṁ kanakaṁ svecchayā ghaṭitaṁ nṛpa tattatsaṁjñāmavāpyeha tattatsaṁtoṣakārakam

जैसे शुद्ध सुवर्ण को इच्छानुसार ढालकर, हे राजन्, वह उस-उस नाम को प्राप्त होकर उस-उस सन्तोष का कारण बनता है,

श्लोक 50 (skanda.2.68.50)

एवं महिम्ना भगवानत्राविरभवन्नृप । यस्य यावांस्तु विश्वासस्तस्य सिद्धिस्तु तावती

evaṁ mahimnā bhagavānatrāvirabhavannṛpa yasya yāvāṁstu viśvāsastasya siddhistu tāvatī

वैसे ही, हे राजन्, भगवान् अपनी महिमा से यहाँ प्रकट हुए हैं। जिसका जितना विश्वास होता है, उसकी उतनी ही सिद्धि होती है।

श्लोक 51 (skanda.2.68.51)

कर्मणा मनसा वाचा विशुद्धेनांतरात्मना । समाराधय गोविंदमत्र दारुवपुर्द्धरम्

karmaṇā manasā vācā viśuddhenāṁtarātmanā samārādhaya goviṁdamatra dāruvapurddharam

कर्म, मन और वाणी से, विशुद्ध अन्तरात्मा से, यहाँ काष्ठमय शरीर धारण करने वाले गोविन्द की आराधना करो,

श्लोक 52 (skanda.2.68.52)

चतुर्वर्गफलावाप्त्यै यथाभिलषितं तव । अनेन मंत्रराजेन विष्णुमेनं समर्चय

caturvargaphalāvāptyai yathābhilaṣitaṁ tava anena maṁtrarājena viṣṇumenaṁ samarcaya

अपनी इच्छानुसार चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए; इसी मन्त्रराज से इस विष्णु का पूजन करो।

श्लोक 53 (skanda.2.68.53)

नातः परतरो मंत्रो न भूतो न भविष्यति । अनेनाभ्यर्चितो विष्णुः प्रीतो भवति तत्क्षणात्

nātaḥ parataro maṁtro na bhūto na bhaviṣyati anenābhyarcito viṣṇuḥ prīto bhavati tatkṣaṇāt

इससे बढ़कर कोई मन्त्र न हुआ है, न होगा; इससे पूजित विष्णु उसी क्षण प्रसन्न हो जाते हैं,

श्लोक 54 (skanda.2.68.54)

ददाति स्वपुरं चापि भगवान्भक्तवत्सलः । यज्ञैस्तीर्थैर्व्रतैर्दानैस्तपोभिश्चापि तस्य किम्

dadāti svapuraṁ cāpi bhagavānbhaktavatsalaḥ yajñaistīrthairvratairdānaistapobhiścāpi tasya kim

और भक्तवत्सल भगवान् अपना ही धाम भी प्रदान कर देते हैं। फिर उनके लिए यज्ञ, तीर्थ, व्रत, दान और तप की क्या आवश्यकता है?

श्लोक 55 (skanda.2.68.55)

नीलाचलस्थं यो विष्णुं दारुमूर्तिमुपास्ति वै । तत्त्वं ब्रवीमि ते भूप श्रुत्वैतदवधारय

nīlācalasthaṁ yo viṣṇuṁ dārumūrtimupāsti vai tattvaṁ bravīmi te bhūpa śrutvaitadavadhāraya

जो नीलाचल में स्थित विष्णु की काष्ठमूर्ति की उपासना करता है — हे राजन्, मैं तुम्हें उसका तत्त्व बताता हूँ, इसे सुनकर धारण करो —

श्लोक 56 (skanda.2.68.56)

न्यग्रोधमूले कूलेऽस्य सिंधोर्नीलाचले स्थितम् । दारुव्याजामृतं ब्रह्म दृष्ट्वा मुच्येन्न संशय

nyagrodhamūle kūle'sya siṁdhornīlācale sthitam dāruvyājāmṛtaṁ brahma dṛṣṭvā mucyenna saṁśaya

वटवृक्ष की जड़ में, इस सागर के तट पर, नीलाचल में स्थित, काष्ठ के बहाने विद्यमान अमृतस्वरूप ब्रह्म को देखकर मनुष्य निःसंदेह मुक्त हो जाता है।

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