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वैष्णव खण्ड · अध्याय 69

इन्द्रद्युम्न को वरदान और उत्सव-विधान

अध्याय 68अध्याय-सूचीअध्याय 70

श्लोक 1 (skanda.2.69.1)

जैमिनिरुवाच । इत्युक्त्वा नृपशार्दूलं लोकसंग्रहणाय वै । सिंहाकृति स हृदये उद्वास्य कमलासनः

jaiminiruvāca ityuktvā nṛpaśārdūlaṁ lokasaṁgrahaṇāya vai siṁhākṛti sa hṛdaye udvāsya kamalāsanaḥ

जैमिनि ने कहा — इस प्रकार नृपश्रेष्ठ से कहकर, लोकसंग्रह के लिए, कमलासन ब्रह्मा ने सिंह-आकृति को अपने हृदय में समाहित करके,

श्लोक 2 (skanda.2.69.2)

पूर्वं प्रकाशरूपं यद्विष्णोस्तु प्रकटीकृतम् । रथावरोहणे दृष्टाश्चतस्रो मूर्त्तयः पुरा

pūrvaṁ prakāśarūpaṁ yadviṣṇostu prakaṭīkṛtam rathāvarohaṇe dṛṣṭāścatasro mūrttayaḥ purā

पूर्वकाल में प्रकट किए गए विष्णु के प्रकाशरूप को — जो चार मूर्तियाँ रथ से उतरते समय पहले देखी गई थीं —

श्लोक 3 (skanda.2.69.3)

ता एव सिंहासनगाः सर्वे ते ददृशुः पुनः । द्विषडक्षरमन्त्रेण बलभद्रमपूजयत्

tā eva siṁhāsanagāḥ sarve te dadṛśuḥ punaḥ dviṣaḍakṣaramantreṇa balabhadramapūjayat

वे सभी पुनः सिंहासन पर विराजमान देखी गईं। द्वादशाक्षर मन्त्र से उन्होंने बलभद्र की पूजा की;

श्लोक 4 (skanda.2.69.4)

सूक्तेन पौरुषेणैनं नारायणमनामयम् । देवीसूक्तेन चक्रं च द्वादशाक्षरकेण च । पूजयित्वानुग्रहाय पार्थिवस्य न्यवेदयत्

sūktena pauruṣeṇainaṁ nārāyaṇamanāmayam devīsūktena cakraṁ ca dvādaśākṣarakeṇa ca pūjayitvānugrahāya pārthivasya nyavedayat

पुरुषसूक्त से इस अनामय नारायण की, देवीसूक्त से तथा द्वादशाक्षर मन्त्र से चक्र की पूजा करके, राजा के अनुग्रह के लिए निवेदन किया।

श्लोक 5 (skanda.2.69.5)

ब्रह्मोवाच । भगवन्देवदेवेश भक्तानुग्रहकारक । इन्द्रद्युम्नस्य जन्मानि त्वयि भक्तिं प्रकुर्वतः । सहस्रं समतीतानि तदन्ते त्वामलोकयत्

brahmovāca bhagavandevadeveśa bhaktānugrahakāraka indradyumnasya janmāni tvayi bhaktiṁ prakurvataḥ sahasraṁ samatītāni tadante tvāmalokayat

ब्रह्माजी ने कहा — हे भगवन्, देवाधिदेव, भक्तों पर अनुग्रह करने वाले! इन्द्रद्युम्न के, तुम्हारे प्रति भक्ति करते हुए, सहस्र जन्म बीत चुके हैं; उनके अन्त में उसने तुम्हारा दर्शन पाया है।

श्लोक 6 (skanda.2.69.6)

त्वद्दर्शनं हि भगवंस्त्वयि सायुज्यकारणम् । यद्यप्ययं भक्तियोगेनेच्छति त्वां समर्चितुम्

tvaddarśanaṁ hi bhagavaṁstvayi sāyujyakāraṇam yadyapyayaṁ bhaktiyogenecchati tvāṁ samarcitum

हे भगवन्, तुम्हारा दर्शन ही तुम्हारे साथ सायुज्य का कारण है। चूँकि यह भक्तियोग से तुम्हारी सम्यक् पूजा करना चाहता है,

श्लोक 7 (skanda.2.69.7)

तदाज्ञापय येन त्वां भक्तियोगेन भावयेत् । देशकालव्रताद्यैस्तु तथा नानोपचारकैः

tadājñāpaya yena tvāṁ bhaktiyogena bhāvayet deśakālavratādyaistu tathā nānopacārakaiḥ

इसलिए यह आज्ञा दो कि वह भक्तियोग से तुम्हारा किस प्रकार ध्यान करे — देश, काल, व्रत आदि तथा विविध उपचारों द्वारा।

श्लोक 8 (skanda.2.69.8)

त्वन्मुखांभोजगलितमाज्ञामृतरसं नृपः । पिपासुस्त्वां जगन्नाथ पश्यत्येषोऽनिमेषकम्

tvanmukhāṁbhojagalitamājñāmṛtarasaṁ nṛpaḥ pipāsustvāṁ jagannātha paśyatyeṣo'nimeṣakam

तुम्हारे मुखकमल से झरते हुए आज्ञारूपी अमृतरस का प्यासा यह राजा, हे जगन्नाथ, तुम्हें अनिमेष होकर देख रहा है।

श्लोक 9 (skanda.2.69.9)

जैमिनिरुवाच । इति विज्ञापितो देवः साक्षात्कमलयोनिना । दारुदेहोऽपि विहसन्प्राह गंभीरया गिरा

jaiminiruvāca iti vijñāpito devaḥ sākṣātkamalayoninā dārudeho'pi vihasanprāha gaṁbhīrayā girā

जैमिनि ने कहा — इस प्रकार साक्षात् कमलयोनि द्वारा निवेदित होकर, काष्ठदेह होते हुए भी देव ने हँसते हुए गम्भीर वाणी में कहा।

श्लोक 10 (skanda.2.69.10)

श्रीप्रतिमोवाच । इन्द्रद्युम्न प्रसन्नस्ते भक्त्या निष्कामकर्मभिः । त्वदन्येनेदृशी संपन्न केनाप्यपवर्जिता

śrīpratimovāca indradyumna prasannaste bhaktyā niṣkāmakarmabhiḥ tvadanyenedṛśī saṁpanna kenāpyapavarjitā

श्रीप्रतिमा ने कहा — हे इन्द्रद्युम्न, मैं तुम्हारी भक्ति और निष्काम कर्मों से प्रसन्न हूँ। ऐसी सम्पदा तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य को पूर्णतः प्राप्त नहीं हुई।

श्लोक 11 (skanda.2.69.11)

वरं ददामि ते भूप मयि भक्तिः स्थिराऽस्तु ते । उत्सृज्य वित्तकोटीस्तु यन्ममायतनं कृतम्

varaṁ dadāmi te bhūpa mayi bhaktiḥ sthirā'stu te utsṛjya vittakoṭīstu yanmamāyatanaṁ kṛtam

हे राजन्, मैं तुम्हें वर देता हूँ — मुझमें तुम्हारी भक्ति स्थिर रहे। करोड़ों धन का त्याग करके तुमने जो मेरा यह आयतन बनाया है,

श्लोक 12 (skanda.2.69.12)

भंगेप्येतस्य राजेंद्र स्थानं न त्यज्यते मया । कालांतरेऽपि योऽप्यन्यः प्रासादं कारयिष्यति

bhaṁgepyetasya rājeṁdra sthānaṁ na tyajyate mayā kālāṁtare'pi yo'pyanyaḥ prāsādaṁ kārayiṣyati

इसके नष्ट होने पर भी, हे राजेन्द्र, मैं यह स्थान नहीं त्यागूँगा। कालान्तर में भी जो भी अन्य कोई यहाँ प्रासाद बनवाएगा,

श्लोक 13 (skanda.2.69.13)

तवैव कीर्त्तिः सा नूनं त्वत्प्रीत्या तत्र मे स्थितिः । सत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्यमेव ब्रवीमि ते

tavaiva kīrttiḥ sā nūnaṁ tvatprītyā tatra me sthitiḥ satyaṁ satyaṁ punaḥ satyaṁ satyameva bravīmi te

वह कीर्ति निश्चय ही तुम्हारी ही रहेगी; तुम्हारे ही प्रेम से मेरा वहाँ निवास होगा। सत्य, सत्य, पुनः सत्य, मैं तुमसे सत्य ही कहता हूँ —

श्लोक 14 (skanda.2.69.14)

प्रासाद भंगे तत्स्थानं न त्यक्ष्यामि कदाचन । अनेन दारुवपुषा स्थास्याम्यत्र परार्द्धकम्

prāsāda bhaṁge tatsthānaṁ na tyakṣyāmi kadācana anena dāruvapuṣā sthāsyāmyatra parārddhakam

प्रासाद के नष्ट होने पर भी मैं वह स्थान कभी नहीं त्यागूँगा। इसी काष्ठमय शरीर से मैं यहाँ परार्ध पर्यन्त रहूँगा,

श्लोक 15 (skanda.2.69.15)

द्वितीयं पद्मयोनेस्तु यावत्परिसमाप्यते । मनोः स्वायंभुवस्यास्य द्वितीये च चतुर्युगे

dvitīyaṁ padmayonestu yāvatparisamāpyate manoḥ svāyaṁbhuvasyāsya dvitīye ca caturyuge

अर्थात् जब तक कमलयोनि की द्वितीय आयु समाप्त नहीं होती। इस स्वायम्भुव मनु के द्वितीय चतुर्युग में,

श्लोक 16 (skanda.2.69.16)

कृतस्य प्रथमे ज्येष्ठे दशेति क्रतुसंस्थितिः । ज्यैष्ठ्यामहं चावतीर्णस्तत्पुण्यजन्मवासरम्

kṛtasya prathame jyeṣṭhe daśeti kratusaṁsthitiḥ jyaiṣṭhyāmahaṁ cāvatīrṇastatpuṇyajanmavāsaram

कृतयुग के प्रथम भाग में, ज्येष्ठ मास की दशमी को ही यज्ञ की स्थापना होती है। मैं ज्येष्ठ में ही अवतीर्ण हुआ था, वही मेरा पुण्य जन्मदिवस है।

श्लोक 17 (skanda.2.69.17)

तस्यां मे स्नपनं कुर्यान्महास्नानविधानतः । प्रत्यर्चायां महाराज साधिवासं समृद्धिमत्

tasyāṁ me snapanaṁ kuryānmahāsnānavidhānataḥ pratyarcāyāṁ mahārāja sādhivāsaṁ samṛddhimat

उस दिन महास्नान-विधि से मेरा स्नपन करना चाहिए; और पुनः प्रतिष्ठा में, हे महाराज, अधिवास सहित समृद्धिपूर्ण विधि से,

श्लोक 18 (skanda.2.69.18)

पापं विनाशयिष्यामि कोटिजन्मभिरर्जितम् । सर्वतीर्थक्रतुफलं सर्वदानफलं तथा

pāpaṁ vināśayiṣyāmi koṭijanmabhirarjitam sarvatīrthakratuphalaṁ sarvadānaphalaṁ tathā

मैं करोड़ों जन्मों में अर्जित पाप का नाश करूँगा, तथा समस्त तीर्थों, यज्ञों और दानों का फल भी दूँगा,

श्लोक 19 (skanda.2.69.19)

पश्यतां चापि राजेंद्र फलं तावत्प्रपद्यते । न्यग्रोधादुत्तरे कूपः सर्वतीर्थमयोऽस्ति हि

paśyatāṁ cāpi rājeṁdra phalaṁ tāvatprapadyate nyagrodhāduttare kūpaḥ sarvatīrthamayo'sti hi

और देखने वालों को भी, हे राजेन्द्र, उतना ही फल प्राप्त होता है। न्यग्रोध वृक्ष के उत्तर में एक कुआँ है जो समस्त तीर्थों से युक्त है;

श्लोक 20 (skanda.2.69.20)

स्नानाय पूर्वं निर्माय किंचिदाच्छादितं भुवा । अवतीर्णस्त्वहं पश्चात्तं विविच्य प्रकाशय

snānāya pūrvaṁ nirmāya kiṁcidācchāditaṁ bhuvā avatīrṇastvahaṁ paścāttaṁ vivicya prakāśaya

स्नान के लिए पहले बनाया गया था, किन्तु अब पृथ्वी से कुछ ढका गया है। अब मैं अवतीर्ण हुआ हूँ, इसलिए उसे खोजकर पुनः प्रकट करो।

श्लोक 21 (skanda.2.69.21)

संस्कार्यः स चतुर्दश्यां बलिं दत्त्वा विधानतः । रक्षकक्षेत्रपालाय दिशांपालेभ्य एव च

saṁskāryaḥ sa caturdaśyāṁ baliṁ dattvā vidhānataḥ rakṣakakṣetrapālāya diśāṁpālebhya eva ca

चतुर्दशी को उसका संस्कार किया जाए, विधिपूर्वक क्षेत्रपाल रक्षक तथा दिक्पालों को बलि अर्पित करके,

श्लोक 22 (skanda.2.69.22)

कम्बुकाहालमुरजध्वनिषु सुस्वरेषु च । द्विजातयः स्वर्णकुम्भैरुद्धरेयुस्ततो जलम्

kambukāhālamurajadhvaniṣu susvareṣu ca dvijātayaḥ svarṇakumbhairuddhareyustato jalam

शंख, काहल और मृदंग की मधुर ध्वनियों के मध्य द्विजगण स्वर्णकलशों से उसका जल निकालें।

श्लोक 23 (skanda.2.69.23)

ज्यैष्ठ्यां प्रातस्तने काले ब्रह्मणा सहितं च माम् । रामं सुभद्रां संस्नाप्य मम लोकमवाप्नुयात्

jyaiṣṭhyāṁ prātastane kāle brahmaṇā sahitaṁ ca mām rāmaṁ subhadrāṁ saṁsnāpya mama lokamavāpnuyāt

ज्येष्ठ मास में प्रातःकाल के समय, ब्रह्मा (चक्र) सहित मुझे, राम और सुभद्रा को स्नान कराकर, मनुष्य मेरे लोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 24 (skanda.2.69.24)

स्नाप्यमानं तु यः पश्येन्मां तदा नृपसत्तम । देहबन्धं च नाप्नोति स पुनर्न तु पूरुषः

snāpyamānaṁ tu yaḥ paśyenmāṁ tadā nṛpasattama dehabandhaṁ ca nāpnoti sa punarna tu pūruṣaḥ

हे नृपसत्तम, जो स्नान कराए जाते समय मुझे देखता है, वह पुनः देहबन्धन को प्राप्त नहीं होता — वह फिर मनुष्य नहीं होता।

श्लोक 25 (skanda.2.69.25)

कारयित्वा दृढं मंचमैशान्यां दिशि मंडितम् । वितानशोभारचितं चंदनांभः समुक्षितम्

kārayitvā dṛḍhaṁ maṁcamaiśānyāṁ diśi maṁḍitam vitānaśobhāracitaṁ caṁdanāṁbhaḥ samukṣitam

ईशान दिशा में एक दृढ़ मंच बनवाकर, सुन्दर वितान से सुशोभित, चन्दन-जल से सिंचित,

श्लोक 26 (skanda.2.69.26)

तत्र मां रामभद्राभ्यां स्नापयित्वा पुनर्नयेत्

tatra māṁ rāmabhadrābhyāṁ snāpayitvā punarnayet

वहाँ मुझे राम और भद्रा के साथ स्नान कराकर, पुनः लौटाया जाए।

श्लोक 27 (skanda.2.69.27)

दक्षिणाभिमुखं यांतं यो मां पश्यति भक्तितः । तत्तद्ध्रुवमवाप्नोति मनसा यद्यदिच्छति

dakṣiṇābhimukhaṁ yāṁtaṁ yo māṁ paśyati bhaktitaḥ tattaddhruvamavāpnoti manasā yadyadicchati

जो दक्षिण की ओर जाते हुए मुझे भक्तिपूर्वक देखता है, वह मन में जो-जो इच्छा करता है, वह-वह निश्चय ही प्राप्त करता है।

श्लोक 28 (skanda.2.69.28)

ततः पंचदशाहानि स्थापयित्वा तु मां नृप । विरूपमभिरूपं वा न पश्येत्तु कदाचन

tataḥ paṁcadaśāhāni sthāpayitvā tu māṁ nṛpa virūpamabhirūpaṁ vā na paśyettu kadācana

तत्पश्चात्, हे राजन्, पन्द्रह दिनों तक मुझे स्थापित करके, मुझे विरूप हो या सुरूप, कभी नहीं देखना चाहिए।

श्लोक 29 (skanda.2.69.29)

ज्येष्ठस्नानमिदं कृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते

jyeṣṭhasnānamidaṁ kṛtvā sarvapāpaiḥ pramucyate

यह ज्येष्ठ-स्नान करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 30 (skanda.2.69.30)

गुंडिचाख्यां महायात्रां प्रकुर्वीथाः क्षितीश्वर । यस्याः संकीर्तनादेव नरः पापाद्विमुच्यते

guṁḍicākhyāṁ mahāyātrāṁ prakurvīthāḥ kṣitīśvara yasyāḥ saṁkīrtanādeva naraḥ pāpādvimucyate

हे पृथ्वीपते, तुम गुण्डिचा नाम की महायात्रा करवाओ, जिसके संकीर्तनमात्र से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 31 (skanda.2.69.31)

माघमासस्य पंचम्यामष्टम्यां चैत्रशुक्लके । एते कालाः प्रशस्ता हि गुंडिचाख्यमहोत्सवे

māghamāsasya paṁcamyāmaṣṭamyāṁ caitraśuklake ete kālāḥ praśastā hi guṁḍicākhyamahotsave

माघ मास की पंचमी को, चैत्र शुक्ल की अष्टमी को — ये काल गुण्डिचा नामक महोत्सव के लिए प्रशस्त हैं।

श्लोक 32 (skanda.2.69.32)

विशेषान्मोक्षदाषाढद्वितीया पुष्यसंयुता । ऋक्षाभावे तिथौ कार्या सदा सा प्रीतये मम

viśeṣānmokṣadāṣāḍhadvitīyā puṣyasaṁyutā ṛkṣābhāve tithau kāryā sadā sā prītaye mama

विशेषतः मोक्षदायक आषाढ़ द्वितीया, जब पुष्य नक्षत्र से युक्त हो; नक्षत्र के अभाव में तिथि पर ही करना चाहिए — यह सदा मुझे प्रिय है।

श्लोक 33 (skanda.2.69.33)

आषाढस्य सिते पक्षे द्वितीया पुष्यसंयुता । तस्यां रथे समारोप्य रामं मां भद्रया सह

āṣāḍhasya site pakṣe dvitīyā puṣyasaṁyutā tasyāṁ rathe samāropya rāmaṁ māṁ bhadrayā saha

आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को, पुष्य से युक्त होने पर, उस दिन राम, मुझे और भद्रा को रथ पर आरूढ़ करके,

श्लोक 34 (skanda.2.69.34)

महोत्सवप्रवृत्त्यर्थं प्रीणयित्वा द्विजान्बहून् । गुंडिचामण्डपंनाम यत्राहमजनं पुरा

mahotsavapravṛttyarthaṁ prīṇayitvā dvijānbahūn guṁḍicāmaṇḍapaṁnāma yatrāhamajanaṁ purā

महोत्सव प्रारम्भ करने के लिए अनेक द्विजों को सन्तुष्ट करके, गुण्डिचा-मण्डप नामक स्थान पर जाएँ, जहाँ मैं पूर्वकाल में उत्पन्न हुआ था।

श्लोक 35 (skanda.2.69.35)

अश्वमेधसहस्रस्य महावेदी तदाभवत् । तस्याः पुण्यतमं स्थानं पृथिव्यां नेह विद्यते

aśvamedhasahasrasya mahāvedī tadābhavat tasyāḥ puṇyatamaṁ sthānaṁ pṛthivyāṁ neha vidyate

वहाँ सहस्र अश्वमेध यज्ञों की महावेदी हुई थी; उससे अधिक पुण्यमय स्थान पृथ्वी पर कहीं नहीं है।

श्लोक 36 (skanda.2.69.36)

यत्राजुहोः पंचशतवर्षाणि प्रीतये मम । मम प्रीतिकरं स्थानं तस्मान्नान्यद्धरागतम्

yatrājuhoḥ paṁcaśatavarṣāṇi prītaye mama mama prītikaraṁ sthānaṁ tasmānnānyaddharāgatam

जहाँ पाँच सौ वर्षों तक मेरी प्रसन्नता के लिए हवन किया गया — मुझे प्रसन्न करने वाला उससे भिन्न स्थान पृथ्वी पर कोई नहीं है,

श्लोक 37 (skanda.2.69.37)

यथेयं नीलशिखरा प्रासादेन तवाधुना । चतुर्मुखानुरोधेन महाप्रीतिकरी मम

yatheyaṁ nīlaśikharā prāsādena tavādhunā caturmukhānurodhena mahāprītikarī mama

सिवाय इस नीलशिखर के, जो अब तुम्हारे प्रासाद के द्वारा, चतुर्मुख ब्रह्मा के अनुरोध से, मुझे अत्यन्त प्रिय हो गया है।

श्लोक 38 (skanda.2.69.38)

तथा नृसिंहक्षेत्रे वै महावेदी तव क्रतोः । ममोत्पत्तेश्च निलयं प्रीतिकृन्मम शाश्वतम्

tathā nṛsiṁhakṣetre vai mahāvedī tava kratoḥ mamotpatteśca nilayaṁ prītikṛnmama śāśvatam

वैसे ही उस क्षेत्र में तुम्हारे यज्ञ की महावेदी और मेरी उत्पत्ति का निवासस्थान है, जो मुझे सदा प्रिय है।

श्लोक 39 (skanda.2.69.39)

बहुकालं स्थितश्चाहं तस्यां मे प्रीतिरुत्तमा । आत्मा मे पद्मभूरेष प्रासादे स्थापितोऽमुना

bahukālaṁ sthitaścāhaṁ tasyāṁ me prītiruttamā ātmā me padmabhūreṣa prāsāde sthāpito'munā

मैं दीर्घकाल तक वहाँ रहा, और उस स्थान में मेरा उत्तम प्रेम है। मेरी यह आत्मा पद्मभू (ब्रह्मा) द्वारा इस प्रासाद में स्थापित की गई है —

श्लोक 40 (skanda.2.69.40)

अस्यानुरोधात्त्वद्भक्त्या ह्यवतिष्ठेऽत्र नित्यदा । दिनानि नव यास्यामि तथा तस्मादिहागतः

asyānurodhāttvadbhaktyā hyavatiṣṭhe'tra nityadā dināni nava yāsyāmi tathā tasmādihāgataḥ

इसी के अनुरोध से और तुम्हारी भक्ति से मैं यहाँ सदा निवास करता हूँ; फिर भी नौ दिनों के लिए वहाँ जाऊँगा, क्योंकि मैं वहीं से यहाँ आया हूँ।

श्लोक 41 (skanda.2.69.41)

तत्रास्ति ते महाराज सर्वतीर्थमयं सरः । तत्तीरे सप्तदिवसान्स्थास्याम्यनुजिघृक्षया

tatrāsti te mahārāja sarvatīrthamayaṁ saraḥ tattīre saptadivasānsthāsyāmyanujighṛkṣayā

वहाँ, हे महाराज, तुम्हारे लिए समस्त तीर्थों से युक्त एक सरोवर है; उसके तट पर मैं अनुग्रह करने की इच्छा से सात दिन रहूँगा।

श्लोक 42 (skanda.2.69.42)

तत्र स्थितं मां पश्यंतो यांति मर्त्या ममालयम् । तिस्रः कोट्योऽर्द्धकोटी च तीर्थानां भुवनत्रये

tatra sthitaṁ māṁ paśyaṁto yāṁti martyā mamālayam tisraḥ koṭyo'rddhakoṭī ca tīrthānāṁ bhuvanatraye

वहाँ स्थित मुझे देखते हुए मनुष्य मेरे धाम को प्राप्त होते हैं। तीनों लोकों में साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं;

श्लोक 43 (skanda.2.69.43)

तानि सर्वाणि सरसि मत्सान्निध्याद्व्रजंति ते । तत्र स्नात्वा च विधिवद्दृष्ट्वा मां भक्तिभावतः

tāni sarvāṇi sarasi matsānnidhyādvrajaṁti te tatra snātvā ca vidhivaddṛṣṭvā māṁ bhaktibhāvataḥ

वे सभी मेरी उपस्थिति के कारण उस सरोवर में एकत्र हो जाते हैं। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके और भक्तिभाव से मुझे देखकर,

श्लोक 44 (skanda.2.69.44)

जननीजठरे क्लेशं पुनर्नानुभवंति हि । नवमेऽह्नि समायातं दक्षिणाशामुखं तदा

jananījaṭhare kleśaṁ punarnānubhavaṁti hi navame'hni samāyātaṁ dakṣiṇāśāmukhaṁ tadā

मनुष्य पुनः माता के गर्भ की पीड़ा का अनुभव नहीं करते। नवें दिन, जब मैं लौटकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आता हूँ,

श्लोक 45 (skanda.2.69.45)

ये पश्यन्ति प्रतिपदमश्वमेधक्रतोः फलम् । प्राप्य भोगानिंद्रसमान्भुक्त्वान्ते मां विशंति ते

ye paśyanti pratipadamaśvamedhakratoḥ phalam prāpya bhogāniṁdrasamānbhuktvānte māṁ viśaṁti te

जो प्रत्येक अवस्था में मुझे देखते हैं, वे अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करते हैं; इन्द्र के समान भोगों को भोगकर अन्त में मुझमें प्रवेश करते हैं।

श्लोक 46 (skanda.2.69.46)

ममोत्थानं मम स्वापं मत्पार्श्वपरिवर्त्तनम् । मार्गप्रावरणं चैव पुष्यस्नानमहोत्सवम्

mamotthānaṁ mama svāpaṁ matpārśvaparivarttanam mārgaprāvaraṇaṁ caiva puṣyasnānamahotsavam

मेरा उठना, मेरा शयन, मेरा करवट बदलना, मार्ग में मेरा आवरण, तथा पुष्य-स्नान महोत्सव —

श्लोक 47 (skanda.2.69.47)

फाल्गुन्यां क्रीडनं कुर्याद्दोलायां मम भूमिप । दोलायां येऽपि पश्यंति दक्षिणामुखपूजितम्

phālgunyāṁ krīḍanaṁ kuryāddolāyāṁ mama bhūmipa dolāyāṁ ye'pi paśyaṁti dakṣiṇāmukhapūjitam

हे भूमिपते, फाल्गुन में डोला में मेरा क्रीड़ोत्सव करवाना चाहिए। डोला में दक्षिणमुख होकर पूजित मुझे जो भी देखते हैं,

श्लोक 48 (skanda.2.69.48)

ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः

brahmahatyādibhiḥ pāpairmucyate nātra saṁśayaḥ

वे ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।

श्लोक 49 (skanda.2.69.49)

अनयोर्मां समभ्यर्च्य दृष्ट्वा मां प्रणिपत्य च । प्रत्येकमष्टसाहस्रं वाजिमेधफलं लभेत्

anayormāṁ samabhyarcya dṛṣṭvā māṁ praṇipatya ca pratyekamaṣṭasāhasraṁ vājimedhaphalaṁ labhet

इन दोनों अवसरों पर मेरी पूजा करके, दर्शन करके और प्रणाम करके, प्रत्येक में आठ हजार अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 50 (skanda.2.69.50)

चैत्रे सितत्रयोदश्यां कुर्यात्कर्मप्रपूरणम् । चैत्रे मासि चतुर्दश्यां दमनैर्मे प्रपूजनम् । शुक्लपक्षे तु ये लोकाः सर्वपापक्षयो भवेत्

caitre sitatrayodaśyāṁ kuryātkarmaprapūraṇam caitre māsi caturdaśyāṁ damanairme prapūjanam śuklapakṣe tu ye lokāḥ sarvapāpakṣayo bhavet

चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को कर्म की पूर्ति करनी चाहिए; चैत्र मास की चतुर्दशी को दमन-पत्रों से मेरी पूजा करनी चाहिए; शुक्ल पक्ष में जो भी लोग ऐसा करते हैं, उनके समस्त पापों का क्षय हो जाता है।

श्लोक 51 (skanda.2.69.51)

वैशाखस्य सिते पक्षे तृतीयाऽक्षयसंज्ञिता । तत्र मां लेपयेद्गन्धलेपनैरतिशोभनैः

vaiśākhasya site pakṣe tṛtīyā'kṣayasaṁjñitā tatra māṁ lepayedgandhalepanairatiśobhanaiḥ

वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया कहा जाता है; उस दिन मुझे अत्यन्त सुन्दर गन्ध-लेपों से लेपित करना चाहिए।

श्लोक 52 (skanda.2.69.52)

प्रीतये मम ये कुर्युरुत्सवान्मम शाश्वतान् । चतुर्वर्गप्रदा ह्येते प्रत्येकं परिकीर्तिताः

prītaye mama ye kuryurutsavānmama śāśvatān caturvargapradā hyete pratyekaṁ parikīrtitāḥ

जो मेरी प्रसन्नता के लिए इन मेरे नित्य उत्सवों को करते हैं — इनमें से प्रत्येक चारों पुरुषार्थों को देने वाला कहा गया है।

श्लोक 53 (skanda.2.69.53)

जैमिनिरुवाच । इति दत्त्वा वरं तस्मा इन्द्रद्युम्नाय भो द्विजाः । ब्रह्माणमाह भगवान्स्मेरांभोरुहसन्मुखः

jaiminiruvāca iti dattvā varaṁ tasmā indradyumnāya bho dvijāḥ brahmāṇamāha bhagavānsmerāṁbhoruhasanmukhaḥ

जैमिनि ने कहा — इस प्रकार इन्द्रद्युम्न को यह वर देकर, हे द्विजो, मुस्कुराते हुए कमल-सदृश मुख वाले भगवान् ने ब्रह्माजी से कहा —

श्लोक 54 (skanda.2.69.54)

चतुर्मुख तव प्रीत्यै सर्वं संपादितं मया । त्वदिच्छा हि ममैवेच्छा न भेदो ह्यावयोर्ध्रुवम्

caturmukha tava prītyai sarvaṁ saṁpāditaṁ mayā tvadicchā hi mamaivecchā na bhedo hyāvayordhruvam

हे चतुर्मुख, तुम्हारी प्रसन्नता के लिए यह सब मेरे द्वारा सम्पन्न किया गया है। तुम्हारी इच्छा ही मेरी इच्छा है — हम दोनों में निश्चय ही कोई भेद नहीं है।

श्लोक 55 (skanda.2.69.55)

यन्मां माधवमूर्तिं त्वं पुरा प्रार्थितवानसि । तस्यैव परिपाकोऽयमवतारः कृतो मया

yanmāṁ mādhavamūrtiṁ tvaṁ purā prārthitavānasi tasyaiva paripāko'yamavatāraḥ kṛto mayā

जो माधव-मूर्ति की तुमने पूर्वकाल में प्रार्थना की थी, यह अवतार उसी प्रार्थना का परिपाक है, जो मेरे द्वारा किया गया है।

श्लोक 56 (skanda.2.69.56)

मामत्र दृष्ट्वा त्वभ्यर्च्य प्राणान्संत्यज्य मुच्यते । क्रमात्सर्वे त्वया सार्द्धं भूयः सायुज्यमेव च

māmatra dṛṣṭvā tvabhyarcya prāṇānsaṁtyajya mucyate kramātsarve tvayā sārddhaṁ bhūyaḥ sāyujyameva ca

यहाँ मुझे देखकर, पूजकर, प्राणत्याग करने वाला मुक्त हो जाता है; क्रमशः सब तुम्हारे साथ पुनः मुझसे सायुज्य को प्राप्त करेंगे।

श्लोक 57 (skanda.2.69.57)

यद्वाचाभिलपन्मर्त्यो मामत्र हि निषेवते । अवश्यं तदवाप्नोति संगत्या चात्र भूपतिः

yadvācābhilapanmartyo māmatra hi niṣevate avaśyaṁ tadavāpnoti saṁgatyā cātra bhūpatiḥ

जो मनुष्य वाणी से कहते हुए यहाँ मेरी सेवा करता है, वह अवश्य ही वह फल प्राप्त करता है; और उस संगति से यहाँ राजा भी।

श्लोक 58 (skanda.2.69.58)

व्रजेदानीं सत्यलोकं त्रिदिवं यांतु देवताः । तवायुःपूर्णिपर्यंतमहमत्र स्थितो ध्रुवम्

vrajedānīṁ satyalokaṁ tridivaṁ yāṁtu devatāḥ tavāyuḥpūrṇiparyaṁtamahamatra sthito dhruvam

अब सत्यलोक को जाओ; देवता अपने स्वर्ग को जाएँ। तुम्हारी आयु पूर्ण होने तक मैं यहीं निश्चित रूप से रहूँगा।

श्लोक 59 (skanda.2.69.59)

ततस्ते हर्षिताः सर्वे ब्रह्मर्षिसुरसत्तमाः । प्रणम्य शिरसा देवं जग्मुस्ते निलयं स्वकम्

tataste harṣitāḥ sarve brahmarṣisurasattamāḥ praṇamya śirasā devaṁ jagmuste nilayaṁ svakam

तब वे सभी हर्षित ब्रह्मर्षि और देवश्रेष्ठ, देव को सिर से प्रणाम करके अपने-अपने निवास को गए।

श्लोक 60 (skanda.2.69.60)

देवोऽपि च जगन्नाथः प्रतिमारूपधृक्तदा । तूष्णीं तिष्ठति सर्वेषां हर्षमापादयन्नृणाम्

devo'pi ca jagannāthaḥ pratimārūpadhṛktadā tūṣṇīṁ tiṣṭhati sarveṣāṁ harṣamāpādayannṛṇām

और देव जगन्नाथ भी, प्रतिमारूप धारण किए हुए, तब मौन होकर, सबको आनन्द प्रदान करते हुए स्थित रहे।

श्लोक 61 (skanda.2.69.61)

इन्द्रद्युम्नोऽपि धर्मात्मा विष्णुभक्तो दृढव्रतः । अनुव्रजन्पद्मयोनिं तेनादिष्टो न्यवर्तत

indradyumno'pi dharmātmā viṣṇubhakto dṛḍhavrataḥ anuvrajanpadmayoniṁ tenādiṣṭo nyavartata

धर्मात्मा, दृढ़व्रती विष्णुभक्त इन्द्रद्युम्न भी कमलयोनि के पीछे कुछ दूर तक गए, फिर उनके द्वारा निर्देशित होकर लौट आए —

श्लोक 62 (skanda.2.69.62)

यात्राः सर्वा भगवता आज्ञप्ताः साधु कारय । अस्मिंस्तुष्टे जगन्नाथे सन्तुष्टं वै चराचरम्

yātrāḥ sarvā bhagavatā ājñaptāḥ sādhu kāraya asmiṁstuṣṭe jagannāthe santuṣṭaṁ vai carācaram

भगवान् द्वारा आज्ञप्त सभी यात्राओं को भलीभाँति सम्पन्न करो। जगन्नाथ के प्रसन्न होने पर सम्पूर्ण चराचर संतुष्ट होता है।

श्लोक 63 (skanda.2.69.63)

इत्याज्ञां पद्मयोनेस्तु मूर्ध्न्याधाय क्षितीश्वरः । नारदेन सह श्रीमान्निधिना च समृद्धिमत् । ज्येष्ठस्नानादिकं सर्वमुत्सवं निरवर्तयत्

ityājñāṁ padmayonestu mūrdhnyādhāya kṣitīśvaraḥ nāradena saha śrīmānnidhinā ca samṛddhimat jyeṣṭhasnānādikaṁ sarvamutsavaṁ niravartayat

इस प्रकार कमलयोनि की आज्ञा को शिर पर धारण करके, श्रीमान् राजा ने नारद तथा मन्त्री निधि के साथ, समृद्धिपूर्वक ज्येष्ठ-स्नान आदि सम्पूर्ण उत्सव सम्पन्न किया।

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