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वैष्णव खण्ड · अध्याय 70

तीर्थ-विधि और सिन्धु-स्नान की महिमा

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71

श्लोक 1 (skanda.2.70.1)

मुनय ऊचुः । चकार केन विधिना जन्मस्नानं श्रियः पतेः । अन्यानप्युत्सवान्सर्वान्विधिवद्ब्रूहि नो मुने

munaya ūcuḥ cakāra kena vidhinā janmasnānaṁ śriyaḥ pateḥ anyānapyutsavānsarvānvidhivadbrūhi no mune

मुनियों ने कहा — श्रीपति (जगन्नाथ) का जन्म-स्नान किस विधि से किया गया? हे मुने, अन्य सभी उत्सवों को भी क्रमशः विधिवत् बताइए।

श्लोक 2 (skanda.2.70.2)

नारदेन पुरा प्रोक्तं सर्वं ते मुनिसत्तम । स हि वेद तमःपारे ब्रह्म ब्रह्मसुतो मुनिः

nāradena purā proktaṁ sarvaṁ te munisattama sa hi veda tamaḥpāre brahma brahmasuto muniḥ

हे मुनिश्रेष्ठ, यह सब पूर्वकाल में नारद द्वारा आपको बताया गया था; क्योंकि वे ब्रह्मपुत्र मुनि अंधकार के पार के ब्रह्म को जानते हैं।

श्लोक 3 (skanda.2.70.3)

तत्सर्वं ब्रूहि तत्त्वेन मुने क्रौतूहलं हि नः । अहो भाग्यं नरपतेरिंद्रद्युम्नस्य भो मुने

tatsarvaṁ brūhi tattvena mune krautūhalaṁ hi naḥ aho bhāgyaṁ narapateriṁdradyumnasya bho mune

हे मुने, हमें तत्त्वतः वह सब बताइए, हमें अत्यंत कुतूहल है। अहो, राजा इन्द्रद्युम्न का कैसा सौभाग्य था, हे मुने!

श्लोक 4 (skanda.2.70.4)

तस्य तावति कर्मांते अत्यद्भुतमिदं महत् । न श्रुता हि न दृष्टा हि प्रतिमा दारुनिर्मिता

tasya tāvati karmāṁte atyadbhutamidaṁ mahat na śrutā hi na dṛṣṭā hi pratimā dārunirmitā

उनके इतने बड़े कर्म के अन्त में यह अत्यंत आश्चर्यजनक महान घटना हुई — काष्ठ से निर्मित ऐसी प्रतिमा न पहले सुनी गई, न देखी गई,

श्लोक 5 (skanda.2.70.5)

सजीवतनुवत्साक्षाद्वारं दद्यान्मनुष्यवत् । स्मारंस्मारं भगवतश्चरितं पापनाशनम्

sajīvatanuvatsākṣādvāraṁ dadyānmanuṣyavat smāraṁsmāraṁ bhagavataścaritaṁ pāpanāśanam

जो सजीव शरीर के समान साक्षात् वर मनुष्य की भाँति दे सके। भगवान् के पापनाशक चरित्र का बार-बार स्मरण करते हुए —

श्लोक 6 (skanda.2.70.6)

चरितं तस्य नृपतेर्दुर्लभं मर्त्यवासिनाम् । न सन्तोषोऽस्ति भगवञ्शृण्वतां नो महामुने

caritaṁ tasya nṛpaterdurlabhaṁ martyavāsinām na santoṣo'sti bhagavañśṛṇvatāṁ no mahāmune

उस राजा का चरित्र मनुष्यों के लिए अत्यंत दुर्लभ है। हे भगवन्, हमें सुनते हुए भी संतोष नहीं हो रहा, हे महामुने!

श्लोक 7 (skanda.2.70.7)

तद्वदानुक्रमेणास्मान्यात्राः सर्वाघनाशनाः । यासां संदर्शनाद्वासो वैकुण्ठ इति निश्चितम्

tadvadānukrameṇāsmānyātrāḥ sarvāghanāśanāḥ yāsāṁ saṁdarśanādvāso vaikuṇṭha iti niścitam

इसलिए हमें क्रमशः वे सभी यात्राएँ बताइए जो समस्त पापों का नाश करने वाली हैं, जिनके दर्शनमात्र से वैकुण्ठ में निवास निश्चित हो जाता है।

श्लोक 8 (skanda.2.70.8)

यात्रामाहात्म्यवक्तासौ यत्साक्षान्मधुसूदनः । तन्नो वद महाभाग जगतां हितकाम्यया

yātrāmāhātmyavaktāsau yatsākṣānmadhusūdanaḥ tanno vada mahābhāga jagatāṁ hitakāmyayā

साक्षात् मधुसूदन द्वारा कही गई उन यात्राओं की महिमा हमें बताइए, हे महाभाग, जगत् के हित की कामना से।

श्लोक 9 (skanda.2.70.9)

जैमिनिरुवाच । ज्येष्ठस्नानं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं मुनयोऽधुना । ज्येष्ठशुक्लदशम्यां तु व्रतं संकल्प्य वाग्यतः

jaiminiruvāca jyeṣṭhasnānaṁ pravakṣyāmi śṛṇudhvaṁ munayo'dhunā jyeṣṭhaśukladaśamyāṁ tu vrataṁ saṁkalpya vāgyataḥ

जैमिनि ने कहा — अब मैं ज्येष्ठ-स्नान का वर्णन करूँगा, हे मुनियो, सुनिए। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को व्रत का संकल्प करके, मौन रहकर,

श्लोक 10 (skanda.2.70.10)

प्रातरुत्थाय कुर्वीत पंचतीर्थविधानतः । मार्कंडेय वटं गत्वा आचम्य प्रयतः पुमान्

prātarutthāya kurvīta paṁcatīrthavidhānataḥ mārkaṁḍeya vaṭaṁ gatvā ācamya prayataḥ pumān

प्रातःकाल उठकर पंचतीर्थ-विधान के अनुसार करना चाहिए; मार्कण्डेय-वट पर जाकर, आचमन करके, पवित्र मनुष्य

श्लोक 11 (skanda.2.70.11)

प्रार्थयेच्छंकरं नत्वा कृतांजलिपुटोऽग्रतः

prārthayecchaṁkaraṁ natvā kṛtāṁjalipuṭo'grataḥ

अंजलिबद्ध होकर आगे शंकर से प्रार्थना करे —

श्लोक 12 (skanda.2.70.12)

अतितीक्ष्ण महाकाय कल्पांतदहनोपम । भैरवाय नमस्तुभ्यमनुज्ञां दातुमर्हसि

atitīkṣṇa mahākāya kalpāṁtadahanopama bhairavāya namastubhyamanujñāṁ dātumarhasi

हे अत्यंत तीक्ष्ण, महाकाय, कल्पान्त-अग्नि के समान! हे भैरव, तुम्हें नमस्कार; तुम अनुज्ञा देने योग्य हो।

श्लोक 13 (skanda.2.70.13)

ततः प्रविश्य तीर्थं तु वैदिकैः पंच वारुणैः । अघमर्षणसूक्तेन त्रिरावृत्तेन वा द्विजाः । स्नात्वा यथावत्स्नायीत मन्त्रेणानेन चांततः

tataḥ praviśya tīrthaṁ tu vaidikaiḥ paṁca vāruṇaiḥ aghamarṣaṇasūktena trirāvṛttena vā dvijāḥ snātvā yathāvatsnāyīta mantreṇānena cāṁtataḥ

तत्पश्चात् तीर्थ में प्रवेश करके, वैदिक पाँच वारुण मन्त्रों से, अथवा तीन बार आवृत्त अघमर्षण सूक्त से, हे द्विजो, विधिवत् स्नान करके, अन्त में इस मन्त्र से भी स्नान करे —

श्लोक 14 (skanda.2.70.14)

नमः शिवाय शांताय सर्वपापहराय च । स्नानं करोमि देवेश मम नश्यतु पातकम्

namaḥ śivāya śāṁtāya sarvapāpaharāya ca snānaṁ karomi deveśa mama naśyatu pātakam

शिव, शान्त, समस्त पापों को हरने वाले को नमस्कार; हे देवेश, मैं स्नान करता हूँ, मेरा पाप नष्ट हो।

श्लोक 15 (skanda.2.70.15)

संसारसागरे मग्नं पापग्रस्तमचेतनम् । त्राहि मां भगनेत्रघ्न त्रिपुरारे नमोऽस्तु ते

saṁsārasāgare magnaṁ pāpagrastamacetanam trāhi māṁ bhaganetraghna tripurāre namo'stu te

संसारसागर में डूबे, पाप से ग्रस्त, अचेत मुझको बचाओ — हे भगनेत्रघ्न, हे त्रिपुरारि, तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 16 (skanda.2.70.16)

एवं स्नात्वा बहिर्गत्वा धौतवासा सपुण्ड्रकः । देवानृषीन्पितॄंश्चैव तर्पयित्वा यथाविधि

evaṁ snātvā bahirgatvā dhautavāsā sapuṇḍrakaḥ devānṛṣīnpitṝṁścaiva tarpayitvā yathāvidhi

इस प्रकार स्नान करके, बाहर जाकर, धुले वस्त्र और तिलक धारण करके, विधिपूर्वक देवता, ऋषि तथा पितरों को तर्पण करके,

श्लोक 17 (skanda.2.70.17)

प्रविश्य शंकरागारं स्पृष्ट्वा वृषणयोर्वृषम् । मन्त्रेणानेन भो विप्राः सर्वक्रतुफलं लभेत्

praviśya śaṁkarāgāraṁ spṛṣṭvā vṛṣaṇayorvṛṣam mantreṇānena bho viprāḥ sarvakratuphalaṁ labhet

शंकर के मन्दिर में प्रवेश करके, वृष (नंदी) के वृषण के निकट स्पर्श करके, इस मन्त्र से, हे विप्रो, समस्त यज्ञों का फल प्राप्त होता है —

श्लोक 18 (skanda.2.70.18)

धर्मश्चतुष्पाद्यज्ञस्त्वं स्वर्णशृंगस्त्रयीवपुः । गोपते वाहरूपस्त्वं शूलिनं त्वां नमाम्यहम्

dharmaścatuṣpādyajñastvaṁ svarṇaśṛṁgastrayīvapuḥ gopate vāharūpastvaṁ śūlinaṁ tvāṁ namāmyaham

तुम धर्म हो चतुष्पाद, यज्ञस्वरूप, स्वर्णशृंग, त्रयीमय शरीर वाले; हे गोपते, वाहनरूप, त्रिशूलधारी तुम्हें मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 19 (skanda.2.70.19)

अघोरमन्त्रेण ततः पूजयेद्वृषवाहनम् । पञ्चब्रह्मभिर्ऋग्भिस्तु संस्पृशेल्लिंगमुत्तमम्

aghoramantreṇa tataḥ pūjayedvṛṣavāhanam pañcabrahmabhirṛgbhistu saṁspṛśelliṁgamuttamam

तत्पश्चात् अघोर मन्त्र से वृषवाहन की पूजा करे; पाँच ब्रह्ममन्त्रों (ऋचाओं) से उत्तम लिंग का स्पर्श करे।

श्लोक 20 (skanda.2.70.20)

अंगुष्ठेन स्पृशेल्लिगं मुष्टिना शक्तिमेव च । पूजयित्वा तु विधिवत्स्तुत्वा देवं पुरद्विषम्

aṁguṣṭhena spṛśelligaṁ muṣṭinā śaktimeva ca pūjayitvā tu vidhivatstutvā devaṁ puradviṣam

अंगूठे से लिंग का, मुट्ठी से शक्ति का स्पर्श करे; विधिपूर्वक पूजा करके, त्रिपुरारि देव की स्तुति करके,

श्लोक 21 (skanda.2.70.21)

दशानामश्वमेधानां फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । मार्कंडेयवटे स्नात्वा दृष्ट्वा देवं तु शंकरम्

daśānāmaśvamedhānāṁ phalaṁ prāpnotyanuttamam mārkaṁḍeyavaṭe snātvā dṛṣṭvā devaṁ tu śaṁkaram

दस अश्वमेध यज्ञों का अनुपम फल प्राप्त होता है। मार्कण्डेय-वट में स्नान करके, शंकर देव का दर्शन करके,

श्लोक 22 (skanda.2.70.22)

फलं प्राप्नोत्यविकलं राजसूयाश्वमेधयोः । अन्ते शिवस्य सालोक्यं प्राप्य ज्ञानं ततो नरः

phalaṁ prāpnotyavikalaṁ rājasūyāśvamedhayoḥ ante śivasya sālokyaṁ prāpya jñānaṁ tato naraḥ

राजसूय और अश्वमेध का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है; अन्त में शिवलोक की सालोक्यता तथा उससे ज्ञान प्राप्त कर मनुष्य

श्लोक 23 (skanda.2.70.23)

क्रमाच्च लभते मुक्तिं जगन्नाथप्रसादतः । ततो मौनी व्रजेद्देवं नारायणमनामयम्

kramācca labhate muktiṁ jagannāthaprasādataḥ tato maunī vrajeddevaṁ nārāyaṇamanāmayam

क्रमशः जगन्नाथ की कृपा से मुक्ति प्राप्त करता है। तत्पश्चात् मौन होकर अनामय नारायण की ओर जाना चाहिए,

श्लोक 24 (skanda.2.70.24)

तद्दक्षिणस्थितं विष्णुरूपं न्यग्रोधमुत्तमम् । दर्शनादपि पापानां पापसंहतिनाशनम्

taddakṣiṇasthitaṁ viṣṇurūpaṁ nyagrodhamuttamam darśanādapi pāpānāṁ pāpasaṁhatināśanam

जो उसके दक्षिण में स्थित उत्तम न्यग्रोध वृक्ष के रूप में विष्णुस्वरूप हैं, जिनके दर्शनमात्र से भी पापों के समूह का नाश हो जाता है।

श्लोक 25 (skanda.2.70.25)

तं दृष्ट्वा प्रणमेद्दूराद्भावयन्पुरुषोत्तमम् । प्रदक्षिणं ततः कुर्यादिमं मन्त्रमुदीरयन्

taṁ dṛṣṭvā praṇameddūrādbhāvayanpuruṣottamam pradakṣiṇaṁ tataḥ kuryādimaṁ mantramudīrayan

उसे देखकर दूर से ही पुरुषोत्तम का ध्यान करते हुए प्रणाम करे; तत्पश्चात् इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए प्रदक्षिणा करे —

श्लोक 26 (skanda.2.70.26)

अमरस्त्वं सदा कल्प विष्णोरायतनं महत् । न्यग्रोध हर मे पापं विष्णुरूप नमोऽस्तु ते

amarastvaṁ sadā kalpa viṣṇorāyatanaṁ mahat nyagrodha hara me pāpaṁ viṣṇurūpa namo'stu te

तुम सदा अमर हो, कल्प के वृक्ष, विष्णु के महान आयतन! हे न्यग्रोध, मेरा पाप हरो, हे विष्णुरूप, तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 27 (skanda.2.70.27)

नमोऽस्त्वव्यक्तरूपाय महाप्रलयस्थायिने । एकाश्रयाय जगतां कल्पवृक्षाय ते नमः

namo'stvavyaktarūpāya mahāpralayasthāyine ekāśrayāya jagatāṁ kalpavṛkṣāya te namaḥ

अव्यक्तरूप को, महाप्रलय में स्थिर रहने वाले को नमस्कार! जगत् के एकमात्र आश्रय, कल्पवृक्ष को नमस्कार!

श्लोक 28 (skanda.2.70.28)

स्तुवञ्जपेत्तु तद्भक्त्या मूले तस्य जनार्दनम् । कोटिजन्मशतोद्भूतपापादेव विमुच्यते

stuvañjapettu tadbhaktyā mūle tasya janārdanam koṭijanmaśatodbhūtapāpādeva vimucyate

इस प्रकार स्तुति करते हुए भक्तिपूर्वक उसकी जड़ में जनार्दन का जप करना चाहिए; मनुष्य सैकड़ों करोड़ जन्मों के पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 29 (skanda.2.70.29)

तच्छायाक्रमणेनापि निष्पापो जायते नरः । ततः सुपर्णं प्रणमेद्यानरूपं हरेः पुरः

tacchāyākramaṇenāpi niṣpāpo jāyate naraḥ tataḥ suparṇaṁ praṇamedyānarūpaṁ hareḥ puraḥ

उसकी छाया में पैर रखने मात्र से भी मनुष्य निष्पाप हो जाता है। तत्पश्चात् हरि के वाहनरूप गरुड़ को उनके सामने प्रणाम करे,

श्लोक 30 (skanda.2.70.30)

स्थितो भक्तिनतो विष्णोः कृतांजलिपुटो मुदा । छन्दोमय जगद्धामन्यानरूप त्रिवृद्वपुः

sthito bhaktinato viṣṇoḥ kṛtāṁjalipuṭo mudā chandomaya jagaddhāmanyānarūpa trivṛdvapuḥ

भक्तिपूर्वक झुककर, प्रसन्नतापूर्वक अंजलि बाँधे खड़े होकर — हे छन्दोमय, जगत् के धाम, वाहनरूप, त्रिविध शरीर वाले,

श्लोक 31 (skanda.2.70.31)

यज्ञरूप जगद्व्यापिन्प्रीयमाणाय ते नमः । स्तुत्वेत्थं गरुडं पापान्मुच्यतेऽनेकजन्मजात्

yajñarūpa jagadvyāpinprīyamāṇāya te namaḥ stutvetthaṁ garuḍaṁ pāpānmucyate'nekajanmajāt

यज्ञरूप, जगत्व्यापी, प्रसन्न रहने वाले, तुम्हें नमस्कार! इस प्रकार गरुड़ की स्तुति करके मनुष्य अनेक जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 32 (skanda.2.70.32)

वाङ्मनःकर्मनियतो गच्छेदेवं विचिंतयन् । प्रविश्य देवतागारं कृत्वा तं त्रिः प्रदक्षिणम्

vāṁmanaḥkarmaniyato gacchedevaṁ viciṁtayan praviśya devatāgāraṁ kṛtvā taṁ triḥ pradakṣiṇam

वाणी, मन और कर्म से संयमित होकर इस प्रकार चिन्तन करते हुए आगे बढ़े; मन्दिर में प्रवेश करके, तीन बार प्रदक्षिणा करके,

श्लोक 33 (skanda.2.70.33)

पूजयेन्मन्त्रराजेन सूक्तेन पुरुषस्य वा । द्वादशाक्षरमंत्रेण यत्र वा जायते रुचिः

pūjayenmantrarājena sūktena puruṣasya vā dvādaśākṣaramaṁtreṇa yatra vā jāyate ruciḥ

मन्त्रराज से, या पुरुषसूक्त से, या द्वादशाक्षर मन्त्र से — जिसमें रुचि हो, उससे पूजा करे।

श्लोक 34 (skanda.2.70.34)

पूजाधिकारिणः सर्वे ब्रह्मक्षत्रविशस्ततः । अन्येषां दर्शन भक्त्या तयोर्नामानुकीर्तनात्

pūjādhikāriṇaḥ sarve brahmakṣatraviśastataḥ anyeṣāṁ darśana bhaktyā tayornāmānukīrtanāt

पूजा का अधिकार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — सभी को है; अन्य लोगों को भक्तिपूर्वक दर्शन तथा दोनों नामों के कीर्तन से,

श्लोक 35 (skanda.2.70.35)

पंचोपचारविधिना पूजयेत्परमेश्वरम् । कृतांजलिपुटो भूत्वा इदं स्तोत्रमुदीरयेत्

paṁcopacāravidhinā pūjayetparameśvaram kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā idaṁ stotramudīrayet

पंचोपचार विधि से परमेश्वर की पूजा करे; अंजलिबद्ध होकर यह स्तोत्र कहे —

श्लोक 36 (skanda.2.70.36)

देवदेव जगन्नाथ संसारार्णवतारक । भक्तानुग्राहक सदा रक्ष मां पादयोर्नतम्

devadeva jagannātha saṁsārārṇavatāraka bhaktānugrāhaka sadā rakṣa māṁ pādayornatam

हे देवाधिदेव जगन्नाथ, संसारसागर से तारने वाले, सदा भक्तों पर अनुग्रह करने वाले! अपने चरणों में नत मुझे रक्षा करो।

श्लोक 37 (skanda.2.70.37)

जय कृष्ण जगन्नाथ जय सर्वाघनाशन । जयाशेषजगद्वंद्य पादांभोज नमोऽस्तु ते

jaya kṛṣṇa jagannātha jaya sarvāghanāśana jayāśeṣajagadvaṁdya pādāṁbhoja namo'stu te

जय हो कृष्ण जगन्नाथ! जय हो सम्पूर्ण पापों के नाशक! जय हो सम्पूर्ण जगत् द्वारा वंदित, तुम्हारे चरणकमल को नमस्कार!

श्लोक 38 (skanda.2.70.38)

जय ब्रह्मांडकोटीश वेदनिःश्वासवातक । अशेषजगदाधार परमात्मन्नमोऽस्तु ते

jaya brahmāṁḍakoṭīśa vedaniḥśvāsavātaka aśeṣajagadādhāra paramātmannamo'stu te

जय हो करोड़ों ब्रह्माण्डों के ईश, वेद जिनकी श्वास हैं! सम्पूर्ण जगत् के आधार, परमात्मा, तुम्हें नमस्कार!

श्लोक 39 (skanda.2.70.39)

जय ब्रह्मेंद्ररुद्रादि देवौघप्रणतार्तिनुत् । जयाखिलजगद्धामन्नंतर्यामिन्नमोऽस्तु ते

jaya brahmeṁdrarudrādi devaughapraṇatārtinut jayākhilajagaddhāmannaṁtaryāminnamo'stu te

जय हो ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र आदि प्रणत देवसमूह की पीड़ा हरने वाले! जय हो सम्पूर्ण जगत् के धाम, अन्तर्यामी, तुम्हें नमस्कार!

श्लोक 40 (skanda.2.70.40)

जय निर्व्याजकरुणापाथोधे दीनवत्सल । दीनानाथैकशरण विश्वसाक्षिन्नमोऽस्तु ते

jaya nirvyājakaruṇāpāthodhe dīnavatsala dīnānāthaikaśaraṇa viśvasākṣinnamo'stu te

जय हो निष्कपट करुणासागर, दीनों के प्रिय! दीन-अनाथों के एकमात्र आश्रय, विश्व के साक्षी, तुम्हें नमस्कार!

श्लोक 41 (skanda.2.70.41)

संसारसिंधुसलिले मोहावर्त्ते सुदुस्तरे । षडूर्मिकुलदुष्पारे कुकर्मग्राहदारुणे

saṁsārasiṁdhusalile mohāvartte sudustare ṣaḍūrmikuladuṣpāre kukarmagrāhadāruṇe

संसाररूपी सागर के जल में, मोहरूपी दुस्तर भँवर में, छह ऊर्मियों के कारण दुष्पार, कुकर्मरूपी मगरमच्छों से भयंकर,

श्लोक 42 (skanda.2.70.42)

निराश्रये निरालंबे निःसारे दुःखफेनिले । तव मायागुणैर्बद्धमवशं पतितं ततः

nirāśraye nirālaṁbe niḥsāre duḥkhaphenile tava māyāguṇairbaddhamavaśaṁ patitaṁ tataḥ

निराश्रय, निराधार, निःसार, दुःखरूपी झाग से भरे उस सागर में, तुम्हारी माया के गुणों से बँधकर असहाय गिरा हुआ,

श्लोक 43 (skanda.2.70.43)

मां समुद्धर देवेश कृपापांगविलोकनैः । तत्र मग्नं सुरश्रेष्ठ सुप्रसादप्रकाशक

māṁ samuddhara deveśa kṛpāpāṁgavilokanaiḥ tatra magnaṁ suraśreṣṭha suprasādaprakāśaka

मुझे उबारो, हे देवेश, अपनी करुणादृष्टि से; उसमें डूबे हुए मुझे, हे देवश्रेष्ठ, हे सुप्रसाद-प्रकाशक,

श्लोक 44 (skanda.2.70.44)

एक एव जगन्नाथ बन्धुस्त्वं भवभीरुणाम् । बुभुक्षा च पिपासा च प्राणस्य मनसः स्मृतौ

eka eva jagannātha bandhustvaṁ bhavabhīruṇām bubhukṣā ca pipāsā ca prāṇasya manasaḥ smṛtau

तुम्हीं, हे जगन्नाथ, संसार से भयभीतों के एकमात्र बन्धु हो। भूख और प्यास प्राण की, स्मृति मन की है,

श्लोक 45 (skanda.2.70.45)

शोकमोहौ शरीरस्य जरा मृत्युर्वपुर्भवः । त्वत्सृष्टौ तादृशो नास्ति यो दीनपरिपालकः

śokamohau śarīrasya jarā mṛtyurvapurbhavaḥ tvatsṛṣṭau tādṛśo nāsti yo dīnaparipālakaḥ

शोक-मोह शरीर के हैं, जरा-मृत्यु और जन्म देह के हैं। तुम्हारी सृष्टि में तुम्हारे अतिरिक्त कोई अन्य दीनों का पालक नहीं है।

श्लोक 46 (skanda.2.70.46)

अवतीर्णोसि लोकानामनुग्रहधिया विभो । पूर्णकामस्य ते नाथ किमन्यत्कारणं क्षितौ

avatīrṇosi lokānāmanugrahadhiyā vibho pūrṇakāmasya te nātha kimanyatkāraṇaṁ kṣitau

तुम अनुग्रह के भाव से लोकों के लिए अवतीर्ण हुए हो, हे विभो। पूर्णकाम तुम्हारे लिए, हे नाथ, पृथ्वी पर अवतरण का और क्या कारण हो सकता है?

श्लोक 47 (skanda.2.70.47)

त्वत्पादपद्ममासाद्य न चिंतास्ति जगत्पते । यतस्ते चरणांभोजं चतुर्वर्गेकसाधनम्

tvatpādapadmamāsādya na ciṁtāsti jagatpate yataste caraṇāṁbhojaṁ caturvargekasādhanam

तुम्हारे चरणकमल को प्राप्त करके कोई चिन्ता नहीं रहती, हे जगत्पते, क्योंकि तुम्हारा चरणकमल चारों पुरुषार्थों का एकमात्र साधन है,

श्लोक 48 (skanda.2.70.48)

दर्शनात्सर्वलोकानां सर्ववांछा फलप्रदम् । ततः सीरध्वजं शेषमन्त्रेण परिपूजयेत्

darśanātsarvalokānāṁ sarvavāṁchā phalapradam tataḥ sīradhvajaṁ śeṣamantreṇa paripūjayet

जो दर्शनमात्र से समस्त लोकों की समस्त इच्छाओं का फल देने वाला है। तत्पश्चात् शेषमन्त्र से सीरध्वज (बलराम) की पूजा करे,

श्लोक 49 (skanda.2.70.49)

द्वादशाक्षरमन्त्रेण नाम्ना वा प्रणवादिना । एकाग्रमानसो भूत्वा प्रणिपत्य प्रसादयेत्

dvādaśākṣaramantreṇa nāmnā vā praṇavādinā ekāgramānaso bhūtvā praṇipatya prasādayet

या द्वादशाक्षर मन्त्र से, या ॐकार-युक्त नाम से; एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करके प्रसन्न करे —

श्लोक 50 (skanda.2.70.50)

जय राम सदाराम सच्चिदानदविग्रह । अविद्यापंकरहित निर्मलाकृतये नमः

jaya rāma sadārāma saccidānadavigraha avidyāpaṁkarahita nirmalākṛtaye namaḥ

जय हो राम, सदा आनन्दमय, सच्चिदानन्दस्वरूप! अविद्यारूपी कीचड़ से रहित, निर्मल आकृति को नमस्कार!

श्लोक 51 (skanda.2.70.51)

जयाखिलजगद्भारधारणश्रमवर्जित । तापत्रयविकर्षाय हलं कलयसे सदा

jayākhilajagadbhāradhāraṇaśramavarjita tāpatrayavikarṣāya halaṁ kalayase sadā

जय हो सम्पूर्ण जगत् का भार धारण करने में श्रमरहित! तीन तापों को दूर करने के लिए तुम सदा हल धारण करते हो।

श्लोक 52 (skanda.2.70.52)

प्रपन्नदीनत्राणाय स्फुटनेत्रसरोरुह । त्वमेवेश पराशेषकलुषक्षालनप्रभुः

prapannadīnatrāṇāya sphuṭanetrasaroruha tvameveśa parāśeṣakaluṣakṣālanaprabhuḥ

शरणागत दीनों की रक्षा के लिए विशाल नेत्रकमल वाले! तुम्हीं, हे ईश, समस्त मलिनता को धोने वाले स्वामी हो।

श्लोक 53 (skanda.2.70.53)

प्रसन्नकरुणासिंधो दीनबन्धो नमोऽस्तु ते । चराचराफणाग्रेण धृता येन वसुन्धरा

prasannakaruṇāsiṁdho dīnabandho namo'stu te carācarāphaṇāgreṇa dhṛtā yena vasundharā

प्रसन्न करुणासागर, दीनबन्धु, तुम्हें नमस्कार! जिनके फणाग्र से यह चराचर पृथ्वी धारण की गई है —

श्लोक 54 (skanda.2.70.54)

मामुद्धरास्माद्दुष्पाराद्भवांभोधेरपारतः । परापराणां परमपरमेश नमोऽस्तु ते

māmuddharāsmādduṣpārādbhavāṁbhodherapārataḥ parāparāṇāṁ paramaparameśa namo'stu te

मुझे इस दुस्तर, अपार संसारसागर से उबारो! श्रेष्ठों और निम्नों में परम श्रेष्ठ, हे परमेश, तुम्हें नमस्कार!

श्लोक 55 (skanda.2.70.55)

स्तुत्वैवं नागराजानं बलं मुसलधारिणम् । पूजयेज्जगतामादिकारणां भद्रलोचनाम्

stutvaivaṁ nāgarājānaṁ balaṁ musaladhāriṇam pūjayejjagatāmādikāraṇāṁ bhadralocanām

इस प्रकार नागराज बल (बलराम), मुसलधारी की स्तुति करके, जगत् के आदिकारण, शुभ नेत्रों वाली उस देवी की पूजा करे,

श्लोक 56 (skanda.2.70.56)

स्तुत्वा जयां तां भो विप्राः प्रणिपत्य प्रसादयेत् । जय देवि महादेवि प्रसीद भवतारिणि

stutvā jayāṁ tāṁ bho viprāḥ praṇipatya prasādayet jaya devi mahādevi prasīda bhavatāriṇi

उस विजयिनी की स्तुति करके, हे विप्रो, प्रणाम करके प्रसन्न करे — जय हो देवि, महादेवि, प्रसन्न होओ, संसार से तारने वाली!

श्लोक 57 (skanda.2.70.57)

सुखारणि श्रितवतां जय संतुष्टिकारिणि । कार्यं कार्यस्वरूपाणां कारणानां च कारणम्

sukhāraṇi śritavatāṁ jaya saṁtuṣṭikāriṇi kāryaṁ kāryasvarūpāṇāṁ kāraṇānāṁ ca kāraṇam

शरणागतों को सुख देने वाली, संतोष देने वाली, जय हो! तुम कार्यरूप वस्तुओं का कार्य और कारणों का भी कारण हो;

श्लोक 58 (skanda.2.70.58)

धारणां धार्यमाणानां त्वामादिं प्रणमाम्यहम् । वक्षःस्थलस्थितां विष्णोः शंभोरर्द्धांगधारिणीम्

dhāraṇāṁ dhāryamāṇānāṁ tvāmādiṁ praṇamāmyaham vakṣaḥsthalasthitāṁ viṣṇoḥ śaṁbhorarddhāṁgadhāriṇīm

धारण की जाने वाली वस्तुओं की धारणा भी तुम्हीं हो — तुम्हें, आदि को, मैं नमस्कार करता हूँ। विष्णु के वक्षस्थल पर स्थित, शंभु के अर्धांग को धारण करने वाली,

श्लोक 59 (skanda.2.70.59)

पद्मयोनि मुखाब्जस्थां प्रणमामि जगत्प्रियाम् । सृष्टिस्थितिविनाशादिकर्मणां परमात्मनः

padmayoni mukhābjasthāṁ praṇamāmi jagatpriyām sṛṣṭisthitivināśādikarmaṇāṁ paramātmanaḥ

पद्मयोनि (ब्रह्मा) के मुखकमल में स्थित — जगत् की प्रिय उसे मैं नमस्कार करता हूँ, परमात्मा के सृष्टि-स्थिति-विनाश आदि कर्मों की शक्ति,

श्लोक 60 (skanda.2.70.60)

त्वमेका शक्तिरतुला त्वां विना सोऽपि नेश्वरः । त्वां सर्वलोकजननीं विष्णुमायां तपस्विनीम्

tvamekā śaktiratulā tvāṁ vinā so'pi neśvaraḥ tvāṁ sarvalokajananīṁ viṣṇumāyāṁ tapasvinīm

तुम अकेली अनुपम शक्ति हो; तुम्हारे बिना वे भी ईश्वर नहीं हैं। सम्पूर्ण लोकों की जननी, विष्णुमाया, तपस्विनी तुम्हें,

श्लोक 61 (skanda.2.70.61)

सुभद्रां भद्ररूपां तां मूलभूतां नमाम्यहम् । ततः सागरस्नानाय प्रार्थयेत्पुरुषोत्तमम्

subhadrāṁ bhadrarūpāṁ tāṁ mūlabhūtāṁ namāmyaham tataḥ sāgarasnānāya prārthayetpuruṣottamam

भद्ररूपा सुभद्रा, समस्त की मूलभूता, मैं नमस्कार करता हूँ। तत्पश्चात् सागर-स्नान के लिए पुरुषोत्तम से प्रार्थना करे —

श्लोक 62 (skanda.2.70.62)

नमस्ते भगवन्विष्णो जगद्व्यापिंश्चराचर । निर्विघ्नं सिद्धिमायातु सिंधुस्नानं मम प्रभो

namaste bhagavanviṣṇo jagadvyāpiṁścarācara nirvighnaṁ siddhimāyātu siṁdhusnānaṁ mama prabho

हे भगवन् विष्णु, चराचर जगत्व्यापी, तुम्हें नमस्कार! हे प्रभो, मेरा सिन्धु-स्नान निर्विघ्न सिद्ध हो।

श्लोक 63 (skanda.2.70.63)

नमस्ते जगतामीश शंखचक्रगदाधर । देहि देव ममानुज्ञां तव तीर्थनिषेवणात्

namaste jagatāmīśa śaṁkhacakragadādhara dehi deva mamānujñāṁ tava tīrthaniṣevaṇāt

हे जगत् के ईश, शंख-चक्र-गदाधारी, तुम्हें नमस्कार! हे देव, तुम्हारे तीर्थ की सेवा से मुझे अनुज्ञा दो।

श्लोक 64 (skanda.2.70.64)

ततो मौनं व्रजेद्विष्णुं चिंतयन्सरितां पतिम् । उग्रसेनं स्थितं मार्गे अनुज्ञाप्य समाहितः

tato maunaṁ vrajedviṣṇuṁ ciṁtayansaritāṁ patim ugrasenaṁ sthitaṁ mārge anujñāpya samāhitaḥ

तत्पश्चात् मौन होकर, नदियों के स्वामी विष्णु का चिन्तन करते हुए, समाहित मन से मार्ग में स्थित उग्रसेन से अनुज्ञा माँगे —

श्लोक 65 (skanda.2.70.65)

उग्रसेन महाबाहो वलवन्नुग्रविक्रम । लब्ध्वा वरं सुप्रसन्नात्समुद्रतटमास्थितः

ugrasena mahābāho valavannugravikrama labdhvā varaṁ suprasannātsamudrataṭamāsthitaḥ

हे उग्रसेन, महाबाहु, बलवान, उग्रविक्रम! तुमसे वर पाकर, हे सुप्रसन्न, मैं समुद्रतट पर खड़ा हूँ;

श्लोक 66 (skanda.2.70.66)

तीर्थराजकृतस्नानसुसंपूर्णफलप्रद । सिंधुस्नानं करिष्यामि अनुज्ञां दातुमर्हसि

tīrtharājakṛtasnānasusaṁpūrṇaphalaprada siṁdhusnānaṁ kariṣyāmi anujñāṁ dātumarhasi

तीर्थराज में किए गए स्नान का सम्पूर्ण फल देने वाले, मैं सिन्धु-स्नान करूँगा, तुम अनुज्ञा देने योग्य हो।

श्लोक 67 (skanda.2.70.67)

ततो गच्छेद्द्विजश्रेष्ठाः स्वर्गद्वारं ततः परम् । येन देवाः समायांति क्षेत्रेऽस्मिन्पुरुषोत्तमे

tato gaccheddvijaśreṣṭhāḥ svargadvāraṁ tataḥ param yena devāḥ samāyāṁti kṣetre'sminpuruṣottame

तत्पश्चात्, हे द्विजश्रेष्ठो, स्वर्गद्वार की ओर जाना चाहिए, जिससे देवता इस पुरुषोत्तम क्षेत्र में

श्लोक 68 (skanda.2.70.68)

भूस्वर्गे जगदीशस्य दर्शनाय दिनेदिने । स्वर्गावतारमार्गेण तत्रस्थौ वां नमाम्यहम्

bhūsvarge jagadīśasya darśanāya dinedine svargāvatāramārgeṇa tatrasthau vāṁ namāmyaham

भूस्वर्ग में जगदीश के दर्शन के लिए, दिन-प्रतिदिन, स्वर्गावतरण के मार्ग से आते हैं। वहाँ स्थित तुम दोनों को मैं नमस्कार करता हूँ —

श्लोक 69 (skanda.2.70.69)

मामप्यूर्ध्वं नयेतां वै साक्षिणौ कर्मणां सताम् । सागरांभः समुत्पन्नौ श्रेष्ठौ सर्वगुणान्वितौ

māmapyūrdhvaṁ nayetāṁ vai sākṣiṇau karmaṇāṁ satām sāgarāṁbhaḥ samutpannau śreṣṭhau sarvaguṇānvitau

तुम दोनों, सत्कर्मों के साक्षी, सागर के जल से उत्पन्न, श्रेष्ठ, सर्वगुणसम्पन्न, मुझे भी ऊपर ले चलो।

श्लोक 70 (skanda.2.70.70)

मध्येन युवयोर्यामि स्वर्गद्वारमपावृतम् । प्रार्थयित्वा ततो गच्छेत्तीर्थराजस्य संनिधिम्

madhyena yuvayoryāmi svargadvāramapāvṛtam prārthayitvā tato gacchettīrtharājasya saṁnidhim

मैं तुम दोनों के मध्य से खुले हुए स्वर्गद्वार से जाता हूँ। इस प्रकार प्रार्थना करके तीर्थराज के समीप जाना चाहिए,

श्लोक 71 (skanda.2.70.71)

यं दृष्ट्वा दूरतः पापान्मुच्यते महतो धुवम् । प्रक्षालितकरांघ्रिक आचांतः शुचिविष्टरे

yaṁ dṛṣṭvā dūrataḥ pāpānmucyate mahato dhuvam prakṣālitakarāṁghrika ācāṁtaḥ śuciviṣṭare

जिसे दूर से देखने मात्र से भी महान पापों से मुक्ति होती है। हाथ-पैर धोकर, आचमन करके, पवित्र आसन पर बैठकर,

श्लोक 72 (skanda.2.70.72)

आसीनः प्राङ्मुखोभूत्वा लिखेन्मंडलमग्रतः । चतुरस्रं चतुर्द्वारं चतुःस्वस्तिककोणकम्

āsīnaḥ prāṁmukhobhūtvā likhenmaṁḍalamagrataḥ caturasraṁ caturdvāraṁ catuḥsvastikakoṇakam

पूर्वाभिमुख होकर आगे मण्डल बनाए — चतुष्कोण, चार द्वारों वाला, चारों कोनों में स्वस्तिक-चिह्नयुक्त,

श्लोक 73 (skanda.2.70.73)

तन्मध्ये विलिखेत्पद्ममष्टपत्रं सुशोभनम् । ततोऽष्टाक्षरमंत्रं तु करयोश्च तनौ न्यसेत्

tanmadhye vilikhetpadmamaṣṭapatraṁ suśobhanam tato'ṣṭākṣaramaṁtraṁ tu karayośca tanau nyaset

उसके मध्य में सुशोभित अष्टदल कमल बनाए; तत्पश्चात् अष्टाक्षर मन्त्र का हाथों और शरीर पर न्यास करे,

श्लोक 74 (skanda.2.70.74)

षड्भिर्वर्णैः षडंगानां न्यासः प्रोक्तो मनीषिभिः । शेषौ कुक्षौ च पृष्ठे च न्यस्तव्यौ च ततः पुनः

ṣaḍbhirvarṇaiḥ ṣaḍaṁgānāṁ nyāsaḥ prokto manīṣibhiḥ śeṣau kukṣau ca pṛṣṭhe ca nyastavyau ca tataḥ punaḥ

बुद्धिमानों ने छह वर्णों से छह अंगों का न्यास बताया है; शेष वर्णों को उदर और पीठ पर पुनः न्यस्त करना चाहिए,

श्लोक 75 (skanda.2.70.75)

पादयोर्जंघयोरूर्वोः स्फिचोश्च पार्श्वयोः पुनः । नाभौ पृष्ठे बाहुयुग्मे हृदि कण्ठे च कक्षयोः

pādayorjaṁghayorūrvoḥ sphicośca pārśvayoḥ punaḥ nābhau pṛṣṭhe bāhuyugme hṛdi kaṇṭhe ca kakṣayoḥ

पैरों, पिंडलियों, जाँघों, नितम्बों और पार्श्वों पर, पुनः नाभि, पीठ, दोनों भुजाओं, हृदय, कण्ठ और काँख पर,

श्लोक 76 (skanda.2.70.76)

ओष्ठयोः कर्णयोरक्ष्णोर्गंडयोर्नासयोस्तथा । भ्रुवोर्ललाटे शिरसि मंत्रवर्णान्यथाक्रमम्

oṣṭhayoḥ karṇayorakṣṇorgaṁḍayornāsayostathā bhruvorlalāṭe śirasi maṁtravarṇānyathākramam

होंठों, कानों, नेत्रों, कपोलों और नासिका पर, तथा भौंहों, ललाट और शिर पर मन्त्रवर्णों का क्रमशः न्यास करके,

श्लोक 77 (skanda.2.70.77)

विन्यस्य व्यापकं सर्वैर्न्यासं कुर्यात्समाहितः । प्राणायामत्रयं कुर्यान्मूलेन पंचविंशतिम्

vinyasya vyāpakaṁ sarvairnyāsaṁ kuryātsamāhitaḥ prāṇāyāmatrayaṁ kuryānmūlena paṁcaviṁśatim

सर्वव्यापी न्यास करके, समाहितचित्त होकर तीन प्राणायाम, मूल मन्त्र से पच्चीस बार करे,

श्लोक 78 (skanda.2.70.78)

बध्नीयात्कवचं दिव्यं सर्वपापापनोदनम् । पूर्वे मां पातु गोविंदो वारिजाक्षस्तु दक्षिणे

badhnīyātkavacaṁ divyaṁ sarvapāpāpanodanam pūrve māṁ pātu goviṁdo vārijākṣastu dakṣiṇe

समस्त पापों का नाश करने वाला दिव्य कवच बाँधे — पूर्व में गोविन्द, दक्षिण में कमलनेत्र मेरी रक्षा करें;

श्लोक 79 (skanda.2.70.79)

प्रद्युम्नः पश्चिमे पातु हृषीकेशस्तथोत्तरे । आग्नेय्यां नरसिंहस्तु नैर्ऋत्यां मधुसूदनः

pradyumnaḥ paścime pātu hṛṣīkeśastathottare āgneyyāṁ narasiṁhastu nairṛtyāṁ madhusūdanaḥ

पश्चिम में प्रद्युम्न, उत्तर में हृषीकेश; आग्नेय में नृसिंह, नैर्ऋत्य में मधुसूदन रक्षा करें;

श्लोक 80 (skanda.2.70.80)

वायव्यां श्रीधरः पातु ऐशान्यां च गदाधरः । ऊर्ध्वं त्रिविक्रमः पातु अधो वाराहरूपधृक्

vāyavyāṁ śrīdharaḥ pātu aiśānyāṁ ca gadādharaḥ ūrdhvaṁ trivikramaḥ pātu adho vārāharūpadhṛk

वायव्य में श्रीधर, ऐशान्य में गदाधर रक्षा करें; ऊपर त्रिविक्रम, नीचे वराहरूपधारी रक्षा करें;

श्लोक 81 (skanda.2.70.81)

सर्वत्र पातु मां देवः शंखचक्रगदाधरः । नारायणो मनः पातु चैतन्यं गरुडध्वजः

sarvatra pātu māṁ devaḥ śaṁkhacakragadādharaḥ nārāyaṇo manaḥ pātu caitanyaṁ garuḍadhvajaḥ

सर्वत्र शंख-चक्र-गदाधारी देव मेरी रक्षा करें; नारायण मन की, गरुड़ध्वज चैतन्य की रक्षा करें;

श्लोक 82 (skanda.2.70.82)

पातु मे बुद्ध्यहंकारौ त्रिगुणात्मा जनार्दनः । इंद्रियाणि सदा पातु दैत्यवर्गनिकृन्तनः

pātu me buddhyahaṁkārau triguṇātmā janārdanaḥ iṁdriyāṇi sadā pātu daityavarganikṛntanaḥ

त्रिगुणात्मा जनार्दन बुद्धि और अहंकार की रक्षा करें; दैत्यसमूह के नाशक सदा इन्द्रियों की रक्षा करें।

श्लोक 83 (skanda.2.70.83)

एवं बद्ध्वा च कवचं निष्पापो जायते पुमान् । षोडशैरुपचारैश्च मनसा कल्पितैर्नरः

evaṁ baddhvā ca kavacaṁ niṣpāpo jāyate pumān ṣoḍaśairupacāraiśca manasā kalpitairnaraḥ

इस प्रकार कवच बाँधकर मनुष्य निष्पाप हो जाता है। सोलह मानसिक उपचारों से मनुष्य,

श्लोक 84 (skanda.2.70.84)

पुरुषोत्तमं पूजयित्वा यथावद्विधितो द्विजाः । आवाह्य मण्डले तस्मिन्देवदेवमनामयम्

puruṣottamaṁ pūjayitvā yathāvadvidhito dvijāḥ āvāhya maṇḍale tasmindevadevamanāmayam

हे द्विजो, विधिवत् पुरुषोत्तम की पूजा करके, उस मण्डल में अनामय देवाधिदेव का आवाहन करके,

श्लोक 85 (skanda.2.70.85)

पूजयित्वा विधानेन यथाशक्त्युपबृंहितैः । आत्मानं तीर्थराजस्य देवदेवस्य चिंतयन्

pūjayitvā vidhānena yathāśaktyupabṛṁhitaiḥ ātmānaṁ tīrtharājasya devadevasya ciṁtayan

अपनी शक्ति के अनुसार विधिपूर्वक पूजा करके, अपने आत्मा को तीर्थराज देवाधिदेव से एकाकार मानते हुए,

श्लोक 86 (skanda.2.70.86)

एवं बद्धांजलिपुटमिमं मन्त्रमुदीरयेत् । सुदर्शन नमस्तेऽस्तु कोटिसूर्यसमप्रभ

evaṁ baddhāṁjalipuṭamimaṁ mantramudīrayet sudarśana namaste'stu koṭisūryasamaprabha

इस प्रकार अंजलिबद्ध होकर यह मन्त्र कहे — हे सुदर्शन, तुम्हें नमस्कार, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी,

श्लोक 87 (skanda.2.70.87)

अज्ञानतिमिरांधस्य विष्णोर्मार्गं प्रदर्शय । एवं संप्रार्थ्य भो विप्रास्तीर्थराजजलांतिके

ajñānatimirāṁdhasya viṣṇormārgaṁ pradarśaya evaṁ saṁprārthya bho viprāstīrtharājajalāṁtike

अज्ञान-अंधकार से अंधे को विष्णु का मार्ग दिखाओ। इस प्रकार प्रार्थना करके, हे विप्रो, तीर्थराज के जल के निकट,

श्लोक 88 (skanda.2.70.88)

जानुभ्यामवनिं गत्वा प्रणमेद्भक्तिभावितः । तीर्थराज नमस्तुभ्यं जलरूपाय विष्णवे

jānubhyāmavaniṁ gatvā praṇamedbhaktibhāvitaḥ tīrtharāja namastubhyaṁ jalarūpāya viṣṇave

दोनों घुटनों से भूमि पर बैठकर भक्तिभाव से प्रणाम करे — हे तीर्थराज, तुम्हें नमस्कार, जलरूप विष्णु,

श्लोक 89 (skanda.2.70.89)

जीवनाय च जंतूनां परं निर्वाणहेतवे

jīvanāya ca jaṁtūnāṁ paraṁ nirvāṇahetave

जो प्राणियों के जीवन के लिए और परम निर्वाण के हेतु हो।

श्लोक 90 (skanda.2.70.90)

अग्निश्च ते योनिरिला च देहे रेतोधा विष्णोरमृतस्य नाभिः । उपैमि ते रूपमनन्यहेतुमानंदसंपन्नमप्रनुप्रविश्य

agniśca te yonirilā ca dehe retodhā viṣṇoramṛtasya nābhiḥ upaimi te rūpamananyahetumānaṁdasaṁpannamapranupraviśya

अग्नि तुम्हारी योनि है, पृथ्वी तुम्हारे शरीर में है; तुम रेतोधा हो, विष्णु के अमृत की नाभि हो। मैं तुम्हारे रूप का, जो अनन्य कारण, आनन्दयुक्त है, बिना किसी रुकावट के प्रवेश करता हूँ।

श्लोक 91 (skanda.2.70.91)

इति मन्त्रं पठन्विप्राः प्रविशेज्जलमध्यतः । आवाहयेत्तीर्थराजं भावयञ्जगतांपतिम्

iti mantraṁ paṭhanviprāḥ praviśejjalamadhyataḥ āvāhayettīrtharājaṁ bhāvayañjagatāṁpatim

यह मन्त्र पढ़ते हुए, हे विप्रो, जल के मध्य में प्रवेश करे; जगत् के स्वामी का चिन्तन करते हुए तीर्थराज का आवाहन करे,

श्लोक 92 (skanda.2.70.92)

जलाधीशं कृतस्नानफलदानेऽतः स्थितम् । अघमर्षणसूक्तेन नारायणयुतेन च

jalādhīśaṁ kṛtasnānaphaladāne'taḥ sthitam aghamarṣaṇasūktena nārāyaṇayutena ca

जल के अधीश्वर को, जो किए गए स्नान का फल देने के लिए वहाँ स्थित हैं, अघमर्षण सूक्त तथा नारायण सूक्त से युक्त करके,

श्लोक 93 (skanda.2.70.93)

त्रिरावृत्तेन कुर्वीत पञ्चवारुणकेन च । सकृदावाहनादीनि षडंगान्यभिषेचने

trirāvṛttena kurvīta pañcavāruṇakena ca sakṛdāvāhanādīni ṣaḍaṁgānyabhiṣecane

तीन बार आवृत्त करके, पाँच वारुण मन्त्रों से भी करे; आवाहन आदि छह अंग एक बार अभिषेक में करने चाहिए —

श्लोक 94 (skanda.2.70.94)

आवाहनं पुर प्रोक्तं सन्निधानमथोच्यते । स्नातुरिष्टफलप्राप्तौ सान्निध्यपरिकल्पनम्

āvāhanaṁ pura proktaṁ sannidhānamathocyate snāturiṣṭaphalaprāptau sānnidhyaparikalpanam

आवाहन पहले बताया गया, अब सान्निध्य कहा जाता है — स्नान करने वाले को अभीष्ट फल की प्राप्ति के लिए देवता की समीपता की कल्पना करनी चाहिए;

श्लोक 95 (skanda.2.70.95)

अन्तःशुद्ध्यर्थमाचामेत्पीत्वा तदभिमंत्रितम् । बाह्यावयवशुद्ध्यर्थं मार्जयेत्कुशवारिणा

antaḥśuddhyarthamācāmetpītvā tadabhimaṁtritam bāhyāvayavaśuddhyarthaṁ mārjayetkuśavāriṇā

आन्तरिक शुद्धि के लिए अभिमन्त्रित जल पीकर आचमन करे; बाह्य अंगों की शुद्धि के लिए कुश-जल से मार्जन करे,

श्लोक 96 (skanda.2.70.96)

अंतर्बहिर्विशुद्ध्यर्थं मन्त्रपूतेन वारिणा । त्रीनंजलीन्मूर्ध्नि सिंचेत्सिंधौ नांतर्जले जपः

aṁtarbahirviśuddhyarthaṁ mantrapūtena vāriṇā trīnaṁjalīnmūrdhni siṁcetsiṁdhau nāṁtarjale japaḥ

भीतर-बाहर की शुद्धि के लिए मन्त्रपूत जल से; शिर पर तीन अंजलि सींचे — सागर के जल में डूबे रहते हुए जप नहीं किया जाता,

श्लोक 97 (skanda.2.70.97)

त्रिः स्नानायात्स्वकृताघानि कोटिजन्मकृतानि च । प्लावितानि जले तस्मिन्भावयन्नघनाशनम्

triḥ snānāyātsvakṛtāghāni koṭijanmakṛtāni ca plāvitāni jale tasminbhāvayannaghanāśanam

तीन बार स्नान के लिए; उस जल में पापनाशक देव का चिन्तन करते हुए, अपने द्वारा किए गए तथा करोड़ों जन्मों के पाप बह जाते हैं।

श्लोक 98 (skanda.2.70.98)

उत्थायाचम्य विधिवत्प्रार्थयेन्मन्त्रमुच्चरन् । त्वमग्निर्जगतां नाथ रेतोधाः कामदीपनः

utthāyācamya vidhivatprārthayenmantramuccaran tvamagnirjagatāṁ nātha retodhāḥ kāmadīpanaḥ

उठकर, विधिपूर्वक आचमन करके, मन्त्र का उच्चारण करते हुए प्रार्थना करे — तुम अग्नि हो, हे जगत् के नाथ, रेतोधा, काम को प्रज्वलित करने वाले,

श्लोक 99 (skanda.2.70.99)

प्रधानं सर्वभूतानां जीवानां प्रभुरव्यय । अमृतस्यारणिस्त्वं हि देवयोनिरपांपते

pradhānaṁ sarvabhūtānāṁ jīvānāṁ prabhuravyaya amṛtasyāraṇistvaṁ hi devayonirapāṁpate

समस्त प्राणियों के मूल, जीवों के अव्यय प्रभु; तुम अमृत की अरणि हो, देवयोनि, हे जलों के स्वामी —

श्लोक 100 (skanda.2.70.100)

वृजिनं हर मे सर्वं तीर्थराज नमोस्तु ते । जन्मकोटिसहस्रेषु यत्पापं पूर्वमर्जितम्

vṛjinaṁ hara me sarvaṁ tīrtharāja namostu te janmakoṭisahasreṣu yatpāpaṁ pūrvamarjitam

मेरे समस्त पाप को हरो, हे तीर्थराज, तुम्हें नमस्कार! हजारों करोड़ों जन्मों में पूर्व में जो पाप अर्जित हुआ है,

श्लोक 101 (skanda.2.70.101)

तदशेषं लयं यातु देहि मे ब्रह्म शाश्वतम् । स्नात्वापि च ततस्तीरमुत्तीर्याचम्य वाग्यतः

tadaśeṣaṁ layaṁ yātu dehi me brahma śāśvatam snātvāpi ca tatastīramuttīryācamya vāgyataḥ

वह सब समाप्त हो जाए; मुझे शाश्वत ब्रह्म प्रदान करो। स्नान करके, तट पर आकर, मौन रहते हुए आचमन करके,

श्लोक 102 (skanda.2.70.102)

धारयेद्वाससी शुक्ले पुंड्रकानुज्ज्वलाकृतीन् । शंखचक्रगदापद्मतिलकानि च भक्तितः

dhārayedvāsasī śukle puṁḍrakānujjvalākṛtīn śaṁkhacakragadāpadmatilakāni ca bhaktitaḥ

शुक्ल वस्त्र धारण करे और उज्ज्वल पुण्ड्र-तिलक — शंख, चक्र, गदा, पद्म के — भक्तिपूर्वक धारण करे,

श्लोक 103 (skanda.2.70.103)

देवान्पितॄन्यथान्यायं चिंतयन्भगवद्धिया । तर्प्पयेद्विधिवद्विप्राः सम्यगव्यग्रमानसः

devānpitṝnyathānyāyaṁ ciṁtayanbhagavaddhiyā tarppayedvidhivadviprāḥ samyagavyagramānasaḥ

और, हे विप्रो, अव्यग्र मन से भगवद्भाव से देवताओं और पितरों का यथान्याय चिन्तन करते हुए विधिपूर्वक तर्पण करे।

श्लोक 104 (skanda.2.70.104)

ततः पूर्ववदालिख्य मण्डलं चोत्तरामुखः । पूजयेन्मूलमन्त्रेण मन्त्रैरेभिश्च भक्तितः

tataḥ pūrvavadālikhya maṇḍalaṁ cottarāmukhaḥ pūjayenmūlamantreṇa mantrairebhiśca bhaktitaḥ

तत्पश्चात् पूर्ववत् मण्डल बनाकर, उत्तराभिमुख होकर, मूल मन्त्र से तथा इन मन्त्रों से भक्तिपूर्वक पूजा करे,

श्लोक 105 (skanda.2.70.105)

नारायणं चतुर्बाहुं शंखचक्रगदाधरम् । धरारमाभ्यां सहितं केवलं वा द्विजोत्तमाः । ध्यात्वांतर्यागसंतुष्टं बहिरावाहयेत्ततः

nārāyaṇaṁ caturbāhuṁ śaṁkhacakragadādharam dharāramābhyāṁ sahitaṁ kevalaṁ vā dvijottamāḥ dhyātvāṁtaryāgasaṁtuṣṭaṁ bahirāvāhayettataḥ

हे द्विजोत्तमो, चतुर्भुज नारायण का, शंख-चक्र-गदाधारी का, पृथ्वी और लक्ष्मी सहित या अकेले ही ध्यान करके, अन्तर्याग से संतुष्ट होकर बाहर आवाहन करे —

श्लोक 106 (skanda.2.70.106)

आगच्छ परमानंद जगद्व्यापिञ्जगन्मय । अनुग्रहाय देवेश मण्डले सन्निधिं कुरु

āgaccha paramānaṁda jagadvyāpiñjaganmaya anugrahāya deveśa maṇḍale sannidhiṁ kuru

आओ, हे परमानन्द, जगत्व्यापी, जगन्मय! अनुग्रह के लिए, हे देवेश, इस मण्डल में सन्निधि करो।

श्लोक 107 (skanda.2.70.107)

चराचरमिदं सर्वं जगदत्र प्रतिष्ठितम् । तदन्तस्थस्त्वमेवेश आसनं कल्पयामि ते

carācaramidaṁ sarvaṁ jagadatra pratiṣṭhitam tadantasthastvameveśa āsanaṁ kalpayāmi te

यह सम्पूर्ण चराचर जगत् यहाँ प्रतिष्ठित है; उसके भीतर तुम्हीं, हे ईश, विराजमान हो। मैं तुम्हारे लिए आसन की कल्पना करता हूँ।

श्लोक 108 (skanda.2.70.108)

यस्य पादांबुजे धौते धर्मेण ब्रह्मरूपिणा । पुनाति तद्भवा गंगा जगत्पाद्यं ददाम्यहम्

yasya pādāṁbuje dhaute dharmeṇa brahmarūpiṇā punāti tadbhavā gaṁgā jagatpādyaṁ dadāmyaham

जिनके धोए गए ब्रह्मरूप धर्म के चरणकमल से गंगा उत्पन्न होकर जगत् को पवित्र करती है — जगत् के लिए वह पाद्य मैं तुम्हें देता हूँ।

श्लोक 109 (skanda.2.70.109)

अनर्घ्यरत्नघटितचूडामणिकरोत्करैः । ब्रह्मादयः पादपद्मं चिंतयंति दिने दिने । अनर्घ्यायजगद्धाम्ने अर्घ्यमेतद्ददाम्यहम्

anarghyaratnaghaṭitacūḍāmaṇikarotkaraiḥ brahmādayaḥ pādapadmaṁ ciṁtayaṁti dine dine anarghyāyajagaddhāmne arghyametaddadāmyaham

अमूल्य रत्नों से जड़ित चूड़ामणियों से युक्त हाथों वाले ब्रह्मा आदि जिनके चरणकमल का दिन-प्रतिदिन चिन्तन करते हैं — उस अमूल्य जगद्धाम को यह अर्घ्य मैं देता हूँ।

श्लोक 110 (skanda.2.70.110)

आचांतस्तीर्थराजो वै येनागस्त्यस्वरूपिणा । तस्मै सुवासितं वारि ददाम्याचमनीयकम्

ācāṁtastīrtharājo vai yenāgastyasvarūpiṇā tasmai suvāsitaṁ vāri dadāmyācamanīyakam

जिस अगस्त्यरूप द्वारा तीर्थराज (समुद्र) पिया गया था, उसे मैं यह सुवासित आचमनीय जल देता हूँ।

श्लोक 111 (skanda.2.70.111)

यः प्राप्य मधुसंपर्कं चकर्ष जलरूपिणम् । अशेषाघविकर्षाय मधुपर्कं ददाम्यहम्

yaḥ prāpya madhusaṁparkaṁ cakarṣa jalarūpiṇam aśeṣāghavikarṣāya madhuparkaṁ dadāmyaham

जो मधु के संपर्क से जलरूपी असुर को खींच लाए थे, समस्त पापों के हरण के लिए मैं उन्हें यह मधुपर्क देता हूँ।

श्लोक 112 (skanda.2.70.112)

यः क्रोडरूपमास्थाय प्रलयार्णवविप्लुताम् । उज्जहार धरामेतां स्नपयामि तमंभसा

yaḥ kroḍarūpamāsthāya pralayārṇavaviplutām ujjahāra dharāmetāṁ snapayāmi tamaṁbhasā

जिन्होंने वराहरूप धारण करके, प्रलयसागर में डूबी इस पृथ्वी का उद्धार किया — उन्हें मैं जल से स्नान कराता हूँ।

श्लोक 113 (skanda.2.70.113)

ब्रह्मांडकोटयो यस्य विश्वरूपस्य संवृतिः । आच्छादनाय सर्वेषां प्रददे वाससी शुभे

brahmāṁḍakoṭayo yasya viśvarūpasya saṁvṛtiḥ ācchādanāya sarveṣāṁ pradade vāsasī śubhe

जिनके विश्वरूप के आवरण में करोड़ों ब्रह्माण्ड समाए हुए हैं — सबके आच्छादन के लिए यह दो शुभ वस्त्र मैं देता हूँ।

श्लोक 114 (skanda.2.70.114)

विना येनानुष्ठितोऽपि यज्ञः स्यादकृतो ध्रुवः । तस्मै यज्ञेश्वरायेदमुपवीतं प्रकल्पये

vinā yenānuṣṭhito'pi yajñaḥ syādakṛto dhruvaḥ tasmai yajñeśvarāyedamupavītaṁ prakalpaye

जिनके बिना अनुष्ठित यज्ञ भी निश्चय ही अकृत हो जाता — उस यज्ञेश्वर को यह उपवीत मैं अर्पित करता हूँ।

श्लोक 115 (skanda.2.70.115)

यदंगसंगमासाय शोभंते भूषणानि वै । विश्वालंकृतये तस्मै भूषणानि प्रकल्पये

yadaṁgasaṁgamāsāya śobhaṁte bhūṣaṇāni vai viśvālaṁkṛtaye tasmai bhūṣaṇāni prakalpaye

जिनके अंगसंग से आभूषण भी सुशोभित होते हैं — विश्व के अलंकरण के लिए यह आभूषण मैं देता हूँ।

श्लोक 116 (skanda.2.70.116)

यदंगसंस्पर्शिमरुत्संगान्मलयजा द्रुमाः । सुगंधरससंपन्नास्तस्मै गंधानुलेपनम्

yadaṁgasaṁsparśimarutsaṁgānmalayajā drumāḥ sugaṁdharasasaṁpannāstasmai gaṁdhānulepanam

जिनके अंग-स्पर्शी वायु के संग से मलय के वृक्ष सुगंधित रस से युक्त होते हैं — उन्हें यह गंध-लेपन मैं देता हूँ।

श्लोक 117 (skanda.2.70.117)

यस्य संचितनादेव सौमनस्यं हतांहसाम् । तस्मै सुमनसां मालां सुगंधां परिकल्पये

yasya saṁcitanādeva saumanasyaṁ hatāṁhasām tasmai sumanasāṁ mālāṁ sugaṁdhāṁ parikalpaye

जिनके मात्र स्मरण से पापरहितों को सौमनस्य प्राप्त होता है — उन्हें यह सुगंधित पुष्पमाला मैं अर्पित करता हूँ।

श्लोक 118 (skanda.2.70.118)

यं चित्ते स्थिरमादाय भवाग्निपरिधूपनम् । जहाति तस्मै प्रददे सुगंधं धूपमुत्तमम्

yaṁ citte sthiramādāya bhavāgniparidhūpanam jahāti tasmai pradade sugaṁdhaṁ dhūpamuttamam

जिन्हें चित्त में स्थिर धारण करके मनुष्य संसार-अग्नि की धूनी छोड़ देता है — उन्हें यह उत्तम सुगंधित धूप मैं देता हूँ।

श्लोक 119 (skanda.2.70.119)

स्वतेजसाखिलमिदं दीपितं यस्य भासतः । तस्मै दीपप्रदीप्ताय दीपमेतं ददाम्यहम्

svatejasākhilamidaṁ dīpitaṁ yasya bhāsataḥ tasmai dīpapradīptāya dīpametaṁ dadāmyaham

जिनके स्वतेज से यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित है — उस दीप्तिमान को यह दीप मैं देता हूँ।

श्लोक 120 (skanda.2.70.120)

चराचरं जगत्सर्वमत्ति यो यश्च भावयेत् । अनेन च पुनः पुष्टौ तस्मादन्नं निवेदये

carācaraṁ jagatsarvamatti yo yaśca bhāvayet anena ca punaḥ puṣṭau tasmādannaṁ nivedaye

जो इस सम्पूर्ण चराचर जगत् को खाते और पुनः पोषण भी करते हैं — इसीलिए उन्हें यह अन्न मैं निवेदित करता हूँ।

श्लोक 121 (skanda.2.70.121)

यदीयमुखरागेण सहजावासितेन च । मोहिताः सुरसुंदर्यस्तस्मै तांबूलमुत्तमम्

yadīyamukharāgeṇa sahajāvāsitena ca mohitāḥ surasuṁdaryastasmai tāṁbūlamuttamam

जिनके स्वाभाविक सुगंधित मुख की लालिमा से देवसुंदरियाँ मोहित होती हैं — उन्हें यह उत्तम ताम्बूल मैं देता हूँ।

श्लोक 122 (skanda.2.70.122)

प्रदक्षिणप्रकमणाद्भवांगणविवर्त्तनम् । हंति यः करुणांभोधिस्तं नमामि जगद्गुरुम्

pradakṣiṇaprakamaṇādbhavāṁgaṇavivarttanam haṁti yaḥ karuṇāṁbhodhistaṁ namāmi jagadgurum

जिनकी प्रदक्षिणा मात्र से संसाररूपी आँगन का भ्रमण नष्ट हो जाता है, उस करुणासागर, जगद्गुरु को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 123 (skanda.2.70.123)

मंत्रास्तु कथिता ह्येत उपचारैः पृथक्पृथक् । आवाह्य चिंतयेद्देवं बहिःसंस्थितमात्मनः

maṁtrāstu kathitā hyeta upacāraiḥ pṛthakpṛthak āvāhya ciṁtayeddevaṁ bahiḥsaṁsthitamātmanaḥ

इस प्रकार ये मन्त्र प्रत्येक उपचार के साथ पृथक्-पृथक् बताए गए हैं। आवाहन करके देव का बाह्य स्थित रूप में चिन्तन करे,

श्लोक 124 (skanda.2.70.124)

रत्नसिहासनं दत्त्वा तत्रासीनं विचिंतयेत् । पादपद्मद्वये दद्यात्पाद्यं श्यामाकपंकजैः

ratnasihāsanaṁ dattvā tatrāsīnaṁ viciṁtayet pādapadmadvaye dadyātpādyaṁ śyāmākapaṁkajaiḥ

रत्नसिंहासन अर्पित करके उस पर विराजमान का ध्यान करे; चरणकमल-युगल के लिए श्यामाक-पद्मों सहित पाद्य अर्पित करे,

श्लोक 125 (skanda.2.70.125)

दूर्वापराजिताभ्यां च संस्कृतं मूलमंत्रणात् । सौवर्णे राजते वापि ताम्रे वा शंख एव वा

dūrvāparājitābhyāṁ ca saṁskṛtaṁ mūlamaṁtraṇāt sauvarṇe rājate vāpi tāmre vā śaṁkha eva vā

दूर्वा और अपराजिता से संस्कृत, मूलमन्त्र से पवित्र किया हुआ, सुवर्ण, चाँदी, ताम्र या शंख के पात्र में,

श्लोक 126 (skanda.2.70.126)

अर्घ्यं संस्कृत्य विधिवद्वारिचंदनपुष्पकैः । यवदूर्वाकुशाग्रैश्च फलसिद्धार्थकैस्तिलैः

arghyaṁ saṁskṛtya vidhivadvāricaṁdanapuṣpakaiḥ yavadūrvākuśāgraiśca phalasiddhārthakaistilaiḥ

जल, चन्दन, पुष्प, यव, दूर्वा, कुशाग्र, फल, सिद्धार्थ (सफेद सरसों) और तिल से विधिवत् संस्कृत अर्घ्य,

श्लोक 127 (skanda.2.70.127)

दूर्वाकुशाग्रैर्देवस्य मूर्ध्नि सिंचेत्तदग्रतः । सावशेषं क्षिपेद्भूमावेषोऽर्घविधिरीरितः

dūrvākuśāgrairdevasya mūrdhni siṁcettadagrataḥ sāvaśeṣaṁ kṣipedbhūmāveṣo'rghavidhirīritaḥ

दूर्वा-कुशाग्र से देव के मस्तक पर आगे सींचे; शेष भूमि पर छोड़े — यह अर्घ्य-विधि कही गई है।

श्लोक 128 (skanda.2.70.128)

जातीफलैर्वा कंकोलैर्लवंगैः संस्कृतं जलम् । दद्यादाचमनार्थं तु मधुपर्कं ततो ददेत्

jātīphalairvā kaṁkolairlavaṁgaiḥ saṁskṛtaṁ jalam dadyādācamanārthaṁ tu madhuparkaṁ tato dadet

जायफल, कंकोल या लौंग से संस्कृत जल आचमन के लिए देना चाहिए; तत्पश्चात् मधुपर्क देना चाहिए,

श्लोक 129 (skanda.2.70.129)

मधुसर्पिर्युतं गव्यं दधि कांस्ये हि निर्मले । पात्रे स्थितं च पिहितं पात्रेणान्येन तादृशा । सुसंस्कृतं फलयुतं स्नपने जलमुच्यते

madhusarpiryutaṁ gavyaṁ dadhi kāṁsye hi nirmale pātre sthitaṁ ca pihitaṁ pātreṇānyena tādṛśā susaṁskṛtaṁ phalayutaṁ snapane jalamucyate

जो शहद और घी से युक्त गव्य दही से, स्वच्छ काँसे के पात्र में स्थित और दूसरे वैसे ही पात्र से ढका हुआ हो; फल-युक्त सुसंस्कृत जल स्नपन कहलाता है।

श्लोक 130 (skanda.2.70.130)

पट्टकौशेयकापासनिर्मिते वाससी शुभे । यथाशक्ति प्रदेये च वित्तशाठ्यं न कारयेत्

paṭṭakauśeyakāpāsanirmite vāsasī śubhe yathāśakti pradeye ca vittaśāṭhyaṁ na kārayet

रेशम, कौशेय या सूती वस्त्र से बने दो शुभ वस्त्र यथाशक्ति अर्पित करने चाहिए; धन में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 131 (skanda.2.70.131)

हारकेयूरमुकुटग्रैवेयादिकभूषणम् । यथाशक्ति यथास्थानं देवस्यांगे निवेशयेत्

hārakeyūramukuṭagraiveyādikabhūṣaṇam yathāśakti yathāsthānaṁ devasyāṁge niveśayet

हार, केयूर, मुकुट, ग्रैवेय आदि आभूषण यथाशक्ति यथास्थान देव के अंग पर पहनाने चाहिए।

श्लोक 132 (skanda.2.70.132)

उपवीतं हरेर्दद्यात्पट्टसूत्रविनिर्मितम् । कार्पासमथवा विप्रा गंधचंदनसंस्कृतम्

upavītaṁ harerdadyātpaṭṭasūtravinirmitam kārpāsamathavā viprā gaṁdhacaṁdanasaṁskṛtam

पट्टसूत्र या सूती धागे से बना, गंध-चन्दन से संस्कृत उपवीत, हे विप्रो, हरि को अर्पित करना चाहिए,

श्लोक 133 (skanda.2.70.133)

चंद्रचंदनकस्तूरीकुंकुमैरनुलेपनम्

caṁdracaṁdanakastūrīkuṁkumairanulepanam

तथा चन्दन, कस्तूरी और कुंकुम से अनुलेपन करना चाहिए।

श्लोक 134 (skanda.2.70.134)

तुलसीदलमालां च जातीपंकजचंपकैः । अशोकच्छुरपुन्नागनागकेसरकेसरैः

tulasīdalamālāṁ ca jātīpaṁkajacaṁpakaiḥ aśokacchurapunnāganāgakesarakesaraiḥ

तुलसीदल की माला तथा चमेली, कमल और चम्पा की, अशोक, पुन्नाग और नागकेसर के फूलों की,

श्लोक 135 (skanda.2.70.135)

अन्यैः सुगंधैः कुसुमैर्माला माल्यमथापि वा । मुक्तकानि च पुष्पाणि दद्याद्देवस्य मूर्द्धनि

anyaiḥ sugaṁdhaiḥ kusumairmālā mālyamathāpi vā muktakāni ca puṣpāṇi dadyāddevasya mūrddhani

तथा अन्य सुगंधित पुष्पों की माला अथवा माल्य अर्पित करने चाहिए; बिखरे फूल देव के मस्तक पर चढ़ाने चाहिए।

श्लोक 136 (skanda.2.70.136)

माला सा प्रपदीनातु माल्यं कंठोरुसंमितम् । गर्भकं केशमध्ये तु मूर्ध्नि पुष्पांजलिं क्षिपेत्

mālā sā prapadīnātu mālyaṁ kaṁṭhorusaṁmitam garbhakaṁ keśamadhye tu mūrdhni puṣpāṁjaliṁ kṣipet

पैरों तक पहुँचने वाली माला, कंठ-वक्ष तक की माल्य, केशों में गर्भक — मस्तक पर पुष्पांजलि डालनी चाहिए।

श्लोक 137 (skanda.2.70.137)

सगुग्गुल्वगुरूशीरसिताज्यमधुचंदनैः । धूपं दद्यात्सुगंधाढ्यं दीपं गोसर्पिषा शुभम् । कर्पूरगर्भया वर्त्या तिलतैलेन वा ददेत्

saguggulvagurūśīrasitājyamadhucaṁdanaiḥ dhūpaṁ dadyātsugaṁdhāḍhyaṁ dīpaṁ gosarpiṣā śubham karpūragarbhayā vartyā tilatailena vā dadet

गुग्गुल, अगुरु, खस, सफेद घी, शहद और चन्दन से युक्त सुगंधित धूप, तथा गाय के घी का शुभ दीप, कपूरयुक्त बत्ती या तिल के तेल से देना चाहिए।

श्लोक 138 (skanda.2.70.138)

अखंडितसमुद्धौतं शालितंडुलनिर्मितम् । सुपक्वमन्नं सुरभि सर्पिषा च सुवासितम्

akhaṁḍitasamuddhautaṁ śālitaṁḍulanirmitam supakvamannaṁ surabhi sarpiṣā ca suvāsitam

अखंडित, भलीभाँति धोए गए शालि चावल से बना, भलीभाँति पका हुआ, सुगंधित, घी से सुवासित अन्न,

श्लोक 139 (skanda.2.70.139)

सौरभेयदधिक्षीरपक्वरंभासितायुतम् । नानाव्यंजनसंकीर्णं सोपदंशं सपूपकम्

saurabheyadadhikṣīrapakvaraṁbhāsitāyutam nānāvyaṁjanasaṁkīrṇaṁ sopadaṁśaṁ sapūpakam

सुगंधित दही, दूध, पके केले और शक्कर से युक्त; विविध व्यंजनों, अचार और पूओं से मिश्रित,

श्लोक 140 (skanda.2.70.140)

नानाफलयुतं हृद्यं सुगंधं सुरसं नवम् । नैवेद्यं देवदेवस्य प्रस्थादूनं न शस्यते

nānāphalayutaṁ hṛdyaṁ sugaṁdhaṁ surasaṁ navam naivedyaṁ devadevasya prasthādūnaṁ na śasyate

विविध फलों से युक्त, मनभावन, सुगंधित, स्वादिष्ट, ताजा — देवाधिदेव का नैवेद्य एक प्रस्थ से कम नहीं होना चाहिए।

श्लोक 141 (skanda.2.70.141)

धूपे दीपे च नैवेद्ये स्नानेऽर्घे मधुपर्कके । वस्त्रे यज्ञोपवीते च दद्यादाचमनीयकम्

dhūpe dīpe ca naivedye snāne'rghe madhuparkake vastre yajñopavīte ca dadyādācamanīyakam

धूप, दीप, नैवेद्य, स्नान, अर्घ्य, मधुपर्क, वस्त्र और यज्ञोपवीत के बाद आचमनीय जल देना चाहिए,

श्लोक 142 (skanda.2.70.142)

अन्यत्र केवलं वारि संस्कृतं त्वौपचारिकम् । नैवेद्यांते त्वाचमनं दद्याच्च करघृष्टिकम्

anyatra kevalaṁ vāri saṁskṛtaṁ tvaupacārikam naivedyāṁte tvācamanaṁ dadyācca karaghṛṣṭikam

अन्यत्र केवल संस्कृत जल औपचारिक रूप से; नैवेद्य के बाद आचमन तथा हाथ धोने का जल देना चाहिए।

श्लोक 143 (skanda.2.70.143)

सगंधचंदनं विप्रास्तांबूलं च ददेत्ततः । सकर्पूरलवंगैलाजातीक्रमुकसंयुतम्

sagaṁdhacaṁdanaṁ viprāstāṁbūlaṁ ca dadettataḥ sakarpūralavaṁgailājātīkramukasaṁyutam

तत्पश्चात्, हे विप्रो, गंध-चन्दन युक्त ताम्बूल देना चाहिए, कपूर, लौंग, इलायची, जायफल और सुपारी से युक्त,

श्लोक 144 (skanda.2.70.144)

अष्टोत्तरशतं जप्त्वा मूलमंत्रमनन्यधीः । स्तुत्वा प्रदक्षिणं कृत्वा प्रार्थयेत्पुरुषोत्तमम्

aṣṭottaraśataṁ japtvā mūlamaṁtramananyadhīḥ stutvā pradakṣiṇaṁ kṛtvā prārthayetpuruṣottamam

तथा एकाग्रचित्त होकर मूल मन्त्र का एक सौ आठ बार जप करके, स्तुति और प्रदक्षिणा करके पुरुषोत्तम से प्रार्थना करे —

श्लोक 145 (skanda.2.70.145)

देवदेव जगन्नाथ सर्वतीर्थप्रवर्त्तक । सर्वतीर्थमयश्चासि सर्वदेवमय प्रभो

devadeva jagannātha sarvatīrthapravarttaka sarvatīrthamayaścāsi sarvadevamaya prabho

हे देवाधिदेव जगन्नाथ, समस्त तीर्थों के प्रवर्तक! तुम्हीं समस्त तीर्थमय और समस्त देवमय हो, हे प्रभो!

श्लोक 146 (skanda.2.70.146)

त्वत्प्रसादान्मया तीर्थराजे स्नानं हि यत्कृतम् । तदस्तु सफलं देव यथोक्तफलदो भव

tvatprasādānmayā tīrtharāje snānaṁ hi yatkṛtam tadastu saphalaṁ deva yathoktaphalado bhava

तुम्हारी कृपा से मैंने तीर्थराज में जो स्नान किया है, वह सफल हो, हे देव; यथोक्त फल देने वाले बनो।

श्लोक 147 (skanda.2.70.147)

सिंधुराजस्त्वं च विभो द्रवरूपोऽस्यसंशयम् । पापालये निमग्नं मां परित्राहि नमोऽस्तु ते

siṁdhurājastvaṁ ca vibho dravarūpo'syasaṁśayam pāpālaye nimagnaṁ māṁ paritrāhi namo'stu te

तुम सिन्धुराज हो, हे विभो, निःसंदेह द्रवरूप हो; पापों के आवास में डूबे मुझे बचाओ, तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 148 (skanda.2.70.148)

इत्थं प्रपूज्य देवेशं नारायणमनामयम् । तीर्थराजकृतस्नानः सर्वतीर्थफलं लभेत्

itthaṁ prapūjya deveśaṁ nārāyaṇamanāmayam tīrtharājakṛtasnānaḥ sarvatīrthaphalaṁ labhet

इस प्रकार अनामय नारायण, देवेश की पूजा करके, तीर्थराज में स्नान किया हुआ व्यक्ति समस्त तीर्थों का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 149 (skanda.2.70.149)

गवां कोटिप्रदानेन क्रतुकोटिकृतेन च । कोटिब्राह्मणभोज्येन महादानैश्च कोटिशः । यत्पुण्यं कर्मिणां प्रोक्तं तदनेन हि लभ्यते

gavāṁ koṭipradānena kratukoṭikṛtena ca koṭibrāhmaṇabhojyena mahādānaiśca koṭiśaḥ yatpuṇyaṁ karmiṇāṁ proktaṁ tadanena hi labhyate

करोड़ों गौओं के दान से, करोड़ों यज्ञों से, करोड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराने से और करोड़ों महादानों से — कर्मियों के लिए जो पुण्य कहा गया है, वह इसी से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 150 (skanda.2.70.150)

ध्यानं दानं तपो जाप्यं श्राद्धं च सुरपूजनम् । सिंधुराजे कृतं सर्वं कोटिकोटिगुणं भवेत्

dhyānaṁ dānaṁ tapo jāpyaṁ śrāddhaṁ ca surapūjanam siṁdhurāje kṛtaṁ sarvaṁ koṭikoṭiguṇaṁ bhavet

ध्यान, दान, तप, जप, श्राद्ध और देवपूजन — सिन्धुराज में किया गया यह सब करोड़ों-करोड़ गुना हो जाता है।

श्लोक 151 (skanda.2.70.151)

अपि नः स कुले कश्चित्सिंधुस्नायी भविष्यति । देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च दास्यते च तिलोदकम्

api naḥ sa kule kaścitsiṁdhusnāyī bhaviṣyati devebhyaśca pitṛbhyaśca dāsyate ca tilodakam

क्या हमारे कुल में भी कोई सिन्धु-स्नान करने वाला होगा, जो देवताओं और पितरों को तिलोदक देगा —

श्लोक 152 (skanda.2.70.152)

क्रंदंति सर्वपापानि संभ्रांताः सर्वपातकाः । अनिष्टानि पलायन्ते सिंधुस्नानोद्यतस्य वै

kraṁdaṁti sarvapāpāni saṁbhrāṁtāḥ sarvapātakāḥ aniṣṭāni palāyante siṁdhusnānodyatasya vai

ऐसा सोचकर समस्त पाप भयभीत होकर क्रन्दन करते हैं; सिन्धु-स्नान के लिए उद्यत व्यक्ति से समस्त अनिष्ट भाग जाते हैं।

श्लोक 153 (skanda.2.70.153)

अन्यतीर्थे कृतं पापं सिंधुतीरे विनश्यति । सिंधुतीरे कृतं पापं सिधुस्नाने विनश्यति

anyatīrthe kṛtaṁ pāpaṁ siṁdhutīre vinaśyati siṁdhutīre kṛtaṁ pāpaṁ sidhusnāne vinaśyati

अन्य तीर्थ में किया गया पाप सिन्धुतट पर नष्ट हो जाता है; सिन्धुतट पर किया गया पाप सिन्धु-स्नान से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 154 (skanda.2.70.154)

सिंधुस्नानरतं नित्यं दृष्ट्वैव यमकिङ्कराः । दिशो दश पलायन्ते सिंहं दृष्ट्वा यथा मृगाः

siṁdhusnānarataṁ nityaṁ dṛṣṭvaiva yamakiṁkarāḥ diśo daśa palāyante siṁhaṁ dṛṣṭvā yathā mṛgāḥ

सदा सिन्धु-स्नान में रत व्यक्ति को देखते ही यमदूत, सिंह को देखकर मृगों की भाँति, दसों दिशाओं में भाग जाते हैं।

श्लोक 155 (skanda.2.70.155)

यमोऽपि भीतस्तं दृष्ट्वा प्रणिपत्य प्रपूज्य च । न शक्नोति तदा स्थातुं तस्याग्रे पुण्यकर्मिणः

yamo'pi bhītastaṁ dṛṣṭvā praṇipatya prapūjya ca na śaknoti tadā sthātuṁ tasyāgre puṇyakarmiṇaḥ

यम भी उसे देखकर भयभीत होकर, प्रणाम और पूजा करके, उस पुण्यकर्मी के सामने खड़े नहीं रह पाते।

श्लोक 156 (skanda.2.70.156)

वांछंति देवता नित्यं मानुष्यं प्राप्नुयामहे । सम्यक्शुद्धतन्वो भूत्वा सिंधुस्नानं लभेमहि

vāṁchaṁti devatā nityaṁ mānuṣyaṁ prāpnuyāmahe samyakśuddhatanvo bhūtvā siṁdhusnānaṁ labhemahi

देवता सदा यह चाहते हैं — हमें मनुष्य-जन्म प्राप्त हो, और भलीभाँति शुद्ध शरीर होकर हमें सिन्धु-स्नान प्राप्त हो!

श्लोक 157 (skanda.2.70.157)

मेरुमन्दरमात्रोऽपि राशिः पापस्य कर्मणः । सिंधुस्नानेन दग्धः स्यात्तूलराशिरिवानलात्

merumandaramātro'pi rāśiḥ pāpasya karmaṇaḥ siṁdhusnānena dagdhaḥ syāttūlarāśirivānalāt

मेरु और मन्दराचल के समान भी पाप-कर्म की राशि सिन्धु-स्नान से इस प्रकार जल जाती है जैसे अग्नि से रुई का ढेर।

श्लोक 158 (skanda.2.70.158)

अप्सु नारायणं देवं स्नानकाले स्मरेत्सदा । साक्षाद्विष्णुस्वरूपेऽत्र सिंधौ चैव विशेषतः

apsu nārāyaṇaṁ devaṁ snānakāle smaretsadā sākṣādviṣṇusvarūpe'tra siṁdhau caiva viśeṣataḥ

स्नान के समय जल में सदा नारायण देव का स्मरण करना चाहिए, विशेषतः यहाँ सिन्धु में, जो साक्षात् विष्णुस्वरूप है।

श्लोक 159 (skanda.2.70.159)

ब्रह्मघ्नो वा सुरापो वा गोघ्नो वा पञ्चपातकी । सर्वे ते निष्कृतिं यांति सिंधुस्नानान्न संशयः

brahmaghno vā surāpo vā goghno vā pañcapātakī sarve te niṣkṛtiṁ yāṁti siṁdhusnānānna saṁśayaḥ

चाहे कोई ब्रह्महत्यारा हो, या सुरापायी, या गोहत्यारा, या पंचमहापातकी — वे सभी सिन्धु-स्नान से निःसंदेह मुक्ति पाते हैं।

श्लोक 160 (skanda.2.70.160)

कपिलाकोटिदानाच्च सिन्धुस्नानं विशिष्यते । सकृत्सिंध्ववगाहेन कुलकोटिं समुद्धरेत्

kapilākoṭidānācca sindhusnānaṁ viśiṣyate sakṛtsiṁdhvavagāhena kulakoṭiṁ samuddharet

करोड़ों कपिला गौओं के दान से भी सिन्धु-स्नान श्रेष्ठ है; एक बार सिन्धु में डुबकी लगाने से कुल की करोड़ों पीढ़ियाँ उद्धृत हो जाती हैं।

श्लोक 161 (skanda.2.70.161)

सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वेष्वायतनेषु च । तत्फलं लभते सर्वं सिन्धुस्नानान्न संशयः

sarvatīrtheṣu yatpuṇyaṁ sarveṣvāyataneṣu ca tatphalaṁ labhate sarvaṁ sindhusnānānna saṁśayaḥ

समस्त तीर्थों में तथा समस्त आयतनों में जो पुण्य है, वह सम्पूर्ण फल सिन्धु-स्नान से निःसंदेह प्राप्त होता है।

श्लोक 162 (skanda.2.70.162)

य इच्छेत्सफलं जन्म जीवितं श्रुतमेव वा । स पितॄंस्तर्पयेत्सिंधुमभिगम्य सुरांस्तथा

ya icchetsaphalaṁ janma jīvitaṁ śrutameva vā sa pitṝṁstarpayetsiṁdhumabhigamya surāṁstathā

जो सफल जन्म, जीवन तथा श्रुत ज्ञान चाहता है, उसे सिन्धु के पास जाकर पितरों तथा देवताओं का तर्पण करना चाहिए।

श्लोक 163 (skanda.2.70.163)

चत्वारः सुलभा वेदाः सषडंग पदक्रमाः । सुलभानि कुरुक्षेत्रे दानानि विविधानि च

catvāraḥ sulabhā vedāḥ saṣaḍaṁga padakramāḥ sulabhāni kurukṣetre dānāni vividhāni ca

षडंग और पदक्रम सहित चारों वेद सुलभ हैं; कुरुक्षेत्र में विविध प्रकार के दान भी सुलभ हैं;

श्लोक 164 (skanda.2.70.164)

चांद्रायणानि कृच्छ्राणि तपांसि सुलभान्यपि । अग्निष्टोमादयो यज्ञाः सुलभा बहुदक्षिणाः

cāṁdrāyaṇāni kṛcchrāṇi tapāṁsi sulabhānyapi agniṣṭomādayo yajñāḥ sulabhā bahudakṣiṇāḥ

चान्द्रायण और कृच्छ्र तप भी सुलभ हैं; अग्निष्टोम आदि बहुदक्षिणा यज्ञ भी सुलभ हैं;

श्लोक 165 (skanda.2.70.165)

सिन्धुतोयैश्च सलिलैर्दुर्लभं पितृतर्पणम् । मासं तर्पणमात्रेण पिंडानां पातनेन च

sindhutoyaiśca salilairdurlabhaṁ pitṛtarpaṇam māsaṁ tarpaṇamātreṇa piṁḍānāṁ pātanena ca

परन्तु सिन्धु के जल से पितृतर्पण दुर्लभ है — एक मास के तर्पण मात्र से तथा पिंडदान से,

श्लोक 166 (skanda.2.70.166)

सिन्धौ वै पितरः सर्वे विमानान्सूर्यवर्चसः । सिन्धुतर्पणसंतुष्टाः श्राद्धपिंडसुतर्पिताः । आरुह्य सहसा यांति ब्रह्मलोकं सनातनम्

sindhau vai pitaraḥ sarve vimānānsūryavarcasaḥ sindhutarpaṇasaṁtuṣṭāḥ śrāddhapiṁḍasutarpitāḥ āruhya sahasā yāṁti brahmalokaṁ sanātanam

सिन्धु में सभी पितर सूर्य के समान तेजस्वी विमानों पर, सिन्धु-तर्पण से संतुष्ट होकर, श्राद्ध-पिंडों से भलीभाँति तृप्त होकर, तुरन्त चढ़कर सनातन ब्रह्मलोक को चले जाते हैं।

श्लोक 167 (skanda.2.70.167)

आद्यंतयोर्जगन्नाथं पूजयित्वा यथाविधि । तीर्थराजेऽभिषिच्य स्वं नरः स्यान्मुक्तिभाजनम्

ādyaṁtayorjagannāthaṁ pūjayitvā yathāvidhi tīrtharāje'bhiṣicya svaṁ naraḥ syānmuktibhājanam

आदि और अन्त में विधिपूर्वक जगन्नाथ की पूजा करके, तीर्थराज में स्वयं का अभिषेक करके, मनुष्य मुक्ति का पात्र बन जाता है।

श्लोक 168 (skanda.2.70.168)

ततस्तीर्थविसर्गं च कृत्वा शुद्धमनाः पुमान् । रामं कृष्णं सुभद्रां च नत्वा रूपं विचिन्तयेत्

tatastīrthavisargaṁ ca kṛtvā śuddhamanāḥ pumān rāmaṁ kṛṣṇaṁ subhadrāṁ ca natvā rūpaṁ vicintayet

तत्पश्चात् तीर्थ-विसर्जन करके, शुद्धमन व्यक्ति राम, कृष्ण और सुभद्रा को प्रणाम करके उनके रूप का चिन्तन करे।

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