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वैष्णव खण्ड · अध्याय 71

नृसिंह-सरोवर और स्नान-दर्शन की महिमा

अध्याय 70अध्याय-सूचीअध्याय 72

श्लोक 1 (skanda.2.71.1)

जैमिनिरुवाच । कृतकृत्यं तदात्मानं मन्यमानस्ततो व्रजेत् । अश्वमेधांगसंभूतमिंद्रद्युम्नसरः प्रति

jaiminiruvāca kṛtakṛtyaṁ tadātmānaṁ manyamānastato vrajet aśvamedhāṁgasaṁbhūtamiṁdradyumnasaraḥ prati

जैमिनि ने कहा — अपने आप को कृतकृत्य मानते हुए तत्पश्चात् अश्वमेध के अंश से उत्पन्न इन्द्रद्युम्न-सरोवर की ओर जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.2.71.2)

यस्य तीरे निवसति नरसिंहाकृतिर्हरिः । नरसिंहमनुप्रार्थ्य तत्र स्नायाद्यथाविधि

yasya tīre nivasati narasiṁhākṛtirhariḥ narasiṁhamanuprārthya tatra snāyādyathāvidhi

जिसके तट पर नृसिंहरूपी हरि निवास करते हैं; नृसिंह से प्रार्थना करके वहाँ विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.2.71.3)

नरसिंह नमस्तुभ्यं यस्य ते क्षेत्र उत्तमे । सहस्रं वाजिमेधस्य क्रतोश्चक्रे नृपोत्तमः

narasiṁha namastubhyaṁ yasya te kṣetra uttame sahasraṁ vājimedhasya kratoścakre nṛpottamaḥ

हे नृसिंह, तुम्हें नमस्कार, जिनके इस उत्तम क्षेत्र में नृपश्रेष्ठ ने सहस्र अश्वमेध यज्ञ किए थे।

श्लोक 4 (skanda.2.71.4)

इन्द्रद्युम्नः प्रसादात्ते तस्य क्रत्वंगसंभवे । सरसि स्नातुमायातो मामनुज्ञापय प्रभो

indradyumnaḥ prasādātte tasya kratvaṁgasaṁbhave sarasi snātumāyāto māmanujñāpaya prabho

तुम्हारी कृपा से इन्द्रद्युम्न ने यह किया; मैं उसी यज्ञ के अंश से उत्पन्न इस सरोवर में स्नान करने आया हूँ — हे प्रभो, मुझे अनुज्ञा दो।

श्लोक 5 (skanda.2.71.5)

ततस्तीर्थतटं गत्वा कृतशौचाचमक्रियः । प्रार्थयेदंजलिं कृत्वा इमं मंत्रमुदीरयेत्

tatastīrthataṭaṁ gatvā kṛtaśaucācamakriyaḥ prārthayedaṁjaliṁ kṛtvā imaṁ maṁtramudīrayet

तत्पश्चात् तीर्थतट पर जाकर, शौच और आचमन करके, अंजलि बाँधकर यह मन्त्र कहते हुए प्रार्थना करे —

श्लोक 6 (skanda.2.71.6)

अश्वमेधांगगोकोटिखुरक्षुण्णमहीतलः । तन्मूत्रफेनादानांभः पूरिताखिलपावनः

aśvamedhāṁgagokoṭikhurakṣuṇṇamahītalaḥ tanmūtraphenādānāṁbhaḥ pūritākhilapāvanaḥ

अश्वमेध के अंगभूत करोड़ों गौओं के खुरों से खोदी गई भूमि वाला, उनके मूत्र-फेन से बने जल से परिपूर्ण, समस्त पवित्रताओं से युक्त —

श्लोक 7 (skanda.2.71.7)

स्नातुं तवागतः पुण्ये सर्वतीर्थमये जले । पूर्वजन्मसहस्रोत्थं पापं स्नानाद्विमोचय

snātuṁ tavāgataḥ puṇye sarvatīrthamaye jale pūrvajanmasahasrotthaṁ pāpaṁ snānādvimocaya

तुझमें स्नान करने आया हूँ, हे पुण्यमय, समस्त तीर्थों से युक्त जल! पूर्वजन्मों के सहस्र में उत्पन्न पाप को स्नान से मुक्त करो।

श्लोक 8 (skanda.2.71.8)

अन्तः प्रविश्य च ततो वारुणैः पंचभिर्द्विजाः । स्नायादन्तर्जले जप्यात्त्रिरावृत्त्याघमर्षणम्

antaḥ praviśya ca tato vāruṇaiḥ paṁcabhirdvijāḥ snāyādantarjale japyāttrirāvṛttyāghamarṣaṇam

तत्पश्चात्, हे द्विजो, भीतर प्रवेश करके पाँच वारुण मन्त्रों से, जल के भीतर तीन बार अघमर्षण का जप करके स्नान करे —

श्लोक 9 (skanda.2.71.9)

अश्वमेधांगसंभूत तीर्थ सर्वाघनाशन । जन्मकोटिभवं पापं त्वयि स्नानाद्विनश्यतु

aśvamedhāṁgasaṁbhūta tīrtha sarvāghanāśana janmakoṭibhavaṁ pāpaṁ tvayi snānādvinaśyatu

हे अश्वमेध के अंग से उत्पन्न तीर्थ, समस्त पापों के नाशक! तुझमें स्नान से करोड़ों जन्मों में उत्पन्न पाप नष्ट हो।

श्लोक 10 (skanda.2.71.10)

इमं मन्त्रं त्रिरुच्चार्य त्रिः स्नायात्तज्जले द्विजाः । संस्मरेद्विष्णुगायत्र्या नरसिंहाकृतिं हरिम्

imaṁ mantraṁ triruccārya triḥ snāyāttajjale dvijāḥ saṁsmaredviṣṇugāyatryā narasiṁhākṛtiṁ harim

इस मन्त्र को तीन बार उच्चारण करके, हे द्विजो, उस जल में तीन बार स्नान करे, और विष्णु-गायत्री से नृसिंहरूपी हरि का स्मरण करे।

श्लोक 11 (skanda.2.71.11)

आपो नारा इति प्रोक्ता यस्मात्ता नरसूनवः । अयनं प्रथमं चास्य तस्मादप्सु हरिं स्मरेत्

āpo nārā iti proktā yasmāttā narasūnavaḥ ayanaṁ prathamaṁ cāsya tasmādapsu hariṁ smaret

जल को 'नार' कहा गया है क्योंकि वे नर की सन्तान हैं; और चूँकि यह हरि का प्रथम शयनस्थान है, इसलिए जल में हरि का स्मरण करना चाहिए।

श्लोक 12 (skanda.2.71.12)

देवानृषीन्पितॄंश्चैव तर्पयेद्विधिवन्नरः । नरसिंहं ततो गच्छेत्पश्चिमाभिमुखं स्थितम्

devānṛṣīnpitṝṁścaiva tarpayedvidhivannaraḥ narasiṁhaṁ tato gacchetpaścimābhimukhaṁ sthitam

मनुष्य को विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों तथा पितरों का तर्पण करना चाहिए; तत्पश्चात् पश्चिमाभिमुख स्थित नृसिंह के पास जाना चाहिए।

श्लोक 13 (skanda.2.71.13)

सिद्धं शंभुं कृत्रिमं वा पश्चिमाभिमुखं हरिम् । दृष्ट्वा विमुच्यते पापैर्जन्मकोटिसमुद्भवैः

siddhaṁ śaṁbhuṁ kṛtrimaṁ vā paścimābhimukhaṁ harim dṛṣṭvā vimucyate pāpairjanmakoṭisamudbhavaiḥ

चाहे स्वयंभू हो या मनुष्यनिर्मित, पश्चिमाभिमुख हरि को देखकर मनुष्य करोड़ों जन्मों में उत्पन्न पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 14 (skanda.2.71.14)

तमाथर्वणमंत्रेण यजेच्च नरकेसरिम् । नारदेन पुरा ह्येष मंत्रराजः प्रतिष्ठितः

tamātharvaṇamaṁtreṇa yajecca narakesarim nāradena purā hyeṣa maṁtrarājaḥ pratiṣṭhitaḥ

उस नरकेसरी की अथर्ववेदोक्त मन्त्र से पूजा करनी चाहिए; यह मन्त्रराज पूर्वकाल में नारद द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था,

श्लोक 15 (skanda.2.71.15)

इन्द्रद्युम्नेन तेनैव चिरादेष उपासितः । नरसिंहाकृतौ नान्यो मंत्रस्तत्सदृशो द्विजाः

indradyumnena tenaiva cirādeṣa upāsitaḥ narasiṁhākṛtau nānyo maṁtrastatsadṛśo dvijāḥ

और उन्हीं इन्द्रद्युम्न द्वारा दीर्घकाल तक उपासित हुआ; नृसिंहरूप के लिए इसके समान अन्य कोई मन्त्र नहीं है, हे द्विजो,

श्लोक 16 (skanda.2.71.16)

यस्योच्चारणमात्रेण तुष्टो भवति केसरी । अनेन दारुवर्ष्मापि ब्रह्मणा संप्रतिष्ठितः

yasyoccāraṇamātreṇa tuṣṭo bhavati kesarī anena dāruvarṣmāpi brahmaṇā saṁpratiṣṭhitaḥ

जिसके मात्र उच्चारण से केसरी प्रसन्न हो जाते हैं; इसी मन्त्र से यह काष्ठमय शरीर भी ब्रह्मा द्वारा प्रतिष्ठित हुआ।

श्लोक 17 (skanda.2.71.17)

पूर्वोक्तैरुपचारैस्तु पूजयेन्नरकेसरिम् । जपाप्रसूनैररुणैरन्यैश्चैव सुगंधिभिः

pūrvoktairupacāraistu pūjayennarakesarim japāprasūnairaruṇairanyaiścaiva sugaṁdhibhiḥ

पूर्वोक्त उपचारों से नरकेसरी की पूजा करनी चाहिए, जपापुष्प तथा अन्य सुगंधित लाल फूलों से,

श्लोक 18 (skanda.2.71.18)

चंदनागरुकर्पूरैर्लेपयेन्नरकेसरिम् । पायसं सितया युक्तं सौरभेयेण सर्पिषा

caṁdanāgarukarpūrairlepayennarakesarim pāyasaṁ sitayā yuktaṁ saurabheyeṇa sarpiṣā

चन्दन, अगुरु और कपूर से नरकेसरी का लेपन करना चाहिए; शक्कर से युक्त, गौघी से मिश्रित खीर,

श्लोक 19 (skanda.2.71.19)

कर्पूरखण्डसंयुक्तान्मोदकान्घृतपाचितान् । संयावान्घृतपूपांश्च फलं नानाविधं तथा

karpūrakhaṇḍasaṁyuktānmodakānghṛtapācitān saṁyāvānghṛtapūpāṁśca phalaṁ nānāvidhaṁ tathā

कपूर-खण्ड से युक्त, घी में पकाए मोदक, संयाव तथा घृतयुक्त पूए, और विविध प्रकार के फल भी,

श्लोक 20 (skanda.2.71.20)

शर्करादधिसंयुक्तं शाल्यन्नं विनिवेदयेत् । दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा नमस्कृत्वा संपूज्य नरकेसरिम्

śarkarādadhisaṁyuktaṁ śālyannaṁ vinivedayet dṛṣṭvā spṛṣṭvā namaskṛtvā saṁpūjya narakesarim

शक्कर और दही से युक्त शालि-चावल निवेदित करने चाहिए। नरकेसरी को देखकर, स्पर्श करके, नमस्कार करके और पूजकर,

श्लोक 21 (skanda.2.71.21)

स्वान्स्वानभीष्टानाप्नोति नरो वै नात्र संशयः । देवत्वममरेशत्वं गंधर्वत्वं च भो द्विजाः

svānsvānabhīṣṭānāpnoti naro vai nātra saṁśayaḥ devatvamamareśatvaṁ gaṁdharvatvaṁ ca bho dvijāḥ

मनुष्य अपनी सभी अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त करता है, इसमें संदेह नहीं। देवत्व, इन्द्रत्व, गन्धर्वत्व, हे द्विजो,

श्लोक 22 (skanda.2.71.22)

ईशित्वं च वशित्वं च सार्वभौमत्वमेव वा । यद्यत्कामयते चित्ते तत्तदाप्नोत्यसंशयम्

īśitvaṁ ca vaśitvaṁ ca sārvabhaumatvameva vā yadyatkāmayate citte tattadāpnotyasaṁśayam

ईशित्व, वशित्व, या सार्वभौमत्व — जो-जो मन में चाहता है, वह-वह निःसंदेह प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 23 (skanda.2.71.23)

पंचतीर्थीविधानं च कथितं पृच्छतां द्विजाः । दिनानि पंच कृत्वैतां पञ्चभूतमये पुनः

paṁcatīrthīvidhānaṁ ca kathitaṁ pṛcchatāṁ dvijāḥ dināni paṁca kṛtvaitāṁ pañcabhūtamaye punaḥ

हे द्विजो, तुम्हारे पूछने पर पंचतीर्थी-विधान बताया गया। पाँच दिनों तक इसे करके, इस पंचभूतमय शरीर में पुनः

श्लोक 24 (skanda.2.71.24)

न देहे प्रविशेन्मर्त्यो व्रती विष्णुपरायणः । पौर्णमास्यां प्रत्युषसि तीर्थराजजले पुनः

na dehe praviśenmartyo vratī viṣṇuparāyaṇaḥ paurṇamāsyāṁ pratyuṣasi tīrtharājajale punaḥ

विष्णुपरायण व्रती मनुष्य को शरीर पर संयम रखना चाहिए; पूर्णिमा को प्रातःकाल तीर्थराज के जल में पुनः

श्लोक 25 (skanda.2.71.25)

पूर्वोक्तविधिना स्नात्वा शुद्धाहारो जितेंद्रियः । एकभक्तव्रतेनैव वर्त्तते प्रीतये नरः । यावत्पंच दिनानि स्युस्तावत्कालं द्विजोत्तमाः

pūrvoktavidhinā snātvā śuddhāhāro jiteṁdriyaḥ ekabhaktavratenaiva varttate prītaye naraḥ yāvatpaṁca dināni syustāvatkālaṁ dvijottamāḥ

पूर्वोक्त विधि से स्नान करके, शुद्ध आहार वाला, जितेन्द्रिय मनुष्य एकभक्त व्रत से भगवान् की प्रसन्नता के लिए रहे, जब तक ये पाँच दिन पूर्ण न हों, हे द्विजोत्तमो।

श्लोक 26 (skanda.2.71.26)

ततः प्रविश्यप्रासादं मंचस्थं पुरुषोत्तमम् । रामं सुभद्रां दृष्ट्वा च मुच्यते पापकंचुकैः

tataḥ praviśyaprāsādaṁ maṁcasthaṁ puruṣottamam rāmaṁ subhadrāṁ dṛṣṭvā ca mucyate pāpakaṁcukaiḥ

तत्पश्चात् प्रासाद में प्रवेश करके, मंच पर स्थित पुरुषोत्तम, राम और सुभद्रा का दर्शन करके, मनुष्य पापरूपी कंचुक से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 27 (skanda.2.71.27)

सर्वतीर्थमयात्कूपादुद्धृतेन सुगन्धिना । वारिणा स्नाप्यमानं तु यो ज्यैष्ठ्यां पश्यते हरिम्

sarvatīrthamayātkūpāduddhṛtena sugandhinā vāriṇā snāpyamānaṁ tu yo jyaiṣṭhyāṁ paśyate harim

जो ज्येष्ठ मास में समस्त तीर्थमय कुएँ से निकाले गए सुगंधित जल से स्नान कराए जाते हुए हरि को देखता है,

श्लोक 28 (skanda.2.71.28)

न तस्य पापसंबंध आत्मनि प्रभविष्यति । यात्राकर्तृविधिं वक्ष्ये शृणुध्वं मुनयः परम्

na tasya pāpasaṁbaṁdha ātmani prabhaviṣyati yātrākartṛvidhiṁ vakṣye śṛṇudhvaṁ munayaḥ param

उसके आत्मा में पाप का संबंध कभी नहीं होगा। अब मैं यात्रा करने वालों की विधि बताऊँगा, हे मुनियो, आगे सुनिए।

श्लोक 29 (skanda.2.71.29)

चतुर्दश्यां दृढं मंचं कारयित्वा सुशोभनम् । तृणकाष्ठमयं लिप्तं सुधया बहुलं शुभम्

caturdaśyāṁ dṛḍhaṁ maṁcaṁ kārayitvā suśobhanam tṛṇakāṣṭhamayaṁ liptaṁ sudhayā bahulaṁ śubham

चतुर्दशी को दृढ़, अत्यन्त सुशोभित मंच बनवाकर, तृण-काष्ठ से निर्मित, चूने से भलीभाँति लिपा हुआ, अत्यन्त शुभ,

श्लोक 30 (skanda.2.71.30)

अथवा दार्षदं कुर्याच्चिरस्थायि द्विजोत्तमाः । स्नानार्थं देवदेवस्य वित्तशाठ्यं न कारयेत्

athavā dārṣadaṁ kuryāccirasthāyi dvijottamāḥ snānārthaṁ devadevasya vittaśāṭhyaṁ na kārayet

या पत्थर का ही बनवाना चाहिए, ताकि वह चिरस्थायी रहे, हे द्विजोत्तमो; देवाधिदेव के स्नान के लिए धन में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 31 (skanda.2.71.31)

नानाद्रुमगणाकीर्णं दक्षिणानिलशीतलम् । उल्लसत्सिंधुकल्लोलशाड्वलोपरि संस्कृतम्

nānādrumagaṇākīrṇaṁ dakṣiṇānilaśītalam ullasatsiṁdhukallolaśāḍvalopari saṁskṛtam

विविध वृक्षसमूहों से युक्त, दक्षिणी वायु से शीतल, समुद्र की चमकती लहरों के बीच घास के मैदान पर तैयार किया गया,

श्लोक 32 (skanda.2.71.32)

समुच्छ्रितमहामूल्यवितानवरशोभितम् । विरलाच्छादनं कुर्याद्देवानां दर्शनाय वै

samucchritamahāmūlyavitānavaraśobhitam viralācchādanaṁ kuryāddevānāṁ darśanāya vai

ऊँचे, अत्यंत मूल्यवान, उत्कृष्ट वितान से सुशोभित; आवरण विरल रखना चाहिए, ताकि देवता उसे देख सकें,

श्लोक 33 (skanda.2.71.33)

आयांति ब्रह्मणा सार्द्धं स्नपनाय जगत्पतेः । स्वर्गंगांभः समादाय पारिजातविभूषितम्

āyāṁti brahmaṇā sārddhaṁ snapanāya jagatpateḥ svargaṁgāṁbhaḥ samādāya pārijātavibhūṣitam

क्योंकि देवता ब्रह्मा सहित जगत्पति के स्नान के लिए स्वर्गगंगा का जल लेकर, पारिजात से विभूषित होकर आते हैं,

श्लोक 34 (skanda.2.71.34)

ब्रह्मर्षयश्च त्रिदशा ब्रह्मणा सहिता विभुम् । मंचस्थं स्नापयन्तीह वचनात्परमेष्ठिनः

brahmarṣayaśca tridaśā brahmaṇā sahitā vibhum maṁcasthaṁ snāpayantīha vacanātparameṣṭhinaḥ

ब्रह्मर्षि तथा तैंतीस देवता, ब्रह्माजी सहित, परमेष्ठी के वचन से मंच पर स्थित विभु को स्नान कराते हैं।

श्लोक 35 (skanda.2.71.35)

जयशब्दैश्च स्तुतिभिर्वंद्योऽयं त्रिदिवौकसाम् । तस्मान्मंचस्तु कर्तव्यो मंडितो माल्यचामरैः

jayaśabdaiśca stutibhirvaṁdyo'yaṁ tridivaukasām tasmānmaṁcastu kartavyo maṁḍito mālyacāmaraiḥ

वे स्वर्गवासियों द्वारा जय-जयकार और स्तुतियों से वंदित होते हैं; इसलिए मंच माला और चामरों से सुसज्जित बनाना चाहिए,

श्लोक 36 (skanda.2.71.36)

नानामणिस्रजा हारिदुकूलकृततोरणम् । सुगंधधूपसुरभिचंदनाभः समुक्षितम्

nānāmaṇisrajā hāridukūlakṛtatoraṇam sugaṁdhadhūpasurabhicaṁdanābhaḥ samukṣitam

विविध मणियों की माला, सुंदर रेशमी वस्त्र से बना तोरण, तथा सुगंधित धूप और चन्दन-जल से सिंचित।

श्लोक 37 (skanda.2.71.37)

एवं मंचं प्रतिष्ठाप्य तस्य दक्षिणतो द्विजाः । कूपाद्वारि समुद्धृत्य कलशान्स्वर्णनिर्मितान्

evaṁ maṁcaṁ pratiṣṭhāpya tasya dakṣiṇato dvijāḥ kūpādvāri samuddhṛtya kalaśānsvarṇanirmitān

इस प्रकार मंच स्थापित करके, हे द्विजो, उसके दक्षिण में, कुएँ से जल निकालकर स्वर्णकलशों में,

श्लोक 38 (skanda.2.71.38)

शालायां शास्त्रदृष्टेन विधिना त्वधिवासयेत्

śālāyāṁ śāstradṛṣṭena vidhinā tvadhivāsayet

शास्त्रोक्त विधि से शाला में अधिवास करना चाहिए।

श्लोक 39 (skanda.2.71.39)

सुवासितं जलं तेषु पावमान्या प्रपूरयेत् । चतुर्दशीनिशामध्ये कर्मैतत्समुदाहृतम्

suvāsitaṁ jalaṁ teṣu pāvamānyā prapūrayet caturdaśīniśāmadhye karmaitatsamudāhṛtam

उन कलशों में सुवासित जल पावमानी मन्त्र से भरना चाहिए; चतुर्दशी की रात्रि के मध्य में यह कर्म बताया गया है।

श्लोक 40 (skanda.2.71.40)

शनैः शनैश्च नीयासुर्हरिं हलि पुरःसरम् । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या राज्ञा संमानितादृताः

śanaiḥ śanaiśca nīyāsurhariṁ hali puraḥsaram brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyā rājñā saṁmānitādṛtāḥ

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, राजा द्वारा सम्मानित होकर, धीरे-धीरे हरि को हल (बलराम) आगे करके ले जाएँ,

श्लोक 41 (skanda.2.71.41)

चामरैस्तालवृन्तैश्च वीज्यमानं निरंतरम् । पुराकृतामलेपं तं विष्णोरंगान्न हापयेत्

cāmaraistālavṛntaiśca vījyamānaṁ niraṁtaram purākṛtāmalepaṁ taṁ viṣṇoraṁgānna hāpayet

चामर और ताल-पंखों से निरन्तर हवा करते हुए; पूर्व में लगाया गया लेप विष्णु के अंगों से न मिटने दें।

श्लोक 42 (skanda.2.71.42)

यथा सुगंधलेपेन सुपुष्टांगो दिने दिने । तथा प्रयत्नतः कार्यः कृशांगो न हि पुष्टिकृत्

yathā sugaṁdhalepena supuṣṭāṁgo dine dine tathā prayatnataḥ kāryaḥ kṛśāṁgo na hi puṣṭikṛt

जैसे सुगंधित लेप से देव दिन-प्रतिदिन सुपुष्ट अंग वाले दिखें, वैसे ही प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए — कृशांग कभी न दिखें, इससे शोभा नहीं बढ़ती।

श्लोक 43 (skanda.2.71.43)

नयेयुरप्रमाद्यंतो भगवंतमानदिताः । प्रमादतो यदि भवेत्पतनं मुरवैरिणः

nayeyurapramādyaṁto bhagavaṁtamānaditāḥ pramādato yadi bhavetpatanaṁ muravairiṇaḥ

भगवान् को ले जाने वाले हर्षित होकर बिना किसी प्रमाद के ले जाएँ; क्योंकि प्रमाद से यदि मुरवैरि (कृष्ण) का,

श्लोक 44 (skanda.2.71.44)

बलस्य वा सुभद्राया राज्ञो राज्यस्य भीतिकृत् । अपि पातयतां हानिः संततेर्बहुदुःखिता

balasya vā subhadrāyā rājño rājyasya bhītikṛt api pātayatāṁ hāniḥ saṁtaterbahuduḥkhitā

या बल का, या सुभद्रा का पतन हो जाए, तो यह राजा और राज्य के लिए भयकारी होगा; और गिराने वालों की संतति को बहुत दुःख और हानि होगी,

श्लोक 45 (skanda.2.71.45)

नरके नियतं वासो भवेत्तेषां दुरात्मनाम् । विमुह्यंतश्चिराद्दारुमयीयं प्रतिमा कथम्

narake niyataṁ vāso bhavetteṣāṁ durātmanām vimuhyaṁtaścirāddārumayīyaṁ pratimā katham

और उन दुरात्माओं का नरक में निश्चित निवास होगा। किन्तु जो मोहवश दीर्घकाल तक यह सोचते रहें — यह काष्ठमय प्रतिमा कैसे [ऐसा कर सकती है]?

श्लोक 46 (skanda.2.71.46)

तिष्ठेदविश्वसंतो ये भगवद्द्रोहिणस्तु ते । नरकं प्रतिपद्यंते सर्वकर्मबहिष्कृताः

tiṣṭhedaviśvasaṁto ye bhagavaddrohiṇastu te narakaṁ pratipadyaṁte sarvakarmabahiṣkṛtāḥ

और जो अविश्वासी बने रहें — वे भगवद्द्रोही समस्त कर्मों के फल से वंचित होकर नरक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 47 (skanda.2.71.47)

मूढानां नास्तिकानां च कृतघ्नानां हतात्मनाम् । धर्मकृत्येषु जायंते अविश्वासस्य युक्तयः

mūḍhānāṁ nāstikānāṁ ca kṛtaghnānāṁ hatātmanām dharmakṛtyeṣu jāyaṁte aviśvāsasya yuktayaḥ

मूर्खों, नास्तिकों, कृतघ्नों और नष्ट-आत्माओं में धर्मकार्यों के प्रति अविश्वास के ये तर्क उत्पन्न होते हैं —

श्लोक 48 (skanda.2.71.48)

अदृष्टं यस्य यावद्धि स तु तेन विनिर्मितः । तदंते तस्य क्षीयंते प्रासादप्रतिमादयः

adṛṣṭaṁ yasya yāvaddhi sa tu tena vinirmitaḥ tadaṁte tasya kṣīyaṁte prāsādapratimādayaḥ

जिसका जितना अदृष्ट (पुण्य) है, उसी से यह बना है; उस पुण्य के क्षीण होने पर प्रासाद, प्रतिमा आदि नष्ट हो जाएँगे;

श्लोक 49 (skanda.2.71.49)

न चायं निर्मितः केन द्रुमः सोऽपि प्रवर्द्धितः । वरं ददाति या नूनं न चासौ प्रतिमा मता

na cāyaṁ nirmitaḥ kena drumaḥ so'pi pravarddhitaḥ varaṁ dadāti yā nūnaṁ na cāsau pratimā matā

और यह वृक्ष किसने बनाया? यह तो स्वयं ही बढ़ा; निश्चय ही यह प्रतिमा वर देती है, ऐसा नहीं माना जाता।

श्लोक 50 (skanda.2.71.50)

निर्मितायां प्रतिकृतौ पुरा मन्वंतरादिषु । व्यतीतेष्वपि वर्द्धंते जनानां च सुपर्वणाम्

nirmitāyāṁ pratikṛtau purā manvaṁtarādiṣu vyatīteṣvapi varddhaṁte janānāṁ ca suparvaṇām

किन्तु पूर्व मन्वन्तरों आदि में भी, जब ऐसी प्रतिमाएँ बनाई गईं, बीत जाने पर भी मनुष्यों और देवताओं की भक्ति उनके प्रति सदा बढ़ती रही —

श्लोक 51 (skanda.2.71.51)

भक्तयस्तादृशो विप्राः सर्वेषां पृथिवीक्षिताम् । स्वारोचिषेंऽतरे चैव आविर्भूतः कृपानिधिः

bhaktayastādṛśo viprāḥ sarveṣāṁ pṛthivīkṣitām svārociṣeṁ'tare caiva āvirbhūtaḥ kṛpānidhiḥ

ऐसी ही भक्ति, हे विप्रो, समस्त पृथ्वीपतियों की थी। स्वारोचिष मन्वन्तर में भी यह करुणानिधि प्रकट हुए,

श्लोक 52 (skanda.2.71.52)

वैवस्वतेंऽतरे सप्तविंशे चैव चतुर्युगे । द्वापरांते समायातौ तदा कृष्णार्जुनावुभौ

vaivasvateṁ'tare saptaviṁśe caiva caturyuge dvāparāṁte samāyātau tadā kṛṣṇārjunāvubhau

तथा वैवस्वत मन्वन्तर के सत्ताईसवें चतुर्युग में, द्वापर के अन्त में, कृष्ण और अर्जुन दोनों यहाँ आए,

श्लोक 53 (skanda.2.71.53)

त्रिदिनानि स्थितावत्र व्रतस्थौ मधुसूदनम् । भक्त्या संपूज्य तं स्तुत्वा जग्मतुर्द्वारकां पुनः

tridināni sthitāvatra vratasthau madhusūdanam bhaktyā saṁpūjya taṁ stutvā jagmaturdvārakāṁ punaḥ

और तीन दिन तक व्रतस्थ रहकर, भक्तिपूर्वक मधुसूदन की पूजा और स्तुति करके, पुनः द्वारका को लौट गए।

श्लोक 54 (skanda.2.71.54)

न केऽपि तत्त्वं जानंति मानुषीं तनुमास्थिताः । अवताराः प्रवर्तंते विष्णोरस्य युगेयुगे

na ke'pi tattvaṁ jānaṁti mānuṣīṁ tanumāsthitāḥ avatārāḥ pravartaṁte viṣṇorasya yugeyuge

मानव-शरीर में स्थित कोई भी उनका वास्तविक तत्त्व नहीं जानता; इस विष्णु के अवतार युग-युग में होते रहते हैं

श्लोक 55 (skanda.2.71.55)

धर्मस्थापनया विप्रा लीयंते स्वपदे पुनः । पूर्वं च ब्रह्मणा प्रोक्तः स चानेन परस्परम्

dharmasthāpanayā viprā līyaṁte svapade punaḥ pūrvaṁ ca brahmaṇā proktaḥ sa cānena parasparam

धर्म की स्थापना के लिए, हे विप्रो, और पुनः अपने ही पद में लीन हो जाते हैं। और यह पहले ब्रह्मा द्वारा उनसे तथा उनके द्वारा ब्रह्मा से परस्पर कहा गया था —

श्लोक 56 (skanda.2.71.56)

स्थाता परार्द्धपर्यंतं भगवान्दारुरूपधृक् । सदायं वरदो विष्णुः शुद्धसत्त्वेन भावितः

sthātā parārddhaparyaṁtaṁ bhagavāndārurūpadhṛk sadāyaṁ varado viṣṇuḥ śuddhasattvena bhāvitaḥ

काष्ठरूप धारण करने वाले भगवान् परार्ध पर्यन्त यहाँ स्थित रहेंगे; यह वरदायक विष्णु शुद्ध सत्त्व से भावना करने वाले पर सदा कृपा करते हैं;

श्लोक 57 (skanda.2.71.57)

यस्य यावांस्तु विश्वासस्तस्य सिद्धिस्तु तावती । प्रमादीकृतविश्वासो भक्तो दृढमतिः पुमान्

yasya yāvāṁstu viśvāsastasya siddhistu tāvatī pramādīkṛtaviśvāso bhakto dṛḍhamatiḥ pumān

जिसका जितना विश्वास है, उसकी उतनी ही सिद्धि होती है। दृढ़ मति वाला भक्त, जिसका विश्वास दूसरों के प्रमाद से डिगता नहीं,

श्लोक 58 (skanda.2.71.58)

यत्नानुरूपं लभते फलमस्मात्सुदुर्लभम् । पुरा वः कथितं सर्वमंबरीषविमोचनम्

yatnānurūpaṁ labhate phalamasmātsudurlabham purā vaḥ kathitaṁ sarvamaṁbarīṣavimocanam

अपने प्रयत्न के अनुरूप, अत्यन्त दुर्लभ फल प्राप्त करता है। पूर्वकाल में तुम्हें अंबरीष की मुक्ति की सम्पूर्ण कथा बताई गई थी —

श्लोक 59 (skanda.2.71.59)

ततस्तस्मिञ्जगन्नाथे परमात्मस्वरूपिणि । विधाय सुदृढां भक्तिं वसध्वं पुरुषोत्तमे

tatastasmiñjagannāthe paramātmasvarūpiṇi vidhāya sudṛḍhāṁ bhaktiṁ vasadhvaṁ puruṣottame

इसलिए उस परमात्मस्वरूप जगन्नाथ में दृढ़ भक्ति स्थापित करके, इस पुरुषोत्तम में निवास करो।

श्लोक 60 (skanda.2.71.60)

अतोऽयं भक्तितो नेयः श्रीकृष्णमंच उत्तमः । सुभद्राबलभद्रौ च राजवत्परिचर्य वै

ato'yaṁ bhaktito neyaḥ śrīkṛṣṇamaṁca uttamaḥ subhadrābalabhadrau ca rājavatparicarya vai

इसलिए इस उत्तम श्रीकृष्ण को भक्तिपूर्वक मंच पर ले जाना चाहिए, तथा सुभद्रा और बलभद्र को भी राजा के समान सेवा-सत्कार सहित,

श्लोक 61 (skanda.2.71.61)

उत्तोलितेषु च्छत्रेषु चामरैर्वीजितेषु च । कालागुरुसुधूपासु दिक्षु गंभीरनादिषु

uttoliteṣu cchatreṣu cāmarairvījiteṣu ca kālāgurusudhūpāsu dikṣu gaṁbhīranādiṣu

छत्र ऊँचे उठाए हुए, चामर हिलाए जाते हुए, दिशाएँ काले अगुरु की सुगंधित धूप से भरी हुई, गंभीर ध्वनियों से गूँजती हुई,

श्लोक 62 (skanda.2.71.62)

नानाविधेषु वाद्येषु त्वगारे परिपूरिते । तौर्यत्रिके साधुवृत्ते दीपिका श्रेणिराजिते

nānāvidheṣu vādyeṣu tvagāre paripūrite tauryatrike sādhuvṛtte dīpikā śreṇirājite

विविध वाद्ययंत्रों से भरे मन्दिर में, सुंदर त्रिविध संगीत-नृत्य-गान के साथ, दीपकों की पंक्तियों से सुशोभित,

श्लोक 63 (skanda.2.71.63)

अंधकारेऽथ सर्वेषां वर्द्धमाने महोत्सवे । आच्छन्ने श्रीपतेरंगे प्रमादपरिशंकया

aṁdhakāre'tha sarveṣāṁ varddhamāne mahotsave ācchanne śrīpateraṁge pramādapariśaṁkayā

अंधकार में, महोत्सव के बढ़ते हुए, किसी प्रमाद की आशंका से श्रीपति के अंग को ढककर,

श्लोक 64 (skanda.2.71.64)

पटुपट्टदुकूलेषु नीयमानेषु दूरतः । गतेर्वेगात्तदोत्तानीकृतास्ये जगतां गुरौ

paṭupaṭṭadukūleṣu nīyamāneṣu dūrataḥ gatervegāttadottānīkṛtāsye jagatāṁ gurau

सुंदर रेशमी वस्त्रों में लिपटे हुए, दूर से ले जाए जाते हुए; और गति की तीव्रता से जब जगत्गुरु का मुख ऊपर की ओर उठ जाए,

श्लोक 65 (skanda.2.71.65)

आवर्त्तदृष्टयो देवा दिवारोहणशंकिनः । जयस्व राम कृष्णेति जय भद्रेति चोचिरे

āvarttadṛṣṭayo devā divārohaṇaśaṁkinaḥ jayasva rāma kṛṣṇeti jaya bhadreti cocire

तब देवता, आशंका से भरी घूमती दृष्टि से, कहीं वे स्वर्ग को न चढ़ जाएँ, यह सोचकर पुकार उठे — जय हो राम! जय कृष्ण! जय भद्रे!

श्लोक 66 (skanda.2.71.66)

एवं सलीलं भगवाञ्जन्मज्यैष्ठ्याभिषेचने । नीयते मंचदेशं तु निशीथे ब्राह्मणादिभिः

evaṁ salīlaṁ bhagavāñjanmajyaiṣṭhyābhiṣecane nīyate maṁcadeśaṁ tu niśīthe brāhmaṇādibhiḥ

इस प्रकार लीलापूर्वक भगवान्, जन्म-ज्येष्ठ के अभिषेक में, अर्धरात्रि में ब्राह्मण आदि द्वारा मंच के स्थान पर ले जाए जाते हैं।

श्लोक 67 (skanda.2.71.67)

अहंपूर्विकशब्दस्तु देवानां श्रूयते दिवि । देवदुंदुभयश्चैव जयशब्दविमिश्रिताः

ahaṁpūrvikaśabdastu devānāṁ śrūyate divi devaduṁdubhayaścaiva jayaśabdavimiśritāḥ

स्वर्ग में देवताओं की होड़ लगाती हुई ध्वनि सुनाई देती है, तथा दिव्य दुंदुभियों की, जय-जयकार से मिश्रित ध्वनि।

श्लोक 68 (skanda.2.71.68)

ततो मंचस्थितं ब्रह्मरूपं प्रत्यर्चया सह । आच्छाद्य सर्वाण्यंगानि मुखवर्जं सुचेलकैः

tato maṁcasthitaṁ brahmarūpaṁ pratyarcayā saha ācchādya sarvāṇyaṁgāni mukhavarjaṁ sucelakaiḥ

तत्पश्चात् मंच पर स्थित ब्रह्मरूप को, प्रतिमा-अर्चा सहित, मुख को छोड़कर सभी अंगों को सुंदर वस्त्रों से ढककर,

श्लोक 69 (skanda.2.71.69)

विना निवेद्यं संपूज्य उपचारैः पुरोदितैः । अधिवासितकुंभैश्च शांतिघोषपुरःसरम्

vinā nivedyaṁ saṁpūjya upacāraiḥ puroditaiḥ adhivāsitakuṁbhaiśca śāṁtighoṣapuraḥsaram

नैवेद्य को छोड़कर पूर्वोक्त उपचारों से पूजा करके, अधिवासित कलशों से, शांति-घोष को आगे करके,

श्लोक 70 (skanda.2.71.70)

समुदज्येष्ठामंत्रेण स्नापयेत्सुरपुंगवान् । पश्यतामभिषेक्तॄणां कृतकृत्यत्वहेतवे

samudajyeṣṭhāmaṁtreṇa snāpayetsurapuṁgavān paśyatāmabhiṣektṝṇāṁ kṛtakṛtyatvahetave

'समुदज्येष्ठा' मन्त्र से देवश्रेष्ठ का स्नान कराना चाहिए, ताकि देखने वाले अभिषेक करने वालों का उद्देश्य पूर्ण हो;

श्लोक 71 (skanda.2.71.71)

स्नाप्यमानं तु पश्यंति ये नरास्तत्र संस्थिताः । गर्भोदकेन स्नपनं न ते पुनरवाप्नुयुः

snāpyamānaṁ tu paśyaṁti ye narāstatra saṁsthitāḥ garbhodakena snapanaṁ na te punaravāpnuyuḥ

और जो मनुष्य वहाँ खड़े होकर स्नान कराए जाते हुए उन्हें देखते हैं, वे पुनः गर्भ के जल में स्नान (अर्थात् पुनर्जन्म) नहीं पाते।

श्लोक 72 (skanda.2.71.72)

ज्येष्ठस्नानं भगवतो ये पश्यंति मुदान्विताः । न ते भवाब्धौ मज्जंति यात्रामुत्कंठमानसाः

jyeṣṭhasnānaṁ bhagavato ye paśyaṁti mudānvitāḥ na te bhavābdhau majjaṁti yātrāmutkaṁṭhamānasāḥ

जो लोग हर्षित होकर भगवान् का ज्येष्ठ-स्नान देखते हैं, यात्रा के लिए उत्कण्ठित मन वाले, वे संसारसागर में नहीं डूबते।

श्लोक 73 (skanda.2.71.73)

बुद्ध्यबुद्धिकृतः पुंसामनादिः पापसंचयः । तत्क्षणान्नाशमायाति पश्यतां स्नपनं हरेः

buddhyabuddhikṛtaḥ puṁsāmanādiḥ pāpasaṁcayaḥ tatkṣaṇānnāśamāyāti paśyatāṁ snapanaṁ hareḥ

जान-अनजान में किए गए मनुष्यों के अनादि पापसमूह उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं जो हरि के स्नान को देखते हैं।

श्लोक 74 (skanda.2.71.74)

सत्यं सत्यं पुनः सत्यं ब्रवीमि द्विजपुंगवाः । सर्वसंतापशमनमशेषमलनाशनम्

satyaṁ satyaṁ punaḥ satyaṁ bravīmi dvijapuṁgavāḥ sarvasaṁtāpaśamanamaśeṣamalanāśanam

सत्य, सत्य, पुनः सत्य मैं कहता हूँ, हे द्विजश्रेष्ठो — समस्त संतापों को शान्त करने वाला, समस्त मल का नाश करने वाला,

श्लोक 75 (skanda.2.71.75)

स्नपनं श्रीपतेर्ज्यैष्ठ्यां यदि भक्त्या विलोकनम् । प्रायश्चित्तनिमित्तानि यानि पापानि संति वै

snapanaṁ śrīpaterjyaiṣṭhyāṁ yadi bhaktyā vilokanam prāyaścittanimittāni yāni pāpāni saṁti vai

ज्येष्ठ में श्रीपति का स्नपन है, यदि भक्तिपूर्वक देखा जाए। जो भी पाप प्रायश्चित्त के योग्य हैं,

श्लोक 76 (skanda.2.71.76)

तानि सर्वाणि क्षीयंते पश्यतां स्नपनं हरेः । नातः परतरं कर्म ह्यनायासेन मोचनम्

tāni sarvāṇi kṣīyaṁte paśyatāṁ snapanaṁ hareḥ nātaḥ parataraṁ karma hyanāyāsena mocanam

वे सभी हरि का स्नपन देखने वालों के नष्ट हो जाते हैं; इससे बढ़कर बिना परिश्रम के मुक्ति देने वाला कोई कर्म नहीं है।

श्लोक 77 (skanda.2.71.77)

ज्येष्ठजन्मदिने स्नानं हरेर्यदवलोकितम् । स्नानदानतपःश्राद्धजपयज्ञादयस्तु ये

jyeṣṭhajanmadine snānaṁ hareryadavalokitam snānadānatapaḥśrāddhajapayajñādayastu ye

ज्येष्ठ जन्मदिन पर हरि का जो स्नान देखा गया — स्नान, दान, तप, श्राद्ध, जप, यज्ञ आदि से जो भी विधियाँ,

श्लोक 78 (skanda.2.71.78)

विधयः कोटिगुणिताः कोटिजन्मोपपादिताः । स्नानदर्शनपुण्यस्य हरेस्ते न तुलां गताः

vidhayaḥ koṭiguṇitāḥ koṭijanmopapāditāḥ snānadarśanapuṇyasya hareste na tulāṁ gatāḥ

करोड़ गुना करके करोड़ों जन्मों में की गई हों, वे हरि के स्नान-दर्शन के पुण्य की तुलना में नहीं आतीं।

श्लोक 79 (skanda.2.71.79)

भक्त्या यः स्नपनं विष्णोरेकस्मिन्वत्सरेऽपि वा । पश्येन्न शोचते विप्रा इह संसारमोचने

bhaktyā yaḥ snapanaṁ viṣṇorekasminvatsare'pi vā paśyenna śocate viprā iha saṁsāramocane

जो भक्तिपूर्वक वर्ष में एक बार भी विष्णु के स्नान को देखता है, हे विप्रो, उसे संसार से मुक्ति के विषय में शोक नहीं करना चाहिए।

श्लोक 80 (skanda.2.71.80)

तेनेष्टं क्रतुभिः पुण्यैः श्रद्धाविपुलदक्षिणैः । महादानानि दत्तानि भोजिताः कोटिशो द्विजाः

teneṣṭaṁ kratubhiḥ puṇyaiḥ śraddhāvipuladakṣiṇaiḥ mahādānāni dattāni bhojitāḥ koṭiśo dvijāḥ

उसके द्वारा श्रद्धा और प्रचुर दक्षिणा सहित पुण्ययज्ञ किए गए, महादान दिए गए, करोड़ों द्विजों को भोजन कराया गया,

श्लोक 81 (skanda.2.71.81)

श्राद्धानि गयशीर्षादौ कोटिशश्च कृतानि वै । पुण्यकाले च तीथार्दौ तपांसि चरितानि च

śrāddhāni gayaśīrṣādau koṭiśaśca kṛtāni vai puṇyakāle ca tīthārdau tapāṁsi caritāni ca

गयाशीर्ष आदि में करोड़ों श्राद्ध किए गए, पुण्यकाल में तीर्थों में तप आचरण किया गया,

श्लोक 82 (skanda.2.71.82)

अर्धोदयादियोगेषु कोटितीर्थेषु कोटिशः । स्नातानि तेन भो विप्रा यः पश्येत्स्नपनं हरेः

ardhodayādiyogeṣu koṭitīrtheṣu koṭiśaḥ snātāni tena bho viprā yaḥ paśyetsnapanaṁ hareḥ

तथा अर्धोदय आदि योगों में करोड़ों तीर्थों में करोड़ों बार स्नान किया गया — यह सब, हे विप्रो, उसी ने किया है जो हरि का स्नान देखता है।

श्लोक 83 (skanda.2.71.83)

सत्यं सत्यं पुनः सत्यं ब्रवीमि द्विजपुंगवाः । नातः श्रेयस्करं कर्म शास्त्रदृष्टपथिस्थितम्

satyaṁ satyaṁ punaḥ satyaṁ bravīmi dvijapuṁgavāḥ nātaḥ śreyaskaraṁ karma śāstradṛṣṭapathisthitam

सत्य, सत्य, पुनः सत्य मैं कहता हूँ, हे द्विजश्रेष्ठो — शास्त्रोक्त मार्ग में इससे बढ़कर कल्याणकारी कोई कर्म नहीं है।

श्लोक 84 (skanda.2.71.84)

मञ्चस्थं स्नाप्यमानं हि यः पश्येत्पुरुषोत्तमम् । स्नानाच्छतगुणं पुण्यं लभते वै न संशयः

mañcasthaṁ snāpyamānaṁ hi yaḥ paśyetpuruṣottamam snānācchataguṇaṁ puṇyaṁ labhate vai na saṁśayaḥ

जो मंच पर स्थित, स्नान कराए जा रहे पुरुषोत्तम को देखता है, वह स्नान से सौ गुना पुण्य प्राप्त करता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 85 (skanda.2.71.85)

मञ्चस्थितं जगन्नाथं स्नानार्द्रं यस्तु पश्यति । सांद्रानन्दार्द्रचित्तोऽसौ न किंचित्पापमश्नुते

mañcasthitaṁ jagannāthaṁ snānārdraṁ yastu paśyati sāṁdrānandārdracitto'sau na kiṁcitpāpamaśnute

मंच पर स्थित, स्नान से भीगे जगन्नाथ को जो देखता है, वह सान्द्र आनन्द से आर्द्रचित्त होकर कोई भी पाप नहीं भोगता।

श्लोक 86 (skanda.2.71.86)

यदेव पुण्यमुदितं स्नानदर्शनकर्मणि । तत्तत्फलमवाप्नोति दृष्ट्वा मञ्चस्थमच्युतम्

yadeva puṇyamuditaṁ snānadarśanakarmaṇi tattatphalamavāpnoti dṛṣṭvā mañcasthamacyutam

स्नान-दर्शन कर्म में जो भी पुण्य कहा गया है, वही फल मंच पर स्थित अच्युत को देखकर प्राप्त होता है।

श्लोक 87 (skanda.2.71.87)

एक एव जगन्नाथस्त्रिधा तत्र स्थितो द्विजाः । एकैकस्यापि स्नपनदर्शनं भुक्तिमुक्तिदम्

eka eva jagannāthastridhā tatra sthito dvijāḥ ekaikasyāpi snapanadarśanaṁ bhuktimuktidam

एक ही जगन्नाथ वहाँ तीन रूपों में स्थित हैं, हे द्विजो; इनमें से एक-एक का भी स्नपन-दर्शन भोग और मोक्ष दोनों देने वाला है।

श्लोक 88 (skanda.2.71.88)

जयस्व रामभद्रेति जय भद्रेति यो वदेत् । जय कृष्ण जगन्नाथ जयेत्युच्चारयेन्मुदा

jayasva rāmabhadreti jaya bhadreti yo vadet jaya kṛṣṇa jagannātha jayetyuccārayenmudā

जो 'जय हो रामभद्र! जय हो भद्रे!' कहता है, और आनन्दपूर्वक 'जय कृष्ण जगन्नाथ, जय!' का उच्चारण करता है,

श्लोक 89 (skanda.2.71.89)

स्नानकाले स वै मुक्तिं प्रयाति द्विजसत्तमाः । अधिवासादिकं तत्र यैः कृतं स्नानकर्मणि

snānakāle sa vai muktiṁ prayāti dvijasattamāḥ adhivāsādikaṁ tatra yaiḥ kṛtaṁ snānakarmaṇi

वह स्नान के समय ही मुक्ति को प्राप्त होता है, हे द्विजसत्तमो। जिन्होंने वहाँ स्नान-कर्म में अधिवास आदि किया,

श्लोक 90 (skanda.2.71.90)

तेषां श्रद्धामुदायुक्तः प्रदद्याद्दक्षिणाः पृथक् । ब्राह्मणेभ्यश्च मिष्टान्नं वस्त्रालंकरणानि च

teṣāṁ śraddhāmudāyuktaḥ pradadyāddakṣiṇāḥ pṛthak brāhmaṇebhyaśca miṣṭānnaṁ vastrālaṁkaraṇāni ca

उन्हें प्रसन्नतापूर्वक श्रद्धा से पृथक्-पृथक् दक्षिणा देनी चाहिए; तथा ब्राह्मणों को मिष्टान्न, वस्त्र और आभूषण

श्लोक 91 (skanda.2.71.91)

प्रदद्याच्छ्रद्धया युक्तो दीनानाथांश्च तर्पयेत् । ये द्रष्टुमागताः स्नानं जीवन्मुक्तास्तु ते ध्रुवम्

pradadyācchraddhayā yukto dīnānāthāṁśca tarpayet ye draṣṭumāgatāḥ snānaṁ jīvanmuktāstu te dhruvam

श्रद्धापूर्वक देने चाहिए, तथा दीन-अनाथों को भी तृप्त करना चाहिए। जो स्नान देखने आए थे, वे निश्चय ही जीवन्मुक्त हैं।

श्लोक 92 (skanda.2.71.92)

तान्यथाशक्ति वै राजा मानयेत्प्रीतये हरेः । स्नानावशेषतोयेन स्नायाद्भद्रासनस्थितः

tānyathāśakti vai rājā mānayetprītaye hareḥ snānāvaśeṣatoyena snāyādbhadrāsanasthitaḥ

राजा को उन्हें अपनी शक्ति के अनुसार, हरि की प्रसन्नता के लिए, सम्मानित करना चाहिए; स्नान के शेष जल से भद्रासन पर बैठकर स्नान करना चाहिए —

श्लोक 93 (skanda.2.71.93)

नारी वा पुरुषो वापि तस्य पुण्यं वदामि वः । कल्पः स्याच्चिररोगार्तो ह्यपमृत्युं जयेदसौ

nārī vā puruṣo vāpi tasya puṇyaṁ vadāmi vaḥ kalpaḥ syāccirarogārto hyapamṛtyuṁ jayedasau

चाहे स्त्री हो या पुरुष; मैं तुम्हें इसका पुण्य बताता हूँ — दीर्घकाल से रोगपीड़ित व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है, और अकाल मृत्यु पर विजय पाता है;

श्लोक 94 (skanda.2.71.94)

अपुत्रा मृतवत्सा वा वन्ध्या वापि लभेत्सुतम् । सुभगः सर्वलोकानां निर्धनो धनवान्भवेत्

aputrā mṛtavatsā vā vandhyā vāpi labhetsutam subhagaḥ sarvalokānāṁ nirdhano dhanavānbhavet

पुत्रहीन, या जिसकी संतान मर चुकी हो, या बाँझ स्त्री भी पुत्र प्राप्त करती है; संसार में निर्धन व्यक्ति धनवान हो जाता है;

श्लोक 95 (skanda.2.71.95)

गुर्विणी लभते पुत्रं दीर्घायुर्गुणवत्तरम् । गंगादिसर्वतीर्थानां स्नानजं फलमुच्यते

gurviṇī labhate putraṁ dīrghāyurguṇavattaram gaṁgādisarvatīrthānāṁ snānajaṁ phalamucyate

गर्भवती स्त्री दीर्घायु और अत्यंत गुणवान पुत्र प्राप्त करती है। गंगा आदि समस्त तीर्थों के स्नान से उत्पन्न फल कहा गया है —

श्लोक 96 (skanda.2.71.96)

स्नानदर्शनजं पुण्यं धर्मात्मा लभते ध्रुवम्

snānadarśanajaṁ puṇyaṁ dharmātmā labhate dhruvam

यह स्नान-दर्शन से उत्पन्न पुण्य धर्मात्मा को निश्चय ही प्राप्त होता है।

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