वैष्णव खण्ड · अध्याय 72
दक्षिणाभिमुख दर्शन और ज्येष्ठ-पंचक व्रत
श्लोक 1 (skanda.2.72.1)
जैमिनिरुवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि दक्षिणामूर्तिदर्शनम् । पदे पदे अश्वमेधस्य फलं यत्रोपलभ्यते
jaiminiruvāca ataḥ paraṁ pravakṣyāmi dakṣiṇāmūrtidarśanam pade pade aśvamedhasya phalaṁ yatropalabhyate
जैमिनि ने कहा — अब आगे मैं दक्षिणाभिमुख मूर्ति के दर्शन का वर्णन करूँगा, जिसमें पग-पग पर अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 2 (skanda.2.72.2)
ततो नानाविधैर्दिव्यैर्भक्ष्यभोज्यादिकैस्तथा । यथाशक्त्युपचारैस्तु गंधैर्माल्यैश्च पूजयेत्
tato nānāvidhairdivyairbhakṣyabhojyādikaistathā yathāśaktyupacāraistu gaṁdhairmālyaiśca pūjayet
तत्पश्चात् नाना प्रकार के दिव्य भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थों से तथा यथाशक्ति उपचारों, गन्ध और मालाओं से पूजा करे।
श्लोक 3 (skanda.2.72.3)
रामं कृष्णं सुभद्रां च गीतनृत्यादिकैस्तथा । प्रेक्षणीयैश्च विविधैः श्रद्धया चोपपादितैः
rāmaṁ kṛṣṇaṁ subhadrāṁ ca gītanṛtyādikaistathā prekṣaṇīyaiśca vividhaiḥ śraddhayā copapāditaiḥ
बलराम, कृष्ण और सुभद्रा को गीत-नृत्य आदि से तथा श्रद्धापूर्वक प्रस्तुत किए गए नाना प्रकार के दर्शनीय कार्यक्रमों से सेवित करे।
श्लोक 4 (skanda.2.72.4)
वस्त्रचंदनमाल्याद्यैः पूजयित्वा द्विजोत्तमान् । भगवद्ब्राह्मणांश्चैतान्महाभागवतांस्तथा
vastracaṁdanamālyādyaiḥ pūjayitvā dvijottamān bhagavadbrāhmaṇāṁścaitānmahābhāgavatāṁstathā
वस्त्र, चन्दन, माला आदि से श्रेष्ठ ब्राह्मणों, भगवद्भक्त ब्राह्मणों तथा महान भागवतों की पूजा करके,
श्लोक 5 (skanda.2.72.5)
ततो नयेद्दक्षिणाभिमुखांस्तांस्त्रिदशेश्वरान् । उत्सवं च महत्कृत्वा पूर्वानयनवद्धरेः
tato nayeddakṣiṇābhimukhāṁstāṁstridaśeśvarān utsavaṁ ca mahatkṛtvā pūrvānayanavaddhareḥ
तत्पश्चात् उन देवेश्वरों को दक्षिण दिशा की ओर मुख किए हुए ले जाए, तथा हरि के पूर्व आनयन के समान महान उत्सव करे।
श्लोक 6 (skanda.2.72.6)
तस्मिन्काले हरिं पश्येद्व्रजंतं दक्षिणामुखम् । समं सुभद्रां यो मर्त्यो न स प्राकृतमानुषः
tasmiṁkāle hariṁ paśyedvrajaṁtaṁ dakṣiṇāmukham samaṁ subhadrāṁ yo martyo na sa prākṛtamānuṣaḥ
उस समय जो मनुष्य दक्षिणमुख होकर जाते हुए हरि को सुभद्रा के साथ देखता है, वह साधारण मनुष्य नहीं है।
श्लोक 7 (skanda.2.72.7)
स्नानार्थमागता देवाः स्नापयित्वा जगद्गुरुम् । आकाशेऽपि ससंबाधास्तावत्कालं स्थिता हरिम् । द्रष्टुं व्रजंतं याम्याशावदनं भवनाशनम्
snānārthamāgatā devāḥ snāpayitvā jagadgurum ākāśe'pi sasaṁbādhāstāvatkālaṁ sthitā harim draṣṭuṁ vrajaṁtaṁ yāmyāśāvadanaṁ bhavanāśanam
स्नान के लिए आए हुए देवगण जगद्गुरु को स्नान कराकर, आकाश में भी सघन भीड़ बनाकर उतने समय तक ठहरे रहे, ताकि दक्षिण दिशा की ओर मुख किए हुए, संसार का नाश करने वाले हरि को जाते हुए देख सकें।
श्लोक 8 (skanda.2.72.8)
धर्मशास्त्रेषु यावंति धर्मकर्माणि संति वै । तानि सर्वाणि संद्रष्टुं व्रजंतं दक्षिणामुखम्
dharmaśāstreṣu yāvaṁti dharmakarmāṇi saṁti vai tāni sarvāṇi saṁdraṣṭuṁ vrajaṁtaṁ dakṣiṇāmukham
धर्मशास्त्रों में जितने भी धर्म-कर्म वर्णित हैं, वे सब उसी क्षण साक्षात् प्राप्त हो जाते हैं जो दक्षिणमुख जाते हुए भगवान को देखता है।
श्लोक 9 (skanda.2.72.9)
स्नानदर्शनजं पुण्यं समग्रं लभते तु सः । स्नातं मुरारिं यः पश्येद्व्रजंतं दक्षिणामुखम्
snānadarśanajaṁ puṇyaṁ samagraṁ labhate tu saḥ snātaṁ murāriṁ yaḥ paśyedvrajaṁtaṁ dakṣiṇāmukham
जो मनुष्य दक्षिणमुख जाते हुए स्नात मुरारि को देखता है, वह स्नान-दर्शन से उत्पन्न सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त करता है।
श्लोक 10 (skanda.2.72.10)
नीराजयित्वा देवेशं रामेण सह भद्रया । प्रासादांतः प्रवेश्याथ न पश्येद्वै कथंचन
nīrājayitvā deveśaṁ rāmeṇa saha bhadrayā prāsādāṁtaḥ praveśyātha na paśyedvai kathaṁcana
बलराम और भद्रा सहित देवेश की आरती उतारकर, फिर उन्हें प्रासाद के भीतर प्रवेश कराकर, इसके बाद किसी को भी न देखे।
श्लोक 11 (skanda.2.72.11)
एतत्तु विस्तरेणोक्तं पूर्वमेव मया द्विजाः
etattu vistareṇoktaṁ pūrvameva mayā dvijāḥ
हे द्विजो, यह मैंने पहले ही विस्तार से कह दिया है।
श्लोक 12 (skanda.2.72.12)
मुनय ऊचुः । भगवन्यत्त्वया प्रोक्तं ज्येष्ठास्नानप्रदर्शनात् । फलं प्राप्नोति नियतं तन्नो बूहि विदांवर
munaya ūcuḥ bhagavanyattvayā proktaṁ jyeṣṭhāsnānapradarśanāt phalaṁ prāpnoti niyataṁ tanno brūhi vidāṁvara
मुनियों ने कहा — हे भगवन्, आपने जो कहा कि ज्येष्ठ-स्नान के दर्शन से मनुष्य निश्चित फल प्राप्त करता है, हे ज्ञानियों में श्रेष्ठ, वह हमें बताइए।
श्लोक 13 (skanda.2.72.13)
जैमिनिरुवाच । हंत वः कथयिष्यामि तद्व्रतं ज्येष्ठपंचकम् । नातः परतरं प्रोक्तमृषिभिः शास्त्रपारगैः
jaiminiruvāca haṁta vaḥ kathayiṣyāmi tadvrataṁ jyeṣṭhapaṁcakam nātaḥ parataraṁ proktamṛṣibhiḥ śāstrapāragaiḥ
जैमिनि ने कहा — भला, अब मैं तुम्हें वह ज्येष्ठ-पंचक व्रत बताऊँगा, जिससे बढ़कर कोई व्रत शास्त्रपारंगत ऋषियों ने नहीं कहा है।
श्लोक 14 (skanda.2.72.14)
श्रौतस्मार्तपुराणोक्तव्रतानामिदमुत्तमम् । इदं प्रथमतः प्रोक्तं ब्रह्मणा परमेष्ठिना
śrautasmārtapurāṇoktavratānāmidamuttamam idaṁ prathamataḥ proktaṁ brahmaṇā parameṣṭhinā
श्रुति, स्मृति और पुराणों में कहे गए व्रतों में यह सर्वश्रेष्ठ है; इसे परमेष्ठी ब्रह्मा ने सर्वप्रथम कहा था।
श्लोक 15 (skanda.2.72.15)
ज्येष्ठत्वाद्व्रतमुख्यानां ख्यातं तज्ज्येष्ठपंचकम् । समुद्रो ज्येष्ठफलदः प्रभुर्ज्येष्ठफलप्रदः
jyeṣṭhatvādvratamukhyānāṁ khyātaṁ tajjyeṣṭhapaṁcakam samudro jyeṣṭhaphaladaḥ prabhurjyeṣṭhaphalapradaḥ
मुख्य व्रतों में श्रेष्ठ होने के कारण यह ज्येष्ठ-पंचक कहलाता है; समुद्र ज्येष्ठ फल देने वाला है और प्रभु भी ज्येष्ठ फल प्रदान करने वाले हैं।
श्लोक 16 (skanda.2.72.16)
वर्षसंदर्शनात्पुण्यं मञ्चकेनैव लभ्यते । मंचकेन तु यल्लभ्यं महाज्यैष्ठ्यां तु तल्लभेत्
varṣasaṁdarśanātpuṇyaṁ maṁcakenaiva labhyate maṁcakena tu yallabhyaṁ mahājyaiṣṭhyāṁ tu tallabhet
एक वर्ष तक दर्शन करने से जो पुण्य केवल मंचक-व्रत से प्राप्त होता है, वही पुण्य महाज्येष्ठी के दिन प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 17 (skanda.2.72.17)
यन्मयोक्तं पुरा विप्राः स्नानदर्शनजं फलम् । समग्रं तदवाप्नोति महाज्यैष्ठ्यां न संशयः
yanmayoktaṁ purā viprāḥ snānadarśanajaṁ phalam samagraṁ tadavāpnoti mahājyaiṣṭhyāṁ na saṁśayaḥ
हे विप्रो, पहले मैंने स्नान-दर्शन से उत्पन्न जो फल बताया था, वह सम्पूर्ण फल महाज्येष्ठी के दिन प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 18 (skanda.2.72.18)
मुनय ऊचुः । महाज्यैष्ठीं समाचक्ष्व यत्र स्नानं महाफलम् । तत्र नः कौतुकं ब्रह्मन्महद्वै संप्रवर्त्तते
munaya ūcuḥ mahājyaiṣṭhīṁ samācakṣva yatra snānaṁ mahāphalam tatra naḥ kautukaṁ brahmanmahadvai saṁpravarttate
मुनियों ने कहा — हे ब्रह्मन्, उस महाज्येष्ठी का वर्णन कीजिए जिसमें स्नान का महान फल है; उसके विषय में हमें बड़ा कौतूहल है।
श्लोक 19 (skanda.2.72.19)
जैमिनिरुवाच । ज्येष्ठस्य विमले पक्षे या वै पंचदशी भवेत् । शक्रर्क्षैकांशगौ चन्द्रगुरू च गुरुवासरे
jaiminiruvāca jyeṣṭhasya vimale pakṣe yā vai paṁcadaśī bhavet śakrarkṣaikāṁśagau candragurū ca guruvāsare
जैमिनि ने कहा — ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जो पूर्णिमा हो, और गुरुवार के दिन चन्द्रमा तथा गुरु दोनों ज्येष्ठा नक्षत्र के एक ही अंश में स्थित हों,
श्लोक 20 (skanda.2.72.20)
शुभे योगे महाज्यैष्ठी सर्वपापप्रणाशिनी । सर्वक्षेत्रं सर्वतीर्थं सप्त वै सागरास्तथा
śubhe yoge mahājyaiṣṭhī sarvapāpapraṇāśinī sarvakṣetraṁ sarvatīrthaṁ sapta vai sāgarāstathā
ऐसे शुभ योग में महाज्येष्ठी होती है, जो समस्त पापों का नाश करने वाली है। समस्त क्षेत्र, समस्त तीर्थ तथा सातों समुद्र —
श्लोक 21 (skanda.2.72.21)
क्रतवश्च महादानसमूहश्च तपांसि च । विद्याश्चाष्टादशविधा व्रतानि विविधानि च
kratavaśca mahādānasamūhaśca tapāṁsi ca vidyāścāṣṭādaśavidhā vratāni vividhāni ca
समस्त यज्ञ, महादानों के समूह, तपस्याएँ, अठारह प्रकार की विद्याएँ, तथा नाना प्रकार के व्रत —
श्लोक 22 (skanda.2.72.22)
शांतिपौष्टिककर्माणि सांख्ययोगस्तथैव च । सर्वे संभूय गच्छंति क्षेत्रं श्रीपुरुषोत्तमम्
śāṁtipauṣṭikakarmāṇi sāṁkhyayogastathaiva ca sarve saṁbhūya gacchaṁti kṣetraṁ śrīpuruṣottamam
शान्ति और पौष्टिक कर्म, तथा सांख्य और योग — ये सब मिलकर श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र में उपस्थित होते हैं।
श्लोक 23 (skanda.2.72.23)
वृन्दशः प्रविभक्तास्त एकैकं क्षेत्रगं प्रति । कस्मै वयं भाग्यवते ज्येष्ठस्नानावलोकने
vṛndaśaḥ pravibhaktāsta ekaikaṁ kṣetragaṁ prati kasmai vayaṁ bhāgyavate jyeṣṭhasnānāvalokane
वे समूहों में विभक्त होकर एक-एक क्षेत्रवासी की ओर जाते हैं, यह विचारते हुए कि ज्येष्ठ-स्नान के अवलोकन में किस भाग्यशाली के पास हम जाएँ।
श्लोक 24 (skanda.2.72.24)
महाज्यैष्ठ्यां प्रवेक्ष्यामः परस्परमहंमया । तत्र यांति महायोगे भगवत्क्षेत्रमुत्तमम्
mahājyaiṣṭhyāṁ pravekṣyāmaḥ parasparamahaṁmayā tatra yāṁti mahāyoge bhagavatkṣetramuttamam
महाज्येष्ठी में हम प्रवेश करेंगे — इस प्रकार परस्पर होड़ करते हुए, वे महायोग के अवसर पर भगवान के उस उत्तम क्षेत्र में जाते हैं।
श्लोक 25 (skanda.2.72.25)
महाज्यैष्ठी महापुण्या भगवत्प्रीतिवर्द्धनी । तस्यां संपूज्य देवेशं जगन्नाथं कृपार्णवम् । दृष्ट्वा च स्नाप्यमानं तं पापकोशाद्विमुच्यते
mahājyaiṣṭhī mahāpuṇyā bhagavatprītivarddhanī tasyāṁ saṁpūjya deveśaṁ jagannāthaṁ kṛpārṇavam dṛṣṭvā ca snāpyamānaṁ taṁ pāpakośādvimucyate
महाज्येष्ठी अत्यन्त पुण्यमयी और भगवान की प्रीति बढ़ाने वाली है। उस दिन देवेश जगन्नाथ, कृपा के सागर, का पूजन करके तथा उन्हें स्नान कराए जाते हुए देखकर मनुष्य पाप के कोश से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 26 (skanda.2.72.26)
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि व्रतं तज्ज्येष्ठपञ्चकम् । व्रतेनानेन लभ्यं यत्तत्तदेव ब्रवीमि वः
ata ūrdhvaṁ pravakṣyāmi vrataṁ tajjyeṣṭhapañcakam vratenānena labhyaṁ yattattadeva bravīmi vaḥ
अब आगे मैं वह ज्येष्ठ-पंचक व्रत बताऊँगा; इस व्रत से जो कुछ प्राप्त होता है, वही मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 27 (skanda.2.72.27)
दशम्यां नियमं कुर्यात्प्रातः स्नात्वा यथाविधि । आचार्यं वृणुयात्तत्र वैष्णवं द्विजपुंगवम्
daśamyāṁ niyamaṁ kuryātprātaḥ snātvā yathāvidhi ācāryaṁ vṛṇuyāttatra vaiṣṇavaṁ dvijapuṁgavam
दशमी के दिन विधिपूर्वक प्रातः स्नान करके नियम धारण करे, और वहाँ किसी वैष्णव, द्विजश्रेष्ठ आचार्य का वरण करे।
श्लोक 28 (skanda.2.72.28)
इत्थं संकल्पममलं गृह्णीयाद्व्रतमुत्तमम्
itthaṁ saṁkalpamamalaṁ gṛhṇīyādvratamuttamam
इस प्रकार निर्मल संकल्प लेकर वह उत्तम व्रत ग्रहण करे।
श्लोक 29 (skanda.2.72.29)
देवदेव जगन्नाथ संसारार्णवतारक । अद्यारभ्य व्रतं देव यावज्ज्यैष्ठी च सा तिथिः । तावद्व्रतं करिष्यामि प्रीतये तव केशव
devadeva jagannātha saṁsārārṇavatāraka adyārabhya vrataṁ deva yāvajjyaiṣṭhī ca sā tithiḥ tāvadvrataṁ kariṣyāmi prītaye tava keśava
हे देवदेव जगन्नाथ, संसार-सागर से तारने वाले! हे देव, आज से लेकर जब तक वह ज्येष्ठा तिथि आएगी, तब तक मैं यह व्रत आपकी प्रसन्नता के लिए करूँगा, हे केशव।
श्लोक 30 (skanda.2.72.30)
सर्वतीर्थाभिषेकं च प्रत्यहं व्रतभोजनम् । मूर्तीनां तव पंचानामेकस्यापि प्रपूजनम्
sarvatīrthābhiṣekaṁ ca pratyahaṁ vratabhojanam mūrtīnāṁ tava paṁcānāmekasyāpi prapūjanam
'प्रतिदिन समस्त तीर्थों में स्नान का फल तथा व्रत-भोजन, और आपकी पाँच मूर्तियों में से एक की भी पूजा —
श्लोक 31 (skanda.2.72.31)
एकस्मिन्दिवसे देव त्रिसंध्यं त्वत्प्रसादतः । समाप्यतां व्रतमिदं सफलं चास्तु ते प्रभो
ekasmindivase deva trisaṁdhyaṁ tvatprasādataḥ samāpyatāṁ vratamidaṁ saphalaṁ cāstu te prabho
एक ही दिन में, हे देव, तीनों संध्याओं में आपकी कृपा से यह व्रत सम्पन्न हो, हे प्रभु, और यह सफल हो।'
श्लोक 32 (skanda.2.72.32)
ततः पंचसु तीर्थेषु स्नात्वा च गृहमेत्य च । स्थंडिले विलिखेत्पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम्
tataḥ paṁcasu tīrtheṣu snātvā ca gṛhametya ca sthaṁḍile vilikhetpadmamaṣṭapatraṁ sakarṇikam
तत्पश्चात् पाँच तीर्थों में स्नान करके तथा घर आकर वेदी पर कर्णिका सहित आठ पंखुड़ियों वाला कमल बनाए।
श्लोक 33 (skanda.2.72.33)
तन्मध्ये स्थापयेत्कुंभं तीर्थांभोभिः प्रपूरितम् । सचंदनफलैर्युक्तं तन्मुखे ताम्रभाजनम्
tanmadhye sthāpayetkuṁbhaṁ tīrthāṁbhobhiḥ prapūritam sacaṁdanaphalairyuktaṁ tanmukhe tāmrabhājanam
उसके मध्य में तीर्थ-जल से परिपूर्ण कलश स्थापित करे, तथा उसके मुख पर चन्दन और फलों सहित एक ताम्रपात्र रखे।
श्लोक 34 (skanda.2.72.34)
वाससा वेष्टितं कण्ठे पात्रं चाक्षतपूरितम् । तन्मध्ये स्थापयेद्देवं सौवर्णं मधुसूदनम्
vāsasā veṣṭitaṁ kaṇṭhe pātraṁ cākṣatapūritam tanmadhye sthāpayeddevaṁ sauvarṇaṁ madhusūdanam
उसके गले में वस्त्र लपेटकर अक्षत से भरा पात्र रखे, और उसके मध्य में स्वर्णनिर्मित मधुसूदन की मूर्ति स्थापित करे।
श्लोक 35 (skanda.2.72.35)
शुभांगावयवं शांतं वामे श्रीयुतमीश्वरम्
śubhāṁgāvayavaṁ śāṁtaṁ vāme śrīyutamīśvaram
जिनके अंग-प्रत्यंग शुभ हों, जो शान्त हों, और जिनके वाम भाग में श्री विराजमान हों, ऐसे ईश्वर की मूर्ति हो,
श्लोक 36 (skanda.2.72.36)
दक्षिणे च गरुत्मंतं स्पृशंतं पृष्ठदेशतः । शंखचक्रधरं चोर्ध्वे पद्मासनगतं विभुम्
dakṣiṇe ca garutmaṁtaṁ spṛśaṁtaṁ pṛṣṭhadeśataḥ śaṁkhacakradharaṁ cordhve padmāsanagataṁ vibhum
दाहिनी ओर गरुड़ को, जो पीठ से स्पर्श कर रहे हों, ऊपर शंख-चक्र धारण किए हुए, कमलासन पर विराजमान उन विभु की मूर्ति स्थापित करे।
श्लोक 37 (skanda.2.72.37)
पूजयेदुपचारैस्तमाचार्यो वापि भो द्विजाः । नीलोत्पलानां मालां तु भक्त्या देवाय दापयेत्
pūjayedupacāraistamācāryo vāpi bho dvijāḥ nīlotpalānāṁ mālāṁ tu bhaktyā devāya dāpayet
हे द्विजो, उनकी पूजा उपचारों से करे, चाहे स्वयं या आचार्य द्वारा, और भक्तिपूर्वक नीलकमलों की माला देवता को अर्पित करे।
श्लोक 38 (skanda.2.72.38)
दशम्यां पूजयित्वैवं दशकोट्यघनाशनम् । प्रार्थयेत्प्रांजलिर्भूत्वा मन्त्रमेतं समुच्चरन्
daśamyāṁ pūjayitvaivaṁ daśakoṭyaghanāśanam prārthayetprāṁjalirbhūtvā mantrametaṁ samuccaran
इस प्रकार दशमी को पूजा करके, दस करोड़ पापों का नाश करने वाले भगवान से अंजलि बाँधकर यह मंत्र बोलते हुए प्रार्थना करे —
श्लोक 39 (skanda.2.72.39)
मधुसूदन देवेश नमस्ते माधवीप्रिय । कृपावारांनिधे पाहि पतितं मां भवार्णवे
madhusūdana deveśa namaste mādhavīpriya kṛpāvārāṁnidhe pāhi patitaṁ māṁ bhavārṇave
'हे मधुसूदन, हे देवेश, आपको नमस्कार है, हे माधवी के प्रिय! हे कृपा के सागर, संसार-सागर में गिरे हुए मुझे बचाइए।'
श्लोक 40 (skanda.2.72.40)
एकादश्यां चतुर्बाहुं शंखचक्रगदाधरम् । नारायणं पद्मसंस्थं पंचनिष्कविनिर्मितम् । तदर्द्धं निर्मितं वापि पूजयेत्पद्ममालया
ekādaśyāṁ caturbāhuṁ śaṁkhacakragadādharam nārāyaṇaṁ padmasaṁsthaṁ paṁcaniṣkavinirmitam tadarddhaṁ nirmitaṁ vāpi pūjayetpadmamālayā
एकादशी को चार भुजाओं वाले, शंख-चक्र-गदा धारण किए हुए, कमल पर विराजमान नारायण की, पाँच निष्क सोने से या उसके आधे भार से निर्मित मूर्ति की, कमल-माला से पूजा करे।
श्लोक 41 (skanda.2.72.41)
नैवेद्यं पायसं दद्यात्सितां रंभाफलानि च । नानाविधं च नैवेद्यं दत्त्वा संप्रार्थयेन्मुदा
naivedyaṁ pāyasaṁ dadyātsitāṁ raṁbhāphalāni ca nānāvidhaṁ ca naivedyaṁ dattvā saṁprārthayenmudā
नैवेद्य में खीर, मिश्री और केले के फल अर्पित करे, तथा नाना प्रकार का नैवेद्य देकर प्रसन्नतापूर्वक प्रार्थना करे —
श्लोक 42 (skanda.2.72.42)
नारायण नमस्तेऽस्तु भवसागरतारण । त्राहि मां पुंडरीकाक्ष शरणागतवत्सल
nārāyaṇa namaste'stu bhavasāgaratāraṇa trāhi māṁ puṁḍarīkākṣa śaraṇāgatavatsala
'हे नारायण, आपको नमस्कार है, हे संसार-सागर से तारने वाले! हे पुण्डरीकाक्ष, शरणागतवत्सल, मेरी रक्षा कीजिए।'
श्लोक 43 (skanda.2.72.43)
एकादशेंद्रियकृतं पापराशिमनुत्तमम् । अनादिभवनिर्व्यूढं नाशयेत्पूजितः प्रभुः
ekādaśeṁdriyakṛtaṁ pāparāśimanuttamam anādibhavanirvyūḍhaṁ nāśayetpūjitaḥ prabhuḥ
इस प्रकार पूजित प्रभु, ग्यारह इन्द्रियों द्वारा किए गए तथा अनादि संसार से संचित उस अत्यन्त बड़े पापराशि का नाश कर देते हैं।
श्लोक 44 (skanda.2.72.44)
द्वादश्यां यज्ञवाराहं पूजयेत्स्वर्णनिर्मितम् । चंदनागुरुकर्पूरलेपनैश्चंपकस्रजा
dvādaśyāṁ yajñavārāhaṁ pūjayetsvarṇanirmitam caṁdanāgurukarpūralepanaiścaṁpakasrajā
द्वादशी को स्वर्णनिर्मित यज्ञवराह की, चन्दन-अगर-कपूर के लेपन तथा चम्पा की माला से पूजा करे।
श्लोक 45 (skanda.2.72.45)
नानाविधापूपसारा भक्ष्यभोज्यफलान्विताः । निवेद्य प्रार्थयेद्देवं स्तुतिमेतां समुच्चरन्
nānāvidhāpūpasārā bhakṣyabhojyaphalānvitāḥ nivedya prārthayeddevaṁ stutimetāṁ samuccaran
नाना प्रकार के उत्तम पूए, खाद्य पदार्थ और फल अर्पित करके, यह स्तुति करते हुए देवता से प्रार्थना करे —
श्लोक 46 (skanda.2.72.46)
प्रलयार्णवसंमग्नां धरणीं धृतवानसि । किन्न शक्तो ममोद्धारे पतितस्यांघ्रिपंकजे । तन्मामुद्धर गोविंद निमग्नं शोकसागरे
pralayārṇavasaṁmagnāṁ dharaṇīṁ dhṛtavānasi kinna śakto mamoddhāre patitasyāṁghripaṁkaje tanmāmuddhara goviṁda nimagnaṁ śokasāgare
'आपने प्रलय के सागर में डूबी हुई पृथ्वी को धारण किया; क्या आप आपके चरणकमलों में गिरे हुए मुझ जैसे को उबारने में समर्थ नहीं हैं? हे गोविन्द, शोक-सागर में डूबे हुए मुझे उबारिए।'
श्लोक 47 (skanda.2.72.47)
अब्दो द्वादशमासो वै यावदब्दकृतानि तु । पापानि महदल्पानि इतः पूर्वेषु जन्मसु । तद्विनाशयते देवो द्वादश्यामर्चितो नृणाम्
abdo dvādaśamāso vai yāvadabdakṛtāni tu pāpāni mahadalpāni itaḥ pūrveṣu janmasu tadvināśayate devo dvādaśyāmarcito nṛṇām
एक वर्ष बारह मासों का होता है; इस जन्म से पूर्व जन्मों में किए गए जितने भी बड़े या छोटे पाप वर्षभर में संचित हुए हों, उन सबका नाश द्वादशी को पूजित देव मनुष्यों के लिए कर देते हैं।
श्लोक 48 (skanda.2.72.48)
त्रयोदश्यां तु प्रद्युम्नं शंखचक्रवराभयान् । धारयन्तं पद्मगतं चतुर्निष्कविनिर्मितम्
trayodaśyāṁ tu pradyumnaṁ śaṁkhacakravarābhayān dhārayaṁtaṁ padmagataṁ caturniṣkavinirmitam
त्रयोदशी को शंख, चक्र, वर और अभय मुद्राएँ धारण किए हुए, कमल पर विराजमान, चार निष्क स्वर्ण से निर्मित प्रद्युम्न की मूर्ति की पूजा करे।
श्लोक 49 (skanda.2.72.49)
उपचारैर्यथाप्रोक्तैः पूजयेद्भक्तितो नरः । अशोकपाटलीमालां चंद्रपूर्णां समुज्ज्वलाम्
upacārairyathāproktaiḥ pūjayedbhaktito naraḥ aśokapāṭalīmālāṁ caṁdrapūrṇāṁ samujjvalām
पहले बताए गए उपचारों से मनुष्य भक्तिपूर्वक पूजा करे, तथा अशोक और पाटल के पुष्पों की उज्ज्वल पूर्णचन्द्र-सी माला अर्पित करे।
श्लोक 50 (skanda.2.72.50)
नैवेद्यं चैव पक्वान्नं फलं पक्वं मनोहरम् । दत्त्वा नमस्कृतिं कुर्वन्प्रार्थयेत्प्रांजलिः शुचिः
naivedyaṁ caiva pakvānnaṁ phalaṁ pakvaṁ manoharam dattvā namaskṛtiṁ kurvanprārthayetprāṁjaliḥ śuciḥ
नैवेद्य में पके हुए अन्न और सुन्दर पके फल अर्पित करके, प्रणाम करते हुए, पवित्र होकर अंजलि बाँधे प्रार्थना करे —
श्लोक 51 (skanda.2.72.51)
देव प्रद्युम्न कामानां पूरक कामरूपधृक् । कामाश्च सफलाः संतु कामपाल नमोऽस्तु ते
deva pradyumna kāmānāṁ pūraka kāmarūpadhṛk kāmāśca saphalāḥ saṁtu kāmapāla namo'stu te
'हे देव प्रद्युम्न, इच्छाओं को पूर्ण करने वाले, इच्छानुरूप रूप धारण करने वाले! मेरी इच्छाएँ सफल हों, हे कामपाल, आपको नमस्कार है।'
श्लोक 52 (skanda.2.72.52)
चतुर्दश्यां नरहरिं पूजयेत्कनकाकृतिम् । वक्षःस्थलस्थया लक्ष्म्या प्रीयमाणं सटोज्ज्वलम्
caturdaśyāṁ narahariṁ pūjayetkanakākṛtim vakṣaḥsthalasthayā lakṣmyā prīyamāṇaṁ saṭojjvalam
चतुर्दशी को स्वर्णाकृति नरहरि की पूजा करे, जो अपने वक्षःस्थल पर विराजमान लक्ष्मी से प्रसन्न हैं और जिनकी अयाल दैदीप्यमान है।
श्लोक 53 (skanda.2.72.53)
व्यात्ताननं साट्टहासं योगपट्टाब्जसंस्थितम् । सुतीक्ष्णनखरं देवं सर्वापद्विनिवारणम्
vyāttānanaṁ sāṭṭahāsaṁ yogapaṭṭābjasaṁsthitam sutīkṣṇanakharaṁ devaṁ sarvāpadvinivāraṇam
मुख खुला हुआ, महाहास्य करता हुआ, योगपट्ट सहित कमल पर विराजमान, अत्यन्त तीक्ष्ण नखों वाला वह देव समस्त विपत्तियों का निवारण करने वाला है।
श्लोक 54 (skanda.2.72.54)
चतुर्भिर्हेमनिष्कैश्च घटितं शुभलक्षणम् । पूजयेत्पूर्ववद्देवं सोपहारं सुभक्तितः
caturbhirhemaniṣkaiśca ghaṭitaṁ śubhalakṣaṇam pūjayetpūrvavaddevaṁ sopahāraṁ subhaktitaḥ
चार निष्क सोने से बनी, शुभ लक्षणों से युक्त उस मूर्ति की पूर्ववत् उपहारों सहित उत्तम भक्ति से पूजा करे।
श्लोक 55 (skanda.2.72.55)
जपाकुसुममालां च जातीपुष्पस्रजं तथा । दत्त्वा पुष्पांजलीन्पादे प्रणम्य सप्रदक्षिणम्
japākusumamālāṁ ca jātīpuṣpasrajaṁ tathā dattvā puṣpāṁjalīnpāde praṇamya sapradakṣiṇam
जपाकुसुम की माला तथा जाती के पुष्पों की माला अर्पित करके, चरणों में पुष्पांजलि देकर, प्रदक्षिणा सहित प्रणाम करे,
श्लोक 56 (skanda.2.72.56)
यथा हिरण्यकशिपुं लोकानां हितकाम्यया । व्यदारयस्तथा पापसंघं नाशय पूजितः
yathā hiraṇyakaśipuṁ lokānāṁ hitakāmyayā vyadārayastathā pāpasaṁghaṁ nāśaya pūjitaḥ
(प्रार्थना करे — ) 'जैसे आपने लोगों के हित की कामना से हिरण्यकशिपु को विदीर्ण किया, वैसे ही, हे पूजित देव, पापों के समूह को नष्ट कीजिए।'
श्लोक 57 (skanda.2.72.57)
एवं संप्रार्थ्य नृहरिं प्रणम्य दण्डवत्क्षितौ । निर्वर्त्य व्रतमेवं तद्व्रती पंचदिनात्मकम् । पंच पंच प्रदीपांस्तु दिवारात्रौ प्रदापयेत्
evaṁ saṁprārthya nṛhariṁ praṇamya daṁḍavatkṣitau nirvartya vratamevaṁ tadvratī paṁcadinātmakam paṁca paṁca pradīpāṁstu divārātrau pradāpayet
इस प्रकार नृहरि से प्रार्थना करके, भूमि पर दण्डवत् प्रणाम करके, इस पाँच दिनों के व्रत को इस प्रकार पूर्ण करके, व्रती दिन और रात्रि में पाँच-पाँच दीपक जलाए।
श्लोक 58 (skanda.2.72.58)
वस्त्रयुग्मान्पंच पञ्च च्छत्रोपानद्युगं तथा । सयज्ञसूत्रान्कलशान्पञ्च पञ्च फलान्वितान्
vastrayugmānpaṁca pañca cchatropānadyugaṁ tathā sayajñasūtrānkalaśānpañca pañca phalānvitān
पाँच-पाँच वस्त्रयुगल, छत्र और खड़ाऊँ का जोड़ा, तथा यज्ञोपवीत सहित फलों से युक्त पाँच-पाँच कलश,
श्लोक 59 (skanda.2.72.59)
भोजनांते द्विजेभ्यश्च प्रदद्याच्छ्रद्धयान्वितः
bhojanāṁte dvijebhyaśca pradadyācchraddhayānvitaḥ
भोजन के अन्त में श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दान करे।
श्लोक 60 (skanda.2.72.60)
रात्रौ जागरगीताद्यैस्तथा नानोपहारकैः । तोषयेद्वासुदेवं तु पुराणपठनेन तु
rātrau jāgaragītādyaistathā nānopahārakaiḥ toṣayedvāsudevaṁ tu purāṇapaṭhanena tu
रात्रि में जागरण, गायन आदि और नाना प्रकार के उपहारों से, तथा पुराण-पाठ से वासुदेव को प्रसन्न करे।
श्लोक 61 (skanda.2.72.61)
पौर्णमास्युषसि स्नात्वा श्रीकृष्णस्यांतिकं व्रजेत्
paurṇamāsyuṣasi snātvā śrīkṛṣṇasyāṁtikaṁ vrajet
पूर्णिमा की भोर में स्नान करके श्रीकृष्ण के समीप जाए।
श्लोक 62 (skanda.2.72.62)
रामं कृष्णं सुभद्रां च पूजयित्वा यथाविधि । स्नपनं कारयित्वाथ दृष्ट्वा वा शास्त्रचोदितम्
rāmaṁ kṛṣṇaṁ subhadrāṁ ca pūjayitvā yathāvidhi snapanaṁ kārayitvātha dṛṣṭvā vā śāstracoditam
बलराम, कृष्ण और सुभद्रा की विधिवत् पूजा करके, फिर शास्त्रोक्त स्नान कराकर या उसे देखकर,
श्लोक 63 (skanda.2.72.63)
स्नानं कृत्वा पुनः सिंधौ गृहमागत्य तत्र वै । यत्र विष्णोर्मूर्त्तयस्ताः कुम्भस्था मन्त्रपूजिताः
snānaṁ kṛtvā punaḥ siṁdhau gṛhamāgatya tatra vai yatra viṣṇormūrttayastāḥ kuṁbhasthā mantrapūjitāḥ
फिर समुद्र में स्वयं स्नान करके घर लौट आए, जहाँ विष्णु की वे मूर्तियाँ मंत्रपूर्वक पूजित कलश में स्थापित हों।
श्लोक 64 (skanda.2.72.64)
तासां पश्चिमतो वह्निं समाधाय यथाविधि । अग्निकार्यं प्रकुर्वीत स्वैः स्वैर्मंत्रैः पुरोहितः
tāsāṁ paścimato vahniṁ samādhāya yathāvidhi agnikāryaṁ prakurvīta svaiḥ svairmaṁtraiḥ purohitaḥ
उनके पश्चिम में विधिपूर्वक अग्नि स्थापित करके, पुरोहित अपने-अपने मंत्रों से अग्निकार्य सम्पन्न करे।
श्लोक 65 (skanda.2.72.65)
प्रणवादिचतुर्थ्यंतं नमोंतं नाम ईरयेत् । देवानां मूलमंत्रस्तु स्वाहांतो होमकर्मणि
praṇavādicaturthyaṁtaṁ namoṁtaṁ nāma īrayet devānāṁ mūlamaṁtrastu svāhāṁto homakarmaṇi
प्रणव से आरम्भ करके चतुर्थी विभक्ति में नाम रखकर 'नमः' अन्त में जोड़े; देवताओं का मूल मंत्र होमकर्म में 'स्वाहा' अन्त वाला हो।
श्लोक 66 (skanda.2.72.66)
चरोराज्यस्य समिधां पलाशानां पृथक्पृथक् । एकैकं देवमुद्दिश्य जुहुयाच्च शतं शतम्
carorājyasya samidhāṁ palāśānāṁ pṛthakpṛthak ekaikaṁ devamuddiśya juhuyācca śataṁ śatam
चरु, घृत और पलाश की समिधाओं से, प्रत्येक देवता के लिए अलग-अलग एक-एक सौ आहुतियाँ दे।
श्लोक 67 (skanda.2.72.67)
तस्य पुष्पशतं चैव जुहुयात्तदनंतरम् । पूर्णाहुतिं ततो हुत्वा ब्रह्मणे दक्षिणां ददेत्
tasya puṣpaśataṁ caiva juhuyāttadanaṁtaram pūrṇāhutiṁ tato hutvā brahmaṇe dakṣiṇāṁ dadet
उसके बाद सौ पुष्पों की आहुति दे, फिर पूर्णाहुति देकर ब्रह्मा को दक्षिणा प्रदान करे।
श्लोक 68 (skanda.2.72.68)
आचार्ये दक्षिणां दद्यात्सुवर्णं धेनुमेव च । स्वर्णशृंगीं रौप्यखुरां नानोपकरणैर्युताम्
ācārye dakṣiṇāṁ dadyātsuvarṇaṁ dhenumeva ca svarṇaśṛṁgīṁ raupyakhurāṁ nānopakaraṇairyutām
आचार्य को दक्षिणा में स्वर्ण तथा एक गाय भी दे, जिसके सींग सोने के और खुर चाँदी के हों, तथा जो नाना उपकरणों से युक्त हो।
श्लोक 69 (skanda.2.72.69)
महार्घ्यवस्त्रदानानि येन तुष्यति वा गुरुः । सर्वोपकरणैर्युक्ताः प्रतिमाश्च निवेदयेत्
mahārghyavastradānāni yena tuṣyati vā guruḥ sarvopakaraṇairyuktāḥ pratimāśca nivedayet
मूल्यवान वस्त्रों का दान भी दे, जिससे गुरु प्रसन्न हों, तथा सम्पूर्ण उपकरणों सहित मूर्तियाँ भी अर्पित करे।
श्लोक 70 (skanda.2.72.70)
ब्राह्मणान्भोजयेत्सर्पिः खण्डयुक्तैश्च पायसैः । एतद्व्रतं समाख्यातं ज्येष्ठपंचकमुत्तमम्
brāhmaṇānbhojayetsarpiḥ khaṇḍayuktaiśca pāyasaiḥ etadvrataṁ samākhyātaṁ jyeṣṭhapaṁcakamuttamam
ब्राह्मणों को घी और शक्कर मिली हुई खीर से भोजन कराए। यह उत्तम ज्येष्ठ-पंचक व्रत बताया गया है।
श्लोक 71 (skanda.2.72.71)
अनुष्ठाय नरो भक्त्या स्नानदर्शनजं फलम् । समग्रं लभते विप्रास्तदा नैवात्र संशयः
anuṣṭhāya naro bhaktyā snānadarśanajaṁ phalam samagraṁ labhate viprāstadā naivātra saṁśayaḥ
इसे भक्तिपूर्वक करके मनुष्य स्नान-दर्शन से उत्पन्न सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है, हे विप्रो, इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 72 (skanda.2.72.72)
एकादशी या तु मध्ये निर्जला सा प्रकीर्तिता । एकां तां भक्तियुक्ता ये यथाविधि उपासते
ekādaśī yā tu madhye nirjalā sā prakīrtitā ekāṁ tāṁ bhaktiyuktā ye yathāvidhi upāsate
इस बीच में जो एकादशी पड़ती है, वह 'निर्जला' कहलाती है; जो भक्तियुक्त होकर उस एक ही एकादशी की विधिपूर्वक उपासना करते हैं,
श्लोक 73 (skanda.2.72.73)
यावज्जीवकृताः सर्वा एकादश्यो न संशयः । व्रतराजमिमं कृत्वा सर्वव्रतफलं लभेत्
yāvajjīvakṛtāḥ sarvā ekādaśyo na saṁśayaḥ vratarājamimaṁ kṛtvā sarvavrataphalaṁ labhet
वे निःसंदेह जीवनभर की गई समस्त एकादशियों का फल प्राप्त करते हैं; इस राजाधिराज व्रत को करके मनुष्य समस्त व्रतों का फल पाता है।
श्लोक 74 (skanda.2.72.74)
यान्यान्समीहते कामांस्तांस्तानाप्नोत्यसंशयः
yānyānsamīhate kāmāṁstāṁstānāpnotyasaṁśayaḥ
जो-जो कामनाएँ मनुष्य चाहता है, उन-उन सबको वह निःसंदेह प्राप्त करता है।