वैष्णव खण्ड · अध्याय 73
गुण्डिचा-यात्रा एवं महावेदी-महोत्सव
श्लोक 1 (skanda.2.73.1)
जैमिनिरुवाच। अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि महावेदीमहोत्सवम्। अज्ञानतिमिरांधोऽपि येन भास्वत्पदं व्रजेत्
jaiminiruvāca ata ūrdhvaṁ pravakṣyāmi mahāvedīmahotsavam ajñānatimirāṁdho'pi yena bhāsvatpadaṁ vrajet
जैमिनि ने कहा — अब आगे मैं महावेदी के महोत्सव का वर्णन करूँगा, जिससे अज्ञान के अंधकार से अंधा हुआ मनुष्य भी भगवान के तेजोमय पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 2 (skanda.2.73.2)
वैशाखस्यामले पक्षे तृतीया पापनाशिनी। स्वयमाविष्कृता चैषा प्राजापत्यर्क्षसंयुता
vaiśākhasyāmale pakṣe tṛtīyā pāpanāśinī svayamāviṣkṛtā caiṣā prājāpatyarkṣasaṁyutā
वैशाख के शुक्ल पक्ष में पापनाशिनी तृतीया तिथि स्वयं प्रकट हुई है, जो प्राजापत्य (रोहिणी) नक्षत्र से युक्त होती है।
श्लोक 3 (skanda.2.73.3)
तस्यां संकल्प्य नृपतिराचार्यं वरयेच्छुचिः। एकं त्रीनथ तक्षाणं दृष्टकर्माणमादरात्
tasyāṁ saṁkalpya nṛpatirācāryaṁ varayecchuciḥ ekaṁ trīnatha takṣāṇaṁ dṛṣṭakarmāṇamādarāt
उस तिथि पर राजा संकल्प करके पवित्र होकर आचार्य का तथा उत्तम कर्मकुशल एक अथवा तीन बढ़इयों का आदरपूर्वक वरण करे।
श्लोक 4 (skanda.2.73.4)
वृणुयाद्वनयागाय वस्त्रालंकरणादिभिः। तक्ष्णा सार्द्धं वनं गत्वा साधुवृक्षगणाकुलम्
vṛṇuyādvanayāgāya vastrālaṁkaraṇādibhiḥ takṣṇā sārddhaṁ vanaṁ gatvā sādhuvṛkṣagaṇākulam
वस्त्र-आभूषण आदि देकर उन्हें वन-यज्ञ के लिए नियुक्त करे, और बढ़इयों के साथ उत्तम वृक्षों से भरे वन में जाए।
श्लोक 5 (skanda.2.73.5)
तन्मध्ये वह्निमाधाय मंत्रराजेन मंत्रवित्। अष्टोत्तरशतं हुत्वा संपाताज्यविमिश्रितम्
tanmadhye vahnimādhāya maṁtrarājena maṁtravit aṣṭottaraśataṁ hutvā saṁpātājyavimiśritam
वहाँ मंत्रवेत्ता अग्नि स्थापित कर मंत्रराज से आहुति की बूँदों से मिश्रित घी की एक सौ आठ आहुतियाँ दे।
श्लोक 6 (skanda.2.73.6)
आज्यं तरूणां मूले तु प्रत्येकमभिघारयेत्। दिक्पालेभ्यो बलिं दत्त्वा क्षेत्रपालपशूंस्तथा
ājyaṁ tarūṇāṁ mūle tu pratyekamabhighārayet dikpālebhyo baliṁ dattvā kṣetrapālapaśūṁstathā
प्रत्येक वृक्ष की जड़ में घी सींचे, दिक्पालों को बलि दे तथा क्षेत्रपाल और रक्षक पशुओं को भी बलि अर्पित करे।
श्लोक 7 (skanda.2.73.7)
वनस्पतये जुहुयात्क्षीरोदनशताहुतिम्। ततः परशुमादाय वृक्षमूलेषु दिक्षु वै
vanaspataye juhuyātkṣīrodanaśatāhutim tataḥ paraśumādāya vṛkṣamūleṣu dikṣu vai
वनस्पति के लिए दूध-भात की सौ आहुतियाँ दे; फिर परशु लेकर वृक्षों की जड़ों में सब दिशाओं में,
श्लोक 8 (skanda.2.73.8)
आज्यसंस्कृतिदेशेषु आचार्यो मंत्रमुच्चरन्। किंचित्किंचिच्छेदयेद्वै चिंतयन्गरुडध्वजम्
ājyasaṁskṛtideśeṣu ācāryo maṁtramuccaran kiṁcitkiṁcicchedayedvai ciṁtayangaruḍadhvajam
घी से संस्कारित स्थानों पर आचार्य मंत्र उच्चारण करते हुए गरुड़ध्वज विष्णु का ध्यान करते हुए थोड़ा-थोड़ा काटे।
श्लोक 9 (skanda.2.73.9)
नदत्सु तूर्यघोषेषु गीतमंगलवादिषु। नियोज्य वर्द्धकिं तत्र आचार्यः स्वगृहं व्रजेत्
nadatsu tūryaghoṣeṣu gītamaṁgalavādiṣu niyojya varddhakiṁ tatra ācāryaḥ svagṛhaṁ vrajet
तुरहियों की ध्वनि और मंगल गीत-वाद्य बजते हुए, वहाँ बढ़ई को नियुक्त कर आचार्य अपने घर लौट जाए।
श्लोक 10 (skanda.2.73.10)
अथवा स्थान लब्धानि दारूणि रथकर्मणि। उक्तसंस्कारविधिना संस्कुर्यात्कल्पितेनले
athavā sthāna labdhāni dārūṇi rathakarmaṇi uktasaṁskāravidhinā saṁskuryātkalpitenale
अथवा रथ-निर्माण के लिए पूर्व से प्राप्त काष्ठों को कहे गए संस्कार-विधि से कल्पित अग्नि द्वारा संस्कारित करे।
श्लोक 11 (skanda.2.73.11)
आरभेत रथं कृत्वा विघ्रराजमहोत्सवम्। षोडशारैः षोडशभिश्चक्रैर्लोहमयैर्दृढैः
ārabheta rathaṁ kṛtvā vighrarājamahotsavam ṣoḍaśāraiḥ ṣoḍaśabhiścakrairlohamayairdṛḍhaiḥ
विघ्नराज गणेश का महोत्सव करके रथ बनाना आरम्भ करे, सोलह मजबूत लोहे के चक्रों से युक्त, प्रत्येक में सोलह अरे।
श्लोक 12 (skanda.2.73.12)
युक्तं विष्णो रथं कुर्याद्दृढाक्षं दृढकूबरम्। विचित्रघटनाकक्षपुत्तलीपरिवेष्टितम्
yuktaṁ viṣṇo rathaṁ kuryāddṛḍhākṣaṁ dṛḍhakūbaram vicitraghaṭanākakṣaputtalīpariveṣṭitam
विष्णु के रथ को दृढ़ धुरी और दृढ़ कूबर से युक्त, विचित्र रचना वाले पुतलियों और कक्षों से घिरा बनाए।
श्लोक 13 (skanda.2.73.13)
नानाविचित्रबहुलमिक्षुखण्डविराजितम्। चतुस्तोरणसंयुक्तं चतुर्द्वारं सुशोभनम्
nānāvicitrabahulamikṣukhaṇḍavirājitam catustoraṇasaṁyuktaṁ caturdvāraṁ suśobhanam
नाना विचित्रताओं से युक्त, इक्षु-खण्ड की आकृतियों से सुशोभित, चार तोरणों और चार द्वारों से युक्त, अत्यंत सुंदर।
श्लोक 14 (skanda.2.73.14)
नानाविचित्रबहुलं हेमपट्टविराजितम्। द्वाविंशतिकरोच्छ्रायं पताकाभिरलंकृतम्
nānāvicitrabahulaṁ hemapaṭṭavirājitam dvāviṁśatikarocchrāyaṁ patākābhiralaṁkṛtam
नाना विचित्रताओं से भरा, स्वर्ण-पट्टिकाओं से सुशोभित, बाईस हाथ ऊँचा, पताकाओं से अलंकृत।
श्लोक 15 (skanda.2.73.15)
गारुडं च ध्वजं कुर्याद्रक्तचंदननिर्मितम्। दीर्घनासं स्थूलदेहं कुण्डलाभ्यां विभूषितम्
gāruḍaṁ ca dhvajaṁ kuryādraktacaṁdananirmitam dīrghanāsaṁ sthūladehaṁ kuṇḍalābhyāṁ vibhūṣitam
लाल चंदन से निर्मित गरुड़ध्वज बनाए, जिसकी लंबी चोंच, स्थूल शरीर और दोनों कुण्डलों से विभूषित हो।
श्लोक 16 (skanda.2.73.16)
चंच्वग्रदष्टभुजगं सर्वालंकारभूषितम्। वितत्य पक्षती व्योम्नि उड्डीयंतमिवोदितम्
caṁcvagradaṣṭabhujagaṁ sarvālaṁkārabhūṣitam vitatya pakṣatī vyomni uḍḍīyaṁtamivoditam
जिसकी चोंच के अग्रभाग में सर्प दबा हो, जो सब आभूषणों से विभूषित हो, आकाश में पंख फैलाए मानो उड़ता हुआ प्रतीत हो।
श्लोक 17 (skanda.2.73.17)
दैत्यदानवसंघस्य बलदर्पविनाशनम्। सर्वांगं तस्य कनकैराच्छाद्य परिशोभयेत्
daityadānavasaṁghasya baladarpavināśanam sarvāṁgaṁ tasya kanakairācchādya pariśobhayet
दैत्य-दानवों के बल और गर्व का नाशक गरुड़ — उसके सारे अंगों को सोने से मढ़कर सुशोभित करे।
श्लोक 18 (skanda.2.73.18)
रथमेव हरेः कुर्यात्स्वासनं सुपरिष्कृतम्। चतुर्दशरथांगैस्तं रथं कुर्याच्च सीरिणः
rathameva hareḥ kuryātsvāsanaṁ supariṣkṛtam caturdaśarathāṁgaistaṁ rathaṁ kuryācca sīriṇaḥ
हरि के लिए स्वयं रथ को ही सुसज्जित आसन बनाए, तथा बलराम के लिए चौदह रथांगों से युक्त रथ बनाए।
श्लोक 19 (skanda.2.73.19)
चक्रैर्द्वादशभिः कुर्यात्सुभद्राया रथोत्तमम्। सप्तच्छदमयं कुर्यात्सीरिणो लांगलध्वजम्
cakrairdvādaśabhiḥ kuryātsubhadrāyā rathottamam saptacchadamayaṁ kuryātsīriṇo lāṁgaladhvajam
सुभद्रा के लिए बारह चक्रों वाला उत्तम रथ बनाए, तथा सप्तच्छद काष्ठ से बलराम की हल-ध्वजा बनाए।
श्लोक 20 (skanda.2.73.20)
देव्याः पद्मध्वजं कुर्यात्पद्मकाष्ठविनिर्मितम्। विरचय्य रथान्राजा प्रतिष्ठां पूर्ववच्चरेत्
devyāḥ padmadhvajaṁ kuryātpadmakāṣṭhavinirmitam viracayya rathānrājā pratiṣṭhāṁ pūrvavaccaret
देवी सुभद्रा की पद्म-ध्वजा कमल-काष्ठ से बनाए; इस प्रकार रथों को रचकर राजा पूर्ववत् प्रतिष्ठा-विधि करे।
श्लोक 21 (skanda.2.73.21)
यथामन्त्रं यथाशास्त्रं विश्वसेद्ब्राह्मणेषु च। ब्राह्मणा जगदीशस्य जंगमास्तनवः स्मृताः
yathāmantraṁ yathāśāstraṁ viśvasedbrāhmaṇeṣu ca brāhmaṇā jagadīśasya jaṁgamāstanavaḥ smṛtāḥ
मंत्र और शास्त्र के अनुसार ब्राह्मणों में विश्वास रखे, क्योंकि ब्राह्मण जगदीश्वर के ही चलते-फिरते शरीर माने गए हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.73.22)
इत्थं सुघटितं चक्रित्रयं देवत्रयस्य वै। आषाढस्य सिते पक्षे दिने विष्णोः शुभप्रदे
itthaṁ sughaṭitaṁ cakritrayaṁ devatrayasya vai āṣāḍhasya site pakṣe dine viṣṇoḥ śubhaprade
इस प्रकार तीनों देवताओं के तीनों रथ भलीभाँति बनकर, आषाढ़ शुक्ल पक्ष के विष्णु-प्रिय शुभ दिन में प्रतिष्ठित होते हैं।
श्लोक 23 (skanda.2.73.23)
प्रतिष्ठाप्य समृद्धेन विधिना पूर्ववद्विजाः। रक्षणीयं तथा तत्र नारोहेत्कश्चनाशुभः
pratiṣṭhāpya samṛddhena vidhinā pūrvavadvijāḥ rakṣaṇīyaṁ tathā tatra nārohetkaścanāśubhaḥ
समृद्धिपूर्ण विधि से पूर्ववत् प्रतिष्ठा करके, हे द्विजो, उनकी रक्षा करनी चाहिए, ताकि कोई अशुभ प्राणी उन पर न चढ़े।
श्लोक 24 (skanda.2.73.24)
पक्षी वा मानुषो वापि मार्जारनकुलादयः। ततो दिनत्रयादर्वाग्रथानामुत्तरे कृते
pakṣī vā mānuṣo vāpi mārjāranakulādayaḥ tato dinatrayādarvāgrathānāmuttare kṛte
न पक्षी, न मनुष्य, न बिल्ली-नेवला आदि। फिर तीन दिन के भीतर जब रथ तैयार हो जाएँ,
श्लोक 25 (skanda.2.73.25)
मण्डपे उत्सवांगे वा प्रकुर्यादंकुरार्पणम्। अद्भुतेष्वथ जातेषु शांतिं कुर्यात्पुरोदिताम्
maṇḍape utsavāṁge vā prakuryādaṁkurārpaṇam adbhuteṣvatha jāteṣu śāṁtiṁ kuryātpuroditām
मंडप में या उत्सव के अंग स्वरूप अंकुरार्पण करे; और यदि कोई अपशकुन घटित हो तो पूर्वोक्त शांति-कर्म करे।
श्लोक 26 (skanda.2.73.26)
रथ्या सुसंस्कृता कार्या महावेदीं यथा व्रजेत्। पार्श्वयोर्मंडलं कुर्यात्पथि गुल्मादिभिः फलैः
rathyā susaṁskṛtā kāryā mahāvedīṁ yathā vrajet pārśvayormaṁḍalaṁ kuryātpathi gulmādibhiḥ phalaiḥ
मार्ग को भलीभाँति संस्कारित करे जिससे महावेदी तक जाया जा सके; दोनों ओर पथ में झाड़ियों और फलों से मंडल बनाए,
श्लोक 27 (skanda.2.73.27)
सुमनस्तबकैर्माल्यैर्दुकूलैश्चामरैस्तथा। यथा सुपुष्पितारण्यराजी तत्र विराजते
sumanastabakairmālyairdukūlaiścāmaraistathā yathā supuṣpitāraṇyarājī tatra virājate
पुष्प-गुच्छों, मालाओं, दुकूलों और चँवरों से, मानो वहाँ सुंदर पुष्पित वन की पंक्ति सुशोभित हो रही हो।
श्लोक 28 (skanda.2.73.28)
भूमिः समा च कार्या वै निष्पंका सुखचारणा। निर्मला च सुगन्धा च सुदूराद्वर्जितोत्करा
bhūmiḥ samā ca kāryā vai niṣpaṁkā sukhacāraṇā nirmalā ca sugandhā ca sudūrādvarjitotkarā
भूमि को समतल, कीचड़-रहित, सुखद, स्वच्छ और सुगंधित बनाया जाए, दूर-दूर तक कूड़े-कचरे से रहित।
श्लोक 29 (skanda.2.73.29)
धूपपात्राण्यनुपदं दिगामोदकराणि च। चंदनांभः परिक्षेपो यंत्रपातोत्करस्तथा
dhūpapātrāṇyanupadaṁ digāmodakarāṇi ca caṁdanāṁbhaḥ parikṣepo yaṁtrapātotkarastathā
हर कदम पर धूप-पात्र रखे जाएँ जो दिशाओं को सुगंधित करें, चंदन-जल का छिड़काव हो तथा जल छिड़कने के यंत्र भी हों।
श्लोक 30 (skanda.2.73.30)
बहूनि ऋतुपुष्पाणि पुष्पवृष्ट्यर्थमेव हि। नटनर्त्तकमुख्याश्च गायना बहवस्तथा
bahūni ṛtupuṣpāṇi puṣpavṛṣṭyarthameva hi naṭanarttakamukhyāśca gāyanā bahavastathā
पुष्प-वर्षा के लिए बहुत से ऋतु-पुष्प एकत्र किए जाएँ; वहाँ बहुत से मुख्य नट-नर्तक तथा गायक हों।
श्लोक 31 (skanda.2.73.31)
वेश्या यौवनगर्वाढ्याः रूपालंकारभूषिताः। मृदंगा पणवाश्चैव भेरीढक्कादयस्तथा
veśyā yauvanagarvāḍhyāḥ rūpālaṁkārabhūṣitāḥ mṛdaṁgā paṇavāścaiva bherīḍhakkādayastathā
यौवन के गर्व से भरी, रूप-आभूषण से सुशोभित वेश्याएँ हों; मृदंग, पणव, भेरी, ढक्का आदि वाद्य भी हों।
श्लोक 32 (skanda.2.73.32)
बहवो बहुधा तत्र पताकाश्चित्रितांतराः। ध्वजाश्च बहवस्तत्र स्वर्णराजतनिर्मिताः
bahavo bahudhā tatra patākāścitritāṁtarāḥ dhvajāśca bahavastatra svarṇarājatanirmitāḥ
वहाँ नाना प्रकार की बहुत सी चित्रित पताकाएँ हों, तथा सोने-चाँदी से बनी बहुत सी ध्वजाएँ हों।
श्लोक 33 (skanda.2.73.33)
वैजयंत्यो बहुविधा भूमिगा वाहनास्तथा। हस्तिनश्च हयाश्चैव सुसन्नद्धाः स्वलंकृताः
vaijayaṁtyo bahuvidhā bhūmigā vāhanāstathā hastinaśca hayāścaiva susannaddhāḥ svalaṁkṛtāḥ
नाना प्रकार की वैजयंती विजय-ध्वजाएँ तथा भूमि पर चलने वाले वाहन हों; हाथी और घोड़े सुसज्जित और अलंकृत हों।
श्लोक 34 (skanda.2.73.34)
एवं संभृतसंभारः क्षितिपालः शुचिव्रतः। मुदा भक्त्या च परया युक्तः कुर्यान्महोत्सवम्
evaṁ saṁbhṛtasaṁbhāraḥ kṣitipālaḥ śucivrataḥ mudā bhaktyā ca parayā yuktaḥ kuryānmahotsavam
इस प्रकार सब सामग्री एकत्र कर, पवित्र व्रत वाला राजा हर्ष और परम भक्ति से युक्त होकर महोत्सव करे।
श्लोक 35 (skanda.2.73.35)
आषाढस्य सिते पक्षे द्वितीया पुष्यसंयुता। अरुणोदयवेलायां तस्यां देवं प्रपूजयेत्
āṣāḍhasya site pakṣe dvitīyā puṣyasaṁyutā aruṇodayavelāyāṁ tasyāṁ devaṁ prapūjayet
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया, पुष्य नक्षत्र से युक्त, उस दिन अरुणोदय के समय भगवान की पूजा करे।
श्लोक 36 (skanda.2.73.36)
ब्राह्मणैर्वैष्णवैः सार्द्धं यतिभिश्च तपस्विभिः। विज्ञापयेद्देवदेवं यात्रायै संस्कृतांजलिः
brāhmaṇairvaiṣṇavaiḥ sārddhaṁ yatibhiśca tapasvibhiḥ vijñāpayeddevadevaṁ yātrāyai saṁskṛtāṁjaliḥ
ब्राह्मणों, वैष्णवों, यतियों और तपस्वियों के साथ हाथ जोड़कर देवाधिदेव से यात्रा के लिए विनती करे —
श्लोक 37 (skanda.2.73.37)
इन्द्रद्युम्नं क्षितिभुजं यथाज्ञासीः पुरा विभो। विजयस्व रथे नाथ गुंडिचामण्डपं प्रति
indradyumnaṁ kṣitibhujaṁ yathājñāsīḥ purā vibho vijayasva rathe nātha guṁḍicāmaṇḍapaṁ prati
हे प्रभु, जैसे आपने पूर्वकाल में राजा इन्द्रद्युम्न को अपना ज्ञान दिया था, वैसे ही, हे नाथ, अब रथ में विराजकर गुंडिचा मंडप की ओर विजय-यात्रा करें।
श्लोक 38 (skanda.2.73.38)
तवापांगविलोकेन प्रपुनंतु दिशो दश। निःश्रेयसपदं यांतु स्थावराणि चराणि च
tavāpāṁgavilokena prapunaṁtu diśo daśa niḥśreyasapadaṁ yāṁtu sthāvarāṇi carāṇi ca
आपकी कृपादृष्टि से दसों दिशाएँ पवित्र हों; सभी स्थावर-जंगम प्राणी मोक्षपद को प्राप्त हों।
श्लोक 39 (skanda.2.73.39)
अवतारः कृतो ह्येष लोकानुग्रहकाम्यया। तदेहि भगवन्प्रीत्या चरणं न्यस्य भूतले
avatāraḥ kṛto hyeṣa lokānugrahakāmyayā tadehi bhagavanprītyā caraṇaṁ nyasya bhūtale
यह अवतार लोकों पर अनुग्रह करने की इच्छा से ही हुआ है; अतः हे भगवन्, प्रेमपूर्वक आइए और पृथ्वी पर चरण रखिए।
श्लोक 40 (skanda.2.73.40)
ततः कर्पूरचूर्णैश्च सुमनोभिरवाकिरेत्। पथि शाकुनसूक्तानि प्रपठंति द्विजातयः
tataḥ karpūracūrṇaiśca sumanobhiravākiret pathi śākunasūktāni prapaṭhaṁti dvijātayaḥ
फिर कर्पूर-चूर्ण और पुष्पों से मार्ग को बिखेरा जाए; ब्राह्मण मार्ग में शकुन-सूक्तों का पाठ करते हैं।
श्लोक 41 (skanda.2.73.41)
केचिन्मंगलगाथाश्च केचिज्जय जयेति च। जितं त इति मन्त्रं वै केचिदुच्चैर्जपंति च
kecinmaṁgalagāthāśca kecijjaya jayeti ca jitaṁ ta iti mantraṁ vai keciduccairjapaṁti ca
कोई मंगल-गाथाएँ गाते हैं, कोई जय-जय कहते हैं, कोई ऊँचे स्वर में जितं ते मंत्र का जप करते हैं।
श्लोक 42 (skanda.2.73.42)
सूतमागधमुख्याश्च कीर्तिं पुण्यां मुदा जगुः। स्वर्णदंडप्रकीर्णानां श्रेणी चोभयपार्श्वयोः
sūtamāgadhamukhyāśca kīrtiṁ puṇyāṁ mudā jaguḥ svarṇadaṁḍaprakīrṇānāṁ śreṇī cobhayapārśvayoḥ
सूत-मागध आदि प्रमुख जन हर्षपूर्वक पवित्र कीर्ति का गान करते हैं; दोनों ओर सोने के डंडों की पंक्तियाँ बिखरी होती हैं।
श्लोक 43 (skanda.2.73.43)
लीलयांदोलयंति स्म रणत्कंकणमंजुलम्। स्वर्णपात्रपरिक्षिप्तकृष्णागुरुसुधूपितैः
līlayāṁdolayaṁti sma raṇatkaṁkaṇamaṁjulam svarṇapātraparikṣiptakṛṣṇāgurusudhūpitaiḥ
वे क्रीड़ापूर्वक मधुर रुनझुन करते कंकणों को हिलाते हैं, सोने के पात्रों से बिखरे कृष्णागुरु की सुगंधित धूप के साथ।
श्लोक 44 (skanda.2.73.44)
सुरभीकृतसर्वाशा मुखे व्योमांगणे तथा। चर्चरीझर्झरीवेणुवीणामाधुरिकादयः। शब्दायंते सुमधुरं गोविंदविजयांतरे
surabhīkṛtasarvāśā mukhe vyomāṁgaṇe tathā carcarījharjharīveṇuvīṇāmādhurikādayaḥ śabdāyaṁte sumadhuraṁ goviṁdavijayāṁtare
सारी दिशाएँ तथा आकाश-आँगन सुगंधित हो जाते हैं; चर्चरी, झर्झरी, वेणु, वीणा आदि की मधुर ध्वनियाँ गोविंद की विजय-यात्रा में गूँजती हैं।
श्लोक 45 (skanda.2.73.45)
एवं प्रवृत्ते समये कृष्णं रामपुरःसरम्। नयंति विप्रा भद्रां च क्षत्रियाश्च विशस्तथा
evaṁ pravṛtte samaye kṛṣṇaṁ rāmapuraḥsaram nayaṁti viprā bhadrāṁ ca kṣatriyāśca viśastathā
इस प्रकार यह सब होते हुए, ब्राह्मण कृष्ण को राम के आगे-आगे तथा क्षत्रिय और वैश्य भद्रा सुभद्रा को ले जाते हैं।
श्लोक 46 (skanda.2.73.46)
छत्रमाला समुदिता मुक्तास्रक्चीनतोरणा। रत्नध्वजा हेमदंडाः पार्श्वयोर्मुरवैरिणः
chatramālā samuditā muktāsrakcīnatoraṇā ratnadhvajā hemadaṁḍāḥ pārśvayormuravairiṇaḥ
छत्रों की पंक्तियाँ उठी हुई हों, मोतियों की मालाएँ और चीनी वस्त्रों के तोरण हों; रत्नजड़ित ध्वजाएँ और सोने के डंडे मुरारि के दोनों ओर हों।
श्लोक 47 (skanda.2.73.47)
राजा चतुर्विधा वर्णा अन्ये ये च पृथग्जनाः। दीना महांतश्च तदा समानास्तत्र भांति वै
rājā caturvidhā varṇā anye ye ca pṛthagjanāḥ dīnā mahāṁtaśca tadā samānāstatra bhāṁti vai
राजा, चारों वर्ण और अन्य सामान्य जन, दीन और महान सब वहाँ समान भाव से शोभा पाते हैं।
श्लोक 48 (skanda.2.73.48)
सलीलचरणन्यासं तूलिकास्तरणेषु तान्। वासयंतः क्वचित्छांता देवांस्ते रथमन्वियुः
salīlacaraṇanyāsaṁ tūlikāstaraṇeṣu tān vāsayaṁtaḥ kvacitchāṁtā devāṁste rathamanviyuḥ
उनके चरणों को क्रीड़ापूर्वक कोमल आस्तरणों पर रखते हुए, कहीं-कहीं उन्हें विश्राम कराते हुए, वे शांत सेवक रथ के पीछे-पीछे चलते हैं।
श्लोक 49 (skanda.2.73.49)
महोत्सवं समासाद्य गीतकोलाहलानि च। करे कृत्वा जगन्नाथं भ्रामयित्वा रथोत्तमम्
mahotsavaṁ samāsādya gītakolāhalāni ca kare kṛtvā jagannāthaṁ bhrāmayitvā rathottamam
महोत्सव में पहुँचकर, गीतों के कोलाहल के बीच, जगन्नाथ को हाथों में लेकर उत्तम रथ में घुमाकर,
श्लोक 50 (skanda.2.73.50)
रामं कृष्णं सुभद्रां च रथमध्ये निवेशयेत्। चारुचंद्रातपाढ्येन मंडपेन विराजिते
rāmaṁ kṛṣṇaṁ subhadrāṁ ca rathamadhye niveśayet cārucaṁdrātapāḍhyena maṁḍapena virājite
राम, कृष्ण और सुभद्रा को रथ के मध्य में विराजमान करे, जो सुंदर चंद्र-सी शुभ्र छतरी से सुशोभित है।
श्लोक 51 (skanda.2.73.51)
किंकिणीमालिकाभिश्च माल्यचामरभूषिते। ससारकृष्णागुरुजधूपपूरितगर्भके
kiṁkiṇīmālikābhiśca mālyacāmarabhūṣite sasārakṛṣṇāgurujadhūpapūritagarbhake
जो छोटी घंटियों की मालाओं, मालाओं और चँवरों से सुसज्जित है, तथा जिसका गर्भ-गृह सार और कृष्णागुरु की धूप से भरा है।
श्लोक 52 (skanda.2.73.52)
ततस्तान्वासयित्वा तु तूलिकासु सुरोत्तमान्। भूषयेद्विविधैर्भक्त्या वस्त्रालंकार माल्यकैः
tatastānvāsayitvā tu tūlikāsu surottamān bhūṣayedvividhairbhaktyā vastrālaṁkāra mālyakaiḥ
फिर उन्हें आस्तरणों पर बिठाकर, भक्तिपूर्वक विविध वस्त्र, आभूषण और मालाओं से सजाए।
श्लोक 53 (skanda.2.73.53)
पूजयेदुपचारैस्तैः समृद्धैर्भक्तिभावितैः। नातः परतरं विष्णोर्यात्रांतरमवेक्ष्यते
pūjayedupacāraistaiḥ samṛddhairbhaktibhāvitaiḥ nātaḥ parataraṁ viṣṇoryātrāṁtaramavekṣyate
समृद्ध और भक्तिभाव से पूर्ण उपचारों से उनकी पूजा करे; विष्णु की इस यात्रा से बढ़कर कोई और यात्रा नहीं देखी जाती।
श्लोक 54 (skanda.2.73.54)
यत्र स्वयं त्रिलोकेशः स्यंदनेन कुतूहलात्। मानयन्पूर्वमाज्ञां तां वर्षे वर्षे व्रजेदसौ
yatra svayaṁ trilokeśaḥ syaṁdanena kutūhalāt mānayanpūrvamājñāṁ tāṁ varṣe varṣe vrajedasau
जिसमें स्वयं त्रिलोकेश कुतूहलवश रथ पर सवार होकर, उस पूर्व आज्ञा का सम्मान करते हुए, हर वर्ष यात्रा करते हैं।
श्लोक 55 (skanda.2.73.55)
रथस्थितं व्रजंतं तं महावेदीमहोत्सवे। ये पश्यंति मुदा भक्त्या वासस्तेषां हरेः पदे
rathasthitaṁ vrajaṁtaṁ taṁ mahāvedīmahotsave ye paśyaṁti mudā bhaktyā vāsasteṣāṁ hareḥ pade
जो लोग महावेदी के महोत्सव में रथ पर विराजमान होकर जाते हुए उन्हें हर्ष और भक्तिपूर्वक देखते हैं, उनका निवास हरि के चरणों में होता है।
श्लोक 56 (skanda.2.73.56)
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं प्रतिजाने द्विजोत्तमाः। नातः श्रेयः परं विष्णोरुत्सवः शास्त्रसंमतः
satyaṁ satyaṁ punaḥ satyaṁ pratijāne dvijottamāḥ nātaḥ śreyaḥ paraṁ viṣṇorutsavaḥ śāstrasaṁmataḥ
सत्य, सत्य, पुनः सत्य — हे श्रेष्ठ द्विजो, मैं प्रतिज्ञा करता हूँ — शास्त्र-सम्मत विष्णु के इस उत्सव से बढ़कर कोई कल्याण नहीं है।
श्लोक 57 (skanda.2.73.57)
यथा रथविहारोऽयं महावेदीमहोत्सवः। यत्रागत्य दिवो देवाः स्वर्गं यांत्यधिकारिणः
yathā rathavihāro'yaṁ mahāvedīmahotsavaḥ yatrāgatya divo devāḥ svargaṁ yāṁtyadhikāriṇaḥ
यह रथ-विहार, महावेदी का यह महोत्सव, जहाँ स्वर्ग के देवता भी आकर अधिकारपूर्वक स्वर्ग को जाते हैं,
श्लोक 58 (skanda.2.73.58)
किं वच्मि तस्य माहात्म्यमुत्सवस्य मुरद्विषः। यस्य संकीर्तनात्पापं नश्येज्जन्म शतोद्भवम्
kiṁ vacmi tasya māhātmyamutsavasya muradviṣaḥ yasya saṁkīrtanātpāpaṁ naśyejjanma śatodbhavam
मुरद्विष कृष्ण के इस उत्सव की महिमा मैं क्या कहूँ, जिसके संकीर्तन मात्र से सौ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं?
श्लोक 59 (skanda.2.73.59)
महावेदीं व्रजंतं तं रथस्थं पुरुषोत्तमम्। बलभद्रं सुभद्रां च जन्मकोटिसमुद्भवम्
mahāvedīṁ vrajaṁtaṁ taṁ rathasthaṁ puruṣottamam balabhadraṁ subhadrāṁ ca janmakoṭisamudbhavam
महावेदी की ओर रथ पर जाते हुए पुरुषोत्तम, बलभद्र और सुभद्रा को देखकर, करोड़ों जन्मों में संचित पाप निःसंदेह नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 60 (skanda.2.73.60)
दृष्ट्वा पापं नाशयति नात्र कार्या विचारणा। रथच्छायां समाक्रम्य ब्रह्महत्या व्यपोहति
dṛṣṭvā pāpaṁ nāśayati nātra kāryā vicāraṇā rathacchāyāṁ samākramya brahmahatyā vyapohati
रथ की छाया में पैर रखने मात्र से ब्रह्महत्या जैसा पाप भी दूर हो जाता है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है।
श्लोक 61 (skanda.2.73.61)
तद्रेणुसंसक्तवपुस्त्रिविधां पापसंहतिम्। नाशयेत्स्वर्गगंगायाः स्नानजं फलमाप्नुयात्
tadreṇusaṁsaktavapustrividhāṁ pāpasaṁhatim nāśayetsvargagaṁgāyāḥ snānajaṁ phalamāpnuyāt
जिसका शरीर उस मार्ग की धूल से लिपट जाता है, वह त्रिविध पाप-समूह को नष्ट कर देता है और स्वर्ग-गंगा में स्नान का फल पाता है।
श्लोक 62 (skanda.2.73.62)
घनांबुवृष्टियोगेन रथमार्गे तु पंकिले। दिव्यदृष्ट्या च कृष्णस्य समस्तमलहारिणि
ghanāṁbuvṛṣṭiyogena rathamārge tu paṁkile divyadṛṣṭyā ca kṛṣṇasya samastamalahāriṇi
जब घनघोर वर्षा से रथ-मार्ग कीचड़युक्त हो जाता है — वह कीचड़ भी कृष्ण की दिव्य दृष्टि से समस्त मल का हरण करने वाला बन जाता है —
श्लोक 63 (skanda.2.73.63)
तत्र ये प्रणिपातांस्तु कुर्वते वैष्णवोत्तमाः। अनादिव्यूढपंकांस्ते हित्वा मोक्षमवाप्नुयुः
tatra ye praṇipātāṁstu kurvate vaiṣṇavottamāḥ anādivyūḍhapaṁkāṁste hitvā mokṣamavāpnuyuḥ
वहाँ जो श्रेष्ठ वैष्णव प्रणाम करते हैं, वे उस अनादिकाल से संचित पाप-रूपी कीचड़ को त्यागकर मोक्ष प्राप्त करते हैं।
श्लोक 64 (skanda.2.73.64)
गवां कोटिप्रदानस्य कन्यानामयुतस्य च। वाजिमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयः
gavāṁ koṭipradānasya kanyānāmayutasya ca vājimedhasahasrasya phalaṁ prāpnotyasaṁśayaḥ
करोड़ों गायों के दान, दस हजार कन्याओं के दान तथा हजार अश्वमेध यज्ञों का फल निःसंदेह प्राप्त होता है।
श्लोक 65 (skanda.2.73.65)
अनुगच्छंति कृष्णं ये यात्राकौतूहलादपि। अनुव्रजंति नित्यं वै देवाः शक्रपुरोगमाः
anugacchaṁti kṛṣṇaṁ ye yātrākautūhalādapi anuvrajaṁti nityaṁ vai devāḥ śakrapurogamāḥ
जो कुतूहलवश भी कृष्ण के पीछे-पीछे यात्रा में जाते हैं, उनके पीछे इन्द्र सहित देवता सदा चलते हैं।
श्लोक 66 (skanda.2.73.66)
पश्यंति ये रथं यांतं दारुब्रह्म सनातनम्। पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं तेषां प्रकीर्तितम्
paśyaṁti ye rathaṁ yāṁtaṁ dārubrahma sanātanam pade pade'śvamedhasya phalaṁ teṣāṁ prakīrtitam
जो सनातन दारु-ब्रह्म को रथ में जाते हुए देखते हैं, उन्हें हर कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल कहा गया है।
श्लोक 67 (skanda.2.73.67)
वेदैः स्तुवंति वेदानां वक्तारो मोक्षदायिनम्। इतिहासपुराणाद्यैः स्तोत्रैर्वापि स्वयंकृतैः
vedaiḥ stuvaṁti vedānāṁ vaktāro mokṣadāyinam itihāsapurāṇādyaiḥ stotrairvāpi svayaṁkṛtaiḥ
वेदों के वक्ता उन्हें वेदों से, मोक्षदाता को इतिहास-पुराण आदि से या स्वरचित स्तोत्रों से स्तुति करते हैं।
श्लोक 68 (skanda.2.73.68)
स्तुवंति पुंडरीकाक्षं ये वै विगतकल्मषाः। वैष्णवं योगमास्थाय मोदंते नारदादिभिः
stuvaṁti puṁḍarīkākṣaṁ ye vai vigatakalmaṣāḥ vaiṣṇavaṁ yogamāsthāya modaṁte nāradādibhiḥ
जो निष्पाप हो चुके हैं, वे पुण्डरीकाक्ष की स्तुति करते हुए वैष्णव योग में स्थित होकर नारद आदि के साथ आनंद मनाते हैं।
श्लोक 69 (skanda.2.73.69)
कुर्वंति वासुदेवाग्रे जयशब्देन वा स्तुतिम्। ते वै जयंति पापानि विविधानि न संशयः
kurvaṁti vāsudevāgre jayaśabdena vā stutim te vai jayaṁti pāpāni vividhāni na saṁśayaḥ
जो वासुदेव के आगे केवल जय शब्द से भी स्तुति करते हैं, वे निःसंदेह अपने नाना पापों पर विजय पाते हैं।
श्लोक 70 (skanda.2.73.70)
लयतालानभिज्ञोपि गीतमाधुर्यवर्जितः। नर्त्तनं कुरुते वापि गायत्यथ नरोत्तमः। वैष्णवोत्तमसंसर्गान्मुक्तिं प्राप्नोत्यसंशयः
layatālānabhijñopi gītamādhuryavarjitaḥ narttanaṁ kurute vāpi gāyatyatha narottamaḥ vaiṣṇavottamasaṁsargānmuktiṁ prāpnotyasaṁśayaḥ
लय-ताल न जानने वाला, गीत-माधुर्य से रहित मनुष्य भी यदि वहाँ नृत्य करे या गाए, तो श्रेष्ठ वैष्णवों के संग से निःसंदेह मुक्ति पाता है।
श्लोक 71 (skanda.2.73.71)
नामानि कीर्तयन्नस्य तेन याति सहैव यः। अनुव्रज्यात्तत्फलं वै प्राप्नोत्यत्र न संशयः
nāmāni kīrtayannasya tena yāti sahaiva yaḥ anuvrajyāttatphalaṁ vai prāpnotyatra na saṁśayaḥ
जो उनके नामों का कीर्तन करते हुए साथ चलता है, वह भी उसी फल को निःसंदेह प्राप्त करता है।
श्लोक 72 (skanda.2.73.72)
जय कृष्ण जय कृष्ण जय कृष्णेति यो वदेत्। गुंडिचानगरं यांतं कृष्णं भक्तिसमन्वितः। न मातृगर्भवासस्य स च दुःखमवाप्नुयात्
jaya kṛṣṇa jaya kṛṣṇa jaya kṛṣṇeti yo vadet guṁḍicānagaraṁ yāṁtaṁ kṛṣṇaṁ bhaktisamanvitaḥ na mātṛgarbhavāsasya sa ca duḥkhamavāpnuyāt
जो भक्तियुक्त होकर जय कृष्ण, जय कृष्ण, जय कृष्ण कहता है, जब कृष्ण गुंडिचा नगर की ओर जाते हैं, वह पुनः माता के गर्भ में रहने का दुःख कभी नहीं पाता।
श्लोक 73 (skanda.2.73.73)
चामरैर्व्यजनैः पुष्पस्तबकैर्नीलचोलकैः। रथस्याग्रस्थितो यो वै वीजयेत्पुरुषोत्तमम्
cāmarairvyajanaiḥ puṣpastabakairnīlacolakaiḥ rathasyāgrasthito yo vai vījayetpuruṣottamam
जो चँवरों, पंखों, पुष्प-गुच्छों और नीले वस्त्रों से रथ के आगे खड़े होकर पुरुषोत्तम को पंखा झलता है,
श्लोक 74 (skanda.2.73.74)
स वीज्यमानोप्सरोभिर्गंधर्वैरुपशोभितः। अनुव्रजद्भिस्त्रिदशैर्महेंद्रासनसंस्थितः
sa vījyamānopsarobhirgaṁdharvairupaśobhitaḥ anuvrajadbhistridaśairmaheṁdrāsanasaṁsthitaḥ
वह स्वयं अप्सराओं द्वारा पंखा झला जाता है, गंधर्वों से सुशोभित होता है, देवताओं द्वारा अनुगमित होकर इन्द्र के आसन पर विराजता है।
श्लोक 75 (skanda.2.73.75)
भुनक्ति भोगानतुलान्यावदाभूतसंप्लवम्। तदंते च ब्रह्मलोकं प्राप्य मुक्तिमवाप्नुयात्
bhunakti bhogānatulānyāvadābhūtasaṁplavam tadaṁte ca brahmalokaṁ prāpya muktimavāpnuyāt
वह प्रलयकाल तक अतुल भोगों का उपभोग करता है, और अंत में ब्रह्मलोक प्राप्त कर मुक्ति पाता है।
श्लोक 76 (skanda.2.73.76)
कृष्णस्य पुरतो ये वै पुष्पवृष्टिं प्रकुर्वते। ते वै मनोगतान्सर्वान्प्राप्नुवंति मनोरथान्
kṛṣṇasya purato ye vai puṣpavṛṣṭiṁ prakurvate te vai manogatānsarvānprāpnuvaṁti manorathān
जो कृष्ण के आगे पुष्प-वर्षा करते हैं, वे मन में इच्छित सभी मनोरथ प्राप्त करते हैं।
श्लोक 77 (skanda.2.73.77)
सहस्रनामभिः पुण्यैः पर्यटंति रथं तु ये। तेषां प्रदक्षिणं कुर्युस्त्रिदशानतकंधराः
sahasranāmabhiḥ puṇyaiḥ paryaṭaṁti rathaṁ tu ye teṣāṁ pradakṣiṇaṁ kuryustridaśānatakaṁdharāḥ
जो सहस्र-नाम के पुण्य से रथ की परिक्रमा करते हैं, देवता झुकी गर्दन से उनकी परिक्रमा करते हैं,
श्लोक 78 (skanda.2.73.78)
वसंति वैकुण्ठगृहे विष्णुतुल्यपराक्रमाः
vasaṁti vaikuṇṭhagṛhe viṣṇutulyaparākramāḥ
और वे विष्णु के समान पराक्रमी होकर वैकुण्ठ-भवन में निवास करते हैं।
श्लोक 79 (skanda.2.73.79)
तस्मिन्काले महापुण्ये देवर्षिपितृसेविते। एकं ब्रह्म त्रिधाभूतं माययानुगतं स्वया
tasminkāle mahāpuṇye devarṣipitṛsevite ekaṁ brahma tridhābhūtaṁ māyayānugataṁ svayā
उस महापुण्य काल में, जो देव-ऋषि-पितरों से सेवित है, एक ही ब्रह्म अपनी माया से अनुगत होकर तीन रूपों में,
श्लोक 80 (skanda.2.73.80)
साक्षाद्दारुस्वरूपेण महावेदीमहोत्सवम्
sākṣāddārusvarūpeṇa mahāvedīmahotsavam
साक्षात् दारु-स्वरूप से महावेदी के महोत्सव में—
श्लोक 81 (skanda.2.73.81)
रथारूढः कौतुकवान्यत्रयाति जगत्प्रभुः। तस्मिन्काले पृथिव्यां तु चरेत्तत्र महोत्सवम्
rathārūḍhaḥ kautukavānyatrayāti jagatprabhuḥ tasminkāle pṛthivyāṁ tu carettatra mahotsavam
रथारूढ़ होकर कौतुकपूर्वक जगत्प्रभु जहाँ जाते हैं, उस समय पृथ्वी पर वह महोत्सव मनाया जाना चाहिए।
श्लोक 82 (skanda.2.73.82)
देवा अप्युत्सवे तस्मिन्पुरुहूतपुरोगमाः। अभिमानं परित्यज्य श्रेणीभूता हि पार्श्वयोः
devā apyutsave tasminpuruhūtapurogamāḥ abhimānaṁ parityajya śreṇībhūtā hi pārśvayoḥ
उस उत्सव में देवता भी, इन्द्र को आगे कर, अभिमान त्यागकर दोनों ओर पंक्तिबद्ध होकर,
श्लोक 83 (skanda.2.73.83)
प्रकुर्वते महायात्रां तैस्तैर्दिव्यैः परिच्छदैः
prakurvate mahāyātrāṁ taistairdivyaiḥ paricchadaiḥ
अपने-अपने दिव्य परिच्छदों के साथ महायात्रा में सम्मिलित होते हैं।
श्लोक 84 (skanda.2.73.84)
तेषामग्रेसरस्तत्र देवोपि प्रपितामहः। चतुर्दशानां जगतां कर्त्ता यः परमेश्वरः
teṣāmagresarastatra devopi prapitāmahaḥ caturdaśānāṁ jagatāṁ karttā yaḥ parameśvaraḥ
उनमें अग्रगण्य वहाँ स्वयं प्रपितामह देव ब्रह्मा हैं, जो चौदह लोकों के रचयिता परमेश्वर हैं।
श्लोक 85 (skanda.2.73.85)
सोऽपि तत्र जगन्नाथं रथे यांतं महोत्सवे। ब्रह्मलोकात्परावृत्य स्तुवन्वेदमयैः स्तवैः। पदे पदे प्रणमति भगवंतं सनातनम्
so'pi tatra jagannāthaṁ rathe yāṁtaṁ mahotsave brahmalokātparāvṛtya stuvanvedamayaiḥ stavaiḥ pade pade praṇamati bhagavaṁtaṁ sanātanam
वे भी वहाँ, महोत्सव में रथ पर जाते हुए जगन्नाथ को, ब्रह्मलोक से लौटकर वेदमय स्तवों से स्तुति करते हुए, हर कदम पर सनातन भगवान को प्रणाम करते हैं।
श्लोक 86 (skanda.2.73.86)
यद्यप्यब्जनिधेः कृष्णान्न भेदोऽस्ति तथाप्ययम्। महोत्सवस्य महिमा यत्र सर्वेऽनुयायिनः
yadyapyabjanidheḥ kṛṣṇānna bhedo'sti tathāpyayam mahotsavasya mahimā yatra sarve'nuyāyinaḥ
यद्यपि कमल से उत्पन्न ब्रह्मा और कृष्ण में कोई भेद नहीं है, तथापि इस महोत्सव की यही महिमा है कि वहाँ सब उनके अनुयायी बन जाते हैं।
श्लोक 87 (skanda.2.73.87)
नातः परतरो लोके महावेदीमहोत्सवात्। सर्वपापहरो योगः सर्वतीर्थफलप्रदः
nātaḥ parataro loke mahāvedīmahotsavāt sarvapāpaharo yogaḥ sarvatīrthaphalapradaḥ
संसार में महावेदी के इस महोत्सव से बढ़कर सर्वपाप-हारी और सर्वतीर्थ-फलदायी कोई योग नहीं है।
श्लोक 88 (skanda.2.73.88)
कृष्णमुद्दिश्य यस्तत्र दानं ददाति वै नरः। यत्किंचिदक्षयफलं मेरुदानेन तत्समम्
kṛṣṇamuddiśya yastatra dānaṁ dadāti vai naraḥ yatkiṁcidakṣayaphalaṁ merudānena tatsamam
जो मनुष्य वहाँ कृष्ण को उद्दिष्ट करके दान देता है, उसका जो भी दान हो, वह मेरु-दान के समान अक्षय फल देने वाला होता है।
श्लोक 89 (skanda.2.73.89)
तस्याग्रे देवदेवस्य व्रजतो गुंडिचालयम्। यत्किंचित्कुरुते कर्म तत्तदक्षयमश्नुते
tasyāgre devadevasya vrajato guṁḍicālayam yatkiṁcitkurute karma tattadakṣayamaśnute
देवाधिदेव के आगे, गुंडिचा-आलय की ओर जाते हुए, जो भी कर्म वहाँ किया जाए, वह अक्षय फल देने वाला होता है।
श्लोक 90 (skanda.2.73.90)
उपायनानि नाना वै भक्ष्यभोज्यानि चैव हि। समर्पयंति देवाय तत्प्रीत्यै वा द्विजन्मने। तेषामक्षयपुण्यानि सर्वकामप्रदानि च
upāyanāni nānā vai bhakṣyabhojyāni caiva hi samarpayaṁti devāya tatprītyai vā dvijanmane teṣāmakṣayapuṇyāni sarvakāmapradāni ca
जो भक्त वहाँ भगवान को प्रसन्न करने के लिए अथवा ब्राह्मणों को नाना प्रकार के उपायन और भक्ष्य-भोज्य अर्पित करते हैं, उनके पुण्य अक्षय और सर्वकाम-प्रद होते हैं।
श्लोक 91 (skanda.2.73.91)
हरेरग्रेसरा ये वै पश्यंतस्तन्मुखांबुजम्। पदे पदे नमंतश्च पंकधूलिपरिप्लुताः
hareragresarā ye vai paśyaṁtastanmukhāṁbujam pade pade namaṁtaśca paṁkadhūlipariplutāḥ
जो हरि के आगे-आगे उनके मुख-कमल को देखते हुए, हर कदम पर प्रणाम करते हुए, कीचड़ और धूल से लथपथ चलते हैं,
श्लोक 92 (skanda.2.73.92)
विहाय पाप कवचमभेद्यं कोटिजन्मभिः। क्षणान्मुक्तिफलं प्राप्य यांति विष्णोः शुभालयम्
vihāya pāpa kavacamabhedyaṁ koṭijanmabhiḥ kṣaṇānmuktiphalaṁ prāpya yāṁti viṣṇoḥ śubhālayam
वे करोड़ों जन्मों के अभेद्य पाप-कवच को त्यागकर, क्षणभर में मुक्ति का फल पाकर विष्णु के शुभ धाम को जाते हैं।
श्लोक 93 (skanda.2.73.93)
सर्वक्रतूनां तीर्थानां दानानां यांति ते फलम्। भगवद्भक्तिभावानां नातः पुण्यतमो महः
sarvakratūnāṁ tīrthānāṁ dānānāṁ yāṁti te phalam bhagavadbhaktibhāvānāṁ nātaḥ puṇyatamo mahaḥ
वे सब यज्ञों, तीर्थों और दानों का फल पाते हैं; भगवद्भक्ति के भाव से बढ़कर कोई अन्य पुण्यतम अवसर नहीं है।
श्लोक 94 (skanda.2.73.94)
एवं स भगवान्कृष्णः सुभद्रारामसंगतः। व्रजन्स्यंदनश्रेष्ठस्थो द्योतयंश्च चतुर्दिशः
evaṁ sa bhagavānkṛṣṇaḥ subhadrārāmasaṁgataḥ vrajansyaṁdanaśreṣṭhastho dyotayaṁśca caturdiśaḥ
इस प्रकार वे भगवान कृष्ण, सुभद्रा और बलराम के साथ, श्रेष्ठ रथ पर विराजमान होकर चारों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए जाते हैं,
श्लोक 95 (skanda.2.73.95)
श्रीमदंगोपसृष्टेन मरुता सर्वदेहिनाम्। पापानि नाशयञ्छ्रीमान्दयालुर्भक्तभावनः
śrīmadaṁgopasṛṣṭena marutā sarvadehinām pāpāni nāśayañchrīmāndayālurbhaktabhāvanaḥ
अपने श्रीअंगों को छूकर आई वायु से समस्त प्राणियों के पाप नष्ट करते हुए — वे कृपालु, भक्त-भाव के रक्षक श्रीमान जाते हैं।
श्लोक 96 (skanda.2.73.96)
अज्ञानामप्यविश्वासभाजां विश्वासहेतवे। निसर्गमुक्तिदोऽप्येष यात्रारंभान्करोति वै
ajñānāmapyaviśvāsabhājāṁ viśvāsahetave nisargamuktido'pyeṣa yātrāraṁbhānkaroti vai
अज्ञानी अविश्वासी जनों में भी विश्वास उत्पन्न करने के लिए, यद्यपि वे स्वभाव से ही मुक्तिदाता हैं, तथापि वे यात्रा का आरंभ करते हैं।
श्लोक 97 (skanda.2.73.97)
व्रजन्समृद्ध्या देवानां मर्त्यानां च जनार्दनः। सूर्ये ललाटं तपति मध्याह्ने मार्गमध्यतः
vrajansamṛddhyā devānāṁ martyānāṁ ca janārdanaḥ sūrye lalāṭaṁ tapati madhyāhne mārgamadhyataḥ
देवताओं और मनुष्यों की समृद्धि के साथ जाते हुए जनार्दन, मध्याह्न में मार्ग के बीच सूर्य जब ललाट पर तपता है,
श्लोक 98 (skanda.2.73.98)
श्रांता कर्षजनस्तस्थौ म्लायन्वै तद्रजोवृतः। तत्रातपस्य शांत्यर्थं दर्पणेष्वभिषेचयेत्
śrāṁtā karṣajanastasthau mlāyanvai tadrajovṛtaḥ tatrātapasya śāṁtyarthaṁ darpaṇeṣvabhiṣecayet
तब थके हुए, धूल से आच्छादित, म्लान होते श्रमिक जन खड़े रह जाते हैं। वहाँ धूप की शांति के लिए दर्पणों में जल का अभिषेक करना चाहिए,
श्लोक 99 (skanda.2.73.99)
पंचामृतैः शीततोयैः पुष्पकर्पूरवासितैः। चामरैश्च जलार्द्रांतैः शीतलैर्व्यजनैस्तथा
paṁcāmṛtaiḥ śītatoyaiḥ puṣpakarpūravāsitaiḥ cāmaraiśca jalārdrāṁtaiḥ śītalairvyajanaistathā
शीतल जल में डूबे पंचामृत, पुष्प-कर्पूर से सुवासित, जल से भीगे चँवर तथा शीतल पंखों से,
श्लोक 100 (skanda.2.73.100)
वीजयेत्पुण्डरीकाक्षं सुभद्रां राममेव च। शीतैश्च पानकैर्हद्यैस्तथा खण्डविकारकैः
vījayetpuṇḍarīkākṣaṁ subhadrāṁ rāmameva ca śītaiśca pānakairhadyaistathā khaṇḍavikārakaiḥ
पुण्डरीकाक्ष, सुभद्रा और राम को पंखा झलना चाहिए; तथा शीतल, हृदयग्राही शर्बत और खाण्ड-विकार अर्पित करने चाहिए,
श्लोक 101 (skanda.2.73.101)
खर्जूरैर्नारिकेलैश्च नानारंभाफलैस्तथा। तथा क्षीरविकारैश्च पनसैस्तृणराजकैः
kharjūrairnārikelaiśca nānāraṁbhāphalaistathā tathā kṣīravikāraiśca panasaistṛṇarājakaiḥ
खजूर, नारियल और नाना प्रकार के केले, तथा दुग्ध-विकार, कटहल और गन्ना,
श्लोक 102 (skanda.2.73.102)
इक्षुभिः स्वादुहृद्यैश्च फलैर्नानाविधैस्तथा। वासितैः शीततोयैश्च पक्वतांबूलपत्रकैः
ikṣubhiḥ svāduhṛdyaiśca phalairnānāvidhaistathā vāsitaiḥ śītatoyaiśca pakvatāṁbūlapatrakaiḥ
मीठे और मनोहर गन्ने तथा नाना प्रकार के फल, सुवासित शीतल जल तथा पके हुए पान के पत्ते,
श्लोक 103 (skanda.2.73.103)
सकर्पूरलवंगाद्यैः पूजयेत्पुरुषोत्तमम्
sakarpūralavaṁgādyaiḥ pūjayetpuruṣottamam
कर्पूर-लवंग आदि सहित — इन सबसे पुरुषोत्तम की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 104 (skanda.2.73.104)
तस्मिन्काले द्विजश्रेष्ठा ये पश्यंति जनार्दनम्। पूजयंति यथाशक्ति न ते संसारजं श्रमम्
tasminkāle dvijaśreṣṭhā ye paśyaṁti janārdanam pūjayaṁti yathāśakti na te saṁsārajaṁ śramam
उस समय, हे श्रेष्ठ द्विजो, जो जनार्दन को देखते और यथाशक्ति उनकी पूजा करते हैं, वे कभी संसार-जनित श्रम नहीं पाते;
श्लोक 105 (skanda.2.73.105)
प्राप्नुवंति द्विजश्रेष्ठा ब्रह्मलोकनिवासिनः
prāpnuvaṁti dvijaśreṣṭhā brahmalokanivāsinaḥ
हे द्विजश्रेष्ठो, वे ब्रह्मलोक में निवास प्राप्त करते हैं।
श्लोक 106 (skanda.2.73.106)
रथत्रयस्थितं देवत्रयं ये पुरुषर्षभाः। प्रदक्षिणं प्रकुर्वंति त्रिश्चतुः सप्त एव वा
rathatrayasthitaṁ devatrayaṁ ye puruṣarṣabhāḥ pradakṣiṇaṁ prakurvaṁti triścatuḥ sapta eva vā
जो पुरुषश्रेष्ठ तीनों रथों में विराजमान तीनों देवताओं की तीन, चार या सात बार परिक्रमा करते हैं,
श्लोक 107 (skanda.2.73.107)
दशप्रणामान्कृत्वांते स्थिताः प्रांजलयोऽग्रतः। पुरारथस्थितान्ब्रह्मा स्तुतिभिर्याभिरब्जभूः
daśapraṇāmānkṛtvāṁte sthitāḥ prāṁjalayo'grataḥ purārathasthitānbrahmā stutibhiryābhirabjabhūḥ
और अंत में दस प्रणाम करके सामने हाथ जोड़कर खड़े होते हैं — जिन स्तुतियों से कमल-जन्मा ब्रह्मा ने पूर्वकाल में रथ पर विराजमान उन्हें प्रसन्न किया था,
श्लोक 108 (skanda.2.73.108)
तुष्टाव ताभिर्देवेशं स्तुवंति परमेश्वरम्। ये नरा ब्रह्मलोकं ते प्रयांति नियतं द्विजाः
tuṣṭāva tābhirdeveśaṁ stuvaṁti parameśvaram ye narā brahmalokaṁ te prayāṁti niyataṁ dvijāḥ
उन्हीं स्तुतियों से देवेश परमेश्वर की स्तुति करते हैं — हे द्विजो, ऐसे मनुष्य निश्चित रूप से ब्रह्मलोक को जाते हैं।
श्लोक 109 (skanda.2.73.109)
ततोऽपराह्णे देवेशं दक्षिणानिलवीजितम्। शनैः शनैर्नयेद्गीतैवेंणुवीणादिनादितैः
tato'parāhṇe deveśaṁ dakṣiṇānilavījitam śanaiḥ śanairnayedgītaiveṁṇuvīṇādināditaiḥ
फिर अपराह्न में, दक्षिणी वायु से पंखा झलते देवेश को धीरे-धीरे गीत, वेणु-वीणा आदि की ध्वनि के साथ ले जाना चाहिए,
श्लोक 110 (skanda.2.73.110)
बंदिनः स्तुतिपाठैश्च कलैर्मधुरिकास्वनैः। निरंतरैः पुष्पवर्षैश्चामरांदोलनैस्तथा
baṁdinaḥ stutipāṭhaiśca kalairmadhurikāsvanaiḥ niraṁtaraiḥ puṣpavarṣaiścāmarāṁdolanaistathā
बंदीजनों के स्तुति-पाठ के साथ, मधुर स्वरों के साथ, निरंतर पुष्प-वर्षा और चँवर-आंदोलन के साथ।
श्लोक 111 (skanda.2.73.111)
एवं व्रजति देवेशे सूर्यश्चास्तंगतो भवेत्। दीपिकानां सहस्राणि ज्वालितानि सहस्रशः
evaṁ vrajati deveśe sūryaścāstaṁgato bhavet dīpikānāṁ sahasrāṇi jvālitāni sahasraśaḥ
इस प्रकार देवेश के जाते-जाते सूर्य अस्त हो जाता है; तब हजारों-हजारों दीपक जला दिए जाते हैं,
श्लोक 112 (skanda.2.73.112)
तदालोकप्रकाशेन मार्गशेषश्च नीयते। रथावरोहणेनैषां मण्डपारोहणेन च
tadālokaprakāśena mārgaśeṣaśca nīyate rathāvarohaṇenaiṣāṁ maṇḍapārohaṇena ca
और उस प्रकाश में शेष मार्ग तय किया जाता है, यहाँ तक कि रथ से उतरकर मंडप में प्रवेश हो जाता है।
श्लोक 113 (skanda.2.73.113)
संमर्दः सुमहांस्तत्र दिदृक्षूणां कुतूहलात्। मण्डपे वासयेद्देवं गुण्डिचाख्ये मनोहरे
saṁmardaḥ sumahāṁstatra didṛkṣūṇāṁ kutūhalāt maṇḍape vāsayeddevaṁ guṇḍicākhye manohare
वहाँ देखने की उत्सुकता से लोगों की बड़ी भीड़ उमड़ती है; देवता को सुंदर गुंडिचा नामक मंडप में विराजमान करना चाहिए,
श्लोक 114 (skanda.2.73.114)
चारुचंद्रातपे चारुमाल्यचामरभूषिते। रत्नस्तंभमये स्वर्णवेदिकोपस्कृतांतरे
cārucaṁdrātape cārumālyacāmarabhūṣite ratnastaṁbhamaye svarṇavedikopaskṛtāṁtare
जो सुंदर चंद्र-सी शुभ्र छतरी, सुंदर मालाओं और चँवरों से सुशोभित है, रत्न-स्तंभों से युक्त और स्वर्ण-वेदिका से सज्जित है,
श्लोक 115 (skanda.2.73.115)
प्राचीरवलयावीते सुधालेपसमुज्ज्वले। साधुसोपानघटिते चतुर्द्वारोपशोभिते
prācīravalayāvīte sudhālepasamujjvale sādhusopānaghaṭite caturdvāropaśobhite
जो प्राचीर की परिधि से घिरा, चूने के लेप से उज्ज्वल, सुंदर सोपानों से युक्त और चार द्वारों से सुशोभित है —
श्लोक 116 (skanda.2.73.116)
त्रैलोक्यांडबरयुते महावेद्यां महाक्रतोः। प्रादुर्भावो महेशस्य यत्राभूद्दारुवर्ष्मणः
trailokyāṁḍabarayute mahāvedyāṁ mahākratoḥ prādurbhāvo maheśasya yatrābhūddāruvarṣmaṇaḥ
त्रैलोक्य के वैभव से युक्त उस महावेदी में, जहाँ महान यज्ञ में महेश जगन्नाथ का दारु-स्वरूप में प्राकट्य हुआ था।