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वैष्णव खण्ड · अध्याय 75

दक्षिणाभिमुख प्रत्यागमन-यात्रा

अध्याय 74अध्याय-सूचीअध्याय 76

श्लोक 1 (skanda.2.75.1)

जैमिनिरुवाच। अतः परं प्रवक्ष्यामि रथरक्षाकरं विधिम्। भूतप्रेतादयो घोरा दारुणान्यद्भुतानि च

jaiminiruvāca ataḥ paraṁ pravakṣyāmi ratharakṣākaraṁ vidhim bhūtapretādayo ghorā dāruṇānyadbhutāni ca

जैमिनि ने कहा — अब आगे मैं रथ की रक्षा करने वाली विधि बताऊँगा; क्योंकि घोर और भयंकर भूत-प्रेत आदि वहाँ विघ्न डालने का प्रयत्न करते हैं।

श्लोक 2 (skanda.2.75.2)

न बाधंते रथान्येन मुनयो वश्च यन्मतम्। प्रत्यहं पूजयेद्देवान्कृष्णादीन्ध्वजसंस्थितान्

na bādhaṁte rathānyena munayo vaśca yanmatam pratyahaṁ pūjayeddevānkṛṣṇādīndhvajasaṁsthitān

वे रथों को बाधा नहीं पहुँचा पाते — यह मुनियों का मत है; प्रतिदिन ध्वज पर स्थित कृष्ण आदि देवताओं की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.2.75.3)

गंधपुष्पाक्षतैर्माल्यैरुपहारैरनुत्तमैः। गीतनृत्तादिकैश्चैव धूपदीपनिवेदनैः

gaṁdhapuṣpākṣatairmālyairupahārairanuttamaiḥ gītanṛttādikaiścaiva dhūpadīpanivedanaiḥ

गंध, पुष्प, अक्षत, माला और उत्तम उपहारों से, गीत-नृत्य आदि से, धूप-दीप-निवेदन से उनकी पूजा करे।

श्लोक 4 (skanda.2.75.4)

दिक्पालेभ्यो बलिं दद्यात्पायसान्नेन चान्वहम्। भूतप्रेतपिशाचेभ्यो दद्याच्च बलिमुत्तमम्

dikpālebhyo baliṁ dadyātpāyasānnena cānvaham bhūtapretapiśācebhyo dadyācca balimuttamam

दिक्पालों को प्रतिदिन खीर-अन्न से बलि दे, तथा भूत-प्रेत-पिशाचों को भी उत्तम बलि अर्पित करे।

श्लोक 5 (skanda.2.75.5)

रक्षेच्च यत्नतस्तान्वै रथानारोहणोचितान्। यथा न कश्चिदारोहेन्नरो ग्राम्यपशुस्तथा। पक्षिणश्च विशेषेण येषां वासो न शोभनः

rakṣecca yatnatastānvai rathānārohaṇocitān yathā na kaścidārohennaro grāmyapaśustathā pakṣiṇaśca viśeṣeṇa yeṣāṁ vāso na śobhanaḥ

रथों पर आरोहण के योग्य उन देवताओं की यत्नपूर्वक रक्षा करे, जिससे कोई ग्राम्य पशु उन पर न चढ़े, और विशेष रूप से जिन पक्षियों का वास शुभ नहीं होता, वे भी न बैठें।

श्लोक 6 (skanda.2.75.6)

अष्टमेऽह्नि पुनः कृत्वा दक्षिणाभिमुखान्रथान्। विभूषयेद्वस्त्रमाल्यपताकैश्चामरादिभिः

aṣṭame'hni punaḥ kṛtvā dakṣiṇābhimukhānrathān vibhūṣayedvastramālyapatākaiścāmarādibhiḥ

आठवें दिन पुनः रथों को दक्षिणाभिमुख करके, वस्त्र, माला, पताका और चँवर आदि से सुसज्जित करे।

श्लोक 7 (skanda.2.75.7)

नवम्यां वासयेद्देवांस्तेषु प्रातः समृद्धिमत्

navamyāṁ vāsayeddevāṁsteṣu prātaḥ samṛddhimat

नवमी को उन रथों पर देवताओं को विराजमान कराए; प्रातःकाल वह अत्यंत समृद्धिमय होता है।

श्लोक 8 (skanda.2.75.8)

दक्षिणाभिमुखा यात्रा विष्णोरेषा सुदुर्लभा। यात्रा प्रयत्नतः सा हि भक्तिश्रद्धासमन्वितैः

dakṣiṇābhimukhā yātrā viṣṇoreṣā sudurlabhā yātrā prayatnataḥ sā hi bhaktiśraddhāsamanvitaiḥ

विष्णु की यह दक्षिणाभिमुख यात्रा अत्यंत दुर्लभ है; यह यात्रा भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर यत्नपूर्वक करनी चाहिए।

श्लोक 9 (skanda.2.75.9)

यथा पूर्वा तथा चेयं द्वे च मुक्तिप्रदायिके। यात्राप्रवेशौ देवस्य एक एवोत्सवो मतः

yathā pūrvā tathā ceyaṁ dve ca muktipradāyike yātrāpraveśau devasya eka evotsavo mataḥ

जैसे पहली रथयात्रा वैसे ही यह वापसी यात्रा है; दोनों ही मुक्तिदायिनी हैं; भगवान की यात्रा और प्रवेश दोनों एक ही उत्सव माने गए हैं।

श्लोक 10 (skanda.2.75.10)

पुराविदो वदंत्येतां यात्रां नवदिनात्मिकाम्। एषा त्र्यवयवा यात्रा संपूर्णा यैरुपासिता

purāvido vadaṁtyetāṁ yātrāṁ navadinātmikām eṣā tryavayavā yātrā saṁpūrṇā yairupāsitā

पुराणविद् इस यात्रा को नौ दिनों की कहते हैं; यह त्रि-अंगों वाली यात्रा जिनके द्वारा पूर्ण रूप से उपासित होती है,

श्लोक 11 (skanda.2.75.11)

सुसंपूर्णफलस्तेषां महावेदीमहोत्सवः

susaṁpūrṇaphalasteṣāṁ mahāvedīmahotsavaḥ

उनके लिए महावेदी का महोत्सव पूर्ण फल देने वाला होता है।

श्लोक 12 (skanda.2.75.12)

गुंडिचामंडपात्कृष्णमायांतं दक्षिणामुखम्। रथस्थं बलिनं भद्रां पश्यंतो मुक्तिभागिनः

guṁḍicāmaṁḍapātkṛṣṇamāyāṁtaṁ dakṣiṇāmukham rathasthaṁ balinaṁ bhadrāṁ paśyaṁto muktibhāginaḥ

गुंडिचा-मंडप से दक्षिणाभिमुख होकर आते हुए कृष्ण को, बलवान बलराम और भद्रा सुभद्रा को रथ पर देखने वाले मुक्ति के भागी होते हैं।

श्लोक 13 (skanda.2.75.13)

उत्तराभिमुखान्दृदृष्ट्वा लभंते यादृश फलम्। रामादीन्स्यंदनस्थान्ये पश्यंत्येवं महोदयान्। यादृशं फलमाप्नुयुस्तादृशं दक्षिणामुखान्

uttarābhimukhāndṛdṛṣṭvā labhaṁte yādṛśa phalam rāmādīnsyaṁdanasthānye paśyaṁtyevaṁ mahodayān yādṛśaṁ phalamāpnuyustādṛśaṁ dakṣiṇāmukhān

उत्तराभिमुख जाते हुए देवताओं को देखकर जो फल मिलता है, राम आदि को रथस्थ महोदय रूप में देखने वालों को भी वही फल मिलता है, वैसा ही फल दक्षिणाभिमुख देवताओं को देखने वालों को भी प्राप्त होता है।

श्लोक 14 (skanda.2.75.14)

पदा यांतं रथे यांतं यः पश्येद्दक्षिणामुखम्। तस्य जन्म कृतार्थं स्याद्वाजिमेधः पदे पदे

padā yāṁtaṁ rathe yāṁtaṁ yaḥ paśyeddakṣiṇāmukham tasya janma kṛtārthaṁ syādvājimedhaḥ pade pade

जो पैदल चलते हुए अथवा रथ पर जाते हुए दक्षिणाभिमुख भगवान को देखता है, उसका जन्म सफल हो जाता है, और उसे हर कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

श्लोक 15 (skanda.2.75.15)

स्तुतिभिः प्रणिपातैश्च पुष्पवृष्टिभिरेव च। नानानृत्तोपहारैश्च व्यजनच्छत्रचामरैः। उपायनैर्बहुविधैरुपतिष्ठेद्रथाग्रतः

stutibhiḥ praṇipātaiśca puṣpavṛṣṭibhireva ca nānānṛttopahāraiśca vyajanacchatracāmaraiḥ upāyanairbahuvidhairupatiṣṭhedrathāgrataḥ

स्तुतियों, प्रणामों, पुष्प-वर्षा, नाना नृत्य-उपहारों, पंखा-छत्र-चँवर तथा नाना प्रकार के उपायनों से रथ के आगे उपस्थित होना चाहिए।

श्लोक 16 (skanda.2.75.16)

नीलाचलं समायांतं रथस्थं दक्षिणामुखम्। ये पश्यंति हृषीकेशं सुभद्रां लांगलायुधम्

nīlācalaṁ samāyāṁtaṁ rathasthaṁ dakṣiṇāmukham ye paśyaṁti hṛṣīkeśaṁ subhadrāṁ lāṁgalāyudham

जो नीलाचल की ओर आते हुए, दक्षिणाभिमुख रथ पर विराजमान हृषीकेश, सुभद्रा और हल-आयुध बलराम को देखते हैं,

श्लोक 17 (skanda.2.75.17)

कामकल्पतरुं पुंसां दर्शनादेव मुक्तिदम्। ते व्रजंति महात्मानो वैकुण्ठ भवनं हरेः

kāmakalpataruṁ puṁsāṁ darśanādeva muktidam te vrajaṁti mahātmāno vaikuṇṭha bhavanaṁ hareḥ

पुरुषों के लिए कामना-कल्पवृक्ष के समान, जिनका दर्शन मात्र मुक्ति देने वाला है — वे महात्मा हरि के वैकुण्ठ-भवन को जाते हैं।

श्लोक 18 (skanda.2.75.18)

रथेन विचरंतं तं सिन्धुतीरे जनार्दनम्। पश्यन्तं करुणापांगैः प्रणतान्पुरतो नरान्

rathena vicaraṁtaṁ taṁ sindhutīre janārdanam paśyantaṁ karuṇāpāṁgaiḥ praṇatānpurato narān

सिंधु के तट पर रथ द्वारा विचरण करते हुए जनार्दन को, जो करुणा भरी चितवन से आगे झुके हुए मनुष्यों को देखते हैं,

श्लोक 19 (skanda.2.75.19)

दक्षिणाभिमुखं यांतं प्रासादं नीलभूधरे। सर्वतीर्थनिधिं सर्वदानकल्पतरुं हरिम्

dakṣiṇābhimukhaṁ yāṁtaṁ prāsādaṁ nīlabhūdhare sarvatīrthanidhiṁ sarvadānakalpataruṁ harim

नीले पर्वत नीलाचल पर स्थित मंदिर की ओर दक्षिणाभिमुख होकर जाते हुए, सर्वतीर्थों के निधि, सर्वदान के कल्पवृक्ष हरि को जो देखते हैं,

श्लोक 20 (skanda.2.75.20)

स्तुवंतः प्रणमंतश्च श्रद्दधानाश्च ये नराः। न ते पुनरिहायांति ब्रह्मलोकस्थिता ध्रुवम्

stuvaṁtaḥ praṇamaṁtaśca śraddadhānāśca ye narāḥ na te punarihāyāṁti brahmalokasthitā dhruvam

जो मनुष्य स्तुति करते, प्रणाम करते और श्रद्धा रखते हैं, वे निश्चय ही ब्रह्मलोक में स्थित होकर फिर इस संसार में नहीं लौटते।

श्लोक 21 (skanda.2.75.21)

मुनयः कथितो वोऽयं महावेदीमहोत्सवः। यस्य संकीर्त्तनादेव निर्मलो जायते नरः

munayaḥ kathito vo'yaṁ mahāvedīmahotsavaḥ yasya saṁkīrttanādeva nirmalo jāyate naraḥ

हे मुनियो, यह महावेदी का महोत्सव तुम्हें बताया गया, जिसके संकीर्तन मात्र से मनुष्य निर्मल हो जाता है।

श्लोक 22 (skanda.2.75.22)

यश्चेदं कीर्तयेन्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः। शृणुयादपि बुद्धिस्थः शक्रलोकं व्रजेदसौ

yaścedaṁ kīrtayennityaṁ prātarutthāya mānavaḥ śṛṇuyādapi buddhisthaḥ śakralokaṁ vrajedasau

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसे नित्य कीर्तन करता है, या बुद्धिपूर्वक इसे सुनता भी है, वह इन्द्रलोक को जाता है।

श्लोक 23 (skanda.2.75.23)

प्रत्यर्चारूपमपि वा रथमास्थाप्य यो हरेः। कुर्याद्यात्रामिमां श्रद्धाभक्तिभावेन मानवः

pratyarcārūpamapi vā rathamāsthāpya yo hareḥ kuryādyātrāmimāṁ śraddhābhaktibhāvena mānavaḥ

अथवा जो मनुष्य श्रद्धा और भक्तिभाव से हरि की प्रत्यर्चा प्रतिनिधि मूर्ति को भी रथ पर स्थापित करके यह यात्रा करता है,

श्लोक 24 (skanda.2.75.24)

सोऽपि विष्णोः प्रसादेन गुंडिचोत्सवजं फलम्। प्राप्य वैकुण्ठभवनं याति नात्र विचारणा

so'pi viṣṇoḥ prasādena guṁḍicotsavajaṁ phalam prāpya vaikuṇṭhabhavanaṁ yāti nātra vicāraṇā

वह भी विष्णु की कृपा से गुंडिचा-उत्सव का फल पाकर वैकुण्ठ-भवन को प्राप्त होता है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 25 (skanda.2.75.25)

पश्य श्रीर्यावती विप्रा भक्तिर्वा श्रद्धयान्विता। तावतीयं महायात्रा यो यथा कर्तुमिच्छति

paśya śrīryāvatī viprā bhaktirvā śraddhayānvitā tāvatīyaṁ mahāyātrā yo yathā kartumicchati

हे विप्रो, देखो — जिस मनुष्य में जितनी श्री सामर्थ्य और जितनी श्रद्धायुक्त भक्ति हो, वह जैसा करना चाहे, यह महायात्रा उतनी ही उसके लिए फलदायी है।

श्लोक 26 (skanda.2.75.26)

इदं पवित्रं परमं रहस्यं वेधसोदितम्। कारयित्वाथवा दृष्ट्वा यन्नरो नावसीदति

idaṁ pavitraṁ paramaṁ rahasyaṁ vedhasoditam kārayitvāthavā dṛṣṭvā yannaro nāvasīdati

यह ब्रह्मा द्वारा कहा गया परम पवित्र रहस्य है; जो मनुष्य इसे कराकर अथवा देखकर इसमें भाग लेता है, वह कभी दुःखी नहीं होता।

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