वैष्णव खण्ड · अध्याय 76
शयनोत्सव और चातुर्मास्य-व्रत
श्लोक 1 (skanda.2.76.1)
जैमिनिरुवाच। अतः परं प्रवक्ष्यामि शयनोत्सवमुत्तमम्। आषाढीमवधिं कृत्वा हरेः स्वापस्तु कर्कटे
jaiminiruvāca ataḥ paraṁ pravakṣyāmi śayanotsavamuttamam āṣāḍhīmavadhiṁ kṛtvā hareḥ svāpastu karkaṭe
जैमिनि ने कहा — अब आगे मैं उत्तम शयनोत्सव का वर्णन करूँगा; आषाढ़ी को सीमा मानकर कर्क संक्रांति में हरि की शय्या होती है।
श्लोक 2 (skanda.2.76.2)
वार्षिकांश्चतुरो मासान्यावत्स्यात्कार्त्तिकी द्विजाः। अयं पुण्यतमः कालो हरेराराधनं प्रति
vārṣikāṁścaturo māsānyāvatsyātkārttikī dvijāḥ ayaṁ puṇyatamaḥ kālo harerārādhanaṁ prati
वर्षा के चार महीने जब तक कार्तिकी न आए, हे द्विजो, यह काल हरि की आराधना के लिए सर्वाधिक पुण्यमय है।
श्लोक 3 (skanda.2.76.3)
काश्यां बहुयुगं वासान्नियमव्रतसंस्थितेः। फलं यदुक्तं तद्विद्यात्क्षेत्रे श्रीपुरुषोत्तमे
kāśyāṁ bahuyugaṁ vāsānniyamavratasaṁsthiteḥ phalaṁ yaduktaṁ tadvidyātkṣetre śrīpuruṣottame
काशी में बहुत युगों तक नियम-व्रत में स्थित रहकर निवास करने का जो फल कहा गया है, वही फल श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र में जानना चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.2.76.4)
चातुर्मास्यदिनैकेन वसतः सन्निधौ हरेः। वार्षिकाणां चतुर्णां तु यान्यहानि वसन्नयेत्
cāturmāsyadinaikena vasataḥ sannidhau hareḥ vārṣikāṇāṁ caturṇāṁ tu yānyahāni vasannayet
चातुर्मास्य के एक ही दिन हरि की समीपता में निवास करने से, वर्षा के चार महीनों के जितने दिन बीतें,
श्लोक 5 (skanda.2.76.5)
पुण्यक्षेत्रे जगन्नाथसन्निधौ निर्मलांतरे। प्रत्यक्षं वाजिमेधस्य सहस्रस्य लभेत्फलम्
puṇyakṣetre jagannāthasannidhau nirmalāṁtare pratyakṣaṁ vājimedhasya sahasrasya labhetphalam
उस पुण्यक्षेत्र में, जगन्नाथ की समीपता में, निर्मल अंतःकरण से, प्रत्यक्ष रूप से सहस्र अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 6 (skanda.2.76.6)
स्नात्वा सिंधुजले पुण्ये दृष्ट्वा श्रीपुरुषोत्तमम्। चातुर्मास्यव्रते तिष्ठन्न शोचति कुतश्चन
snātvā siṁdhujale puṇye dṛṣṭvā śrīpuruṣottamam cāturmāsyavrate tiṣṭhanna śocati kutaścana
पवित्र सिंधु-जल में स्नान करके श्रीपुरुषोत्तम का दर्शन करके, चातुर्मास्य-व्रत में स्थित रहने वाला कहीं भी शोक नहीं करता।
श्लोक 7 (skanda.2.76.7)
चातुर्मास्ये निवसति क्षेत्रे श्रीपुरुषोत्तमे। साक्षाद्दृष्टिर्भगवतस्तद्द्वयं मुक्तिसाधनम्
cāturmāsye nivasati kṣetre śrīpuruṣottame sākṣāddṛṣṭirbhagavatastaddvayaṁ muktisādhanam
श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र में चातुर्मास्य में निवास करना, और भगवान का साक्षात् दर्शन — ये दोनों ही मुक्ति के साधन हैं।
श्लोक 8 (skanda.2.76.8)
तस्मात्सर्वाणि संत्यज्य श्रौतस्मार्त्तानि मानवः। प्रयत्नान्निवसेत्पुण्ये क्षेत्रे श्रीपुरुषोत्तमे
tasmātsarvāṇi saṁtyajya śrautasmārttāni mānavaḥ prayatnānnivasetpuṇye kṣetre śrīpuruṣottame
इसलिए मनुष्य को श्रौत-स्मार्त सभी कर्मों को त्यागकर, प्रयत्नपूर्वक उस पुण्यक्षेत्र श्रीपुरुषोत्तम में निवास करना चाहिए।
श्लोक 9 (skanda.2.76.9)
भोगिभोगासने सुप्तश्चातुर्मास्येषु वै प्रभुः। सर्व क्षेत्रेषु सान्निध्यं न करोति जगद्गुरुः
bhogibhogāsane suptaścāturmāsyeṣu vai prabhuḥ sarva kṣetreṣu sānnidhyaṁ na karoti jagadguruḥ
शेषनाग की सर्प-शय्या पर सोए हुए प्रभु, चातुर्मास्य में जगद्गुरु सभी क्षेत्रों में समान रूप से सान्निध्य नहीं देते।
श्लोक 10 (skanda.2.76.10)
अत्र साक्षान्निवसति यथा वैकुण्ठवेश्मनि। द्वादशस्वपि मासेषु भगवानत्र मूर्तिमान्। मुक्तिदश्चक्षुषा दृष्टश्चातुर्मास्ये विशेषतः
atra sākṣānnivasati yathā vaikuṇṭhaveśmani dvādaśasvapi māseṣu bhagavānatra mūrtimān muktidaścakṣuṣā dṛṣṭaścāturmāsye viśeṣataḥ
यहाँ वे साक्षात् वैसे ही निवास करते हैं जैसे वैकुण्ठ-भवन में; बारहों महीनों में भगवान यहाँ मूर्तिमान रहते हैं, परंतु चातुर्मास्य में उनका दर्शन विशेष रूप से मुक्तिदायी होता है।
श्लोक 11 (skanda.2.76.11)
अष्टमासनिवासेन दृष्ट्वा विष्णुं दिने दिने। यदाप्नोति फलं तद्धि चातुर्मास्यदिनैकतः
aṣṭamāsanivāsena dṛṣṭvā viṣṇuṁ dine dine yadāpnoti phalaṁ taddhi cāturmāsyadinaikataḥ
आठ महीने प्रतिदिन विष्णु का दर्शन करके निवास करने से जो फल मिलता है, वही फल चातुर्मास्य के एक ही दिन से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.2.76.12)
चातुर्मास्यनिवासेन क्षेत्रे श्रीपुरुषोत्तमे। दिनं दिनं महापुण्यं सर्वक्षत्रनिवासजम्। फलं ददाति भगवान्क्षेत्रे वर्षनिवासतः
cāturmāsyanivāsena kṣetre śrīpuruṣottame dinaṁ dinaṁ mahāpuṇyaṁ sarvakṣatranivāsajam phalaṁ dadāti bhagavānkṣetre varṣanivāsataḥ
श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र में चातुर्मास्य-निवास से हर दिन महापुण्यमय होता है, जो अन्य सभी क्षेत्रों में वर्ष भर निवास करने के बराबर फल भगवान प्रदान करते हैं।
श्लोक 13 (skanda.2.76.13)
सर्वपापप्रसक्तोऽपि सर्वाचारच्युतोऽपि च। सर्वधर्मबहिर्भूतो निवसेत्पुरुषोत्तमे
sarvapāpaprasakto'pi sarvācāracyuto'pi ca sarvadharmabahirbhūto nivasetpuruṣottame
चाहे मनुष्य सब पापों में लिप्त हो, सब आचार से भ्रष्ट हो, सब धर्मों से बाहर हो, तो भी उसे पुरुषोत्तम क्षेत्र में निवास करना चाहिए।
श्लोक 14 (skanda.2.76.14)
चातुर्मास्यमथेकं यः कुर्याद्वै पापकृन्नरः। विहाय सर्वपापानि बहिरंतश्च निर्मलः
cāturmāsyamathekaṁ yaḥ kuryādvai pāpakṛnnaraḥ vihāya sarvapāpāni bahiraṁtaśca nirmalaḥ
जो पापी मनुष्य भी एक चातुर्मास्य वहाँ करता है, वह बाहर और भीतर से सब पापों को त्यागकर निर्मल हो जाता है,
श्लोक 15 (skanda.2.76.15)
नरसिंहप्रसादेन वैकुण्ठभवनं व्रजेत्
narasiṁhaprasādena vaikuṇṭhabhavanaṁ vrajet
और नृसिंह की कृपा से वैकुण्ठ-भवन को जाता है।
श्लोक 16 (skanda.2.76.16)
तस्मान्नरः सर्वभावैर्विष्णोः शयनभावितान्। वार्षिकांश्चतुरो मासान्निवसेत्पुरुषोत्तमे
tasmānnaraḥ sarvabhāvairviṣṇoḥ śayanabhāvitān vārṣikāṁścaturo māsānnivasetpuruṣottame
इसलिए मनुष्य को सर्वभाव से विष्णु की शयन-भावना से युक्त होकर, वर्षा के चारों महीने पुरुषोत्तम में निवास करना चाहिए।
श्लोक 17 (skanda.2.76.17)
कुर्यादन्यन्न वा कुर्याज्जन्मसाफल्यमृच्छति
kuryādanyanna vā kuryājjanmasāphalyamṛcchati
अन्य कुछ करे या न करे, इतने मात्र से ही उसका जन्म सफल हो जाता है।
श्लोक 18 (skanda.2.76.18)
आषाढशुक्लैकादश्यां कुर्यात्स्वापमहोत्सवम्। मण्डपं रचयेत्तत्र शयनागारमुत्तमम्
āṣāḍhaśuklaikādaśyāṁ kuryātsvāpamahotsavam maṇḍapaṁ racayettatra śayanāgāramuttamam
आषाढ़ शुक्ल एकादशी को शयन-महोत्सव करे; वहाँ उत्तम शयनागार का मंडप रचे।
श्लोक 19 (skanda.2.76.19)
देवस्य पुरतः शय्यां रत्नपल्यंकिकोपरि। स्वास्तीर्य सोपधानां तु मृदुचीनोत्तरच्छदाम्
devasya purataḥ śayyāṁ ratnapalyaṁkikopari svāstīrya sopadhānāṁ tu mṛducīnottaracchadām
भगवान के आगे रत्न-जड़ित पलंग पर, तकिये सहित, मुलायम रेशमी चादर बिछाकर,
श्लोक 20 (skanda.2.76.20)
कर्पूरधूलिविक्षिप्तां साधुचंद्रातपां शुभाम्। सर्वतो वेष्टितां छिद्ररहितां चदनोक्षिताम्
karpūradhūlivikṣiptāṁ sādhucaṁdrātapāṁ śubhām sarvato veṣṭitāṁ chidrarahitāṁ cadanokṣitām
कर्पूर-चूर्ण से बिखरी, सुंदर चंद्र-सी छतरी से युक्त शुभ शय्या को, चारों ओर से घिरी, छिद्ररहित, चंदन से सिंचित,
श्लोक 21 (skanda.2.76.21)
साधुद्वारां समां स्निग्धां नानाचित्रोपशोभिताम्। एकं स्वापगृहं कृत्वा निशीथे प्रतिमात्रयम्
sādhudvārāṁ samāṁ snigdhāṁ nānācitropaśobhitām ekaṁ svāpagṛhaṁ kṛtvā niśīthe pratimātrayam
सुंदर द्वार वाली, समतल, स्निग्ध, नाना चित्रों से सुशोभित — एक शयनगृह बनाकर, आधी रात में तीन प्रतिमाओं को,
श्लोक 22 (skanda.2.76.22)
सौवर्णं राजतं वापि रीतिजं दार्षदं तथा। यथाश्रद्धं प्रकुर्वीत प्रशस्तं चोत्तरोत्तरम्
sauvarṇaṁ rājataṁ vāpi rītijaṁ dārṣadaṁ tathā yathāśraddhaṁ prakurvīta praśastaṁ cottarottaram
सोने की, चाँदी की, अथवा पीतल या पत्थर की, यथाश्रद्धा और उत्तरोत्तर श्रेष्ठ बनवाकर,
श्लोक 23 (skanda.2.76.23)
तत्त्रयाणां सुराणां वै पादमूले यथातथम्। निधाय पूजूयेद्देवांस्तच्छेषं तेषु निक्षिपेत्
tattrayāṇāṁ surāṇāṁ vai pādamūle yathātatham nidhāya pūjūyeddevāṁstaccheṣaṁ teṣu nikṣipet
उन तीनों देवताओं के चरणों के पास यथायोग्य रखकर, देवताओं की पूजा करे, और उसका शेष निर्माल्य उन्हीं में रख दे।
श्लोक 24 (skanda.2.76.24)
पूजांते भावयेदैक्य तेषां कृष्णादिभिः सह। एह्येहि भगवन्देव सर्वलोकैकजीवन
pūjāṁte bhāvayedaikya teṣāṁ kṛṣṇādibhiḥ saha ehyehi bhagavandeva sarvalokaikajīvana
पूजा के अंत में उनकी कृष्ण आदि मूल देवताओं के साथ एकता की भावना करे — 'हे भगवन् देव, आइए, आइए, हे सब लोकों के एकमात्र जीवन,
श्लोक 25 (skanda.2.76.25)
स्वापार्थं चतुरो मासान्सर्वकल्याणवृद्धये। इति संप्रार्थ्य देवेशांस्तदंगात्तत्स्रजां त्रयम्
svāpārthaṁ caturo māsānsarvakalyāṇavṛddhaye iti saṁprārthya deveśāṁstadaṁgāttatsrajāṁ trayam
चार महीने सोने के लिए, सब कल्याण की वृद्धि के लिए' — इस प्रकार देवेशों से प्रार्थना करके, उनके अंगों से तीन मालाएँ,
श्लोक 26 (skanda.2.76.26)
प्रत्यर्चासु विनिक्षिप्य मांगल्यस्तुतिगीतिभिः। नयेच्छय्यागृहद्द्वारं वासयेद्धटिकात्रये
pratyarcāsu vinikṣipya māṁgalyastutigītibhiḥ nayecchayyāgṛhaddvāraṁ vāsayeddhaṭikātraye
उन्हें प्रतिमाओं में रखकर, मंगल स्तुति-गीतों के साथ शयनगृह के द्वार तक ले जाए और तीन घड़ी तक वहाँ विराजमान कराए।
श्लोक 27 (skanda.2.76.27)
पंचामृतैः स्नापयेत्तान्पृथक्पलशताधिकैः। सुगन्धचंदनैर्लिप्तान्वस्त्रालंकरणादिभिः
paṁcāmṛtaiḥ snāpayettānpṛthakpalaśatādhikaiḥ sugandhacaṁdanairliptānvastrālaṁkaraṇādibhiḥ
उन्हें पंचामृत से, प्रत्येक सौ से अधिक पल की मात्रा में, अलग-अलग स्नान कराए, सुगंधित चंदन से लेप कर, वस्त्र-आभूषण आदि से सजाए।
श्लोक 28 (skanda.2.76.28)
पूजयित्वा यथान्यायं प्रांजलिर्मंत्रमुच्चरेत्। जगद्वन्द्य जगन्नाथ जगत्त्राणपरायण
pūjayitvā yathānyāyaṁ prāṁjalirmaṁtramuccaret jagadvandya jagannātha jagattrāṇaparāyaṇa
विधिपूर्वक पूजा करके हाथ जोड़कर यह मंत्र बोले — 'हे जगद्वंद्य जगन्नाथ, हे जगत् की रक्षा में तत्पर,
श्लोक 29 (skanda.2.76.29)
हिताय जगतामीश चातुर्मास्यान्घनागमान्। सुप्त्वा प्रशमयारिष्टाञ्छक्रेण सह पूजितः
hitāya jagatāmīśa cāturmāsyānghanāgamān suptvā praśamayāriṣṭāñchakreṇa saha pūjitaḥ
हे जगत् के हित के लिए ईश्वर, चातुर्मास्य के वर्षा-आगमन में सोकर, इन्द्र के साथ पूजित होकर अरिष्टों को शांत कीजिए,
श्लोक 30 (skanda.2.76.30)
एह्येहि शयनागारं सुखमत्र स्वप प्रभो। इति संप्रार्थ्य देवेशं स्वापयेत्पुरुषोत्तमम्
ehyehi śayanāgāraṁ sukhamatra svapa prabho iti saṁprārthya deveśaṁ svāpayetpuruṣottamam
आइए, आइए, शयनागार को; यहाँ सुखपूर्वक सोइए, हे प्रभु' — इस प्रकार देवेश से प्रार्थना करके पुरुषोत्तम को सुलाए।
श्लोक 31 (skanda.2.76.31)
सुदृढं बन्धयेद्द्वारं विष्णोः शयनवेश्मनः। स्वापयित्वा जगन्नाथं लभते सुखमुत्तमम्
sudṛḍhaṁ bandhayeddvāraṁ viṣṇoḥ śayanaveśmanaḥ svāpayitvā jagannāthaṁ labhate sukhamuttamam
विष्णु के शयन-गृह के द्वार को दृढ़तापूर्वक बंद कर दे; जगन्नाथ को सुलाकर मनुष्य उत्तम सुख प्राप्त करता है।
श्लोक 32 (skanda.2.76.32)
वार्षिकांश्चतुरो मासान्प्रसुप्ते वै जनार्दने। व्रतैरनेकैर्नियमैर्मासान्वै चतुरः क्षिपेत्
vārṣikāṁścaturo māsānprasupte vai janārdane vratairanekairniyamairmāsānvai caturaḥ kṣipet
वर्षा के चार महीने जब जनार्दन सोए हुए हों, तब अनेक व्रतों और नियमों से उन चार महीनों को व्यतीत करे।
श्लोक 33 (skanda.2.76.33)
कल्पस्थायी विष्णुलोके नरो भक्तो भवेद्ध्रुवम्। नियमव्रतानि गदतः शृणुध्वं मुनयो मम
kalpasthāyī viṣṇuloke naro bhakto bhaveddhruvam niyamavratāni gadataḥ śṛṇudhvaṁ munayo mama
ऐसा मनुष्य निश्चय ही एक कल्प तक विष्णुलोक में भक्त बनकर स्थायी रहता है। हे मुनियो, अब मुझसे नियम-व्रतों को सुनो।
श्लोक 34 (skanda.2.76.34)
मंचखट्वादिशयनं वर्जयेद्भक्तिमान्नरः। अनृतौ न व्रजेद्भार्यां मासं मधु परौदनम्
maṁcakhaṭvādiśayanaṁ varjayedbhaktimānnaraḥ anṛtau na vrajedbhāryāṁ māsaṁ madhu paraudanam
भक्तिमान मनुष्य चारपाई-खाट आदि पर सोना त्यागे; ऋतुकाल के अतिरिक्त पत्नी के पास न जाए; उस महीने मधु और सामान्य पके हुए चावल का सेवन न करे।
श्लोक 35 (skanda.2.76.35)
पटोलं मूलकं चैव वार्ताकं च न भक्षयेत्। अभक्ष्यं वर्जयेद्दूरान्मसूरं सितसर्षपम्
paṭolaṁ mūlakaṁ caiva vārtākaṁ ca na bhakṣayet abhakṣyaṁ varjayeddūrānmasūraṁ sitasarṣapam
परवल, मूली और बैंगन न खाए; मसूर और सफेद सरसों जैसे अभक्ष्य पदार्थों को दूर से ही त्याग दे।
श्लोक 36 (skanda.2.76.36)
राजमाषान्कुलत्थांश्च आशुधान्यं च संत्यजेत्। शाकं दधि पयो माषाच्छ्रावणादौ क्रमादिमान्
rājamāṣānkulatthāṁśca āśudhānyaṁ ca saṁtyajet śākaṁ dadhi payo māṣācchrāvaṇādau kramādimān
राजमाष और कुलत्थ तथा शीघ्र-पकने वाले अन्न को त्याग दे; श्रावण आदि महीनों में क्रमशः साग, दही, दूध और उड़द का त्याग करे।
श्लोक 37 (skanda.2.76.37)
राजगोपयतींस्त्यक्त्वा नारोहेच्चर्मपादुके। वार्षिकांश्चतुरो मासानव्रतेन नयेद्यदि। तस्य पापस्य शांत्यर्थं कार्तिके वा व्रती भवेत्
rājagopayatīṁstyaktvā nāroheccarmapāduke vārṣikāṁścaturo māsānavratena nayedyadi tasya pāpasya śāṁtyarthaṁ kārtike vā vratī bhavet
राजा और गोसेवियों की सेवा त्यागकर चमड़े की जूती न पहने; यदि वर्षा के चार महीने बिना व्रत के बिताए हों, तो उस पाप की शांति के लिए कार्तिक में व्रती बने।
श्लोक 38 (skanda.2.76.38)
नमः कृष्णाय हरये केशवाय नमोनमः। नमोऽस्तु नारसिंहाय विष्णवे पापजिष्णवे
namaḥ kṛṣṇāya haraye keśavāya namonamaḥ namo'stu nārasiṁhāya viṣṇave pāpajiṣṇave
'कृष्ण को नमस्कार, हरि को नमस्कार, केशव को बार-बार नमस्कार; नृसिंह को नमस्कार, पाप को जीतने वाले विष्णु को नमस्कार' —
श्लोक 39 (skanda.2.76.39)
सायं प्रातर्दिवामध्ये कर्मांतेषु च योजयेत्
sāyaṁ prātardivāmadhye karmāṁteṣu ca yojayet
इस मंत्र को संध्या, प्रातः, दिन के मध्य में तथा कर्मों के अंत में जपे।
श्लोक 40 (skanda.2.76.40)
तस्य पापानि घोराणि चितानि बहुजन्मसु। निर्दहत्येव सर्वाणि तूलराशिमिवानलः
tasya pāpāni ghorāṇi citāni bahujanmasu nirdahatyeva sarvāṇi tūlarāśimivānalaḥ
ऐसा करने वाले के अनेक जन्मों में संचित घोर पाप, अग्नि द्वारा रुई के ढेर के समान, सब भस्म हो जाते हैं।
श्लोक 41 (skanda.2.76.41)
एकाहारो यताहारो विष्णुनिर्माल्यभोजनः। आषाढीमवधिं कृत्वा कार्तिक्यवधि यो भवेत्। नक्तभोजी भवेद्वापि स्वर्गस्तस्याल्पकं फलम्
ekāhāro yatāhāro viṣṇunirmālyabhojanaḥ āṣāḍhīmavadhiṁ kṛtvā kārtikyavadhi yo bhavet naktabhojī bhavedvāpi svargastasyālpakaṁ phalam
एक बार भोजन करने वाला, संयमित आहार वाला, विष्णु के निर्माल्य का भोजन करने वाला, जो आषाढ़ी से कार्तिकी तक ऐसा रहे, अथवा रात्रि में ही भोजन करे, उसके लिए स्वर्ग का फल तो अल्प ही है, वह इससे कहीं अधिक पाता है।
श्लोक 42 (skanda.2.76.42)
तैलाभ्यंगं दिवास्वापं मृषावादं च वर्जयेत्। आषाढशुक्लैकादश्यां संक्रांतौ कर्कटस्य वा
tailābhyaṁgaṁ divāsvāpaṁ mṛṣāvādaṁ ca varjayet āṣāḍhaśuklaikādaśyāṁ saṁkrāṁtau karkaṭasya vā
तेल की मालिश, दिन में सोना और झूठ बोलना त्याग दे; आषाढ़ शुक्ल एकादशी को, अथवा कर्क-संक्रांति में,
श्लोक 43 (skanda.2.76.43)
आषाढ्यां वा नरो भक्त्या गृह्णीयान्नियमं व्रती। सर्वपापहरं देवं प्रपूज्य मधुसूदनम्
āṣāḍhyāṁ vā naro bhaktyā gṛhṇīyānniyamaṁ vratī sarvapāpaharaṁ devaṁ prapūjya madhusūdanam
अथवा आषाढ़ी को ही, भक्तिपूर्वक व्रती मनुष्य सर्वपाप-हारी मधुसूदन देव की पूजा करके नियम ग्रहण करे।
श्लोक 44 (skanda.2.76.44)
तदग्रे प्रतिसंकल्प्य व्रतार्चनजपादिकम्। प्रार्थयेत्परमानन्दं कृतांजलिपुटो व्रती
tadagre pratisaṁkalpya vratārcanajapādikam prārthayetparamānandaṁ kṛtāṁjalipuṭo vratī
उनके सामने व्रत, पूजा, जप आदि का संकल्प करके, हाथ जोड़कर व्रती परम आनंद के लिए प्रार्थना करे —
श्लोक 45 (skanda.2.76.45)
चातुर्मास्यव्रतं देव गृहीतं त्वत्प्रसादतः। तव प्रसादान्निर्विघ्नं सिद्धिमायातु केशव
cāturmāsyavrataṁ deva gṛhītaṁ tvatprasādataḥ tava prasādānnirvighnaṁ siddhimāyātu keśava
'हे देव, आपकी कृपा से मैंने चातुर्मास्य-व्रत ग्रहण किया है; हे केशव, आपकी कृपा से यह निर्विघ्न सिद्धि को प्राप्त हो।
श्लोक 46 (skanda.2.76.46)
व्रतेस्मिन्यद्यसंपूर्णे परलोकगतिर्भवेत्। तन्मे भवतुसंपूर्णं त्वत्प्रसादादधोक्षज
vratesminyadyasaṁpūrṇe paralokagatirbhavet tanme bhavatusaṁpūrṇaṁ tvatprasādādadhokṣaja
यदि यह व्रत अपूर्ण रह जाए, तो मेरी परलोक-गति अटक जाएगी; इसलिए हे अधोक्षज, आपकी कृपा से यह पूर्ण हो।'
श्लोक 47 (skanda.2.76.47)
इति संप्रार्थ्य देवेशं पूर्वोक्तनियमे स्थितः। यापयेच्चतुरो मासान्विष्ण्वर्पित मतिर्व्रती
iti saṁprārthya deveśaṁ pūrvoktaniyame sthitaḥ yāpayeccaturo māsānviṣṇvarpita matirvratī
इस प्रकार देवेश से प्रार्थना करके, पूर्वोक्त नियम में स्थित रहकर, विष्णु में मन अर्पित किए हुए व्रती चार महीने बिताए।
श्लोक 48 (skanda.2.76.48)
पारणं प्रतिमासांते प्रीत्यै कृष्णस्य कारयेत्
pāraṇaṁ pratimāsāṁte prītyai kṛṣṇasya kārayet
प्रत्येक मास के अंत में कृष्ण की प्रसन्नता के लिए पारणा करे।
श्लोक 49 (skanda.2.76.49)
मिष्टान्नैर्भोजयेद्विप्रान्पूजयित्वा जगत्पतिम्। असमर्थस्तु कार्तिक्यां पारयेद्व्रतमुत्तमम्
miṣṭānnairbhojayedviprānpūjayitvā jagatpatim asamarthastu kārtikyāṁ pārayedvratamuttamam
जगत्पति की पूजा करके ब्राह्मणों को मिष्टान्न से भोजन कराए; जो असमर्थ हो, वह कार्तिकी को इस उत्तम व्रत की समाप्ति करे।
श्लोक 50 (skanda.2.76.50)
तस्यां पूज्य जगन्नाथं वह्निस्थं तर्पयेत्ततः। द्विजाग्र्यान्पायसैर्मिष्टैर्विष्णुभक्त्या प्रपूजयेत्
tasyāṁ pūjya jagannāthaṁ vahnisthaṁ tarpayettataḥ dvijāgryānpāyasairmiṣṭairviṣṇubhaktyā prapūjayet
उस दिन जगन्नाथ की पूजा करके अग्नि में स्थित देव को तर्पण दे, फिर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को मीठी खीर से विष्णु-भक्तिपूर्वक भोजन कराए।
श्लोक 51 (skanda.2.76.51)
यथाशक्त्या प्रदद्याद्वै कनकं वस्त्रमेव च। अशक्तः कार्तिके मासि व्रतं कुर्यात्पुरोदितम्
yathāśaktyā pradadyādvai kanakaṁ vastrameva ca aśaktaḥ kārtike māsi vrataṁ kuryātpuroditam
यथाशक्ति सोना और वस्त्र दान में दे; जो असमर्थ हो, वह कार्तिक मास में पूर्वोक्त व्रत करे।
श्लोक 52 (skanda.2.76.52)
व्रतं च विविधं विष्णोः कृच्छ्रचांद्रायणं तथा
vrataṁ ca vividhaṁ viṣṇoḥ kṛcchracāṁdrāyaṇaṁ tathā
विष्णु के लिए नाना प्रकार के व्रत हैं, तथा कृच्छ्र और चांद्रायण व्रत भी हैं।
श्लोक 53 (skanda.2.76.53)
पयः पीत्वा नयेद्यस्तु शाकाहारेण वा पुनः। भुक्त्वात्र विपुलान्भोगान्परं निर्वाणमृच्छति
payaḥ pītvā nayedyastu śākāhāreṇa vā punaḥ bhuktvātra vipulānbhogānparaṁ nirvāṇamṛcchati
जो केवल दूध पीकर, अथवा साग-सब्जी के आहार से इसे पूरा करता है, वह यहाँ प्रचुर भोगों को भोगकर अंततः परम निर्वाण प्राप्त करता है।
श्लोक 54 (skanda.2.76.54)
तत्रापि चेदशक्तः स्याद्भीष्मपंचकमुत्तमम्। प्रीतये देवदेवस्य वन्यवृत्तिर्भवेद्व्रती
tatrāpi cedaśaktaḥ syādbhīṣmapaṁcakamuttamam prītaye devadevasya vanyavṛttirbhavedvratī
यदि इसके लिए भी असमर्थ हो, तो देवाधिदेव की प्रसन्नता के लिए उत्तम भीष्मपंचक व्रत करे, और व्रती वन्य आहार पर रहे।
श्लोक 55 (skanda.2.76.55)
एतद्व्रतं समाख्यातं भगवत्प्रीतिकारकम्। सर्वपापप्रशमनं विष्णुलोकगतिप्रदम्। धन्यं यशस्यमायुष्यं सर्वकामप्रसाधनम्
etadvrataṁ samākhyātaṁ bhagavatprītikārakam sarvapāpapraśamanaṁ viṣṇulokagatipradam dhanyaṁ yaśasyamāyuṣyaṁ sarvakāmaprasādhanam
यह भगवान की प्रसन्नता उत्पन्न करने वाला व्रत तुम्हें बताया गया, जो सब पापों को शांत करने वाला, विष्णुलोक की गति देने वाला, धन्यकारी, यशस्वी, आयुष्यकारी और सब कामनाओं को सिद्ध करने वाला है।
श्लोक 56 (skanda.2.76.56)
मुनयः प्रोक्तमेतद्वो रहस्यं शृणुतापरम्। एतद्व्रतानि चान्यानि व्रतानि सबहूनि च
munayaḥ proktametadvo rahasyaṁ śṛṇutāparam etadvratāni cānyāni vratāni sabahūni ca
हे मुनियो, यह रहस्य तुम्हें बताया गया; अब आगे कुछ और सुनो। यह व्रत और अन्य बहुत से व्रत हैं,
श्लोक 57 (skanda.2.76.57)
भगवद्भक्तिहीनानां जानीध्वं विफलानि वै। फलं महाक्रतूनां यत्तीर्थानां फलमुत्तमम्
bhagavadbhaktihīnānāṁ jānīdhvaṁ viphalāni vai phalaṁ mahākratūnāṁ yattīrthānāṁ phalamuttamam
जो भगवद्भक्ति से रहित हों, उन्हें निष्फल जानो; महान यज्ञों का जो फल है, तीर्थों का जो उत्तम फल है,
श्लोक 58 (skanda.2.76.58)
दानानां तपसां चैव सात्त्विकानां च यत्फलम्। एकया विष्णुभक्त्या तत्समग्रं फलमश्नुते
dānānāṁ tapasāṁ caiva sāttvikānāṁ ca yatphalam ekayā viṣṇubhaktyā tatsamagraṁ phalamaśnute
दान और तपस्या का तथा सात्त्विक कर्मों का जो फल है, वह सब फल केवल एक विष्णु-भक्ति से ही प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 59 (skanda.2.76.59)
ये पश्यंति महात्मानः शयनोप्सवमुत्तमम्। मातुर्गर्भे न स्वपंति कारयंति च ये महम्
ye paśyaṁti mahātmānaḥ śayanopsavamuttamam māturgarbhe na svapaṁti kārayaṁti ca ye maham
जो महात्मा इस उत्तम शयनोत्सव को देखते हैं, वे माता के गर्भ में फिर नहीं सोते, और जो इसे संपन्न कराते हैं वे भी नहीं सोते।
श्लोक 60 (skanda.2.76.60)
उत्सवांते व्रतं चेदं प्रतिज्ञाय तदग्रतः। पर्याप्तं पारयित्वा तु ब्रह्मलोके महीयते
utsavāṁte vrataṁ cedaṁ pratijñāya tadagrataḥ paryāptaṁ pārayitvā tu brahmaloke mahīyate
उत्सव के अंत में इस व्रत की प्रतिज्ञा उनके समक्ष करके, इसे पूरी तरह से समाप्त कर, मनुष्य ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है।