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वैष्णव खण्ड · अध्याय 80

प्रावरण-उत्सव

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81

श्लोक 1 (skanda.2.80.1)

जैमिनिरुवाच। मार्गशीर्षे सिते पक्षे षष्ठ्यां प्रावरणोत्सवम्। कृत्वा दृष्ट्वा नरो भक्त्या वैष्णवं लोकमाप्नुयात्

jaiminiruvāca mārgaśīrṣe site pakṣe ṣaṣṭhyāṁ prāvaraṇotsavam kṛtvā dṛṣṭvā naro bhaktyā vaiṣṇavaṁ lokamāpnuyāt

जैमिनि ने कहा — मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को प्रावरण-उत्सव करके तथा भक्तिपूर्वक देखकर मनुष्य वैष्णव लोक प्राप्त करता है।

श्लोक 2 (skanda.2.80.2)

विधानं तस्य वक्ष्यामि शृणुध्वं मुनयोऽधुना। वासोधिवासं कुर्वीत पंचम्यां निशि कर्मवित्

vidhānaṁ tasya vakṣyāmi śṛṇudhvaṁ munayo'dhunā vāsodhivāsaṁ kurvīta paṁcamyāṁ niśi karmavit

अब मैं उसकी विधि बताऊँगा, हे मुनियो, सुनो; विधिवेत्ता को पंचमी की रात्रि में वस्त्रों का अधिवास करना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.2.80.3)

देवाग्रे मंडपे कुर्यात्पद्ममष्टदलान्वितम्। दिक्पालान्पूजयेद्दिक्षु क्षेत्रपालं गणाधिपम्

devāgre maṁḍape kuryātpadmamaṣṭadalānvitam dikpālānpūjayeddikṣu kṣetrapālaṁ gaṇādhipam

देवता के आगे मंडप में अष्टदल कमल बनाए; दिशाओं में दिक्पालों, क्षेत्रपाल और गणाधिप (गणेश) की पूजा करे।

श्लोक 4 (skanda.2.80.4)

चंडप्रचंडौ च बहिश्चतुर्दिक्षु प्रपूजयेत्। मध्ये पात्रं समाधाय प्रोक्षयेद्वस्त्रवारिणा

caṁḍapracaṁḍau ca bahiścaturdikṣu prapūjayet madhye pātraṁ samādhāya prokṣayedvastravāriṇā

बाहर चारों दिशाओं में चण्ड और प्रचण्ड की पूजा करे; मध्य में पात्र स्थापित करके वस्त्र और जल से प्रोक्षण करे।

श्लोक 5 (skanda.2.80.5)

द्युतानस्त्वेति मंत्रेणच्छादयेद्दिव्यवाससा। सुधूपितं वस्त्रजातमेकविंशतिसंख्यकम्

dyutānastveti maṁtreṇacchādayeddivyavāsasā sudhūpitaṁ vastrajātamekaviṁśatisaṁkhyakam

'द्युतानस्तु' इस मंत्र से उसे दिव्य वस्त्र से ढके; भलीभाँति धूपित इक्कीस वस्त्रों के समूह को,

श्लोक 6 (skanda.2.80.6)

तन्मध्ये स्थापयेन्मंत्रं वैष्णवं च समुच्चरन्। अन्येन वाससा तद्धि समाच्छाद्य प्रयत्नतः

tanmadhye sthāpayenmaṁtraṁ vaiṣṇavaṁ ca samuccaran anyena vāsasā taddhi samācchādya prayatnataḥ

वैष्णव मंत्र का उच्चारण करते हुए उसके मध्य में स्थापित करे; फिर उसे दूसरे वस्त्र से यत्नपूर्वक ढक दे।

श्लोक 7 (skanda.2.80.7)

स्पृष्ट्वा जपेन्मंत्रमिमं संस्मरन्पुरुषोत्तमम्। आच्छादको यो जगतां तेजसा विष्णुरव्ययः

spṛṣṭvā japenmaṁtramimaṁ saṁsmaranpuruṣottamam ācchādako yo jagatāṁ tejasā viṣṇuravyayaḥ

उसे स्पर्श करके, पुरुषोत्तम का स्मरण करते हुए यह मंत्र जपे — 'जो जगत् को ढकने वाले, तेज से अव्यय विष्णु हैं,

श्लोक 8 (skanda.2.80.8)

वसनात्तस्य वस्त्र त्वं वस वासे जगत्पतेः। इन्द्रघोषस्त्वेति रक्षां विदध्यात्तस्य सर्वतः

vasanāttasya vastra tvaṁ vasa vāse jagatpateḥ indraghoṣastveti rakṣāṁ vidadhyāttasya sarvataḥ

आप, हे वस्त्र, उनके अपने ही वस्त्र से, जगत्पति के परिधान में निवास करो।' 'इन्द्रघोषस्तु' इस मंत्र से चारों ओर उसकी रक्षा करे।

श्लोक 9 (skanda.2.80.9)

पूजयेद्गंधपुष्पाभ्यां ततो देवं प्रपूजयेत्। सर्वलेपं प्रकुर्वीत नृत्यगीतैर्नयेन्निशाम्

pūjayedgaṁdhapuṣpābhyāṁ tato devaṁ prapūjayet sarvalepaṁ prakurvīta nṛtyagītairnayenniśām

गंध-पुष्प से उसकी पूजा करे, फिर देवता की पूजा करे; सम्पूर्ण अंगराग करे और नृत्य-गीत से रात्रि बिताए।

श्लोक 10 (skanda.2.80.10)

ततोऽरुणोदये काले प्रातःसंध्यासमीपतः। पुनः प्रपूजयेद्देवं पूर्ववत्सुसमाहितः

tato'ruṇodaye kāle prātaḥsaṁdhyāsamīpataḥ punaḥ prapūjayeddevaṁ pūrvavatsusamāhitaḥ

फिर अरुणोदय के समय, प्रातःसंध्या के निकट, पूर्ववत् सुसमाहित होकर पुनः देवता की पूजा करे।

श्लोक 11 (skanda.2.80.11)

ततस्तं पूजितं वस्त्रसमूहं बहिरानयेत्। कार्पासपट्टक्षौमाढ्यं तथैवाच्छादितं द्विजाः

tatastaṁ pūjitaṁ vastrasamūhaṁ bahirānayet kārpāsapaṭṭakṣaumāḍhyaṁ tathaivācchāditaṁ dvijāḥ

फिर उस पूजित वस्त्र-समूह को, जो कपास, पट्ट-रेशम और क्षौम (सन के वस्त्र) से समृद्ध और उसी प्रकार ढका हुआ है, हे द्विजो, बाहर लाए।

श्लोक 12 (skanda.2.80.12)

छत्रध्वजपताकाभिश्चामरांदोलनैस्तथा। गीतवादित्रनृत्यैश्च प्रसूनोत्किरणेन च

chatradhvajapatākābhiścāmarāṁdolanaistathā gītavāditranṛtyaiśca prasūnotkiraṇena ca

छत्र-ध्वज-पताकाओं के साथ, चँवर हिलाते हुए, गीत-वाद्य-नृत्य के साथ तथा पुष्प बिखेरते हुए,

श्लोक 13 (skanda.2.80.13)

प्रासादं त्रिः परिभ्रम्य देवं त्रिर्भ्रामयेत्ततः। आच्छादितं तदाकृष्य संस्कुयार्द्वीक्षणादिभिः

prāsādaṁ triḥ paribhramya devaṁ trirbhrāmayettataḥ ācchāditaṁ tadākṛṣya saṁskuyārdvīkṣaṇādibhiḥ

मंदिर की तीन परिक्रमा करके फिर देवता को तीन बार घुमाए; ढके हुए (पुराने वस्त्र) को खींचकर हटाकर उन्हें ताज़े अंगराग आदि से संस्कारित करे,

श्लोक 14 (skanda.2.80.14)

सप्तभिः सप्तभिर्देवान्वासोभिः परिवेष्टयेत्। मुखवर्जं तु सर्वांगं शीतप्रावरणैर्द्विजाः

saptabhiḥ saptabhirdevānvāsobhiḥ pariveṣṭayet mukhavarjaṁ tu sarvāṁgaṁ śītaprāvaraṇairdvijāḥ

और सात-सात के सात समूहों में वस्त्रों से देवता को लपेटे, मुख को छोड़कर सारे अंगों को, हे द्विजो, शीत-वस्त्रों से।

श्लोक 15 (skanda.2.80.15)

तांबूलं च निवेद्याथ कर्पूरलतिकां तथा। दूर्वाक्षतैः प्रपूज्याथ कुर्यान्नीराजनं विभोः

tāṁbūlaṁ ca nivedyātha karpūralatikāṁ tathā dūrvākṣataiḥ prapūjyātha kuryānnīrājanaṁ vibhoḥ

फिर ताम्बूल और कर्पूर की लता निवेदित करके, दूर्वा-अक्षत से पूजा करके भगवान की आरती करे।

श्लोक 16 (skanda.2.80.16)

हिमागमे नृसिंहं ये प्रावृण्वंति सुचेलकैः। पश्यंति प्रावृतिं ये वा न तेषां मोहसंवृतिः

himāgame nṛsiṁhaṁ ye prāvṛṇvaṁti sucelakaiḥ paśyaṁti prāvṛtiṁ ye vā na teṣāṁ mohasaṁvṛtiḥ

जो हिम-ऋतु के आगमन पर नृसिंह को सुंदर वस्त्रों से ढकते हैं, अथवा जो उस आवरण को देखते हैं, उन्हें मोह का आवरण नहीं होता।

श्लोक 17 (skanda.2.80.17)

ते द्वंद्ववातशीतोत्थभयं नाप्नुवते क्वचित्। विष्णोर्देवाधिदेवस्य इमं प्रावरणोत्सवम्

te dvaṁdvavātaśītotthabhayaṁ nāpnuvate kvacit viṣṇordevādhidevasya imaṁ prāvaraṇotsavam

उन्हें द्वंद्व-रूपी शीत-वायु से उत्पन्न भय कभी नहीं होता। जो देवाधिदेव विष्णु के इस प्रावरण-उत्सव को,

श्लोक 18 (skanda.2.80.18)

भक्त्या ये वै प्रपश्यंति सर्वान्कामानवाप्नुयुः। भगवंतं समुद्दिश्य ब्राह्मणेभ्यः प्रदापयेत्

bhaktyā ye vai prapaśyaṁti sarvānkāmānavāpnuyuḥ bhagavaṁtaṁ samuddiśya brāhmaṇebhyaḥ pradāpayet

भक्तिपूर्वक देखते हैं, वे सब कामनाएँ प्राप्त करते हैं। भगवान को उद्दिष्ट करके ब्राह्मणों को,

श्लोक 19 (skanda.2.80.19)

गुरुभ्यश्चान्यदेवेभ्यो दीनानाथेभ्य एव च। शीतप्रावरणं दद्यात्सत्कृत्य परया मुदा। ददाति भगवान्प्रीतस्तस्मै वरमनुत्तमम्

gurubhyaścānyadevebhyo dīnānāthebhya eva ca śītaprāvaraṇaṁ dadyātsatkṛtya parayā mudā dadāti bhagavānprītastasmai varamanuttamam

गुरुओं, अन्य देवताओं तथा दीन-अनाथों को भी, परम हर्ष से सत्कारपूर्वक शीत-वस्त्र देना चाहिए; भगवान प्रसन्न होकर ऐसे मनुष्य को उत्तम वर देते हैं।

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