ब्रह्म खण्ड · अध्याय 15
हनूमत्कुण्ड की महिमा और सौ पुत्रों की प्राप्ति
श्लोक 1 (skanda.3.15.1)
श्रीसूत उवाच। ब्रह्मकुण्डे महापुण्ये स्नानं कृत्वा समाहितः। नरो हनूमतः कुण्डमथ गच्छेद्विजोत्तमाः
śrīsūta uvāca brahmakuṇḍe mahāpuṇye snānaṁ kṛtvā samāhitaḥ naro hanūmataḥ kuṇḍamatha gacchedvijottamāḥ
श्रीसूत जी ने कहा - महापुण्यमयी ब्रह्मकुण्ड में एकाग्रचित्त होकर स्नान करके, हे द्विजोत्तमो! मनुष्य को फिर हनूमान् के कुण्ड में जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.3.15.2)
पुरा हतेषु रक्षःसु समाप्ते रणकर्मणि। रामादिषु निवृत्तेषु गंधमादनपर्वते
purā hateṣu rakṣaḥsu samāpte raṇakarmaṇi rāmādiṣu nivṛtteṣu gaṁdhamādanaparvate
पूर्वकाल में जब राक्षस मारे जा चुके थे, युद्ध-कर्म समाप्त हो चुका था, और राम आदि गन्धमादन पर्वत पर विश्राम कर रहे थे,
श्लोक 3 (skanda.3.15.3)
सर्व लोकोपकाराय हनूमान्मारुतात्मजः। सर्वतीर्थोत्तमं चक्रे स्वनाम्ना तीर्थमुत्तमम्
sarva lokopakārāya hanūmānmārutātmajaḥ sarvatīrthottamaṁ cakre svanāmnā tīrthamuttamam
समस्त लोकों के उपकार के लिए वायुपुत्र हनूमान् ने अपने ही नाम से समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ एक उत्तम तीर्थ बनाया।
श्लोक 4 (skanda.3.15.4)
विदित्वा वैभवं यस्य स्वयं रुद्रेण सेव्यते। तस्य तीर्थस्य सदृशं न भूतं न भविष्यति
viditvā vaibhavaṁ yasya svayaṁ rudreṇa sevyate tasya tīrthasya sadṛśaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati
जिसका माहात्म्य जानकर स्वयं रुद्र भी उसका सेवन करते हैं, उस तीर्थ के समान न कोई हुआ है, न होगा।
श्लोक 5 (skanda.3.15.5)
यत्र स्नाता नरा यांति शिवलोकं सनातनम्। यस्मिंस्तीर्थे महापुण्ये महापातकनाशने
yatra snātā narā yāṁti śivalokaṁ sanātanam yasmiṁstīrthe mahāpuṇye mahāpātakanāśane
जहाँ स्नान किया हुआ मनुष्य सनातन शिवलोक को जाता है, वह तीर्थ महापुण्यमय और महापातकों का नाशक है -
श्लोक 6 (skanda.3.15.6)
सर्वलोकोपकाराय निर्मिते वायुसूनुना। सर्वाणि नरकाण्यासञ्च्छून्यान्येव चिराय वै
sarvalokopakārāya nirmite vāyusūnunā sarvāṇi narakāṇyāsañcchūnyānyeva cirāya vai
जो सभी लोकों के उपकार के लिए वायुपुत्र द्वारा निर्मित हुआ; इसी कारण चिरकाल से सभी नरक शून्य ही हो गए हैं।
श्लोक 7 (skanda.3.15.7)
वैभवं तस्य तीर्थस्य शंकरो वेत्ति वा न वा। यत्र धर्मसखोनाम राजा केकयवंशजः
vaibhavaṁ tasya tīrthasya śaṁkaro vetti vā na vā yatra dharmasakhonāma rājā kekayavaṁśajaḥ
उस तीर्थ के माहात्म्य को शंकर भी जानते हों या न जानते हों। जहाँ केकय-वंश में उत्पन्न धर्मसख नामक राजा ने,
श्लोक 8 (skanda.3.15.8)
भक्त्या सह पुरा स्नात्वा शतं पुत्रानवाप्त वान्। ऋषय ऊचुः। सूत धर्मसखस्याद्य चरितं वक्तुमर्हसि। हनूमत्कुण्डतीर्थे यो लेभे स्नात्वा शतं सुतान्
bhaktyā saha purā snātvā śataṁ putrānavāpta vān ṛṣaya ūcuḥ sūta dharmasakhasyādya caritaṁ vaktumarhasi hanūmatkuṇḍatīrthe yo lebhe snātvā śataṁ sutān
भक्तिपूर्वक पूर्वकाल में स्नान करके सौ पुत्र प्राप्त किए। ऋषियों ने कहा - हे सूत! अब आप धर्मसख के उस चरित्र को कहने योग्य हैं, जिसने हनूमत्कुण्ड-तीर्थ में स्नान करके सौ पुत्र प्राप्त किए।
श्लोक 9 (skanda.3.15.9)
श्रीसूत उवाच। शृणुध्वमृषयो यूयं चरितं तस्य भूपतेः
śrīsūta uvāca śṛṇudhvamṛṣayo yūyaṁ caritaṁ tasya bhūpateḥ
श्रीसूत जी ने कहा - हे ऋषियो! सुनिए उस राजा का चरित्र।
श्लोक 10 (skanda.3.15.10)
अद्य धर्मसखस्याहं प्रवक्ष्यामि समासतः। राजा धर्मसखोनाम विजितारिः सुधार्मिकः
adya dharmasakhasyāhaṁ pravakṣyāmi samāsataḥ rājā dharmasakhonāma vijitāriḥ sudhārmikaḥ
आज मैं धर्मसख के चरित्र को संक्षेप में कहूँगा। धर्मसख नामक राजा शत्रुओं को जीतने वाला, अत्यन्त धर्मात्मा,
श्लोक 11 (skanda.3.15.11)
बभूव नीतिमान्पूर्वं प्रजापालनतत्परः। तस्य भार्याशतं विप्रा वभूव पतिदैवतम्
babhūva nītimānpūrvaṁ prajāpālanatatparaḥ tasya bhāryāśataṁ viprā vabhūva patidaivatam
पहले नीतिमान् और प्रजापालन में तत्पर था। हे विप्रो! उसकी सौ पत्नियाँ थीं, जो पति को ही देवता मानने वाली थीं।
श्लोक 12 (skanda.3.15.12)
स पालयन्महीं राजा सशैलवनकाननाम्। तासु भार्यासु तनयं नाविंदद्वंशवर्द्धनम्
sa pālayanmahīṁ rājā saśailavanakānanām tāsu bhāryāsu tanayaṁ nāviṁdadvaṁśavarddhanam
पर्वत, वन और कानन-सहित पृथ्वी का पालन करते हुए वह राजा उन पत्नियों में वंश-वर्धक पुत्र प्राप्त न कर सका।
श्लोक 13 (skanda.3.15.13)
पुत्रार्थं स महीपालो बहूयत्नानथाकरोत्।५ अकरोच्च महादानं पुत्रार्थं स महीपतिः
putrārthaṁ sa mahīpālo bahūyatnānathākarot5 akarocca mahādānaṁ putrārthaṁ sa mahīpatiḥ
पुत्र के लिए उस राजा ने अनेक प्रयत्न किए, और पुत्र के लिए ही उस भूपति ने महादान भी किए।
श्लोक 14 (skanda.3.15.14)
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैरयजच्च सुरान्प्रति। तुलापुरुषमुख्यानि ददौ दानानि भूरिशः
aśvamedhādibhiryajñairayajacca surānprati tulāpuruṣamukhyāni dadau dānāni bhūriśaḥ
उसने अश्वमेध आदि यज्ञों से देवताओं का यजन किया और तुलापुरुष आदि प्रमुख दान बहुतायत से दिए।
श्लोक 15 (skanda.3.15.15)
आमध्यरात्रमन्नानि सर्वेभ्योऽप्यनिवारितम्। प्रायच्छद्बहुसूपानि सस्योपेतानि भूमिपः
āmadhyarātramannāni sarvebhyo'pyanivāritam prāyacchadbahusūpāni sasyopetāni bhūmipaḥ
वह भूमिपति आधी रात तक सबको बिना रोक-टोक अन्न देता रहा, अनेक व्यंजन, अन्न-सहित, प्रदान करता रहा।
श्लोक 16 (skanda.3.15.16)
पितॄनुद्दिश्य च श्राद्धमकरोद्विधिपूर्वकम्। संतानदायिनो मंत्राञ्जजाप नियतेद्रियः
pitṝnuddiśya ca śrāddhamakarodvidhipūrvakam saṁtānadāyino maṁtrāñjajāpa niyatedriyaḥ
उसने पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक श्राद्ध किया और इन्द्रियों को संयत रखते हुए संतान देने वाले मंत्रों का जप किया।
श्लोक 17 (skanda.3.15.17)
एवमादीन्बहून्धर्मान्पुत्रार्थं कृतवान्नृपः। पुत्रमुद्दिश्य सततं कुर्वन्धर्माननुत्तमान्
evamādīnbahūndharmānputrārthaṁ kṛtavānnṛpaḥ putramuddiśya satataṁ kurvandharmānanuttamān
इस प्रकार राजा ने पुत्र के लिए ऐसे अनेक धर्म किए, सदा पुत्र को लक्ष्य कर उत्तम धर्म-कर्म करते हुए।
श्लोक 18 (skanda.3.15.18)
राजा दीर्घेण कालेन वृद्धतां प्रत्यपद्यत। कदाचित्तस्य वृद्धस्य यतमानस्य भूपतेः
rājā dīrgheṇa kālena vṛddhatāṁ pratyapadyata kadācittasya vṛddhasya yatamānasya bhūpateḥ
दीर्घकाल में राजा वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ। एक बार उस वृद्ध, प्रयत्नशील राजा को -
श्लोक 19 (skanda.3.15.19)
पुत्रस्सुचंद्रनामाभूज्ज्येष्ठपत्न्यां मनोरमः। जातं पुत्रं जनन्यस्ताः सर्वा वैषम्यवर्जिताः
putrassucaṁdranāmābhūjjyeṣṭhapatnyāṁ manoramaḥ jātaṁ putraṁ jananyastāḥ sarvā vaiṣamyavarjitāḥ
उसकी ज्येष्ठ पत्नी से सुचन्द्र नामक एक मनोहर पुत्र उत्पन्न हुआ। उस उत्पन्न पुत्र को उसकी सभी माताओं ने, बिना किसी भेदभाव के,
श्लोक 20 (skanda.3.15.20)
समं संवर्द्धयामासुः क्षीरादिभिरनुत्तमाः। राज्ञश्च सर्वमातॄणां पौराणाम्मंत्रिणां तथा
samaṁ saṁvarddhayāmāsuḥ kṣīrādibhiranuttamāḥ rājñaśca sarvamātṝṇāṁ paurāṇāmmaṁtriṇāṁ tathā
दूध आदि से समान रूप से पालन किया। यह पुत्र राजा की, सभी माताओं की, नगरवासियों की और मंत्रियों की -
श्लोक 21 (skanda.3.15.21)
मनोनयनसंतोषजनकोऽयं सुतोऽभवत्। लालयानः सुतं राजा मुदं लेभे परात्पराम्
manonayanasaṁtoṣajanako'yaṁ suto'bhavat lālayānaḥ sutaṁ rājā mudaṁ lebhe parātparām
मन और नेत्रों को संतुष्ट करने वाला हुआ। पुत्र को दुलारते हुए राजा ने परम आनन्द प्राप्त किया।
श्लोक 22 (skanda.3.15.22)
आंदोलिकाशयानस्य सूनोस्तस्य कदाचन। वृश्चिकोऽकुट्टयत्पादे पुच्छेनोद्यद्विषाग्निना
āṁdolikāśayānasya sūnostasya kadācana vṛściko'kuṭṭayatpāde pucchenodyadviṣāgninā
एक बार झूले में सोए हुए उस पुत्र के पैर को, उठती हुई विष-अग्नि से युक्त अपनी पूँछ से एक बिच्छू ने काट लिया।
श्लोक 23 (skanda.3.15.23)
कुट्टनाद्वृश्चिकस्यासावरुदत्तनयो भृशम्। ततस्तन्मातरः सर्वाः प्रारुदञ्च्छोककातराः
kuṭṭanādvṛścikasyāsāvarudattanayo bhṛśam tatastanmātaraḥ sarvāḥ prārudañcchokakātarāḥ
बिच्छू के काटने से वह पुत्र अत्यन्त रोने लगा; तब उसकी सभी माताएँ भी शोक से व्याकुल होकर रोने लगीं,
श्लोक 24 (skanda.3.15.24)
परिवार्यात्मजं विप्राः सध्वनिः संकुलोऽभवत्। आर्तध्वनिं स शुश्राव राजा धर्मसखस्तदा
parivāryātmajaṁ viprāḥ sadhvaniḥ saṁkulo'bhavat ārtadhvaniṁ sa śuśrāva rājā dharmasakhastadā
हे विप्रो! पुत्र को घेरकर एक साथ रोने का शोर मच गया। राजा धर्मसख ने उस समय वह आर्तनाद सुना,
श्लोक 25 (skanda.3.15.25)
उपविष्टः सभामध्ये सहामात्यपुरोहितः। अथ प्रातिष्ठिपद्राजा सौविदल्लं स वेदितुम्
upaviṣṭaḥ sabhāmadhye sahāmātyapurohitaḥ atha prātiṣṭhipadrājā sauvidallaṁ sa veditum
जो मंत्री और पुरोहित सहित सभा के मध्य बैठे हुए थे। तब राजा ने पता लगाने के लिए एक सौविदल्ल (कंचुकी) को भेजा।
श्लोक 26 (skanda.3.15.26)
अन्तःपुरबहिर्द्वारं सौविदल्लः समेत्य सः। षंढवृद्धान्समाहूय वाक्यमेतदभाषत
antaḥpurabahirdvāraṁ sauvidallaḥ sametya saḥ ṣaṁḍhavṛddhānsamāhūya vākyametadabhāṣata
अन्तःपुर के बाहरी द्वार पर जाकर उस सौविदल्ल ने वृद्ध नपुंसकों को बुलाकर यह वचन कहा -
श्लोक 27 (skanda.3.15.27)
षंढाः किमर्थमधुना रुदत्यन्तःपुर स्त्रियः। तत्परिज्ञायतां तत्र गत्वा रोदनकारणम्
ṣaṁḍhāḥ kimarthamadhunā rudatyantaḥpura striyaḥ tatparijñāyatāṁ tatra gatvā rodanakāraṇam
'हे नपुंसको! अन्तःपुर की स्त्रियाँ अभी क्यों रो रही हैं? वहाँ जाकर रोने का कारण जान लो।
श्लोक 28 (skanda.3.15.28)
एतदर्थं हि मां राजा प्रेरयामास संसदि। इत्युक्तास्तु परिज्ञाय निदानं रोदनस्य ते
etadarthaṁ hi māṁ rājā prerayāmāsa saṁsadi ityuktāstu parijñāya nidānaṁ rodanasya te
इसी के लिए राजा ने मुझे सभा में भेजा है।' इस प्रकार कहे जाने पर उन्होंने रोने का कारण जानकर,
श्लोक 29 (skanda.3.15.29)
निर्गम्यांतःपुरात्तस्मै यथावृत्तं न्यवेदयत्। स षंढकवचः श्रुत्वा सौविदल्लः सभां गतः
nirgamyāṁtaḥpurāttasmai yathāvṛttaṁ nyavedayat sa ṣaṁḍhakavacaḥ śrutvā sauvidallaḥ sabhāṁ gataḥ
अन्तःपुर से बाहर निकलकर उसे यथावत् वृत्तान्त बताया। उन नपुंसकों की बात सुनकर वह सौविदल्ल सभा में गया,
श्लोक 30 (skanda.3.15.30)
राज्ञे निवेदयामास पुत्रं वृश्चिकपीडितम्। ततो धर्मसखो राजा श्रुत्वा वृत्तांतमीदृशम्
rājñe nivedayāmāsa putraṁ vṛścikapīḍitam tato dharmasakho rājā śrutvā vṛttāṁtamīdṛśam
और राजा को बताया कि पुत्र बिच्छू से पीड़ित है। तब धर्मसख राजा ऐसा समाचार सुनकर,
श्लोक 31 (skanda.3.15.31)
त्वरमाणः समुत्थाय सामात्यः सपुरोहितः। प्रविश्यांतःपुरं सार्द्धं मांत्रिकैर्विषहा रिभिः
tvaramāṇaḥ samutthāya sāmātyaḥ sapurohitaḥ praviśyāṁtaḥpuraṁ sārddhaṁ māṁtrikairviṣahā ribhiḥ
शीघ्रता से उठकर, मंत्री और पुरोहित के साथ, विष-नाशक मंत्रवादियों को लेकर अन्तःपुर में प्रविष्ट हुआ,
श्लोक 32 (skanda.3.15.32)
चिकित्सयामास सुतमौषधाद्यैरनेकशः। जातस्वास्थ्यं ततः पुत्रं लालयित्वा स भूपतिः
cikitsayāmāsa sutamauṣadhādyairanekaśaḥ jātasvāsthyaṁ tataḥ putraṁ lālayitvā sa bhūpatiḥ
और अनेक औषधियों आदि से पुत्र की चिकित्सा कराई। पुत्र के स्वस्थ हो जाने पर उस भूपति ने उसे दुलारकर,
श्लोक 33 (skanda.3.15.33)
मानयित्वा च मंत्रज्ञान्रत्नकां चनमौक्तिकैः। निष्क्रम्यांतःपुराद्राजा भृशं चिंतासमाकुलः
mānayitvā ca maṁtrajñānratnakāṁ canamauktikaiḥ niṣkramyāṁtaḥpurādrājā bhṛśaṁ ciṁtāsamākulaḥ
तथा मंत्रवेत्ताओं को रत्न, स्वर्ण और मोतियों से सम्मानित करके, अत्यन्त चिन्ता से व्याकुल राजा अन्तःपुर से बाहर निकला,
श्लोक 34 (skanda.3.15.34)
ऋत्विक्पुरोहितामात्यैस्तां सभां सनुपाविशत्। तत्र धर्मसखो राजा समासीनो वरासने। उवाचेदं वचो युक्तमृत्विजः सपुरोहितान्
ṛtvikpurohitāmātyaistāṁ sabhāṁ sanupāviśat tatra dharmasakho rājā samāsīno varāsane uvācedaṁ vaco yuktamṛtvijaḥ sapurohitān
और ऋत्विक्, पुरोहित तथा मंत्रियों के साथ उस सभा में बैठा। वहाँ श्रेष्ठ आसन पर बैठे धर्मसख राजा ने ऋत्विजों और पुरोहित से यह उचित वचन कहा -
श्लोक 35 (skanda.3.15.35)
धर्मसख उवाच। दुःखायैवैकपुत्रत्वं भवति ब्राह्मणो त्तमाः
dharmasakha uvāca duḥkhāyaivaikaputratvaṁ bhavati brāhmaṇo ttamāḥ
धर्मसख ने कहा - 'हे ब्राह्मणोत्तमो! एक ही पुत्र होना दुःख के लिए ही होता है।
श्लोक 36 (skanda.3.15.36)
एकपुत्रत्वतो तृणां वरा चैव ह्यपुत्रता। नित्यं व्यपाययुक्तत्वाद्वरमेव ह्यपुत्रता। अहं भार्याशतं विप्रा उदवोढ विचिंत्य तु
ekaputratvato tṛṇāṁ varā caiva hyaputratā nityaṁ vyapāyayuktatvādvarameva hyaputratā ahaṁ bhāryāśataṁ viprā udavoḍha viciṁtya tu
एक पुत्र होने से तो अपुत्रता ही सैकड़ों गुना श्रेष्ठ है, क्योंकि वह सदा भय से युक्त रहती है - अपुत्रता ही श्रेष्ठ है। हे विप्रो! मैंने विचारकर सौ पत्नियाँ ब्याहीं,
श्लोक 37 (skanda.3.15.37)
वयश्च समतिक्रांतं सपत्नीकस्य मे द्विजाः। प्राणा मम च भार्याणामस्मिन्पुत्रे व्यवस्थिताः
vayaśca samatikrāṁtaṁ sapatnīkasya me dvijāḥ prāṇā mama ca bhāryāṇāmasminputre vyavasthitāḥ
और हे द्विजो! मेरी और पत्नियों की भी आयु अब बीत चुकी है। मेरे और मेरी पत्नियों के प्राण इसी एक पुत्र पर टिके हैं;
श्लोक 38 (skanda.3.15.38)
तन्नाशे मम भार्याणां सर्वासां च मृतिर्ध्रुवा। ममापि प्राणनाशः स्यादेकपुत्रस्य मारणे
tannāśe mama bhāryāṇāṁ sarvāsāṁ ca mṛtirdhruvā mamāpi prāṇanāśaḥ syādekaputrasya māraṇe
उसके नष्ट होने पर मेरी सभी पत्नियों की मृत्यु निश्चित है। और इस एक पुत्र के मरने पर मेरा भी प्राण-नाश हो जाएगा।
श्लोक 39 (skanda.3.15.39)
अतो मे बहुपुत्रत्वं केनोपायेन वै भवेत्। तमुपायं मम ब्रूत ब्राह्मणा वेदवि त्तमाः
ato me bahuputratvaṁ kenopāyena vai bhavet tamupāyaṁ mama brūta brāhmaṇā vedavi ttamāḥ
इसलिए किस उपाय से मुझे बहुत पुत्र प्राप्त हों? हे वेदज्ञ ब्राह्मणो! मुझे वह उपाय बताइए,
श्लोक 40 (skanda.3.15.40)
एकैकः शतभार्यासु पुत्रो मे स्याद्यथा गुणी। तत्कर्म व्रत यूयं तु शास्त्रमालोक्य धर्मतः
ekaikaḥ śatabhāryāsu putro me syādyathā guṇī tatkarma vrata yūyaṁ tu śāstramālokya dharmataḥ
जिससे मेरी सौ पत्नियों में प्रत्येक को एक-एक गुणी पुत्र प्राप्त हो। शास्त्र देखकर धर्मानुसार वह कर्म आप ही निश्चित करें।
श्लोक 41 (skanda.3.15.41)
महता लघुना वापि कर्मणा दुष्करेण वा। फलं यद्यपि तत्साध्यं करिष्येऽहं न संशयः
mahatā laghunā vāpi karmaṇā duṣkareṇa vā phalaṁ yadyapi tatsādhyaṁ kariṣye'haṁ na saṁśayaḥ
चाहे वह बड़ा कर्म हो या छोटा, चाहे दुष्कर ही क्यों न हो, यदि उसका फल साध्य है तो मैं उसे अवश्य करूँगा, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 42 (skanda.3.15.42)
युष्माभिरुदितं कर्म करिष्यामि न संशयः। कृतमेव हि तद्वित्त शपेऽहं सुकृतैर्मम
yuṣmābhiruditaṁ karma kariṣyāmi na saṁśayaḥ kṛtameva hi tadvitta śape'haṁ sukṛtairmama
आप लोगों द्वारा कहा गया कर्म मैं अवश्य करूँगा, संशय नहीं। उसे किया हुआ ही मानिए - मैं अपने सुकृतों की शपथ लेकर कहता हूँ।
श्लोक 43 (skanda.3.15.43)
अस्ति चेदीदृशं कर्म येन पुत्रशतं भवेत्। तत्कर्म कुत्र कर्तव्यं मयेति वदताधुना
asti cedīdṛśaṁ karma yena putraśataṁ bhavet tatkarma kutra kartavyaṁ mayeti vadatādhunā
यदि ऐसा कोई कर्म है जिससे सौ पुत्र प्राप्त हों, तो अब बताइए कि वह कर्म मुझे कहाँ करना चाहिए।'
श्लोक 44 (skanda.3.15.44)
इति पृष्टास्तदा राज्ञा ऋत्विजः सपुरोहिताः। संभूय सर्वे राजानमिदमूचुः सुनिश्चितम्
iti pṛṣṭāstadā rājñā ṛtvijaḥ sapurohitāḥ saṁbhūya sarve rājānamidamūcuḥ suniścitam
इस प्रकार राजा द्वारा पूछे गए ऋत्विक् और पुरोहित सब मिलकर राजा से यह सुनिश्चित वचन बोले -
श्लोक 45 (skanda.3.15.45)
ऋत्विज ऊचुः। अस्ति राजन्प्रवक्ष्यामो येन पुत्रशतं तव। भवेद्धर्मेण महता शतभार्यासु कैकय
ṛtvija ūcuḥ asti rājanpravakṣyāmo yena putraśataṁ tava bhaveddharmeṇa mahatā śatabhāryāsu kaikaya
ऋत्विजों ने कहा - 'हे राजन्! हम बताते हैं वह उपाय है, जिससे हे कैकय! महान् धर्म-कर्म द्वारा तुम्हारी सौ पत्नियों में सौ पुत्र होंगे।
श्लोक 46 (skanda.3.15.46)
अस्ति कश्चिन्महापुण्यो गन्धमादनपर्वतः। दक्षिणांबुधिमध्ये यः सेतुरूपेण वर्तते
asti kaścinmahāpuṇyo gandhamādanaparvataḥ dakṣiṇāṁbudhimadhye yaḥ seturūpeṇa vartate
दक्षिण समुद्र के मध्य सेतु-रूप में स्थित एक अत्यन्त पवित्र गन्धमादन नामक पर्वत है,
श्लोक 47 (skanda.3.15.47)
सिद्धचारणगंधर्वदेवर्षिगणसंकुलः। दर्शनात्स्पर्शनान्नृणां महापातकनाशनः
siddhacāraṇagaṁdharvadevarṣigaṇasaṁkulaḥ darśanātsparśanānnṛṇāṁ mahāpātakanāśanaḥ
जो सिद्ध, चारण, गन्धर्व और देवर्षिगणों से भरा हुआ है, और मनुष्यों के दर्शन-स्पर्श मात्र से ही महापातकों का नाशक है।
श्लोक 48 (skanda.3.15.48)
तत्रास्ति हनुमत्कुंडमिति लोकेषु विश्रुतम्। महादुःखप्रशमनं स्वर्गमोक्षफलप्रदम्
tatrāsti hanumatkuṁḍamiti lokeṣu viśrutam mahāduḥkhapraśamanaṁ svargamokṣaphalapradam
वहाँ हनूमत्कुण्ड नाम से लोकों में विख्यात एक तीर्थ है, जो महादुःख को शान्त करने वाला, स्वर्ग और मोक्ष-फल देने वाला है,
श्लोक 49 (skanda.3.15.49)
नरकक्लेशशमनं तथा दारिद्र्यमोचनम्। पुत्रप्रदमपुत्राणामस्त्रीणां स्त्रीपदं नृणाम्
narakakleśaśamanaṁ tathā dāridryamocanam putrapradamaputrāṇāmastrīṇāṁ strīpadaṁ nṛṇām
नरक के क्लेश को शान्त करने वाला, तथा दरिद्रता से मुक्त करने वाला है। यह पुत्रहीनों को पुत्र देता है, और स्त्रीहीन पुरुषों को स्त्री-पद देता है।
श्लोक 50 (skanda.3.15.50)
तत्र त्वं प्रयतः स्नात्वा सर्वाभीष्टप्रदायिनीम्। पुत्रीयेष्टिं च तत्तीरे कुरुष्व सुसमाहितः
tatra tvaṁ prayataḥ snātvā sarvābhīṣṭapradāyinīm putrīyeṣṭiṁ ca tattīre kuruṣva susamāhitaḥ
वहाँ आप शुद्ध होकर स्नान करके, सभी अभीष्ट देने वाली पुत्रीयेष्टि उस तट पर पूर्ण एकाग्रचित्त होकर करें।
श्लोक 51 (skanda.3.15.51)
तेन ते शतभार्यासु प्रत्येकं तनयो नृप। एकैकस्तु भवेच्छीघ्रं मा कुरु ष्वात्र संशयम्
tena te śatabhāryāsu pratyekaṁ tanayo nṛpa ekaikastu bhavecchīghraṁ mā kuru ṣvātra saṁśayam
हे राजन्! इससे आपकी सौ पत्नियों में प्रत्येक को शीघ्र ही एक-एक पुत्र होगा - इसमें संशय मत कीजिए।'
श्लोक 52 (skanda.3.15.52)
तथोक्तो नृपतिर्विप्रैऋत्विक्भिः सपुरोहितैः। तत्क्षणेनैव ऋत्विक्भिर्भार्याभिश्च पुरोधसा
tathokto nṛpatirvipraiṛtvikbhiḥ sapurohitaiḥ tatkṣaṇenaiva ṛtvikbhirbhāryābhiśca purodhasā
ऋत्विजों और पुरोहित द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर राजा तत्क्षण ही ऋत्विजों, पत्नियों और पुरोहित सहित,
श्लोक 53 (skanda.3.15.53)
वृतोमात्यैश्च भृत्यैश्च यज्ञसंभारसंयुतः। प्रययौ दक्षिणांभोधौ गन्धमादनपर्वतम्
vṛtomātyaiśca bhṛtyaiśca yajñasaṁbhārasaṁyutaḥ prayayau dakṣiṇāṁbhodhau gandhamādanaparvatam
मंत्रियों और सेवकों से घिरा हुआ, यज्ञ-सामग्री सहित, दक्षिण समुद्र के गन्धमादन पर्वत को चल पड़ा।
श्लोक 54 (skanda.3.15.54)
हनुमत्कुंडमासाद्य तत्र सस्नौ ससैनिकः। मासमात्रं स तत्तीरे न्यवस त्स्नानमाचरन्
hanumatkuṁḍamāsādya tatra sasnau sasainikaḥ māsamātraṁ sa tattīre nyavasa tsnānamācaran
हनूमत्कुण्ड पहुँचकर उसने वहाँ सेना सहित स्नान किया; एक महीने तक उस तट पर रहकर नित्य स्नान करता रहा।
श्लोक 55 (skanda.3.15.55)
ततो वसंते संप्राप्ते चैत्रमासि नृपोत्तमः। इष्टिमारब्धवांस्तत्र पुत्रीयां सपुरोहितः
tato vasaṁte saṁprāpte caitramāsi nṛpottamaḥ iṣṭimārabdhavāṁstatra putrīyāṁ sapurohitaḥ
तब वसन्त-ऋतु आने पर, चैत्र मास में, उस श्रेष्ठ राजा ने पुरोहित सहित वहाँ पुत्रीयेष्टि आरम्भ की।
श्लोक 56 (skanda.3.15.56)
सम्यक्कर्माणि चक्रुस्ते ऋत्विजः सपुरोधसः। सपत्नीकस्य राजर्षेस्तथाधर्मसखस्य तु
samyakkarmāṇi cakruste ṛtvijaḥ sapurodhasaḥ sapatnīkasya rājarṣestathādharmasakhasya tu
पुरोहित सहित उन ऋत्विजों ने पत्नी सहित राजर्षि धर्मसख के लिए विधिपूर्वक सभी कर्म सम्पन्न किए।
श्लोक 57 (skanda.3.15.57)
इष्टौ तस्य समाप्तायां हनूमत्कुंडतीरतः। पुरोहितो हुतोच्छिष्टं प्राश यद्राजयोषितः
iṣṭau tasya samāptāyāṁ hanūmatkuṁḍatīrataḥ purohito hutocchiṣṭaṁ prāśa yadrājayoṣitaḥ
उसका यज्ञ समाप्त होने पर, हनूमत्कुण्ड के तट से पुरोहित ने राजा की पत्नियों को हवन का शेष अंश खिलाया।
श्लोक 58 (skanda.3.15.58)
ततो धर्मसखो राजा हनूमत्कुंडवारिषु। सम्यक्चकारावभृथस्नानं भार्याशतान्वितः
tato dharmasakho rājā hanūmatkuṁḍavāriṣu samyakcakārāvabhṛthasnānaṁ bhāryāśatānvitaḥ
तब राजा धर्मसख ने सौ पत्नियों सहित हनूमत्कुण्ड के जल में विधिपूर्वक अवभृथ-स्नान किया।
श्लोक 59 (skanda.3.15.59)
ऋत्विक्भ्यो दक्षिणाः प्रादादसंख्यातास्तु भूरिशः। ग्रामांश्च प्रददौ राजा बाह्मणेभ्यो द्विजोत्तमाः
ṛtvikbhyo dakṣiṇāḥ prādādasaṁkhyātāstu bhūriśaḥ grāmāṁśca pradadau rājā bāhmaṇebhyo dvijottamāḥ
उसने ऋत्विजों को असंख्य, प्रचुर दक्षिणाएँ दीं; और हे द्विजोत्तमो! राजा ने ब्राह्मणों को गाँव दान किए।
श्लोक 60 (skanda.3.15.60)
सामात्यः सपरीवारः सपत्नीकः स धार्म्मिकः। राजा ततो निववृते पुरीं स्वां प्रति नंदितः
sāmātyaḥ saparīvāraḥ sapatnīkaḥ sa dhārmmikaḥ rājā tato nivavṛte purīṁ svāṁ prati naṁditaḥ
वह धर्मात्मा राजा मंत्री, परिवार और पत्नियों सहित तब हर्षित होकर अपनी नगरी को लौट गया।
श्लोक 61 (skanda.3.15.61)
ततः कतिपये काले गते दशममामि वै। शतं भार्याः शतं पुत्रान्सुषुवुर्गुणवत्तरान्
tataḥ katipaye kāle gate daśamamāmi vai śataṁ bhāryāḥ śataṁ putrānsuṣuvurguṇavattarān
तत्पश्चात् कुछ काल बीतने पर, दसवें महीने में ही, सौ पत्नियों ने अत्यन्त गुणवान् सौ पुत्रों को जन्म दिया।
श्लोक 62 (skanda.3.15.62)
अथ प्रीतमना राजा वीरो धर्मसखो महान्। स्नातः शुद्धश्च संकल्प्य जातकर्माकरोत्तदा
atha prītamanā rājā vīro dharmasakho mahān snātaḥ śuddhaśca saṁkalpya jātakarmākarottadā
तब प्रसन्नचित्त, महान् वीर धर्मसख राजा ने स्नान कर शुद्ध होकर संकल्प करके उन सबका जातकर्म-संस्कार किया।
श्लोक 63 (skanda.3.15.63)
गोभूतिलहिरण्यादि ब्राह्मणेभ्यो ददौ बहु। द्वौ पुत्रौ ज्येष्ठभार्यायाः पूर्वजोऽवरजस्तदा
gobhūtilahiraṇyādi brāhmaṇebhyo dadau bahu dvau putrau jyeṣṭhabhāryāyāḥ pūrvajo'varajastadā
उसने ब्राह्मणों को गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि प्रचुर मात्रा में दान किए। ज्येष्ठ पत्नी के दो पुत्र थे - एक पहले जन्मा, एक बाद में।
श्लोक 64 (skanda.3.15.64)
सर्वे ववृधिरे पुत्रा एकाधिकशतं द्विजाः। प्रौढेषु तेषु राजासौ तेभ्यो राज्यं विभज्य तु
sarve vavṛdhire putrā ekādhikaśataṁ dvijāḥ prauḍheṣu teṣu rājāsau tebhyo rājyaṁ vibhajya tu
हे द्विजो! सभी एक सौ एक पुत्र बड़े हुए। उनके प्रौढ़ हो जाने पर उस राजा ने उन्हें राज्य विभाजित करके,
श्लोक 65 (skanda.3.15.65)
दत्त्वा च प्रययौ सेतुं सभार्यो गन्धमादनम्। हनुमत्कुंडमासाद्य तपोऽतप्यत तत्तटे
dattvā ca prayayau setuṁ sabhāryo gandhamādanam hanumatkuṁḍamāsādya tapo'tapyata tattaṭe
प्रदान कर, पत्नियों सहित सेतु, गन्धमादन को चल पड़ा। हनूमत्कुण्ड में पहुँचकर उसके तट पर तप करने लगा।
श्लोक 66 (skanda.3.15.66)
महान्कालो व्यतीयाय राज्ञ स्तस्य तपस्यतः। राज्ञो धर्मसखस्यास्य ध्यायमानस्य शूलिनम्
mahānkālo vyatīyāya rājña stasya tapasyataḥ rājño dharmasakhasyāsya dhyāyamānasya śūlinam
शूलधारी शिव का ध्यान करते हुए तप करते उस राजा धर्मसख का बहुत बड़ा समय व्यतीत हो गया।
श्लोक 67 (skanda.3.15.67)
ततो बहुतिथे काले गते धर्मसखो नृपः। कालधर्मं ययौ तत्र धार्म्मिकश्शांतमानसः
tato bahutithe kāle gate dharmasakho nṛpaḥ kāladharmaṁ yayau tatra dhārmmikaśśāṁtamānasaḥ
तत्पश्चात् बहुत समय बीतने पर, धर्मात्मा और शान्तचित्त राजा धर्मसख वहीं काल-धर्म को प्राप्त हुआ (देहत्याग किया)।
श्लोक 68 (skanda.3.15.68)
पत्न्योपि तस्य राजर्षेरनुजग्मुः पतिं तदा। ज्येष्ठपुत्रः सुचन्द्रोपि संस्कृत्य पितरं ततः
patnyopi tasya rājarṣeranujagmuḥ patiṁ tadā jyeṣṭhaputraḥ sucandropi saṁskṛtya pitaraṁ tataḥ
उस राजर्षि की पत्नियाँ भी तब अपने पति के पीछे चली गईं। तत्पश्चात् ज्येष्ठ पुत्र सुचन्द्र ने पिता का संस्कार करके,
श्लोक 69 (skanda.3.15.69)
अकरोच्छ्राद्ध पर्यंतं कर्माणि श्रद्धया सह। राजा सभार्यो वैकुंठं मरणादत्र जग्मिवान्
akarocchrāddha paryaṁtaṁ karmāṇi śraddhayā saha rājā sabhāryo vaikuṁṭhaṁ maraṇādatra jagmivān
श्रद्धापूर्वक श्राद्ध-पर्यन्त सभी कर्म सम्पन्न किए। राजा पत्नियों सहित मरणोपरान्त यहाँ से वैकुण्ठ को गए।
श्लोक 70 (skanda.3.15.70)
सुचन्द्रमुख्यास्ते सर्वे राजपुत्रा महौजसः। स्वस्वराज्यं बुभुजिरे भ्रातरस्त्यक्तमत्सराः
sucandramukhyāste sarve rājaputrā mahaujasaḥ svasvarājyaṁ bubhujire bhrātarastyaktamatsarāḥ
सुचन्द्र आदि वे सभी महातेजस्वी राजकुमार, ईर्ष्या त्यागकर भाइयों के रूप में अपने-अपने राज्य को भोगने लगे।
श्लोक 71 (skanda.3.15.71)
एवं वः कथितं विप्रा हनूमत्कुंडवैभवम्। राज्ञो धर्मसखस्यापि चरित्रं परमाद्भुतम्
evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā hanūmatkuṁḍavaibhavam rājño dharmasakhasyāpi caritraṁ paramādbhutam
हे विप्रो! इस प्रकार मैंने आपको हनूमत्कुण्ड की महिमा और राजा धर्मसख का परम अद्भुत चरित्र भी सुनाया।
श्लोक 72 (skanda.3.15.72)
तत्सर्वं कामसि द्ध्यर्थं स्नायात्कुंडे हनृमतः
tatsarvaṁ kāmasi ddhyarthaṁ snāyātkuṁḍe hanṛmataḥ
सभी कामनाओं की सिद्धि के लिए मनुष्य को हनूमान् के कुण्ड में स्नान करना चाहिए।
श्लोक 73 (skanda.3.15.73)
अध्यायमेनं पठते मनुष्यः शृणोति वा यः सुसमाहितो द्विजाः। सोऽनंतमाप्नोति सुखं परत्र क्रीडेत सार्द्धं दिवि देववृन्दैः
adhyāyamenaṁ paṭhate manuṣyaḥ śṛṇoti vā yaḥ susamāhito dvijāḥ so'naṁtamāpnoti sukhaṁ paratra krīḍeta sārddhaṁ divi devavṛndaiḥ
हे द्विजो! जो मनुष्य पूर्ण एकाग्रचित्त होकर इस अध्याय को पढ़ता या सुनता है, वह परलोक में अनन्त सुख प्राप्त करता है और स्वर्ग में देवगणों के साथ क्रीड़ा करता है।