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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 16

अगस्तितीर्थ की महिमा और कक्षीवान् के विवाह का प्रयत्न

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

श्लोक 1 (skanda.3.16.1)

सूत उवाच। कुंडे हनुमतः स्नात्वा स्वयं रुद्रेण सेविते। अगस्तितीर्थं विप्रेंद्रास्ततो गच्छेत्समाहितः

sūta uvāca kuṁḍe hanumataḥ snātvā svayaṁ rudreṇa sevite agastitīrthaṁ vipreṁdrāstato gacchetsamāhitaḥ

सूत जी ने कहा - स्वयं रुद्र द्वारा सेवित हनूमान् के कुण्ड में स्नान करके, हे विप्रेन्द्रो! फिर एकाग्रचित्त होकर अगस्तितीर्थ जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.3.16.2)

एतद्विनिर्मितं तीर्थं साक्षाद्वै कुम्भयोनिना। प्रवर्तमाने कलहे पुरा वै मेरुविंध्ययोः

etadvinirmitaṁ tīrthaṁ sākṣādvai kumbhayoninā pravartamāne kalahe purā vai meruviṁdhyayoḥ

यह तीर्थ साक्षात् कुम्भयोनि (अगस्त्य) द्वारा ही निर्मित हुआ, जब पूर्वकाल में मेरु और विन्ध्य में कलह छिड़ गया था।

श्लोक 3 (skanda.3.16.3)

निरुद्धभुवनाभोगो ववृधे विंध्यपर्वतः। तदा प्राणिषु सर्वेषु निरुच्छ्वासेषु देवताः

niruddhabhuvanābhogo vavṛdhe viṁdhyaparvataḥ tadā prāṇiṣu sarveṣu nirucchvāseṣu devatāḥ

विन्ध्य पर्वत बढ़ता हुआ लोक के मार्ग को रोकने लगा; तब सभी प्राणियों का श्वास रुक जाने पर देवता,

श्लोक 4 (skanda.3.16.4)

कैलासं पर्वतं गत्वा शंभवे तद्व्यजिज्ञपन्। तदा स पार्वतीपाणिग्रहणोत्सुककौतुकी

kailāsaṁ parvataṁ gatvā śaṁbhave tadvyajijñapan tadā sa pārvatīpāṇigrahaṇotsukakautukī

कैलास पर्वत जाकर शम्भु को यह निवेदन किया। उस समय पार्वती का पाणिग्रहण करने के उत्सुक कौतुकी शिव ने,

श्लोक 5 (skanda.3.16.5)

प्रेषयित्वा वसिष्ठादीन्पार्वतीं याचितुं मुनीन्। कुंभज त्वं निगृह्णीष्व विंध्याद्रिमिति सोऽन्वशात्

preṣayitvā vasiṣṭhādīnpārvatīṁ yācituṁ munīn kuṁbhaja tvaṁ nigṛhṇīṣva viṁdhyādrimiti so'nvaśāt

पार्वती को माँगने के लिए वसिष्ठ आदि मुनियों को भेजकर, यह आज्ञा दी - 'हे कुम्भज! तुम विन्ध्याचल को रोको।'

श्लोक 6 (skanda.3.16.6)

ततः स कुम्भजः प्राह भगवंतं पिनाकिनम्। उद्वाहवेषं ते देव न द्रक्ष्येहं कथं विभो

tataḥ sa kumbhajaḥ prāha bhagavaṁtaṁ pinākinam udvāhaveṣaṁ te deva na drakṣyehaṁ kathaṁ vibho

तब उस कुम्भज ने भगवान् पिनाकधारी से कहा - 'हे विभो! तब मैं आपका विवाह-वेष कैसे देख सकूँगा?'

श्लोक 7 (skanda.3.16.7)

इति विज्ञापितः शंभुः पुनः कुंभजमब्रवीत्। कुंभजोद्वाहवेषं ते पार्वत्या सहितो ह्यहम्

iti vijñāpitaḥ śaṁbhuḥ punaḥ kuṁbhajamabravīt kuṁbhajodvāhaveṣaṁ te pārvatyā sahito hyaham

इस प्रकार निवेदन किए जाने पर शम्भु ने फिर कुम्भज से कहा - 'हे कुम्भज! मैं पार्वती सहित विवाह-वेष में,

श्लोक 8 (skanda.3.16.8)

वेदारण्ये महापुण्ये दर्शयिष्याम्यसंशयः। तद्गच्छ शीघ्रं विंध्याद्रिं निग्रहीतुं मुनीश्वर

vedāraṇye mahāpuṇye darśayiṣyāmyasaṁśayaḥ tadgaccha śīghraṁ viṁdhyādriṁ nigrahītuṁ munīśvara

महापुण्यमय वेदारण्य में निश्चय ही तुम्हें दर्शन दूँगा। इसलिए हे मुनीश्वर! शीघ्र जाकर विन्ध्याचल को रोको।'

श्लोक 9 (skanda.3.16.9)

एवमुक्तस्ततोगस्त्यो विन्ध्याद्रिं स निगृह्य च। पादाक्रमणमात्रेण समीकुर्वन्महीतलम्

evamuktastatogastyo vindhyādriṁ sa nigṛhya ca pādākramaṇamātreṇa samīkurvanmahītalam

इस प्रकार आज्ञा पाकर अगस्त्य ने विन्ध्याचल को रोककर, अपने पैर के आक्रमण-मात्र से पृथ्वीतल को समतल करते हुए,

श्लोक 10 (skanda.3.16.10)

चरित्वा दक्षि णान्देशान्गन्धमादनमन्वगात्। स विदित्वा महर्षिस्तु गन्धमादनवैभवम्

caritvā dakṣi ṇāndeśāngandhamādanamanvagāt sa viditvā maharṣistu gandhamādanavaibhavam

दक्षिण देशों में विचरण करते हुए गन्धमादन पहुँचे। उस महर्षि ने गन्धमादन के माहात्म्य को जानकर,

श्लोक 11 (skanda.3.16.11)

तत्र तीर्थं महापुण्यं स्वनाम्ना निर्ममे मुनिः। लोपामुद्रासखस्तत्र वर्ततेऽद्यापि कुंभजः

tatra tīrthaṁ mahāpuṇyaṁ svanāmnā nirmame muniḥ lopāmudrāsakhastatra vartate'dyāpi kuṁbhajaḥ

वहाँ अपने नाम से एक महापुण्य तीर्थ बनाया। लोपामुद्रा के पति वे कुम्भज आज भी वहीं विद्यमान हैं।

श्लोक 12 (skanda.3.16.12)

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च न भूयो जन्मभाग्भवेत्। इह लोके त्रिकालेपि तत्तीर्थसदृशं द्विजाः।

tatra snātvā ca pītvā ca na bhūyo janmabhāgbhavet iha loke trikālepi tattīrthasadṛśaṁ dvijāḥ

वहाँ स्नान करके और जल पीकर मनुष्य फिर जन्म नहीं लेता। हे द्विजो! इस लोक में तीनों कालों में भी,

श्लोक 13 (skanda.3.16.13)

तीर्थं न विद्यते पुण्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्। सर्वाभीष्टप्रदं नृणां यत्तीर्थस्नानवैभवात्

tīrthaṁ na vidyate puṇyaṁ bhuktimuktiphalapradam sarvābhīṣṭapradaṁ nṛṇāṁ yattīrthasnānavaibhavāt

उस तीर्थ के समान कोई अन्य पुण्यमय, भोग और मोक्ष का फल देने वाला, मनुष्यों के सभी अभीष्ट देने वाला तीर्थ नहीं है, ऐसी उस तीर्थ-स्नान की महिमा है।

श्लोक 14 (skanda.3.16.14)

सुदीर्घतमसः पुत्रः कक्षीवान्नाम नामतः। लेभे मनोरमां नाम स्वनयस्य सुतां प्रियाम्

sudīrghatamasaḥ putraḥ kakṣīvānnāma nāmataḥ lebhe manoramāṁ nāma svanayasya sutāṁ priyām

सुदीर्घतमा के पुत्र, कक्षीवान् नामक, ने स्वनय की प्रिय पुत्री मनोरमा को प्राप्त किया।

श्लोक 15 (skanda.3.16.15)

कक्षीवतः कथा सेयं पुण्यापापविनाशिनी। तां कथां वः प्रवक्ष्यामि तच्छृणुध्वं मुनीश्वराः।

kakṣīvataḥ kathā seyaṁ puṇyāpāpavināśinī tāṁ kathāṁ vaḥ pravakṣyāmi tacchṛṇudhvaṁ munīśvarāḥ

कक्षीवान् की यह कथा पुण्य-प्रद और पाप-नाशक है। हे मुनीश्वरो! मैं वह कथा आपको सुनाता हूँ, उसे सुनिए।

श्लोक 16 (skanda.3.16.16)

अस्ति दीर्घतमा नाम मुनिः परमधार्मिकः। तस्य पुत्रः समभवत्कक्षीवानिति विश्रुतः

asti dīrghatamā nāma muniḥ paramadhārmikaḥ tasya putraḥ samabhavatkakṣīvāniti viśrutaḥ

दीर्घतमा नामक एक अत्यन्त धर्मात्मा मुनि थे; उनका पुत्र कक्षीवान् नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 17 (skanda.3.16.17)

उपनीतः स कक्षीवान्ब्रह्मचारी जितें द्रियः। वेदाभ्यासाय स गुरोः कुले वासमकल्पयत्

upanītaḥ sa kakṣīvānbrahmacārī jiteṁ driyaḥ vedābhyāsāya sa guroḥ kule vāsamakalpayat

उपनयन-संस्कार से युक्त वह कक्षीवान्, ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय, वेदाभ्यास के लिए गुरु के कुल में निवास करने लगा।

श्लोक 18 (skanda.3.16.18)

उदंकस्य गुरोर्गेहे वसन्दीर्घतमःसुतः। सोऽध्येष्ट चतुरो वेदान्सांगाञ्छास्त्राणि षट् तथा

udaṁkasya gurorgehe vasandīrghatamaḥsutaḥ so'dhyeṣṭa caturo vedānsāṁgāñchāstrāṇi ṣaṭ tathā

गुरु उदंक के घर में रहते हुए दीर्घतमा-पुत्र ने अंगों सहित चारों वेद और वैसे ही छहों वेदांग-शास्त्र पढ़े,

श्लोक 19 (skanda.3.16.19)

इतिहासपुराणानि तथोपनिषदोऽपिच। उषित्वा षष्टिवर्षाणि कक्षीवान्गुरुसन्निधौ

itihāsapurāṇāni tathopaniṣado'pica uṣitvā ṣaṣṭivarṣāṇi kakṣīvāngurusannidhau

इतिहास-पुराणों को और उपनिषदों को भी पढ़ा। गुरु के समीप साठ वर्षों तक निवास करके कक्षीवान्,

श्लोक 20 (skanda.3.16.20)

प्रयास्यन्स्वगृहं विप्रा गुरवे दक्षि णामदात्। उवाच वै गुरुर्विद्वान्कक्षीवान्ब्रह्मवित्तमः

prayāsyansvagṛhaṁ viprā gurave dakṣi ṇāmadāt uvāca vai gururvidvānkakṣīvānbrahmavittamaḥ

हे विप्रो! अपने घर जाने के लिए उद्यत हो, गुरु को दक्षिणा दी। तब विद्वान्, ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ गुरु ने कक्षीवान् से कहा -

श्लोक 21 (skanda.3.16.21)

कक्षीवानुवाच। अहं गृहं प्रयास्यामि कुर्वनुज्ञां महामुने। अवलोक्य कृपादृष्ट्या मां रक्षोदंक सांप्रतम्। उदंकस्त्वेव मुदितः कक्षीवंतमथाब्रवीत्

kakṣīvānuvāca ahaṁ gṛhaṁ prayāsyāmi kurvanujñāṁ mahāmune avalokya kṛpādṛṣṭyā māṁ rakṣodaṁka sāṁpratam udaṁkastveva muditaḥ kakṣīvaṁtamathābravīt

कक्षीवान् ने कहा - 'हे महामुने! मैं घर जाना चाहता हूँ, आज्ञा दीजिए। हे उदंक! कृपादृष्टि से देखकर अभी मेरी रक्षा कीजिए।' यह सुनकर उदंक प्रसन्न होकर कक्षीवान् से बोले -

श्लोक 22 (skanda.3.16.22)

उदंक उवाच। अनुजानामि कक्षीवन्गच्छ त्वं स्वगृहं प्रति

udaṁka uvāca anujānāmi kakṣīvangaccha tvaṁ svagṛhaṁ prati

उदंक ने कहा - 'हे कक्षीवान्! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, अपने घर की ओर जाओ।

श्लोक 23 (skanda.3.16.23)

उद्वाहार्थमुपायं ते वत्स वक्ष्यामि तच्छृणु। रामसेतुं प्रयाहि त्वं गंधमादनपर्वतम्

udvāhārthamupāyaṁ te vatsa vakṣyāmi tacchṛṇu rāmasetuṁ prayāhi tvaṁ gaṁdhamādanaparvatam

किन्तु हे वत्स! तुम्हारे विवाह का उपाय मैं बताता हूँ, उसे सुनो। तुम रामसेतु के गन्धमादन पर्वत जाओ।

श्लोक 24 (skanda.3.16.24)

तत्रागस्त्यकृतं तीर्थं सर्वाभीष्टप्रदा यकम्। भुक्तिमुक्तिप्रदं पुंसां सर्वपापनिबर्हणम्

tatrāgastyakṛtaṁ tīrthaṁ sarvābhīṣṭapradā yakam bhuktimuktipradaṁ puṁsāṁ sarvapāpanibarhaṇam

वहाँ अगस्त्य द्वारा किया गया, सभी अभीष्टों को देने वाला, मनुष्यों को भोग और मोक्ष देने वाला, समस्त पापों का नाश करने वाला एक तीर्थ है।

श्लोक 25 (skanda.3.16.25)

विद्यते स्नाहि तत्र त्वं सर्वमंगलसाधने। त्रिवर्षं वस तत्र त्वं नियमाचारसंयुतः

vidyate snāhi tatra tvaṁ sarvamaṁgalasādhane trivarṣaṁ vasa tatra tvaṁ niyamācārasaṁyutaḥ

वह सभी मंगलों का साधन-रूप है, वहाँ स्नान करो। तीन वर्ष तक नियम और आचार से युक्त होकर वहाँ रहो।

श्लोक 26 (skanda.3.16.26)

वर्षेषु त्रिषु यातेषु चतुर्थे वत्सरे ततः। निर्गमिष्यति मातंगः कश्चित्तीर्थोत्तमात्ततः

varṣeṣu triṣu yāteṣu caturthe vatsare tataḥ nirgamiṣyati mātaṁgaḥ kaścittīrthottamāttataḥ

तीन वर्ष बीत जाने पर चौथे वर्ष में उस श्रेष्ठ तीर्थ से एक हाथी निकलेगा,

श्लोक 27 (skanda.3.16.27)

चतुर्दंतो महाकायः शरदभ्रसमच्छविः। तं गजं गिरिसंकाशं स्नात्वा तत्र समारुह

caturdaṁto mahākāyaḥ śaradabhrasamacchaviḥ taṁ gajaṁ girisaṁkāśaṁ snātvā tatra samāruha

चार दाँतों वाला, विशाल शरीर वाला, शरद्-मेघ के समान कान्तिवाला। पर्वत के समान उस हाथी पर, वहाँ स्नान करके सवार हो जाना।

श्लोक 28 (skanda.3.16.28)

आरुह्य तं गजं वत्स स्वनयस्य पुरीं व्रज। चतुर्दंतगजस्थं त्वां दृष्ट्वा शक्रमिवापरम्

āruhya taṁ gajaṁ vatsa svanayasya purīṁ vraja caturdaṁtagajasthaṁ tvāṁ dṛṣṭvā śakramivāparam

हे वत्स! उस हाथी पर सवार होकर स्वनय की नगरी जाओ। चार दाँतों वाले हाथी पर बैठे तुम्हें दूसरे इन्द्र के समान देखकर,

श्लोक 29 (skanda.3.16.29)

राजर्षिः स्वनयो धीमान्हर्षव्याकुललोचनः। स्वकन्यायाः कृते दुःखं त्यजेदेव हृदिस्थितम्

rājarṣiḥ svanayo dhīmānharṣavyākulalocanaḥ svakanyāyāḥ kṛte duḥkhaṁ tyajedeva hṛdisthitam

बुद्धिमान् राजर्षि स्वनय हर्ष से व्याकुल नेत्र होकर, अपनी पुत्री के लिए हृदय में स्थित दुःख को त्याग देगा।

श्लोक 30 (skanda.3.16.30)

पुरा हि प्रतिजज्ञे सा तस्य पुत्री मनोरमा। चतुर्दंतं महाकायं गजं सर्वांगपांडुरम्

purā hi pratijajñe sā tasya putrī manoramā caturdaṁtaṁ mahākāyaṁ gajaṁ sarvāṁgapāṁḍuram

क्योंकि पूर्वकाल में उसकी पुत्री मनोरमा ने यह प्रतिज्ञा की थी - चार दाँतों वाला, विशाल शरीर वाला, सर्वांग-श्वेत हाथी पर,

श्लोक 31 (skanda.3.16.31)

आरुह्य यः समागच्छेत्स मे भर्ता भवेदिति। स्वकन्यायाः प्रतिज्ञां तां समाकर्ण्य स भूपतिः।

āruhya yaḥ samāgacchetsa me bhartā bhavediti svakanyāyāḥ pratijñāṁ tāṁ samākarṇya sa bhūpatiḥ

सवार होकर जो आएगा, वही मेरा पति होगा। अपनी पुत्री की उस प्रतिज्ञा को सुनकर वह राजा,

श्लोक 32 (skanda.3.16.32)

दुःखाकुलमना भूत्वा सततं पर्यचिंतयत्। स्वनये चिंतयत्येवं नारदः समुपागमत्

duḥkhākulamanā bhūtvā satataṁ paryaciṁtayat svanaye ciṁtayatyevaṁ nāradaḥ samupāgamat

दुःख से व्याकुल-मन होकर निरन्तर चिन्ता करने लगा। स्वनय के इस प्रकार चिन्ता करते समय नारद वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 33 (skanda.3.16.33)

तमागतं मुनिं दृष्ट्वा राजर्षिरतिधार्मिकः। प्रत्युद्गम्य मुदा युक्तः पाद्यार्घ्याद्यैरपूजयत्

tamāgataṁ muniṁ dṛṣṭvā rājarṣiratidhārmikaḥ pratyudgamya mudā yuktaḥ pādyārghyādyairapūjayat

आए हुए उस मुनि को देखकर अत्यन्त धर्मात्मा राजर्षि ने प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़कर पाद्य-अर्घ्य आदि से उनकी पूजा की।

श्लोक 34 (skanda.3.16.34)

प्रणम्य नारदं राजा वचनं चेदमब्रवीत्। कन्येयं मम देवर्षे प्रतिज्ञामकरोत्पुरा

praṇamya nāradaṁ rājā vacanaṁ cedamabravīt kanyeyaṁ mama devarṣe pratijñāmakarotpurā

नारद को प्रणाम कर राजा ने यह वचन कहा - 'हे देवर्षे! मेरी इस पुत्री ने पूर्वकाल में प्रतिज्ञा की थी -

श्लोक 35 (skanda.3.16.35)

चतु र्दंतं महाकायं गजं सर्वांगपांडुरम्। आरुह्य यः समागच्छेत्स मे भर्ता भवेदिति

catu rdaṁtaṁ mahākāyaṁ gajaṁ sarvāṁgapāṁḍuram āruhya yaḥ samāgacchetsa me bhartā bhavediti

चार दाँतों वाले, विशाल शरीर वाले, सर्वांग-श्वेत हाथी पर सवार होकर जो आएगा, वही मेरा पति होगा।

श्लोक 36 (skanda.3.16.36)

चतुर्दंतो महाकायो गजः सर्वांगपांडुरः। संभवेदिंद्रभवने भूतले नैव विद्यते

caturdaṁto mahākāyo gajaḥ sarvāṁgapāṁḍuraḥ saṁbhavediṁdrabhavane bhūtale naiva vidyate

चार दाँतों वाला, विशाल शरीर वाला, सर्वांग-श्वेत हाथी तो इन्द्र के भवन में ही सम्भव है, इस भूतल पर तो है ही नहीं।

श्लोक 37 (skanda.3.16.37)

इयं च दुस्तरामेनां प्रतिज्ञां बालिशाऽकरोत्। इयं प्रतिज्ञातितरां सततं बाधते हि माम्

iyaṁ ca dustarāmenāṁ pratijñāṁ bāliśā'karot iyaṁ pratijñātitarāṁ satataṁ bādhate hi mām

इस बालिका ने यह अत्यन्त दुष्कर प्रतिज्ञा कर ली है। यह प्रतिज्ञा मुझे निरन्तर अत्यन्त पीड़ित करती है।

श्लोक 38 (skanda.3.16.38)

अनूढा हि पितुः कन्या सर्वदा शोकमावहेत्। इति तस्य वचः श्रुत्वा स्वनये नारदोऽब्रवीत्

anūḍhā hi pituḥ kanyā sarvadā śokamāvahet iti tasya vacaḥ śrutvā svanaye nārado'bravīt

क्योंकि विवाह न हुई पिता की कन्या सदा शोक का कारण होती है।' उसका यह वचन सुनकर नारद ने स्वनय से कहा -

श्लोक 39 (skanda.3.16.39)

मा विषीदस्व राजर्षे तस्या ईदृग्विधः पतिः। भविष्यत्यचिरादेव पृथिव्यां ब्राह्मणोत्तमः

mā viṣīdasva rājarṣe tasyā īdṛgvidhaḥ patiḥ bhaviṣyatyacirādeva pṛthivyāṁ brāhmaṇottamaḥ

'हे राजर्षे! शोक मत करो, ऐसे ही स्वरूप वाला पति उसे शीघ्र ही मिलेगा - पृथ्वी पर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ,

श्लोक 40 (skanda.3.16.40)

कक्षीवानिति विख्यातो जामाता ते भविष्यति। इत्युक्त्वा नारदमुनिर्ययावाकाशमार्गतः

kakṣīvāniti vikhyāto jāmātā te bhaviṣyati ityuktvā nāradamuniryayāvākāśamārgataḥ

कक्षीवान् नाम से विख्यात, तुम्हारा जामाता होगा।' यह कहकर नारद मुनि आकाश-मार्ग से चले गए।

श्लोक 41 (skanda.3.16.41)

स्व नयस्तद्वचः श्रुत्वा नारदेन प्रभाषितम्। आकांक्षते दिवारात्रं तादृग्विधसमागमम्

sva nayastadvacaḥ śrutvā nāradena prabhāṣitam ākāṁkṣate divārātraṁ tādṛgvidhasamāgamam

नारद द्वारा कहे गए उस वचन को सुनकर स्वनय दिन-रात ऐसे ही मिलन की आकांक्षा करने लगा।

श्लोक 42 (skanda.3.16.42)

अतः सौम्य महाभाग कक्षीवन्बालतापस। अगस्त्यतीर्थमद्य त्वं स्नातुं गच्छ त्वरान्वितः

ataḥ saumya mahābhāga kakṣīvanbālatāpasa agastyatīrthamadya tvaṁ snātuṁ gaccha tvarānvitaḥ

(उदंक ने आगे कहा -) 'इसलिए हे सौम्य, महाभाग कक्षीवान्, हे बाल-तपस्वी! आज तुम शीघ्रतापूर्वक अगस्तितीर्थ स्नान के लिए जाओ।

श्लोक 43 (skanda.3.16.43)

सर्वमंगलसिद्धिस्ते भविष्यति न संशयः। उदंकेनैवमुक्तोऽथ कक्षीवान्द्विजपुंगवः

sarvamaṁgalasiddhiste bhaviṣyati na saṁśayaḥ udaṁkenaivamukto'tha kakṣīvāndvijapuṁgavaḥ

तुम्हारे सभी मंगल-कार्य सिद्ध होंगे, इसमें संशय नहीं।' उदंक द्वारा इस प्रकार कहे गए द्विजश्रेष्ठ कक्षीवान् ने,

श्लोक 44 (skanda.3.16.44)

अनु ज्ञातश्च गुरुणा प्रययौ गंधमादनम्। संप्राप्यागस्त्यतीर्थं च तत्र सस्नौ जितेंद्रियः

anu jñātaśca guruṇā prayayau gaṁdhamādanam saṁprāpyāgastyatīrthaṁ ca tatra sasnau jiteṁdriyaḥ

गुरु से आज्ञा पाकर गन्धमादन को प्रस्थान किया। अगस्तितीर्थ पहुँचकर जितेन्द्रिय कक्षीवान् ने वहाँ स्नान किया।

श्लोक 45 (skanda.3.16.45)

क्षेत्रोपवासमकरोद्दिनमेकं मुनीश्वरः। अपरेद्युः पुनः स्नात्वा पारणामकरोद्द्विजः

kṣetropavāsamakaroddinamekaṁ munīśvaraḥ aparedyuḥ punaḥ snātvā pāraṇāmakaroddvijaḥ

उस मुनीश्वर ने एक दिन उस क्षेत्र में उपवास किया। दूसरे दिन फिर स्नान करके उस द्विज ने पारणा की।

श्लोक 46 (skanda.3.16.46)

रात्रौ तत्रैव सुष्वाप कक्षीवान्धर्मतत्परः। एवं नियमयुक्तस्य तस्य कक्षीवतो मुनेः

rātrau tatraiva suṣvāpa kakṣīvāndharmatatparaḥ evaṁ niyamayuktasya tasya kakṣīvato muneḥ

रात में धर्मपरायण कक्षीवान् वहीं सो गया। इस प्रकार नियम-पालन करते हुए उस कक्षीवान् मुनि के,

श्लोक 47 (skanda.3.16.47)

एकेन दिवसे नोनं वर्षत्रयमथागमत्। अथ वर्षत्रयस्यांते तस्मिन्नेव दिने मुनिः

ekena divase nonaṁ varṣatrayamathāgamat atha varṣatrayasyāṁte tasminneva dine muniḥ

एक दिन कम तीन वर्ष व्यतीत हो गए। फिर तीन वर्ष के अंत में, उसी दिन वह मुनि,

श्लोक 48 (skanda.3.16.48)

अन्वास्य पश्चिमां संध्यां सुखं सुष्वाप तत्तटे। याममात्रावशिष्टायां विभावर्यां महाध्वनिः

anvāsya paścimāṁ saṁdhyāṁ sukhaṁ suṣvāpa tattaṭe yāmamātrāvaśiṣṭāyāṁ vibhāvaryāṁ mahādhvaniḥ

सायं-संध्या करके उस तट पर सुखपूर्वक सो गया। रात्रि का एक ही पहर शेष रहने पर एक महाध्वनि,

श्लोक 49 (skanda.3.16.49)

उदभूत्प्रलयांभोधिवीचिकोलाहलोपमः। तेन शब्देन महता कक्षीवान्प्रत्यबुध्यत

udabhūtpralayāṁbhodhivīcikolāhalopamaḥ tena śabdena mahatā kakṣīvānpratyabudhyata

प्रलय-समुद्र की लहरों के कोलाहल के समान उठी। उस विशाल शब्द से कक्षीवान् जाग गया।

श्लोक 50 (skanda.3.16.50)

ततस्तु स्वनयो नाम राजा सानुचरो बली। मृगयाकौतुकी तत्र मधुरापतिराययौ

tatastu svanayo nāma rājā sānucaro balī mṛgayākautukī tatra madhurāpatirāyayau

इसी बीच स्वनय नामक बलवान् राजा, अनुचरों सहित, मृगया के कौतुकी वहाँ मधुरा-नरेश आ पहुँचे।

श्लोक 51 (skanda.3.16.51)

विनिघ्नन्स गजान्सिंहान्वराहान्महिषान्नुरून्। अन्यान्मृगविशेषांश्च स राजा न्यवधीच्छरैः

vinighnansa gajānsiṁhānvarāhānmahiṣānnurūn anyānmṛgaviśeṣāṁśca sa rājā nyavadhīccharaiḥ

हाथियों, सिंहों, वराहों, भैंसों, हरिणों तथा अन्य विशेष मृगों को मारते हुए, वह राजा बाणों से उनका वध करता गया।

श्लोक 52 (skanda.3.16.52)

सामात्यो मृगयासक्तो रथवाजिगजैर्युतः। अगस्त्यतीर्थसविधमाससाद भटान्वितः

sāmātyo mṛgayāsakto rathavājigajairyutaḥ agastyatīrthasavidhamāsasāda bhaṭānvitaḥ

मंत्रियों सहित, शिकार में लीन, रथ, अश्व और हाथियों से युक्त, वह भटों सहित अगस्तितीर्थ के समीप पहुँच गया।

श्लोक 53 (skanda.3.16.53)

स राजा मृगयाश्रांतः श्रांतसैनिकसंवृतः। तत्तीर्थतीरप्रांतेषु निषसाद महीपतिः

sa rājā mṛgayāśrāṁtaḥ śrāṁtasainikasaṁvṛtaḥ tattīrthatīraprāṁteṣu niṣasāda mahīpatiḥ

मृगया से थका हुआ, थके हुए सैनिकों से घिरा हुआ, वह राजा उस तीर्थ के तट के समीप बैठ गया।

श्लोक 54 (skanda.3.16.54)

ततः प्रभाते विमले कक्षी वान्मुनिसत्तमः। अगस्त्यतीर्थे स्नात्वाऽसौ संध्यां पूर्वामुपास्य च

tataḥ prabhāte vimale kakṣī vānmunisattamaḥ agastyatīrthe snātvā'sau saṁdhyāṁ pūrvāmupāsya ca

तत्पश्चात् निर्मल प्रभात में मुनिश्रेष्ठ कक्षीवान् ने अगस्तितीर्थ में स्नान कर, पूर्व-संध्या की उपासना करके,

श्लोक 55 (skanda.3.16.55)

तस्य तीरे जपन्मत्रांस्तस्थौ नियमसंयुतः। अत्रांतरे तीर्थवराद्गज एको विनिर्ययौ

tasya tīre japanmatrāṁstasthau niyamasaṁyutaḥ atrāṁtare tīrthavarādgaja eko viniryayau

उस तट पर मंत्र-जप करते हुए नियम-पूर्वक स्थित हो गए। इसी बीच उस श्रेष्ठ तीर्थ से एक हाथी निकला,

श्लोक 56 (skanda.3.16.56)

चतुर्दंतो महाकायः कैलास इव मूर्तिमान्। स समुत्थाय तत्तीर्थादगात्कक्षीवदंतिकम्

caturdaṁto mahākāyaḥ kailāsa iva mūrtimān sa samutthāya tattīrthādagātkakṣīvadaṁtikam

चार दाँतों वाला, विशाल शरीर वाला, मानो साक्षात् कैलास ही मूर्तिमान् हो। वह उस तीर्थ से उठकर कक्षीवान् के पास गया।

श्लोक 57 (skanda.3.16.57)

तमागतमुदंकोक्त लक्षणैरुपलक्षितम्। तदा निरीक्ष्य कक्षीवानारोढुं स्नानमातनोत्

tamāgatamudaṁkokta lakṣaṇairupalakṣitam tadā nirīkṣya kakṣīvānāroḍhuṁ snānamātanot

उदंक द्वारा बताए गए लक्षणों से युक्त उस आए हुए हाथी को देखकर, कक्षीवान् ने उस पर सवार होने के लिए स्नान किया।

श्लोक 58 (skanda.3.16.58)

नमस्कृत्य च तत्तीर्थं श्लाघमानो मुहुर्मुहुः। आरुरोह च कक्षीवांश्चतुर्दंतं महागजम्

namaskṛtya ca tattīrthaṁ ślāghamāno muhurmuhuḥ āruroha ca kakṣīvāṁścaturdaṁtaṁ mahāgajam

उस तीर्थ को नमस्कार करके, बार-बार उसकी प्रशंसा करते हुए, कक्षीवान् उस चार दाँतों वाले महाहाथी पर सवार हो गए।

श्लोक 59 (skanda.3.16.59)

आरुह्य तं चतुर्दंतं रजताचलसंनिभम्। स्वनयस्य पुरीमेव कक्षीवान्गंतुमैच्छत

āruhya taṁ caturdaṁtaṁ rajatācalasaṁnibham svanayasya purīmeva kakṣīvāngaṁtumaicchata

चाँदी के पर्वत के समान उस चार दाँतों वाले हाथी पर सवार होकर, कक्षीवान् स्वनय की नगरी जाना चाहते थे।

श्लोक 60 (skanda.3.16.60)

तमारूढं चतुर्दंतं श्वेतदंतावलोत्तमम्। स वीक्ष्य निश्चिकायैनं कक्षीवानिति भूपतिः

tamārūḍhaṁ caturdaṁtaṁ śvetadaṁtāvalottamam sa vīkṣya niścikāyainaṁ kakṣīvāniti bhūpatiḥ

उस श्वेत-दाँतों वाले श्रेष्ठ हाथी पर सवार उन्हें देखकर वह राजा पहचान गया कि यही कक्षीवान् है।

श्लोक 61 (skanda.3.16.61)

प्रसन्नहृदयो राजा तस्यांतिकमुपागमत्। तदाभ्याशमुपागम्य कक्षीवंतं नृपोऽब्रवीत्

prasannahṛdayo rājā tasyāṁtikamupāgamat tadābhyāśamupāgamya kakṣīvaṁtaṁ nṛpo'bravīt

प्रसन्नहृदय राजा उनके समीप गया। उनके पास पहुँचकर राजा ने कक्षीवान् से कहा -

श्लोक 62 (skanda.3.16.62)

स्वनय उवाच। त्वं ब्रह्मन्कस्य पुत्रोऽसि नाम किं तव मे वद। गजमेनं समारुह्य कुत्र वा गन्तुमिच्छसि। स्वनयेनैवमुक्तस्तु कक्षीवान्वाक्यमब्रवीत्

svanaya uvāca tvaṁ brahmankasya putro'si nāma kiṁ tava me vada gajamenaṁ samāruhya kutra vā gantumicchasi svanayenaivamuktastu kakṣīvānvākyamabravīt

स्वनय ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! आप किसके पुत्र हैं, मुझे अपना नाम बताएँ। इस हाथी पर सवार होकर आप कहाँ जाना चाहते हैं?' स्वनय के इस प्रकार पूछने पर कक्षीवान् ने यह वचन कहा -

श्लोक 63 (skanda.3.16.63)

कक्षीवानुवाच। पुत्रोऽहं दीर्घतमसः कक्षीवानिति विश्रुतः

kakṣīvānuvāca putro'haṁ dīrghatamasaḥ kakṣīvāniti viśrutaḥ

कक्षीवान् ने कहा - 'मैं दीर्घतमा का पुत्र हूँ, कक्षीवान् नाम से विख्यात।

श्लोक 64 (skanda.3.16.64)

स्वनयस्य तु राजर्षेर्गच्छामि नगरं प्रति। अहमुद्वोढुमिच्छामि तस्य कन्या मनोरमाम्

svanayasya tu rājarṣergacchāmi nagaraṁ prati ahamudvoḍhumicchāmi tasya kanyā manoramām

मैं राजर्षि स्वनय की नगरी की ओर जा रहा हूँ। मैं उनकी पुत्री मनोरमा से विवाह करना चाहता हूँ।

श्लोक 65 (skanda.3.16.65)

चतुर्दंतगजारूढस्तत्प्रतिज्ञां च पूरयन्। स्वनयस्य सुतापाणिं ग्रहीष्यामि नराधिप

caturdaṁtagajārūḍhastatpratijñāṁ ca pūrayan svanayasya sutāpāṇiṁ grahīṣyāmi narādhipa

हे नराधिप! चार दाँतों वाले हाथी पर सवार होकर, उसकी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए, मैं स्वनय की पुत्री का पाणिग्रहण करूँगा।'

श्लोक 66 (skanda.3.16.66)

तद्भाषितं समाकर्ण्य श्रोत्रपीयूषवर्षणम्। हर्षसंफुल्लनयनः स्वनयो वाक्यम ब्रवीत्

tadbhāṣitaṁ samākarṇya śrotrapīyūṣavarṣaṇam harṣasaṁphullanayanaḥ svanayo vākyama bravīt

कानों के लिए अमृत-वर्षा के समान उस वचन को सुनकर हर्ष से खिले नेत्रों वाले स्वनय ने यह वचन कहा -

श्लोक 67 (skanda.3.16.67)

कक्षीवन्भोः कृतार्थोस्मि स एव स्वनयो ह्यहम्। उद्वोढुमिच्छति भवान्यस्य कन्यां मनोरमाम्

kakṣīvanbhoḥ kṛtārthosmi sa eva svanayo hyaham udvoḍhumicchati bhavānyasya kanyāṁ manoramām

'हे कक्षीवान्! मैं धन्य हुआ, मैं ही वह स्वनय हूँ जिसकी पुत्री मनोरमा से आप विवाह करना चाहते हैं।

श्लोक 68 (skanda.3.16.68)

स्वागतं ते मुनिश्रेष्ठ कक्षीवन्बालतापस। मम कन्यां गृहाण त्वं तपोधन मनोरमाम्

svāgataṁ te muniśreṣṭha kakṣīvanbālatāpasa mama kanyāṁ gṛhāṇa tvaṁ tapodhana manoramām

हे मुनिश्रेष्ठ कक्षीवान्, हे बाल-तपस्वी! आपका स्वागत है। हे तपोधन! आप मेरी पुत्री मनोरमा को ग्रहण करें।

श्लोक 69 (skanda.3.16.69)

तया सह चरन्धर्मान्गार्हस्थ्यं प्रतिपालय। राज्ञोक्तः स तदोवाच कक्षीवान्धर्मतत्परः। राजानं स्वनयं प्रीतं मधुरापुरवासिनम्

tayā saha carandharmāngārhasthyaṁ pratipālaya rājñoktaḥ sa tadovāca kakṣīvāndharmatatparaḥ rājānaṁ svanayaṁ prītaṁ madhurāpuravāsinam

उसके साथ धर्माचरण करते हुए गृहस्थ-धर्म का पालन करें।' राजा के इस प्रकार कहने पर धर्मपरायण कक्षीवान् ने प्रसन्न, मधुरापुरवासी राजा स्वनय से कहा -

श्लोक 70 (skanda.3.16.70)

कक्षीवानुवाच। पिता दीर्घतमानाम वेदारण्ये मम प्रभो।

kakṣīvānuvāca pitā dīrghatamānāma vedāraṇye mama prabho

कक्षीवान् ने कहा - 'हे प्रभो! मेरे पिता दीर्घतमा नामक वेदारण्य में,

श्लोक 71 (skanda.3.16.71)

आस्ते तपश्चरन्सौम्यो नियमाचारतत्परः। तस्यांतिकं प्रेषय त्वं विप्रमेकं धरापते

āste tapaścaransaumyo niyamācāratatparaḥ tasyāṁtikaṁ preṣaya tvaṁ vipramekaṁ dharāpate

तपश्चरण करते हुए, सौम्य स्वभाव से, नियम-आचार में तत्पर होकर विराजते हैं। हे धरापते! आप एक ब्राह्मण को उनके पास भेजें।

श्लोक 72 (skanda.3.16.72)

तथोक्तः स तदा राजा स्वनयो हृष्टमा नसः। अनेकसेनया सार्धं प्राहिणोत्स्वपुरोधसम्

tathoktaḥ sa tadā rājā svanayo hṛṣṭamā nasaḥ anekasenayā sārdhaṁ prāhiṇotsvapurodhasam

इस प्रकार कहे जाने पर वह राजा स्वनय, हृष्ट-मन होकर, अनेक सेना के साथ अपने पुरोहित को भेजा -

श्लोक 73 (skanda.3.16.73)

विप्रं सुदर्शनं नाम वेदारण्यस्थलं प्रति। सुदर्शनः समादिष्टः स्वनयेन नृपेण सः

vipraṁ sudarśanaṁ nāma vedāraṇyasthalaṁ prati sudarśanaḥ samādiṣṭaḥ svanayena nṛpeṇa saḥ

सुदर्शन नामक उस ब्राह्मण को वेदारण्य-स्थल की ओर। राजा स्वनय द्वारा आदेश पाकर वह सुदर्शन,

श्लोक 74 (skanda.3.16.74)

महत्या सेनया सार्धं प्रययौ वेदकाननम्। तत्रोटजे समासीन तं दीर्घतमसं मुनिम्

mahatyā senayā sārdhaṁ prayayau vedakānanam tatroṭaje samāsīna taṁ dīrghatamasaṁ munim

बड़ी सेना के साथ वेद-कानन को गया। वहाँ कुटिया में बैठे उस दीर्घतमा मुनि को,

श्लोक 75 (skanda.3.16.75)

तपश्चरतमासीनं ध्यायन्वेदाटवी पतिम्। पुरोहितो ददर्शाथ जपंतं मंत्रमुत्तमम्

tapaścaratamāsīnaṁ dhyāyanvedāṭavī patim purohito dadarśātha japaṁtaṁ maṁtramuttamam

तप करते हुए, ध्यानस्थ, वेदाटवी के स्वामी को, उत्तम मंत्र का जप करते हुए उस पुरोहित ने देखा।

श्लोक 76 (skanda.3.16.76)

प्रणाममकरोत्तस्मै मुनये स सुदर्शनः। उवाच दीर्घतमसं मुनिं प्रह्लादयन्निव

praṇāmamakarottasmai munaye sa sudarśanaḥ uvāca dīrghatamasaṁ muniṁ prahlādayanniva

उस सुदर्शन ने उस मुनि को प्रणाम किया। दीर्घतमा मुनि को मानो प्रसन्न करते हुए यह कहा -

श्लोक 77 (skanda.3.16.77)

सुदर्शन उवाच। कच्चित्ते कुशलं ब्रह्मन्कच्चित्ते वर्धते तपः। आश्रमे कुशलं कच्चित्कच्चिद्धर्मे सुखं वद

sudarśana uvāca kaccitte kuśalaṁ brahmankaccitte vardhate tapaḥ āśrame kuśalaṁ kaccitkacciddharme sukhaṁ vada

सुदर्शन ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! क्या आपका कुशल है? क्या आपका तप बढ़ रहा है? क्या आश्रम में कुशल है? क्या धर्म में सुख है, यह बताइए।'

श्लोक 78 (skanda.3.16.78)

पृष्टः सुदर्शनेनैवं मुनिर्दीर्घतमास्तदा। सुदर्शनमुवाचेदमर्घ्यादिविधिपूर्वकम्

pṛṣṭaḥ sudarśanenaivaṁ munirdīrghatamāstadā sudarśanamuvācedamarghyādividhipūrvakam

सुदर्शन द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर मुनि दीर्घतमा ने अर्घ्य आदि विधिपूर्वक देकर सुदर्शन से यह कहा -

श्लोक 79 (skanda.3.16.79)

दीर्घतमा उवाच। सर्वत्र कुशलं ब्रह्मन्सुदर्शन महामते। मम वेदाटवीनाथकृपया नाशुभं क्वचित्

dīrghatamā uvāca sarvatra kuśalaṁ brahmansudarśana mahāmate mama vedāṭavīnāthakṛpayā nāśubhaṁ kvacit

दीर्घतमा ने कहा - 'हे महामते सुदर्शन! सर्वत्र कुशल है। वेदाटवी के स्वामी की कृपा से मेरे यहाँ कहीं भी अशुभ नहीं है।

श्लोक 80 (skanda.3.16.80)

तवापि कुशलं ब्रह्मन्किं सुखागमनं तथा। किंवाऽऽगमनकार्यं ते सुदर्शन ममाश्रमे

tavāpi kuśalaṁ brahmankiṁ sukhāgamanaṁ tathā kiṁvā''gamanakāryaṁ te sudarśana mamāśrame

हे ब्रह्मन्! क्या तुम्हारा भी कुशल है? क्या यात्रा सुखपूर्वक हुई? और हे सुदर्शन! मेरे आश्रम में तुम्हारे आगमन का क्या प्रयोजन है?

श्लोक 81 (skanda.3.16.81)

स्वनयस्य पुरोधास्त्वं खलु वेदविदांवरः। तं विहाय महाराज मधुरापुरवासिनम्

svanayasya purodhāstvaṁ khalu vedavidāṁvaraḥ taṁ vihāya mahārāja madhurāpuravāsinam

तुम तो स्वनय के पुरोहित हो, वेदज्ञों में श्रेष्ठ हो। हे महाराज! मधुरापुर-निवासी उस राजा को छोड़कर,

श्लोक 82 (skanda.3.16.82)

महत्या सेनया सार्धं किमर्थं त्वमिहागतः। इत्युक्तो दीर्घतमसा तदानीं स सुदर्शनः

mahatyā senayā sārdhaṁ kimarthaṁ tvamihāgataḥ ityukto dīrghatamasā tadānīṁ sa sudarśanaḥ

बड़ी सेना के साथ तुम यहाँ किसलिए आए हो?' दीर्घतमा द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर उस समय सुदर्शन ने,

श्लोक 83 (skanda.3.16.83)

उवाच तं महात्मानं मुनिं ज्वलिततेजसम्। सर्वत्र मे सुखं ब्रह्मन्भवतः कृपया सदा

uvāca taṁ mahātmānaṁ muniṁ jvalitatejasam sarvatra me sukhaṁ brahmanbhavataḥ kṛpayā sadā

प्रज्वलित तेज वाले उस महात्मा मुनि से कहा - 'हे ब्रह्मन्! आपकी कृपा से मेरा सर्वत्र सदा कल्याण है।

श्लोक 84 (skanda.3.16.84)

भगवन्स्व नयो राजा साष्टांगं प्रणिपत्य तु। त्वां प्राह प्रश्रितं वाक्यं मन्मुखेन शृणुष्व तत्

bhagavansva nayo rājā sāṣṭāṁgaṁ praṇipatya tu tvāṁ prāha praśritaṁ vākyaṁ manmukhena śṛṇuṣva tat

हे भगवन्! राजा स्वनय ने साष्टांग प्रणाम करके आपसे यह विनम्र वचन कहलवाया है; उसे मेरे मुख से सुनिए।

श्लोक 85 (skanda.3.16.85)

स्वनय उवाच। कक्षीवांस्ते सुतो ब्रह्म न्गंधमादनपर्वते। स्नानं कुर्वन्नगस्त्यस्य तीर्थे संप्रति वर्तते

svanaya uvāca kakṣīvāṁste suto brahma ngaṁdhamādanaparvate snānaṁ kurvannagastyasya tīrthe saṁprati vartate

स्वनय ने कहा है - हे ब्रह्मन्! आपका पुत्र कक्षीवान् गन्धमादन पर्वत पर अगस्त्य के तीर्थ में स्नान करते हुए वर्तमान में विद्यमान है।

श्लोक 86 (skanda.3.16.86)

तस्य रूपं तपो धर्ममाचारान्वैदिकांस्तथा। वेदशास्त्रप्रवीणत्वमाभि जात्यं च तादृशम्

tasya rūpaṁ tapo dharmamācārānvaidikāṁstathā vedaśāstrapravīṇatvamābhi jātyaṁ ca tādṛśam

उसका रूप, तप, धर्म, वैदिक आचार, वेद-शास्त्रों में निपुणता और वैसा ही उत्तम कुल -

श्लोक 87 (skanda.3.16.87)

लोकोत्तरमिदं सर्वं विज्ञाय तव नंदने। मनोरमां सुतां तस्मै दातुमिच्छाम्यहं मुने

lokottaramidaṁ sarvaṁ vijñāya tava naṁdane manoramāṁ sutāṁ tasmai dātumicchāmyahaṁ mune

इस लोकोत्तर सब कुछ को जानकर, हे मुने! मैं अपनी पुत्री मनोरमा को उसे देना चाहता हूँ।

श्लोक 88 (skanda.3.16.88)

मृगयाकौतुकी चाहं गंधमादनपर्वतम्। आगतो मुनिशार्दूल वर्त्ते युष्मत्सुतांतिके

mṛgayākautukī cāhaṁ gaṁdhamādanaparvatam āgato muniśārdūla vartte yuṣmatsutāṁtike

हे मुनिशार्दूल! शिकार में कौतुकी मैं गन्धमादन पर्वत आया, और आपके पुत्र के समीप ही हूँ।

श्लोक 89 (skanda.3.16.89)

पित्रनुज्ञां विना नाहमुद्वहेयं सुतां तव। इति ब्रूते तव सुतः कक्षीवान्मुनिस त्तम

pitranujñāṁ vinā nāhamudvaheyaṁ sutāṁ tava iti brūte tava sutaḥ kakṣīvānmunisa ttama

आपके पुत्र कक्षीवान् ने कहा - हे मुनिसत्तम! पिता की आज्ञा के बिना मैं तुम्हारी पुत्री से विवाह नहीं करूँगा।

श्लोक 90 (skanda.3.16.90)

तद्भावां मत्सुतां तस्मै दातुं मेऽनुग्रहं कुरु। प्रैषयं च समीपं ते सेनया च सुदर्शनम्

tadbhāvāṁ matsutāṁ tasmai dātuṁ me'nugrahaṁ kuru praiṣayaṁ ca samīpaṁ te senayā ca sudarśanam

इसलिए अपनी पुत्री उसे देने के लिए मुझ पर कृपा करें। मैंने ही सुदर्शन को सेना सहित आपके समीप भेजा है।'

श्लोक 91 (skanda.3.16.91)

सुदर्शन उवाच। इति मां भगवन्राजा प्राहिणोत्तव सन्निधिम्। तद्भवाननुमन्यस्व राज्ञस्तस्य चिकीर्षितम्

sudarśana uvāca iti māṁ bhagavanrājā prāhiṇottava sannidhim tadbhavānanumanyasva rājñastasya cikīrṣitam

सुदर्शन ने कहा - 'हे भगवन्! राजा ने मुझे इस प्रकार आपके समीप भेजा है। आप उस राजा की इच्छा को स्वीकार करें।'

श्लोक 92 (skanda.3.16.92)

श्रीसूत उवाच। इत्युक्त्वा विररामाथ स्वनयस्य पुरोहितः। ततो दीर्घतमाः प्राह स्वनयस्य पुरोहितम्

śrīsūta uvāca ityuktvā virarāmātha svanayasya purohitaḥ tato dīrghatamāḥ prāha svanayasya purohitam

श्रीसूत जी ने कहा - इस प्रकार कहकर स्वनय का पुरोहित चुप हो गया। तब दीर्घतमा ने स्वनय के पुरोहित से कहा -

श्लोक 93 (skanda.3.16.93)

दीर्घतमा उवाच। सुदर्शन भवत्वेवं कथितं स्वनयेन यत्। ममाभीष्टतमं ह्येतत्पाणिग्रहणमंगलम्

dīrghatamā uvāca sudarśana bhavatvevaṁ kathitaṁ svanayena yat mamābhīṣṭatamaṁ hyetatpāṇigrahaṇamaṁgalam

दीर्घतमा ने कहा - 'हे सुदर्शन! स्वनय ने जो कहा है, वैसा ही हो। यह पाणिग्रहण-रूपी मंगल मुझे भी अत्यन्त अभीष्ट है।

श्लोक 94 (skanda.3.16.94)

आगमिष्याम्यहं विप्र गन्धमादनपर्वतम्। इत्युक्त्वा स मुनिर्विप्रा महादीर्घतमा मुनिः

āgamiṣyāmyahaṁ vipra gandhamādanaparvatam ityuktvā sa munirviprā mahādīrghatamā muniḥ

हे विप्र! मैं स्वयं गन्धमादन पर्वत आऊँगा।' यह कहकर हे विप्रो! वह महादीर्घतमा मुनि,

श्लोक 95 (skanda.3.16.95)

वेदाटवीपतिं नत्वा भक्तिप्रवणचेतसा। सुदर्शनेन सहितः सेतुमुद्दिश्य निर्ययौ

vedāṭavīpatiṁ natvā bhaktipravaṇacetasā sudarśanena sahitaḥ setumuddiśya niryayau

भक्ति से नत हृदय से वेदाटवी के स्वामी को नमस्कार करके, सुदर्शन के साथ सेतु की ओर चल पड़े।

श्लोक 96 (skanda.3.16.96)

षट्भिर्दिनैर्मुनिः पुण्यं प्रययौ गन्धमादनम्। अगस्तितीर्थतीरं च गत्वा दीर्घतमा मुनिः

ṣaṭbhirdinairmuniḥ puṇyaṁ prayayau gandhamādanam agastitīrthatīraṁ ca gatvā dīrghatamā muniḥ

छह दिनों में वह मुनि पुण्यमय गन्धमादन पहुँचे; और अगस्तितीर्थ के तट पर जाकर दीर्घतमा मुनि ने,

श्लोक 97 (skanda.3.16.97)

अथ पुत्रं ददर्शाग्रे कक्षीवंतं महामुनिः। कक्षीवान्पितरं दृष्ट्वा ववन्दे नाम कीर्तयन्

atha putraṁ dadarśāgre kakṣīvaṁtaṁ mahāmuniḥ kakṣīvānpitaraṁ dṛṣṭvā vavande nāma kīrtayan

अपने सामने पुत्र कक्षीवान् को देखा, उस महामुनि ने। कक्षीवान् ने पिता को देखकर नाम कहते हुए वन्दना की।

श्लोक 98 (skanda.3.16.98)

ततो दीर्घतमा योगी स्वांकमारोप्य तं सुतम्। मूर्ध्न्युपाघ्राय सस्नेहं सस्वजे पुलकाकुलः

tato dīrghatamā yogī svāṁkamāropya taṁ sutam mūrdhnyupāghrāya sasnehaṁ sasvaje pulakākulaḥ

तब योगी दीर्घतमा ने अपने पुत्र को गोद में बिठाकर, सिर सूँघकर, स्नेहपूर्वक रोमांचित होकर उसे आलिंगन किया।

श्लोक 99 (skanda.3.16.99)

कुशलं परिपप्रच्छ तदा दीर्घतमा ऋषिः। सर्ववेदास्त्वयाधीताः कक्षीवन्किमु वत्सक

kuśalaṁ paripapraccha tadā dīrghatamā ṛṣiḥ sarvavedāstvayādhītāḥ kakṣīvankimu vatsaka

तब ऋषि दीर्घतमा ने कुशल-क्षेम पूछा - 'हे कक्षीवान्, क्या तुमने सभी वेद पढ़ लिए, हे वत्स?

श्लोक 100 (skanda.3.16.100)

शास्त्राण्यपाठीः किं त्वं वा वत्स सर्वं वदस्व मे। इति पृष्टः स्वपित्रा स सर्वं वृत्तं तमव्रवीत्।

śāstrāṇyapāṭhīḥ kiṁ tvaṁ vā vatsa sarvaṁ vadasva me iti pṛṣṭaḥ svapitrā sa sarvaṁ vṛttaṁ tamavravīt

शास्त्र भी पढ़े या नहीं, हे वत्स? मुझे सब कुछ बताओ।' अपने पिता द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर उसने सारा वृत्तान्त उन्हें बताया।

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