ब्रह्म खण्ड · अध्याय 17
कक्षीवान् के विवाह की सिद्धि
श्लोक 1 (skanda.3.17.1)
श्रीसूत उवाच। पुनरित्याह कक्षीवान्पितरं तं मुनीश्वराः। यथोदंकेन गुरुणा प्रेषितोऽहमिहा धुना
śrīsūta uvāca punarityāha kakṣīvānpitaraṁ taṁ munīśvarāḥ yathodaṁkena guruṇā preṣito'hamihā dhunā
श्रीसूत जी ने कहा - हे मुनीश्वरो! कक्षीवान् ने फिर अपने पिता से कहा - 'जैसे गुरु उदंक ने मुझे यहाँ भेजा था,
श्लोक 2 (skanda.3.17.2)
समागतोस्मि तीर्थेऽस्मिन्नागस्त्ये मुनिसत्तम। स्वनयस्य सुतोद्वाहसिद्ध्यर्थं गुरुचोदितः
samāgatosmi tīrthe'sminnāgastye munisattama svanayasya sutodvāhasiddhyarthaṁ gurucoditaḥ
हे मुनिसत्तम! उसी प्रकार मैं इस अगस्त्य-तीर्थ में आया, गुरु द्वारा स्वनय की पुत्री से विवाह की सिद्धि के लिए प्रेरित होकर।
श्लोक 3 (skanda.3.17.3)
उपायं तन्निगदितमत्र कुर्व न्न्यवर्तिषम्। वर्षत्रयावसाने मामुद्वाहोपायसंयुतम्
upāyaṁ tannigaditamatra kurva nnyavartiṣam varṣatrayāvasāne māmudvāhopāyasaṁyutam
यहाँ उनके बताए उपाय को करते हुए, तीन वर्ष के अंत में विवाह के उपाय से युक्त मुझे,
श्लोक 4 (skanda.3.17.4)
स्वनयोत्रैव तिष्ठन्तमाससाद यदृच्छया। स च मामेत्य कन्यां ते दास्यामीति वचोऽब्रवीत्
svanayotraiva tiṣṭhantamāsasāda yadṛcchayā sa ca māmetya kanyāṁ te dāsyāmīti vaco'bravīt
यहीं ठहरे हुए स्वनय संयोगवश मिले। वे मेरे पास आकर बोले - मैं तुम्हें अपनी कन्या दूँगा।
श्लोक 5 (skanda.3.17.5)
ततोस्मदनुरोधेन त्वामाह्वयदयं नृपः। इतीरयित्वा पितरं कक्षीवान्विरराम सः
tatosmadanurodhena tvāmāhvayadayaṁ nṛpaḥ itīrayitvā pitaraṁ kakṣīvānvirarāma saḥ
तब मेरे ही अनुरोध पर इस राजा ने आपको बुलवाया है।' पिता से यह कहकर कक्षीवान् चुप हो गया।
श्लोक 6 (skanda.3.17.6)
सुदर्शनोऽथ विप्रेंद्रः पुरोधाः स्वन यस्य सः। प्रययौ राजसविधं स्वनयाय निवेदितुम्
sudarśano'tha vipreṁdraḥ purodhāḥ svana yasya saḥ prayayau rājasavidhaṁ svanayāya niveditum
तब विप्रेन्द्र सुदर्शन, जो स्वनय के पुरोहित थे, राजा के पास स्वनय को सूचित करने के लिए गए।
श्लोक 7 (skanda.3.17.7)
राजानं तं समासाद्य स्वनयं स सुदर्शनः। प्राप्तं निवेदयामास तं दीर्घतमसं मुनिम्
rājānaṁ taṁ samāsādya svanayaṁ sa sudarśanaḥ prāptaṁ nivedayāmāsa taṁ dīrghatamasaṁ munim
राजा स्वनय के पास पहुँचकर उस सुदर्शन ने दीर्घतमा मुनि के आगमन की सूचना दी।
श्लोक 8 (skanda.3.17.8)
ततः स राजा स्वनयो मुनिं प्राप्तं पुरोहितात्। श्रुत्वा विनिर्ययौ द्रष्टुं महसा पटमण्डपात्
tataḥ sa rājā svanayo muniṁ prāptaṁ purohitāt śrutvā viniryayau draṣṭuṁ mahasā paṭamaṇḍapāt
तब राजा स्वनय पुरोहित से मुनि के आगमन की बात सुनकर, उन्हें देखने के लिए शीघ्रता से अपने शिविर-मंडप से बाहर निकले।
श्लोक 9 (skanda.3.17.9)
अगस्त्यतीर्थतीरे तं सपुत्रमृषि सत्तमम्। ददर्श राजा स्वनयो ब्रह्माणमिव देवराट्
agastyatīrthatīre taṁ saputramṛṣi sattamam dadarśa rājā svanayo brahmāṇamiva devarāṭ
अगस्त्यतीर्थ के तट पर पुत्र सहित उस श्रेष्ठ ऋषि को राजा स्वनय ने वैसे ही देखा जैसे देवराज इन्द्र ब्रह्मा को देखते हैं।
श्लोक 10 (skanda.3.17.10)
ववंदे दीर्घतमसश्चरणौ लोकमंगलौ। उत्थाप्य नृपतिं विप्रास्तदा दीर्घतमा मुनिः।
vavaṁde dīrghatamasaścaraṇau lokamaṁgalau utthāpya nṛpatiṁ viprāstadā dīrghatamā muniḥ
उसने लोक-मंगलकारी दीर्घतमा के चरणों की वन्दना की। राजा को उठाते हुए दीर्घतमा मुनि ने, हे विप्रो!
श्लोक 11 (skanda.3.17.11)
आशिषं प्रयुयोजाथ स्वनयाय नृपाय सः। अत्रांतरे समायात उदंकोऽपि महानृषिः
āśiṣaṁ prayuyojātha svanayāya nṛpāya saḥ atrāṁtare samāyāta udaṁko'pi mahānṛṣiḥ
तब राजा स्वनय को आशीर्वाद दिया। इसी बीच महर्षि उदंक भी वहाँ आ पहुँचे,
श्लोक 12 (skanda.3.17.12)
रामसेतौ धनुष्कोटौ स्नातुं शिष्यगणैर्वृतः। लक्षसंख्यो मुनिगणस्तेन साकं मुनीश्वरः
rāmasetau dhanuṣkoṭau snātuṁ śiṣyagaṇairvṛtaḥ lakṣasaṁkhyo munigaṇastena sākaṁ munīśvaraḥ
अपने शिष्यगणों से घिरे हुए, रामसेतु के धनुष्कोटि में स्नान के लिए; एक लाख की संख्या में मुनिगण उस मुनीश्वर के साथ,
श्लोक 13 (skanda.3.17.13)
उदंकोऽगस्त्यतीर्थेस्मिन्स्नातुं संप्राप्तवान्मुनिः। उदंकमागतं दृष्ट्वा कक्षीवान्प्रणनाम तम्
udaṁko'gastyatīrthesminsnātuṁ saṁprāptavānmuniḥ udaṁkamāgataṁ dṛṣṭvā kakṣīvānpraṇanāma tam
उदंक इस अगस्त्यतीर्थ में स्नान के लिए पहुँचे। उदंक को आया देखकर कक्षीवान् ने उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 14 (skanda.3.17.14)
अकरोदाशिषं विप्रः शिष्यायाथ गुरुस्तदा। अथ दीर्घतमा विप्रस्तमुदंकं महामुनिम्
akarodāśiṣaṁ vipraḥ śiṣyāyātha gurustadā atha dīrghatamā viprastamudaṁkaṁ mahāmunim
उस समय गुरु ब्राह्मण ने शिष्य को आशीर्वाद दिया। तब ब्राह्मण दीर्घतमा ने उस महामुनि उदंक से,
श्लोक 15 (skanda.3.17.15)
कुशलं परिपप्रच्छ सोऽपि तं मुनि पुंगमम्। उभौ तौ मुनिशार्दूलौ सर्वलोकेषु विश्रुतौ
kuśalaṁ paripapraccha so'pi taṁ muni puṁgamam ubhau tau muniśārdūlau sarvalokeṣu viśrutau
कुशल-क्षेम पूछा, उन्होंने भी उस मुनिश्रेष्ठ से पूछा। दोनों ही मुनिशार्दूल, सभी लोकों में विख्यात,
श्लोक 16 (skanda.3.17.16)
कथयामासतुस्तत्र कथाः पापप्रणाशिनीः। अथ राजाप्युदंकं तं प्रणनाम मुनीश्व रम्
kathayāmāsatustatra kathāḥ pāpapraṇāśinīḥ atha rājāpyudaṁkaṁ taṁ praṇanāma munīśva ram
वहाँ पाप-नाशक कथाएँ आपस में कहने लगे। तब राजा ने भी उस मुनीश्वर उदंक को प्रणाम किया।
श्लोक 17 (skanda.3.17.17)
उदंकोप्याशिषं तस्मै प्रायुंक्त स्वनयाय वै। राजाथ स्वनयः प्रीतस्तत्र वाक्यमभाषत
udaṁkopyāśiṣaṁ tasmai prāyuṁkta svanayāya vai rājātha svanayaḥ prītastatra vākyamabhāṣata
उदंक ने भी स्वनय को आशीर्वाद दिया। तब प्रसन्न राजा स्वनय ने वहाँ यह वचन कहा -
श्लोक 18 (skanda.3.17.18)
मुनिं तं दीर्घतमसं विवाहः क्रिय तामिति। तथास्त्वित्यवदत्सोऽपि तदा दीर्घतमा मुनिः
muniṁ taṁ dīrghatamasaṁ vivāhaḥ kriya tāmiti tathāstvityavadatso'pi tadā dīrghatamā muniḥ
दीर्घतमा मुनि से - 'विवाह कर दिया जाए।' 'तथास्तु' - ऐसा उस समय दीर्घतमा मुनि ने भी कहा -
श्लोक 19 (skanda.3.17.19)
श्व एव क्रियतां राजन्सुमुहूर्ते महामते। अत्रैव पाणिग्रहणं क्रियतां गन्धमा दने
śva eva kriyatāṁ rājansumuhūrte mahāmate atraiva pāṇigrahaṇaṁ kriyatāṁ gandhamā dane
'हे राजन्, हे महामते! कल ही शुभ मुहूर्त में, यहीं गन्धमादन में पाणिग्रहण किया जाए।
श्लोक 20 (skanda.3.17.20)
तस्मादिहानय क्षिप्रं कन्यामंतःपुरं तथा। इत्युक्तः स्वनयो राजा गत्वा स्वपटमण्डपम्
tasmādihānaya kṣipraṁ kanyāmaṁtaḥpuraṁ tathā ityuktaḥ svanayo rājā gatvā svapaṭamaṇḍapam
इसलिए यहाँ शीघ्र कन्या को और अंतःपुर को भी ले आइए।' इस प्रकार कहे जाने पर राजा स्वनय अपने शिविर-मंडप में जाकर,
श्लोक 21 (skanda.3.17.21)
आहूय शतसंख्याकान्वृद्धान्वर्ष वरांस्तदा। आनेतुं प्रेषयामास कन्यामंतःपुरं तथा
āhūya śatasaṁkhyākānvṛddhānvarṣa varāṁstadā ānetuṁ preṣayāmāsa kanyāmaṁtaḥpuraṁ tathā
सौ वृद्ध कंचुकियों को बुलाकर, कन्या और अंतःपुर को लाने के लिए भेजा।
श्लोक 22 (skanda.3.17.22)
ते वर्षवरमुख्यास्तु स्वनयेन प्रचोदिताः। मनोजवान्समारुह्य वाजिनो मधुरां ययुः
te varṣavaramukhyāstu svanayena pracoditāḥ manojavānsamāruhya vājino madhurāṁ yayuḥ
स्वनय द्वारा प्रेरित वे मुख्य कंचुकी, मन के समान वेगवान् घोड़ों पर सवार होकर मधुरा गए।
श्लोक 23 (skanda.3.17.23)
गत्वा चांतःपुरं तूर्णं वृत्तं सर्वं निवेद्यच। कन्ययांतःपुरेणापि सहिताः पुनराययुः
gatvā cāṁtaḥpuraṁ tūrṇaṁ vṛttaṁ sarvaṁ nivedyaca kanyayāṁtaḥpureṇāpi sahitāḥ punarāyayuḥ
अंतःपुर में शीघ्र जाकर सारा वृत्तान्त बताकर, वे कन्या और अंतःपुर सहित पुनः लौट आए।
श्लोक 24 (skanda.3.17.24)
ततः परस्मिन्दिवसे शुभे दीर्घतमा ऋषिः। गोदानादीनि पुत्रस्य विधिवन्निरवर्तयत्
tataḥ parasmindivase śubhe dīrghatamā ṛṣiḥ godānādīni putrasya vidhivanniravartayat
तब अगले शुभ दिन ऋषि दीर्घतमा ने पुत्र के गोदान आदि संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किए।
श्लोक 25 (skanda.3.17.25)
निर्वृत्तेष्वथ कक्षीवान्गोदानादिषु कर्मसु। उद्वोढुं राजतनयां पित्रा च गुरुणा सह।
nirvṛtteṣvatha kakṣīvāngodānādiṣu karmasu udvoḍhuṁ rājatanayāṁ pitrā ca guruṇā saha
गोदान आदि कर्म पूर्ण हो जाने पर, राजकन्या से विवाह के लिए कक्षीवान् पिता और गुरु के साथ,
श्लोक 26 (skanda.3.17.26)
चतुर्दंतं महाकायं गजं सर्वांगपांडुरम्। आरुह्य हर्षसंयुक्तो द्वितीय इव देवराट्
caturdaṁtaṁ mahākāyaṁ gajaṁ sarvāṁgapāṁḍuram āruhya harṣasaṁyukto dvitīya iva devarāṭ
चार दाँतों वाले, विशाल शरीर वाले, सर्वांग-श्वेत हाथी पर सवार होकर, हर्षयुक्त, मानो दूसरे देवराज-सा,
श्लोक 27 (skanda.3.17.27)
मनोरमायाः कन्यायाः पूरयंश्च मनोरथम्। ब्राह्मणैर्बहुसाहस्रैः सहितः स्वस्तिवाचकैः
manoramāyāḥ kanyāyāḥ pūrayaṁśca manoratham brāhmaṇairbahusāhasraiḥ sahitaḥ svastivācakaiḥ
मनोरमा कन्या के मनोरथ को पूर्ण करता हुआ, आशीर्वाद पढ़ते हुए हजारों ब्राह्मणों सहित,
श्लोक 28 (skanda.3.17.28)
तोरणालंकृतद्वारं राजर्षे पटमण्डपम्। कृतमंगलकृत्योऽसौ कक्षीवान्मुदितो ययौ
toraṇālaṁkṛtadvāraṁ rājarṣe paṭamaṇḍapam kṛtamaṁgalakṛtyo'sau kakṣīvānmudito yayau
तोरण से सुसज्जित द्वार वाले उस राजर्षि के शिविर-मंडप को, मंगल-कार्य सम्पन्न करता हुआ हर्षित कक्षीवान् गया।
श्लोक 29 (skanda.3.17.29)
ततः स्वनयकन्या सा कृतमंगलभूषणा। चतुर्दंतमहाकायश्वेतदंतावलस्थितम्
tataḥ svanayakanyā sā kṛtamaṁgalabhūṣaṇā caturdaṁtamahākāyaśvetadaṁtāvalasthitam
तब स्वनय की पुत्री, मंगल-आभूषणों से सुसज्जित, चार दाँतों वाले, विशाल शरीर वाले, श्वेत-दाँतों वाले गजराज पर बैठे,
श्लोक 30 (skanda.3.17.30)
कक्षीवंतं समायांतं दृष्ट्वा स्वोद्वाहनोत्सुकम्। प्रतिज्ञा मत्कृते दानीं निर्वृत्तेति मुदं ययौ
kakṣīvaṁtaṁ samāyāṁtaṁ dṛṣṭvā svodvāhanotsukam pratijñā matkṛte dānīṁ nirvṛtteti mudaṁ yayau
अपने विवाह के लिए उत्सुक कक्षीवान् को आते देखकर - 'मेरे लिए की गई प्रतिज्ञा अब पूर्ण हो गई' - यह सोचकर प्रसन्न हुई।
श्लोक 31 (skanda.3.17.31)
कक्षीवान्दीर्घतमसा तथोदंकेन संयुतः। पटाकारबहिर्द्वारं क्रमाद्राज्ञः समाययौ
kakṣīvāndīrghatamasā tathodaṁkena saṁyutaḥ paṭākārabahirdvāraṁ kramādrājñaḥ samāyayau
कक्षीवान् दीर्घतमा और उदंक के साथ क्रमशः राजा के शिविर-मंडप के बाहरी द्वार तक पहुँचे।
श्लोक 32 (skanda.3.17.32)
स्वनयस्तु ततो दृष्ट्वा कक्षीवंतं समागतम्। प्रत्युज्जगाम सहितः सुदर्शनपुरोधसा
svanayastu tato dṛṣṭvā kakṣīvaṁtaṁ samāgatam pratyujjagāma sahitaḥ sudarśanapurodhasā
तब कक्षीवान् को आया हुआ देखकर स्वनय पुरोहित सुदर्शन सहित उनकी अगवानी के लिए आगे बढ़े।
श्लोक 33 (skanda.3.17.33)
कक्षीवतो वरस्याथ कन्यकापरिचारिकाः। राजतैः स्वर्णपात्रैश्च चक्रु र्नीराजनाविधिम्
kakṣīvato varasyātha kanyakāparicārikāḥ rājataiḥ svarṇapātraiśca cakru rnīrājanāvidhim
तब वर कक्षीवान् की कन्या-सेविकाओं ने चाँदी और सोने के पात्रों से आरती-विधि की।
श्लोक 34 (skanda.3.17.34)
स्वनयेन समाहूतो ब्राह्मणैः परिवारितः। प्रविवेशाथ लक्ष्मीवान्कक्षीवान्राजमंदिरम्
svanayena samāhūto brāhmaṇaiḥ parivāritaḥ praviveśātha lakṣmīvānkakṣīvānrājamaṁdiram
स्वनय द्वारा आमंत्रित, ब्राह्मणों से घिरे हुए, लक्ष्मीवान् कक्षीवान् तब राजमहल में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 35 (skanda.3.17.35)
ततो वरेण सहितं तं दीर्घतमसं मुनिम्। सोदंकमनयद्राजा स्वगृहं विनयान्वितः
tato vareṇa sahitaṁ taṁ dīrghatamasaṁ munim sodaṁkamanayadrājā svagṛhaṁ vinayānvitaḥ
तब विनय-सम्पन्न राजा ने वर सहित उस दीर्घतमा मुनि को उदंक सहित अपने घर ले गए।
श्लोक 36 (skanda.3.17.36)
उदंकदीर्घतमसोरर्घ्यं च प्रददौ नृपः। अलंकृते प्रपामध्ये वस्त्रचामरतोरणैः
udaṁkadīrghatamasorarghyaṁ ca pradadau nṛpaḥ alaṁkṛte prapāmadhye vastracāmaratoraṇaiḥ
वस्त्र, चामर और तोरणों से सज्जित मंडप के मध्य राजा ने उदंक और दीर्घतमा को अर्घ्य दिया।
श्लोक 37 (skanda.3.17.37)
वरो दीर्घतमाश्चान्ये सोदंका मुनयस्तदा। न्यषीदन्स्वनयश्चापि सामात्यः सपुरोहितः
varo dīrghatamāścānye sodaṁkā munayastadā nyaṣīdansvanayaścāpi sāmātyaḥ sapurohitaḥ
वर, दीर्घतमा और अन्य मुनि, उदंक सहित, तब बैठे; और स्वनय भी मंत्रियों और पुरोहित सहित -
श्लोक 38 (skanda.3.17.38)
ततो दुहितरं कन्यां सुकेशीं तां मनो रमाम्। भूषणालंकृतां गात्रे दिव्यवस्त्रधरां शुभाम्
tato duhitaraṁ kanyāṁ sukeśīṁ tāṁ mano ramām bhūṣaṇālaṁkṛtāṁ gātre divyavastradharāṁ śubhām
तब वह अपनी सुकेशी पुत्री मनोरमा को, अंगों में आभूषणों से सुसज्जित, दिव्य वस्त्र धारण किए हुए, शुभ रूप में,
श्लोक 39 (skanda.3.17.39)
बिंबोष्ठीं चारुसर्वांगीं पीनोन्नतपयोधराम्। प्रपायामध्यमनयन्महाजनसमाकुलम्।
biṁboṣṭhīṁ cārusarvāṁgīṁ pīnonnatapayodharām prapāyāmadhyamanayanmahājanasamākulam
बिम्बफल-सी ओठों वाली, सर्वांग-सुन्दर, उन्नत-स्तन वाली, मंडप के मध्य लाया, जो महाजनों से भरा हुआ था।
श्लोक 40 (skanda.3.17.40)
ततो वरस्य कंठे सा मालां चंपकनिर्मिताम्। निवेशयामास शुभा जनमध्ये मनोरमा
tato varasya kaṁṭhe sā mālāṁ caṁpakanirmitām niveśayāmāsa śubhā janamadhye manoramā
तब उस शुभ मनोरमा ने चम्पक के फूलों की माला वर के गले में, लोगों के मध्य, पहनाई।
श्लोक 41 (skanda.3.17.41)
उदंकस्तत आगत्य प्रतिष्ठाप्यानलं स्थले। कृत्वाग्निमुखपर्यंतं लाजाहोमादिकं तथा
udaṁkastata āgatya pratiṣṭhāpyānalaṁ sthale kṛtvāgnimukhaparyaṁtaṁ lājāhomādikaṁ tathā
तब उदंक ने आकर उस स्थान पर अग्नि स्थापित की, और अग्निमुख आदि से लेकर लाजाहोम आदि विधियाँ सम्पन्न करके,
श्लोक 42 (skanda.3.17.42)
पाणिमग्राहयत्तस्याः कन्यायाश्च वरेण तु। उदंकः सर्वकर्माणि कारयामास तत्र वै।
pāṇimagrāhayattasyāḥ kanyāyāśca vareṇa tu udaṁkaḥ sarvakarmāṇi kārayāmāsa tatra vai
उस कन्या का पाणिग्रहण वर से कराया। उदंक ने वहाँ सभी कर्मों को सम्पन्न कराया।
श्लोक 43 (skanda.3.17.43)
वरवध्वोस्तदा विप्राः प्रायुंजत तदाशिषः। ततः स राजा स्वनयो वरं दीर्घतमोमुनिम्
varavadhvostadā viprāḥ prāyuṁjata tadāśiṣaḥ tataḥ sa rājā svanayo varaṁ dīrghatamomunim
तब ब्राह्मणों ने वर-वधू को आशीर्वाद दिए। तब राजा स्वनय ने वर दीर्घतमा-मुनि,
श्लोक 44 (skanda.3.17.44)
उदंकं वरपक्षीयान्स्वपक्षीयांस्तथाद्विजाः। त्रिलक्षं ब्राह्मणानन्नैर्भोजयामास षड्रसैः
udaṁkaṁ varapakṣīyānsvapakṣīyāṁstathādvijāḥ trilakṣaṁ brāhmaṇānannairbhojayāmāsa ṣaḍrasaiḥ
उदंक, वर-पक्ष और अपने पक्ष के लोगों को, हे द्विजो! तीन लाख ब्राह्मणों को षड्रस भोजन से तृप्त किया।
श्लोक 45 (skanda.3.17.45)
ततः संभावयामास तांबूलाद्यैरनेकधा। अथामंत्र्य मुनिश्रेष्ठमुदंकः स्वाश्रमं ययौ
tataḥ saṁbhāvayāmāsa tāṁbūlādyairanekadhā athāmaṁtrya muniśreṣṭhamudaṁkaḥ svāśramaṁ yayau
फिर उसने तांबूल आदि से अनेक प्रकार से सम्मान किया। तब उस मुनिश्रेष्ठ से विदा लेकर उदंक अपने आश्रम गए,
श्लोक 46 (skanda.3.17.46)
अन्ये च ब्राह्मणाः सर्वे स्वदेशान्प्रययुस्तदा। एवं विवाहे निर्वृत्ते कक्षीवद्राजकन्ययोः
anye ca brāhmaṇāḥ sarve svadeśānprayayustadā evaṁ vivāhe nirvṛtte kakṣīvadrājakanyayoḥ
और अन्य सभी ब्राह्मण भी तब अपने-अपने देश को चले गए। इस प्रकार कक्षीवान् और राजकन्या का विवाह सम्पन्न हो जाने पर,
श्लोक 47 (skanda.3.17.47)
प्रविश्यागस्त्यतीर्थं स तिरोधत्त गजोत्तमः। ततो दीर्घतमा विप्राः पुत्रेण स्नुषया सह
praviśyāgastyatīrthaṁ sa tirodhatta gajottamaḥ tato dīrghatamā viprāḥ putreṇa snuṣayā saha
वह श्रेष्ठ गजराज अगस्त्यतीर्थ में प्रविष्ट होकर अन्तर्धान हो गया। तब हे विप्रो! दीर्घतमा पुत्र और पुत्रवधू सहित,
श्लोक 48 (skanda.3.17.48)
अगस्त्यस्य महातीर्थे स्नानं कृत्वेष्टदायिनि। श्लाघमानश्च तत्तीर्थं सर्वलोकेषु विश्रुतम्
agastyasya mahātīrthe snānaṁ kṛtveṣṭadāyini ślāghamānaśca tattīrthaṁ sarvalokeṣu viśrutam
अभीष्ट-दायक अगस्त्य के महातीर्थ में स्नान करके, सभी लोकों में विख्यात उस तीर्थ की प्रशंसा करते हुए,
श्लोक 49 (skanda.3.17.49)
प्रयातुं स्वा श्रमं पुण्यं वेदारण्यं मनो दधे। राजानं च तमागंतुमापृच्छन्मुनिसत्तमः
prayātuṁ svā śramaṁ puṇyaṁ vedāraṇyaṁ mano dadhe rājānaṁ ca tamāgaṁtumāpṛcchanmunisattamaḥ
अपने पवित्र आश्रम, वेदारण्य, जाने का मन बनाया; और उस मुनिश्रेष्ठ ने राजा से जाने की अनुमति माँगी।
श्लोक 50 (skanda.3.17.50)
स्वनयोऽपि तदा राजा स्वदुहित्रे मुदान्वितः। ददौ शतसहस्राणि स्वर्णानि स्त्रीधनं तदा
svanayo'pi tadā rājā svaduhitre mudānvitaḥ dadau śatasahasrāṇi svarṇāni strīdhanaṁ tadā
राजा स्वनय ने भी तब प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुत्री को स्त्रीधन के रूप में लाखों स्वर्ण-मुद्राएँ दीं,
श्लोक 51 (skanda.3.17.51)
गवां सहस्रं प्रददौ दासीनां च सहस्रकम्। ग्रामं पंचशतं चापि ददौ दुहितृवत्सलः
gavāṁ sahasraṁ pradadau dāsīnāṁ ca sahasrakam grāmaṁ paṁcaśataṁ cāpi dadau duhitṛvatsalaḥ
हजार गायें और हजार दासियाँ दीं; और पुत्री-वत्सल उस राजा ने पाँच सौ गाँव भी दिए।
श्लोक 52 (skanda.3.17.52)
दिव्यवस्त्रा युतं चापि शतं भूषणपेटिकाः। हारमालासहस्रं च ददौ दुहितृसौहृदात्
divyavastrā yutaṁ cāpi śataṁ bhūṣaṇapeṭikāḥ hāramālāsahasraṁ ca dadau duhitṛsauhṛdāt
दिव्य वस्त्रों सहित सौ आभूषण-पेटिकाएँ और हजार हार-मालाएँ भी पुत्री के प्रेम से दीं।
श्लोक 53 (skanda.3.17.53)
एतत्सर्वं समादाय स पुत्रः सस्नुषो मुनिः। राज्ञा च समनुज्ञातः प्रययौ वेदकाननम्
etatsarvaṁ samādāya sa putraḥ sasnuṣo muniḥ rājñā ca samanujñātaḥ prayayau vedakānanam
यह सब लेकर वह मुनि पुत्र और पुत्रवधू सहित, राजा से आज्ञा पाकर वेद-कानन को चल पड़े।
श्लोक 54 (skanda.3.17.54)
वेदारण्यं समासाद्य तदा दीर्घतमा मुनिः। उवास ससुखं विप्राः पुत्रेण स्नुषया सह
vedāraṇyaṁ samāsādya tadā dīrghatamā muniḥ uvāsa sasukhaṁ viprāḥ putreṇa snuṣayā saha
वेदारण्य पहुँचकर तब दीर्घतमा मुनि, हे विप्रो! पुत्र और पुत्रवधू सहित सुखपूर्वक रहने लगे,
श्लोक 55 (skanda.3.17.55)
सेवन्वेदाटवीनाथं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्। न्यवसत्तु चिरं कालं कक्षीवानपि भार्यया
sevanvedāṭavīnāthaṁ bhuktimuktiphalapradam nyavasattu ciraṁ kālaṁ kakṣīvānapi bhāryayā
भोग और मोक्ष-फल देने वाले वेदाटवीनाथ की सेवा करते हुए। कक्षीवान् भी अपनी पत्नी के साथ वहाँ दीर्घकाल तक निवास करते रहे।
श्लोक 56 (skanda.3.17.56)
स्वनयोपि स राजर्षिः स्नात्वा कुंभजनिर्मिते। तत्र तीर्थे महापुण्ये सहितः सर्वसैनिकैः
svanayopi sa rājarṣiḥ snātvā kuṁbhajanirmite tatra tīrthe mahāpuṇye sahitaḥ sarvasainikaiḥ
स्वनय राजर्षि भी कुम्भज द्वारा निर्मित उस महापुण्य तीर्थ में सभी सैनिकों सहित स्नान करके,
श्लोक 57 (skanda.3.17.57)
अतःपुरं समादाय मुदितः स्वपुरं ययौ। अगस्त्यतीर्थमाहात्म्यादेवं कक्षीवतो मुनेः। अनन्यसुलभो विप्रा विवाहः समजायत
ataḥpuraṁ samādāya muditaḥ svapuraṁ yayau agastyatīrthamāhātmyādevaṁ kakṣīvato muneḥ ananyasulabho viprā vivāhaḥ samajāyata
अंतःपुर को साथ लेकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नगरी को गए। हे विप्रो! अगस्त्यतीर्थ के माहात्म्य से इस प्रकार कक्षीवान् मुनि का, अन्य किसी को सुलभ न होने वाला विवाह सम्पन्न हुआ।
श्लोक 58 (skanda.3.17.58)
श्रीसूत उवाच। इतिहासस्त्वयं पुण्यो वेदसिद्धो मुनीश्वराः
śrīsūta uvāca itihāsastvayaṁ puṇyo vedasiddho munīśvarāḥ
श्रीसूत जी ने कहा - हे मुनीश्वरो! यह इतिहास पुण्यमय है, वेद से सिद्ध है,
श्लोक 59 (skanda.3.17.59)
धन्यो यशस्य आयुष्यः कीर्तिसौभाग्य वर्द्धनः। श्रोतव्यः पठितव्योऽयं सर्वथा मानवैर्द्विजाः
dhanyo yaśasya āyuṣyaḥ kīrtisaubhāgya varddhanaḥ śrotavyaḥ paṭhitavyo'yaṁ sarvathā mānavairdvijāḥ
धन्य, यशस्वी, आयुष्यवर्धक, कीर्ति और सौभाग्य को बढ़ाने वाला है। हे द्विजो! इसे मनुष्यों को सर्वथा सुनना और पढ़ना चाहिए।
श्लोक 60 (skanda.3.17.60)
पठतां शृण्वतां चेममितिहासं पुरातनम्। नेहामुत्रापि वा क्लेशो दारिद्यं चापि नो भवेत्
paṭhatāṁ śṛṇvatāṁ cemamitihāsaṁ purātanam nehāmutrāpi vā kleśo dāridyaṁ cāpi no bhavet
इस पुरातन इतिहास को पढ़ने और सुनने वालों को न तो इस लोक में और न परलोक में कोई क्लेश होता है, न ही दरिद्रता होती है।