ब्रह्म खण्ड · अध्याय 18
रामतीर्थ की महिमा और युधिष्ठिर के असत्यभाषण-दोष की शांति
श्लोक 1 (skanda.3.18.1)
श्रीसूत उवाच। कुंभसंभवतीर्थेऽस्मिन्विधायाभिषवं नरः। रामकुंडं ततः पुण्यं गच्छेत्पापविमुक्तये
śrīsūta uvāca kuṁbhasaṁbhavatīrthe'sminvidhāyābhiṣavaṁ naraḥ rāmakuṁḍaṁ tataḥ puṇyaṁ gacchetpāpavimuktaye
श्रीसूत जी ने कहा - इस कुम्भसम्भव-तीर्थ (अगस्तितीर्थ) में स्नान करके, मनुष्य को पापों से मुक्ति के लिए फिर पुण्यमय रामकुण्ड जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.3.18.2)
रघुनाथसरः पुण्यं द्विजाः पापहरं तथा। रघुनाथसरस्तीरे कृतो यज्ञोऽल्पदक्षिणः
raghunāthasaraḥ puṇyaṁ dvijāḥ pāpaharaṁ tathā raghunāthasarastīre kṛto yajño'lpadakṣiṇaḥ
हे द्विजो! रघुनाथ का सरोवर पुण्यमय और पाप-हारक है; रघुनाथ-सरोवर के तट पर अल्प दक्षिणा से किया गया यज्ञ भी,
श्लोक 3 (skanda.3.18.3)
संपूर्णफलदो भूयात्स्वाध्यायोऽपि जपस्तथा। रघुनाथ सरस्तीरे मुष्टिमात्रमपि द्विजाः
saṁpūrṇaphalado bhūyātsvādhyāyo'pi japastathā raghunātha sarastīre muṣṭimātramapi dvijāḥ
पूर्ण फल देने वाला हो जाता है, और वैसे ही स्वाध्याय तथा जप भी। हे द्विजो! रघुनाथ-सरोवर के तट पर एक मुट्ठी भर भी,
श्लोक 4 (skanda.3.18.4)
दत्तं चेद्वेदविदुषे तदनंतगुणं भवेत्। रामतीर्थं समुद्दिश्य वक्ष्यामि मुनिपुंगवाः
dattaṁ cedvedaviduṣe tadanaṁtaguṇaṁ bhavet rāmatīrthaṁ samuddiśya vakṣyāmi munipuṁgavāḥ
यदि वेदज्ञ को दान दिया जाए, तो वह अनन्त गुणा हो जाता है। हे मुनिपुंगवो! अब मैं रामतीर्थ के विषय में,
श्लोक 5 (skanda.3.18.5)
इतिहासं महापुण्यं सर्वपातकनाशनम्। सुतीक्ष्णनामा विप्रेंद्रो मुनिर्नियतमानसः
itihāsaṁ mahāpuṇyaṁ sarvapātakanāśanam sutīkṣṇanāmā vipreṁdro munirniyatamānasaḥ
समस्त पातकों का नाश करने वाला यह महापुण्यमय इतिहास कहूँगा। सुतीक्ष्ण नामक विप्रेन्द्र, नियत-मन मुनि,
श्लोक 6 (skanda.3.18.6)
अगस्त्यशिष्यो रामस्य चरणाब्जविचिंतकः। रामचंद्रसरस्तीरे तपस्तेपे सुदुष्करम्
agastyaśiṣyo rāmasya caraṇābjaviciṁtakaḥ rāmacaṁdrasarastīre tapastepe suduṣkaram
अगस्त्य के शिष्य, राम के चरण-कमलों का चिंतन करने वाले, रामचन्द्र-सरोवर के तट पर अत्यन्त दुष्कर तप करते थे,
श्लोक 7 (skanda.3.18.7)
जपन्षडक्षरं मंत्रं रामचंद्राधिदैवतम्। नित्यं स पंचसाहस्रं मत्रराजमतंद्रितः
japanṣaḍakṣaraṁ maṁtraṁ rāmacaṁdrādhidaivatam nityaṁ sa paṁcasāhasraṁ matrarājamataṁdritaḥ
रामचन्द्र-अधिष्ठित छह अक्षरों वाले मंत्र का जप करते हुए। नित्य पाँच हजार बार वे उस मंत्रराज का, बिना आलस्य के,
श्लोक 8 (skanda.3.18.8)
जजाप कुर्वन्स्नानं च रघुनाथसरोजले। भिक्षाशी नियताहारो जितक्रोधो जितेंद्रियः
jajāpa kurvansnānaṁ ca raghunāthasarojale bhikṣāśī niyatāhāro jitakrodho jiteṁdriyaḥ
जप करते हुए रघुनाथ-सरोवर के जल में स्नान भी करते थे; भिक्षान्न-भोजी, नियत-आहारी, क्रोध-विजयी, जितेन्द्रिय।
श्लोक 9 (skanda.3.18.9)
एवं सुतीक्ष्णो विप्रेंद्रा बहुकालमवर्तत। ततः कदाचित्स मुनीरामं ध्याय न्सदा हृदि। तुष्टाव सीतासहितं रामचंद्रं सभक्तिकम्
evaṁ sutīkṣṇo vipreṁdrā bahukālamavartata tataḥ kadācitsa munīrāmaṁ dhyāya nsadā hṛdi tuṣṭāva sītāsahitaṁ rāmacaṁdraṁ sabhaktikam
हे विप्रेन्द्रो! इस प्रकार सुतीक्ष्ण बहुत काल तक रहे। तब एक बार वे मुनि, हृदय में सदा राम का ध्यान करते हुए, सीता सहित रामचन्द्र की भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगे।
श्लोक 10 (skanda.3.18.10)
सुतीक्ष्ण उवाच। नमस्ते जानकीनाथ नमस्ते हनुमत्प्रिय
sutīkṣṇa uvāca namaste jānakīnātha namaste hanumatpriya
सुतीक्ष्ण ने कहा - 'हे जानकीनाथ! आपको नमस्कार। हे हनुमत्प्रिय! आपको नमस्कार।
श्लोक 11 (skanda.3.18.11)
नमस्ते कौशिकमुनेर्यागरक्षणदीक्षित। नमस्ते कौसलेयाय विश्वामित्रप्रियाय च
namaste kauśikamuneryāgarakṣaṇadīkṣita namaste kausaleyāya viśvāmitrapriyāya ca
हे कौशिक-मुनि के यज्ञ-रक्षण-व्रती! आपको नमस्कार। हे कौसल्या-पुत्र, विश्वामित्र के प्रिय! आपको नमस्कार।
श्लोक 12 (skanda.3.18.12)
नमस्ते हरकोदण्डभंजकामरसेवित। मारीचांतक राजेंद्र ताटकाप्राणनाशन
namaste harakodaṇḍabhaṁjakāmarasevita mārīcāṁtaka rājeṁdra tāṭakāprāṇanāśana
हे हर के धनुष के भंजक, अमरों द्वारा सेवित! आपको नमस्कार। हे मारीचांतक, राजेन्द्र, ताटका के प्राण-नाशक!
श्लोक 13 (skanda.3.18.13)
कबंधारे हरे तुभ्यं नमो दशरथात्मज। जामदग्न्यजिते तुभ्यं खरविध्वंसिने नमः
kabaṁdhāre hare tubhyaṁ namo daśarathātmaja jāmadagnyajite tubhyaṁ kharavidhvaṁsine namaḥ
हे कबन्ध के शत्रु, हरि! आपको नमस्कार, हे दशरथ-पुत्र। हे जामदग्न्य (परशुराम) के विजेता! आपको नमस्कार, हे खर के विध्वंसक!
श्लोक 14 (skanda.3.18.14)
नमः सुग्रीवनाथाय नमो वालिहराय ते। विभीषणभयक्लेशहारिणे मलहारिणे
namaḥ sugrīvanāthāya namo vāliharāya te vibhīṣaṇabhayakleśahāriṇe malahāriṇe
हे सुग्रीव के स्वामी! नमस्कार, हे वालि-हारी! आपको नमस्कार। हे विभीषण के भय और क्लेश को हरने वाले, मल-हारी!
श्लोक 15 (skanda.3.18.15)
अहल्यादुःखसंहर्त्रे नमस्ते भरताग्रज। अंभोधिगर्वसंहर्त्रे तस्मिन्सेतु कृते नमः
ahalyāduḥkhasaṁhartre namaste bharatāgraja aṁbhodhigarvasaṁhartre tasminsetu kṛte namaḥ
हे अहल्या के दुःख के संहर्ता! आपको नमस्कार, हे भरत के अग्रज। हे समुद्र के गर्व के संहर्ता! उस सेतु-निर्माता को नमस्कार।
श्लोक 16 (skanda.3.18.16)
तारकब्रह्मणे तुभ्यं लक्ष्मणाग्रज ते नमः। रक्षःसंहारिणे तुभ्यं नमो रावणमर्द्दिने
tārakabrahmaṇe tubhyaṁ lakṣmaṇāgraja te namaḥ rakṣaḥsaṁhāriṇe tubhyaṁ namo rāvaṇamarddine
हे तारक-ब्रह्म! आपको, हे लक्ष्मण के अग्रज, नमस्कार। हे राक्षसों के संहारक! आपको नमस्कार, हे रावण के मर्दक!
श्लोक 17 (skanda.3.18.17)
कोदण्डधारिणे तुभ्यं सर्व रक्षाविधायिने। इति स्तुवन्मुनिः सोऽयं सुतीक्ष्णो राममन्वहम्
kodaṇḍadhāriṇe tubhyaṁ sarva rakṣāvidhāyine iti stuvanmuniḥ so'yaṁ sutīkṣṇo rāmamanvaham
हे धनुर्धारी, सर्वरक्षा-विधायक! आपको नमस्कार।' इस प्रकार वे मुनि सुतीक्ष्ण प्रतिदिन राम की स्तुति करते हुए,
श्लोक 18 (skanda.3.18.18)
निनाय कालमनिशं रामचंद्रनिषण्णधीः। एवमभ्यसतस्तस्य राम मन्त्रं षडक्षरम्
nināya kālamaniśaṁ rāmacaṁdraniṣaṇṇadhīḥ evamabhyasatastasya rāma mantraṁ ṣaḍakṣaram
रामचन्द्र में स्थिर बुद्धि रखते हुए, निरन्तर काल बिताते थे। इस प्रकार राम के छह-अक्षर मंत्र का अभ्यास करते हुए,
श्लोक 19 (skanda.3.18.19)
स्तुवतो रामचंद्रं च स्तोत्रेणानेन सुव्रताः। तीर्थे च रघुनाथस्य कुर्वतः स्नानमन्वहम्
stuvato rāmacaṁdraṁ ca stotreṇānena suvratāḥ tīrthe ca raghunāthasya kurvataḥ snānamanvaham
हे सुव्रतो! इस स्तोत्र से रामचन्द्र की स्तुति करते हुए, तथा रघुनाथ के तीर्थ में प्रतिदिन स्नान करते हुए,
श्लोक 20 (skanda.3.18.20)
अभवन्निश्चला भक्ती रामचंद्रेतिनिर्मला। अभूदद्वैतविज्ञानं प्रत्यगात्मैकलक्षणम्
abhavanniścalā bhaktī rāmacaṁdretinirmalā abhūdadvaitavijñānaṁ pratyagātmaikalakṣaṇam
उनकी 'रामचन्द्र' नाम में अचल, निर्मल भक्ति उत्पन्न हो गई। प्रत्यगात्मा को ही लक्षण मानने वाला अद्वैत-विज्ञान उत्पन्न हुआ,
श्लोक 21 (skanda.3.18.21)
अनधीतत्रयीज्ञानं तथैवाश्रुतवेदनम्। परकायप्रवेशे च सामर्थ्यमभवद्द्विजाः
anadhītatrayījñānaṁ tathaivāśrutavedanam parakāyapraveśe ca sāmarthyamabhavaddvijāḥ
त्रयी (वेद) का ज्ञान न पढ़े होने पर भी, तथा वेद को न सुना होने पर भी। हे द्विजो! उन्हें दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की सामर्थ्य उत्पन्न हो गई,
श्लोक 22 (skanda.3.18.22)
आकाशगमने शक्तिः कलावैदग्ध्यमेव च। अश्रुतानां च शास्त्राणामभिज्ञानं विना गुरुम्
ākāśagamane śaktiḥ kalāvaidagdhyameva ca aśrutānāṁ ca śāstrāṇāmabhijñānaṁ vinā gurum
आकाश-गमन की शक्ति, और कला-निपुणता भी। बिना गुरु के भी अनसुने शास्त्रों का ज्ञान,
श्लोक 23 (skanda.3.18.23)
गमनं सर्वलोकेषु प्रति घातविवर्जितम्। अतींद्रियार्थद्रष्टृत्वं देवैः संभाषणं तथा
gamanaṁ sarvalokeṣu prati ghātavivarjitam atīṁdriyārthadraṣṭṛtvaṁ devaiḥ saṁbhāṣaṇaṁ tathā
सभी लोकों में बिना किसी रुकावट के गमन; इन्द्रियों से परे पदार्थों को देखने की क्षमता, तथा देवताओं से वार्तालाप,
श्लोक 24 (skanda.3.18.24)
पिपीलिकादिजंतूनां वार्ताज्ञानमपि द्विजाः। ब्रह्मविष्णुमहादेवलोकेषु गमनं तथा
pipīlikādijaṁtūnāṁ vārtājñānamapi dvijāḥ brahmaviṣṇumahādevalokeṣu gamanaṁ tathā
यहाँ तक कि हे द्विजो! चींटी आदि जीवों की बातों का भी ज्ञान; ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के लोकों में गमन भी,
श्लोक 25 (skanda.3.18.25)
चतुर्दशसु लोकेषु स्वाधीनगमनं तथा। एतान्यन्यानि सर्वाणि योगिलभ्यानि सत्तमाः
caturdaśasu lokeṣu svādhīnagamanaṁ tathā etānyanyāni sarvāṇi yogilabhyāni sattamāḥ
तथा चौदहों लोकों में स्वेच्छा से गमन - हे सत्तमो! ये और अन्य सभी, योगियों को ही प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ,
श्लोक 26 (skanda.3.18.26)
सुतीक्ष्णस्याभवन्विप्रा रामा तीर्थनिषेवणात्। एवंप्रभावं तत्तीर्थं महापातकनाशनम्
sutīkṣṇasyābhavanviprā rāmā tīrthaniṣevaṇāt evaṁprabhāvaṁ tattīrthaṁ mahāpātakanāśanam
हे विप्रो! सुतीक्ष्ण को उस रामतीर्थ की सेवा से प्राप्त हुईं। उस तीर्थ का ऐसा ही प्रभाव है, वह महापातकों का नाशक,
श्लोक 27 (skanda.3.18.27)
महासिद्धिकरं पुण्यमपमृत्युविनाशनम्। भुक्तिमुक्तिप्रदं पुंसां नरकक्लेशना शनम्
mahāsiddhikaraṁ puṇyamapamṛtyuvināśanam bhuktimuktipradaṁ puṁsāṁ narakakleśanā śanam
महासिद्धिकारक, पुण्यमय, अकाल-मृत्यु का नाशक, मनुष्यों को भोग और मोक्ष देने वाला, नरक के क्लेश का नाश करने वाला है।
श्लोक 28 (skanda.3.18.28)
रामभक्तिप्रदं नित्यं संसारोच्छेदकारणम्। अस्य तीरे महल्लिंगं स्थापयित्वा रघूद्वहः। पूजयामास तल्लिंगं लोकानुग्रहका म्यया
rāmabhaktipradaṁ nityaṁ saṁsārocchedakāraṇam asya tīre mahalliṁgaṁ sthāpayitvā raghūdvahaḥ pūjayāmāsa talliṁgaṁ lokānugrahakā myayā
वह सदा राम-भक्ति देने वाला, संसार के उच्छेद का कारण है। इसके तट पर रघुकुल-श्रेष्ठ राम ने एक महालिंग स्थापित करके, लोगों के अनुग्रह की इच्छा से उस लिंग की पूजा की थी।
श्लोक 29 (skanda.3.18.29)
रामतीर्थे महापुण्ये स्नात्वा तल्लिंगदर्शनात्। नराणां मुक्तिरेव स्यात्किमुतान्या विभूतयः
rāmatīrthe mahāpuṇye snātvā talliṁgadarśanāt narāṇāṁ muktireva syātkimutānyā vibhūtayaḥ
महापुण्यमय रामतीर्थ में स्नान करके, उस लिंग के दर्शन-मात्र से मनुष्यों को मुक्ति ही प्राप्त होती है, तो अन्य विभूतियों की क्या बात!
श्लोक 30 (skanda.3.18.30)
तत्र स्नात्वा शिवं दृष्ट्वा धर्म पुत्रः पुरा द्विजाः। अनृतोक्तिसमुद्भूतदोषान्मुक्तोऽभवत्क्षणात्
tatra snātvā śivaṁ dṛṣṭvā dharma putraḥ purā dvijāḥ anṛtoktisamudbhūtadoṣānmukto'bhavatkṣaṇāt
हे द्विजो! वहाँ स्नान करके, शिव का दर्शन करके, पूर्वकाल में धर्मपुत्र (युधिष्ठिर) असत्य-भाषण से उत्पन्न दोष से क्षणमात्र में मुक्त हो गए थे।
श्लोक 31 (skanda.3.18.31)
ऋषय ऊचुः।असत्यमुदितं कस्माद्धर्मपुत्रेण सूतज। यद्दोषशांतये सस्नौ रामतीथेऽतिपावने
ṛṣaya ūcuḥasatyamuditaṁ kasmāddharmaputreṇa sūtaja yaddoṣaśāṁtaye sasnau rāmatīthe'tipāvane
ऋषियों ने कहा - हे सूतपुत्र! धर्मपुत्र ने किस कारण असत्य कहा था, जिसके दोष की शांति के लिए उन्होंने अत्यन्त पावन रामतीर्थ में स्नान किया?
श्लोक 32 (skanda.3.18.32)
श्रीसूत उवाच। युष्माकमृषयो वक्ष्ये यथोक्तमनृतं रणे। छलेन धर्मपुत्रेण यन्नष्टं रामतीर्थके
śrīsūta uvāca yuṣmākamṛṣayo vakṣye yathoktamanṛtaṁ raṇe chalena dharmaputreṇa yannaṣṭaṁ rāmatīrthake
श्रीसूत जी ने कहा - हे ऋषियो! मैं आपको बताता हूँ कि युद्ध में धर्मपुत्र ने कैसे छल से असत्य कहा, जिससे रामतीर्थ में उनका दोष नष्ट हुआ।
श्लोक 33 (skanda.3.18.33)
अन्योन्यं पांडवा विप्रा धर्मपुत्रादयः पुरा। धृतराष्ट्रस्य पुत्राश्च दुर्नोधनमुखास्तदा
anyonyaṁ pāṁḍavā viprā dharmaputrādayaḥ purā dhṛtarāṣṭrasya putrāśca durnodhanamukhāstadā
हे विप्रो! पूर्वकाल में धर्मपुत्र आदि पाण्डव और दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के पुत्र, आपस में
श्लोक 34 (skanda.3.18.34)
महद्वै वैरमासाद्य राज्यार्थं विप्रसत्तमाः। महत्या सेनया सार्द्धं कुरुक्षेत्रे समेत्य च
mahadvai vairamāsādya rājyārthaṁ viprasattamāḥ mahatyā senayā sārddhaṁ kurukṣetre sametya ca
राज्य के लिए बड़ा वैर पाकर, हे विप्रसत्तमो! बड़ी सेना के साथ कुरुक्षेत्र में मिलकर,
श्लोक 35 (skanda.3.18.35)
अयुध्यन्समरे वीराः समरेष्वनिवर्तिनः। युद्धं कृत्वा दशदिनं गांगेयः पतितो भुवि
ayudhyansamare vīrāḥ samareṣvanivartinaḥ yuddhaṁ kṛtvā daśadinaṁ gāṁgeyaḥ patito bhuvi
युद्ध में लड़े, वे वीर, जो युद्ध से कभी न मुड़ने वाले थे। दस दिन युद्ध करके गंगापुत्र भीष्म भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 36 (skanda.3.18.36)
ततः पंचदिनं भूयो धृष्टद्युम्नेन वीर्यवान्। आचार्यो युयुधे द्रोणो महाबलपराक्रमः
tataḥ paṁcadinaṁ bhūyo dhṛṣṭadyumnena vīryavān ācāryo yuyudhe droṇo mahābalaparākramaḥ
फिर पाँच दिन तक बलवान् धृष्टद्युम्न के साथ महाबलपराक्रमी आचार्य द्रोण ने युद्ध किया।
श्लोक 37 (skanda.3.18.37)
अनेकास्त्राणि शस्त्राणि द्रोणाचर्यो महाबली। विसृजन्पांडवानीकं पीडयामास वीर्यवान्
anekāstrāṇi śastrāṇi droṇācaryo mahābalī visṛjanpāṁḍavānīkaṁ pīḍayāmāsa vīryavān
अनेक अस्त्र-शस्त्रों को चलाते हुए, महाबली द्रोणाचार्य ने वीर्यवान् होकर पाण्डव-सेना को पीड़ित किया।
श्लोक 38 (skanda.3.18.38)
अथ दिव्यास्त्रविच्छूरो धृष्टद्युम्नो महाबलः। अभिनद्बाणवर्षेण द्रोणसेनामनेकधा
atha divyāstravicchūro dhṛṣṭadyumno mahābalaḥ abhinadbāṇavarṣeṇa droṇasenāmanekadhā
तब दिव्यास्त्रों के ज्ञाता, महाबली, शूरवीर धृष्टद्युम्न ने बाणों की वर्षा से द्रोण-सेना को अनेक प्रकार से बींध डाला।
श्लोक 39 (skanda.3.18.39)
धृष्टद्युम्नं तदा द्रोणः शरवर्षैरवाकिरत्। पार्थसेना तथा द्रोणबाणवर्षातिपीडिता
dhṛṣṭadyumnaṁ tadā droṇaḥ śaravarṣairavākirat pārthasenā tathā droṇabāṇavarṣātipīḍitā
तब द्रोण ने धृष्टद्युम्न को बाणों की वर्षा से ढक दिया; और पार्थ-सेना भी द्रोण की बाण-वर्षा से अत्यन्त पीड़ित होकर,
श्लोक 40 (skanda.3.18.40)
दशदिक्षु भयाक्रांता विद्रुता द्विजसत्तमाः। ततोऽर्जुनो रणे द्रोणं युयुधे रथिनां वरः
daśadikṣu bhayākrāṁtā vidrutā dvijasattamāḥ tato'rjuno raṇe droṇaṁ yuyudhe rathināṁ varaḥ
हे द्विजसत्तमो! भय से आक्रान्त होकर दसों दिशाओं में भाग गई। तब अर्जुन, रथियों में श्रेष्ठ, रणभूमि में द्रोण से भिड़ गए।
श्लोक 41 (skanda.3.18.41)
रणप्रवीणयोस्तत्र विजयद्रोणयो रणे। द्रष्टुं समागतैर्देवैरभूद्व्योमनिरं तरम्
raṇapravīṇayostatra vijayadroṇayo raṇe draṣṭuṁ samāgatairdevairabhūdvyomaniraṁ taram
रणकुशल विजय (अर्जुन) और द्रोण का वह युद्ध देखने के लिए आए हुए देवताओं से आकाश भर गया।
श्लोक 42 (skanda.3.18.42)
द्रोणफाल्गुनयोर्विप्रा नास्ति युद्धोपमा भुवि। सामर्षयोस्तदाचार्यशिष्ययोरभवद्रणः
droṇaphālgunayorviprā nāsti yuddhopamā bhuvi sāmarṣayostadācāryaśiṣyayorabhavadraṇaḥ
हे विप्रो! पृथ्वी पर द्रोण और फाल्गुन के युद्ध के समान कोई युद्ध नहीं है। क्रोधित गुरु-शिष्य के बीच वह भीषण संग्राम हुआ।
श्लोक 43 (skanda.3.18.43)
द्रोणफाल्गुनयोर्युद्धं द्रोणफाल्गुन योरिव। बहु मेनेऽथ मनसा द्रोणोऽर्जुनपराक्रमम्
droṇaphālgunayoryuddhaṁ droṇaphālguna yoriva bahu mene'tha manasā droṇo'rjunaparākramam
द्रोण-फाल्गुन का युद्ध द्रोण-फाल्गुन के ही समान था (अनुपम था)। द्रोण ने मन में अर्जुन के पराक्रम की बहुत सराहना की।
श्लोक 44 (skanda.3.18.44)
ततो द्रोणो महावीर्यं प्रियशिष्यं स फाल्गुनम्। विहाय पांचालबलं समयुध्यत वीर्यवान्
tato droṇo mahāvīryaṁ priyaśiṣyaṁ sa phālgunam vihāya pāṁcālabalaṁ samayudhyata vīryavān
फिर वह वीर्यवान् द्रोण अपने प्रिय शिष्य महावीर्य फाल्गुन को छोड़कर पांचाल-सेना से युद्ध करने लगा।
श्लोक 45 (skanda.3.18.45)
सविंशतिसहस्राणि दश तत्रायुतानि च। द्रोणाचार्योऽवधीद्राज्ञां युद्धे सगजवाजिनाम्
saviṁśatisahasrāṇi daśa tatrāyutāni ca droṇācāryo'vadhīdrājñāṁ yuddhe sagajavājinām
बीस हजार और दस अयुत (एक लाख) राजाओं को, गजों और अश्वों सहित, द्रोणाचार्य ने उस युद्ध में मार डाला।
श्लोक 46 (skanda.3.18.46)
धृष्टद्युम्नोऽथ कुपितो द्रोण मभ्यहनच्छरैः। द्रोणश्च पट्टिशं गृह्य धृष्टद्युम्नमताडयत्
dhṛṣṭadyumno'tha kupito droṇa mabhyahanaccharaiḥ droṇaśca paṭṭiśaṁ gṛhya dhṛṣṭadyumnamatāḍayat
तब कुपित हुए धृष्टद्युम्न ने द्रोण को बाणों से मारा; और द्रोण ने पट्टिश (गदाविशेष) लेकर धृष्टद्युम्न को घायल किया।
श्लोक 47 (skanda.3.18.47)
शरैर्विव्याध तं युद्धे तीक्ष्णैरग्निशिखोपमैः। परङ्मुखोऽभवत्तत्र धृष्ट द्युम्नः शराहतः
śarairvivyādha taṁ yuddhe tīkṣṇairagniśikhopamaiḥ paraṅmukho'bhavattatra dhṛṣṭa dyumnaḥ śarāhataḥ
अग्निशिखा के समान तीक्ष्ण बाणों से उसे युद्ध में बींध दिया; बाणों से आहत धृष्टद्युम्न वहाँ मुँह मोड़कर भाग खड़ा हुआ।
श्लोक 48 (skanda.3.18.48)
ततो विरथमागत्य धृष्टद्युम्नं वृकोदरः। स्वं स्यंदनं समारोप्य द्रोणाचार्यमथाब्रवीत्
tato virathamāgatya dhṛṣṭadyumnaṁ vṛkodaraḥ svaṁ syaṁdanaṁ samāropya droṇācāryamathābravīt
तब रथहीन धृष्टद्युम्न को देखकर वृकोदर (भीम) ने उसे अपने रथ पर चढ़ाकर, द्रोणाचार्य से यह कहा -
श्लोक 49 (skanda.3.18.49)
स्वकर्मभिरसंतुष्टाः शिक्षितास्त्रा द्विजाधमाः। न युद्ध्येरन्यदि क्रूरा न नश्येरन्नृपा रणे
svakarmabhirasaṁtuṣṭāḥ śikṣitāstrā dvijādhamāḥ na yuddhyeranyadi krūrā na naśyerannṛpā raṇe
'यदि अपने कर्मों से असंतुष्ट, शस्त्र-शिक्षित, क्रूर द्विजाधम युद्ध न करें, तो राजा युद्ध में नष्ट न हों।
श्लोक 50 (skanda.3.18.50)
अहिंसा हि परो धर्मो ब्राह्मणानां सदा स्मृतः। हिंसया दारपुत्रादीन्रक्षंते व्याधजातयः
ahiṁsā hi paro dharmo brāhmaṇānāṁ sadā smṛtaḥ hiṁsayā dāraputrādīnrakṣaṁte vyādhajātayaḥ
ब्राह्मणों के लिए अहिंसा ही सदा परम धर्म माना गया है; हिंसा से तो व्याध-जातियाँ अपने स्त्री-पुत्र आदि की रक्षा करती हैं।
श्लोक 51 (skanda.3.18.51)
हिंसीस्त्वमेकपुत्रार्थे युद्धे स्थित्वा बहून्नृपान्। स चापि ते सुतो ब्रह्मन्हतः शेते रणाजिरे
hiṁsīstvamekaputrārthe yuddhe sthitvā bahūnnṛpān sa cāpi te suto brahmanhataḥ śete raṇājire
तुमने अपने एक पुत्र के लिए युद्ध में स्थित होकर अनेक राजाओं की हिंसा की; और हे ब्रह्मन्! वह तुम्हारा पुत्र भी मारा जाकर रणभूमि में सोया पड़ा है।
श्लोक 52 (skanda.3.18.52)
तथापि लज्जा ते नास्ति शोकोऽपीह न जायते। वचनं त्विति भीमस्य सत्यं श्रुत्वा युधिष्ठिरात्
tathāpi lajjā te nāsti śoko'pīha na jāyate vacanaṁ tviti bhīmasya satyaṁ śrutvā yudhiṣṭhirāt
फिर भी तुम्हें लज्जा नहीं है, यहाँ तक कि शोक भी नहीं होता।' युधिष्ठिर के मुख से भीम का यह सत्य वचन सुनकर,
श्लोक 53 (skanda.3.18.53)
निजायुधं स तत्याज पपात स्यंदनो परि। योगवित्प्रायमातस्थे द्रोणाचार्यस्तदा द्विजाः
nijāyudhaṁ sa tatyāja papāta syaṁdano pari yogavitprāyamātasthe droṇācāryastadā dvijāḥ
द्रोण ने अपना शस्त्र त्याग दिया, वे रथ पर गिर पड़े; हे द्विजो! द्रोणाचार्य तब योग में स्थित-से रहे।
श्लोक 54 (skanda.3.18.54)
तदंतरं परिज्ञाय द्रोणाचार्यस्य पार्श्वतः। खङ्गपाणिः शिरच्छेत्तुमभ्यधावद्रणा जिरे
tadaṁtaraṁ parijñāya droṇācāryasya pārśvataḥ khaṅgapāṇiḥ śiracchettumabhyadhāvadraṇā jire
वह अवसर जानकर द्रोणाचार्य के पास से एक व्यक्ति खड्ग हाथ में लेकर उनका सिर काटने के लिए रणभूमि में दौड़ा।
श्लोक 55 (skanda.3.18.55)
वार्यमाणोऽपि पार्थाद्यैस्तच्छिरश्छेत्तुमुद्ययौ। योगवित्त्वाद्द्रोणमूर्ध्नो ज्योतिरूर्ध्वं दिवं ययौ
vāryamāṇo'pi pārthādyaistacchiraśchettumudyayau yogavittvāddroṇamūrdhno jyotirūrdhvaṁ divaṁ yayau
पार्थ आदि द्वारा रोके जाने पर भी वह उनका सिर काटने चल पड़ा। योगवेत्ता होने के कारण द्रोण के सिर से एक ज्योति ऊर्ध्व आकाश में चली गई,
श्लोक 56 (skanda.3.18.56)
दृष्टं कृष्णार्जुनकृपधर्मपुत्रादि भिर्मृधे। द्रोणस्यास्य गतप्राणाच्छरीरादच्छिनच्छिरः
dṛṣṭaṁ kṛṣṇārjunakṛpadharmaputrādi bhirmṛdhe droṇasyāsya gataprāṇāccharīrādacchinacchiraḥ
जो कृष्ण, अर्जुन, कृप, धर्मपुत्र आदि ने युद्धभूमि में देखी; उस निष्प्राण द्रोण के शरीर से उस (धृष्टद्युम्न) ने सिर काट लिया।
श्लोक 57 (skanda.3.18.57)
भारद्वाजे हते युद्धे कौरवाः प्राद्रवन्भयात्। जहृषुः पांडवा विप्रा धृष्टद्युम्नादय स्तदा
bhāradvāje hate yuddhe kauravāḥ prādravanbhayāt jahṛṣuḥ pāṁḍavā viprā dhṛṣṭadyumnādaya stadā
भारद्वाज (द्रोण) के युद्ध में मारे जाने पर कौरव भय से भाग गए; हे विप्रो! धृष्टद्युम्न आदि पाण्डव तब हर्षित हो गए।
श्लोक 58 (skanda.3.18.58)
सेनां तां विद्रुतां दृष्ट्वा द्रौणिरूचे सुयोधनम्। एतद्द्रवति कि सैन्यं त्यक्तप्रहरणं नृप
senāṁ tāṁ vidrutāṁ dṛṣṭvā drauṇirūce suyodhanam etaddravati ki sainyaṁ tyaktapraharaṇaṁ nṛpa
उस भागती हुई सेना को देखकर द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) ने सुयोधन से कहा - 'हे राजन्! यह सेना शस्त्र त्यागकर क्यों भाग रही है?'
श्लोक 59 (skanda.3.18.59)
तदा दुर्योधनो राजा स्वयं वक्तु मशक्नुवन्। युद्धे द्रोणवधं वक्तुं कृपाचार्यमचोदयत्। द्रौणयेऽथ कृपाचार्यो वधमूचे गुरोस्तदा
tadā duryodhano rājā svayaṁ vaktu maśaknuvan yuddhe droṇavadhaṁ vaktuṁ kṛpācāryamacodayat drauṇaye'tha kṛpācāryo vadhamūce gurostadā
तब राजा दुर्योधन स्वयं कुछ कहने में असमर्थ होकर, युद्ध में द्रोण-वध की बात कहने के लिए कृपाचार्य को प्रेरित किया। तब कृपाचार्य ने द्रोणपुत्र से गुरु के वध की बात कही -
श्लोक 60 (skanda.3.18.60)
कृप उवाच। अश्वत्थामंस्तव पिता ब्रह्मास्त्रेण मृधे रिपून्। हत्वा निनाय सदनं यमस्य शतशो बली
kṛpa uvāca aśvatthāmaṁstava pitā brahmāstreṇa mṛdhe ripūn hatvā nināya sadanaṁ yamasya śataśo balī
कृप ने कहा - 'हे अश्वत्थामन्! तुम्हारे पिता ने बलपूर्वक युद्ध में शत्रुओं को ब्रह्मास्त्र से सैकड़ों की संख्या में मारकर यमलोक भेज दिया।
श्लोक 61 (skanda.3.18.61)
दुराधर्षतमं दृष्ट्वा तद्वीर्यं केशवस्तदा। पांडवान्प्राह विप्रेंद्र वाक्यं वाक्यविशारदः
durādharṣatamaṁ dṛṣṭvā tadvīryaṁ keśavastadā pāṁḍavānprāha vipreṁdra vākyaṁ vākyaviśāradaḥ
उस अत्यन्त दुर्जय वीर्य को देखकर तब केशव ने, हे विप्रेन्द्र! वाक्य-निपुण होकर पाण्डवों से यह वचन कहा -
श्लोक 62 (skanda.3.18.62)
केशव उवाच। द्रोणं जेतुमुपायोऽस्ति पांडवा युधि दुर्जयम्
keśava uvāca droṇaṁ jetumupāyo'sti pāṁḍavā yudhi durjayam
केशव ने कहा - 'हे पाण्डवो! युद्ध में दुर्जय द्रोण को जीतने का एक उपाय है -
श्लोक 63 (skanda.3.18.63)
अश्वत्थात्मा तव सुतो हतो द्रोण मृधेऽधुना। सत्यवादी वदेदेवं यदि प्रामाणिको जनः
aśvatthātmā tava suto hato droṇa mṛdhe'dhunā satyavādī vadedevaṁ yadi prāmāṇiko janaḥ
यदि कोई सत्यवादी, प्रामाणिक जन ऐसा कहे - अश्वत्थामा नामक तुम्हारा पुत्र अभी द्रोण के युद्ध में मारा गया है -
श्लोक 64 (skanda.3.18.64)
द्रोणो निवर्तेत रणात्तदा त्यक्त्वायुधं क्षणात्। अत एनां मृषावार्तां धर्मराजोऽधुना वदेत्
droṇo nivarteta raṇāttadā tyaktvāyudhaṁ kṣaṇāt ata enāṁ mṛṣāvārtāṁ dharmarājo'dhunā vadet
तो द्रोण उसी क्षण शस्त्र त्यागकर युद्ध से निवृत्त हो जाएँगे। इसलिए धर्मराज अभी यह मिथ्या समाचार कहें।
श्लोक 65 (skanda.3.18.65)
नान्यथा शक्यते जेतुं द्रोणो युद्धविशारदः। धर्माज्जेतुमशक्यं चेद्धर्मं त्यक्त्वाऽप्यरिं जयेत्
nānyathā śakyate jetuṁ droṇo yuddhaviśāradaḥ dharmājjetumaśakyaṁ ceddharmaṁ tyaktvā'pyariṁ jayet
युद्ध-कुशल द्रोण को अन्यथा जीता नहीं जा सकता। यदि धर्म से जीतना असम्भव हो, तो धर्म त्यागकर भी शत्रु को जीतना चाहिए।'
श्लोक 66 (skanda.3.18.66)
इति केशववाक्यं तच्छ्रुत्वा भीमः पृथासतः। पितरं ते समभ्येत्य मिथ्यावाक्यमभाषत
iti keśavavākyaṁ tacchrutvā bhīmaḥ pṛthāsataḥ pitaraṁ te samabhyetya mithyāvākyamabhāṣata
केशव का यह वचन सुनकर पृथा-पुत्र भीम ने तुम्हारे पिता के पास जाकर यह मिथ्या वचन कहा -
श्लोक 67 (skanda.3.18.67)
अश्वत्थामा हतो द्रोण युद्धेऽत्र पतितोऽधुना। द्रोणाचार्योपि तद्वाक्यममन्यत यथार्थतः
aśvatthāmā hato droṇa yuddhe'tra patito'dhunā droṇācāryopi tadvākyamamanyata yathārthataḥ
'हे द्रोण! अश्वत्थामा अभी युद्ध में मारा गया, गिर पड़ा है।' द्रोणाचार्य ने भी उस वचन को सत्य मान लिया।
श्लोक 68 (skanda.3.18.68)
अविश्वस्य पुनः सोऽथ धर्मजं प्राप्य चाब्रवीत्। धर्मात्मज मृधे सूनुरश्वत्थामा ममाधुना
aviśvasya punaḥ so'tha dharmajaṁ prāpya cābravīt dharmātmaja mṛdhe sūnuraśvatthāmā mamādhunā
किन्तु उस पर पूर्ण विश्वास न करके, वे फिर धर्मपुत्र के पास जाकर बोले - 'हे धर्मात्मज! युद्ध में मेरा पुत्र अश्वत्थामा अभी
श्लोक 69 (skanda.3.18.69)
हतः किं त्वं वदस्वाद्य सत्यवादी भवान्मतः। धर्मपुत्रोऽसत्यभीरुरासीच्चारिजयोत्सुकः
hataḥ kiṁ tvaṁ vadasvādya satyavādī bhavānmataḥ dharmaputro'satyabhīrurāsīccārijayotsukaḥ
मारा गया क्या? आज मुझे बताओ, तुम सत्यवादी माने जाते हो।' धर्मपुत्र, असत्य से भयभीत, फिर भी शत्रु की विजय के उत्सुक,
श्लोक 70 (skanda.3.18.70)
किं कर्तव्यं मयाद्येति दोलालोलमना अभूत्। स दृष्ट्वा भीमनिहतमश्वत्थामाभिधं गजम्
kiṁ kartavyaṁ mayādyeti dolālolamanā abhūt sa dṛṣṭvā bhīmanihatamaśvatthāmābhidhaṁ gajam
'अब मुझे क्या करना चाहिए' - इस प्रकार डाँवाडोल मन वाले हो गए। उन्होंने भीम द्वारा मारे गए अश्वत्थामा नामक हाथी को देखकर,
श्लोक 71 (skanda.3.18.71)
अश्वत्थामा हतो युद्धे भीमेनाद्य रणे महान्। इत्थं द्रोणं बभाषेऽसौ धर्मपुत्रश्छलोक्तितः
aśvatthāmā hato yuddhe bhīmenādya raṇe mahān itthaṁ droṇaṁ babhāṣe'sau dharmaputraśchaloktitaḥ
'अश्वत्थामा आज युद्ध में भीम द्वारा मारा गया' - इस प्रकार धर्मपुत्र ने छल-वचन से द्रोण से यह कहा।
श्लोक 72 (skanda.3.18.72)
तच्छ्रुत्वा त्वत्पिता शस्त्रं त्यक्त्वा युद्धान्न्यवर्त्तत। अथ धर्मसुतः प्राह परं वारण इत्यपि
tacchrutvā tvatpitā śastraṁ tyaktvā yuddhānnyavarttata atha dharmasutaḥ prāha paraṁ vāraṇa ityapi
यह सुनकर तुम्हारे पिता ने शस्त्र त्यागकर युद्ध से निवृत्ति ले ली। फिर धर्मपुत्र ने आगे यह भी कहा -
श्लोक 73 (skanda.3.18.73)
त्यक्तं शस्त्रं न गृह्णीयां युद्धे पुनरिति स्म सः। प्रतिजज्ञे तव पिता वत्स द्रोणो बली पुनः
tyaktaṁ śastraṁ na gṛhṇīyāṁ yuddhe punariti sma saḥ pratijajñe tava pitā vatsa droṇo balī punaḥ
'त्यागा हुआ शस्त्र मैं फिर युद्ध में नहीं उठाऊँगा' - इस प्रकार, हे वत्स! बलवान् तुम्हारे पिता द्रोण ने यह दूसरी प्रतिज्ञा की।
श्लोक 74 (skanda.3.18.74)
अतः शस्त्रं न जग्राह प्रतिज्ञाभंगकातरः। धृष्टद्युम्नं तदा दृष्ट्वा पिता ते मृत्युमात्मनः
ataḥ śastraṁ na jagrāha pratijñābhaṁgakātaraḥ dhṛṣṭadyumnaṁ tadā dṛṣṭvā pitā te mṛtyumātmanaḥ
इसलिए उन्होंने प्रतिज्ञा-भंग के भय से शस्त्र नहीं उठाया। तब धृष्टद्युम्न को देखकर तुम्हारे पिता ने अपनी मृत्यु को
श्लोक 75 (skanda.3.18.75)
मत्वा प्रायोपवेशेन रथोपस्थे स योगवित्। अशयिष्ट समाधिस्थः प्राणानायम्य वाग्यतः
matvā prāyopaveśena rathopasthe sa yogavit aśayiṣṭa samādhisthaḥ prāṇānāyamya vāgyataḥ
समझकर प्रायोपवेशन (अनशन) से रथ पर योगस्थित होकर, प्राणों को रोककर, मौन होकर बैठ गए।
श्लोक 76 (skanda.3.18.76)
ततो निर्भिद्य मूर्धानं तत्प्राणा निर्ययुः क्षणात्। तदा मृतस्य द्रोणस्य वत्स खङ्गेन तच्छिरः
tato nirbhidya mūrdhānaṁ tatprāṇā niryayuḥ kṣaṇāt tadā mṛtasya droṇasya vatsa khaṅgena tacchiraḥ
फिर मस्तक भेदकर उनके प्राण क्षणमात्र में निकल गए। तब हे वत्स! मृत द्रोण के उस सिर को खड्ग से,
श्लोक 77 (skanda.3.18.77)
केशागृहीत्वा हस्तेन धृष्टद्युम्नोऽच्छिनद्युधि। मावधीरिति पार्थाद्याः प्रोचुः सर्वे च सैनिकाः। सर्वैर्निवार्यमाणोपि त्वत्तातं पार्श्वतोऽवधीत्
keśāgṛhītvā hastena dhṛṣṭadyumno'cchinadyudhi māvadhīriti pārthādyāḥ procuḥ sarve ca sainikāḥ sarvairnivāryamāṇopi tvattātaṁ pārśvato'vadhīt
बालों से पकड़कर हाथ से धृष्टद्युम्न ने युद्ध में काट लिया। 'उन्हें मत मारो' - ऐसा पार्थ आदि सभी सैनिकों ने कहा; सबके द्वारा रोके जाने पर भी उसने तुम्हारे पिता को पास से ही मार डाला।
श्लोक 78 (skanda.3.18.78)
श्रीसूत उवाच। पितरं निहतं श्रुत्वा रुदन्द्रौणिश्चिरं द्विजाः।
śrīsūta uvāca pitaraṁ nihataṁ śrutvā rudandrauṇiściraṁ dvijāḥ
श्रीसूत जी ने कहा - हे द्विजो! पिता के मारे जाने का समाचार सुनकर द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) बहुत देर तक रोता रहा।
श्लोक 79 (skanda.3.18.79)
कोपेन महता तत्र ज्वलन्वाक्यमथाब्रवीत। अनृतं प्रोच्य पितरं न्यस्तशस्त्रं चकार यः
kopena mahatā tatra jvalanvākyamathābravīta anṛtaṁ procya pitaraṁ nyastaśastraṁ cakāra yaḥ
तब वह वहाँ महाक्रोध से जलता हुआ यह वचन बोला - 'जिसने मेरे पिता से असत्य कहकर उन्हें, जिन्होंने शस्त्र त्याग दिया था,
श्लोक 80 (skanda.3.18.80)
पितरं मेऽद्य तं पार्थमप्यन्या थ पांडवान्। गृहीत्वा केशपाशं यस्त्यक्तशस्त्रशिरोऽहनत्
pitaraṁ me'dya taṁ pārthamapyanyā tha pāṁḍavān gṛhītvā keśapāśaṁ yastyaktaśastraśiro'hanat
और आज मुझसे भी, तथा पार्थ आदि पाण्डवों से भी छल किया - जिसने केशपाश पकड़कर, शस्त्र त्यागे, सिर झुकाए हुए को मार डाला,
श्लोक 81 (skanda.3.18.81)
छद्मना पार्षतं तं च हनिष्याम्यचिरादहम्। कृष्णेन सह पश्यंतु पाण्डवा मत्पराक्रमम्
chadmanā pārṣataṁ taṁ ca haniṣyāmyacirādaham kṛṣṇena saha paśyaṁtu pāṇḍavā matparākramam
उस पार्षत (धृष्टद्युम्न) को मैं छल से शीघ्र ही मार डालूँगा। कृष्ण सहित पाण्डव मेरा पराक्रम देखें।'
श्लोक 82 (skanda.3.18.82)
इति द्रौणिर्द्विजास्तत्र प्रतिजज्ञे भयंकरम्। ततोस्तं गत आदित्ये राजानः सर्व एव ते
iti drauṇirdvijāstatra pratijajñe bhayaṁkaram tatostaṁ gata āditye rājānaḥ sarva eva te
हे द्विजो! इस प्रकार द्रोणपुत्र ने वहाँ यह भयंकर प्रतिज्ञा की। फिर सूर्य के अस्त हो जाने पर वे सभी राजा,
श्लोक 83 (skanda.3.18.83)
उभये निहते द्रोणे प्राविशन्पटमण्डपम्। अष्टादशदिनैरेवं निवृत्तमभवद्रणम्
ubhaye nihate droṇe prāviśanpaṭamaṇḍapam aṣṭādaśadinairevaṁ nivṛttamabhavadraṇam
दोनों ओर से द्रोण के मारे जाने पर, अपने-अपने शिविर-मंडपों में प्रविष्ट हुए। इस प्रकार अठारह दिनों में युद्ध समाप्त हुआ।
श्लोक 84 (skanda.3.18.84)
शल्यं कर्णं तथान्यांश्च दुर्योधनमुखांस्ततः। धार्तराष्ट्रान्निहत्याजौ धर्मराजो युधिष्ठिरः
śalyaṁ karṇaṁ tathānyāṁśca duryodhanamukhāṁstataḥ dhārtarāṣṭrānnihatyājau dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ
शल्य, कर्ण तथा अन्य दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र-पुत्रों को युद्ध में मारकर, धर्मराज युधिष्ठिर ने,
श्लोक 85 (skanda.3.18.85)
स्वीयानां च परेषां च मृतानां सांपरायिकम्। अकरोद्विधिवद्विप्राः सार्धं धौम्या दिभिर्द्विजैः
svīyānāṁ ca pareṣāṁ ca mṛtānāṁ sāṁparāyikam akarodvidhivadviprāḥ sārdhaṁ dhaumyā dibhirdvijaiḥ
हे विप्रो! अपने और शत्रु-पक्ष के मृतकों का परलौकिक कर्म धौम्य आदि ब्राह्मणों सहित विधिपूर्वक सम्पन्न किया।
श्लोक 86 (skanda.3.18.86)
वंदित्वा धृतराष्ट्रं च सर्वे संभूय पाण्डवाः। धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञाता हतशिष्टजनैर्वृताः
vaṁditvā dhṛtarāṣṭraṁ ca sarve saṁbhūya pāṇḍavāḥ dhṛtarāṣṭrābhyanujñātā hataśiṣṭajanairvṛtāḥ
धृतराष्ट्र को प्रणाम करके सभी पाण्डव मिलकर, धृतराष्ट्र से आज्ञा पाकर, बचे हुए लोगों से घिरे हुए,
श्लोक 87 (skanda.3.18.87)
संप्राप्य हास्तिनपुरं प्राविशंस्ते स्वमंदिरम्। ततः कतिपयाहःसु गतेषु किल नागराः
saṁprāpya hāstinapuraṁ prāviśaṁste svamaṁdiram tataḥ katipayāhaḥsu gateṣu kila nāgarāḥ
हस्तिनापुर पहुँचकर अपने महल में प्रविष्ट हुए। फिर कुछ दिन बीतने पर, नगरवासियों ने,
श्लोक 88 (skanda.3.18.88)
धौम्यादिमुनिभिः सार्धं धर्मजस्य महात्मनः। राज्या भिषेचनं कर्तुं प्रारभंत मुनीश्वराः। राज्याभिषेचने तस्य प्रवृत्ते धर्मजस्य तु। अशरीरा ततो वाणी बभाषे धर्मनंदनम्
dhaumyādimunibhiḥ sārdhaṁ dharmajasya mahātmanaḥ rājyā bhiṣecanaṁ kartuṁ prārabhaṁta munīśvarāḥ rājyābhiṣecane tasya pravṛtte dharmajasya tu aśarīrā tato vāṇī babhāṣe dharmanaṁdanam
धौम्य आदि मुनियों सहित उस महात्मा धर्मपुत्र का राज्याभिषेक करना आरम्भ किया। उसका राज्याभिषेक होते समय, अशरीरी वाणी ने धर्मपुत्र से यह कहा -
श्लोक 89 (skanda.3.18.89)
धर्म पुत्र महाभाग रिपूणामपि वत्सल। राज्याभिषेकं मा कार्षीर्नार्हस्त्वं राज्यपालने
dharma putra mahābhāga ripūṇāmapi vatsala rājyābhiṣekaṁ mā kārṣīrnārhastvaṁ rājyapālane
'हे धर्मपुत्र, महाभाग, शत्रुओं पर भी वत्सल! राज्याभिषेक मत करो, तुम राज्य-पालन के योग्य नहीं हो,
श्लोक 90 (skanda.3.18.90)
यतस्त्वं छद्मनाचार्यमुक्त्वा सत्यं द्विजोत्तमम्। न्यस्त शस्त्रं रणे राजन्नघातयदलज्जकः
yatastvaṁ chadmanācāryamuktvā satyaṁ dvijottamam nyasta śastraṁ raṇe rājannaghātayadalajjakaḥ
क्योंकि हे द्विजोत्तम! तुमने छल से आचार्य से सत्य के समान असत्य कहकर, हे राजन्! शस्त्र त्यागे हुए को बिना लज्जा के मरवा दिया।
श्लोक 91 (skanda.3.18.91)
अतस्ते पापबाहुल्यं विद्यते धर्मनंदन। प्रायश्चित्तमकृत्वास्य राज्यपालनकर्मणि
ataste pāpabāhulyaṁ vidyate dharmanaṁdana prāyaścittamakṛtvāsya rājyapālanakarmaṇi
इसलिए हे धर्मनन्दन! तुझमें पाप की बहुलता है। इस पाप का प्रायश्चित किए बिना राज्य-पालन के कर्म में
श्लोक 92 (skanda.3.18.92)
नार्हता विद्यते यस्मात्प्रायश्चित्तमतश्चर। इत्युक्त्वा विररामाथ सा तु वागशरीरिणी
nārhatā vidyate yasmātprāyaścittamataścara ityuktvā virarāmātha sā tu vāgaśarīriṇī
तुम्हारी योग्यता नहीं है, इसलिए प्रायश्चित करो।' यह कहकर वह अशरीरी वाणी शान्त हो गई।
श्लोक 93 (skanda.3.18.93)
ततो धर्मसुतो राजा तद्वाक्यं भृशकातरः। मूढोऽहं साहसी क्रूरः पिशुनो लोभमोहितः
tato dharmasuto rājā tadvākyaṁ bhṛśakātaraḥ mūḍho'haṁ sāhasī krūraḥ piśuno lobhamohitaḥ
तब धर्मपुत्र राजा उस वचन से अत्यन्त व्याकुल होकर सोचने लगे - 'मैं मूढ़, दुःसाहसी, क्रूर, चुगलखोर, लोभ से मोहित,
श्लोक 94 (skanda.3.18.94)
तुच्छराज्याभिलाषेण कृतवान्पापमीदृशम्। एतत्पापविशुद्ध्यर्थं किं करिष्यामि का गतिः
tuccharājyābhilāṣeṇa kṛtavānpāpamīdṛśam etatpāpaviśuddhyarthaṁ kiṁ kariṣyāmi kā gatiḥ
तुच्छ राज्य की अभिलाषा से ऐसा पाप किया है। इस पाप की शुद्धि के लिए मैं क्या करूँ, मेरी क्या गति होगी?
श्लोक 95 (skanda.3.18.95)
किं वा दानं प्रदास्यामि कुत्र यास्यामि वा पुनः। इति शोकसमाविष्टे तस्मिन्राजनि धर्मजे
kiṁ vā dānaṁ pradāsyāmi kutra yāsyāmi vā punaḥ iti śokasamāviṣṭe tasminrājani dharmaje
मैं क्या दान दूँ, या फिर कहाँ जाऊँ?' इस प्रकार शोक में डूबे उस राजा धर्मज के पास,
श्लोक 96 (skanda.3.18.96)
कृष्णद्वैपायनो व्यासस्समायातस्तदंतिकम्। ततोऽभिवंद्य तं व्यासं प्रत्युत्थाय कृतांजलिः
kṛṣṇadvaipāyano vyāsassamāyātastadaṁtikam tato'bhivaṁdya taṁ vyāsaṁ pratyutthāya kṛtāṁjaliḥ
कृष्णद्वैपायन व्यास आ पहुँचे। तब उन व्यास की वन्दना करके, उठकर हाथ जोड़े हुए,
श्लोक 97 (skanda.3.18.97)
संपूज्यार्घ्यादिना विप्रा भक्तियुक्तेन चेतसा। अदेहवाचा यत्प्रोक्तं तत्सर्वमखिलेन सः।
saṁpūjyārghyādinā viprā bhaktiyuktena cetasā adehavācā yatproktaṁ tatsarvamakhilena saḥ
हे विप्रो! अर्घ्य आदि से पूजा करके, भक्तियुक्त हृदय से, उस अशरीरी वाणी द्वारा कहा गया सब कुछ,
श्लोक 98 (skanda.3.18.98)
व्यासाय श्रावयामास दुःखितो धर्मनंदनः। श्रुत्वा तदखिलं वाक्यं धर्मजस्य महामुनिः। ध्यात्वा तु सुचिरं कालं ततो वक्तुं प्रच क्रमे
vyāsāya śrāvayāmāsa duḥkhito dharmanaṁdanaḥ śrutvā tadakhilaṁ vākyaṁ dharmajasya mahāmuniḥ dhyātvā tu suciraṁ kālaṁ tato vaktuṁ praca krame
दुःखी धर्मनन्दन ने व्यास को सुनाया। धर्मपुत्र का वह सारा वचन सुनकर वह महामुनि, बहुत देर तक ध्यान करके, फिर बोलने लगे -
श्लोक 99 (skanda.3.18.99)
व्यास उवाच। मा कार्षीस्त्वं भयं राजन्नुपायं प्रब्रवीमि ते। अस्य पापस्य शांत्यर्थं श्रुत्वानुष्ठीयतां त्वया
vyāsa uvāca mā kārṣīstvaṁ bhayaṁ rājannupāyaṁ prabravīmi te asya pāpasya śāṁtyarthaṁ śrutvānuṣṭhīyatāṁ tvayā
व्यास ने कहा - 'हे राजन्! भय मत करो, मैं तुम्हें उपाय बताता हूँ। इस पाप की शान्ति के लिए, सुनकर उसे तुम्हें अनुष्ठान करना चाहिए।
श्लोक 100 (skanda.3.18.100)
युधिष्ठिर उवाच। किं तद्ब्रूहि महायोगिन्पाराशर्य कृपानिधे। येन मे पापनाशः स्यादचिरात्तद्वदाधुना
yudhiṣṭhira uvāca kiṁ tadbrūhi mahāyoginpārāśarya kṛpānidhe yena me pāpanāśaḥ syādacirāttadvadādhunā
युधिष्ठिर ने कहा - 'हे महायोगिन्, पाराशर्य, हे कृपानिधे! वह बताइए, जिससे मेरे पाप का शीघ्र नाश हो, वह अभी कहिए।'
श्लोक 101 (skanda.3.18.101)
व्यास उवाच। दक्षिणांभोनिधौ सेतौ गंधमादनपर्वते
vyāsa uvāca dakṣiṇāṁbhonidhau setau gaṁdhamādanaparvate
व्यास ने कहा - 'दक्षिण समुद्र में सेतु पर, गन्धमादन पर्वत पर,
श्लोक 102 (skanda.3.18.102)
रामसेतौ महाराज रामतीर्थमिति श्रुतम्। अस्ति पुण्यं सरः सिद्धं महापातकनाशनम्
rāmasetau mahārāja rāmatīrthamiti śrutam asti puṇyaṁ saraḥ siddhaṁ mahāpātakanāśanam
हे महाराज! रामसेतु पर, रामतीर्थ नाम से विख्यात एक पुण्यमय, सिद्ध, महापातकों का नाशक सरोवर है,
श्लोक 103 (skanda.3.18.103)
यस्य दर्शनमात्रेण महापातककोटयः। प्रयांति विलयं सद्यस्तमः सूर्योदये यथा
yasya darśanamātreṇa mahāpātakakoṭayaḥ prayāṁti vilayaṁ sadyastamaḥ sūryodaye yathā
जिसके दर्शन-मात्र से करोड़ों महापातक तत्क्षण उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्योदय होते ही अंधकार।
श्लोक 104 (skanda.3.18.104)
रामतीर्थं यदा पश्येत्स्वयं रामेण निर्मितम्। तदैव ब्रह्महत्याया मुच्यते नात्र संशयः
rāmatīrthaṁ yadā paśyetsvayaṁ rāmeṇa nirmitam tadaiva brahmahatyāyā mucyate nātra saṁśayaḥ
जब स्वयं राम द्वारा निर्मित रामतीर्थ का दर्शन होता है, तभी ब्रह्महत्या से मुक्ति मिल जाती है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 105 (skanda.3.18.105)
तत्र गत्वा महाराज रामतीर्थे विमुक्तिदे। स्नाहि ते पापशुद्धिः स्याद्राज्यरक्षार्हतापि च
tatra gatvā mahārāja rāmatīrthe vimuktide snāhi te pāpaśuddhiḥ syādrājyarakṣārhatāpi ca
हे महाराज! वहाँ जाकर मुक्तिदायक रामतीर्थ में स्नान करो, तुम्हारे पाप की शुद्धि होगी और तुम राज्य-रक्षा के योग्य भी हो जाओगे।
श्लोक 106 (skanda.3.18.106)
दानं कुरुष्व तत्तीरे गोभूमितिलवाससाम्। सुवर्णरजतानां च दानं कुरु युधिष्ठिर। अवश्यमेतत्पापानां शुद्धिस्ते न चिराद्भवेत्
dānaṁ kuruṣva tattīre gobhūmitilavāsasām suvarṇarajatānāṁ ca dānaṁ kuru yudhiṣṭhira avaśyametatpāpānāṁ śuddhiste na cirādbhavet
उसके तट पर गौ, भूमि, तिल, वस्त्र का दान करो, तथा हे युधिष्ठिर! स्वर्ण और रजत का भी दान करो। निश्चय ही तुम्हारे इन पापों की शुद्धि शीघ्र हो जाएगी।'
श्लोक 107 (skanda.3.18.107)
श्रीसूत उवाच। व्यासेन धर्मपुत्रोऽयमेवमुक्तो द्विजोत्तमाः
śrīsūta uvāca vyāsena dharmaputro'yamevamukto dvijottamāḥ
श्रीसूत जी ने कहा - हे द्विजोत्तमो! व्यास द्वारा इस प्रकार कहे गए धर्मपुत्र ने,
श्लोक 108 (skanda.3.18.108)
तत्क्षणेनैव धौम्येन सहितः सानुजस्तदा। सहदेवं प्रतिष्ठाप्य राज्ये धर्मात्मजस्तदा
tatkṣaṇenaiva dhaumyena sahitaḥ sānujastadā sahadevaṁ pratiṣṭhāpya rājye dharmātmajastadā
उसी क्षण धौम्य सहित, छोटे भाइयों के साथ, राज्य में व्यवस्था करके, धर्मात्मज ने,
श्लोक 109 (skanda.3.18.109)
रामसेतुं समुद्दिश्य प्रतस्थे वाहनं विना। दिनैः कतिपयैरेव रामसेतुं जगाम सः
rāmasetuṁ samuddiśya pratasthe vāhanaṁ vinā dinaiḥ katipayaireva rāmasetuṁ jagāma saḥ
बिना किसी वाहन के रामसेतु की ओर प्रस्थान किया; कुछ ही दिनों में वे रामसेतु पहुँच गए।
श्लोक 110 (skanda.3.18.110)
रामतीर्थं समासाद्य धौम्येन सह पांडवः। पुरोहितोक्तमार्गेण संकल्प्य विधिपूर्वकम्
rāmatīrthaṁ samāsādya dhaumyena saha pāṁḍavaḥ purohitoktamārgeṇa saṁkalpya vidhipūrvakam
रामतीर्थ पहुँचकर वह पाण्डव, धौम्य सहित, पुरोहित द्वारा बताए मार्ग से विधिपूर्वक संकल्प करके,
श्लोक 111 (skanda.3.18.111)
सस्नौ रामसरस्तीर्थे पुण्ये पापविनाशने। स्नात्वाचम्य विशुद्धात्मा क्षेत्रपिंडं प्रदाय च
sasnau rāmasarastīrthe puṇye pāpavināśane snātvācamya viśuddhātmā kṣetrapiṁḍaṁ pradāya ca
पुण्यमय, पाप-नाशक रामतीर्थ में स्नान किया; स्नान और आचमन करके विशुद्धात्मा होकर, क्षेत्र-पिण्ड देकर,
श्लोक 112 (skanda.3.18.112)
व्यासो क्ताखिलदानानि प्रददौ स युधिष्ठिरः। मासमेकं निराहारः सस्नौ तत्र स धर्मजः
vyāso ktākhiladānāni pradadau sa yudhiṣṭhiraḥ māsamekaṁ nirāhāraḥ sasnau tatra sa dharmajaḥ
युधिष्ठिर ने व्यास द्वारा बताए गए सभी दान दिए। वह धर्मपुत्र वहाँ एक महीने तक निराहार रहकर स्नान करते रहे,
श्लोक 113 (skanda.3.18.113)
प्रत्यहं च ददौ दानं वित्तलोभं विना द्विजाः। एक मासे गते त्वेवं कस्मिंश्चिद्दिवसे ततः
pratyahaṁ ca dadau dānaṁ vittalobhaṁ vinā dvijāḥ eka māse gate tvevaṁ kasmiṁściddivase tataḥ
और हे द्विजो! प्रतिदिन बिना धन-लोभ के दान देते रहे। इस प्रकार एक महीना बीत जाने पर, किसी एक दिन,
श्लोक 114 (skanda.3.18.114)
आह धर्मात्मजं वाणी पुनरप्यशरीरिणी। राजंस्ते विलयं यातं सर्वं पापं युधिष्ठिर
āha dharmātmajaṁ vāṇī punarapyaśarīriṇī rājaṁste vilayaṁ yātaṁ sarvaṁ pāpaṁ yudhiṣṭhira
वह अशरीरी वाणी फिर धर्मात्मज से बोली - 'हे राजन्, हे युधिष्ठिर! तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो गए हैं -
श्लोक 115 (skanda.3.18.115)
छले नासत्यवचनादाचार्यस्य वधेन यः। दोषस्ते समभूत्पूर्वं सोऽपि नष्टः परंतप
chale nāsatyavacanādācāryasya vadhena yaḥ doṣaste samabhūtpūrvaṁ so'pi naṣṭaḥ paraṁtapa
छल से, असत्य वचन से आचार्य के वध से जो दोष पूर्व में उत्पन्न हुआ था, हे परंतप! वह भी नष्ट हो गया है।
श्लोक 116 (skanda.3.18.116)
याहि स्वनगरं राजन्गत्वा पालय मेदिनीम्। अभिषेचय चात्मानं राज्यरक्षार्हतास्ति ते
yāhi svanagaraṁ rājangatvā pālaya medinīm abhiṣecaya cātmānaṁ rājyarakṣārhatāsti te
अपने नगर जाओ, हे राजन्, जाकर पृथ्वी का पालन करो। अपना अभिषेक करो, तुम अब राज्य-रक्षा के योग्य हो।'
श्लोक 117 (skanda.3.18.117)
इत्युक्त्वा विररामाथ सापि वागशरीरिणी। ततो धर्मात्मजः प्रीतस्तामुद्दिश्य दिशं प्रति
ityuktvā virarāmātha sāpi vāgaśarīriṇī tato dharmātmajaḥ prītastāmuddiśya diśaṁ prati
यह कहकर वह अशरीरी वाणी भी शान्त हो गई। तब धर्मात्मज प्रसन्न होकर, उसी दिशा की ओर,
श्लोक 118 (skanda.3.18.118)
नमस्कृत्वाशरीरिण्यै तस्यै वाचे सहानुजः। प्रययौ हास्तिनपुरं सुप्रीतेनांतरात्मना
namaskṛtvāśarīriṇyai tasyai vāce sahānujaḥ prayayau hāstinapuraṁ suprītenāṁtarātmanā
उस अशरीरी वाणी को नमस्कार करके, छोटे भाइयों सहित, प्रसन्न अन्तःकरण से हस्तिनापुर की ओर चल पड़े।
श्लोक 119 (skanda.3.18.119)
अभिषिक्तोऽथ राज्येऽसौ पालयामास मेदिनीम्। इत्थं धर्मात्मजो विप्रा रामतीर्थनिमज्जनात्
abhiṣikto'tha rājye'sau pālayāmāsa medinīm itthaṁ dharmātmajo viprā rāmatīrthanimajjanāt
फिर राज्याभिषिक्त होकर उन्होंने पृथ्वी का पालन किया। हे विप्रो! इस प्रकार धर्मात्मज, रामतीर्थ में स्नान करने से,
श्लोक 120 (skanda.3.18.120)
गतपापो विशुद्धात्मा योग्योऽभूद्राज्यरक्षणे। एवं वः कथितं चित्रं रामतीर्थस्य वैभवम्
gatapāpo viśuddhātmā yogyo'bhūdrājyarakṣaṇe evaṁ vaḥ kathitaṁ citraṁ rāmatīrthasya vaibhavam
पाप-रहित, विशुद्धात्मा होकर राज्य-रक्षा के योग्य हो गए। इस प्रकार मैंने तुम्हें रामतीर्थ का अद्भुत माहात्म्य बताया,
श्लोक 121 (skanda.3.18.121)
सर्वपापहरं पुण्यं भक्तिमुक्तिप्रदायकम्। यत्र स्नानाद्विमुक्तोऽभून्मिथ्यादोषात्स धर्मजः
sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ bhaktimuktipradāyakam yatra snānādvimukto'bhūnmithyādoṣātsa dharmajaḥ
जो समस्त पापों का हरण करने वाला, पुण्यमय, भक्ति और मुक्ति देने वाला है, जहाँ स्नान करने से वह धर्मात्मज मिथ्या-दोष से मुक्त हो गए थे।
श्लोक 122 (skanda.3.18.122)
पठंति येऽ ध्यायमिदं द्विजोत्तमाः शृण्वंति वा ये मनुजा विपातकाः। यास्यंति कैलासमनन्यलभ्यं गत्वा न संयांति पुनश्च जन्म।
paṭhaṁti ye' dhyāyamidaṁ dvijottamāḥ śṛṇvaṁti vā ye manujā vipātakāḥ yāsyaṁti kailāsamananyalabhyaṁ gatvā na saṁyāṁti punaśca janma
हे द्विजोत्तमो! जो पापी मनुष्य भी इस अध्याय को पढ़ते हैं या सुनते हैं, वे उस कैलास को जाएँगे, जो अन्य किसी को सुलभ नहीं, और वहाँ जाकर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होंगे।