ब्रह्म खण्ड · अध्याय 19
लक्ष्मणतीर्थ की महिमा और बलभद्र का ब्रह्महत्या से विमोचन
श्लोक 1 (skanda.3.19.1)
श्रीसूत उवाच। तारकब्रह्मणस्तस्य तीर्थे स्नात्वा द्विजोत्तमाः। लक्ष्मणस्य ततस्तीर्थमभिगच्छेत्समाहितः
śrīsūta uvāca tārakabrahmaṇastasya tīrthe snātvā dvijottamāḥ lakṣmaṇasya tatastīrthamabhigacchetsamāhitaḥ
श्रीसूत जी ने कहा - हे द्विजोत्तमो! उस तारकब्रह्म (राम) के तीर्थ में स्नान करके, फिर एकाग्रचित्त होकर लक्ष्मण के तीर्थ में जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.3.19.2)
श्रीलक्ष्मणस्य तीर्थे तु स्नात्वा पापैर्विमोचिताः। मुक्तिं प्रयांति विमलामपुनर्भवलक्षणाम्
śrīlakṣmaṇasya tīrthe tu snātvā pāpairvimocitāḥ muktiṁ prayāṁti vimalāmapunarbhavalakṣaṇām
श्री लक्ष्मण के तीर्थ में स्नान करके, पापों से मुक्त होकर, पुनर्जन्म-रहित निर्मल मुक्ति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 3 (skanda.3.19.3)
स्नानाल्लक्ष्मणतीर्थे तु दारिद्र्यं नश्यतेखिलम्। आयुष्मान्गुणवान्विद्वान्पुत्रश्चैवास्य जायते
snānāllakṣmaṇatīrthe tu dāridryaṁ naśyatekhilam āyuṣmānguṇavānvidvānputraścaivāsya jāyate
लक्ष्मणतीर्थ में स्नान से समस्त दरिद्रता नष्ट हो जाती है; उसे आयुष्मान्, गुणवान्, विद्वान् पुत्र प्राप्त होता है।
श्लोक 4 (skanda.3.19.4)
कूले लक्ष्मणतीर्थस्य तन्मन्त्रं जपते तु यः। स सर्वशास्त्रवेत्ता स्याच्चतुर्वेदविदप्यसौ
kūle lakṣmaṇatīrthasya tanmantraṁ japate tu yaḥ sa sarvaśāstravettā syāccaturvedavidapyasau
जो लक्ष्मणतीर्थ के तट पर उसके मंत्र का जप करता है, वह सभी शास्त्रों का ज्ञाता और चारों वेदों का ज्ञाता भी हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.3.19.5)
तस्य कूले महल्लिंगं स्थापयामास लक्ष्मणः। तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा सेवते लक्ष्मणेश्वरम्
tasya kūle mahalliṁgaṁ sthāpayāmāsa lakṣmaṇaḥ tatra tīrthe tu yaḥ snātvā sevate lakṣmaṇeśvaram
उसके तट पर लक्ष्मण ने एक महालिंग स्थापित किया; उस तीर्थ में स्नान करके जो लक्ष्मणेश्वर की सेवा करता है,
श्लोक 6 (skanda.3.19.6)
इह दारिद्र्यरोगाभ्यां संसाराच्च विमुच्यते। स्नात्वा लक्ष्मणतीर्थे तु सेवित्वा लक्ष्मणेश्वरम्। बलभद्रः पुरा विप्रा मुमुचे ब्रह्महत्यया
iha dāridryarogābhyāṁ saṁsārācca vimucyate snātvā lakṣmaṇatīrthe tu sevitvā lakṣmaṇeśvaram balabhadraḥ purā viprā mumuce brahmahatyayā
वह यहीं दरिद्रता, रोग और संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है। लक्ष्मणतीर्थ में स्नान करके लक्ष्मणेश्वर की सेवा करके, हे विप्रो! पूर्वकाल में बलभद्र ब्रह्महत्या से मुक्त हुए थे।
श्लोक 7 (skanda.3.19.7)
ऋषय ऊचुः। ब्रह्महत्या कथमभूद्रौहिणेयस्य सूतज। कथं चात्र विनष्टा सा तन्नो ब्रूहि महामुने
ṛṣaya ūcuḥ brahmahatyā kathamabhūdrauhiṇeyasya sūtaja kathaṁ cātra vinaṣṭā sā tanno brūhi mahāmune
ऋषियों ने कहा - हे सूतपुत्र! रोहिणी-पुत्र (बलराम) को ब्रह्महत्या कैसे हुई? और वह यहाँ कैसे नष्ट हुई? हे महामुने! वह हमें बताइए।
श्लोक 8 (skanda.3.19.8)
श्रीसूत उवाच। शेषावतारो भगवान्बलभद्रः पुरा द्विजाः
śrīsūta uvāca śeṣāvatāro bhagavānbalabhadraḥ purā dvijāḥ
श्रीसूत जी ने कहा - हे द्विजो! शेष के अवतार भगवान् बलभद्र पूर्वकाल में,
श्लोक 9 (skanda.3.19.9)
कुरूणां पांडवानां च युद्धोद्योगं विलोक्य तु। बंधूनां स वधं सोढुमसमर्थो हलायुधः
kurūṇāṁ pāṁḍavānāṁ ca yuddhodyogaṁ vilokya tu baṁdhūnāṁ sa vadhaṁ soḍhumasamartho halāyudhaḥ
कुरुओं और पाण्डवों के युद्ध-प्रयत्न को देखकर, बंधुओं के वध को सहन न कर सकने के कारण, हलधारी बलराम ने,
श्लोक 10 (skanda.3.19.10)
विचारमेवमकरोद्बलभद्रो महामतिः। यद्यहं कुरुराजस्य करिष्यामि सहायताम्
vicāramevamakarodbalabhadro mahāmatiḥ yadyahaṁ kururājasya kariṣyāmi sahāyatām
महामति बलभद्र ने इस प्रकार विचार किया - 'यदि मैं कौरव-राज की सहायता करूँगा,
श्लोक 11 (skanda.3.19.11)
कोपः स्यात्पांडुपुत्राणां मय्यवार्यः सुदारुणः। उपकारं करिष्यामि पांडवानामहं यदि
kopaḥ syātpāṁḍuputrāṇāṁ mayyavāryaḥ sudāruṇaḥ upakāraṁ kariṣyāmi pāṁḍavānāmahaṁ yadi
तो पाण्डु-पुत्रों का क्रोध मुझ पर पड़ेगा, जिसे रोका न जा सकेगा, अत्यन्त भयंकर। और यदि मैं पाण्डवों की सहायता करूँगा,
श्लोक 12 (skanda.3.19.12)
दुर्योधनस्य कोपः स्यादिति बुद्ध्वा हलायुधः। तीर्थयात्राच्छलेनासौ मध्यस्थः प्रययौ तदा
duryodhanasya kopaḥ syāditi buddhvā halāyudhaḥ tīrthayātrācchalenāsau madhyasthaḥ prayayau tadā
तो दुर्योधन का क्रोध होगा' - यह जानकर हलायुध ने तीर्थयात्रा के बहाने उदासीन होकर प्रस्थान किया।
श्लोक 13 (skanda.3.19.13)
प्रभासमभिगम्याथ स्नात्वा संकल्पपूर्वकम्। देवानृषीन्पितृगणांस्तर्पयामास वारिणा
prabhāsamabhigamyātha snātvā saṁkalpapūrvakam devānṛṣīnpitṛgaṇāṁstarpayāmāsa vāriṇā
प्रभास पहुँचकर वहाँ संकल्पपूर्वक स्नान करके, उन्होंने देवताओं, ऋषियों और पितरों को जल से तर्पण किया।
श्लोक 14 (skanda.3.19.14)
सरस्वतीं ततः प्रायात्प्रतीच्यभिमुखां हली। पृथूदकं बिंदुसरो मुक्तिदं ब्रह्मतीर्थकम्
sarasvatīṁ tataḥ prāyātpratīcyabhimukhāṁ halī pṛthūdakaṁ biṁdusaro muktidaṁ brahmatīrthakam
फिर हलधारी पश्चिमाभिमुखी सरस्वती की ओर गए, तथा मुक्तिदायक पृथूदक, बिन्दुसरोवर और ब्रह्मतीर्थ की ओर,
श्लोक 15 (skanda.3.19.15)
गंगां च यमुनां सिंधुं शतद्रूं च सुदर्शनम्। संप्राप्य बलभद्रोऽयं स्नात्वा तीर्थेषु धर्मतः
gaṁgāṁ ca yamunāṁ siṁdhuṁ śatadrūṁ ca sudarśanam saṁprāpya balabhadro'yaṁ snātvā tīrtheṣu dharmataḥ
गंगा, यमुना, सिन्धु, शतद्रु और सुदर्शन को पाकर, यह बलभद्र धर्मानुसार उन तीर्थों में स्नान करके,
श्लोक 16 (skanda.3.19.16)
प्रपेदे नैमिषारण्यं मुनींद्रैरभिसेवितम्। आगतं तं विलोक्याथ नैमिषीयास्तपस्विनः
prapede naimiṣāraṇyaṁ munīṁdrairabhisevitam āgataṁ taṁ vilokyātha naimiṣīyāstapasvinaḥ
मुनीन्द्रों से सेवित नैमिषारण्य पहुँचे। उन्हें आया हुआ देखकर नैमिष के तपस्वी,
श्लोक 17 (skanda.3.19.17)
दीर्घसत्रे स्थिताः सम्यङ्नियता धर्मतत्पराः। अभ्युद्गम्य यदुश्रेष्ठं प्रणम्योत्थाय चासनात्
dīrghasatre sthitāḥ samyaṅniyatā dharmatatparāḥ abhyudgamya yaduśreṣṭhaṁ praṇamyotthāya cāsanāt
दीर्घ सत्र में स्थित, नियम-संयत, धर्मपरायण, उठकर, प्रणाम करके, उठकर उस यदुश्रेष्ठ की अगवानी को आए,
श्लोक 18 (skanda.3.19.18)
अपूजयन्विष्टराद्यैः कंदमूलफलैस्तदा। आसनं परिगृह्यायं पूजितः सपुरःसरः
apūjayanviṣṭarādyaiḥ kaṁdamūlaphalaistadā āsanaṁ parigṛhyāyaṁ pūjitaḥ sapuraḥsaraḥ
और उस समय आसन, कन्द-मूल-फल आदि से उनकी पूजा की। आसन ग्रहण करके, अनुचरों सहित पूजित होकर,
श्लोक 19 (skanda.3.19.19)
उच्चासने स्थितं सूतमनमंतमनुत्थितम्। अकृतांजलिमासीनं व्यासशिष्यं विलोक्य सः
uccāsane sthitaṁ sūtamanamaṁtamanutthitam akṛtāṁjalimāsīnaṁ vyāsaśiṣyaṁ vilokya saḥ
ऊँचे आसन पर बैठे हुए, न प्रणाम करते हुए, न उठे हुए, बिना अंजलि जोड़े बैठे हुए व्यास-शिष्य सूत को देखकर,
श्लोक 20 (skanda.3.19.20)
विप्रांश्चानमतो दृष्ट्वा विलोक्यात्मानमागतम्। चुक्रोध रोहिणीसूनुः सूतं पौराणिकोत्तमम्
viprāṁścānamato dṛṣṭvā vilokyātmānamāgatam cukrodha rohiṇīsūnuḥ sūtaṁ paurāṇikottamam
तथा प्रणाम करते ब्राह्मणों को और स्वयं को आया हुआ देखकर, रोहिणीपुत्र उस सूत, उस पौराणिकों में श्रेष्ठ पर क्रुद्ध हो गए -
श्लोक 21 (skanda.3.19.21)
मध्ये मुनीनां सूतोऽयं कस्मान्निंद्योऽनुलोमजः। उच्चासने समध्यास्ते न युक्तमिदमंजसा।
madhye munīnāṁ sūto'yaṁ kasmānniṁdyo'nulomajaḥ uccāsane samadhyāste na yuktamidamaṁjasā
'मुनियों के मध्य यह निन्दनीय, अनुलोमज सूत ऊँचे आसन पर क्यों बैठा है? यह सर्वथा उचित नहीं है।
श्लोक 22 (skanda.3.19.22)
अवमत्य भृशं चास्मान्धर्मसंरक्षकानयम्। आस्तेऽनुत्थाय निर्भीतिर्न च प्रणमते तथा
avamatya bhṛśaṁ cāsmāndharmasaṁrakṣakānayam āste'nutthāya nirbhītirna ca praṇamate tathā
धर्म-रक्षक हम लोगों का अत्यन्त अनादर करके यह बिना उठे, निर्भय होकर बैठा है, प्रणाम भी नहीं करता।
श्लोक 23 (skanda.3.19.23)
पठित्वायं पुराणानि द्वैपायनसकाशतः। सेतिहासानि सर्वाणि धर्मशास्त्राण्यनेकशः
paṭhitvāyaṁ purāṇāni dvaipāyanasakāśataḥ setihāsāni sarvāṇi dharmaśāstrāṇyanekaśaḥ
द्वैपायन के पास से पुराणों को पढ़कर, इतिहासों और अनेक धर्मशास्त्रों को भी पढ़कर,
श्लोक 24 (skanda.3.19.24)
न मां दृष्ट्वा प्रणमते नैव त्यजति चासनम्। द्वैपायनस्य महतः शिष्याः पैलादयो द्विजाः
na māṁ dṛṣṭvā praṇamate naiva tyajati cāsanam dvaipāyanasya mahataḥ śiṣyāḥ pailādayo dvijāḥ
यह मुझे देखकर न प्रणाम करता है, न आसन छोड़ता है। महान् द्वैपायन के पैल आदि शिष्य, हे द्विजो!
श्लोक 25 (skanda.3.19.25)
एवंविधमधर्मं ते नैव कुर्युर्यथा त्वयम्। तस्मादेनं वधिष्यामि दुरात्मानमचेतनम्
evaṁvidhamadharmaṁ te naiva kuryuryathā tvayam tasmādenaṁ vadhiṣyāmi durātmānamacetanam
इस प्रकार का अधर्म कभी नहीं करते, जैसा यह करता है। इसलिए मैं इस दुरात्मा, अचेत को मार डालूँगा।
श्लोक 26 (skanda.3.19.26)
दुष्टानां निग्रहार्थं हि भूर्लोकमहमागमम्। मया हतो हि दुष्टात्मा शुद्धिमेष्यत्यसंशयम्
duṣṭānāṁ nigrahārthaṁ hi bhūrlokamahamāgamam mayā hato hi duṣṭātmā śuddhimeṣyatyasaṁśayam
दुष्टों के निग्रह के लिए ही मैं भूलोक में आया हूँ। मेरे द्वारा मारा गया यह दुष्टात्मा निश्चय ही शुद्धि को प्राप्त होगा।'
श्लोक 27 (skanda.3.19.27)
इत्युक्त्वा भगवान्रामो मुसली प्रबलो हली। पाणिस्थेन कुशाग्रेण तच्छिरः प्राच्छिनद्रुषा
ityuktvā bhagavānrāmo musalī prabalo halī pāṇisthena kuśāgreṇa tacchiraḥ prācchinadruṣā
यह कहकर भगवान् राम, मूसलधारी, बलवान् हलधारी ने, हाथ में स्थित कुश की नोक से ही क्रोधवश उसका सिर काट दिया।
श्लोक 28 (skanda.3.19.28)
तत्रत्या मुनयः सर्वे हा कष्टमिति चुक्रुशुः। अवादिषुस्तदा रामं मुनयो ब्रह्मवादिनः
tatratyā munayaḥ sarve hā kaṣṭamiti cukruśuḥ avādiṣustadā rāmaṁ munayo brahmavādinaḥ
वहाँ उपस्थित सभी मुनि 'हा कष्ट!' कहकर चिल्ला उठे। तब ब्रह्मवादी मुनियों ने राम से यह कहा -
श्लोक 29 (skanda.3.19.29)
रामाधर्मः कृतः कष्टस्त्वया संकर्षण प्रभो। अस्य सूतस्य चास्माभिर्दत्तं ब्रह्मासनं महत्
rāmādharmaḥ kṛtaḥ kaṣṭastvayā saṁkarṣaṇa prabho asya sūtasya cāsmābhirdattaṁ brahmāsanaṁ mahat
'हे राम, हे संकर्षण प्रभो! आपने यह कष्टकर अधर्म किया है। हमने ही इस सूत को यह महान् ब्रह्म-आसन दिया था,
श्लोक 30 (skanda.3.19.30)
अक्षयं चायुरस्माभिरस्य दत्तं हलायुध। भवताऽऽजानतैवाद्य कृतो ब्रह्मवधो महान्
akṣayaṁ cāyurasmābhirasya dattaṁ halāyudha bhavatā''jānataivādya kṛto brahmavadho mahān
हे हलायुध! हमने ही इसे अक्षय आयु दी थी। जानते हुए भी आपने आज यह महान् ब्रह्म-वध किया है।
श्लोक 31 (skanda.3.19.31)
योगेश्वरस्य भवतो नास्ति कश्चिन्नियामकः। अस्यास्तु ब्रह्महत्याया यत्कर्त्तव्यं विचार्य तत्
yogeśvarasya bhavato nāsti kaścinniyāmakaḥ asyāstu brahmahatyāyā yatkarttavyaṁ vicārya tat
आप योगेश्वर के कोई नियन्ता नहीं है; किन्तु इस ब्रह्महत्या का जो कर्तव्य हो, उसे विचारकर,
श्लोक 32 (skanda.3.19.32)
प्रायश्चित्तं भवानेव लोकसंग्रहणाय तु। कुरुष्व भगवन्राम नान्येन प्रेरितः कुरु। इत्युक्तो भगवान्रामस्तानुवाच मुनीन्प्रति
prāyaścittaṁ bhavāneva lokasaṁgrahaṇāya tu kuruṣva bhagavanrāma nānyena preritaḥ kuru ityukto bhagavānrāmastānuvāca munīnprati
हे भगवन् राम! लोक-संग्रह के लिए आप ही प्रायश्चित करें, किसी अन्य से प्रेरित होकर नहीं।' इस प्रकार कहे जाने पर भगवान् राम ने उन मुनियों से यह कहा -
श्लोक 33 (skanda.3.19.33)
राम उवाच। प्रायश्चित्तं चरिष्याभि पापशोधकमास्तिकाः
rāma uvāca prāyaścittaṁ cariṣyābhi pāpaśodhakamāstikāḥ
राम ने कहा - 'हे आस्तिको! मैं पाप-शोधक प्रायश्चित करूँगा,
श्लोक 34 (skanda.3.19.34)
लोकसंग्रहणार्थाय नान्यकामनयाऽधुना। यादृशो नियमोऽस्माभिः कर्तव्यः पापशांतये
lokasaṁgrahaṇārthāya nānyakāmanayā'dhunā yādṛśo niyamo'smābhiḥ kartavyaḥ pāpaśāṁtaye
लोक-संग्रह के लिए ही, अभी किसी अन्य कामना से नहीं। पाप-शान्ति के लिए मुझे जैसा नियम करना उचित हो,
श्लोक 35 (skanda.3.19.35)
तादृशं नियमं त्वद्य भवतः प्रब्रुवंतु नः। भवद्भिरस्य सूतस्य यदायुर्दत्तमक्षयम्। इंद्रियाणि च सत्त्वं च करिष्ये योगमायया
tādṛśaṁ niyamaṁ tvadya bhavataḥ prabruvaṁtu naḥ bhavadbhirasya sūtasya yadāyurdattamakṣayam iṁdriyāṇi ca sattvaṁ ca kariṣye yogamāyayā
वैसा नियम आप लोग अभी मुझे बताएँ। आप लोगों ने इस सूत को जो अक्षय आयु दी थी, उसकी इन्द्रियों और सत्त्व को मैं योग-माया से पुनः सिद्ध करूँगा।'
श्लोक 36 (skanda.3.19.36)
मुनय ऊचुः। पराक्रमस्य तेस्त्रस्य मृत्योर्नश्च यथा प्रभो। स्यात्सत्यवचनं राम तद्भवान्कर्तुमर्हति
munaya ūcuḥ parākramasya testrasya mṛtyornaśca yathā prabho syātsatyavacanaṁ rāma tadbhavānkartumarhati
मुनियों ने कहा - 'हे प्रभो! इस अस्त्र के पराक्रम और इसकी मृत्यु-अमृत्यु के विषय में जैसा सत्य वचन हो, हे राम! वह आप करने योग्य हैं।'
श्लोक 37 (skanda.3.19.37)
राम उवाच। आत्मा वै पुत्ररूपेण भवतीति श्रुतिस्सदा
rāma uvāca ātmā vai putrarūpeṇa bhavatīti śrutissadā
राम ने कहा - 'आत्मा ही पुत्र के रूप में प्रकट होता है' - ऐसा श्रुति सदा
श्लोक 38 (skanda.3.19.38)
उद्घोषयति विप्रेंद्रास्तस्मादस्य शरीरतः। पुत्रो भवतु दीर्घायुः सत्त्वेंद्रिय बलोर्जितः
udghoṣayati vipreṁdrāstasmādasya śarīrataḥ putro bhavatu dīrghāyuḥ sattveṁdriya balorjitaḥ
हे विप्रेन्द्रो! घोषित करती है, इसलिए इसके शरीर से ही, सत्त्व और इन्द्रियों के बल से सम्पन्न, दीर्घायु पुत्र उत्पन्न होगा,
श्लोक 39 (skanda.3.19.39)
कथयिष्यति युष्माकं पुराणादीनि सोऽन्वहम्। संभविष्यति सर्वज्ञो योगमायाबलान्मम
kathayiṣyati yuṣmākaṁ purāṇādīni so'nvaham saṁbhaviṣyati sarvajño yogamāyābalānmama
जो आपको पुराण आदि प्रतिदिन सुनाएगा। मेरी योग-माया के बल से वह सर्वज्ञ हो जाएगा।'
श्लोक 40 (skanda.3.19.40)
इत्युक्त्वा रौहिणेयस्तान्पुनः प्रश्रितमब्रवीत्। मनोभिलषितं किं वा युष्माकं करवाण्यहम्
ityuktvā rauhiṇeyastānpunaḥ praśritamabravīt manobhilaṣitaṁ kiṁ vā yuṣmākaṁ karavāṇyaham
यह कहकर रोहिणी-पुत्र ने फिर विनम्रतापूर्वक उनसे कहा - 'आप लोगों के मन में और क्या इच्छा है, मैं आपके लिए क्या करूँ?
श्लोक 41 (skanda.3.19.41)
तद्ब्रूत मुनयो यूयं करिष्यामि न संशयः। अज्ञानान्मत्कृतस्यास्य पापस्यापि निवर्तकम्। प्रायश्चित्तं भवन्तो मे प्रब्रूत मुनिसत्तमाः
tadbrūta munayo yūyaṁ kariṣyāmi na saṁśayaḥ ajñānānmatkṛtasyāsya pāpasyāpi nivartakam prāyaścittaṁ bhavanto me prabrūta munisattamāḥ
वह मुझे बताएँ, हे मुनियो, मैं अवश्य करूँगा - अज्ञान से किए गए इस पाप का भी निवारक प्रायश्चित, हे मुनिसत्तमो! आप मुझे बताएँ।'
श्लोक 42 (skanda.3.19.42)
मुनय ऊचुः। इल्वलस्यात्मजः कश्चिद्दानवो बल्वलाभिधः
munaya ūcuḥ ilvalasyātmajaḥ kaściddānavo balvalābhidhaḥ
मुनियों ने कहा - 'इल्वल का पुत्र, बल्वल नामक एक दानव है,
श्लोक 43 (skanda.3.19.43)
स दूषयति नो यागं रामेहागत्य पर्वणि। दुष्टं तं दानवं पापं जहि लोकैककण्टकम्
sa dūṣayati no yāgaṁ rāmehāgatya parvaṇi duṣṭaṁ taṁ dānavaṁ pāpaṁ jahi lokaikakaṇṭakam
जो हे राम! यहाँ पर्व के अवसर पर आकर हमारे यज्ञ को दूषित करता है। उस दुष्ट, पापी, लोक के एकमात्र कण्टक-स्वरूप दानव को मार डालिए।
श्लोक 44 (skanda.3.19.44)
अनेन पूजा ह्यस्माकं कृता स्याद्भवताधुना। अस्थिविण्मूत्ररक्तानि सुरामांसानि च क्रतौ
anena pūjā hyasmākaṁ kṛtā syādbhavatādhunā asthiviṇmūtraraktāni surāmāṁsāni ca kratau
इससे ही आप द्वारा हमारी पूजा हो जाएगी, अभी। यज्ञ में अस्थि, विष्ठा, मूत्र, रक्त, तथा सुरा-मांस -
श्लोक 45 (skanda.3.19.45)
सदाभिवर्षतेऽस्माकमत्रागत्य स दानवः। अस्मिन्भारतभूभागे यानि तीर्थानि संति हि
sadābhivarṣate'smākamatrāgatya sa dānavaḥ asminbhāratabhūbhāge yāni tīrthāni saṁti hi
वह दानव यहाँ आकर सदा हम पर बरसाता है। इस भारतभूमि के भाग में जो भी तीर्थ हैं,
श्लोक 46 (skanda.3.19.46)
तेषु स्नाह्यब्दमेकं त्वं सर्वेषु सुसमाहितः। तेन ते पापशांतिः स्यान्नात्र कार्या विचारणा
teṣu snāhyabdamekaṁ tvaṁ sarveṣu susamāhitaḥ tena te pāpaśāṁtiḥ syānnātra kāryā vicāraṇā
उन सभी में आप एक वर्ष तक एकाग्रचित्त होकर स्नान करें। इससे आपके पाप की शान्ति होगी, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।'
श्लोक 47 (skanda.3.19.47)
श्रीसूत उवाच। पर्वकाले तु विप्रेंद्राः समावृत्ते मुनिक्रतौ। महाभीमो रजोवर्षो झंझावातश्च भीषणः
śrīsūta uvāca parvakāle tu vipreṁdrāḥ samāvṛtte munikratau mahābhīmo rajovarṣo jhaṁjhāvātaśca bhīṣaṇaḥ
श्रीसूत जी ने कहा - हे विप्रेन्द्रो! पर्व के समय, मुनियों का यज्ञ चल रहा था, तभी अत्यन्त भयंकर धूल-वर्षा और भीषण झंझावात,
श्लोक 48 (skanda.3.19.48)
प्रादुर्बभूव विप्रेंद्राः पूयरक्तैश्च वर्षणम्। ततो विष्ठामया वृष्टिर्बल्वलेन कृताप्यभूत्
prādurbabhūva vipreṁdrāḥ pūyaraktaiśca varṣaṇam tato viṣṭhāmayā vṛṣṭirbalvalena kṛtāpyabhūt
हे विप्रेन्द्रो! प्रकट हुए, तथा पीब और रक्त की वर्षा हुई। फिर बल्वल ने विष्ठा की वर्षा भी की।
श्लोक 49 (skanda.3.19.49)
असुरं यज्ञशालायां शूलपाणिमथ क्षणात्। अपश्यद्बलभद्रोऽसौ महाबलपराक्रमम्
asuraṁ yajñaśālāyāṁ śūlapāṇimatha kṣaṇāt apaśyadbalabhadro'sau mahābalaparākramam
तब बलभद्र ने यज्ञशाला में त्रिशूलधारी उस असुर को क्षणभर में देखा, जो महाबल-पराक्रमी था।
श्लोक 50 (skanda.3.19.50)
तमालोक्य महादेहं दग्धाद्रिप्रतिमं तदा। प्रतप्तताम्रसंकाशश्मश्रुदंष्ट्रोत्कटाननम्
tamālokya mahādehaṁ dagdhādripratimaṁ tadā prataptatāmrasaṁkāśaśmaśrudaṁṣṭrotkaṭānanam
उस विशाल देह वाले, जले हुए पर्वत के समान, तपे हुए ताँबे के समान चमकते, दाढ़ी-दाढ़ों से विकराल मुख वाले को देखकर,
श्लोक 51 (skanda.3.19.51)
चिंतयामास मुसलं रामः परविदारणम्। सीरं च दानवहरं गदां दैत्यविदारिणीम्
ciṁtayāmāsa musalaṁ rāmaḥ paravidāraṇam sīraṁ ca dānavaharaṁ gadāṁ daityavidāriṇīm
राम ने अपने शत्रु-नाशक मूसल का, दानव-नाशक हल का, तथा दैत्य-विदारक गदा का चिन्तन किया।
श्लोक 52 (skanda.3.19.52)
यान्यायुधानि तं रामं चिंतितान्युपतस्थिरे। सीराग्रेण तमाकृष्य बल्वलं खेचरं तदा
yānyāyudhāni taṁ rāmaṁ ciṁtitānyupatasthire sīrāgreṇa tamākṛṣya balvalaṁ khecaraṁ tadā
जिन आयुधों का उन्होंने चिन्तन किया, वे सब उनके पास आ उपस्थित हुए। हल की नोक से उस आकाशचारी बल्वल को खींचकर,
श्लोक 53 (skanda.3.19.53)
मुसलेन निजघ्ने स कुपितो मूर्ध्नि वेगतः। पपात भुवि संक्षुण्णललाटो रक्तमुद्वमन्
musalena nijaghne sa kupito mūrdhni vegataḥ papāta bhuvi saṁkṣuṇṇalalāṭo raktamudvaman
उन्होंने क्रुद्ध होकर उसे मूसल से वेगपूर्वक सिर पर मारा। वह भूमि पर गिर पड़ा, ललाट कुचला हुआ, रक्त वमन करता हुआ,
श्लोक 54 (skanda.3.19.54)
बल्वलो दीनकथनो गिरिर्वज्रहतो यथा। स्तुत्वाथ मुनयो रामं प्रोच्चार्य विमलाशिषः
balvalo dīnakathano girirvajrahato yathā stutvātha munayo rāmaṁ proccārya vimalāśiṣaḥ
बल्वल दीन वचन बोलता हुआ, वज्र से आहत पर्वत के समान। तब मुनियों ने राम की स्तुति करके, निर्मल आशीर्वाद देकर,
श्लोक 55 (skanda.3.19.55)
अभ्यषिंचञ्च्छुभैस्तोयैर्वृत्रशत्रुं यथा सुराः। मालां ददुर्वैजयन्तीं श्रीमदंबुज शोभिताम्
abhyaṣiṁcañcchubhaistoyairvṛtraśatruṁ yathā surāḥ mālāṁ dadurvaijayantīṁ śrīmadaṁbuja śobhitām
शुभ जलों से उनका अभिषेक किया, जैसे देवगण वृत्रशत्रु इन्द्र का करते हैं। उन्हें कमल-शोभित वैजयन्ती माला दी,
श्लोक 56 (skanda.3.19.56)
माधवाय शुभे वस्त्रे भूषणानि शुभानि च। धारयंस्तानि सर्वाणि रौहिणेयो महाबलः
mādhavāya śubhe vastre bhūṣaṇāni śubhāni ca dhārayaṁstāni sarvāṇi rauhiṇeyo mahābalaḥ
माधव को शुभ वस्त्र और शुभ आभूषण भी दिए। उन सभी को धारण किए हुए महाबली रोहिणी-पुत्र,
श्लोक 57 (skanda.3.19.57)
पुष्पितानोकहोपेतः कैलास इव पर्वतः। अनुज्ञातोऽथ मुनिभिः सर्वतीर्थेषु स द्विजाः
puṣpitānokahopetaḥ kailāsa iva parvataḥ anujñāto'tha munibhiḥ sarvatīrtheṣu sa dvijāḥ
फूले हुए वृक्षों से युक्त कैलास पर्वत के समान शोभित हुए। तब मुनियों से आज्ञा पाकर, हे द्विजो!
श्लोक 58 (skanda.3.19.58)
एकमब्दं चरन्सस्नौ नियमाचारसंयुतः। ततः संवत्सरे पूर्णे कालिंदीभेदनो बलः
ekamabdaṁ caransasnau niyamācārasaṁyutaḥ tataḥ saṁvatsare pūrṇe kāliṁdībhedano balaḥ
वे एक वर्ष तक सभी तीर्थों में विचरण करते हुए, नियम-आचार से युक्त होकर स्नान करते रहे। तब वर्ष पूर्ण हो जाने पर, कालिन्दी के भेदक बल (बलराम),
श्लोक 59 (skanda.3.19.59)
समाप्ततीर्थयात्रः सन्पुरीं गन्तुं प्रचक्रमे। ततस्तमोमयीं छायां पृष्ठतोनुगतां कृशाम्
samāptatīrthayātraḥ sanpurīṁ gantuṁ pracakrame tatastamomayīṁ chāyāṁ pṛṣṭhatonugatāṁ kṛśām
तीर्थयात्रा पूर्ण करके नगरी को जाने के लिए उद्यत हुए। तभी उन्होंने अपने पीछे-पीछे चलती हुई, अंधकार-मयी, दुबली,
श्लोक 60 (skanda.3.19.60)
अपश्यद्बलदेवोयं महानादविराविणीम्। अथ वार्ता स शुश्राव समुद्भूतां तदांबरे
apaśyadbaladevoyaṁ mahānādavirāviṇīm atha vārtā sa śuśrāva samudbhūtāṁ tadāṁbare
महाध्वनि करती हुई छाया को उस बलदेव ने देखा। फिर उन्होंने उस समय आकाश में उठी हुई एक वाणी सुनी -
श्लोक 61 (skanda.3.19.61)
रामराम महाबाहो रौहिणेय सितप्रभ। तीर्थाभिगमनेनाद्य चरितेन त्वयाऽनघ।
rāmarāma mahābāho rauhiṇeya sitaprabha tīrthābhigamanenādya caritena tvayā'nagha
'हे राम-राम, महाबाहो, रोहिणी-पुत्र, श्वेत-कान्ति वाले! आज इस तीर्थ-यात्रा के आचरण से भी, हे निष्पाप!
श्लोक 62 (skanda.3.19.62)
न नष्टा ब्रह्महत्या ते निःशेषं रोहिणीसुत। इति वार्तां समाकर्ण्य चिंतयामास वै बलः
na naṣṭā brahmahatyā te niḥśeṣaṁ rohiṇīsuta iti vārtāṁ samākarṇya ciṁtayāmāsa vai balaḥ
तुम्हारी ब्रह्महत्या पूर्णतः नष्ट नहीं हुई, हे रोहिणी-सुत।' इस वाणी को सुनकर बल ने विचार किया -
श्लोक 63 (skanda.3.19.63)
प्रायश्चित्तं मया चीर्णमेकाब्दं तीर्थ सेवया। तथापि ब्रह्महत्या सा न नष्टेति श्रुतं वचः
prāyaścittaṁ mayā cīrṇamekābdaṁ tīrtha sevayā tathāpi brahmahatyā sā na naṣṭeti śrutaṁ vacaḥ
'मैंने तीर्थ-सेवा से एक वर्ष का प्रायश्चित किया, फिर भी 'वह ब्रह्महत्या नष्ट नहीं हुई' - यह वचन सुना।
श्लोक 64 (skanda.3.19.64)
किं कुर्म इति संचिंत्य नैमिषारण्यमभ्यगात्। तत्र गत्वा मुनीनां तन्न्यवेदयदरिंदमः
kiṁ kurma iti saṁciṁtya naimiṣāraṇyamabhyagāt tatra gatvā munīnāṁ tannyavedayadariṁdamaḥ
अब क्या करें' - यह विचार कर वे नैमिषारण्य पहुँचे। वहाँ जाकर उस अरिन्दम ने मुनियों से यह निवेदन किया,
श्लोक 65 (skanda.3.19.65)
यच्छ्रुतं गगने वाक्यं या च दृष्टा तमोमयी। न्यवेदयत तत्सर्वं मुनीनां रोहिणीसुतः। तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे रामं वाक्यमथाब्रुवन्
yacchrutaṁ gagane vākyaṁ yā ca dṛṣṭā tamomayī nyavedayata tatsarvaṁ munīnāṁ rohiṇīsutaḥ tacchrutvā munayaḥ sarve rāmaṁ vākyamathābruvan
जो वचन आकाश में सुना था, और जो अन्धकार-मयी छाया देखी थी, वह सब रोहिणी-पुत्र ने मुनियों को बताया। यह सुनकर सभी मुनि राम से यह वचन बोले -
श्लोक 66 (skanda.3.19.66)
मुनय ऊचुः। यदि राम न नष्टा ते ब्रह्महत्या तु कृत्स्नशः
munaya ūcuḥ yadi rāma na naṣṭā te brahmahatyā tu kṛtsnaśaḥ
मुनियों ने कहा - 'हे राम! यदि आपकी ब्रह्महत्या पूर्णतः नष्ट नहीं हुई,
श्लोक 67 (skanda.3.19.67)
तर्हि गच्छ महाभाग गंधमादनपर्वतम्। महादुःख प्रशमनं महारोगविनाशनम्
tarhi gaccha mahābhāga gaṁdhamādanaparvatam mahāduḥkha praśamanaṁ mahārogavināśanam
तो हे महाभाग! गन्धमादन पर्वत जाइए - जो महादुःख की शान्ति और महारोगों का नाशक है।
श्लोक 68 (skanda.3.19.68)
रामसेतौ महापुण्ये गन्धमादनपर्वते। अस्ति लक्ष्मणतीर्थाख्यं सरः पापविनाशनम्
rāmasetau mahāpuṇye gandhamādanaparvate asti lakṣmaṇatīrthākhyaṁ saraḥ pāpavināśanam
रामसेतु पर, महापुण्यमय गन्धमादन पर्वत पर, लक्ष्मणतीर्थ नामक पाप-नाशक सरोवर है।
श्लोक 69 (skanda.3.19.69)
स्नानं कुरुष्व तत्र त्वं तल्लिंगं च नमस्कुरु। निःशेषं तेन नष्टा स्याद्ब्रह्महत्या न संशयः
snānaṁ kuruṣva tatra tvaṁ talliṁgaṁ ca namaskuru niḥśeṣaṁ tena naṣṭā syādbrahmahatyā na saṁśayaḥ
वहाँ स्नान कीजिए और उस लिंग को नमस्कार कीजिए। इससे आपकी ब्रह्महत्या पूर्णतः नष्ट हो जाएगी, इसमें संशय नहीं।'
श्लोक 70 (skanda.3.19.70)
श्रीसूत उवाच। एवमुक्तस्तदा रामो गन्धमादनपर्वतम्। गत्वा लक्ष्मणतीर्थं च प्राप्तवान्मुनिपुंगवाः
śrīsūta uvāca evamuktastadā rāmo gandhamādanaparvatam gatvā lakṣmaṇatīrthaṁ ca prāptavānmunipuṁgavāḥ
श्रीसूत जी ने कहा - हे मुनिपुंगवो! इस प्रकार कहे जाने पर तब राम गन्धमादन पर्वत जाकर लक्ष्मणतीर्थ पहुँचे।
श्लोक 71 (skanda.3.19.71)
स्नात्वा संकल्पपूर्वं तु तत्र तीर्थे हलायुधः। ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं धान्यं गाश्च वसुन्धराम्
snātvā saṁkalpapūrvaṁ tu tatra tīrthe halāyudhaḥ brāhmaṇebhyo dadau vittaṁ dhānyaṁ gāśca vasundharām
वहाँ संकल्पपूर्वक स्नान करके हलायुध ने ब्राह्मणों को धन, अन्न, गौएँ और भूमि दान की।
श्लोक 72 (skanda.3.19.72)
तस्मिन्नवसरे तत्र राममाहाशरीरवाक्। निःशेषं राम नष्टा ते ब्रह्महत्याधुना त्विह
tasminnavasare tatra rāmamāhāśarīravāk niḥśeṣaṁ rāma naṣṭā te brahmahatyādhunā tviha
उसी अवसर पर वहाँ राम को अशरीरी वाणी ने कहा - 'हे राम! तुम्हारी ब्रह्महत्या अब यहीं पूर्णतः नष्ट हो गई है।
श्लोक 73 (skanda.3.19.73)
संदेहो नात्र कर्तव्यः सुखं याहि पुरीं निजाम्। तच्छ्रुत्वा बलभद्रोऽथ तत्तीर्थं प्रशशंस ह
saṁdeho nātra kartavyaḥ sukhaṁ yāhi purīṁ nijām tacchrutvā balabhadro'tha tattīrthaṁ praśaśaṁsa ha
इसमें कोई संदेह न करो, सुखपूर्वक अपनी नगरी जाओ।' यह सुनकर बलभद्र ने उस तीर्थ की प्रशंसा की।
श्लोक 74 (skanda.3.19.74)
ततस्तत्रत्यतीर्थेषु स्नात्वा सर्वेषु माधवः। धनुष्कोटौ तथा स्नात्वा रामनाथं निषेव्य च। द्वारकां स्वपुरीं प्रायान्नष्टपातकसंचयः
tatastatratyatīrtheṣu snātvā sarveṣu mādhavaḥ dhanuṣkoṭau tathā snātvā rāmanāthaṁ niṣevya ca dvārakāṁ svapurīṁ prāyānnaṣṭapātakasaṁcayaḥ
फिर वहाँ के सभी तीर्थों में स्नान करके, धनुष्कोटि में भी स्नान करके और रामनाथ की सेवा करके, माधव पाप-समूह से मुक्त होकर अपनी नगरी द्वारका को गए।
श्लोक 75 (skanda.3.19.75)
श्रीसूत उवाच। एवं वः कथितं विप्राः श्रीलक्ष्मणसरोऽमलम्
śrīsūta uvāca evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāḥ śrīlakṣmaṇasaro'malam
श्रीसूत जी ने कहा - हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें श्री लक्ष्मण के निर्मल सरोवर के विषय में बताया,
श्लोक 76 (skanda.3.19.76)
पुण्यं पवित्रं पापघ्नं ब्रह्महत्यादिशोधकम्। यः पठेदिममध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः
puṇyaṁ pavitraṁ pāpaghnaṁ brahmahatyādiśodhakam yaḥ paṭhedimamadhyāyaṁ śṛṇuyādvā samāhitaḥ
जो पुण्यमय, पवित्र, पाप-नाशक, ब्रह्महत्या आदि का शोधक है। जो इस अध्याय को पढ़ता है या एकाग्रचित्त होकर सुनता है,
श्लोक 77 (skanda.3.19.77)
स याति मुक्तिं विप्रेंद्राः पुनरावृत्तिवर्जिताम्
sa yāti muktiṁ vipreṁdrāḥ punarāvṛttivarjitām
हे विप्रेन्द्रो! वह पुनरावृत्ति-रहित मुक्ति को प्राप्त होता है।