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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 21

लक्ष्मीतीर्थ की महिमा और युधिष्ठिर की अतुल संपत्ति-प्राप्ति

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (skanda.3.21.1)

श्रीसूत उवाच। जटा तीर्थाभिधे तीर्थे सर्वपातकनाशने। स्नानं कृत्वा विशुद्धात्मा लक्ष्मीतीर्थं ततो व्रजेत्

śrīsūta uvāca jaṭā tīrthābhidhe tīrthe sarvapātakanāśane snānaṁ kṛtvā viśuddhātmā lakṣmītīrthaṁ tato vrajet

श्रीसूत जी ने कहा - समस्त पातकों का नाश करने वाले जटातीर्थ में स्नान करके, विशुद्धात्मा होकर फिर लक्ष्मीतीर्थ जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.3.21.2)

यंयं कामं समुद्दिश्य लक्ष्मीतीर्थे द्विजोत्तमाः। स्नानं समाचरेन्मर्त्यस्तंतं कामं समश्नुते

yaṁyaṁ kāmaṁ samuddiśya lakṣmītīrthe dvijottamāḥ snānaṁ samācarenmartyastaṁtaṁ kāmaṁ samaśnute

हे द्विजोत्तमो! जिस-जिस कामना को लक्ष्य करके मनुष्य लक्ष्मीतीर्थ में स्नान करता है, उसे वही-वही कामना प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 3 (skanda.3.21.3)

महादारिद्र्यशमनं महाधान्यसमृद्धिदम्। महादुःखप्रशमनं महासंपद्विवर्धनम्

mahādāridryaśamanaṁ mahādhānyasamṛddhidam mahāduḥkhapraśamanaṁ mahāsaṁpadvivardhanam

यह महादरिद्रता को शान्त करने वाला, महाधान्य-समृद्धि देने वाला, महादुःख को शान्त करने वाला, महासंपत्ति को बढ़ाने वाला है।

श्लोक 4 (skanda.3.21.4)

अत्र स्नात्वा धर्मपुत्रो महदैश्वर्यमाप्तवान्। इन्द्रप्रस्थे वसन्पूर्वं श्रीकृष्णेन प्रचोदितः

atra snātvā dharmaputro mahadaiśvaryamāptavān indraprasthe vasanpūrvaṁ śrīkṛṣṇena pracoditaḥ

यहाँ स्नान करके धर्मपुत्र ने महान् ऐश्वर्य प्राप्त किया था, जब वे पहले इन्द्रप्रस्थ में रहते हुए श्रीकृष्ण द्वारा प्रेरित हुए थे।

श्लोक 5 (skanda.3.21.5)

ऋषय ऊचुः। यथैश्वर्यं धर्मपुत्रो लक्ष्मीतीर्थे निमज्जनात्। आप्तवान्कृष्णवचनात्तन्नो ब्रूहि महामुने

ṛṣaya ūcuḥ yathaiśvaryaṁ dharmaputro lakṣmītīrthe nimajjanāt āptavānkṛṣṇavacanāttanno brūhi mahāmune

ऋषियों ने कहा - हे महामुने! धर्मपुत्र ने कृष्ण के वचन से लक्ष्मीतीर्थ में स्नान करके जैसे ऐश्वर्य प्राप्त किया, वह हमें बताइए।

श्लोक 6 (skanda.3.21.6)

श्रीसूत उवाच। इन्द्रप्रस्थे पुरा विप्रा धृतराष्ट्रेण चोदिताः। न्यवसन्पांडवाः पंच महाबलपराक्रमाः

śrīsūta uvāca indraprasthe purā viprā dhṛtarāṣṭreṇa coditāḥ nyavasanpāṁḍavāḥ paṁca mahābalaparākramāḥ

श्रीसूत जी ने कहा - हे विप्रो! पूर्वकाल में धृतराष्ट्र द्वारा प्रेरित, महाबल-पराक्रमी पाँचों पाण्डव इन्द्रप्रस्थ में रहते थे।

श्लोक 7 (skanda.3.21.7)

इन्द्रप्रस्थं ययौ कृष्णः कदाचित्तान्निरीक्षितुम्। तमागतमेभिप्रेक्ष्य पांडवास्ते समुत्सुकाः

indraprasthaṁ yayau kṛṣṇaḥ kadācittānnirīkṣitum tamāgatamebhiprekṣya pāṁḍavāste samutsukāḥ

एक बार कृष्ण उन्हें देखने के लिए इन्द्रप्रस्थ गए। उन्हें आया हुआ देखकर वे पाण्डव अत्यन्त उत्सुक होकर,

श्लोक 8 (skanda.3.21.8)

स्वगृहं प्रापयामासुर्मुदा परमया युताः। कञ्चित्कालमसौ कृष्णस्तत्रावात्सीत्पुरोत्तमे

svagṛhaṁ prāpayāmāsurmudā paramayā yutāḥ kañcitkālamasau kṛṣṇastatrāvātsītpurottame

परम हर्ष से युक्त होकर उन्हें अपने घर ले गए। वह कृष्ण उस श्रेष्ठ नगरी में कुछ काल तक रहे।

श्लोक 9 (skanda.3.21.9)

कदाचित्कृष्णमाहूय पूजयित्वा युधिष्ठिरः। पप्रच्छ पुंडरीकाक्षं वासुदेवं जगत्पतिम्

kadācitkṛṣṇamāhūya pūjayitvā yudhiṣṭhiraḥ papraccha puṁḍarīkākṣaṁ vāsudevaṁ jagatpatim

एक बार कृष्ण को बुलाकर, उनकी पूजा करके, युधिष्ठिर ने पुण्डरीकाक्ष, जगत्पति वासुदेव से पूछा -

श्लोक 10 (skanda.3.21.10)

युधिष्ठिर उवाच। कृष्णकृष्ण महाप्राज्ञ येन धर्मेण मानवाः। लभंते महदैश्वर्यं तन्नो ब्रूहि महामते। इत्युक्तो धर्मपुत्रेण कृष्णः प्राह युधिष्ठिरम्

yudhiṣṭhira uvāca kṛṣṇakṛṣṇa mahāprājña yena dharmeṇa mānavāḥ labhaṁte mahadaiśvaryaṁ tanno brūhi mahāmate ityukto dharmaputreṇa kṛṣṇaḥ prāha yudhiṣṭhiram

युधिष्ठिर ने कहा - 'हे कृष्ण-कृष्ण, महाप्राज्ञ! जिस धर्म से मनुष्य महान् ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं, हे महामते! वह हमें बताइए।' धर्मपुत्र द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा -

श्लोक 11 (skanda.3.21.11)

श्रीकृष्ण उवाच। धर्मपुत्र महाभाग गन्धमादनपर्वते

śrīkṛṣṇa uvāca dharmaputra mahābhāga gandhamādanaparvate

श्रीकृष्ण ने कहा - 'हे धर्मपुत्र, महाभाग! गन्धमादन पर्वत पर,

श्लोक 12 (skanda.3.21.12)

लक्ष्मी तीर्थमिति ख्यातमस्त्यैश्वर्यैककारणम्। तत्र स्नानं कुरुष्व त्वमैश्वर्यं ते भविष्यति

lakṣmī tīrthamiti khyātamastyaiśvaryaikakāraṇam tatra snānaṁ kuruṣva tvamaiśvaryaṁ te bhaviṣyati

लक्ष्मीतीर्थ नाम से विख्यात, ऐश्वर्य का एकमात्र कारण एक तीर्थ है; वहाँ स्नान करो, तुम्हें ऐश्वर्य प्राप्त होगा।

श्लोक 13 (skanda.3.21.13)

तत्र स्नानेन वर्धंते धनधान्यसमृद्धयः। सर्वे सपत्ना नश्यंति क्षात्रमेषां विवर्द्धते

tatra snānena vardhaṁte dhanadhānyasamṛddhayaḥ sarve sapatnā naśyaṁti kṣātrameṣāṁ vivarddhate

वहाँ स्नान से धन-धान्य की समृद्धि बढ़ती है, सभी शत्रु नष्ट होते हैं, और उनका (स्नान करने वाले का) क्षात्र-बल बढ़ता है।

श्लोक 14 (skanda.3.21.14)

तीर्थे सस्नुः पुरा देवा लक्ष्मीनामनि पुण्यदे। अलभन्त्सर्वमैश्वर्यं तेन पुण्येन धर्मज

tīrthe sasnuḥ purā devā lakṣmīnāmani puṇyade alabhantsarvamaiśvaryaṁ tena puṇyena dharmaja

पूर्वकाल में देवताओं ने पुण्यदायी लक्ष्मी-नामक तीर्थ में स्नान किया, और हे धर्मज! उसी पुण्य से उन्होंने सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त किया,

श्लोक 15 (skanda.3.21.15)

असुरांश्च महावीर्यान्समरे जघ्नुरंजसा। मही लक्ष्मीश्च धर्मश्च तत्तीर्थस्नायिनां नृणाम्

asurāṁśca mahāvīryānsamare jaghnuraṁjasā mahī lakṣmīśca dharmaśca tattīrthasnāyināṁ nṛṇām

तथा महान् वीर्यशाली असुरों को युद्ध में सरलता से मार डाला। पृथ्वी, लक्ष्मी और धर्म, उस तीर्थ में स्नान करने वाले मनुष्यों को,

श्लोक 16 (skanda.3.21.16)

भविष्यत्यचिरादेव संशयं मा कृथा इह। तपोभिः क्रतुभिर्दानैराशीर्वादैश्च पांडव

bhaviṣyatyacirādeva saṁśayaṁ mā kṛthā iha tapobhiḥ kratubhirdānairāśīrvādaiśca pāṁḍava

शीघ्र ही प्राप्त होंगे, इसमें संदेह मत करो। हे पाण्डव! तप से, यज्ञों से, दानों से, आशीर्वादों से,

श्लोक 17 (skanda.3.21.17)

ऐश्वर्यं प्राप्यते यद्वल्लक्ष्मीतीर्थनिमज्जनात्। सर्वपापानि नश्यंति विप्रा यांति लयं सदा।

aiśvaryaṁ prāpyate yadvallakṣmītīrthanimajjanāt sarvapāpāni naśyaṁti viprā yāṁti layaṁ sadā

जो ऐश्वर्य प्राप्त होता है, वही लक्ष्मीतीर्थ में निमज्जन से भी प्राप्त होता है। हे विप्रो! सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, वे सदा लय को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 18 (skanda.3.21.18)

व्याधयश्च विनश्यंति लक्ष्मीतीर्थनिषेवणात्। श्रेयः सुविपुलं लोके लभ्यते नात्र संशयः

vyādhayaśca vinaśyaṁti lakṣmītīrthaniṣevaṇāt śreyaḥ suvipulaṁ loke labhyate nātra saṁśayaḥ

लक्ष्मीतीर्थ की सेवा से व्याधियाँ भी नष्ट हो जाती हैं; लोक में अत्यन्त विपुल श्रेय प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 19 (skanda.3.21.19)

स्नानमात्रेण वै लक्ष्म्यास्तीर्थेऽस्मि न्धर्मनंदन। रंभामप्सरसां श्रेष्ठां लब्धवानवधो नृपः

snānamātreṇa vai lakṣmyāstīrthe'smi ndharmanaṁdana raṁbhāmapsarasāṁ śreṣṭhāṁ labdhavānavadho nṛpaḥ

हे धर्मनन्दन! केवल इस लक्ष्मी-तीर्थ में स्नान करने से एक निर्दोष राजा ने अप्सराओं में श्रेष्ठ रम्भा को प्राप्त किया था।

श्लोक 20 (skanda.3.21.20)

स्नात्वात्र तीर्थे पुण्ये तु कुबेरो नरवाहनः। स महापद्ममुख्यानां निधीनां नायकोऽ भवत्

snātvātra tīrthe puṇye tu kubero naravāhanaḥ sa mahāpadmamukhyānāṁ nidhīnāṁ nāyako' bhavat

इस पुण्यमय तीर्थ में स्नान करके नरवाहन कुबेर, महापद्म आदि निधियों के नायक बन गए।

श्लोक 21 (skanda.3.21.21)

तस्मात्त्वमपि राजेंद्र लक्ष्मीतीर्थे शुभप्रदे। स्नात्वा वृकोदरमुखैरनुजैरपि संवृतः

tasmāttvamapi rājeṁdra lakṣmītīrthe śubhaprade snātvā vṛkodaramukhairanujairapi saṁvṛtaḥ

इसलिए हे राजेन्द्र! तुम भी शुभदायक लक्ष्मीतीर्थ में, वृकोदर आदि छोटे भाइयों सहित स्नान करके,

श्लोक 22 (skanda.3.21.22)

लप्स्यसे महतीं लक्ष्मीं जेष्यसे च रिपूनपि। संदेहो नात्र कर्तव्यः पैतृष्वसेय धर्मज

lapsyase mahatīṁ lakṣmīṁ jeṣyase ca ripūnapi saṁdeho nātra kartavyaḥ paitṛṣvaseya dharmaja

महती लक्ष्मी प्राप्त करोगे और शत्रुओं को भी जीतोगे। हे धर्मज, हे मेरी बुआ के पुत्र! इसमें संदेह मत करो।'

श्लोक 23 (skanda.3.21.23)

इत्युक्तो धर्मपुत्रोऽयं कृष्णेनाद्भुतदर्शनः। सानुजः प्रययौ शीघ्रं गन्धमादनपर्वतम्

ityukto dharmaputro'yaṁ kṛṣṇenādbhutadarśanaḥ sānujaḥ prayayau śīghraṁ gandhamādanaparvatam

अद्भुत-दर्शन कृष्ण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर यह धर्मपुत्र छोटे भाइयों सहित शीघ्र गन्धमादन पर्वत को चल पड़े।

श्लोक 24 (skanda.3.21.24)

लक्ष्मी तीर्थं ततो गत्वा महदैश्वर्यकारणम्। सस्नौ युधिष्ठिरस्तत्र सानुजो नियमान्वितः

lakṣmī tīrthaṁ tato gatvā mahadaiśvaryakāraṇam sasnau yudhiṣṭhirastatra sānujo niyamānvitaḥ

फिर महान् ऐश्वर्य के कारण-रूप लक्ष्मीतीर्थ जाकर, युधिष्ठिर ने वहाँ छोटे भाइयों सहित नियमपूर्वक स्नान किया।

श्लोक 25 (skanda.3.21.25)

लक्ष्मतीर्थस्य तोये स सर्वपातकनाशने। सानुजो मासमेकं तु सस्नौ नियमपूर्वकम्

lakṣmatīrthasya toye sa sarvapātakanāśane sānujo māsamekaṁ tu sasnau niyamapūrvakam

समस्त पातकों का नाश करने वाले लक्ष्मीतीर्थ के जल में, वे छोटे भाइयों सहित एक महीने तक नियमपूर्वक स्नान करते रहे।

श्लोक 26 (skanda.3.21.26)

गोभूतिलहिरण्यादीन्ब्राह्मणेभ्यो ददौ बहून्। सानुजो धर्मपुत्रोऽसाविंद्रप्रस्थं ययौ ततः

gobhūtilahiraṇyādīnbrāhmaṇebhyo dadau bahūn sānujo dharmaputro'sāviṁdraprasthaṁ yayau tataḥ

गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि बहुत सा दान ब्राह्मणों को दिया; फिर छोटे भाइयों सहित वह धर्मपुत्र इन्द्रप्रस्थ को गए।

श्लोक 27 (skanda.3.21.27)

राजसूयक्रतुं कर्तुं तत एच्छद्युधिष्ठिरः। कृष्णं समाह्वयामास यियक्षुर्धर्मनंदनं

rājasūyakratuṁ kartuṁ tata ecchadyudhiṣṭhiraḥ kṛṣṇaṁ samāhvayāmāsa yiyakṣurdharmanaṁdanaṁ

तब युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ करने की इच्छा की; यज्ञ करने के इच्छुक उस धर्मनन्दन ने कृष्ण को आमन्त्रित किया।

श्लोक 28 (skanda.3.21.28)

कृष्णो धर्मजदूतेन समाहूतः ससंभ्रमः। चतुर्भिरश्वैः संयुक्तं रथमा रुह्य वेगिनम्

kṛṣṇo dharmajadūtena samāhūtaḥ sasaṁbhramaḥ caturbhiraśvaiḥ saṁyuktaṁ rathamā ruhya veginam

धर्मज के दूत द्वारा आमन्त्रित कृष्ण, हड़बड़ी में, चार घोड़ों से युक्त वेगवान् रथ पर सवार होकर,

श्लोक 29 (skanda.3.21.29)

सत्यभामासहचर इंद्रप्रस्थं समाययौ। तमागतं समालोक्य प्रमोदाद्धर्मनंदनः

satyabhāmāsahacara iṁdraprasthaṁ samāyayau tamāgataṁ samālokya pramodāddharmanaṁdanaḥ

सत्यभामा के साथ इन्द्रप्रस्थ आ पहुँचे। उन्हें आया हुआ देखकर हर्ष से धर्मनन्दन ने,

श्लोक 30 (skanda.3.21.30)

न्यवेदयत्स कृष्णाय राजसूयोद्यमं तदा। अन्वमन्यत कृष्णोपि तथैव क्रियतामिति

nyavedayatsa kṛṣṇāya rājasūyodyamaṁ tadā anvamanyata kṛṣṇopi tathaiva kriyatāmiti

तब कृष्ण को राजसूय के उद्यम की सूचना दी। कृष्ण ने भी 'वैसा ही किया जाए' कहकर सम्मति दी,

श्लोक 31 (skanda.3.21.31)

वाक्यं च युक्तिसंयुक्तं धर्मपुत्रमभाषत। पैतृष्वस्रेय धर्मात्मञ्च्छृणु पथ्यं वचो मम।

vākyaṁ ca yuktisaṁyuktaṁ dharmaputramabhāṣata paitṛṣvasreya dharmātmañcchṛṇu pathyaṁ vaco mama

और युक्तिपूर्ण वचन धर्मपुत्र से कहा - 'हे धर्मात्मन्, मेरी बुआ के पुत्र! मेरा हितकर वचन सुनो।

श्लोक 32 (skanda.3.21.32)

दुष्करो राजसूयोऽयं सर्वैरपि महीश्वरैः। अनेकशतपादातरथकुंजरवाजिमान्

duṣkaro rājasūyo'yaṁ sarvairapi mahīśvaraiḥ anekaśatapādātarathakuṁjaravājimān

यह राजसूय सभी महीपतियों के लिए भी दुष्कर है। जिसके पास अनेक सैकड़ों पैदल-सैनिक, रथ, हाथी और घोड़े हों,

श्लोक 33 (skanda.3.21.33)

महीपतिरिमं यज्ञं कर्तुमर्हति नेतरः। दिशो दश विजेतव्या प्रथमं वलिना त्वया

mahīpatirimaṁ yajñaṁ kartumarhati netaraḥ diśo daśa vijetavyā prathamaṁ valinā tvayā

ऐसा ही राजा इस यज्ञ को करने योग्य है, अन्य नहीं। इसलिए पहले तुम्हें बल से दसों दिशाएँ जीतनी चाहिए,

श्लोक 34 (skanda.3.21.34)

पराजितेभ्यः शत्रुभ्यो गृहीत्वा करमुत्तमम्। तेन कांचनजातेन कर्तव्योऽयं क्रतूत्तमः

parājitebhyaḥ śatrubhyo gṛhītvā karamuttamam tena kāṁcanajātena kartavyo'yaṁ kratūttamaḥ

पराजित शत्रुओं से उत्तम कर लेकर; उस स्वर्ण से ही यह श्रेष्ठ यज्ञ करना चाहिए।

श्लोक 35 (skanda.3.21.35)

रोचये युक्तिविदहं न हि त्वां भीषयामि भोः। अतः क्रतुसमारंभात्पूर्वं दिग्विजयं कुरु

rocaye yuktividahaṁ na hi tvāṁ bhīṣayāmi bhoḥ ataḥ kratusamāraṁbhātpūrvaṁ digvijayaṁ kuru

मैं युक्ति जानते हुए यह कह रहा हूँ, तुम्हें डराता नहीं हूँ। इसलिए यज्ञ के आरम्भ से पहले दिग्विजय करो।'

श्लोक 36 (skanda.3.21.36)

ततो धर्मात्मजः श्रुत्वा कृष्णस्य वचनं हितम्। प्रशंसन्देवकीपुत्रमाजुहाव निजानुजान्

tato dharmātmajaḥ śrutvā kṛṣṇasya vacanaṁ hitam praśaṁsandevakīputramājuhāva nijānujān

तब धर्मात्मज ने कृष्ण के हितकर वचन सुनकर, देवकी-पुत्र की प्रशंसा करते हुए, अपने छोटे भाइयों को बुलाया।

श्लोक 37 (skanda.3.21.37)

आहूय चतुरो भ्रातॄन्धर्मजः प्राह हर्षयन्। अयि भीम महाबाहो बहुवीर्य धनंजय

āhūya caturo bhrātṝndharmajaḥ prāha harṣayan ayi bhīma mahābāho bahuvīrya dhanaṁjaya

चारों भाइयों को बुलाकर धर्मज ने हर्षित करते हुए कहा - 'हे भीम, महाबाहो! हे बहुवीर्य धनंजय!

श्लोक 38 (skanda.3.21.38)

यमौ च सुकुमागंगौ शत्रुसंहारदीक्षितौ। चिकीर्षामि महायज्ञं राजसूयमनुत्तमम्

yamau ca sukumāgaṁgau śatrusaṁhāradīkṣitau cikīrṣāmi mahāyajñaṁ rājasūyamanuttamam

और हे सुकुमारा-माद्री के दोनों पुत्रो, शत्रु-संहार में दीक्षित! मैं परम श्रेष्ठ महायज्ञ राजसूय करना चाहता हूँ।

श्लोक 39 (skanda.3.21.39)

स च सर्वान्रणे जित्वा कर्तव्यः पृथिवीपतीन्। अतो विजेतुं भूपालांश्चत्वरोऽपि ससैनिकाः

sa ca sarvānraṇe jitvā kartavyaḥ pṛthivīpatīn ato vijetuṁ bhūpālāṁścatvaro'pi sasainikāḥ

और उसे सभी पृथ्वीपतियों को युद्ध में जीतकर ही करना चाहिए। इसलिए राजाओं को जीतने के लिए, चारों ही तुम,

श्लोक 40 (skanda.3.21.40)

दिशश्चतस्रो गच्छंतु भवंतो वीर्यवत्तराः। युष्माभिराहतैर्द्रव्यैः करिष्यामि महाक्रतुम्

diśaścatasro gacchaṁtu bhavaṁto vīryavattarāḥ yuṣmābhirāhatairdravyaiḥ kariṣyāmi mahākratum

सेना सहित चारों दिशाओं में जाओ, तुम अत्यन्त वीर्यवान् हो। तुम लोगों द्वारा लाए गए धन से मैं महायज्ञ करूँगा।'

श्लोक 41 (skanda.3.21.41)

इत्युक्ताः सादरं सर्वे वृकोदरमुखास्तदा। प्रसन्नवदना भूत्वा धर्मपुत्रानुजाः पुरात्

ityuktāḥ sādaraṁ sarve vṛkodaramukhāstadā prasannavadanā bhūtvā dharmaputrānujāḥ purāt

इस प्रकार आदरपूर्वक कहे जाने पर वृकोदर आदि सभी, प्रसन्न मुख होकर, वे धर्मपुत्र के छोटे भाई नगरी से,

श्लोक 42 (skanda.3.21.42)

राज्ञां जयाय सर्वासु निर्ययुर्दिक्षु पांडवाः। ते सर्वे नृपतीञ्जित्वा चतुर्दिक्षु स्थितान्बहून्

rājñāṁ jayāya sarvāsu niryayurdikṣu pāṁḍavāḥ te sarve nṛpatīñjitvā caturdikṣu sthitānbahūn

राजाओं को जीतने के लिए सभी दिशाओं में निकल पड़े, वे पाण्डव। उन सभी ने चारों दिशाओं में स्थित अनेक राजाओं को जीतकर,

श्लोक 43 (skanda.3.21.43)

स्ववशे स्थापयित्वा तान्नृपतीन्पांडुनंदनाः। तैर्दत्तं बहुधा द्रव्यमसंख्यातमनुत्तमम्

svavaśe sthāpayitvā tānnṛpatīnpāṁḍunaṁdanāḥ tairdattaṁ bahudhā dravyamasaṁkhyātamanuttamam

उन राजाओं को अपने वश में करके, उन पाण्डु-नन्दनों ने, उन (राजाओं) द्वारा अनेक प्रकार से दिए गए असंख्य, श्रेष्ठ धन को,

श्लोक 44 (skanda.3.21.44)

आदाय स्वपुरं तूर्णमाययुः कृष्णसंश्रयाः। भीमः समाययौ तत्र महाबलपराक्रमः

ādāya svapuraṁ tūrṇamāyayuḥ kṛṣṇasaṁśrayāḥ bhīmaḥ samāyayau tatra mahābalaparākramaḥ

लेकर, कृष्ण की शरण में रहते हुए शीघ्र अपनी नगरी को लौट आए। भीम वहाँ महाबल-पराक्रमी होकर,

श्लोक 45 (skanda.3.21.45)

शतभारसुवर्णानि समादाय पुरोत्तमम्। सहस्रं भारमादाय सुवर्णानां ततोऽर्जुनः

śatabhārasuvarṇāni samādāya purottamam sahasraṁ bhāramādāya suvarṇānāṁ tato'rjunaḥ

सौ भार स्वर्ण लेकर उस श्रेष्ठ नगरी में पहुँचे। फिर अर्जुन एक हजार भार स्वर्ण लेकर,

श्लोक 46 (skanda.3.21.46)

शक्रप्रस्थं समायातो महाबलपराक्रमः। शतभारं सुवर्णानां प्रगृह्य नकुलस्तथा

śakraprasthaṁ samāyāto mahābalaparākramaḥ śatabhāraṁ suvarṇānāṁ pragṛhya nakulastathā

महाबल-पराक्रमी शक्रप्रस्थ पहुँचे। वैसे ही नकुल भी सौ भार स्वर्ण लेकर,

श्लोक 47 (skanda.3.21.47)

समागतो महातेजाः शक्रप्रस्थं पुरोत्तमम्। दत्तान्विभीषणेनाथ स्वर्णतालांश्चतुर्दश

samāgato mahātejāḥ śakraprasthaṁ purottamam dattānvibhīṣaṇenātha svarṇatālāṁścaturdaśa

महातेजस्वी होकर उस श्रेष्ठ नगरी शक्रप्रस्थ पहुँचे। विभीषण द्वारा दिए गए चौदह स्वर्ण-थाल,

श्लोक 48 (skanda.3.21.48)

दाक्षिणात्यमहीपानां गृहीत्वा धनसंचयम्। सहदेवोपि सहसा समा यातो निजां पुरीम्

dākṣiṇātyamahīpānāṁ gṛhītvā dhanasaṁcayam sahadevopi sahasā samā yāto nijāṁ purīm

तथा दक्षिणी राजाओं का धन-संचय लेकर, सहदेव भी शीघ्र अपनी नगरी को लौट आए।

श्लोक 49 (skanda.3.21.49)

लक्षकोटिसहस्राणि लक्षकोटिशतान्यपि। सुवर्णानि ददौ कृष्णो धर्मपुत्राय यादवः

lakṣakoṭisahasrāṇi lakṣakoṭiśatānyapi suvarṇāni dadau kṛṣṇo dharmaputrāya yādavaḥ

यादव कृष्ण ने धर्मपुत्र को हजारों लाख-करोड़, और सैकड़ों लाख-करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ दीं।

श्लोक 50 (skanda.3.21.50)

स्वानुजैराहृतैरेवमसं ख्यातैर्महाधनैः। कृष्णदत्तैरसंख्यातैर्धनैरपि युधिष्ठिरः

svānujairāhṛtairevamasaṁ khyātairmahādhanaiḥ kṛṣṇadattairasaṁkhyātairdhanairapi yudhiṣṭhiraḥ

अपने छोटे भाइयों द्वारा लाए गए इन असंख्य महाधनों से, तथा कृष्ण द्वारा दिए गए असंख्य धन से भी, युधिष्ठिर ने,

श्लोक 51 (skanda.3.21.51)

कृष्णाश्रयोऽयजद्विप्रा राजसूयेन पांडवः। तस्मिन्यागे ददौ द्रव्यं ब्राह्मणेभ्यो यथेष्टतः

kṛṣṇāśrayo'yajadviprā rājasūyena pāṁḍavaḥ tasminyāge dadau dravyaṁ brāhmaṇebhyo yatheṣṭataḥ

कृष्ण की शरण में रहते हुए, हे विप्रो! राजसूय यज्ञ किया, उस पाण्डव ने। उस यज्ञ में ब्राह्मणों को इच्छानुसार धन दिया।

श्लोक 52 (skanda.3.21.52)

अन्नानि प्रददौ तत्र ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिरः। वस्त्राणि गाश्च भूमिं च भूषणानि ददौ तथा

annāni pradadau tatra brāhmaṇebhyo yudhiṣṭhiraḥ vastrāṇi gāśca bhūmiṁ ca bhūṣaṇāni dadau tathā

युधिष्ठिर ने वहाँ ब्राह्मणों को अन्न दिए; वस्त्र, गौएँ, भूमि तथा आभूषण भी वैसे ही दिए।

श्लोक 53 (skanda.3.21.53)

अर्थिनः परितुष्यंति यावता कांचनादिना। ततोपि द्विगुणं तेभ्यो दापयामास धर्मजः

arthinaḥ parituṣyaṁti yāvatā kāṁcanādinā tatopi dviguṇaṁ tebhyo dāpayāmāsa dharmajaḥ

याचकजन जितने स्वर्ण आदि से संतुष्ट हो जाते हैं, उससे भी दुगुना धर्मज ने उन्हें दिलवाया।

श्लोक 54 (skanda.3.21.54)

इयंति दत्तान्यर्थिभ्यो धनानि विविधान्यपि। इतीयत्तां परिच्छेत्तुं न शक्ता ब्रह्मकोटयः

iyaṁti dattānyarthibhyo dhanāni vividhānyapi itīyattāṁ paricchettuṁ na śaktā brahmakoṭayaḥ

'याचकों को इतने प्रकार के धन दिए गए' - इतनी गणना करने में करोड़ों ब्रह्मा भी समर्थ नहीं थे।

श्लोक 55 (skanda.3.21.55)

अर्थिभिर्दीयमानानि दृष्ट्वा तत्र धनानि वै। सर्वस्वमप्यहो राज्ञा दत्तमित्यब्रवीज्जनः

arthibhirdīyamānāni dṛṣṭvā tatra dhanāni vai sarvasvamapyaho rājñā dattamityabravījjanaḥ

वहाँ याचकों को दिए जाते धन को देखकर लोगों ने कहा - 'अहो! राजा ने अपना सर्वस्व ही दे दिया है।'

श्लोक 56 (skanda.3.21.56)

दृष्ट्वा कोशास्तथा नंताननंतमणिकांचनान्

dṛṣṭvā kośāstathā naṁtānanaṁtamaṇikāṁcanān

परन्तु फिर अनन्त मणियों और स्वर्ण से भरे कोषों को देखकर,

श्लोक 57 (skanda.3.21.57)

स्वल्पं हि दत्तमर्थिभ्य इत्यवोचञ्जनास्तदा। इष्ट्वैवं राजसूयेन धर्मपुत्रः सहानुजः

svalpaṁ hi dattamarthibhya ityavocañjanāstadā iṣṭvaivaṁ rājasūyena dharmaputraḥ sahānujaḥ

तब लोगों ने कहा - 'याचकों को तो बहुत ही कम दिया गया है।' इस प्रकार राजसूय से यज्ञ करके धर्मपुत्र छोटे भाइयों सहित,

श्लोक 58 (skanda.3.21.58)

बहुवित्तसमृद्धः सन्रेमे तत्र पुरोत्तमे। लक्ष्मीतीर्थस्य माहात्म्याद्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः

bahuvittasamṛddhaḥ sanreme tatra purottame lakṣmītīrthasya māhātmyāddharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

प्रचुर धन-समृद्धि से युक्त होकर उस श्रेष्ठ नगरी में सुखपूर्वक रहने लगे। लक्ष्मीतीर्थ के माहात्म्य से ही धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने,

श्लोक 59 (skanda.3.21.59)

लेभे सर्वमिदं विप्रा अहो तीर्थस्य वैभवम्। इदं तीर्थं महापुण्यं महा दारिद्यनाशनम्

lebhe sarvamidaṁ viprā aho tīrthasya vaibhavam idaṁ tīrthaṁ mahāpuṇyaṁ mahā dāridyanāśanam

यह सब प्राप्त किया, हे विप्रो! अहो! उस तीर्थ की महिमा! यह तीर्थ महापुण्यमय, महादरिद्रता का नाशक,

श्लोक 60 (skanda.3.21.60)

धनधान्यप्रदं पुंसां महापातकनाशनम्। महानरकसंहर्तृ महादुःखनिवर्तकम्

dhanadhānyapradaṁ puṁsāṁ mahāpātakanāśanam mahānarakasaṁhartṛ mahāduḥkhanivartakam

मनुष्यों को धन-धान्य देने वाला, महापातकों का नाशक, महानरक का संहारक, महादुःख का निवारक,

श्लोक 61 (skanda.3.21.61)

मोक्षदं स्वर्गदं नित्यं महाऋण विमोचनम्। सुकलत्रप्रदं पुंसां सुपुत्रप्रदमेव च

mokṣadaṁ svargadaṁ nityaṁ mahāṛṇa vimocanam sukalatrapradaṁ puṁsāṁ suputrapradameva ca

सदा मोक्ष और स्वर्ग देने वाला, महाऋण से मुक्त करने वाला, मनुष्यों को सुशील पत्नी और सुपुत्र देने वाला भी है।

श्लोक 62 (skanda.3.21.62)

एतत्तीर्थसमं तीर्थं न भूतं न भविष्यति। एतद्वः कथितं विप्रा लक्ष्मीतीर्थस्य वैभवम्

etattīrthasamaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati etadvaḥ kathitaṁ viprā lakṣmītīrthasya vaibhavam

इस तीर्थ के समान न कोई तीर्थ हुआ है, न होगा। हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें लक्ष्मीतीर्थ की महिमा बताई,

श्लोक 63 (skanda.3.21.63)

दुःस्वप्ननाशनं पुण्यं सर्वाभीष्टप्रसाधकम्। यः पठेदिममध्यायं शृणुते वा सभक्तिकम्

duḥsvapnanāśanaṁ puṇyaṁ sarvābhīṣṭaprasādhakam yaḥ paṭhedimamadhyāyaṁ śṛṇute vā sabhaktikam

जो दुःस्वप्नों को नष्ट करने वाली, पुण्यमय, सभी अभीष्टों को सिद्ध करने वाली है। जो इस अध्याय को पढ़ता है या भक्तिपूर्वक सुनता है,

श्लोक 64 (skanda.3.21.64)

धनधान्यसमृद्धः स्यात्स नरो नास्ति संशयः। भुक्त्वेह सकलान्भोगान्देहांते मुक्तिमाप्नुयात्

dhanadhānyasamṛddhaḥ syātsa naro nāsti saṁśayaḥ bhuktveha sakalānbhogāndehāṁte muktimāpnuyāt

वह मनुष्य धन-धान्य से समृद्ध होगा, इसमें संशय नहीं। यहाँ सभी भोगों को भोगकर, देहान्त होने पर वह मुक्ति प्राप्त करेगा।

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