Skip to main content

ब्रह्म खण्ड · अध्याय 22

अग्नितीर्थ की महिमा और दुष्पण्य-पैशाच्य से मोक्षण

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (skanda.3.22.1)

श्रीसूत उवाच। लक्ष्मीतीर्थे शुभे पुंसां सर्वैश्वर्यैककारणे। स्नात्वा नरस्ततो गच्छेदग्नितीर्थं द्विजोत्तमाः

śrīsūta uvāca lakṣmītīrthe śubhe puṁsāṁ sarvaiśvaryaikakāraṇe snātvā narastato gacchedagnitīrthaṁ dvijottamāḥ

श्रीसूत जी ने कहा - हे द्विजोत्तमो! मनुष्यों के सम्पूर्ण ऐश्वर्य के एकमात्र कारण-रूप शुभ लक्ष्मीतीर्थ में स्नान करके, फिर अग्नितीर्थ जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.3.22.2)

अग्नितीर्थं महापुण्यं महापातकनाशनम्। तीर्थानामुत्तमं तीर्थं सर्वाभीष्टैकसाधनम्। तत्र स्नायान्नरो भक्त्या स्वपापपरिशुद्धये

agnitīrthaṁ mahāpuṇyaṁ mahāpātakanāśanam tīrthānāmuttamaṁ tīrthaṁ sarvābhīṣṭaikasādhanam tatra snāyānnaro bhaktyā svapāpapariśuddhaye

अग्नितीर्थ महापुण्यमय, महापातकों का नाशक, तीर्थों में उत्तम तीर्थ, समस्त अभीष्टों का एकमात्र साधन है। मनुष्य को अपने पापों की शुद्धि के लिए वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.3.22.3)

ऋषय ऊचुः। अग्निर्तार्थमितिख्यातिः कथं तस्य मुनीश्वर।

ṛṣaya ūcuḥ agnirtārthamitikhyātiḥ kathaṁ tasya munīśvara

ऋषियों ने कहा - हे मुनीश्वर! यह अग्नितीर्थ नाम से कैसे प्रसिद्ध हुआ?

श्लोक 4 (skanda.3.22.4)

कुत्रैदमग्नितीर्थं च कीदृशं तस्य वैभवम्। एतन्नः श्रद्दधानानां विस्तराद्वक्तुमर्हसि

kutraidamagnitīrthaṁ ca kīdṛśaṁ tasya vaibhavam etannaḥ śraddadhānānāṁ vistarādvaktumarhasi

यह अग्नितीर्थ कहाँ है और उसकी महिमा कैसी है? श्रद्धावान् हम लोगों को यह विस्तार से बताने योग्य हैं आप।

श्लोक 5 (skanda.3.22.5)

श्रीसूत उवाच। सम्यक्पृष्टं हि युष्माभिः शृणुध्वं मुनिपुंगवाः। पुरा हि राघवो हत्वा रावणं सपरिच्छदम्

śrīsūta uvāca samyakpṛṣṭaṁ hi yuṣmābhiḥ śṛṇudhvaṁ munipuṁgavāḥ purā hi rāghavo hatvā rāvaṇaṁ saparicchadam

श्रीसूत जी ने कहा - हे मुनिपुंगवो! आप लोगों ने भली-भाँति पूछा है, सुनिए। पूर्वकाल में रघुनाथ ने रावण को उसके परिवार सहित मारकर,

श्लोक 6 (skanda.3.22.6)

स्थापयित्वा तु लंकायां भर्तारं च विभीषणम्। सीतासौमित्रिसंयुक्तो रामो दशरथात्मजः

sthāpayitvā tu laṁkāyāṁ bhartāraṁ ca vibhīṣaṇam sītāsaumitrisaṁyukto rāmo daśarathātmajaḥ

लंका में विभीषण को स्वामी स्थापित करके, सीता और सौमित्रि (लक्ष्मण) सहित दशरथ-पुत्र राम,

श्लोक 7 (skanda.3.22.7)

सिद्धचारणगंधवैर्देवैरप्सरसां गणैः। स्तूयमानो मुनिगणैः सत्याशीस्तीर्थकौतुकी

siddhacāraṇagaṁdhavairdevairapsarasāṁ gaṇaiḥ stūyamāno munigaṇaiḥ satyāśīstīrthakautukī

सिद्ध, चारण, गन्धर्व, देव और अप्सराओं के समूहों तथा मुनि-समूहों द्वारा स्तुत होते हुए, सत्य-आशीषों वाले तीर्थ-कौतुकी,

श्लोक 8 (skanda.3.22.8)

धारयँल्लीलया चापं रामोऽसह्यपराक्रमः। आत्मनः शुद्धिमाधातुं जानकीं शोधितु तथा

dhāraya~llīlayā cāpaṁ rāmo'sahyaparākramaḥ ātmanaḥ śuddhimādhātuṁ jānakīṁ śodhitu tathā

लीलापूर्वक धनुष धारण करते हुए, असह्य-पराक्रमी राम, अपनी शुद्धि स्थापित करने और वैसे ही जानकी को शुद्ध करने के लिए,

श्लोक 9 (skanda.3.22.9)

इंद्रादिदेववृन्दैश्च मुनिभिः पितृभिस्तथा। विभीषणेन सहितः सर्वेरपि च वानरैः

iṁdrādidevavṛndaiśca munibhiḥ pitṛbhistathā vibhīṣaṇena sahitaḥ sarverapi ca vānaraiḥ

इन्द्र आदि देव-समूहों, मुनियों, पितरों के साथ, तथा विभीषण और सभी वानरों सहित,

श्लोक 10 (skanda.3.22.10)

आययौ सेतुमार्गेण गंधमादनपर्वतम्। लक्ष्मीतीर्थतटे स्थित्वा जानकीशोधनाय सः

āyayau setumārgeṇa gaṁdhamādanaparvatam lakṣmītīrthataṭe sthitvā jānakīśodhanāya saḥ

सेतु-मार्ग से गन्धमादन पर्वत पर आए। लक्ष्मीतीर्थ के तट पर स्थित होकर, जानकी की शुद्धि के लिए उन्होंने,

श्लोक 11 (skanda.3.22.11)

अग्निमावाहयामास देवर्षिपितृसन्निधौ। अथोत्तस्थौ महांभोधेर्लक्ष्मीतीर्थाद्विदूरतः

agnimāvāhayāmāsa devarṣipitṛsannidhau athottasthau mahāṁbhodherlakṣmītīrthādvidūrataḥ

देवों, ऋषियों और पितरों की उपस्थिति में अग्नि का आवाहन किया। तब लक्ष्मीतीर्थ से बहुत दूर, महासमुद्र से,

श्लोक 12 (skanda.3.22.12)

पश्यत्सु सर्वलोकेषु लिहन्नंभांसि पावकः। आताम्रलोचनः पीतवासा धनुर्धरः

paśyatsu sarvalokeṣu lihannaṁbhāṁsi pāvakaḥ ātāmralocanaḥ pītavāsā dhanurdharaḥ

समस्त लोकों के देखते हुए, जल को चाटते हुए पावक (अग्नि) प्रकट हुए, ताम्र-नेत्र, पीतवस्त्रधारी, धनुर्धर,

श्लोक 13 (skanda.3.22.13)

सप्तभिश्चैव जिह्वाभिर्लेलिहानो दिशो दश। दृष्ट्वा रघुपतिं शूरं लीलामानुषरूपिणम्

saptabhiścaiva jihvābhirlelihāno diśo daśa dṛṣṭvā raghupatiṁ śūraṁ līlāmānuṣarūpiṇam

सात जिह्वाओं से दसों दिशाओं को चाटते हुए। लीलामय मनुष्य-रूपधारी वीर रघुपति को देखकर,

श्लोक 14 (skanda.3.22.14)

जगाद वचनं रम्यं जानकीशुद्धिकारणात्। रामराम महाबाहो राक्षसानां भयावह

jagāda vacanaṁ ramyaṁ jānakīśuddhikāraṇāt rāmarāma mahābāho rākṣasānāṁ bhayāvaha

उन्होंने जानकी की शुद्धि के लिए यह मनोहर वचन कहा - 'हे राम-राम, महाबाहो, राक्षसों के भयदायक!

श्लोक 15 (skanda.3.22.15)

पातिव्रत्येन जानक्या रावणं हतवान्भवान्। सत्यंसत्यं पुनः सत्यं नात्र कार्या विचारणा

pātivratyena jānakyā rāvaṇaṁ hatavānbhavān satyaṁsatyaṁ punaḥ satyaṁ nātra kāryā vicāraṇā

जानकी की पतिव्रता से ही आपने रावण को मारा है। सत्य है, सत्य है, फिर सत्य है - इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 16 (skanda.3.22.16)

कमलेयं जगन्माता लीलामानुषविग्रहा। देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी

kamaleyaṁ jaganmātā līlāmānuṣavigrahā devatve devadeheyaṁ manuṣyatve ca mānuṣī

यह कमला जगन्माता है, लीलामय मनुष्य-रूप धारण करने वाली; देवत्व में देव-देह और मनुष्यत्व में मानुषी है।

श्लोक 17 (skanda.3.22.17)

विष्णोर्देहानुरूपां वै करोत्येषात्मनस्तनुम्। यदायदा जगत्स्वामिन्देवदेव जनार्द्दन

viṣṇordehānurūpāṁ vai karotyeṣātmanastanum yadāyadā jagatsvāmindevadeva janārddana

वह विष्णु के देह के अनुरूप ही अपनी देह धारण करती है। हे जगत्स्वामी, हे देवदेव जनार्दन! जब-जब आप,

श्लोक 18 (skanda.3.22.18)

अवतारान्करोषि त्वं तदेयं त्वत्सहायिनी। यदा त्वं भार्गवो रामस्तदाभूद्धरणी त्वियम्

avatārānkaroṣi tvaṁ tadeyaṁ tvatsahāyinī yadā tvaṁ bhārgavo rāmastadābhūddharaṇī tviyam

अवतार लेते हैं, तब-तब यह आपकी सहायिका होती है। जब आप भार्गव राम थे, तब यह पृथ्वी हुई थी;

श्लोक 19 (skanda.3.22.19)

अधुना जानकी जाता भवित्री रुक्मिणी ततः। अन्येषु चावतारेषु विष्णोरेषा सहायिनी

adhunā jānakī jātā bhavitrī rukmiṇī tataḥ anyeṣu cāvatāreṣu viṣṇoreṣā sahāyinī

अभी यह जानकी हुई है, फिर रुक्मिणी होगी। अन्य अवतारों में भी यह विष्णु की सहायिका है।

श्लोक 20 (skanda.3.22.20)

तस्मामद्वचनादेनां प्रति गृह्णीष्व राघव। पावकस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा देवा महर्षयः

tasmāmadvacanādenāṁ prati gṛhṇīṣva rāghava pāvakasya tu tadvākyaṁ śrutvā devā maharṣayaḥ

इसलिए हे राघव! मेरे वचन से इसे स्वीकार कीजिए।' पावक के उस वचन को सुनकर देवगण, महर्षिगण,

श्लोक 21 (skanda.3.22.21)

विद्याधराश्च गंधर्वा मानवाः पन्नगास्तथा। अन्ये च भूतनिवहा रामं दशरथात्मजम्

vidyādharāśca gaṁdharvā mānavāḥ pannagāstathā anye ca bhūtanivahā rāmaṁ daśarathātmajam

विद्याधर, गन्धर्व, मानव, नाग तथा अन्य भूत-समूह, दशरथ-पुत्र राम की और

श्लोक 22 (skanda.3.22.22)

जानकीं मैथिलीं चैव प्रशशंसुः पुनःपुनः। रामोऽग्निवचनात्सीतां प्रतिजग्राह निर्मलाम्

jānakīṁ maithilīṁ caiva praśaśaṁsuḥ punaḥpunaḥ rāmo'gnivacanātsītāṁ pratijagrāha nirmalām

मैथिली जानकी की भी बार-बार प्रशंसा करने लगे। राम ने अग्नि के वचन से निर्मल सीता को पुनः स्वीकार किया।

श्लोक 23 (skanda.3.22.23)

एवं सीताविशुद्ध्यर्थं रामेणाक्लिष्टकर्मणा। आवाहने कृते वह्निर्लक्ष्मीतीर्थाद्विदूरतः

evaṁ sītāviśuddhyarthaṁ rāmeṇākliṣṭakarmaṇā āvāhane kṛte vahnirlakṣmītīrthādvidūrataḥ

इस प्रकार सीता की शुद्धि के लिए, अक्लिष्ट-कर्मा राम द्वारा आवाहन किए जाने पर, अग्नि लक्ष्मीतीर्थ से बहुत दूर,

श्लोक 24 (skanda.3.22.24)

यतः प्रदेशादुत्तस्थावंबुधेर्द्विजसत्तमाः। अग्नितीर्थं विजानीत तं प्रदेशमनुत्तमम्

yataḥ pradeśāduttasthāvaṁbudherdvijasattamāḥ agnitīrthaṁ vijānīta taṁ pradeśamanuttamam

हे द्विजसत्तमो! समुद्र के जिस स्थान से प्रकट हुए, उस उत्तम स्थान को जानो।

श्लोक 25 (skanda.3.22.25)

ततो विनिर्गमादग्नेरग्नितीर्थमितीर्यते। अत्र स्नात्वा नरो भक्त्या वह्नेस्तीर्थे विमुक्तिदे

tato vinirgamādagneragnitīrthamitīryate atra snātvā naro bhaktyā vahnestīrthe vimuktide

इसलिए अग्नि के प्राकट्य से ही वह अग्नितीर्थ कहलाया। यहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य, मुक्तिदायक उस अग्नि-तीर्थ में,

श्लोक 26 (skanda.3.22.26)

उपोष्य वेदविदुषो ब्राह्मणानपि भोजयेत्। तेभ्यो वस्त्रं धनं भूमिं दद्यात्कन्यां च भूषिताम्

upoṣya vedaviduṣo brāhmaṇānapi bhojayet tebhyo vastraṁ dhanaṁ bhūmiṁ dadyātkanyāṁ ca bhūṣitām

उपवास करके वेदज्ञ ब्राह्मणों को भोजन कराए; उन्हें वस्त्र, धन, भूमि और अलंकृत कन्या का दान करे।

श्लोक 27 (skanda.3.22.27)

सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुसायुज्यमाप्नुयात्। अग्नितीर्थस्य कूलेस्मिन्नन्नदानं विशिष्यते

sarvapāpavinirmukto viṣṇusāyujyamāpnuyāt agnitīrthasya kūlesminnannadānaṁ viśiṣyate

वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है। इस अग्नितीर्थ के तट पर अन्न-दान विशेष महत्व रखता है।

श्लोक 28 (skanda.3.22.28)

अग्नितीर्थसमं तीर्थं न भूतं न भविष्यति। दुष्पण्योपि महापापो यत्र स्नानात्पिशाचताम्

agnitīrthasamaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati duṣpaṇyopi mahāpāpo yatra snānātpiśācatām

अग्नितीर्थ के समान न कोई तीर्थ हुआ है, न होगा। महापापी दुष्पण्य भी जहाँ स्नान करके पिशाचत्व को,

श्लोक 29 (skanda.3.22.29)

परित्यज्य महाघोरां दिव्यं रूपमवाप्तवान्। पशुमान्नाम वैश्योऽभूत्पुरा पाटलिपुत्रके

parityajya mahāghorāṁ divyaṁ rūpamavāptavān paśumānnāma vaiśyo'bhūtpurā pāṭaliputrake

त्यागकर, उस महाघोर पिशाचत्व को छोड़कर, दिव्य रूप प्राप्त कर लिया था। पूर्वकाल में पाटलिपुत्र में पशुमान् नामक एक वैश्य था,

श्लोक 30 (skanda.3.22.30)

स वै धर्मपरो नित्यं ब्राह्मणाराधने रतः। कृषिं निरंतरं कुर्वन्गो रक्षां चैव सर्वदा

sa vai dharmaparo nityaṁ brāhmaṇārādhane rataḥ kṛṣiṁ niraṁtaraṁ kurvango rakṣāṁ caiva sarvadā

जो सदा धर्मपरायण, ब्राह्मणों की आराधना में रत, निरन्तर खेती करते हुए और सदा गौओं की रक्षा करते हुए,

श्लोक 31 (skanda.3.22.31)

पण्यवीथ्यां च विक्रीणन्कांचनादीनि धर्मतः। पशुमन्नामधेयस्य वणिक्छ्रेष्ठस्य तस्य वै

paṇyavīthyāṁ ca vikrīṇankāṁcanādīni dharmataḥ paśumannāmadheyasya vaṇikchreṣṭhasya tasya vai

तथा पण्य-वीथी में धर्मानुसार सोना आदि बेचते हुए रहता था। उस वणिकों में श्रेष्ठ पशुमान् नामक की,

श्लोक 32 (skanda.3.22.32)

बभूव भार्यात्रितयं पतिशुश्रूषणे रतम्। ज्येष्ठा त्रीन्सुषुवे पुत्रान्वैश्यवंशविवर्द्धनान्

babhūva bhāryātritayaṁ patiśuśrūṣaṇe ratam jyeṣṭhā trīnsuṣuve putrānvaiśyavaṁśavivarddhanān

पति-सेवा में रत तीन पत्नियाँ थीं। ज्येष्ठा ने वैश्य-वंश को बढ़ाने वाले तीन पुत्र जन्मे -

श्लोक 33 (skanda.3.22.33)

सुपण्यं पण्यवतं च चारुपण्यं तथैव च। मध्यमा सुषुते पुत्रौ सुकोश बहुकोशकौ

supaṇyaṁ paṇyavataṁ ca cārupaṇyaṁ tathaiva ca madhyamā suṣute putrau sukośa bahukośakau

सुपण्य, पण्यवान् और वैसे ही चारुपण्य। मध्यमा ने दो पुत्र जन्मे - सुकोश और बहुकोश।

श्लोक 34 (skanda.3.22.34)

तृतीयायां त्रयः पुत्रास्तस्य वैश्यस्य जज्ञिरे। महापण्यो महाकोशो दुष्पण्य इति विश्रुताः

tṛtīyāyāṁ trayaḥ putrāstasya vaiśyasya jajñire mahāpaṇyo mahākośo duṣpaṇya iti viśrutāḥ

तीसरी पत्नी से उस वैश्य के तीन पुत्र उत्पन्न हुए - महापण्य, महाकोश और दुष्पण्य नाम से विख्यात।

श्लोक 35 (skanda.3.22.35)

एवं पशुमतस्तस्य वैश्यस्य द्विजसत्तमाः। बभूवुरष्टौ तनयास्तासु स्त्रीषु तिसृष्वपि

evaṁ paśumatastasya vaiśyasya dvijasattamāḥ babhūvuraṣṭau tanayāstāsu strīṣu tisṛṣvapi

हे द्विजसत्तमो! इस प्रकार उस वैश्य पशुमान् के इन तीनों स्त्रियों से आठ पुत्र हुए।

श्लोक 36 (skanda.3.22.36)

ते सुपण्यमुखाः सर्वे पुत्रा ववृधिरे क्रमात। धूलिकेलिं वितन्वन्तः पितरौ तोषयंति ते

te supaṇyamukhāḥ sarve putrā vavṛdhire kramāta dhūlikeliṁ vitanvantaḥ pitarau toṣayaṁti te

सुपण्य आदि वे सभी पुत्र क्रमशः बड़े होते गए, धूल में खेलते हुए वे माता-पिता को संतुष्ट करते थे।

श्लोक 37 (skanda.3.22.37)

पंचहायनतां प्राप्ताः क्रमात्ते वैश्यनंदनाः। पशुमानपि वैश्येंद्रः सर्वानपि च तान्सुतान्

paṁcahāyanatāṁ prāptāḥ kramātte vaiśyanaṁdanāḥ paśumānapi vaiśyeṁdraḥ sarvānapi ca tānsutān

वे वैश्य-पुत्र क्रमशः पाँच वर्ष की आयु को प्राप्त हुए। वैश्यों में श्रेष्ठ पशुमान् ने भी उन सभी पुत्रों को,

श्लोक 38 (skanda.3.22.38)

बाल्यमारभ्य सततं स्वकृत्येषु व्यशिक्षयत्। कृषिगोत्राणवाणिज्यकर्मसु क्रमशिक्षिताः

bālyamārabhya satataṁ svakṛtyeṣu vyaśikṣayat kṛṣigotrāṇavāṇijyakarmasu kramaśikṣitāḥ

बचपन से ही निरन्तर अपने-अपने कार्यों में शिक्षित किया। कृषि, गौ-पालन और वाणिज्य के कर्मों में क्रम से शिक्षित,

श्लोक 39 (skanda.3.22.39)

सुपण्यमुख्याः सप्तैव पितृवाक्यमशृण्वत। पशुमान्वक्ति यत्कार्यं तत्क्षणान्निरवर्तयन्

supaṇyamukhyāḥ saptaiva pitṛvākyamaśṛṇvata paśumānvakti yatkāryaṁ tatkṣaṇānniravartayan

सुपण्य आदि सातों पुत्र पिता के वचन को सुनते थे। पशुमान् जो कार्य कहते, वे उसी क्षण उसे पूरा कर देते।

श्लोक 40 (skanda.3.22.40)

नैपुण्यं प्रापुरत्यंतं ते सुवर्णक्रियास्वपि। दुष्पण्यस्त्वष्टमः पुत्रो बाल्यमारभ्य संततम्

naipuṇyaṁ prāpuratyaṁtaṁ te suvarṇakriyāsvapi duṣpaṇyastvaṣṭamaḥ putro bālyamārabhya saṁtatam

वे स्वर्ण-कार्यों में भी अत्यन्त निपुणता प्राप्त कर चुके थे। किन्तु आठवाँ पुत्र दुष्पण्य बचपन से ही निरन्तर,

श्लोक 41 (skanda.3.22.41)

दुर्मार्गनिरतो भूत्वा नाशृणोत्पितृभाषितम्। धूलिकेलिं समारभ्य दुर्मार्गनिरतोऽभवत्

durmārganirato bhūtvā nāśṛṇotpitṛbhāṣitam dhūlikeliṁ samārabhya durmārganirato'bhavat

दुर्मार्ग में रत होकर पिता के कहे को नहीं सुनता था। धूल में खेलने से ही आरम्भ करके वह दुर्मार्ग में रत हो गया था।

श्लोक 42 (skanda.3.22.42)

स बाल एव सन्पुत्रो बालानन्यानबाधत। दुष्कर्मनिरतं दृष्ट्वा तं पिता पशुमांस्तथा

sa bāla eva sanputro bālānanyānabādhata duṣkarmanirataṁ dṛṣṭvā taṁ pitā paśumāṁstathā

वह बालक होते हुए भी अन्य बच्चों को सताता था। उस दुष्कर्म में रत उसे देखकर पिता पशुमान् ने भी,

श्लोक 43 (skanda.3.22.43)

उपेक्षामेव कृतवान्बालिशोऽयमितीरयन्। अथाष्टावपि वैश्यस्य प्रापुर्यौवनमात्मजाः

upekṣāmeva kṛtavānbāliśo'yamitīrayan athāṣṭāvapi vaiśyasya prāpuryauvanamātmajāḥ

'यह तो बालिश है' कहकर उपेक्षा ही कर दी। फिर वैश्य के सभी आठों पुत्र यौवन को प्राप्त हुए।

श्लोक 44 (skanda.3.22.44)

ततोऽयमष्टमः पुत्रो दुष्पण्यो बलिनां वरः। गृहीत्वा पाणिषु गले बालान्नगरवर्तिनः

tato'yamaṣṭamaḥ putro duṣpaṇyo balināṁ varaḥ gṛhītvā pāṇiṣu gale bālānnagaravartinaḥ

तब यह आठवाँ पुत्र दुष्पण्य, बलवानों में श्रेष्ठ, नगर के बालकों को हाथ और गले से पकड़कर,

श्लोक 45 (skanda.3.22.45)

निचिक्षेप स कूपेषु सरित्सु च सरःस्वपि। न कोऽपि तस्य जानाति दुश्चरित्रमिदं जनः

nicikṣepa sa kūpeṣu saritsu ca saraḥsvapi na ko'pi tasya jānāti duścaritramidaṁ janaḥ

उन्हें कुओं में, नदियों में और सरोवरों में भी फेंक देता था। यह उसका दुश्चरित्र कोई भी व्यक्ति नहीं जानता था।

श्लोक 46 (skanda.3.22.46)

यावन्म्रियंते ते बालास्तावन्निक्षिप्तवाञ्जले। तेषां मृतानां बालानां पितरो मातरस्तथा

yāvanmriyaṁte te bālāstāvannikṣiptavāñjale teṣāṁ mṛtānāṁ bālānāṁ pitaro mātarastathā

जब तक वे बालक मरते नहीं थे, तब तक वह उन्हें जल में डाले रखता था। उन मृत बालकों के माता-पिता,

श्लोक 47 (skanda.3.22.47)

गवेषयंति तान्सर्वान्नगरेषु हि सर्वशः। तान् दृष्ट्वा च मृतान्पुत्रान्केवलं प्रारुदञ्जनाः

gaveṣayaṁti tānsarvānnagareṣu hi sarvaśaḥ tān dṛṣṭvā ca mṛtānputrānkevalaṁ prārudañjanāḥ

उन सबको नगर में सब जगह ढूँढते थे। उन मृत पुत्रों को देखकर लोग केवल रोते रहते थे।

श्लोक 48 (skanda.3.22.48)

जलेष्वथ शवान्दृष्ट्वा जनाश्चक्रुर्यथोचितम्। एवं प्रतिदिनं बालान्दुष्पण्यो मारयन्पुरे

jaleṣvatha śavāndṛṣṭvā janāścakruryathocitam evaṁ pratidinaṁ bālānduṣpaṇyo mārayanpure

जल में शवों को देखकर लोगों ने यथोचित संस्कार किया। इस प्रकार दुष्पण्य प्रतिदिन नगर में बालकों को मारता रहा,

श्लोक 49 (skanda.3.22.49)

जनैरप्यपरिज्ञातश्चिरमेवमवर्तत। म्रियमाणेषु बालेषु वैश्यपुत्रस्य कर्मणा

janairapyaparijñātaściramevamavartata mriyamāṇeṣu bāleṣu vaiśyaputrasya karmaṇā

लोगों द्वारा भी अज्ञात होकर यह दीर्घकाल तक चलता रहा। वैश्य-पुत्र के इस कर्म से बालकों के मरते रहने से,

श्लोक 50 (skanda.3.22.50)

प्रजानां वृद्धिराहित्याच्छून्यप्रायमभूत्पुरम्। ततः समेत्य पौरास्तद्वृत्तं राज्ञे न्यवेदयन्

prajānāṁ vṛddhirāhityācchūnyaprāyamabhūtpuram tataḥ sametya paurāstadvṛttaṁ rājñe nyavedayan

प्रजा की वृद्धि न होने के कारण नगर प्रायः शून्य हो गया। तब नगरवासियों ने एकत्र होकर वह वृत्तान्त राजा को बताया।

श्लोक 51 (skanda.3.22.51)

श्रुत्वा नृपस्तद्वचनमाहूय ग्रामपालकान्। कारणं बालमरणे चिंत्यतामिति सोऽन्वशात्

śrutvā nṛpastadvacanamāhūya grāmapālakān kāraṇaṁ bālamaraṇe ciṁtyatāmiti so'nvaśāt

राजा ने वह वचन सुनकर ग्राम-रक्षकों को बुलाकर, 'बालकों की मृत्यु के कारण का पता लगाया जाए' - ऐसी आज्ञा दी।

श्लोक 52 (skanda.3.22.52)

ग्रामपालास्तथेत्युक्त्वा तत्र तत्र व्यवस्थिताः। सम्यग्गवेषयामासुः कारणं बालमारणे

grāmapālāstathetyuktvā tatra tatra vyavasthitāḥ samyaggaveṣayāmāsuḥ kāraṇaṁ bālamāraṇe

ग्राम-रक्षकों ने 'ऐसा ही होगा' कहकर, वहाँ-वहाँ नियुक्त होकर, बालकों की मृत्यु के कारण को भली-भाँति ढूँढा।

श्लोक 53 (skanda.3.22.53)

ते वै गवेषंयतोऽपि नाविंदन्बालमारकम्। ते पुनर्नृपमासाद्य भीता वाक्यमथाब्रुवन्

te vai gaveṣaṁyato'pi nāviṁdanbālamārakam te punarnṛpamāsādya bhītā vākyamathābruvan

ढूँढते हुए भी वे बालकों के मारने वाले को नहीं पा सके। वे भयभीत होकर पुनः राजा के पास जाकर यह वचन बोले -

श्लोक 54 (skanda.3.22.54)

गवेषयंतोऽपि वयं तन्न विंदामहे नृप। यो बालान्नगरे स्थित्वा सततं मारयत्यपि

gaveṣayaṁto'pi vayaṁ tanna viṁdāmahe nṛpa yo bālānnagare sthitvā satataṁ mārayatyapi

'हे राजन्! ढूँढते हुए भी हम उसे नहीं पाते, जो नगर में रहकर निरन्तर बालकों को मार रहा है।'

श्लोक 55 (skanda.3.22.55)

पुनश्च नागराः सर्वे राजानं प्राप्य दुःखिताः। पुनः प्रजानां मरणमब्रुवन्वाष्पसंकुलाः

punaśca nāgarāḥ sarve rājānaṁ prāpya duḥkhitāḥ punaḥ prajānāṁ maraṇamabruvanvāṣpasaṁkulāḥ

फिर सभी नगरवासी दुःखी होकर पुनः राजा के पास जाकर, आँसुओं से भरे हुए, फिर प्रजा की मृत्यु की बात कहने लगे।

श्लोक 56 (skanda.3.22.56)

राजा तत्कारणाज्ञानात्तूष्णीमास्ते विचिंत्य तु। कदाचिद्वैश्यपुत्रोयं पंचभिर्बालकैः सह

rājā tatkāraṇājñānāttūṣṇīmāste viciṁtya tu kadācidvaiśyaputroyaṁ paṁcabhirbālakaiḥ saha

राजा उस कारण के अज्ञान से चुप होकर विचार करने लगे। एक बार यह वैश्य-पुत्र पाँच बालकों के साथ,

श्लोक 57 (skanda.3.22.57)

तटाकांतिकमापेदे पंकजाहरणच्छलात्। बलाद्गृहीत्वा तान्बालान्दुष्पण्यः क्रोशतस्तदा

taṭākāṁtikamāpede paṁkajāharaṇacchalāt balādgṛhītvā tānbālānduṣpaṇyaḥ krośatastadā

कमल तोड़ने के बहाने तालाब के समीप गया। उन रोते हुए बालकों को बलपूर्वक पकड़कर, दुष्पण्य ने तब,

श्लोक 58 (skanda.3.22.58)

क्रूरात्मा मज्जयामास कंठदघ्ने सरोजले। मृतान्मत्वा च ताञ्छीघ्रं दुष्पण्यः स्वगृहं ययौ

krūrātmā majjayāmāsa kaṁṭhadaghne sarojale mṛtānmatvā ca tāñchīghraṁ duṣpaṇyaḥ svagṛhaṁ yayau

क्रूर हृदय से उन्हें कण्ठ तक सरोवर के जल में डुबो दिया। उन्हें मृत मानकर दुष्पण्य शीघ्र अपने घर चला गया।

श्लोक 59 (skanda.3.22.59)

पञ्चानां पितरस्तेषां मार्गयंतः सुतान्पुरे। तेषु वै मार्गमाणेषु पंच तेनातिबालकाः

pañcānāṁ pitarasteṣāṁ mārgayaṁtaḥ sutānpure teṣu vai mārgamāṇeṣu paṁca tenātibālakāḥ

उन पाँचों के पिता नगर में अपने पुत्रों को ढूँढ रहे थे। उनके इस प्रकार ढूँढते समय, वे अत्यन्त छोटे पाँचों बालक,

श्लोक 60 (skanda.3.22.60)

निक्षिप्ता अपि तोयेषु नाम्रियंत यदृच्छया। ते शनैः कूलमासाद्य पंचापि क्लिन्नमौलयः

nikṣiptā api toyeṣu nāmriyaṁta yadṛcchayā te śanaiḥ kūlamāsādya paṁcāpi klinnamaulayaḥ

जल में डाले जाने पर भी, संयोगवश नहीं मरे। वे धीरे-धीरे तट पर पहुँचकर, पाँचों बाल गीले होने पर भी,

श्लोक 61 (skanda.3.22.61)

अशक्ता नगरं गंतुं बाल्यात्तत्रैव बभ्रमुः। दूरादुच्चार्यमाणानि स्वनामानि स्वबंधुभिः

aśaktā nagaraṁ gaṁtuṁ bālyāttatraiva babhramuḥ dūrāduccāryamāṇāni svanāmāni svabaṁdhubhiḥ

बालक होने के कारण नगर जाने में असमर्थ, वहीं भटकते रहे। दूर से अपने बन्धुओं द्वारा पुकारे जाते अपने नामों को,

श्लोक 62 (skanda.3.22.62)

श्रुत्वा पंचापि ते बालाः प्रतिशब्दमकुर्वत। ततस्तत्पितरः श्रुत्वा तत्रागत्यसरस्तटे

śrutvā paṁcāpi te bālāḥ pratiśabdamakurvata tatastatpitaraḥ śrutvā tatrāgatyasarastaṭe

सुनकर वे पाँचों बालक प्रतिध्वनि करने लगे। तब उनके पिता उसे सुनकर वहाँ सरोवर के तट पर आकर,

श्लोक 63 (skanda.3.22.63)

पुत्रान्दृष्ट्वा तु सप्राणान्प्रहर्षमतुलं गताः। किमेतदिति पित्राद्यैः पृष्टास्ते बालकास्तदा

putrāndṛṣṭvā tu saprāṇānpraharṣamatulaṁ gatāḥ kimetaditi pitrādyaiḥ pṛṣṭāste bālakāstadā

अपने पुत्रों को जीवित देखकर अतुल हर्ष को प्राप्त हुए। पिता आदि द्वारा 'यह क्या हुआ' पूछे जाने पर, उन बालकों ने,

श्लोक 64 (skanda.3.22.64)

दुष्पण्यस्याथ दुष्कृत्यं बन्धुभ्यस्ते न्यवेदयन्। ततो विदितवृत्तांता राजानं प्राप्य नागराः

duṣpaṇyasyātha duṣkṛtyaṁ bandhubhyaste nyavedayan tato viditavṛttāṁtā rājānaṁ prāpya nāgarāḥ

दुष्पण्य के दुष्कृत्य को अपने बन्धुओं को बता दिया। तब वृत्तान्त को जानकर नगरवासियों ने राजा के पास जाकर,

श्लोक 65 (skanda.3.22.65)

पंचभिः कथितं वृत्तं दुष्पण्यस्य न्यवेदयन्। ततो राजा समाहूय पशुमंतं वणिग्वरम्। पौरेष्वपि च शृण्वत्सु वाक्यमेतदभाषत

paṁcabhiḥ kathitaṁ vṛttaṁ duṣpaṇyasya nyavedayan tato rājā samāhūya paśumaṁtaṁ vaṇigvaram paureṣvapi ca śṛṇvatsu vākyametadabhāṣata

उन पाँचों द्वारा बताए दुष्पण्य के वृत्तान्त की सूचना दी। तब राजा ने वणिक्-श्रेष्ठ पशुमान् को बुलाकर, नगरवासियों के सुनते हुए भी यह वचन कहा -

श्लोक 66 (skanda.3.22.66)

राजोवाच। दुष्पण्यनामा पशुमन्बहुप्रजमिदं पुरम्

rājovāca duṣpaṇyanāmā paśumanbahuprajamidaṁ puram

राजा ने कहा - 'हे पशुमन्! इस बहुप्रजा वाले नगर को दुष्पण्य नामक तुम्हारे पुत्र ने,

श्लोक 67 (skanda.3.22.67)

शून्यप्रायं कृतं पश्य त्वत्पुत्रेण दुरात्मना। इदानीं बालिशानेतान्मज्जयामास वै जले

śūnyaprāyaṁ kṛtaṁ paśya tvatputreṇa durātmanā idānīṁ bāliśānetānmajjayāmāsa vai jale

दुरात्मा होकर लगभग शून्य कर दिया है, देखो। अभी उसने इन भोले बालकों को जल में डुबो दिया,

श्लोक 68 (skanda.3.22.68)

यदृच्छया च सप्राणाः पुनरप्यागताः पुरम्। अस्मिन्नित्थं गते कार्ये किं कर्तव्यं वदाधुना

yadṛcchayā ca saprāṇāḥ punarapyāgatāḥ puram asminnitthaṁ gate kārye kiṁ kartavyaṁ vadādhunā

और वे संयोगवश जीवित होकर पुनः नगर में लौट आए हैं। यह कार्य इस प्रकार हो जाने पर, अब क्या करना चाहिए, यह बताओ।

श्लोक 69 (skanda.3.22.69)

अद्य त्वामेव पृच्छामि यतस्त्वं धर्मतत्परः। इत्युक्तः पशुमान्राज्ञा धर्मज्ञो युक्तमब्रवीत्

adya tvāmeva pṛcchāmi yatastvaṁ dharmatatparaḥ ityuktaḥ paśumānrājñā dharmajño yuktamabravīt

मैं आज तुम्हीं से पूछता हूँ, क्योंकि तुम धर्मपरायण हो।' राजा द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर धर्मज्ञ पशुमान् ने उचित वचन कहा -

श्लोक 70 (skanda.3.22.70)

पशुमानुवाच। पुरं निःशेषितं येन वधमेवायमर्हति। न ह्यत्र विषये किंचित्प्रष्टव्यं विद्यते नृप

paśumānuvāca puraṁ niḥśeṣitaṁ yena vadhamevāyamarhati na hyatra viṣaye kiṁcitpraṣṭavyaṁ vidyate nṛpa

पशुमान् ने कहा - 'जिससे नगर को शून्य कर दिया गया, वह वध के ही योग्य है। हे राजन्! इस विषय में कुछ भी पूछने योग्य नहीं है।

श्लोक 71 (skanda.3.22.71)

न ह्ययं मम पुत्रः स्याच्छत्रुरेवातिपापकृत्। न ह्यस्य निष्कृतिं पश्ये येन निःशेषितं पुरम्

na hyayaṁ mama putraḥ syācchatrurevātipāpakṛt na hyasya niṣkṛtiṁ paśye yena niḥśeṣitaṁ puram

वह मेरा पुत्र नहीं है, वह तो अत्यन्त पापकर्मी शत्रु ही है। मुझे इसका कोई प्रायश्चित नहीं दिखता, जिसने नगर को शून्य कर दिया।

श्लोक 72 (skanda.3.22.72)

वध्यतामेव दुष्टात्मा सत्यमेव ब्रवीम्यहम्। श्रुत्वा पशुमतो वाक्यं नागराः सर्व एव हि

vadhyatāmeva duṣṭātmā satyameva bravīmyaham śrutvā paśumato vākyaṁ nāgarāḥ sarva eva hi

उस दुष्टात्मा का वध ही किया जाए - मैं केवल सत्य कह रहा हूँ।' पशुमान् का वचन सुनकर सभी नगरवासी,

श्लोक 73 (skanda.3.22.73)

वणिग्वरं श्लाघमाना राजानमिदमूचिरे। न वध्यतामयं दुष्टस्तूष्णीं निर्वास्यतां पुरात्

vaṇigvaraṁ ślāghamānā rājānamidamūcire na vadhyatāmayaṁ duṣṭastūṣṇīṁ nirvāsyatāṁ purāt

वणिक्-श्रेष्ठ की प्रशंसा करते हुए राजा से यह बोले - 'इस दुष्ट का वध न किया जाए, इसे चुपचाप नगर से निर्वासित कर दिया जाए।'

श्लोक 74 (skanda.3.22.74)

ततः स राजा दुष्पण्यं समाहूयेदमब्रवीत्। अस्माद्देशाद्भवाञ्छीघ्रं दुष्टात्मन्गच्छ सांप्रतम्

tataḥ sa rājā duṣpaṇyaṁ samāhūyedamabravīt asmāddeśādbhavāñchīghraṁ duṣṭātmangaccha sāṁpratam

तब उस राजा ने दुष्पण्य को बुलाकर यह कहा - 'हे दुष्टात्मन्! इस देश से तुम अभी शीघ्र चले जाओ।

श्लोक 75 (skanda.3.22.75)

यदि तिष्ठेस्त्वमत्रैव दण्डयेयं वधेन वै। इति राज्ञा विनिर्भर्त्स्य दूतैर्निर्वासितः पुरात्

yadi tiṣṭhestvamatraiva daṇḍayeyaṁ vadhena vai iti rājñā vinirbhartsya dūtairnirvāsitaḥ purāt

यदि तुम यहीं रहोगे, तो मैं तुम्हें वध का दण्ड दूँगा।' इस प्रकार राजा द्वारा तिरस्कृत होकर दूतों द्वारा नगर से निर्वासित कर दिया गया।

श्लोक 76 (skanda.3.22.76)

दुष्पण्यस्त्वथ तं देशं परित्यज्य भयान्वितः। मुनिमंडलसंबाधं वनमेव ययौ तदा

duṣpaṇyastvatha taṁ deśaṁ parityajya bhayānvitaḥ munimaṁḍalasaṁbādhaṁ vanameva yayau tadā

दुष्पण्य तब उस देश को छोड़कर, भय से युक्त होकर, मुनियों के समूह से भरे एक वन में ही गया।

श्लोक 77 (skanda.3.22.77)

तत्राप्येकं मुनिसुतं स तोयेषु न्यमज्जयत्। केल्यर्थमागता दृष्ट्वा मुनिपुत्रा मृतं शिशुम्

tatrāpyekaṁ munisutaṁ sa toyeṣu nyamajjayat kelyarthamāgatā dṛṣṭvā muniputrā mṛtaṁ śiśum

वहाँ भी उसने एक मुनि-पुत्र को जल में डुबो दिया। खेलने के लिए आए मुनि-पुत्रों ने मृत बालक को देखकर,

श्लोक 78 (skanda.3.22.78)

तत्पित्रे कथयामासुरभ्येत्य भृशदुःखिताः। तत उग्रश्रवाः श्रुत्वा तेभ्यः पुत्रं जले मृतम्

tatpitre kathayāmāsurabhyetya bhṛśaduḥkhitāḥ tata ugraśravāḥ śrutvā tebhyaḥ putraṁ jale mṛtam

अत्यन्त दुःखी होकर उसके पिता के पास जाकर यह बता दिया। तब उग्रश्रवा ने उनसे अपने पुत्र के जल में मरने की बात सुनकर,

श्लोक 79 (skanda.3.22.79)

तपोमहिम्ना दुष्प ण्यचरितं तदमन्यत। उग्रश्रवाः शशापैनं दुष्पण्यं वैश्यनंदनम्

tapomahimnā duṣpa ṇyacaritaṁ tadamanyata ugraśravāḥ śaśāpainaṁ duṣpaṇyaṁ vaiśyanaṁdanam

तप के प्रभाव से यह जान लिया कि यह दुष्पण्य का ही कर्म है। उग्रश्रवा ने उस वैश्य-नन्दन दुष्पण्य को शाप दिया -

श्लोक 80 (skanda.3.22.80)

उग्रश्रवा उवाच। मत्सुतं पयसि क्षिप्य यत्त्वं मारितवानसि। तवापि मरणं भूयाज्जल एव निमज्जनात्

ugraśravā uvāca matsutaṁ payasi kṣipya yattvaṁ māritavānasi tavāpi maraṇaṁ bhūyājjala eva nimajjanāt

उग्रश्रवा ने कहा - 'जिस प्रकार तुमने मेरे पुत्र को जल में फेंककर मारा है, उसी प्रकार तुम्हारी भी मृत्यु जल में डूबने से ही हो।

श्लोक 81 (skanda.3.22.81)

मृतश्च सुचिरं कालं पिशाचस्त्वं भविष्यसि। इति शापे श्रुते सद्यो दुष्पण्यः खिन्नमानसः

mṛtaśca suciraṁ kālaṁ piśācastvaṁ bhaviṣyasi iti śāpe śrute sadyo duṣpaṇyaḥ khinnamānasaḥ

और मरकर तुम बहुत लंबे समय तक पिशाच बनोगे।' यह शाप सुनते ही दुष्पण्य दुःखी मन से,

श्लोक 82 (skanda.3.22.82)

तद्वै वनं परित्यज्य घोरमन्यद्वनं ययौ। सिंहादिक्रूरसत्वाढ्यं तस्मिन्प्राप्ते वनांतरम्

tadvai vanaṁ parityajya ghoramanyadvanaṁ yayau siṁhādikrūrasatvāḍhyaṁ tasminprāpte vanāṁtaram

उस वन को छोड़कर एक अन्य घोर वन को गया। सिंह आदि क्रूर जीवों से भरे उस वनान्तर में पहुँचने पर,

श्लोक 83 (skanda.3.22.83)

पांसुवर्षं मह्द्वर्षन्वृक्षानामोटय न्मुहुः। वज्रघातसमस्पर्शो ववौ झंझानिलो महान्

pāṁsuvarṣaṁ mahdvarṣanvṛkṣānāmoṭaya nmuhuḥ vajraghātasamasparśo vavau jhaṁjhānilo mahān

धूल की बड़ी वर्षा होने लगी, जो बार-बार वृक्षों को तोड़ती थी; वज्र के आघात जैसी स्पर्श वाली महाझंझावाती वायु बहने लगी।

श्लोक 84 (skanda.3.22.84)

वेगेन गात्रं भिंदन्ती वृष्टिश्चासीत्सुदुःसहा। तद्दृष्ट्वा स तु दुष्पण्यश्चिंतयन्भृशदुः खितः

vegena gātraṁ bhiṁdantī vṛṣṭiścāsītsuduḥsahā taddṛṣṭvā sa tu duṣpaṇyaściṁtayanbhṛśaduḥ khitaḥ

वेग से शरीर को भेदती हुई अत्यन्त असह्य वर्षा हुई। यह देखकर वह दुष्पण्य अत्यन्त दुःखी होकर सोचते हुए,

श्लोक 85 (skanda.3.22.85)

मृतं शुष्कं महाकायं गजमेकमपश्यत। महावातं महावर्षं तदा सोढुमशक्नुवन्

mṛtaṁ śuṣkaṁ mahākāyaṁ gajamekamapaśyata mahāvātaṁ mahāvarṣaṁ tadā soḍhumaśaknuvan

एक मृत, सूखे, विशाल हाथी को देखा। उस महावायु और महावर्षा को सहन करने में असमर्थ होकर,

श्लोक 86 (skanda.3.22.86)

गजास्यविवरेणैव विवेशोदरगह्वरम्। तस्मिन्प्रविष्टमात्रे तु वृष्टिरासीत्सुभूयसी

gajāsyavivareṇaiva viveśodaragahvaram tasminpraviṣṭamātre tu vṛṣṭirāsītsubhūyasī

वह हाथी के मुँह के छिद्र से ही उसके उदर की गुहा में घुस गया। उसके प्रविष्ट होते ही वर्षा अत्यन्त अधिक हो गई।

श्लोक 87 (skanda.3.22.87)

ततो वर्षजलैः सर्वैः प्रवाहः सुमहानभूत्। स प्रवाहो वने तस्मिन्नदी काचिदजायत

tato varṣajalaiḥ sarvaiḥ pravāhaḥ sumahānabhūt sa pravāho vane tasminnadī kācidajāyata

फिर उन सभी वर्षा-जलों से एक अत्यन्त बड़ा प्रवाह बना; उस वन में वह प्रवाह एक नदी-सी बन गई।

श्लोक 88 (skanda.3.22.88)

अथ तैर्वर्षसलिलैः स गजः पूरितोदरः। प्लवमानो महापूरे नीरंध्रः समजायत

atha tairvarṣasalilaiḥ sa gajaḥ pūritodaraḥ plavamāno mahāpūre nīraṁdhraḥ samajāyata

तब उन वर्षा-जलों से उदर भरा हुआ वह हाथी, महाबाढ़ में तैरता हुआ, बिना किसी छिद्र वाला हो गया।

श्लोक 89 (skanda.3.22.89)

ततो निर्विवरस्यास्य जलपूर्णोदरस्य च। गजस्य जठरात्सोऽयं निर्गंतु न शशाक ह

tato nirvivarasyāsya jalapūrṇodarasya ca gajasya jaṭharātso'yaṁ nirgaṁtu na śaśāka ha

तब उस छिद्ररहित, जल से भरे उदर वाले हाथी के पेट से वह बाहर नहीं निकल सका।

श्लोक 90 (skanda.3.22.90)

ततश्च वृष्टितोयानां प्रवाहो भीमवेगवान्। उदरस्थितदुष्पण्यं समुद्रं प्रापयद्गजम्

tataśca vṛṣṭitoyānāṁ pravāho bhīmavegavān udarasthitaduṣpaṇyaṁ samudraṁ prāpayadgajam

फिर वर्षा-जल का वह भयानक वेगवान् प्रवाह, उदर में स्थित दुष्पण्य सहित उस हाथी को समुद्र तक ले गया।

श्लोक 91 (skanda.3.22.91)

दुष्पण्यः सलिले मग्नः क्षणात्प्राणैर्व्ययुज्यत। मृत एव स दुष्पण्यः पिशाचत्वमवाप्तवान्

duṣpaṇyaḥ salile magnaḥ kṣaṇātprāṇairvyayujyata mṛta eva sa duṣpaṇyaḥ piśācatvamavāptavān

दुष्पण्य जल में डूबा हुआ क्षणभर में प्राणों से वियुक्त हो गया। मरते ही वह दुष्पण्य पिशाचत्व को प्राप्त हो गया।

श्लोक 92 (skanda.3.22.92)

पीडितः क्षुत्पिपासाभ्यां दुर्गमं वनमाश्रितः। घोरेषु घर्मकालेषु समाक्रोशन्भयानकम्

pīḍitaḥ kṣutpipāsābhyāṁ durgamaṁ vanamāśritaḥ ghoreṣu gharmakāleṣu samākrośanbhayānakam

भूख-प्यास से पीड़ित, दुर्गम वन का आश्रय लेकर, घोर ग्रीष्मकाल में भयंकर चीत्कार करते हुए,

श्लोक 93 (skanda.3.22.93)

अतिष्ठद्गहनेऽरण्ये दुःखान्यनुभवन्बहु। कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च

atiṣṭhadgahane'raṇye duḥkhānyanubhavanbahu kalpakoṭisahasrāṇi kalpakoṭiśatāni ca

वह गहन अरण्य में रहता हुआ बहुत दुःख भोगता रहा। हजारों करोड़ कल्पों और सैकड़ों करोड़ कल्पों तक,

श्लोक 94 (skanda.3.22.94)

स पिशाचो महादुःखी न्यवसद्घोरकानने। वनाद्वनांतरं धावन्देशाद्देशाद्देशांतरं तथा

sa piśāco mahāduḥkhī nyavasadghorakānane vanādvanāṁtaraṁ dhāvandeśāddeśāddeśāṁtaraṁ tathā

वह पिशाच अत्यन्त दुःखी होकर उस घोर वन में रहा। वन से वन में भागते हुए, तथा देश से देश में,

श्लोक 95 (skanda.3.22.95)

सर्वत्रानुभवन्दुःखमाययौ दण्डकान्क्रमात्। अगस्त्यादाश्रमात्पुण्यान्नातिदूरे स संचरन्

sarvatrānubhavanduḥkhamāyayau daṇḍakānkramāt agastyādāśramātpuṇyānnātidūre sa saṁcaran

सर्वत्र दुःख भोगते हुए वह क्रमशः दण्डकारण्य पहुँचा। पुण्यमय अगस्त्य के आश्रम से बहुत दूर नहीं, वहाँ विचरण करते हुए,

श्लोक 96 (skanda.3.22.96)

नदन्भैरवनादं च वाक्यमुच्चैरभाषत। भोभोस्तपोधनाः सर्वे शृणुध्वं मामकं वचः

nadanbhairavanādaṁ ca vākyamuccairabhāṣata bhobhostapodhanāḥ sarve śṛṇudhvaṁ māmakaṁ vacaḥ

भैरव-नाद से चिल्लाते हुए वह ऊँचे स्वर में यह वचन बोला - 'हे तपोधनो! आप सब मेरा वचन सुनें।

श्लोक 97 (skanda.3.22.97)

भवन्तो हि कृपावन्तः सर्वभूतहिते रताः। कृपादृष्ट्यानुगृह्णीत मां दुःखैरतिपीडितम्

bhavanto hi kṛpāvantaḥ sarvabhūtahite ratāḥ kṛpādṛṣṭyānugṛhṇīta māṁ duḥkhairatipīḍitam

आप लोग तो कृपालु, सभी प्राणियों के हित में रत हैं। कृपादृष्टि से मुझ पर, दुःखों से अत्यन्त पीड़ित, अनुग्रह करें।

श्लोक 98 (skanda.3.22.98)

पुरा दुष्पण्यनामाहं वैश्यः पाटलिपुत्रके। पुत्रः पशु मतश्चापि बहून्बालानमारयम्

purā duṣpaṇyanāmāhaṁ vaiśyaḥ pāṭaliputrake putraḥ paśu mataścāpi bahūnbālānamārayam

पूर्वकाल में मैं पाटलिपुत्र में दुष्पण्य नामक वैश्य था, पशुमान् का पुत्र, और मैंने अनेक बालकों को मार डाला।

श्लोक 99 (skanda.3.22.99)

ततो विवासितो राज्ञा तस्माद्देशाद्वनं गतः। अमारयं जले पुत्रं तत्रोग्रश्रवसो मुनेः

tato vivāsito rājñā tasmāddeśādvanaṁ gataḥ amārayaṁ jale putraṁ tatrograśravaso muneḥ

फिर राजा द्वारा निर्वासित होकर उस देश से वन में गया। वहाँ उग्रश्रवा मुनि के पुत्र को जल में मार डाला।

श्लोक 100 (skanda.3.22.100)

स मुनिर्दत्त वाञ्छापं ममापि मरणं जले। पिशाचतां च मे घोरां दत्तवान्दुःखभूयसीम्

sa munirdatta vāñchāpaṁ mamāpi maraṇaṁ jale piśācatāṁ ca me ghorāṁ dattavānduḥkhabhūyasīm

उस मुनि ने मुझे शाप दिया कि मेरी मृत्यु भी जल में हो। उन्होंने मुझे यह घोर, अत्यन्त दुःखदायी पिशाचत्व भी दिया।

श्लोक 101 (skanda.3.22.101)

कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतान्यपि। पिशाच तानुभूतेयं शून्यकाननभूमिषु

kalpakoṭisahasrāṇi kalpakoṭiśatānyapi piśāca tānubhūteyaṁ śūnyakānanabhūmiṣu

हजारों करोड़ कल्पों और सैकड़ों करोड़ कल्पों तक, मैंने इस पिशाचत्व को शून्य वन-भूमियों में भोगा है।

श्लोक 102 (skanda.3.22.102)

नाहं सोढुं समर्थोऽस्मि पिपासां क्षुधमेव च। रक्षध्वं कृपया यूयमतो मां बहुदुःखिनम्

nāhaṁ soḍhuṁ samartho'smi pipāsāṁ kṣudhameva ca rakṣadhvaṁ kṛpayā yūyamato māṁ bahuduḥkhinam

मैं अब प्यास और भूख को सहन करने में समर्थ नहीं हूँ। आप लोग कृपा करके अत्यन्त दुःखी मुझे बचाइए।

श्लोक 103 (skanda.3.22.103)

यथा मुच्येय पैशाच्यात्तथा कुरुत तापसाः। इति श्रुत्वा पिशाचस्य वचनं ते तपोधनाः। लोपामुद्रासहचरमूचिरे कुम्भसंभवम्। तापसा ऊचुः। पिशाचस्यास्य भगवन्ब्रूहि निष्कृतिमुत्तमाम्

yathā mucyeya paiśācyāttathā kuruta tāpasāḥ iti śrutvā piśācasya vacanaṁ te tapodhanāḥ lopāmudrāsahacaramūcire kumbhasaṁbhavam tāpasā ūcuḥ piśācasyāsya bhagavanbrūhi niṣkṛtimuttamām

हे तपस्वियो! जिस प्रकार मैं पिशाचत्व से मुक्त हो सकूँ, वैसा उपाय करें।' पिशाच का यह वचन सुनकर उन तपोधनों ने, लोपामुद्रा के सहचर कुम्भज (अगस्त्य) से कहा। तापसों ने कहा - 'हे भगवन्! इस पिशाच के लिए उत्तम मुक्ति-उपाय बताइए।

श्लोक 104 (skanda.3.22.104)

एवंविधानां पापानां त्वं समर्थो हि रक्षणे। तेषामगस्त्यः श्रुतवान्कृपया परया युतः। प्रियशिष्यं समाहूय सुतीक्ष्णं वाक्यमब्रवीत्

evaṁvidhānāṁ pāpānāṁ tvaṁ samartho hi rakṣaṇe teṣāmagastyaḥ śrutavānkṛpayā parayā yutaḥ priyaśiṣyaṁ samāhūya sutīkṣṇaṁ vākyamabravīt

ऐसे पापों से आप ही रक्षा करने में समर्थ हैं।' उनकी बात सुनकर परम कृपा से युक्त अगस्त्य ने, अपने प्रिय शिष्य सुतीक्ष्ण को बुलाकर यह वचन कहा -

श्लोक 105 (skanda.3.22.105)

अगस्त्य उवाच। सुतीक्ष्ण गच्छ त्वरितं पर्वतं गंधमादनम्

agastya uvāca sutīkṣṇa gaccha tvaritaṁ parvataṁ gaṁdhamādanam

अगस्त्य ने कहा - 'हे सुतीक्ष्ण! शीघ्र गन्धमादन पर्वत जाओ;

श्लोक 106 (skanda.3.22.106)

तत्राग्नितीर्थं सुमहद्विद्यते पापनाशनम्। पिशाचमोक्षणार्थाय तत्र स्नाहि महामते

tatrāgnitīrthaṁ sumahadvidyate pāpanāśanam piśācamokṣaṇārthāya tatra snāhi mahāmate

वहाँ पाप-नाशक अत्यन्त महान् अग्नितीर्थ विद्यमान है। पिशाच की मुक्ति के लिए, हे महामते! वहाँ स्नान करो।

श्लोक 107 (skanda.3.22.107)

पिशाचार्थं त्वयि स्नाते तत्र संकल्पपूर्वकम्। पिशाचभावमुन्मुच्य दिव्यतामेष यास्यति

piśācārthaṁ tvayi snāte tatra saṁkalpapūrvakam piśācabhāvamunmucya divyatāmeṣa yāsyati

पिशाच के लिए तुम्हारे संकल्पपूर्वक वहाँ स्नान करने पर, वह पिशाच-भाव त्यागकर दिव्यता को प्राप्त होगा।

श्लोक 108 (skanda.3.22.108)

निष्कृतिं नास्य पश्यामि विना तत्तीर्थसेवनात। अतः सुतीक्ष्णकृपया रक्षस्वैनं पिशाचकम्

niṣkṛtiṁ nāsya paśyāmi vinā tattīrthasevanāta ataḥ sutīkṣṇakṛpayā rakṣasvainaṁ piśācakam

उस तीर्थ की सेवा के बिना मुझे इसका कोई प्रायश्चित नहीं दिखता। इसलिए हे सुतीक्ष्ण! कृपा करके इस पिशाच की रक्षा करो।'

श्लोक 109 (skanda.3.22.109)

अगस्त्येनैवमुक्तस्तु सुतीक्ष्णो गन्धमादनम्। प्राप्याग्नितीर्थे संकल्प्य पिशाचार्थं कृपानिधिः

agastyenaivamuktastu sutīkṣṇo gandhamādanam prāpyāgnitīrthe saṁkalpya piśācārthaṁ kṛpānidhiḥ

अगस्त्य द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सुतीक्ष्ण, गन्धमादन पहुँचकर, अग्नितीर्थ में पिशाच के लिए संकल्प करके, वह कृपानिधि,

श्लोक 110 (skanda.3.22.110)

सस्नौ तत्र पिशाचार्थं नियमेन दिनत्रयम्। रामनाथादिकं सेव्य तत्तीर्थं प्रतिगृह्य च

sasnau tatra piśācārthaṁ niyamena dinatrayam rāmanāthādikaṁ sevya tattīrthaṁ pratigṛhya ca

वहाँ पिशाच के लिए नियमपूर्वक तीन दिन तक स्नान करता रहा; रामनाथ आदि की सेवा करके और उस तीर्थ की कृपा प्राप्त करके,

श्लोक 111 (skanda.3.22.111)

स्वाश्रमं प्रति गत्वाथ सुतीक्ष्णो विप्रसत्तमः। तत्तीर्थ प्रोक्षणात्सद्यः सवियुज्य पिशाचताम्

svāśramaṁ prati gatvātha sutīkṣṇo viprasattamaḥ tattīrtha prokṣaṇātsadyaḥ saviyujya piśācatām

अपने आश्रम को लौटकर, वह विप्रसत्तम सुतीक्ष्ण - उस तीर्थ के जल के छिड़काव से तत्काल ही वह पिशाच पिशाचत्व से मुक्त होकर,

श्लोक 112 (skanda.3.22.112)

वैभवात्तस्य तीर्थस्य सद्यो दिव्यत्वमाप्तवान्। विमानवरमारूढो दिव्यस्त्रीपरिवारितः

vaibhavāttasya tīrthasya sadyo divyatvamāptavān vimānavaramārūḍho divyastrīparivāritaḥ

उस तीर्थ के प्रभाव से तत्काल दिव्यत्व को प्राप्त हो गया। श्रेष्ठ विमान पर सवार होकर, दिव्य स्त्रियों से घिरा हुआ,

श्लोक 113 (skanda.3.22.113)

सुतीक्ष्णं चाप्यगस्त्यं च तथान्यांश्च तपोधनान्। पुनःपुनर्नमस्कृत्य तांश्चामंत्र्य प्रहर्षितः

sutīkṣṇaṁ cāpyagastyaṁ ca tathānyāṁśca tapodhanān punaḥpunarnamaskṛtya tāṁścāmaṁtrya praharṣitaḥ

सुतीक्ष्ण को, अगस्त्य को तथा अन्य तपस्वियों को भी बार-बार नमस्कार करके, उनसे विदा लेकर, अत्यन्त प्रसन्न होकर,

श्लोक 114 (skanda.3.22.114)

स्वर्गमेवारुहत्तूर्णं देवैरपि स पूजितः। अग्नितीर्थस्य माहात्म्याद्दुष्पण्यो वैश्यनंदनः

svargamevāruhattūrṇaṁ devairapi sa pūjitaḥ agnitīrthasya māhātmyādduṣpaṇyo vaiśyanaṁdanaḥ

वह देवताओं द्वारा भी पूजित होकर शीघ्र स्वर्ग को चला गया। अग्नितीर्थ के माहात्म्य से वैश्य-नन्दन दुष्पण्य ने,

श्लोक 115 (skanda.3.22.115)

पैशाच्यं शापजं त्यक्त्वा दिव्यतामित्थमाप्तवान्। एवं वः कथितं विप्रा अग्नितीर्थस्य वैभवम्

paiśācyaṁ śāpajaṁ tyaktvā divyatāmitthamāptavān evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā agnitīrthasya vaibhavam

शाप से उत्पन्न पैशाच्य को त्यागकर इस प्रकार दिव्यत्व प्राप्त किया। हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें अग्नितीर्थ की महिमा बताई।

श्लोक 116 (skanda.3.22.116)

यः पठेदिममध्यायं शृणुयाद्वा सभक्तिकम्। पिशाचमोक्षणाख्यानं मुच्यते सर्वपातकैः

yaḥ paṭhedimamadhyāyaṁ śṛṇuyādvā sabhaktikam piśācamokṣaṇākhyānaṁ mucyate sarvapātakaiḥ

जो इस अध्याय को पढ़ता है, या भक्तिपूर्वक सुनता है - यह पिशाच-मुक्ति की कथा - वह समस्त पातकों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 117 (skanda.3.22.117)

इह भुक्त्वा महाभोगान्परत्रापि सुखं लभेत्

iha bhuktvā mahābhogānparatrāpi sukhaṁ labhet

यहाँ महान् भोगों को भोगकर वह परलोक में भी सुख प्राप्त करेगा।

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23