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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 23

चक्रतीर्थ की महिमा और सूर्य से हिरण्मय हस्त की प्राप्ति

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (skanda.3.23.1)

श्रीसूत उवाच। अग्नितीर्थाभिधे तीर्थे सर्वपातकनाशने। स्नानं कृत्वा विशुद्धात्मा चक्रतीर्थं ततो व्रजेत्

śrīsūta uvāca agnitīrthābhidhe tīrthe sarvapātakanāśane snānaṁ kṛtvā viśuddhātmā cakratīrthaṁ tato vrajet

श्रीसूत जी ने कहा - समस्त पातकों का नाश करने वाले अग्नितीर्थ में स्नान करके, विशुद्धात्मा होकर फिर चक्रतीर्थ जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.3.23.2)

यंयं कामं समुद्दिश्य चक्रतीर्थे द्विजोत्तमाः। स्नानं समाचरेन्मर्त्यस्तंतं कामं समश्नुते

yaṁyaṁ kāmaṁ samuddiśya cakratīrthe dvijottamāḥ snānaṁ samācarenmartyastaṁtaṁ kāmaṁ samaśnute

हे द्विजोत्तमो! जिस-जिस कामना को लक्ष्य करके मनुष्य चक्रतीर्थ में स्नान करता है, उसे वही-वही कामना प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 3 (skanda.3.23.3)

पुराहिर्बुध्न्यनामा तु महर्षिः संशित व्रतः। सुदर्शनमुपास्तास्मिंस्तपस्वी गंधमादने

purāhirbudhnyanāmā tu maharṣiḥ saṁśita vrataḥ sudarśanamupāstāsmiṁstapasvī gaṁdhamādane

पूर्वकाल में अहिर्बुध्न्य नामक एक कठोर-व्रती महर्षि तपस्वी, इस गन्धमादन में सुदर्शन की उपासना करते थे।

श्लोक 4 (skanda.3.23.4)

तपस्यंतं मुनिं तत्र राक्षसा घोररूपिणः। अबाधंत सदा विप्रास्तपोविघ्नैकतत्पराः।

tapasyaṁtaṁ muniṁ tatra rākṣasā ghorarūpiṇaḥ abādhaṁta sadā viprāstapovighnaikatatparāḥ

तप करते उस मुनि को घोर-रूपधारी राक्षस, हे विप्रो! तप में विघ्न डालने में तत्पर होकर, सदा सताते थे।

श्लोक 5 (skanda.3.23.5)

सुदर्शनं तदागत्य भक्तरक्षणवांछया। यातुधानान्बाधमानान्न्यवधीर्लीलया पुरा

sudarśanaṁ tadāgatya bhaktarakṣaṇavāṁchayā yātudhānānbādhamānānnyavadhīrlīlayā purā

तब भक्त की रक्षा की इच्छा से सुदर्शन ने वहाँ आकर, पूर्वकाल में उन्हें सताते हुए राक्षसों को लीलापूर्वक मार डाला।

श्लोक 6 (skanda.3.23.6)

तदाप्रभृति तच्चक्रं भक्तप्रार्थनया द्विजाः। अहिर्बुध्न्यकृते तीर्थे सन्निधानं सदाऽकरोत्

tadāprabhṛti taccakraṁ bhaktaprārthanayā dvijāḥ ahirbudhnyakṛte tīrthe sannidhānaṁ sadā'karot

हे द्विजो! तभी से वह चक्र, भक्त की प्रार्थना से, अहिर्बुध्न्य द्वारा किए गए उस तीर्थ में सदा निवास करने लगा।

श्लोक 7 (skanda.3.23.7)

तदाप्रभृति तत्तीर्थं चक्रतीर्थमितीर्यते। सुदर्शनप्रसादेन तत्र तीर्थे निमज्जनात्

tadāprabhṛti tattīrthaṁ cakratīrthamitīryate sudarśanaprasādena tatra tīrthe nimajjanāt

तभी से वह तीर्थ चक्रतीर्थ कहलाने लगा। सुदर्शन की कृपा से, उस तीर्थ में निमज्जन से,

श्लोक 8 (skanda.3.23.8)

रक्षःपिशाचा दिकृता पीडा नास्त्येव कर्हिचित्। स्नात्वास्मिन्पावने तीर्थे छिन्नपाणिः पुरा रविः। स हिरण्यमयौ पाणी लब्धवांस्तीर्थवैभवात्

rakṣaḥpiśācā dikṛtā pīḍā nāstyeva karhicit snātvāsminpāvane tīrthe chinnapāṇiḥ purā raviḥ sa hiraṇyamayau pāṇī labdhavāṁstīrthavaibhavāt

राक्षस-पिशाच आदि की पीड़ा कभी नहीं होती। इस पावन तीर्थ में स्नान करके, पूर्वकाल में हाथ-कटे सूर्य ने उस तीर्थ के प्रभाव से स्वर्णमय दोनों हाथ प्राप्त किए थे।

श्लोक 9 (skanda.3.23.9)

ऋषय ऊचुः। छिन्नपाणिः कथमभूदादित्यः सूतनंदन। यथा च लब्धवान्पाणी सौवर्णौ तद्वदस्व नः

ṛṣaya ūcuḥ chinnapāṇiḥ kathamabhūdādityaḥ sūtanaṁdana yathā ca labdhavānpāṇī sauvarṇau tadvadasva naḥ

ऋषियों ने कहा - हे सूतनन्दन! आदित्य के हाथ कैसे कटे? और जिस प्रकार उन्होंने स्वर्णमय हाथ प्राप्त किए, वह भी हमें बताइए।

श्लोक 10 (skanda.3.23.10)

श्रीसूत उवाच। इंद्रादयः सुराः पूर्वं संततं दैत्यपीडिताः

śrīsūta uvāca iṁdrādayaḥ surāḥ pūrvaṁ saṁtataṁ daityapīḍitāḥ

श्रीसूत जी ने कहा - पूर्वकाल में इन्द्र आदि देवगण दैत्यों से निरन्तर पीड़ित होते थे।

श्लोक 11 (skanda.3.23.11)

किं कुर्म इति संचित्य संभूय सममंत्रयन्। बृहस्पतिं पुरस्कृत्य मंत्रयित्वा चिरं सुराः

kiṁ kurma iti saṁcitya saṁbhūya samamaṁtrayan bṛhaspatiṁ puraskṛtya maṁtrayitvā ciraṁ surāḥ

'क्या करें' - यह विचार कर सब मिलकर आपस में मंत्रणा करने लगे। बृहस्पति को आगे कर, देवताओं ने दीर्घकाल तक विचार-विमर्श करके,

श्लोक 12 (skanda.3.23.12)

तुरासाहं पुरोधाय धाम स्वायंभुवं ययुः। ते ब्रह्माणं समासाद्य दृष्ट्वा स्तुत्वा च भक्तितः

turāsāhaṁ purodhāya dhāma svāyaṁbhuvaṁ yayuḥ te brahmāṇaṁ samāsādya dṛṣṭvā stutvā ca bhaktitaḥ

इन्द्र को आगे रखकर, स्वायम्भू (ब्रह्मा) के धाम को गए। वे ब्रह्मा के पास पहुँचकर, दर्शन करके और भक्तिपूर्वक स्तुति करके,

श्लोक 13 (skanda.3.23.13)

ततो व्यजिज्ञपस्तस्मै स्वेषामागमकारणम्। सुरा ऊचुः। भगवन्भारतीनाथ दैत्या ह्यस्मान्बलोत्कटाः

tato vyajijñapastasmai sveṣāmāgamakāraṇam surā ūcuḥ bhagavanbhāratīnātha daityā hyasmānbalotkaṭāḥ

फिर उन्हें अपने आगमन का कारण बताया। देवताओं ने कहा - 'हे भगवन्, हे भारतीनाथ! अत्यन्त बलशाली दैत्य हमें,

श्लोक 14 (skanda.3.23.14)

बाधंते सततं देव तत्र ब्रूहि प्रतिक्रियाम्। इत्युक्तः स सुरैर्ब्रह्मा तानाह कृपया वचः

bādhaṁte satataṁ deva tatra brūhi pratikriyām ityuktaḥ sa surairbrahmā tānāha kṛpayā vacaḥ

निरन्तर सताते हैं, हे देव! उसका प्रतिकार बताइए।' इस प्रकार देवताओं द्वारा कहे जाने पर ब्रह्मा ने उनसे कृपापूर्वक यह वचन कहा -

श्लोक 15 (skanda.3.23.15)

ब्रह्मोवाच। मा भैष्ट यूयं विबुधास्तत्रोपायं ब्रवीम्यहम्। माहेश्वरं महायज्ञमसुराणां विनाशनम्।

brahmovāca mā bhaiṣṭa yūyaṁ vibudhāstatropāyaṁ bravīmyaham māheśvaraṁ mahāyajñamasurāṇāṁ vināśanam

ब्रह्मा ने कहा - 'हे विबुधो! भय मत करो, मैं उसका उपाय बताता हूँ। असुरों के नाशक महेश्वर-महायज्ञ को,

श्लोक 16 (skanda.3.23.16)

प्रारभध्वं सुरा यूयं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः। अयं च दैवतैः सर्वैर्विधिलोभं विना कृतः

prārabhadhvaṁ surā yūyaṁ munibhistattvadarśibhiḥ ayaṁ ca daivataiḥ sarvairvidhilobhaṁ vinā kṛtaḥ

हे देवो! तत्त्वदर्शी मुनियों के साथ आरम्भ करो। और यह सभी देवताओं द्वारा बिना किसी लोभ के, विधिपूर्वक किया जाए।

श्लोक 17 (skanda.3.23.17)

माहेश्वरो महायज्ञः क्रियतां गंधमादने। यदि ह्यन्यत्र तं यज्ञं कुर्युस्तद्विबुधर्षभाः

māheśvaro mahāyajñaḥ kriyatāṁ gaṁdhamādane yadi hyanyatra taṁ yajñaṁ kuryustadvibudharṣabhāḥ

यह महेश्वर-महायज्ञ गन्धमादन में किया जाए। हे देवश्रेष्ठो! यदि तुम वह यज्ञ अन्यत्र करोगे,

श्लोक 18 (skanda.3.23.18)

यज्ञविघ्नं तदा कुर्युर्दुरात्मानः सुरद्विषः। क्रियते यद्ययं यज्ञो गंधमादनपर्वते

yajñavighnaṁ tadā kuryurdurātmānaḥ suradviṣaḥ kriyate yadyayaṁ yajño gaṁdhamādanaparvate

तो देवद्वेषी दुरात्मा उस यज्ञ में विघ्न डालेंगे। यदि यह यज्ञ गन्धमादन पर्वत पर किया जाए,

श्लोक 19 (skanda.3.23.19)

सुदर्शनप्रसादेन नैव विघ्नो भवेत्तदा। अहिर्बुध्न्याभिधानस्य महर्षेर्गंधमादने

sudarśanaprasādena naiva vighno bhavettadā ahirbudhnyābhidhānasya maharṣergaṁdhamādane

तो सुदर्शन की कृपा से वहाँ कोई विघ्न नहीं होगा। क्योंकि गन्धमादन में अहिर्बुध्न्य नामक महर्षि पर,

श्लोक 20 (skanda.3.23.20)

अनुग्रहाय तत्तीर्थे सन्निधत्ते सुदर्शनम्। अतः कुरुध्वं भो यूयं तं यज्ञं गंधमादने

anugrahāya tattīrthe sannidhatte sudarśanam ataḥ kurudhvaṁ bho yūyaṁ taṁ yajñaṁ gaṁdhamādane

अनुग्रह के लिए, सुदर्शन उस तीर्थ में सदा निवास करते हैं। इसलिए हे देवो! तुम वह यज्ञ गन्धमादन में करो,

श्लोक 21 (skanda.3.23.21)

नातिदूरे चक्रतीर्थादसुराणां विनाशकम्। ततस्ते ब्रह्मवचसा सहसा गंधमादनम्

nātidūre cakratīrthādasurāṇāṁ vināśakam tataste brahmavacasā sahasā gaṁdhamādanam

असुरों के नाशक उस यज्ञ को, चक्रतीर्थ से अधिक दूर नहीं।' तब वे ब्रह्मा के वचन से तत्काल गन्धमादन को,

श्लोक 22 (skanda.3.23.22)

बृहस्पतिं पुरस्कृत्य जग्मुर्यज्ञचिकीर्षया। ते प्रणम्य महात्मानमहिर्बुध्न्यं मुनीश्वरम्

bṛhaspatiṁ puraskṛtya jagmuryajñacikīrṣayā te praṇamya mahātmānamahirbudhnyaṁ munīśvaram

बृहस्पति को आगे कर, यज्ञ करने की इच्छा से गए। उस महात्मा मुनीश्वर अहिर्बुध्न्य को प्रणाम करके,

श्लोक 23 (skanda.3.23.23)

अकल्पयन्यज्ञवाटन्नातिदूरे तदाश्रमात्। यज्ञकर्मसु निष्णातैः सहितास्ते तपोधनैः

akalpayanyajñavāṭannātidūre tadāśramāt yajñakarmasu niṣṇātaiḥ sahitāste tapodhanaiḥ

उन्होंने उनके आश्रम से अधिक दूर नहीं यज्ञ-वेदी बनाई। यज्ञ-कर्मों में निपुण उन तपस्वियों के साथ,

श्लोक 24 (skanda.3.23.24)

इष्टिमारेभिरे देवा असुराणां विनाशिनीम्। तस्मिन्कर्मणि होतासीत्स्वयमेव बृहस्पतिः

iṣṭimārebhire devā asurāṇāṁ vināśinīm tasminkarmaṇi hotāsītsvayameva bṛhaspatiḥ

देवताओं ने असुरों की नाशक इष्टि आरम्भ की। उस कर्म में स्वयं बृहस्पति ही होता बने।

श्लोक 25 (skanda.3.23.25)

बभूव मैत्रावरुणो जयंतः पाकशासनिः। अच्छावाको बभूवात्र वसूनामष्टमो वसुः

babhūva maitrāvaruṇo jayaṁtaḥ pākaśāsaniḥ acchāvāko babhūvātra vasūnāmaṣṭamo vasuḥ

इन्द्र-पुत्र जयन्त मैत्रावरुण बने। वसुओं में आठवें वसु अच्छावाक बने।

श्लोक 26 (skanda.3.23.26)

ग्रावस्तुदभवत्तत्र शक्तिपुत्रः पराशरः। अष्टावक्रो महातेजा अध्वर्युधुरमूढवान्।

grāvastudabhavattatra śaktiputraḥ parāśaraḥ aṣṭāvakro mahātejā adhvaryudhuramūḍhavān

शक्ति-पुत्र पराशर वहाँ ग्रावस्तुत् बने। महातेजस्वी अष्टावक्र ने अध्वर्यु का भार वहन किया।

श्लोक 27 (skanda.3.23.27)

तत्र प्रतिप्रस्थाताभूद्विश्वामित्रो महामुनिः। बभूव वरुण उन्नेता च धनेश्वरः

tatra pratiprasthātābhūdviśvāmitro mahāmuniḥ babhūva varuṇa unnetā ca dhaneśvaraḥ

महामुनि विश्वामित्र वहाँ प्रतिप्रस्थाता बने। वरुण और धनेश्वर (कुबेर) उन्नेता बने।

श्लोक 28 (skanda.3.23.28)

ब्रह्मा बभूव सविता यज्ञस्यार्धधुरं वहन्। बभूव ब्राह्मणाच्छंसी वसिष्ठो ब्रह्मणोत्तमः

brahmā babhūva savitā yajñasyārdhadhuraṁ vahan babhūva brāhmaṇācchaṁsī vasiṣṭho brahmaṇottamaḥ

यज्ञ का आधा भार वहन करते हुए सविता (सूर्य) सदस्य बने। ब्रह्मणों में श्रेष्ठ वसिष्ठ ब्राह्मणाच्छंसी बने।

श्लोक 29 (skanda.3.23.29)

आग्नीध्रोऽभूच्छुनःशेपः पोता जातश्च पावकः। उद्गाता वायुरभवत्प्रस्तोता च परेतराट्।

āgnīdhro'bhūcchunaḥśepaḥ potā jātaśca pāvakaḥ udgātā vāyurabhavatprastotā ca paretarāṭ

शुनःशेप आग्नीध्र बने, स्वयं पावक पोता बने। वायु उद्गाता बने और परेतराज (यम) प्रस्तोता बने।

श्लोक 30 (skanda.3.23.30)

प्रतिहर्ता तु तत्रासीदगस्त्यः कुंभसंभवः। सुब्रह्मण्यो मधुच्छंदा विश्वामित्रात्मजो महान्

pratihartā tu tatrāsīdagastyaḥ kuṁbhasaṁbhavaḥ subrahmaṇyo madhucchaṁdā viśvāmitrātmajo mahān

वहाँ कुम्भज अगस्त्य प्रतिहर्ता बने। विश्वामित्र के महान् पुत्र, सुब्रह्मण्य मधुच्छन्दा,

श्लोक 31 (skanda.3.23.31)

यजमानः स्वयमभूद्देवराजः पुरंदरः। उपद्रष्टा बभूवात्र व्यासपुत्रः शुको मुनिः

yajamānaḥ svayamabhūddevarājaḥ puraṁdaraḥ upadraṣṭā babhūvātra vyāsaputraḥ śuko muniḥ

तथा स्वयं देवराज पुरन्दर यजमान बने। व्यास-पुत्र मुनि शुक वहाँ उपद्रष्टा बने।

श्लोक 32 (skanda.3.23.32)

ततस्ते ऋत्विजः सर्वे देवराजं पुरंदरम्। विधिवद्दीक्षयांचक्रुस्तत्र माहेश्वरे क्रतौ

tataste ṛtvijaḥ sarve devarājaṁ puraṁdaram vidhivaddīkṣayāṁcakrustatra māheśvare kratau

तब उन सभी ऋत्विजों ने देवराज पुरन्दर को उस माहेश्वर यज्ञ में विधिपूर्वक दीक्षित किया।

श्लोक 33 (skanda.3.23.33)

प्रावर्तत महायज्ञ एवं वै गंधमादने। सुदर्शनप्रभावेन दुःसहेनातिपीडिताः

prāvartata mahāyajña evaṁ vai gaṁdhamādane sudarśanaprabhāvena duḥsahenātipīḍitāḥ

इस प्रकार गन्धमादन में वह महायज्ञ प्रारम्भ हुआ। सुदर्शन के दुःसह प्रभाव से अत्यन्त पीड़ित होकर,

श्लोक 34 (skanda.3.23.34)

नाविंदन्नसुरास्तत्र रंध्रं यज्ञे प्रवर्तिते। एवन्निरंतरायोऽसौ प्रावर्तत महा क्रतुः

nāviṁdannasurāstatra raṁdhraṁ yajñe pravartite evanniraṁtarāyo'sau prāvartata mahā kratuḥ

यज्ञ आरम्भ होने पर असुरों को वहाँ कोई छिद्र नहीं मिला। इस प्रकार निर्विघ्न वह महायज्ञ चलता रहा।

श्लोक 35 (skanda.3.23.35)

भक्षयंश्च हरिस्तत्र जज्वाल हुतवाहनः। विधिवत्कर्मजालानि कृत्वाध्वर्युरसंभ्रमात्

bhakṣayaṁśca haristatra jajvāla hutavāhanaḥ vidhivatkarmajālāni kṛtvādhvaryurasaṁbhramāt

आहुतियों को ग्रहण करते हुए वहाँ हवन-वाहक अग्नि प्रज्वलित हुए। विधिपूर्वक सभी कर्मों को बिना किसी घबराहट के करके अध्वर्यु ने,

श्लोक 36 (skanda.3.23.36)

मंत्रपूतं पुरोडाशं जुहवामास पावके। हुतशेषं पुरोडाशं विभज्याध्वर्युरादरात्

maṁtrapūtaṁ puroḍāśaṁ juhavāmāsa pāvake hutaśeṣaṁ puroḍāśaṁ vibhajyādhvaryurādarāt

मंत्र से पवित्र पुरोडाश (यज्ञ-पिण्ड) को अग्नि में हवन किया। हवन किए गए शेष पुरोडाश को आदरपूर्वक बाँटकर अध्वर्यु ने,

श्लोक 37 (skanda.3.23.37)

ऋत्विग्भ्यो होतृमुख्येभ्यः प्रददौ पापनाशनम्। सवित्रे ब्रह्मणे चैकमत्युग्रतरतेजसम्।

ṛtvigbhyo hotṛmukhyebhyaḥ pradadau pāpanāśanam savitre brahmaṇe caikamatyugrataratejasam

होता आदि प्रमुख ऋत्विजों को पाप-नाशक वह भाग दिया; और सविता ब्रह्मण को अत्यन्त उग्र तेज वाला एक भाग,

श्लोक 38 (skanda.3.23.38)

ददौ तत्र पुरोडाशभागं प्राशित्रनामकम्। प्रतिजग्राह पाणिभ्यां प्राशित्रं सविता तदा

dadau tatra puroḍāśabhāgaṁ prāśitranāmakam pratijagrāha pāṇibhyāṁ prāśitraṁ savitā tadā

वहाँ पुरोडाश का, प्राशित्र नामक भाग दिया। सविता ने तब दोनों हाथों से उस प्राशित्र को ग्रहण किया।

श्लोक 39 (skanda.3.23.39)

सवित्रा स्पृष्टमात्रं सत्तत्प्राशित्रं दुरासदम्। तस्य पाणी प्रचिच्छेद पश्यतां सर्वऋत्विजाम्

savitrā spṛṣṭamātraṁ sattatprāśitraṁ durāsadam tasya pāṇī praciccheda paśyatāṁ sarvaṛtvijām

सविता द्वारा स्पर्श किए जाते ही वह अत्यन्त दुर्धर्ष प्राशित्र, सभी ऋत्विजों के देखते-देखते, उनके दोनों हाथ काट डाले।

श्लोक 40 (skanda.3.23.40)

ततः संछिन्नपाणिः स प्राशित्रेणोग्रतेजसा। किमेतदिति संत्रस्तो विषण्णवदनोऽभवत्

tataḥ saṁchinnapāṇiḥ sa prāśitreṇogratejasā kimetaditi saṁtrasto viṣaṇṇavadano'bhavat

तब उस उग्र तेज वाले प्राशित्र से हाथ कट जाने पर वे, 'यह क्या हुआ' कहकर भयभीत होकर उदास मुख वाले हो गए।

श्लोक 41 (skanda.3.23.41)

सविता ऋत्विजः सर्वान्समाहूयेदमब्रवीत्। सवितोवाच। पुरोडाशस्य भागोऽयं मम प्राशित्रनामकः

savitā ṛtvijaḥ sarvānsamāhūyedamabravīt savitovāca puroḍāśasya bhāgo'yaṁ mama prāśitranāmakaḥ

सविता ने तब सभी ऋत्विजों को बुलाकर यह कहा - सविता ने कहा - 'पुरोडाश का यह मेरा प्राशित्र नामक भाग,

श्लोक 42 (skanda.3.23.42)

दत्तश्चिच्छेद मत्पाणी मिषत्स्वेव भवत्स्वपि। अतो भवंतः संभूय सर्व एव हि ऋत्विजः

dattaściccheda matpāṇī miṣatsveva bhavatsvapi ato bhavaṁtaḥ saṁbhūya sarva eva hi ṛtvijaḥ

मुझे दिए जाते ही, तुम सबके देखते-देखते ही, मेरे हाथ काट डाले। इसलिए आप सभी ऋत्विजगण मिलकर,

श्लोक 43 (skanda.3.23.43)

कल्पयंतामिमौ पाणी नोचेद्यज्ञं निहन्म्यमुम्। सवितुर्वाक्यमाकर्ण्य ते सर्वे समचिंतयन्

kalpayaṁtāmimau pāṇī nocedyajñaṁ nihanmyamum saviturvākyamākarṇya te sarve samaciṁtayan

इन दोनों हाथों की व्यवस्था करें, अन्यथा मैं इस यज्ञ को नष्ट कर दूँगा।' सविता का यह वचन सुनकर वे सभी विचार करने लगे।

श्लोक 44 (skanda.3.23.44)

तत्र मध्ये मुनींद्राणां देवानां चैव सर्वशः। अष्टावक्रो महातेजा ऋत्विजस्तानभाषत

tatra madhye munīṁdrāṇāṁ devānāṁ caiva sarvaśaḥ aṣṭāvakro mahātejā ṛtvijastānabhāṣata

वहाँ मुनीन्द्रों और देवताओं के मध्य में, महातेजस्वी अष्टावक्र ने उन ऋत्विजों से यह कहा -

श्लोक 45 (skanda.3.23.45)

अष्टावक्र उवाच। शृणुध्वमृत्विजः सर्वे मम वाक्यं समाहिताः। मयि जीवति विप्रेंद्रा विरिंचानां शतं गतम्

aṣṭāvakra uvāca śṛṇudhvamṛtvijaḥ sarve mama vākyaṁ samāhitāḥ mayi jīvati vipreṁdrā viriṁcānāṁ śataṁ gatam

अष्टावक्र ने कहा - 'हे ऋत्विजो! एकाग्रचित्त होकर सब लोग मेरा वचन सुनो। हे विप्रेन्द्रो! मेरे जीवित रहते ही सौ ब्रह्मा बीत चुके हैं।

श्लोक 46 (skanda.3.23.46)

जायंते च म्रियंते च चतुराननकोटयः। पश्यन्नेव च तान्सर्वानहं प्राणानधारयम्

jāyaṁte ca mriyaṁte ca caturānanakoṭayaḥ paśyanneva ca tānsarvānahaṁ prāṇānadhārayam

करोड़ों चतुरानन जन्म लेते और मरते हैं; उन सभी को देखते हुए ही मैंने अपने प्राणों को धारण किया है।

श्लोक 47 (skanda.3.23.47)

तत्र लोकेश्वराभिख्ये वर्तमाने प्रजापतौ। विप्रो हरिहरोनाम निवसञ्छयामलापुरे

tatra lokeśvarābhikhye vartamāne prajāpatau vipro hariharonāma nivasañchayāmalāpure

उस समय, लोकेश्वर नामक प्रजापति के काल में, श्यामलापुर में हरिहर नामक एक ब्राह्मण रहता था,

श्लोक 48 (skanda.3.23.48)

व्याधेनारण्यवासेन केल्यर्थं लक्ष्यवेधिना। छिन्नपादोऽभवद्बाणैर्लक्ष्य मध्यं समागतः

vyādhenāraṇyavāsena kelyarthaṁ lakṣyavedhinā chinnapādo'bhavadbāṇairlakṣya madhyaṁ samāgataḥ

जो वनवासी, लक्ष्य-वेधी एक व्याध द्वारा, खेल के लिए छोड़े गए बाणों से, लक्ष्य के मध्य आ जाने से पैर-कटा हो गया था।

श्लोक 49 (skanda.3.23.49)

स गंधमादनं प्राप्य मुनिभिः प्रेरितस्तदा। स्नात्वा च मुनितीर्थेऽस्मिन्प्राप्तवांश्चरणौ पुरा

sa gaṁdhamādanaṁ prāpya munibhiḥ preritastadā snātvā ca munitīrthe'sminprāptavāṁścaraṇau purā

वह गन्धमादन पहुँचकर, तब मुनियों द्वारा प्रेरित होकर, इस मुनितीर्थ में स्नान करके पूर्वकाल में अपना पैर पुनः प्राप्त कर लिया था।

श्लोक 50 (skanda.3.23.50)

तदा पुण्यमिदं तीर्थं मुनितीर्थमितीरितम्। इदानीं चक्रतीर्थाख्यं चक्रनाम त्वविंदत

tadā puṇyamidaṁ tīrthaṁ munitīrthamitīritam idānīṁ cakratīrthākhyaṁ cakranāma tvaviṁdata

तब यह पुण्यमय तीर्थ मुनितीर्थ कहलाया था; अभी इसने चक्रतीर्थ नाम प्राप्त किया है।

श्लोक 51 (skanda.3.23.51)

तदत्र क्रियतां स्नानं प्राशित्रच्छिन्नपाणिना। मुनितीर्थे सवित्रापि युष्माकं यदि रोचते

tadatra kriyatāṁ snānaṁ prāśitracchinnapāṇinā munitīrthe savitrāpi yuṣmākaṁ yadi rocate

इसलिए यहाँ मुनितीर्थ में प्राशित्र से हाथ-कटे सविता का स्नान कराया जाए, यदि आप सबको यह उचित लगे।'

श्लोक 52 (skanda.3.23.52)

ऋत्विजः कथितास्त्वेवमष्टावक्रमहर्षिणा। सवितारमभाषंत सर्व एव प्रहर्षिताः

ṛtvijaḥ kathitāstvevamaṣṭāvakramaharṣiṇā savitāramabhāṣaṁta sarva eva praharṣitāḥ

महर्षि अष्टावक्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, सभी ऋत्विज अत्यन्त प्रसन्न होकर सविता से यह बोले -

श्लोक 53 (skanda.3.23.53)

सवितः स्नाहि तीर्थेऽ स्मिंस्तव पाणी भविष्यतः। अष्टावक्रो यथा प्राह तथा कुरु समाहितः

savitaḥ snāhi tīrthe' smiṁstava pāṇī bhaviṣyataḥ aṣṭāvakro yathā prāha tathā kuru samāhitaḥ

'हे सविता! इस तीर्थ में स्नान करो, तुम्हारे हाथ पुनः प्राप्त होंगे। अष्टावक्र ने जैसा कहा है, वैसा ही एकाग्रचित्त होकर करो।'

श्लोक 54 (skanda.3.23.54)

ततः स सविता गत्वा चक्रतीर्थं महत्तरम्। सस्नौ पाण्योरवाप्त्यर्थमिष्टदायिनि तत्र सः

tataḥ sa savitā gatvā cakratīrthaṁ mahattaram sasnau pāṇyoravāptyarthamiṣṭadāyini tatra saḥ

तब वह सविता जाकर, उस महान् चक्रतीर्थ में, इष्ट-प्रदायक उस तीर्थ में, हाथों की प्राप्ति के लिए स्नान करने लगे।

श्लोक 55 (skanda.3.23.55)

उत्तिष्ठन्नेव स तदा तत्र स्नात्वा सभक्तिकम्। युक्तो हिरण्मयाभ्यां तु पाणिभ्यां समदृश्यत

uttiṣṭhanneva sa tadā tatra snātvā sabhaktikam yukto hiraṇmayābhyāṁ tu pāṇibhyāṁ samadṛśyata

उसी क्षण, वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करके उठते हुए ही, वे स्वर्णमय दोनों हाथों से युक्त दिखाई दिए।

श्लोक 56 (skanda.3.23.56)

हिरण्यपाणिं तं दृष्ट्वा जहृषुः सर्वऋत्विजः। ततः समाप्य तं यज्ञं दैत्यसंघान्विजित्य च

hiraṇyapāṇiṁ taṁ dṛṣṭvā jahṛṣuḥ sarvaṛtvijaḥ tataḥ samāpya taṁ yajñaṁ daityasaṁghānvijitya ca

उन्हें स्वर्ण-हस्त देखकर सभी ऋत्विज हर्षित हो गए। फिर उस यज्ञ को समाप्त करके, दैत्य-समूहों को जीतकर,

श्लोक 57 (skanda.3.23.57)

इंद्रादयः सुराः सर्वे सुखिताः स्वर्गमाययुः। तस्मादेतत्समागत्य तीर्थं सर्वैश्च मानवैः

iṁdrādayaḥ surāḥ sarve sukhitāḥ svargamāyayuḥ tasmādetatsamāgatya tīrthaṁ sarvaiśca mānavaiḥ

इन्द्र आदि सभी देवगण सुखी होकर स्वर्ग को चले गए। इसलिए इस तीर्थ में आकर सभी मनुष्यों को,

श्लोक 58 (skanda.3.23.58)

सेवनीयं प्रयत्नेन स्वस्वाभीष्टस्य सिद्धये। अंधैश्च कुणिभिर्मूकैर्बधिरैः कुब्जकैरपि

sevanīyaṁ prayatnena svasvābhīṣṭasya siddhaye aṁdhaiśca kuṇibhirmūkairbadhiraiḥ kubjakairapi

अपने-अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए प्रयत्नपूर्वक इसकी सेवा करनी चाहिए। अंधों, कुणी (एक-हाथ-हीन) मनुष्यों, मूकों, बहरों, कुबड़ों द्वारा भी,

श्लोक 59 (skanda.3.23.59)

खंजैः पंगुभिरप्येतदंगहीनैस्तथापरैः। संछिन्नपाणिचरणैः संछिन्नान्यांगसंचयैः

khaṁjaiḥ paṁgubhirapyetadaṁgahīnaistathāparaiḥ saṁchinnapāṇicaraṇaiḥ saṁchinnānyāṁgasaṁcayaiḥ

लंगड़ों, पंगुओं और भी अंगहीन अन्य लोगों द्वारा, हाथ-पैर कटे और अन्य अंग-समूह कटे हुए,

श्लोक 60 (skanda.3.23.60)

मनुष्यैश्च तथान्यैश्च विकलांगस्य पूर्तये। सेवनीयमिदं तीर्थं सर्वाभीष्टप्रदायकम्

manuṣyaiśca tathānyaiśca vikalāṁgasya pūrtaye sevanīyamidaṁ tīrthaṁ sarvābhīṣṭapradāyakam

मनुष्यों और अन्य लोगों द्वारा भी, अपने विकलांगपन की पूर्ति के लिए, यह सभी अभीष्टों को देने वाला तीर्थ सेवन करने योग्य है।

श्लोक 61 (skanda.3.23.61)

एवं वः कथितं विप्राश्चक्रतीर्थस्य वैभवम्। यत्र स्नात्वा पुरा छिन्नौ पाणी प्राप प्रभाकरः

evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāścakratīrthasya vaibhavam yatra snātvā purā chinnau pāṇī prāpa prabhākaraḥ

हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें चक्रतीर्थ की महिमा बताई, जहाँ स्नान करके पूर्वकाल में हाथ-कटे प्रभाकर (सूर्य) ने पुनः हाथ प्राप्त किए थे।

श्लोक 62 (skanda.3.23.62)

यः पठेदिममध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः। अंगानि विकलान्यस्य पूर्णानि स्युर्न संशयः

yaḥ paṭhedimamadhyāyaṁ śṛṇuyādvā samāhitaḥ aṁgāni vikalānyasya pūrṇāni syurna saṁśayaḥ

जो इस अध्याय को पढ़ता है या एकाग्रचित्त होकर सुनता है, उसके विकलांग अंग पूर्ण हो जाएँगे, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 63 (skanda.3.23.63)

मोक्षकामस्य मर्त्यस्य मुक्तिः स्यान्नात्र संशयः

mokṣakāmasya martyasya muktiḥ syānnātra saṁśayaḥ

मोक्ष के इच्छुक मरणशील प्राणी को मुक्ति प्राप्त होगी, इसमें संशय नहीं।

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