ब्रह्म खण्ड · अध्याय 25
शंखतीर्थ की महिमा और वत्सनाभ के कृतघ्नता-दोष की शांति
श्लोक 1 (skanda.3.25.1)
श्रीसूत उवाच। शिवतीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्महत्याविमोक्षणे। स्वपापजालशांत्यर्थं शंखतीर्थं ततो व्रजेत्
śrīsūta uvāca śivatīrthe naraḥ snātvā brahmahatyāvimokṣaṇe svapāpajālaśāṁtyarthaṁ śaṁkhatīrthaṁ tato vrajet
श्रीसूत जी ने कहा - ब्रह्महत्या से मुक्ति देने वाले शिवतीर्थ में स्नान करके, मनुष्य को अपने पाप-समूह की शान्ति के लिए फिर शंखतीर्थ जाना चाहिए,
श्लोक 2 (skanda.3.25.2)
यत्र मज्जनमात्रेण कृतघ्नोऽपि विमुच्यते। मातॄः पितॄन्गुरूंश्चापि ये न मन्यंति मोहिताः
yatra majjanamātreṇa kṛtaghno'pi vimucyate mātṝḥ pitṝngurūṁścāpi ye na manyaṁti mohitāḥ
जहाँ केवल निमज्जन से कृतघ्न भी मुक्त हो जाता है। जो मोहवश माताओं, पिताओं और गुरुओं का सम्मान नहीं करते,
श्लोक 3 (skanda.3.25.3)
ये चाप्यन्ये दुरात्मानः कृतघ्ना निरपत्रपाः। ते सर्वे शंखतीर्थे स्मिञ्छुद्ध्यंति स्नानमात्रतः
ye cāpyanye durātmānaḥ kṛtaghnā nirapatrapāḥ te sarve śaṁkhatīrthe smiñchuddhyaṁti snānamātrataḥ
तथा अन्य भी जो दुरात्मा, कृतघ्न, निर्लज्ज हैं - वे सभी इस शंखतीर्थ में केवल स्नान से शुद्ध हो जाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.3.25.4)
शंखनामा मुनिः पूर्वं गंधमादनपर्वते। अवर्तत तपः कुर्वन्विष्णुं ध्यायन्समाहितः
śaṁkhanāmā muniḥ pūrvaṁ gaṁdhamādanaparvate avartata tapaḥ kurvanviṣṇuṁ dhyāyansamāhitaḥ
पूर्वकाल में शंख नामक मुनि गन्धमादन पर्वत पर, विष्णु का ध्यान करते हुए एकाग्रचित्त होकर तप करते थे।
श्लोक 5 (skanda.3.25.5)
स तत्र कल्पयामास स्नानार्थं तीर्थमुत्तमम्। शंखेन निर्मितं तीर्थं शंखतीर्थमितीर्यते
sa tatra kalpayāmāsa snānārthaṁ tīrthamuttamam śaṁkhena nirmitaṁ tīrthaṁ śaṁkhatīrthamitīryate
उन्होंने वहाँ स्नान के लिए एक उत्तम तीर्थ बनाया। शंख द्वारा निर्मित होने से वह शंखतीर्थ कहलाया।
श्लोक 6 (skanda.3.25.6)
तत्र स्नात्वा सकृन्मर्त्यः कृतघ्नोऽपिविमुच्यते १। अत्रेतिहासं वक्ष्यामि पुराणं पापनाशनम्
tatra snātvā sakṛnmartyaḥ kṛtaghno'pivimucyate 1 atretihāsaṁ vakṣyāmi purāṇaṁ pāpanāśanam
वहाँ एक बार स्नान करने से मरणशील मनुष्य, कृतघ्न होते हुए भी, मुक्त हो जाता है। यहाँ मैं पाप-नाशक एक पुरातन इतिहास कहूँगा,
श्लोक 7 (skanda.3.25.7)
यस्य श्रवणमात्रेण नरो मुक्तिमवाप्नुयात्। पुरा बभूव विप्रेंद्रो वत्सनाभो महामुनिः
yasya śravaṇamātreṇa naro muktimavāpnuyāt purā babhūva vipreṁdro vatsanābho mahāmuniḥ
जिसे सुनने-मात्र से मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है। पूर्वकाल में विप्रेन्द्र वत्सनाभ नामक एक महामुनि थे,
श्लोक 8 (skanda.3.25.8)
सत्यवाञ्छीलवान्वाग्मी सर्वभूतदयापरः। शत्रुमित्रसमो दांतस्तपस्वी विजितेंद्रियः
satyavāñchīlavānvāgmī sarvabhūtadayāparaḥ śatrumitrasamo dāṁtastapasvī vijiteṁdriyaḥ
सत्यवादी, शीलवान्, वाग्मी, सभी प्राणियों पर दया करने वाले, शत्रु-मित्र में समान, दान्त, तपस्वी, जितेन्द्रिय,
श्लोक 9 (skanda.3.25.9)
परब्रह्मणि निष्णातस्तत्त्वब्रह्मैकसंश्रयः। एवं प्रभावः स मुनिस्तपस्तेपे निजाश्रमे
parabrahmaṇi niṣṇātastattvabrahmaikasaṁśrayaḥ evaṁ prabhāvaḥ sa munistapastepe nijāśrame
परब्रह्म में निष्णात, केवल तत्त्व-ब्रह्म का ही आश्रय लेने वाले। ऐसे प्रभाव वाले उस मुनि ने अपने आश्रम में तप किया।
श्लोक 10 (skanda.3.25.10)
स वै निश्चलसर्वांगस्तिष्ठंस्तत्रैव भूतले। परमाण्वंतरं वापि न स्वस्थानाच्चचाल सः
sa vai niścalasarvāṁgastiṣṭhaṁstatraiva bhūtale paramāṇvaṁtaraṁ vāpi na svasthānāccacāla saḥ
वे सभी अंगों से निश्चल होकर, वहीं भूतल पर स्थित रहते, एक परमाणु के बराबर भी अपने स्थान से नहीं हिलते थे।
श्लोक 11 (skanda.3.25.11)
स्थित्वैकत्र तपस्यंतमनेकशतवत्सरान्। तमाचकाम वल्मीकं छादितांगं चकार च
sthitvaikatra tapasyaṁtamanekaśatavatsarān tamācakāma valmīkaṁ chāditāṁgaṁ cakāra ca
एक ही स्थान पर स्थित होकर अनेक सौ वर्षों तक तप करते हुए, उन्हें एक वल्मीक (बाँबी) ने ढक लिया और उनका पूरा शरीर आच्छादित कर दिया।
श्लोक 12 (skanda.3.25.12)
वल्मीकाक्रांतदेहोपि वत्सनाभो महामुनिः। अकरोत्तप एवासौ वल्मीकं न त्वबुद्ध्यत।
valmīkākrāṁtadehopi vatsanābho mahāmuniḥ akarottapa evāsau valmīkaṁ na tvabuddhyata
वल्मीक से देह ढके हुए भी वे महामुनि वत्सनाभ अपना तप करते ही रहे, उन्हें उस वल्मीक का पता ही नहीं चला।
श्लोक 13 (skanda.3.25.13)
तस्मिंश्च तप्यति तपो वासवो मुनिपुंगवाः।१ विसृज्य मेघजालानि वर्षयामास वेगवान्
tasmiṁśca tapyati tapo vāsavo munipuṁgavāḥ1 visṛjya meghajālāni varṣayāmāsa vegavān
हे मुनिपुंगवो! उनके तप करते समय, वासव (इन्द्र) ने मेघ-समूहों को छोड़कर वेगपूर्वक वर्षा कराई।
श्लोक 14 (skanda.3.25.14)
एवं दिनानि सप्तायं स ववर्ष निरं तरम्। आसारेणातिमहता वृष्यमाणोपि वै मुनिः
evaṁ dināni saptāyaṁ sa vavarṣa niraṁ taram āsāreṇātimahatā vṛṣyamāṇopi vai muniḥ
इस प्रकार वह सात दिनों तक निरन्तर वर्षा करता रहा। उस अत्यन्त प्रबल वर्षा से भीगते हुए भी वे मुनि,
श्लोक 15 (skanda.3.25.15)
तं वर्षं प्रतिजग्राह निमीलितविलोचनः। महता स्तनितेनाशु तदा बधिरयञ्छ्रुती।
taṁ varṣaṁ pratijagrāha nimīlitavilocanaḥ mahatā stanitenāśu tadā badhirayañchrutī
नेत्र मूँदे हुए उस वर्षा को सहते रहे; महाध्वनि से तत्काल ही उनके कान बहरे हो गए।
श्लोक 16 (skanda.3.25.16)
वल्मीकस्योपरिष्टाद्वै निपपात महाशनिः। तस्मिन्वर्षति पर्जन्ये शीतवातातिदुःसहे
valmīkasyopariṣṭādvai nipapāta mahāśaniḥ tasminvarṣati parjanye śītavātātiduḥsahe
वल्मीक के ऊपर ही एक महावज्र गिरा। उस पर्जन्य के वर्षा करते हुए, अत्यन्त असह्य शीतल पवन में,
श्लोक 17 (skanda.3.25.17)
वल्मीकशिखरं ध्वस्तं बभूवाशनिताडि तम्। विशीर्णशिखरे तस्मिन्वल्मीकेऽशनिताडिते
valmīkaśikharaṁ dhvastaṁ babhūvāśanitāḍi tam viśīrṇaśikhare tasminvalmīke'śanitāḍite
वल्मीक का शिखर वज्र से आहत होकर ध्वस्त हो गया। वज्र से आहत, शिखर के बिखरे हुए उस वल्मीक में,
श्लोक 18 (skanda.3.25.18)
सेहेतिदुःसहां वृष्टिं वत्सनाभो विचिंतयन्। महर्षौ वर्षधाराभिः पीड्यमाने दिवानि शम्
sehetiduḥsahāṁ vṛṣṭiṁ vatsanābho viciṁtayan maharṣau varṣadhārābhiḥ pīḍyamāne divāni śam
वत्सनाभ उस असह्य वृष्टि को सहते हुए, दिनों तक जल-धाराओं से पीड़ित महर्षि के विषय में सोचते हुए धर्म के मन में,
श्लोक 19 (skanda.3.25.19)
धर्मस्य चेतसि कृपा संबभूवातिभूयसी। स धर्मश्चिंतयामास वत्सनाभे तपस्यति
dharmasya cetasi kṛpā saṁbabhūvātibhūyasī sa dharmaściṁtayāmāsa vatsanābhe tapasyati
अत्यन्त गहरी कृपा उत्पन्न हुई। धर्म ने वत्सनाभ के तप करते समय यह विचार किया -
श्लोक 20 (skanda.3.25.20)
पतत्यप्यतिवर्षेऽयं तपसो न निवर्तते। अहोऽस्य वत्सनाभस्य धर्मैकायत्तचित्तता
patatyapyativarṣe'yaṁ tapaso na nivartate aho'sya vatsanābhasya dharmaikāyattacittatā
'इतनी वर्षा गिरने पर भी यह अपने तप से नहीं मुड़ता। अहो! इस वत्सनाभ का चित्त केवल धर्म में ही लगा हुआ है!'
श्लोक 21 (skanda.3.25.21)
इति चिंतयतस्तस्य मातिरेवमजायत। अहं वै माहिषं रूपं सुमहांतं मनोहरम्
iti ciṁtayatastasya mātirevamajāyata ahaṁ vai māhiṣaṁ rūpaṁ sumahāṁtaṁ manoharam
इस प्रकार विचार करते हुए उनके मन में यह विचार आया - 'मैं भैंसे का, अत्यन्त बड़ा, मनोहर रूप धारण करके,
श्लोक 22 (skanda.3.25.22)
वर्षधारानिपातानां सोढारं कठिनत्वचम्। स्वीकृत्य माहिषं रूपं स्थास्याम्युपरि योगिनः
varṣadhārānipātānāṁ soḍhāraṁ kaṭhinatvacam svīkṛtya māhiṣaṁ rūpaṁ sthāsyāmyupari yoginaḥ
वर्षा-धाराओं के गिरने को सहन करने वाली, कठोर त्वचा वाली उस देह को धारण करके, इस योगी के ऊपर खड़ा हो जाऊँगा;
श्लोक 23 (skanda.3.25.23)
न हि बाधिष्यते वर्षं महावेगयुतं त्वपि। धर्म एवं विनिश्चित्य धाराः पृष्ठेन धारयन्
na hi bādhiṣyate varṣaṁ mahāvegayutaṁ tvapi dharma evaṁ viniścitya dhārāḥ pṛṣṭhena dhārayan
तब वेगवान् वर्षा भी उसे बाधा नहीं देगी।' ऐसा निश्चय करके धर्म ने अपनी पीठ पर धाराओं को धारण करते हुए,
श्लोक 24 (skanda.3.25.24)
वत्सनाभोपरि तदा गात्रमाच्छाद्य तस्थिवान्। ततः सप्तदिनांते तु तद्वै वर्षमुपारमत्
vatsanābhopari tadā gātramācchādya tasthivān tataḥ saptadināṁte tu tadvai varṣamupāramat
वत्सनाभ के शरीर को अपने शरीर से ढककर उनके ऊपर खड़े रहे। तब सातवें दिन के अन्त में वह वर्षा रुक गई।
श्लोक 25 (skanda.3.25.25)
ततो महिषरूपी स धर्मोऽतिकृपया युतः। तद्वै वल्मीकमुत्सृज्य नातिदूरे ह्यवर्त्तत
tato mahiṣarūpī sa dharmo'tikṛpayā yutaḥ tadvai valmīkamutsṛjya nātidūre hyavarttata
तब वह महिष-रूपधारी धर्म, अत्यन्त कृपा से युक्त होकर, उस वल्मीक को छोड़कर वहाँ से अधिक दूर नहीं जाकर खड़ा हो गया।
श्लोक 26 (skanda.3.25.26)
ततो निवृते वर्षे तु वत्सनाभो महामुनिः। निवृत्तस्तपसस्तू र्णं दिशः सर्वा व्यलोकयन्
tato nivṛte varṣe tu vatsanābho mahāmuniḥ nivṛttastapasastū rṇaṁ diśaḥ sarvā vyalokayan
तब वर्षा रुक जाने पर महामुनि वत्सनाभ, तप से निवृत्त होकर, शीघ्र ही सभी दिशाओं की ओर देखने लगे।
श्लोक 27 (skanda.3.25.27)
स्थितोऽहं वृष्टिसंपाते कुर्वन्नद्य महत्तपः। पृथिवी सलिलाक्लिन्ना दृश्यते सर्वतोदिशम्
sthito'haṁ vṛṣṭisaṁpāte kurvannadya mahattapaḥ pṛthivī salilāklinnā dṛśyate sarvatodiśam
'आज मैं इस वर्षा-पात में महान् तप करता हुआ स्थित रहा; पृथ्वी सभी दिशाओं में जल से भीगी हुई दिखाई दे रही है।
श्लोक 28 (skanda.3.25.28)
शिखराणि गिरीणां च वना न्युपवनानि च। आश्रमाणि महर्षीणामाप्लुतानि जलैर्नवैः
śikharāṇi girīṇāṁ ca vanā nyupavanāni ca āśramāṇi maharṣīṇāmāplutāni jalairnavaiḥ
पर्वतों के शिखर, वन-उपवन, तथा महर्षियों के आश्रम भी नए जल से आप्लावित हैं।'
श्लोक 29 (skanda.3.25.29)
एवमादीनि सर्वाणि दृष्ट्वा प्रमुदितोऽभवत्। चिंतयामास धर्मात्मा वत्सना भो महामुनिः
evamādīni sarvāṇi dṛṣṭvā pramudito'bhavat ciṁtayāmāsa dharmātmā vatsanā bho mahāmuniḥ
इन सब को देखकर वे प्रसन्न हुए। धर्मात्मा महामुनि वत्सनाभ ने यह विचार किया -
श्लोक 30 (skanda.3.25.30)
अहमस्मिन्महावर्षे नूनं केनापि रक्षितः। वर्षत्यस्मिन्महावर्षे जीवितं त्वन्यथा कुतः
ahamasminmahāvarṣe nūnaṁ kenāpi rakṣitaḥ varṣatyasminmahāvarṣe jīvitaṁ tvanyathā kutaḥ
'निश्चय ही मैं इस महावर्षा में किसी के द्वारा रक्षित हुआ हूँ; इस महावर्षा के होते हुए मेरा जीवन अन्यथा कैसे बचता?'
श्लोक 31 (skanda.3.25.31)
विचिंत्यैवं मुनिश्रेष्ठः सर्वत्र समलोकयत्। ततोऽपश्यन्महाकायमदूरादग्रतः स्थितम्
viciṁtyaivaṁ muniśreṣṭhaḥ sarvatra samalokayat tato'paśyanmahākāyamadūrādagrataḥ sthitam
इस प्रकार विचार करते हुए उस श्रेष्ठ मुनि ने चारों ओर देखा। तब उन्होंने अधिक दूर नहीं, अपने सामने खड़े,
श्लोक 32 (skanda.3.25.32)
महिषं नीलवर्णं च वत्सनाभस्तपोधनः। महिषं तं समुद्दिश्य मनसा समचिंतयत्
mahiṣaṁ nīlavarṇaṁ ca vatsanābhastapodhanaḥ mahiṣaṁ taṁ samuddiśya manasā samaciṁtayat
विशाल शरीर वाले नीलवर्ण भैंसे को देखा। तपोधन वत्सनाभ ने उस भैंसे के विषय में मन में यह विचार किया -
श्लोक 33 (skanda.3.25.33)
तिर्यग्योनिष्वपि कथं दृश्यते धर्मशीलता। यतो ह्यहं महावर्षान्महिषेणाभिरक्षितः
tiryagyoniṣvapi kathaṁ dṛśyate dharmaśīlatā yato hyahaṁ mahāvarṣānmahiṣeṇābhirakṣitaḥ
'तिर्यक्-योनियों में भी धर्मशीलता कैसे दिखाई देती है? क्योंकि मैं इस महावर्षा से इस भैंसे द्वारा रक्षित हुआ हूँ।
श्लोक 34 (skanda.3.25.34)
दीर्घमायुरमुष्यास्तु यन्मां रक्षितवानिह। इत्यादि स विचिंत्यैवं तपसे पुनरुद्ययौ
dīrghamāyuramuṣyāstu yanmāṁ rakṣitavāniha ityādi sa viciṁtyaivaṁ tapase punarudyayau
इसकी आयु दीर्घ हो, जिसने मुझे यहाँ बचाया।' इस प्रकार विचार करके वे पुनः तप के लिए प्रवृत्त हुए।
श्लोक 35 (skanda.3.25.35)
तं पुनश्च तपस्यंतं दृष्ट्वा महिषरूपधृक्। रोमांचावृतसर्वांगः प्रमोदमगमद्भृशम्।
taṁ punaśca tapasyaṁtaṁ dṛṣṭvā mahiṣarūpadhṛk romāṁcāvṛtasarvāṁgaḥ pramodamagamadbhṛśam
उन्हें पुनः तप करते देखकर, वह महिष-रूपधारी, समस्त शरीर में रोमांच से आवृत होकर, अत्यन्त हर्षित हुआ।
श्लोक 36 (skanda.3.25.36)
वत्सनाभस्य हि मुनेः पुनश्चैव तपस्यतः। मनः पूर्ववदेकाग्रं परब्रह्मणि नाभवत्
vatsanābhasya hi muneḥ punaścaiva tapasyataḥ manaḥ pūrvavadekāgraṁ parabrahmaṇi nābhavat
किन्तु मुनि वत्सनाभ का मन, पुनः तप करते हुए भी, पहले की भाँति परब्रह्म में एकाग्र नहीं हुआ।
श्लोक 37 (skanda.3.25.37)
स विषण्णमना भूत्वा वत्सनाभो व्यचिंतयत्। न भवेद्यदि नैर्मल्यं तदा स्याच्चंचलं मनः
sa viṣaṇṇamanā bhūtvā vatsanābho vyaciṁtayat na bhavedyadi nairmalyaṁ tadā syāccaṁcalaṁ manaḥ
वे मन में खिन्न होकर विचार करने लगे - 'यदि निर्मलता न हो, तभी मन चंचल होता है।
श्लोक 38 (skanda.3.25.38)
मनश्च पापबाहुल्ये निर्मलं नैव जायते। पापलेशोपि मे नास्ति कथं लोला यते मनः
manaśca pāpabāhulye nirmalaṁ naiva jāyate pāpaleśopi me nāsti kathaṁ lolā yate manaḥ
और मन पाप की बहुलता में निर्मल नहीं होता। मुझमें तो पाप का लेश भी नहीं है, फिर मन क्यों चंचल है?'
श्लोक 39 (skanda.3.25.39)
अचिंतयद्दोषहेतुं वत्सनाभः पुनःपुनः। स विचिंत्य विनिश्चित्य निनिंदात्मानमंजसा
aciṁtayaddoṣahetuṁ vatsanābhaḥ punaḥpunaḥ sa viciṁtya viniścitya niniṁdātmānamaṁjasā
वत्सनाभ ने बार-बार दोष के कारण पर विचार किया। विचारकर, निश्चय करके, उन्होंने सीधे अपनी ही निन्दा की -
श्लोक 40 (skanda.3.25.40)
धिङ्मामद्य दुरात्मानमहो मूढोस्म्यहं भृशम्। कृतघ्नता महादोषो मामद्य समुपागतः
dhiṅmāmadya durātmānamaho mūḍhosmyahaṁ bhṛśam kṛtaghnatā mahādoṣo māmadya samupāgataḥ
'धिक्कार है मुझ दुरात्मा को, अहो! मैं आज अत्यन्त मूढ़ हूँ! कृतघ्नता का महादोष मुझ पर आज आ पड़ा है।
श्लोक 41 (skanda.3.25.41)
यदीदृशान्महावर्षात्त्रातारं महिषोत्तमम्। तिष्ठाम्यपूजयन्नेव ततो मे भूत्कृतघ्नता
yadīdṛśānmahāvarṣāttrātāraṁ mahiṣottamam tiṣṭhāmyapūjayanneva tato me bhūtkṛtaghnatā
क्योंकि ऐसी महावर्षा से बचाने वाले उस श्रेष्ठ भैंसे की पूजा किए बिना ही मैं बैठा रहा, इसलिए मुझमें कृतघ्नता हुई।
श्लोक 42 (skanda.3.25.42)
कृतघ्नता महान्दोषः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः। कृतघ्नस्य न वै लोकाः कृतघ्नस्य न बांधवाः
kṛtaghnatā mahāndoṣaḥ kṛtaghne nāsti niṣkṛtiḥ kṛtaghnasya na vai lokāḥ kṛtaghnasya na bāṁdhavāḥ
कृतघ्नता महान् दोष है, कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित नहीं है। कृतघ्न के सच्चे लोक नहीं होते, कृतघ्न के सच्चे बन्धु नहीं होते।
श्लोक 43 (skanda.3.25.43)
कृतघ्नतादोष वलान्मम चित्तं मलीमसम्। कृतघ्ना नरकं यांति ये च विश्वस्तघातिनः
kṛtaghnatādoṣa valānmama cittaṁ malīmasam kṛtaghnā narakaṁ yāṁti ye ca viśvastaghātinaḥ
कृतघ्नता के दोष से मेरा चित्त मलिन हो गया है। कृतघ्न लोग नरक जाते हैं, तथा वे भी जो विश्वास करने वाले का घात करते हैं।
श्लोक 44 (skanda.3.25.44)
निष्कृतिं नैव पश्यामि कृतघ्नानां कथंचन। ऋते प्राणपरित्यागाद्धर्मज्ञानां वचो यथा
niṣkṛtiṁ naiva paśyāmi kṛtaghnānāṁ kathaṁcana ṛte prāṇaparityāgāddharmajñānāṁ vaco yathā
कृतघ्नों का कोई प्रायश्चित मुझे कहीं भी दिखाई नहीं देता, प्राणों के त्याग के अतिरिक्त - जैसा धर्मज्ञों का वचन है।
श्लोक 45 (skanda.3.25.45)
पित्रोरभरणं कृत्वा ह्यदत्त्वा गुरुदक्षिणाम्। कृतघ्नतां च संप्राप्य मरणांता हि निष्कृतिः
pitrorabharaṇaṁ kṛtvā hyadattvā gurudakṣiṇām kṛtaghnatāṁ ca saṁprāpya maraṇāṁtā hi niṣkṛtiḥ
माता-पिता का भरण न करके, गुरु-दक्षिणा न देकर, और कृतघ्नता प्राप्त करके, मृत्यु ही प्रायश्चित है।
श्लोक 46 (skanda.3.25.46)
तस्मात्प्राणान्परित्यज्य प्रायश्चित्तं चराम्यहम्। इति निश्चित्य मनसा वत्सनाभो महामुनिः
tasmātprāṇānparityajya prāyaścittaṁ carāmyaham iti niścitya manasā vatsanābho mahāmuniḥ
इसलिए प्राणों का त्याग करके मैं प्रायश्चित करता हूँ' - ऐसा मन में निश्चय करके महामुनि वत्सनाभ ने,
श्लोक 47 (skanda.3.25.47)
तृणीकृत्य निजान्प्राणान्निःसंगेनांतरा त्मना। मेरोः शिखरमारूढः प्रायश्चित्तचिकीर्षया
tṛṇīkṛtya nijānprāṇānniḥsaṁgenāṁtarā tmanā meroḥ śikharamārūḍhaḥ prāyaścittacikīrṣayā
अपने प्राणों को तृण के समान मानकर, निःसंग अन्तरात्मा से, प्रायश्चित करने की इच्छा से मेरु के शिखर पर चढ़ गए।
श्लोक 48 (skanda.3.25.48)
सुमेरुशिखरात्तस्मादियेष पतितुं मुनिः। तस्मिन्पतितुमारब्धे मा त्वरिष्ठा इति ब्रुवन्। त्यक्तमाहिषरूपः सन्धर्म एव न्यवारयत्
sumeruśikharāttasmādiyeṣa patituṁ muniḥ tasminpatitumārabdhe mā tvariṣṭhā iti bruvan tyaktamāhiṣarūpaḥ sandharma eva nyavārayat
उस सुमेरु-शिखर से वे मुनि गिरना चाहते थे। उनके गिरने का प्रयत्न आरम्भ करते ही 'शीघ्रता मत करो' - ऐसा कहते हुए, भैंसे का रूप त्यागकर स्वयं धर्म ने उन्हें रोक दिया।
श्लोक 49 (skanda.3.25.49)
धर्म उवाच। वत्सनाभ महाप्राज्ञ जीवस्व बहुवत्सरान्
dharma uvāca vatsanābha mahāprājña jīvasva bahuvatsarān
धर्म ने कहा - 'हे वत्सनाभ, महाप्राज्ञ! बहुत वर्षों तक जीवित रहो।
श्लोक 50 (skanda.3.25.50)
परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते देहत्यागचिकीर्षया। न हि त्वद्धर्मकक्षायां लोके कश्चित्समोऽस्ति वै
parituṣṭo'smi bhadraṁ te dehatyāgacikīrṣayā na hi tvaddharmakakṣāyāṁ loke kaścitsamo'sti vai
तुम्हारी देह-त्याग की इच्छा से मैं अत्यन्त संतुष्ट हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; क्योंकि लोक में तुम्हारे धर्म की कक्षा के समान कोई नहीं है।
श्लोक 51 (skanda.3.25.51)
यद्यपि प्राणसंत्यागः कृतघ्ने निष्कृतिर्भवेत्। तथापि धर्मशीलत्वात्तवान्यां निष्कृतिं वदे
yadyapi prāṇasaṁtyāgaḥ kṛtaghne niṣkṛtirbhavet tathāpi dharmaśīlatvāttavānyāṁ niṣkṛtiṁ vade
यद्यपि कृतघ्न के लिए प्राण-त्याग ही प्रायश्चित है, फिर भी तुम्हारे धर्मशील होने के कारण मैं तुम्हें एक अन्य प्रायश्चित बताता हूँ।
श्लोक 52 (skanda.3.25.52)
शंखतीर्थाभिधं तीर्थमस्ति वै गंधमादने। शांत्यर्थमस्य पापस्य तत्र स्नाहि समाहितः।
śaṁkhatīrthābhidhaṁ tīrthamasti vai gaṁdhamādane śāṁtyarthamasya pāpasya tatra snāhi samāhitaḥ
गन्धमादन में शंखतीर्थ नामक एक तीर्थ है; इस पाप की शान्ति के लिए, एकाग्रचित्त होकर वहाँ स्नान करो।
श्लोक 53 (skanda.3.25.53)
प्राप्स्यसे चित्तशुद्धिं त्वमतो विगतकल्मषः। ततश्च लब्धविज्ञानः प्राप्स्यसे शाश्वतं पदम्
prāpsyase cittaśuddhiṁ tvamato vigatakalmaṣaḥ tataśca labdhavijñānaḥ prāpsyase śāśvataṁ padam
इससे तुम चित्त-शुद्धि प्राप्त करोगे, पाप-रहित हो जाओगे। फिर ज्ञान प्राप्त करके तुम शाश्वत पद प्राप्त करोगे।
श्लोक 54 (skanda.3.25.54)
अहं धर्मोस्मि योगीन्द्र सत्यमेव ब्रवीमि ते। इति धर्मवचः श्रुत्वा वत्सनाभो महामुनिः
ahaṁ dharmosmi yogīndra satyameva bravīmi te iti dharmavacaḥ śrutvā vatsanābho mahāmuniḥ
हे योगीन्द्र! मैं ही धर्म हूँ, मैं तुम्हें केवल सत्य कह रहा हूँ।' धर्म के इस वचन को सुनकर महामुनि वत्सनाभ,
श्लोक 55 (skanda.3.25.55)
स्नातुकामः शंखतीर्थे गंधमादनमन्वगात्। शंखतीर्थं च संप्राप्य तत्र सस्नौ महामुनिः
snātukāmaḥ śaṁkhatīrthe gaṁdhamādanamanvagāt śaṁkhatīrthaṁ ca saṁprāpya tatra sasnau mahāmuniḥ
शंखतीर्थ में स्नान की इच्छा से गन्धमादन को गए। शंखतीर्थ पहुँचकर उस महामुनि ने वहाँ स्नान किया।
श्लोक 56 (skanda.3.25.56)
ततो विगतपापस्य मनो निर्मलतां गतम्। ततोऽचिरेण कालेन ब्रह्मभूयमगान्मुनिः
tato vigatapāpasya mano nirmalatāṁ gatam tato'cireṇa kālena brahmabhūyamagānmuniḥ
तब पाप-मुक्त होकर उनका मन निर्मलता को प्राप्त हुआ। फिर अल्प समय में ही वह मुनि ब्रह्म-भाव को प्राप्त हुए।
श्लोक 57 (skanda.3.25.57)
एवं वः कथितं विप्राः शंखतीर्थस्य वैभवम्। यत्र हि स्नानमात्रेण कृतघ्नोऽपि विमुच्यते
evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāḥ śaṁkhatīrthasya vaibhavam yatra hi snānamātreṇa kṛtaghno'pi vimucyate
हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें शंखतीर्थ की महिमा बताई, जहाँ केवल स्नान से कृतघ्न भी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 58 (skanda.3.25.58)
मातृद्रोही पितृद्रोही गुरुद्रोही तथैव च। अन्ये कृतघ्ननिवहा मुच्यंतेऽत्र निमज्जनात्
mātṛdrohī pitṛdrohī gurudrohī tathaiva ca anye kṛtaghnanivahā mucyaṁte'tra nimajjanāt
माता-द्रोही, पिता-द्रोही, तथा वैसे ही गुरु-द्रोही, और अन्य कृतघ्नों के समूह भी यहाँ निमज्जन से मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 59 (skanda.3.25.59)
अतः कृतघ्नैर्मनुजैः सेवनीयमिदं सदा। अहो तीर्थस्य माहात्म्यं यत्कृतघ्नोपि मुच्यते
ataḥ kṛtaghnairmanujaiḥ sevanīyamidaṁ sadā aho tīrthasya māhātmyaṁ yatkṛtaghnopi mucyate
इसलिए यह तीर्थ कृतघ्न मनुष्यों द्वारा सदा सेवन करने योग्य है। अहो! तीर्थ की यह महिमा है कि कृतघ्न भी मुक्त हो जाता है!
श्लोक 60 (skanda.3.25.60)
अकृत्वा भरणं पित्रोरदत्त्वा गुरुदक्षिणाम्। कृतघ्नतां च संप्राप्य मरणांता हि निष्कृतिः
akṛtvā bharaṇaṁ pitroradattvā gurudakṣiṇām kṛtaghnatāṁ ca saṁprāpya maraṇāṁtā hi niṣkṛtiḥ
माता-पिता का भरण किए बिना, गुरु-दक्षिणा दिए बिना, और कृतघ्नता प्राप्त करके, मृत्यु ही प्रायश्चित है।
श्लोक 61 (skanda.3.25.61)
इह तु स्नानमात्रेण कृतघ्नस्यापि निष्कृतिः। कृतघ्नतापि तत्तीर्थे स्नानमात्राद्विनश्यति
iha tu snānamātreṇa kṛtaghnasyāpi niṣkṛtiḥ kṛtaghnatāpi tattīrthe snānamātrādvinaśyati
किन्तु यहाँ केवल स्नान से कृतघ्न का भी प्रायश्चित हो जाता है; कृतघ्नता भी इस तीर्थ में केवल स्नान से नष्ट हो जाती है।
श्लोक 62 (skanda.3.25.62)
अन्येषां तुच्छपापानां सर्वेषां किमुताधुना
anyeṣāṁ tucchapāpānāṁ sarveṣāṁ kimutādhunā
फिर अन्य सभी तुच्छ पापों की तो अभी क्या ही बात है!
श्लोक 63 (skanda.3.25.63)
अध्यायमेनं पठेद्भक्तियुक्तः कृतघ्नोपि मर्त्याः स पापाद्विमुक्तः। विशुद्धांतरात्मा गतः सत्यलोकं समं ब्रह्मणा मोक्षमप्याशु गच्छेत्
adhyāyamenaṁ paṭhedbhaktiyuktaḥ kṛtaghnopi martyāḥ sa pāpādvimuktaḥ viśuddhāṁtarātmā gataḥ satyalokaṁ samaṁ brahmaṇā mokṣamapyāśu gacchet
जो भक्तियुक्त होकर इस अध्याय को पढ़ता है, वह कृतघ्न मरणशील प्राणी भी उस पाप से मुक्त हो जाता है; विशुद्ध अन्तरात्मा होकर वह सत्यलोक को जाता है और ब्रह्मा के साथ शीघ्र मोक्ष को भी प्राप्त करता है।