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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 26

यमुना-गंगा-गया तीर्थों की महिमा और जानश्रुति की ज्ञान-प्राप्ति

अध्याय 25अध्याय-सूचीअध्याय 27

श्लोक 1 (skanda.3.26.1)

श्रीसूत उवाच। विधायाभिषवं मर्त्याः शंखतीर्थे द्विजोत्तमाः। यमुनां चैव गंगां च गयां चापि क्रमाद्व्रजेत्

śrīsūta uvāca vidhāyābhiṣavaṁ martyāḥ śaṁkhatīrthe dvijottamāḥ yamunāṁ caiva gaṁgāṁ ca gayāṁ cāpi kramādvrajet

श्रीसूत जी ने कहा - हे द्विजोत्तमो! शंखतीर्थ में स्नान करके मरणशील मनुष्यों को क्रमशः यमुना, गंगा और गया भी जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.3.26.2)

यमुनाख्यं महातीर्थं गंगातीर्थमनुत्तमम्। गयातीर्थं च मर्त्यानां महापातकनाशनम्

yamunākhyaṁ mahātīrthaṁ gaṁgātīrthamanuttamam gayātīrthaṁ ca martyānāṁ mahāpātakanāśanam

यमुना नामक महातीर्थ, गंगातीर्थ और गयातीर्थ - ये तीनों मरणशील मनुष्यों के महापातकों के नाशक हैं।

श्लोक 3 (skanda.3.26.3)

एतत्तीर्थत्रयं पुण्यं सर्वलोकेषु विश्रुतम्। सर्वविघ्नप्रशमनं सर्वरोगनिबर्हणम्

etattīrthatrayaṁ puṇyaṁ sarvalokeṣu viśrutam sarvavighnapraśamanaṁ sarvaroganibarhaṇam

यह तीनों पुण्यमय तीर्थ सभी लोकों में विख्यात हैं, सभी विघ्नों को शान्त करने वाले, सभी रोगों का नाश करने वाले हैं।

श्लोक 4 (skanda.3.26.4)

एतद्धि तीर्थत्रितयं सकलाज्ञाननाशनम्। अविद्यायां विनष्टायां तथा ज्ञानप्रदं नृणाम्

etaddhi tīrthatritayaṁ sakalājñānanāśanam avidyāyāṁ vinaṣṭāyāṁ tathā jñānapradaṁ nṛṇām

यह तीनों तीर्थ समस्त अज्ञान का नाशक हैं; अविद्या नष्ट होने पर वे मनुष्यों को वैसे ही ज्ञान देने वाले हैं।

श्लोक 5 (skanda.3.26.5)

जानश्रुतिर्महाराज एषु तीर्थेषु वै पुरा। स्नात्वा रैक्वाद्द्विजश्रेष्ठात्प्राप्तवाञ्ज्ञानमुत्तमम्

jānaśrutirmahārāja eṣu tīrtheṣu vai purā snātvā raikvāddvijaśreṣṭhātprāptavāñjñānamuttamam

महाराज जानश्रुति ने पूर्वकाल में इन्हीं तीर्थों में स्नान करके, द्विजश्रेष्ठ रैक्व से उत्तम ज्ञान प्राप्त किया था।

श्लोक 6 (skanda.3.26.6)

ऋषय ऊचुः। सूत सर्वार्थतत्त्वज्ञ व्यासशिष्य महामते। यमुना चैव गंगा च गया चैवेति विश्रुतम्

ṛṣaya ūcuḥ sūta sarvārthatattvajña vyāsaśiṣya mahāmate yamunā caiva gaṁgā ca gayā caiveti viśrutam

ऋषियों ने कहा - हे सूत, सभी अर्थों के तत्त्वज्ञ, व्यास-शिष्य, महामते! यमुना, गंगा और गया - इस प्रकार विख्यात,

श्लोक 7 (skanda.3.26.7)

एतत्तीर्थत्रयं कस्मादागतं गंधमादने। जानश्रुतेश्च राजर्षेः स्नानात्तीर्थत्रयेऽपि च। ज्ञानावाप्तिः कथं रैक्वादस्माकं सूत तद्वद

etattīrthatrayaṁ kasmādāgataṁ gaṁdhamādane jānaśruteśca rājarṣeḥ snānāttīrthatraye'pi ca jñānāvāptiḥ kathaṁ raikvādasmākaṁ sūta tadvada

यह तीनों तीर्थ गन्धमादन में कहाँ से आए? और राजर्षि जानश्रुति को उन तीनों तीर्थों में स्नान से रैक्व से ज्ञान की प्राप्ति कैसे हुई, हे सूत! वह हमें बताइए।

श्लोक 8 (skanda.3.26.8)

श्रीसूत उवाच। रैक्वनामा महर्षिस्तु पुरा वै गन्धमादने

śrīsūta uvāca raikvanāmā maharṣistu purā vai gandhamādane

श्रीसूत जी ने कहा - रैक्व नामक एक महर्षि पूर्वकाल में गन्धमादन में,

श्लोक 9 (skanda.3.26.9)

तपस्सुदुश्चरं कुर्वन्न्यवसत्तपसां निधिः। दीर्घकालं तपः कुर्वन्स वै रैक्वो महामुनिः

tapassuduścaraṁ kurvannyavasattapasāṁ nidhiḥ dīrghakālaṁ tapaḥ kurvansa vai raikvo mahāmuniḥ

अत्यन्त दुष्कर तप करते हुए, तपस्याओं के निधि, निवास करते थे। दीर्घकाल तक तप करते हुए वे रैक्व महामुनि,

श्लोक 10 (skanda.3.26.10)

तपोबलेन महता दीर्घमायुरवाप्तवान्। जन्मना पंगुरेवासीद्रैक्वनामा महामुनिः

tapobalena mahatā dīrghamāyuravāptavān janmanā paṁgurevāsīdraikvanāmā mahāmuniḥ

अपने तप के महान् बल से दीर्घ आयु प्राप्त कर चुके थे। रैक्व नामक वह महामुनि जन्म से ही पंगु थे।

श्लोक 11 (skanda.3.26.11)

पंगुत्वादसमर्थोऽभूद्गंतुं तीर्थान्यसौ मुनिः। संति यानि तु तीर्थानि गन्धमादनपर्वते

paṁgutvādasamartho'bhūdgaṁtuṁ tīrthānyasau muniḥ saṁti yāni tu tīrthāni gandhamādanaparvate

पंगुता के कारण वे मुनि तीर्थों में जाने में असमर्थ थे। गन्धमादन पर्वत पर जो भी तीर्थ थे,

श्लोक 12 (skanda.3.26.12)

तानि गच्छति सामीप्याच्छकटेनैव संचरन्। स यद्रैक्वो मुनिवरो युग्वेन सह वर्तते

tāni gacchati sāmīpyācchakaṭenaiva saṁcaran sa yadraikvo munivaro yugvena saha vartate

वे उनके निकट होने के कारण गाड़ी में ही जाकर उन्हें प्राप्त करते थे। चूँकि रैक्व मुनिवर 'युग्व' (गाड़ी) के साथ रहते थे,

श्लोक 13 (skanda.3.26.13)

तपस्वी वैदिकैर्लोके सयुग्वैत्यभिधीयते। युग्वेति शकटं प्रोक्तं स तेन सह वर्तते

tapasvī vaidikairloke sayugvaityabhidhīyate yugveti śakaṭaṁ proktaṁ sa tena saha vartate

इसलिए वैदिक लोग उस तपस्वी को लोक में 'सयुग्व' कहते थे। 'युग्व' गाड़ी को कहा जाता है, वे उसी के साथ रहते थे।

श्लोक 14 (skanda.3.26.14)

स खल्वेवं मुनिश्रेष्ठः सयुग्वानाम वै मुनिः। पूर्णज्ञानस्तपस्तेपे गन्धमादनपर्वते

sa khalvevaṁ muniśreṣṭhaḥ sayugvānāma vai muniḥ pūrṇajñānastapastepe gandhamādanaparvate

वे मुनिश्रेष्ठ 'सयुग्व' नामक मुनि, पूर्ण-ज्ञान से युक्त होकर गन्धमादन पर्वत पर तप करते थे।

श्लोक 15 (skanda.3.26.15)

ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यस्थः सोऽतप्यत महत्तपः। वर्षायां कण्ठदघ्नेषु जलेषु समवर्तत

grīṣme pañcāgnimadhyasthaḥ so'tapyata mahattapaḥ varṣāyāṁ kaṇṭhadaghneṣu jaleṣu samavartata

ग्रीष्म में पंचाग्नि के मध्य स्थित होकर वे महान् तप करते थे; वर्षा में कण्ठ तक जल में डूबे रहते थे।

श्लोक 16 (skanda.3.26.16)

तपसा शोषिते गात्रे पामा तस्य व्यजायत। कण्डूयत स पामानं दिवारात्रं मुनीश्वरः

tapasā śoṣite gātre pāmā tasya vyajāyata kaṇḍūyata sa pāmānaṁ divārātraṁ munīśvaraḥ

तप से उनका शरीर सूख जाने पर उन्हें खुजली (पामा) हो गई। वे मुनीश्वर दिन-रात उस खुजली को खुजलाते रहते थे।

श्लोक 17 (skanda.3.26.17)

कण्डूयमान एवायं पामानं न तपोऽत्यजत्। अजायत मनस्त्वेवं तस्य सयुग्वनो मुनेः

kaṇḍūyamāna evāyaṁ pāmānaṁ na tapo'tyajat ajāyata manastvevaṁ tasya sayugvano muneḥ

खुजलाते हुए भी वे कभी अपना तप नहीं छोड़ते थे। तब उस सयुग्व मुनि के मन में यह विचार आया -

श्लोक 18 (skanda.3.26.18)

यमुनायां च गंगायां गयायां चाधुनैव हि। अस्मिंस्तीर्थे त्रये पुण्ये स्नातव्यं हि मया त्विति

yamunāyāṁ ca gaṁgāyāṁ gayāyāṁ cādhunaiva hi asmiṁstīrthe traye puṇye snātavyaṁ hi mayā tviti

'यमुना में, गंगा में और अभी गया में भी - इन तीनों पुण्यमय तीर्थों में मुझे स्नान करना चाहिए।'

श्लोक 19 (skanda.3.26.19)

एवं विचिंत्य स मुनिरन्यां चिंतामथाकरोत्। अहं हि जन्मना पंगुरतः स्नानं हि दुर्लभम्

evaṁ viciṁtya sa muniranyāṁ ciṁtāmathākarot ahaṁ hi janmanā paṁgurataḥ snānaṁ hi durlabham

इस प्रकार विचार करके उन मुनि के मन में एक और विचार आया - 'मैं जन्म से ही पंगु हूँ, अतः स्नान करना दुर्लभ है।

श्लोक 20 (skanda.3.26.20)

अतिदूरं मया गन्तुं शकटेन न शक्यते। किं करोम्यधुनेत्येवं स वितर्क्य महामतिः

atidūraṁ mayā gantuṁ śakaṭena na śakyate kiṁ karomyadhunetyevaṁ sa vitarkya mahāmatiḥ

मेरे लिए गाड़ी से इतनी दूर जाना संभव नहीं है। अब मैं क्या करूँ' - ऐसा तर्क करके उन महामति ने,

श्लोक 21 (skanda.3.26.21)

तीर्थत्रयेषु स्नानार्थं कर्तव्यं निश्चिकाय वै। अप्रसह्यमनाधृष्यं विद्यते मे तपोबलम्

tīrthatrayeṣu snānārthaṁ kartavyaṁ niścikāya vai aprasahyamanādhṛṣyaṁ vidyate me tapobalam

तीनों तीर्थों में स्नान के लिए एक निश्चय किया - 'मेरे पास असह्य, अजेय तपोबल विद्यमान है।

श्लोक 22 (skanda.3.26.22)

तेनैवावाहयिष्यामि तद्धि तीर्थत्रयं त्विह। इति निश्चित्य मनसा प्राङ्मुखो नियतेंद्रियः

tenaivāvāhayiṣyāmi taddhi tīrthatrayaṁ tviha iti niścitya manasā prāṅmukho niyateṁdriyaḥ

उसी से मैं उन तीनों तीर्थों को यहीं बुला लूँगा।' मन में यह निश्चय करके, पूर्वाभिमुख, इन्द्रियसंयत होकर,

श्लोक 23 (skanda.3.26.23)

त्रिराचम्य च सयुग्वान्दध्यौ क्षणमतंद्रितः। तस्य मंत्रप्रभावेन यमुना सा महानदी

trirācamya ca sayugvāndadhyau kṣaṇamataṁdritaḥ tasya maṁtraprabhāvena yamunā sā mahānadī

तीन बार आचमन करके सयुग्व ने एक क्षण तक अनथक ध्यान किया। उनके मंत्र-प्रभाव से वह महानदी यमुना,

श्लोक 24 (skanda.3.26.24)

गंगा च जह्नुतनया गया सा पापनाशिनी। भूमिं निर्भिद्य तिस्रोपि पातालात्सहसोत्थिताः

gaṁgā ca jahnutanayā gayā sā pāpanāśinī bhūmiṁ nirbhidya tisropi pātālātsahasotthitāḥ

जह्नु-पुत्री गंगा, और पाप-नाशक गया - तीनों ही भूमि को भेदकर पाताल से सहसा उठ खड़ी हुईं,

श्लोक 25 (skanda.3.26.25)

मानुषं रूपमास्थाय सयुग्वानमुपेत्य च। ऊचुः परमसंहृष्टा हर्षयंत्यश्च तं मुनिम्

mānuṣaṁ rūpamāsthāya sayugvānamupetya ca ūcuḥ paramasaṁhṛṣṭā harṣayaṁtyaśca taṁ munim

मानव-रूप धारण करके, सयुग्व के पास जाकर, अत्यन्त हर्षित होकर, उस मुनि को प्रसन्न करती हुई बोलीं -

श्लोक 26 (skanda.3.26.26)

सयुग्वन्रैक्व भद्रं ते ध्यानादस्मादुपारम। त्वन्मंत्रेण समाकृष्टा वयमत्र समागताः

sayugvanraikva bhadraṁ te dhyānādasmādupārama tvanmaṁtreṇa samākṛṣṭā vayamatra samāgatāḥ

'हे सयुग्व रैक्व! तुम्हारा कल्याण हो। इस ध्यान से निवृत्त हो जाओ। तुम्हारे मंत्र से आकृष्ट होकर हम यहाँ आई हैं।

श्लोक 27 (skanda.3.26.27)

कि कर्तव्यं तवास्माभिस्तद्वदस्व मुनीश्वर। इति तासां वचः श्रुत्वा सयुग्वान्हि महामुनिः

ki kartavyaṁ tavāsmābhistadvadasva munīśvara iti tāsāṁ vacaḥ śrutvā sayugvānhi mahāmuniḥ

हमें तुम्हारे लिए क्या करना है, हे मुनीश्वर! वह बताओ।' उनका यह वचन सुनकर सयुग्व महामुनि,

श्लोक 28 (skanda.3.26.28)

ध्यानादुपारमत्तूर्णं ताश्चापश्यत्पुरः स्थिताः। स ताः संपूज्य विधिवद्रैक्वो वाचमभाषत

dhyānādupāramattūrṇaṁ tāścāpaśyatpuraḥ sthitāḥ sa tāḥ saṁpūjya vidhivadraikvo vācamabhāṣata

शीघ्र ध्यान से निवृत्त होकर उन्हें अपने सामने खड़ा हुआ देखा। उनकी विधिपूर्वक पूजा करके रैक्व ने यह वचन कहा -

श्लोक 29 (skanda.3.26.29)

यमुने देवि हे गंगे हे गये पापनाशिनि। सन्निधानं कुरुध्वं मे गन्धमादनपर्वते

yamune devi he gaṁge he gaye pāpanāśini sannidhānaṁ kurudhvaṁ me gandhamādanaparvate

'हे देवी यमुने! हे गंगे! हे पाप-नाशिनी गये! तुम गन्धमादन पर्वत पर मेरे लिए अपना सान्निध्य स्थापित करो,

श्लोक 30 (skanda.3.26.30)

यत्र भूमिं विनिर्भिद्य भवत्य इह निर्गताः। तानि पुण्यानि तीर्थानि भवेयुर्वोऽभिधानतः

yatra bhūmiṁ vinirbhidya bhavatya iha nirgatāḥ tāni puṇyāni tīrthāni bhaveyurvo'bhidhānataḥ

जहाँ भूमि को भेदकर तुम यहाँ निकली हो; वे तीर्थ तुम्हारे नाम से पुण्यमय हो जाएँ।'

श्लोक 31 (skanda.3.26.31)

सहसांतरधीयंत तथास्त्वित्येव तत्र ताः। तदाप्रभृति तीर्थानि तानि त्रीण्यपि भूतले

sahasāṁtaradhīyaṁta tathāstvityeva tatra tāḥ tadāprabhṛti tīrthāni tāni trīṇyapi bhūtale

तत्काल वे वहाँ 'तथास्तु' कहकर अन्तर्धान हो गईं। तभी से भूतल पर वे तीनों तीर्थ,

श्लोक 32 (skanda.3.26.32)

तेनतेनाभिधानेन गीयन्ते सर्वदा जनैः। यत्र भूमिं विनिर्भिद्य यमुना निर्गता तदा

tenatenābhidhānena gīyante sarvadā janaiḥ yatra bhūmiṁ vinirbhidya yamunā nirgatā tadā

उन्हीं-उन्हीं नामों से सदा लोगों द्वारा गाए जाते हैं। जहाँ भूमि भेदकर यमुना उस समय निकलीं,

श्लोक 33 (skanda.3.26.33)

यमुनातीर्थमिति वै तज्जनैरभिधीयते। यतो वै पृथिवीरंध्राज्जाह्नवी सहसोत्थिता

yamunātīrthamiti vai tajjanairabhidhīyate yato vai pṛthivīraṁdhrājjāhnavī sahasotthitā

वह स्थान लोगों द्वारा यमुनातीर्थ कहा जाता है। जहाँ से पृथ्वी के छिद्र से जाह्नवी सहसा उठीं,

श्लोक 34 (skanda.3.26.34)

गंगातीर्थमिति ख्यातं तल्लोके पापनाशनम्। गया हि मानुषं रूपं यत आस्थाय निर्ययौ

gaṁgātīrthamiti khyātaṁ talloke pāpanāśanam gayā hi mānuṣaṁ rūpaṁ yata āsthāya niryayau

वह लोक में पाप-नाशक गंगातीर्थ नाम से विख्यात है। और जिस भूमि के छिद्र से गया मानव-रूप धारण करके निकलीं,

श्लोक 35 (skanda.3.26.35)

तदेव भूमिविवरं गयातीर्थं प्रचक्षते। एवमेतन्महापुण्यं तीर्थत्रयमनुत्तमम्

tadeva bhūmivivaraṁ gayātīrthaṁ pracakṣate evametanmahāpuṇyaṁ tīrthatrayamanuttamam

उसी को गयातीर्थ कहा जाता है। इस प्रकार यह महापुण्यमय, अनुपम तीर्थ-त्रय,

श्लोक 36 (skanda.3.26.36)

रैक्वमंत्रप्रभावेण पृथिव्याः सहसोत्थितम्। अत्र तीर्थत्रये स्नानं ये कुर्वंति नरोत्तमाः

raikvamaṁtraprabhāveṇa pṛthivyāḥ sahasotthitam atra tīrthatraye snānaṁ ye kurvaṁti narottamāḥ

रैक्व के मंत्र-प्रभाव से पृथ्वी से सहसा उठ खड़ा हुआ। इन तीनों तीर्थों में जो श्रेष्ठ मनुष्य स्नान करते हैं,

श्लोक 37 (skanda.3.26.37)

तेषामज्ञाननाशः स्याज्ज्ञानमप्युदयं लभेत्। स्वमंत्रेण समाकृष्टे तत्र तीर्थत्रये मुनिः

teṣāmajñānanāśaḥ syājjñānamapyudayaṁ labhet svamaṁtreṇa samākṛṣṭe tatra tīrthatraye muniḥ

उनका अज्ञान नष्ट हो जाता है, और वे ज्ञान का उदय भी प्राप्त करते हैं। अपने ही मंत्र से आकृष्ट उस तीर्थ-त्रय में वे मुनि,

श्लोक 38 (skanda.3.26.38)

स्नानं समाचरन्नित्यं स कालानत्यवाहयत्। एतस्मिन्नेव काले तु राजा जानश्रुतिर्महान्

snānaṁ samācarannityaṁ sa kālānatyavāhayat etasminneva kāle tu rājā jānaśrutirmahān

नित्य स्नान करते हुए काल बिताते रहे। इसी काल में जानश्रुति नामक एक महान् राजा,

श्लोक 39 (skanda.3.26.39)

पुत्रसंज्ञस्य राजर्षेः पौत्रो धर्मैकतत्परः। देयमन्नादि स तदा ह्यर्थिभ्यः श्रद्धयैव यत्

putrasaṁjñasya rājarṣeḥ pautro dharmaikatatparaḥ deyamannādi sa tadā hyarthibhyaḥ śraddhayaiva yat

राजर्षि पुत्र-संज्ञक के पौत्र, केवल धर्म में तत्पर, अर्थियों को श्रद्धापूर्वक ही अन्न आदि दान करते थे।

श्लोक 40 (skanda.3.26.40)

तस्मादेनं नजालोके श्रद्धादेयं प्रचक्षते। यतो बहुतरं वाक्यमन्नाद्यस्य महीपतेः

tasmādenaṁ najāloke śraddhādeyaṁ pracakṣate yato bahutaraṁ vākyamannādyasya mahīpateḥ

इसलिए उन्हें लोक में 'श्रद्धादेय' कहा जाता है। क्योंकि उस भूपति के घर में अन्न-पान की बहुतायत की बात,

श्लोक 41 (skanda.3.26.41)

अर्थिनां क्षुधितानां तु तृप्त्यर्थं वर्तते गृहे। अतोयमर्थिभिः सर्वैर्बहुवाक्य इतीर्यते

arthināṁ kṣudhitānāṁ tu tṛptyarthaṁ vartate gṛhe atoyamarthibhiḥ sarvairbahuvākya itīryate

क्षुधित अर्थिजनों की तृप्ति के लिए विद्यमान रहती थी, इसलिए वे सभी अर्थियों द्वारा 'बहुवाक्य' (जिसकी बहुत ख्याति है) कहे जाते थे।

श्लोक 42 (skanda.3.26.42)

स वै पौत्रायणो राजा जानश्रुतसुतो बली। प्रियातिथिर्बभूवासौ बहुदायी तथाऽभवत्

sa vai pautrāyaṇo rājā jānaśrutasuto balī priyātithirbabhūvāsau bahudāyī tathā'bhavat

वह बलवान् पौत्रायण राजा, जानश्रुति के पुत्र, अतिथि-प्रिय थे और अत्यन्त दानशील भी थे।

श्लोक 43 (skanda.3.26.43)

नगरेषु च राष्ट्रेषु ग्रामेषु च वनेषु च। चतुष्पथेषु सर्वेषु महामार्गेषु सर्वशः

nagareṣu ca rāṣṭreṣu grāmeṣu ca vaneṣu ca catuṣpatheṣu sarveṣu mahāmārgeṣu sarvaśaḥ

नगरों में, राष्ट्रों में, गाँवों में और वनों में भी, सभी चौराहों पर, सर्वत्र बड़े मार्गों पर,

श्लोक 44 (skanda.3.26.44)

बह्वन्नपान संयुक्तं सूपशाकादिसंयुतम्। आतिथ्यं कल्पयामास तृप्तयेऽर्थिजनस्य वै

bahvannapāna saṁyuktaṁ sūpaśākādisaṁyutam ātithyaṁ kalpayāmāsa tṛptaye'rthijanasya vai

अन्न-पान से भरपूर, सूप-शाक आदि से युक्त आतिथ्य की व्यवस्था अर्थिजनों की तृप्ति के लिए की थी।

श्लोक 45 (skanda.3.26.45)

अन्नपानादिकं सर्वमुपयुड्ध्वमिहार्थिनः। इत्यसौ घोषयामास तत्र तत्र जनास्पदे

annapānādikaṁ sarvamupayuḍdhvamihārthinaḥ ityasau ghoṣayāmāsa tatra tatra janāspade

'यहाँ हे अर्थियो! इस अन्न-पान आदि सब का उपभोग करो' - इस प्रकार उन्होंने वहाँ-वहाँ, हर जनस्थान में घोषणा करवाई थी।

श्लोक 46 (skanda.3.26.46)

तस्य प्रियातिथेरेव नृपस्य बहुदायिनः। अर्थिभ्यो दानशौंडस्य गुणाः सर्वत्र विश्रुताः

tasya priyātithereva nṛpasya bahudāyinaḥ arthibhyo dānaśauṁḍasya guṇāḥ sarvatra viśrutāḥ

उस अतिथि-प्रिय, दानशील, अर्थियों को दान देने में उदार राजा के गुण सर्वत्र विख्यात थे।

श्लोक 47 (skanda.3.26.47)

अथ पौत्रायणस्यास्य गुण ग्रामेण वर्ततः। देवर्षयो महाभागास्तस्यानुग्रहकांक्षिणः

atha pautrāyaṇasyāsya guṇa grāmeṇa vartataḥ devarṣayo mahābhāgāstasyānugrahakāṁkṣiṇaḥ

तब उस पौत्रायण के गुण-समूह के फैलते रहने पर, उसके अनुग्रह की इच्छा रखने वाले महाभाग्यशाली देवर्षियों ने,

श्लोक 48 (skanda.3.26.48)

हंसरूपं समास्थाय निदाघसमये निशि। रमणीयां विधायाशु श्रेणीमाकाशमागतः

haṁsarūpaṁ samāsthāya nidāghasamaye niśi ramaṇīyāṁ vidhāyāśu śreṇīmākāśamāgataḥ

हंस-रूप धारण करके, ग्रीष्म ऋतु की रात्रि में, शीघ्र ही एक सुन्दर पंक्ति बनाकर आकाश-मार्ग से आते हुए,

श्लोक 49 (skanda.3.26.49)

सौधवातायनस्थस्य तस्योपरि महीपतेः। उड्डीयोड्डीय वेगेन तरसा जग्मुरुच्चकैः

saudhavātāyanasthasya tasyopari mahīpateḥ uḍḍīyoḍḍīya vegena tarasā jagmuruccakaiḥ

उस भूपति के महल के गवाक्ष के ऊपर से, बार-बार उड़ते हुए, वेगपूर्वक ऊँचे स्वर में जा रहे थे।

श्लोक 50 (skanda.3.26.50)

तरसा पततां तेषां हंसानां पृष्ठतो व्रजन्। एको हंसस्तु संबोध्य हंसमग्रेसरं तदा

tarasā patatāṁ teṣāṁ haṁsānāṁ pṛṣṭhato vrajan eko haṁsastu saṁbodhya haṁsamagresaraṁ tadā

वेगपूर्वक उड़ते उन हंसों के पीछे जाते हुए एक हंस ने, आगे चल रहे हंस को सम्बोधित करते हुए,

श्लोक 51 (skanda.3.26.51)

सोपहासमिदं वाक्यं प्राह शृण्वति राजनि। भोभो भल्लाक्ष भल्लाक्ष पुरो गच्छन्मरालक

sopahāsamidaṁ vākyaṁ prāha śṛṇvati rājani bhobho bhallākṣa bhallākṣa puro gacchanmarālaka

राजा के सुनते हुए यह उपहासपूर्ण वचन कहा - 'हे भल्लाक्ष, भल्लाक्ष, आगे चलने वाले मराल!

श्लोक 52 (skanda.3.26.52)

सौधमध्ये पुरस्ताद्वै जानश्रुतसुतो नृपः। वर्तते पूजनीयोऽयं न पश्यसि किमंधवत्

saudhamadhye purastādvai jānaśrutasuto nṛpaḥ vartate pūjanīyo'yaṁ na paśyasi kimaṁdhavat

आगे, महल के मध्य में, जानश्रुत-पुत्र राजा पूजनीय होकर विद्यमान है, क्या तुम अंधे के समान नहीं देख रहे हो?

श्लोक 53 (skanda.3.26.53)

यस्य तेजो दुराधर्षमाब्रह्म भवनादिदम्। अनंतादित्यसंकाशं ज्वलते पुरतो भृशम्

yasya tejo durādharṣamābrahma bhavanādidam anaṁtādityasaṁkāśaṁ jvalate purato bhṛśam

जिसका दुर्धर्ष तेज ब्रह्मलोक तक इस भवन से फैला हुआ है, अनन्त सूर्यों के समान हमारे सामने अत्यन्त प्रज्वलित हो रहा है।

श्लोक 54 (skanda.3.26.54)

तमतिक्रम्य राजर्षिं मा गास्त्वमुपरि द्रुतम्। यदि गच्छसि तत्तेजस्सांप्रतं त्वां प्रधक्ष्यति

tamatikramya rājarṣiṁ mā gāstvamupari drutam yadi gacchasi tattejassāṁprataṁ tvāṁ pradhakṣyati

उस राजर्षि को लाँघकर उसके ऊपर से वेगपूर्वक मत जाओ। यदि तुम गए, तो वह तेज तुम्हें अभी भस्म कर देगा।'

श्लोक 55 (skanda.3.26.55)

इत्युक्तवंतं तं हंसमग्रतः प्रत्यभाषत। अहो भवानभिज्ञोऽसि श्लाघनीयोऽसि सूरिभिः

ityuktavaṁtaṁ taṁ haṁsamagrataḥ pratyabhāṣata aho bhavānabhijño'si ślāghanīyo'si sūribhiḥ

इस प्रकार कहने वाले उस हंस को आगे चलने वाले हंस ने उत्तर दिया - 'अहो! तुम अभिज्ञ हो, विद्वानों द्वारा प्रशंसनीय हो!

श्लोक 56 (skanda.3.26.56)

अश्लाघनीयं कितवं यत्त्वमेनं प्रशंससे। प्रशंससे किमर्थं त्वमल्पं संतमिमं जनम्

aślāghanīyaṁ kitavaṁ yattvamenaṁ praśaṁsase praśaṁsase kimarthaṁ tvamalpaṁ saṁtamimaṁ janam

किन्तु यह अप्रशंसनीय, धूर्ततापूर्ण है कि तुम इसकी प्रशंसा करते हो। तुम इस अल्प व्यक्ति की प्रशंसा किसलिए करते हो,

श्लोक 57 (skanda.3.26.57)

भस्रावत्पशुवच्चैव केवलं श्वासधारिणम्। न ह्ययं वेत्ति धर्माणां रहस्यं पृथिवी पतिः

bhasrāvatpaśuvaccaiva kevalaṁ śvāsadhāriṇam na hyayaṁ vetti dharmāṇāṁ rahasyaṁ pṛthivī patiḥ

जो धौंकनी की भाँति पशु के समान केवल श्वास धारण करने वाला है? यह भूपति धर्मों के रहस्य को नहीं जानता,

श्लोक 58 (skanda.3.26.58)

तत्त्वज्ञानी यथा रैक्वः सयुग्वान्ब्राह्मणोत्तमः। रैक्वस्य हि महज्ज्योतीरहस्यं दैवतैरपि

tattvajñānī yathā raikvaḥ sayugvānbrāhmaṇottamaḥ raikvasya hi mahajjyotīrahasyaṁ daivatairapi

जैसे तत्त्वज्ञानी ब्राह्मणश्रेष्ठ रैक्व सयुग्व जानते हैं। रैक्व की महान् ज्योति तो देवताओं के लिए भी रहस्य है।

श्लोक 59 (skanda.3.26.59)

न ह्यस्य प्राणमात्रस्य तेजस्तादृशमस्ति वै। रैक्वस्य पुण्यराशीनामियत्ता नैव विद्यते

na hyasya prāṇamātrasya tejastādṛśamasti vai raikvasya puṇyarāśīnāmiyattā naiva vidyate

मात्र प्राणधारी इस राजा का तेज वैसा नहीं है। रैक्व के पुण्य-राशियों की सीमा ही ज्ञात नहीं है।

श्लोक 60 (skanda.3.26.60)

गण्यते पांसवो भूमेर्गण्यंते दिवि तारकाः। रैक्वपुण्यमहामेरुसमूहो नैव गण्यते।

gaṇyate pāṁsavo bhūmergaṇyaṁte divi tārakāḥ raikvapuṇyamahāmerusamūho naiva gaṇyate

पृथ्वी के धूल-कण गिने जा सकते हैं, आकाश के तारे गिने जा सकते हैं, किन्तु रैक्व के पुण्य-रूपी महामेरु-समूह की गणना नहीं हो सकती।

श्लोक 61 (skanda.3.26.61)

किं च तिष्ठंत्विमे धर्मा नश्वरास्तस्य वै मुनेः। ब्रह्मज्ञानमबाध्यं यत्तेन स श्लाघ्यते मुनिः

kiṁ ca tiṣṭhaṁtvime dharmā naśvarāstasya vai muneḥ brahmajñānamabādhyaṁ yattena sa ślāghyate muniḥ

और फिर, इस राजा के ये नश्वर धर्म रहें भी तो क्या? उस मुनि की तो अबाध्य ब्रह्मज्ञान से प्रशंसा होती है।

श्लोक 62 (skanda.3.26.62)

जानश्रुतेस्तु तादृक्षो धर्म एव न विद्यते। दुर्लभं यत्तु योगीन्द्रैः कुतस्तज्ज्ञानवैभवम्

jānaśrutestu tādṛkṣo dharma eva na vidyate durlabhaṁ yattu yogīndraiḥ kutastajjñānavaibhavam

जानश्रुति के पास वैसा धर्म ही नहीं है। जो योगीन्द्रों को भी दुर्लभ है, उसकी तो बात ही कहाँ, वह ज्ञान-वैभव उसे कैसे प्राप्त होगा?

श्लोक 63 (skanda.3.26.63)

परित्यज्य दुरात्मानं तद्वराकमिमं जनम्। स एव रैक्वः सयुग्वाञ्छ्लाघ्यतां भवता मुनिः

parityajya durātmānaṁ tadvarākamimaṁ janam sa eva raikvaḥ sayugvāñchlāghyatāṁ bhavatā muniḥ

इस दुरात्मा, वराक व्यक्ति को छोड़कर, वही सयुग्व रैक्व मुनि तुम्हारे द्वारा प्रशंसनीय है -

श्लोक 64 (skanda.3.26.64)

जन्मना पंगुरपि यः स्वस्य स्नानचिकीर्षया। गंगां च यमुनां चापि गयामपि मुनीश्वरः

janmanā paṁgurapi yaḥ svasya snānacikīrṣayā gaṁgāṁ ca yamunāṁ cāpi gayāmapi munīśvaraḥ

जो जन्म से पंगु होते हुए भी अपने स्नान की इच्छा से, गंगा को और यमुना को तथा गया को भी, वह मुनीश्वर,

श्लोक 65 (skanda.3.26.65)

आह्वयामास मन्त्रेण निजाश्रमसमीपतः। तस्य ब्रह्मविदो रैक्वमहर्षेर्धर्मसंचये

āhvayāmāsa mantreṇa nijāśramasamīpataḥ tasya brahmavido raikvamaharṣerdharmasaṁcaye

मंत्र से अपने आश्रम के समीप ही बुला लाया। उस ब्रह्मवेत्ता रैक्व महर्षि के धर्म-समूह में,

श्लोक 66 (skanda.3.26.66)

अंतर्भवंति धर्मौघास्त्रैलोक्योदरवर्तिनाम्। रैक्वस्य धर्मकक्षा तु न हि त्रैलोक्यवर्तिनाम्

aṁtarbhavaṁti dharmaughāstrailokyodaravartinām raikvasya dharmakakṣā tu na hi trailokyavartinām

त्रैलोक्य के भीतर रहने वाले सभी प्राणियों के धर्म-प्रवाह समा जाते हैं। किन्तु रैक्व की धर्म-कक्षा त्रैलोक्य में रहने वाले

श्लोक 67 (skanda.3.26.67)

प्राणिनां धर्मकक्षायामन्तर्भवति कर्हिचित। एवमग्रेसरे हंसे कथित्वोपरते सति

prāṇināṁ dharmakakṣāyāmantarbhavati karhicita evamagresare haṁse kathitvoparate sati

प्राणियों की धर्म-कक्षा में कभी नहीं समाती।' इस प्रकार आगे चलने वाले हंस के यह कहकर चुप हो जाने पर,

श्लोक 68 (skanda.3.26.68)

हंसरूपा मुनींद्रास्ते ब्रह्मलोकं ययुः पुनः। अथ पौत्रायणो राजा जानश्रुतिररिंदमः

haṁsarūpā munīṁdrāste brahmalokaṁ yayuḥ punaḥ atha pautrāyaṇo rājā jānaśrutirariṁdamaḥ

हंस-रूपधारी वे मुनीन्द्र फिर ब्रह्मलोक को चले गए। तब पौत्रायण राजा जानश्रुति, शत्रु-दमनकारी,

श्लोक 69 (skanda.3.26.69)

रैक्वं चोत्कर्षकाष्ठायां निशम्य परमावधिम्। विषण्णोऽभवदत्यर्थं वराकोऽक्षजितो यथा

raikvaṁ cotkarṣakāṣṭhāyāṁ niśamya paramāvadhim viṣaṇṇo'bhavadatyarthaṁ varāko'kṣajito yathā

रैक्व की उस परम उत्कर्ष की सीमा को सुनकर, इन्द्रियों से जीते हुए किसी दीन-हीन के समान अत्यन्त उदास हो गए।

श्लोक 70 (skanda.3.26.70)

चिंतयामास स नृपः पौनःपुन्येन निःश्वसन्। हंस उत्कर्षयन्रैक्वं निकृष्टं मामिहाब्रवीत्

ciṁtayāmāsa sa nṛpaḥ paunaḥpunyena niḥśvasan haṁsa utkarṣayanraikvaṁ nikṛṣṭaṁ māmihābravīt

वह राजा बार-बार निःश्वास लेते हुए विचार करने लगे - 'रैक्व की महिमा बढ़ाते हुए हंस ने मुझे यहाँ हीन कहा।

श्लोक 71 (skanda.3.26.71)

अहो रैक्वस्य माहात्म्यं यं प्रशंसंति पक्षिणः। तत्परित्यज्य संसारं सर्वं राज्यमिहाधुना

aho raikvasya māhātmyaṁ yaṁ praśaṁsaṁti pakṣiṇaḥ tatparityajya saṁsāraṁ sarvaṁ rājyamihādhunā

अहो! रैक्व का यह माहात्म्य है, जिसकी पक्षी भी प्रशंसा करते हैं! इसलिए इस पूरे संसार, इस पूरे राज्य को अभी त्यागकर,

श्लोक 72 (skanda.3.26.72)

सयुग्वानं महात्मानं तमेव शरणं व्रजे। कृपानिधिः स वै रैक्वः शरणं मामुपागतम्

sayugvānaṁ mahātmānaṁ tameva śaraṇaṁ vraje kṛpānidhiḥ sa vai raikvaḥ śaraṇaṁ māmupāgatam

मैं उन्हीं महात्मा सयुग्व की शरण में जाऊँ। वह कृपानिधि रैक्व, मुझे शरण में आया देखकर,

श्लोक 73 (skanda.3.26.73)

प्रतिगृह्यात्मविज्ञानं मह्यं समुपदेक्ष्यति। इत्यसौ चिंतयन्नेव कथंकथमपि द्विजाः

pratigṛhyātmavijñānaṁ mahyaṁ samupadekṣyati ityasau ciṁtayanneva kathaṁkathamapi dvijāḥ

स्वीकार कर मुझे आत्म-विज्ञान का उपदेश देंगे।' इस प्रकार विचार करते हुए ही, हे द्विजो! उस राजा ने किसी तरह,

श्लोक 74 (skanda.3.26.74)

जाग्रन्नेवायमुद्वेलां रात्रिं तामत्यवाहयत्। निशावसाने संप्राप्ते बंदिवृन्दप्रवर्तितम्

jāgrannevāyamudvelāṁ rātriṁ tāmatyavāhayat niśāvasāne saṁprāpte baṁdivṛndapravartitam

जागते हुए ही उस अनन्त-सी रात्रि को व्यतीत किया। रात्रि के अन्त में, वन्दीजनों के समूह द्वारा किया गया,

श्लोक 75 (skanda.3.26.75)

अशृणोन्मंगलरवं तूर्यघोषसमन्वितम्। तदाकर्ण्य महाराजस्तदा तल्पस्थ एव सन्

aśṛṇonmaṁgalaravaṁ tūryaghoṣasamanvitam tadākarṇya mahārājastadā talpastha eva san

तूर्य-घोष सहित मंगल-ध्वनि उन्होंने सुना। उसे सुनकर वह महाराज, शय्या पर लेटे हुए ही,

श्लोक 76 (skanda.3.26.76)

सारथिं शीघ्रमाहूय बभाषे सादरं वचः। सारथे सत्वरं गत्वा रथमारुह्य वेगवत्

sārathiṁ śīghramāhūya babhāṣe sādaraṁ vacaḥ sārathe satvaraṁ gatvā rathamāruhya vegavat

शीघ्र सारथि को बुलाकर आदरपूर्वक यह वचन कहा - 'हे सारथे! शीघ्रता से जाकर रथ पर सवार होकर वेगपूर्वक,

श्लोक 77 (skanda.3.26.77)

आश्रमेषु महर्षीणां पुण्येषु विपिनेषु च। विविक्तेषु प्रदेशेषु सतामावासभूमिषु

āśrameṣu maharṣīṇāṁ puṇyeṣu vipineṣu ca vivikteṣu pradeśeṣu satāmāvāsabhūmiṣu

महर्षियों के आश्रमों में, पुण्यमय वनों में, एकान्त स्थानों में, सत्पुरुषों के निवास-स्थलों में,

श्लोक 78 (skanda.3.26.78)

तीर्थानां च नदीनां च कूलेषु पुलिनेषु च। अन्येषु च प्रदेशेषु यत्र संति मुनीश्वराः।

tīrthānāṁ ca nadīnāṁ ca kūleṣu pulineṣu ca anyeṣu ca pradeśeṣu yatra saṁti munīśvarāḥ

तीर्थों और नदियों के तटों में, बालू-तटों में, तथा अन्य स्थानों में भी, जहाँ भी मुनीश्वर हों,

श्लोक 79 (skanda.3.26.79)

तेषु सर्वेषु योगींद्रं पंगुं शकटसंस्थितम्। रैक्वाभिधानं सर्वेषां धर्माणामेकसंश्रयम्

teṣu sarveṣu yogīṁdraṁ paṁguṁ śakaṭasaṁsthitam raikvābhidhānaṁ sarveṣāṁ dharmāṇāmekasaṁśrayam

उन सभी स्थानों में उस योगीन्द्र को, गाड़ी में बैठे उस पंगु को, रैक्व नाम से विख्यात, सभी धर्मों के एकमात्र आश्रय,

श्लोक 80 (skanda.3.26.80)

ब्रह्मज्ञानैकनिलयं सयुग्वानं गवेषय। अन्विष्य तूर्णं मत्प्रीत्यै पुनरागच्छ सारथे

brahmajñānaikanilayaṁ sayugvānaṁ gaveṣaya anviṣya tūrṇaṁ matprītyai punarāgaccha sārathe

ब्रह्मज्ञान के एकमात्र निवास सयुग्व को ढूँढो। ढूँढकर, शीघ्र मेरी प्रसन्नता के लिए, हे सारथे! पुनः लौट आओ।'

श्लोक 81 (skanda.3.26.81)

स तथेति विनिर्गत्य वेगवद्रथसंस्थितः। सर्वत्रान्वेषयामास रैक्वं ब्रह्मविदं मुनिम्

sa tatheti vinirgatya vegavadrathasaṁsthitaḥ sarvatrānveṣayāmāsa raikvaṁ brahmavidaṁ munim

'वैसा ही होगा' कहकर निकलकर, वेगवान् रथ पर सवार होकर, उसने सर्वत्र ब्रह्मवेत्ता मुनि रैक्व को ढूँढा।

श्लोक 82 (skanda.3.26.82)

गुहासु पर्वतानां च मुनीनामाश्रमेषु च। संचचार महीं कृत्स्नां तत्र तत्र गवेषयन्

guhāsu parvatānāṁ ca munīnāmāśrameṣu ca saṁcacāra mahīṁ kṛtsnāṁ tatra tatra gaveṣayan

पर्वतों की गुफाओं में और मुनियों के आश्रमों में भी, उसने सारी पृथ्वी को, यहाँ-वहाँ ढूँढते हुए, नाप डाला।

श्लोक 83 (skanda.3.26.83)

अन्विष्य विविधान्देशान्सारथिस्त्वरया सह। क्रमान्महर्षिसंबाधं गंधमादनमन्वगात्

anviṣya vividhāndeśānsārathistvarayā saha kramānmaharṣisaṁbādhaṁ gaṁdhamādanamanvagāt

विभिन्न देशों को ढूँढकर, वह सारथि शीघ्रतापूर्वक, क्रमशः महर्षियों से भरे गन्धमादन पहुँचा।

श्लोक 84 (skanda.3.26.84)

मार्गमाणः स तत्रापि तं ददर्श मुनीश्वरम्। कंडूयमानं पामानं शकटीयस्थलस्थितम्

mārgamāṇaḥ sa tatrāpi taṁ dadarśa munīśvaram kaṁḍūyamānaṁ pāmānaṁ śakaṭīyasthalasthitam

वहाँ भी ढूँढते हुए उसने उस मुनीश्वर को देखा, अपनी खुजली को खुजलाते हुए, गाड़ी-शाला के स्थान पर बैठे हुए,

श्लोक 85 (skanda.3.26.85)

अद्वैतनिष्कलं ब्रह्म चिंतयंतं निरन्तरम्। तं दृष्ट्वा सारथिस्तत्र सयुग्वानं महामुनिम्

advaitaniṣkalaṁ brahma ciṁtayaṁtaṁ nirantaram taṁ dṛṣṭvā sārathistatra sayugvānaṁ mahāmunim

अद्वैत, निष्कल ब्रह्म का निरन्तर चिन्तन करते हुए। वहाँ उस सयुग्व महामुनि को देखकर सारथि ने,

श्लोक 86 (skanda.3.26.86)

रैक्वोऽयमिति संचिंत्य तमासाद्य प्रणम्य च। विनयान्मुनिमप्राक्षीदुपविश्य तदन्तिके

raikvo'yamiti saṁciṁtya tamāsādya praṇamya ca vinayānmunimaprākṣīdupaviśya tadantike

'यह रैक्व है' - ऐसा सोचकर उनके पास जाकर, प्रणाम करके, विनयपूर्वक उनके समीप बैठकर पूछा -

श्लोक 87 (skanda.3.26.87)

सयुग्वान्रैक्वनामा च ब्रह्मन्किं वै भवानिति। तस्य वाक्यं समाकर्ण्य स मुनिः प्रत्यभाषत

sayugvānraikvanāmā ca brahmankiṁ vai bhavāniti tasya vākyaṁ samākarṇya sa muniḥ pratyabhāṣata

'हे ब्रह्मन्! क्या आप ही सयुग्व रैक्व नाम से विख्यात हैं?' उसका यह वचन सुनकर उस मुनि ने उत्तर दिया -

श्लोक 88 (skanda.3.26.88)

अहमेव सयुग्वान्वै रैक्वनामेति वै तदा। इत्याकर्ण्य मुने र्वाक्यमिंगितैर्बहुभिस्तथा

ahameva sayugvānvai raikvanāmeti vai tadā ityākarṇya mune rvākyamiṁgitairbahubhistathā

'मैं ही सयुग्व, रैक्व नाम से विख्यात हूँ।' मुनि का यह वचन सुनकर, तथा अनेक संकेतों से भी,

श्लोक 89 (skanda.3.26.89)

कुटुम्बभरणार्थाय धनेच्छामवगम्य च। सर्वं न्यवेदयद्राज्ञे निवृत्तो गंधमादनात्

kuṭumbabharaṇārthāya dhanecchāmavagamya ca sarvaṁ nyavedayadrājñe nivṛtto gaṁdhamādanāt

उनकी कुटुम्ब-भरण की धन-इच्छा को समझकर, गन्धमादन से लौटे उस सारथि ने राजा को सब कुछ बताया।

श्लोक 90 (skanda.3.26.90)

जानश्रुतिर्निशम्याथ सारथेर्वाक्यमादरात्। षट्शतानि गवां चापि निष्कभारं धनस्य च

jānaśrutirniśamyātha sārathervākyamādarāt ṣaṭśatāni gavāṁ cāpi niṣkabhāraṁ dhanasya ca

जानश्रुति ने सारथि के इस वचन को आदरपूर्वक सुनकर, छह सौ गौएँ, स्वर्ण-मुद्राओं का एक भार,

श्लोक 91 (skanda.3.26.91)

रथं चाश्वतरीयुक्तं समादाय त्वरान्वितः। पौत्रायणः स राजर्षिस्तं रैक्वं प्रतिचक्रमे

rathaṁ cāśvatarīyuktaṁ samādāya tvarānvitaḥ pautrāyaṇaḥ sa rājarṣistaṁ raikvaṁ praticakrame

तथा खच्चरों से जुते हुए एक रथ लेकर शीघ्रतापूर्वक, वह राजर्षि पौत्रायण उस रैक्व की ओर चल पड़े।

श्लोक 92 (skanda.3.26.92)

गत्वा च वचनं प्राह तं रैक्वं स महीपतिः। भगवन्रैक्व सयुग्वन्मद्दत्तं प्रतिगृह्यताम्

gatvā ca vacanaṁ prāha taṁ raikvaṁ sa mahīpatiḥ bhagavanraikva sayugvanmaddattaṁ pratigṛhyatām

वहाँ जाकर उस भूपति ने रैक्व से यह वचन कहा - 'हे भगवन् रैक्व, हे सयुग्व! मेरा दिया हुआ यह स्वीकार करें।

श्लोक 93 (skanda.3.26.93)

षट्शतानि गवां चापि निष्कभारं धनस्य च। रथं चाश्वतरीयुक्तं प्रतिगृह्णीष्व मामकम्

ṣaṭśatāni gavāṁ cāpi niṣkabhāraṁ dhanasya ca rathaṁ cāśvatarīyuktaṁ pratigṛhṇīṣva māmakam

छह सौ गौएँ, स्वर्ण का एक भार, और खच्चर-युक्त रथ - मेरा यह सब स्वीकार करें।

श्लोक 94 (skanda.3.26.94)

गृहीत्वा सवमेतत्तु भो ब्रह्मन्ननुशाधि माम्। अद्वैतब्रह्मविज्ञानं मह्यं समुपदिश्यताम्

gṛhītvā savametattu bho brahmannanuśādhi mām advaitabrahmavijñānaṁ mahyaṁ samupadiśyatām

हे ब्रह्मन्! यह सब स्वीकार करके मुझे शिक्षा दें। मुझे अद्वैत ब्रह्म-विज्ञान का उपदेश दें।'

श्लोक 95 (skanda.3.26.95)

इति तस्य वचः श्रुत्वा सस्पृहं च ससंभ्रम्। रैक्वः प्रत्याह सयुग्वाञ्जानश्रुतिमरिंदमम्।

iti tasya vacaḥ śrutvā saspṛhaṁ ca sasaṁbhram raikvaḥ pratyāha sayugvāñjānaśrutimariṁdamam

उसका यह वचन सुनकर, कुछ आकांक्षा और कुछ घबराहट से, सयुग्व रैक्व ने शत्रु-दमनकारी जानश्रुति से यह उत्तर दिया।

श्लोक 96 (skanda.3.26.96)

रैक्व उवाच। एता गावस्तवैवास्तु निष्कभारस्तथा रथः। किमल्पेन ममानेन बहुकल्पेषु जीवतः

raikva uvāca etā gāvastavaivāstu niṣkabhārastathā rathaḥ kimalpena mamānena bahukalpeṣu jīvataḥ

रैक्व ने कहा - 'यह गौएँ, स्वर्ण का भार, तथा वह रथ भी - सब तुम्हारा ही रहे। बहुत कल्पों तक जीने वाले मुझे इतने अल्प से क्या प्रयोजन?

श्लोक 97 (skanda.3.26.97)

न मे कुटुंब निर्वाहे पर्याप्तमिदमंजसा। एवं शतगुणं चापि यदि दत्तं त्वया मम

na me kuṭuṁba nirvāhe paryāptamidamaṁjasā evaṁ śataguṇaṁ cāpi yadi dattaṁ tvayā mama

यह मेरे कुटुम्ब के निर्वाह के लिए भी सचमुच पर्याप्त नहीं है। यदि तुम मुझे इससे सौ गुना भी दे दो,

श्लोक 98 (skanda.3.26.98)

नालं तदपि राजेंद्र कुटुंबभरणाय वै। इति रैक्ववचः श्रुत्वा जानश्रुतिरभाषत

nālaṁ tadapi rājeṁdra kuṭuṁbabharaṇāya vai iti raikvavacaḥ śrutvā jānaśrutirabhāṣata

तब भी, हे राजेन्द्र! वह कुटुम्ब-भरण के लिए पर्याप्त नहीं होगा।' रैक्व का यह वचन सुनकर जानश्रुति ने कहा -

श्लोक 99 (skanda.3.26.99)

जानश्रुतिरुवाच। त्वयोपदिश्यमानस्य ब्रह्मज्ञानस्य वै मुने। न हि मूल्यमिदं ब्रह्मन्गोधनं रथ एव च।

jānaśrutiruvāca tvayopadiśyamānasya brahmajñānasya vai mune na hi mūlyamidaṁ brahmangodhanaṁ ratha eva ca

जानश्रुति ने कहा - 'हे मुने! आपके द्वारा उपदिष्ट किए जाने वाले ब्रह्म-ज्ञान का, हे ब्रह्मन्! यह गोधन और रथ कोई मूल्य नहीं है।

श्लोक 100 (skanda.3.26.100)

प्रतिगृह्णीष्व वा मा वा ममैतत्तु गवादिकम्। निष्कलाद्वैतविज्ञानं ब्रह्मन्नुपदिशस्व मे। तदाकर्ण्य वचस्तस्य सयुग्वान्वाक्यमब्रवीत्

pratigṛhṇīṣva vā mā vā mamaitattu gavādikam niṣkalādvaitavijñānaṁ brahmannupadiśasva me tadākarṇya vacastasya sayugvānvākyamabravīt

मेरी यह गौएँ आदि आप स्वीकार करें या न करें, हे ब्रह्मन्! मुझे निष्कल-अद्वैत विज्ञान का उपदेश दें।' उसका यह वचन सुनकर सयुग्व ने यह वचन कहा -

श्लोक 101 (skanda.3.26.101)

रैक्व उवाच। निर्वेदो यस्य संसारे तथा वै पुण्यपापयोः

raikva uvāca nirvedo yasya saṁsāre tathā vai puṇyapāpayoḥ

रैक्व ने कहा - 'जिसमें संसार से, तथा वैसे ही पुण्य और पाप दोनों से विरक्ति हो,

श्लोक 102 (skanda.3.26.102)

प्रारब्धयोर्विनाशश्च स वै ज्ञानोपदेशभाक्। तव यद्यपि संसारे निर्वेदः समजायत

prārabdhayorvināśaśca sa vai jñānopadeśabhāk tava yadyapi saṁsāre nirvedaḥ samajāyata

और प्रारब्ध हो चुके (कर्मों) का नाश हो, वही ज्ञानोपदेश का अधिकारी है। तुम्हें संसार से विरक्ति यद्यपि उत्पन्न हुई है,

श्लोक 103 (skanda.3.26.103)

तथापि पुण्यपापानां न हि नाशो व्याजयत। पुण्यपापौघसंघाश्च पुनर्जन्मनि हेतवः

tathāpi puṇyapāpānāṁ na hi nāśo vyājayata puṇyapāpaughasaṁghāśca punarjanmani hetavaḥ

फिर भी पुण्य-पापों का नाश नहीं दिखाई देता। पुण्य-पाप के समूह ही पुनर्जन्म के कारण होते हैं,

श्लोक 104 (skanda.3.26.104)

न हि भोगं विना तेषां नाशो भवति भूपते। तन्नाशोपायमद्याहं तथापि प्रब्रवीमि ते

na hi bhogaṁ vinā teṣāṁ nāśo bhavati bhūpate tannāśopāyamadyāhaṁ tathāpi prabravīmi te

हे भूपते! उनके भोग के बिना उनका नाश नहीं होता। फिर भी उनके नाश का उपाय मैं तुम्हें अभी बताता हूँ,

श्लोक 105 (skanda.3.26.105)

यतो मां शरणं प्राप्तस्तच्छृणुष्व समाहितः। अत्र तीर्थत्रयं पुण्यं वर्ततेऽभीष्टदायकम्

yato māṁ śaraṇaṁ prāptastacchṛṇuṣva samāhitaḥ atra tīrthatrayaṁ puṇyaṁ vartate'bhīṣṭadāyakam

क्योंकि तुम मेरी शरण में आए हो, वह एकाग्रचित्त होकर सुनो। यहाँ अभीष्ट देने वाला पुण्यमय तीर्थ-त्रय विद्यमान है,

श्लोक 106 (skanda.3.26.106)

मुमुक्षूणां हि सर्वेषां सर्वप्रारब्धनाशनम्। एतद्धि यमुनातीर्थं गंगातीर्थं तथैव च

mumukṣūṇāṁ hi sarveṣāṁ sarvaprārabdhanāśanam etaddhi yamunātīrthaṁ gaṁgātīrthaṁ tathaiva ca

जो सभी मुमुक्षुओं के समस्त प्रारब्ध का नाशक है। यह यमुनातीर्थ है, और वैसे ही गंगातीर्थ है,

श्लोक 107 (skanda.3.26.107)

गयातीर्थमिदं चापि तदेषु स्नाहि मा चिरम्। सर्वप्रारब्धनाशः स्यात्तदा नैवात्र संशयः

gayātīrthamidaṁ cāpi tadeṣu snāhi mā ciram sarvaprārabdhanāśaḥ syāttadā naivātra saṁśayaḥ

और यह गयातीर्थ भी है; इनमें बिना विलम्ब किए स्नान करो। तब तुम्हारे समस्त प्रारब्ध का नाश होगा, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 108 (skanda.3.26.108)

ततस्ते शुद्धचित्तस्य ज्ञानं चैव दिशाम्यहम्। इत्युक्ते रैक्वमुनिना हर्षसंफुल्ललोचनः

tataste śuddhacittasya jñānaṁ caiva diśāmyaham ityukte raikvamuninā harṣasaṁphullalocanaḥ

फिर मैं तुम्हारे शुद्ध-चित्त होने पर ज्ञान भी दूँगा।' रैक्व मुनि के यह कहने पर, हर्ष से खिले नेत्रों वाले जानश्रुति,

श्लोक 109 (skanda.3.26.109)

ससंभ्रममुपागम्य सस्नौ तीर्थत्रयेऽपि सः। तत्तीर्थस्नानमात्रेण शुद्धचित्तोऽभवन्नृपः

sasaṁbhramamupāgamya sasnau tīrthatraye'pi saḥ tattīrthasnānamātreṇa śuddhacitto'bhavannṛpaḥ

शीघ्रतापूर्वक जाकर उन्होंने तीनों तीर्थों में स्नान किया। उस तीर्थ-स्नान मात्र से ही वह राजा शुद्ध-चित्त हो गया।

श्लोक 110 (skanda.3.26.110)

उपातिष्ठत राजासौ सयुग्वानं गुरुं पुनः। सयुग्वा स च रैक्वोऽपि मुनींद्रैरपि दुर्लभम्

upātiṣṭhata rājāsau sayugvānaṁ guruṁ punaḥ sayugvā sa ca raikvo'pi munīṁdrairapi durlabham

वह राजा फिर अपने गुरु सयुग्व के पास आया। और वह सयुग्व रैक्व भी, योगीन्द्रों को भी दुर्लभ,

श्लोक 111 (skanda.3.26.111)

तज्जानश्रुतये ज्ञानं कृपया समुपादिशत्। तेनोपदिष्टमात्रे तु विज्ञाने ब्रह्मरूपिणि

tajjānaśrutaye jñānaṁ kṛpayā samupādiśat tenopadiṣṭamātre tu vijñāne brahmarūpiṇi

वह ज्ञान जानश्रुति को कृपापूर्वक प्रदान किया। उस ब्रह्म-स्वरूप विज्ञान के उपदेश मिलते ही,

श्लोक 112 (skanda.3.26.112)

अबाधितानुभववानभवद्राजसत्तमः। ब्रह्मरूपं गतस्यास्य प्रसादाद्रैक्वयोगिनः

abādhitānubhavavānabhavadrājasattamaḥ brahmarūpaṁ gatasyāsya prasādādraikvayoginaḥ

वह श्रेष्ठ राजा अबाधित अनुभव से युक्त हो गया। योगी रैक्व की कृपा से ब्रह्म-रूप को प्राप्त हुए उसे,

श्लोक 113 (skanda.3.26.113)

घटकुड्यकुसूलात्मा न प्रपंचस्समस्फुरत्। निर्भिद्य सहसा मायामभूद्ब्रह्मैव केवलम्

ghaṭakuḍyakusūlātmā na prapaṁcassamasphurat nirbhidya sahasā māyāmabhūdbrahmaiva kevalam

घट, दीवार, कोठार आदि (सांसारिक) प्रपंच फिर स्फुरित नहीं हुआ; माया को सहसा भेदकर वह केवल ब्रह्म-स्वरूप ही हो गया।

श्लोक 114 (skanda.3.26.114)

इत्थं तीर्थत्रये स्नानाज्जानश्रुतिरहो नृपः। दुर्लभं योगिवृंदैश्च ब्रह्मभूयत्वमाप्तवान्

itthaṁ tīrthatraye snānājjānaśrutiraho nṛpaḥ durlabhaṁ yogivṛṁdaiśca brahmabhūyatvamāptavān

इस प्रकार तीर्थ-त्रय में स्नान से, अहो! राजा जानश्रुति ने, योगी-समूहों को भी दुर्लभ, ब्रह्म-भाव को प्राप्त कर लिया।

श्लोक 115 (skanda.3.26.115)

एवं वः कथितं विप्रास्तत्तीर्थत्रयवैभवम्। यस्त्विमं पठतेऽध्यायं तीर्थत्रितयवैभवम्

evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāstattīrthatrayavaibhavam yastvimaṁ paṭhate'dhyāyaṁ tīrthatritayavaibhavam

हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें उस तीर्थ-त्रय की महिमा बताई। जो इस तीर्थ-त्रय की महिमा वाले अध्याय को पढ़ता है,

श्लोक 116 (skanda.3.26.116)

निर्भिद्याज्ञानतिमिरं ब्रह्मभूयाय कल्पते

nirbhidyājñānatimiraṁ brahmabhūyāya kalpate

वह अज्ञान के अन्धकार को भेदकर ब्रह्म-भाव के योग्य हो जाता है।

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