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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 27

कोटितीर्थ-माहात्म्य एवं कृष्ण की मातुलवध-दोषशांति

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (skanda.3.27.1)

श्रीसूत उवाच यमुनायां च गंगायां गयायां च नरो मुदा स्नानं विधाय विधिवत्कोटितीर्थं ततो व्रजेत्

śrīsūta uvāca yamunāyāṁ ca gaṁgāyāṁ gayāyāṁ ca naro mudā snānaṁ vidhāya vidhivatkoṭitīrthaṁ tato vrajet

श्रीसूत जी बोले - मनुष्य यमुना, गंगा और गया में विधिपूर्वक स्नान करके प्रसन्नतापूर्वक कोटितीर्थ की ओर प्रस्थान करे।

श्लोक 2 (skanda.3.27.2)

कोटितीर्थं महापुण्यं सर्वलोकेषु विश्रुतम् सर्वसंपत्करं शुद्धं सर्वपापप्रणाशनम्

koṭitīrthaṁ mahāpuṇyaṁ sarvalokeṣu viśrutam sarvasaṁpatkaraṁ śuddhaṁ sarvapāpapraṇāśanam

कोटितीर्थ महान पुण्यदायी है, समस्त लोकों में विख्यात है; यह सब प्रकार की संपत्ति देने वाला, पवित्र और सभी पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 3 (skanda.3.27.3)

दुःस्वप्ननाशनं ह्येतन्महापातकनाशनम् महाविघ्नप्रशमनं महाशांतिकरं नृणाम्

duḥsvapnanāśanaṁ hyetanmahāpātakanāśanam mahāvighnapraśamanaṁ mahāśāṁtikaraṁ nṛṇām

यह दुःस्वप्नों का नाश करने वाला तथा महापातकों को मिटाने वाला है; यह महाविघ्नों को शांत कर मनुष्यों को महाशांति प्रदान करता है।

श्लोक 4 (skanda.3.27.4)

स्मृतिमात्रेण यत्पुंसां सर्वपापनिषूदनम् लीलया धनुषः कोट्या स्वयं रामेण निर्मितम्

smṛtimātreṇa yatpuṁsāṁ sarvapāpaniṣūdanam līlayā dhanuṣaḥ koṭyā svayaṁ rāmeṇa nirmitam

इसके स्मरण मात्र से ही मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि इसे स्वयं भगवान राम ने लीलापूर्वक अपने धनुष की नोक से बनाया था।

श्लोक 5 (skanda.3.27.5)

पुरा दाशरथी रामो निहत्य युधि रावणम् ब्रह्महत्याविमोक्षाय गंधमादनपर्वते

purā dāśarathī rāmo nihatya yudhi rāvaṇam brahmahatyāvimokṣāya gaṁdhamādanaparvate

प्राचीनकाल में युद्ध में रावण का वध करके, दशरथनन्दन श्रीराम ने ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने हेतु गन्धमादन पर्वत पर,

श्लोक 6 (skanda.3.27.6)

प्रातिष्ठिपल्लिंगमेकं लोकानुग्रहकाम्यया लिंगस्यास्याभिषेकाय शुद्धं वारि गवेषयन्

prātiṣṭhipalliṁgamekaṁ lokānugrahakāmyayā liṁgasyāsyābhiṣekāya śuddhaṁ vāri gaveṣayan

लोककल्याण की इच्छा से एक शिवलिंग की स्थापना की; और उस लिंग के अभिषेक हेतु शुद्ध जल की खोज करते हुए,

श्लोक 7 (skanda.3.27.7)

नाविंदत जलं तत्र पार्श्वे दशरथात्मजः लिंगाभिषेकयोग्यं च जलं किमिति चिंतयन्

nāviṁdata jalaṁ tatra pārśve daśarathātmajaḥ liṁgābhiṣekayogyaṁ ca jalaṁ kimiti ciṁtayan

दशरथपुत्र को वहाँ आस-पास लिंगाभिषेक योग्य कोई जल नहीं मिला, और वे सोचने लगे कि किस जल से अभिषेक करूँ।

श्लोक 8 (skanda.3.27.8)

नवेन वारिणा लिंगं स्नापनीयं मयेति सः निश्चित्य मनसा तत्र धनुष्कोट्या रघूद्वहः

navena vāriṇā liṁgaṁ snāpanīyaṁ mayeti saḥ niścitya manasā tatra dhanuṣkoṭyā raghūdvahaḥ

"मुझे नवीन जल से इस लिंग को स्नान कराना है" - ऐसा मन में निश्चय करके रघुकुलभूषण श्रीराम ने,

श्लोक 9 (skanda.3.27.9)

बिभेद धरणीं शीघ्रं मनसा जाह्नवीं स्मरन् रामकार्मुककोटिः सा तदा प्राप रसातलम्

bibheda dharaṇīṁ śīghraṁ manasā jāhnavīṁ smaran rāmakārmukakoṭiḥ sā tadā prāpa rasātalam

मन में गंगा का स्मरण करते हुए शीघ्र ही धनुष की नोक से पृथ्वी को भेद दिया; और राम के धनुष की वह नोक उसी क्षण रसातल तक जा पहुँची।

श्लोक 10 (skanda.3.27.10)

तत उद्धारयामास तद्धनुर्धन्विनां वरः धनुष्युद्ध्रियमाणे तु राघवेण महीतलात्

tata uddhārayāmāsa taddhanurdhanvināṁ varaḥ dhanuṣyuddhriyamāṇe tu rāghaveṇa mahītalāt

तब धनुर्धरों में श्रेष्ठ राम ने उस धनुष को बाहर खींचना आरम्भ किया; और जब राघव उस धनुष को पृथ्वीतल से ऊपर खींच रहे थे,

श्लोक 11 (skanda.3.27.11)

काकुत्स्थेन स्मृता गंगा निर्ययौ विवरात्ततः वारिणा तेन तल्लिंगमभ्यषिंचद्रघूद्वहः

kākutsthena smṛtā gaṁgā niryayau vivarāttataḥ vāriṇā tena talliṁgamabhyaṣiṁcadraghūdvahaḥ

काकुत्स्थवंशी राम द्वारा स्मरण की गई गंगा उस छिद्र से बाहर निकल आईं; और उसी जल से रघुनाथ ने उस लिंग का अभिषेक किया।

श्लोक 12 (skanda.3.27.12)

रामकार्मुककोट्यैव यतस्तन्निर्मितं पुरा अतः कोटिरिति ख्यातं तत्तीर्थं भुवनत्रये

rāmakārmukakoṭyaiva yatastannirmitaṁ purā ataḥ koṭiriti khyātaṁ tattīrthaṁ bhuvanatraye

चूँकि यह राम के धनुष की नोक (कोटि) से निर्मित हुआ था, इसलिए वह तीर्थ तीनों लोकों में "कोटितीर्थ" के नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 13 (skanda.3.27.13)

यानि यानीह तीर्थानि संति वै गंधमादने प्रथमं तेषु तीर्थेषु स्नात्वा विगतकल्मषः

yāni yānīha tīrthāni saṁti vai gaṁdhamādane prathamaṁ teṣu tīrtheṣu snātvā vigatakalmaṣaḥ

गन्धमादन पर्वत पर जो भी तीर्थ हैं, उन तीर्थों में सर्वप्रथम स्नान करके मनुष्य पापरहित हो जाए,

श्लोक 14 (skanda.3.27.14)

शेषपापविमोक्षाय स्नायात्कोटौ नरस्ततः तीर्थांतरेषु स्नानेन यः पापौघो न नश्यति

śeṣapāpavimokṣāya snāyātkoṭau narastataḥ tīrthāṁtareṣu snānena yaḥ pāpaugho na naśyati

तत्पश्चात शेष पाप से मुक्ति हेतु उसे कोटि में स्नान करना चाहिए; क्योंकि अन्य तीर्थों में स्नान करने से जो पापसमूह नष्ट नहीं होता,

श्लोक 15 (skanda.3.27.15)

अनेकजन्मकोटीभिरर्जितो ह्यस्थिसंस्थितः विनश्यति स सर्वोऽपि कोटिस्नानान्न संशयः

anekajanmakoṭībhirarjito hyasthisaṁsthitaḥ vinaśyati sa sarvo'pi koṭisnānānna saṁśayaḥ

अनेक करोड़ों जन्मों में अर्जित और हड्डियों में बसा हुआ वह सारा पाप कोटि-स्नान से निःसंदेह नष्ट हो जाता है।

श्लोक 16 (skanda.3.27.16)

यदि हि प्रथमं स्नायादत्र कोटौ नरो द्विजाः तस्य मुक्तस्य तीर्थानि व्यर्थान्येवापराणि हि

yadi hi prathamaṁ snāyādatra koṭau naro dvijāḥ tasya muktasya tīrthāni vyarthānyevāparāṇi hi

परन्तु हे द्विजो! यदि कोई मनुष्य सबसे पहले ही कोटि में स्नान कर ले, तो मुक्त हो चुकने के कारण उसके लिए अन्य समस्त तीर्थ व्यर्थ हो जाते हैं।

श्लोक 17 (skanda.3.27.17)

ऋषय ऊचुः सूत सर्वार्थतत्त्वज्ञ व्यासशिष्य मुनीश्वर अस्माकं संशयं कंचिच्छिंधि पौराणिकोत्तम

ṛṣaya ūcuḥ sūta sarvārthatattvajña vyāsaśiṣya munīśvara asmākaṁ saṁśayaṁ kaṁcicchiṁdhi paurāṇikottama

ऋषिगण बोले - हे सूत जी! समस्त तत्त्वों के ज्ञाता, व्यासशिष्य, मुनिश्रेष्ठ, हे पुराणकथावाचकों में श्रेष्ठ, हमारे इस संशय का निवारण कीजिए।

श्लोक 18 (skanda.3.27.18)

कोटौ स्नातस्य मर्त्यस्य यदि तीर्थांतरं वृथा किमर्थं धर्मतीर्थादि तीर्थेषु स्नांति मानवाः

koṭau snātasya martyasya yadi tīrthāṁtaraṁ vṛthā kimarthaṁ dharmatīrthādi tīrtheṣu snāṁti mānavāḥ

यदि कोटि में स्नान किए हुए मनुष्य के लिए अन्य तीर्थ व्यर्थ हैं, तो फिर लोग धर्मतीर्थ आदि तीर्थों में स्नान क्यों करते हैं?

श्लोक 19 (skanda.3.27.19)

तीर्थानि तानि सर्वाणि समतिक्रम्य मानवाः अत्रैव कोटौ किं स्नानं न कुर्वंति हि तद्वद

tīrthāni tāni sarvāṇi samatikramya mānavāḥ atraiva koṭau kiṁ snānaṁ na kurvaṁti hi tadvada

मनुष्य उन सभी तीर्थों को लांघकर केवल यहीं कोटि में स्नान क्यों नहीं कर लेते - यह हमें उसी प्रकार बताइए।

श्लोक 20 (skanda.3.27.20)

श्रीसूत उवाच अहो रहस्यं युष्माभिः पृष्टमेतन्मुनीश्वराः नारदाय पुरा शंभुः पृच्छते यत्किलाब्रवीत्

śrīsūta uvāca aho rahasyaṁ yuṣmābhiḥ pṛṣṭametanmunīśvarāḥ nāradāya purā śaṁbhuḥ pṛcchate yatkilābravīt

श्रीसूत जी बोले - अहो मुनीश्वरो! आपने यह रहस्यमय बात पूछी है। मैं वही बताता हूँ जो शिवजी ने प्राचीनकाल में पूछते हुए नारदजी से कहा था -

श्लोक 21 (skanda.3.27.21)

तद्ब्रवीमि मुनिश्रेष्ठाः शृणुध्वं श्रद्धया सह गच्छन्यदृच्छया वापि तीर्थयात्रापरोऽपि वा

tadbravīmi muniśreṣṭhāḥ śṛṇudhvaṁ śraddhayā saha gacchanyadṛcchayā vāpi tīrthayātrāparo'pi vā

सुनो श्रेष्ठ मुनियो, मैं वह श्रद्धापूर्वक कहता हूँ। चाहे कोई संयोगवश जा रहा हो या तीर्थयात्रा के उद्देश्य से जा रहा हो,

श्लोक 22 (skanda.3.27.22)

मार्गमध्ये द्विजश्रेष्ठास्तीर्थं देवालयं तथा दृष्ट्वा श्रुत्वापि वा मोहान्न सेवेत नराधमः

mārgamadhye dvijaśreṣṭhāstīrthaṁ devālayaṁ tathā dṛṣṭvā śrutvāpi vā mohānna seveta narādhamaḥ

हे द्विजश्रेष्ठो! मार्ग में यदि किसी तीर्थ या देवालय को देखकर अथवा सुनकर भी अधम मनुष्य मोहवश उसका दर्शन-सेवन नहीं करता,

श्लोक 23 (skanda.3.27.23)

निष्कृतिस्तस्य नास्तीति प्राब्रुवन्परमर्षयः सेतुं गच्छंस्ततोऽन्येषु न स्नायाद्यदि मानवः

niṣkṛtistasya nāstīti prābruvanparamarṣayaḥ setuṁ gacchaṁstato'nyeṣu na snāyādyadi mānavaḥ

तो महर्षियों ने कहा है कि उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है। अतः सेतु जाते समय यदि मनुष्य मार्ग के अन्य तीर्थों में स्नान नहीं करता,

श्लोक 24 (skanda.3.27.24)

तीर्थातिक्रमदोषैः स बहिष्कार्योऽत्यवद्द्विजैः अतः स्नातव्यमेवैषु चक्रतीर्थादिषु द्विजाः

tīrthātikramadoṣaiḥ sa bahiṣkāryo'tyavaddvijaiḥ ataḥ snātavyamevaiṣu cakratīrthādiṣu dvijāḥ

तो तीर्थ की उपेक्षा के दोष से द्विजों द्वारा उसका बहिष्कार किया जाना चाहिए। इसलिए हे द्विजो! चक्रतीर्थ आदि इन सब तीर्थों में अवश्य स्नान करना चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.3.27.25)

स्नात्वा चैतेषु तीर्थेषु शेषपापविमुक्तये प्रयतैर्मनुजैरत्र स्नातव्यं कोटितीर्थके

snātvā caiteṣu tīrtheṣu śeṣapāpavimuktaye prayatairmanujairatra snātavyaṁ koṭitīrthake

इन तीर्थों में स्नान करके शेष पाप से मुक्ति हेतु संयमी मनुष्य को अंततः यहाँ कोटितीर्थ में स्नान करना चाहिए।

श्लोक 26 (skanda.3.27.26)

कोटौ चाभिषवं कृत्वा न तिष्ठेद्गन्धमादने निवर्तेत्तत्क्षणादेव निष्पापो गंधमादनात्

koṭau cābhiṣavaṁ kṛtvā na tiṣṭhedgandhamādane nivartettatkṣaṇādeva niṣpāpo gaṁdhamādanāt

कोटि में अभिषेक-स्नान करके गन्धमादन पर्वत पर नहीं रुकना चाहिए; पापरहित होकर उसी क्षण गन्धमादन से लौट जाना चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.3.27.27)

रामोऽपि हि पुरा कोटितीर्थसंभूतवारिणा रामनाथेऽभिषिक्ते तु स्वयं स्नात्वा च तत्र वै

rāmo'pi hi purā koṭitīrthasaṁbhūtavāriṇā rāmanāthe'bhiṣikte tu svayaṁ snātvā ca tatra vai

प्राचीनकाल में स्वयं श्रीराम ने भी कोटितीर्थ से उत्पन्न जल से रामनाथ के अभिषेक के समय वहाँ स्वयं स्नान करके,

श्लोक 28 (skanda.3.27.28)

ब्रह्महत्याविमुक्तः संस्तत्क्षणादेव सानुजः आरूढपुष्पकोऽयोध्यां प्रययौ कपिभिर्वृतः

brahmahatyāvimuktaḥ saṁstatkṣaṇādeva sānujaḥ ārūḍhapuṣpako'yodhyāṁ prayayau kapibhirvṛtaḥ

उसी क्षण अपने अनुज सहित ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त हो गए; और पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर वानरों से घिरे हुए अयोध्या की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 29 (skanda.3.27.29)

अतः कोटौ नरः स्नात्वा पापशेषविमोचितः निवर्तेत्तत्क्षणादेव रामो दाशरथिर्यथा

ataḥ koṭau naraḥ snātvā pāpaśeṣavimocitaḥ nivartettatkṣaṇādeva rāmo dāśarathiryathā

अतः कोटि में स्नान करने वाला मनुष्य शेष पाप से मुक्त होकर उसी क्षण वहाँ से प्रस्थान करे - जैसे दशरथनंदन राम ने किया था।

श्लोक 30 (skanda.3.27.30)

एतद्धि तीर्थप्रवरं सर्वलोकेषु विश्रुतम् रामनाथाभिषेकाय निर्मितं राघवेण यत्

etaddhi tīrthapravaraṁ sarvalokeṣu viśrutam rāmanāthābhiṣekāya nirmitaṁ rāghaveṇa yat

यह निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है, जो समस्त लोकों में विख्यात है, जिसे राघव ने रामनाथ के अभिषेक हेतु स्वयं निर्मित किया था,

श्लोक 31 (skanda.3.27.31)

स्वयं भगवती यत्र सन्निधत्ते च जाह्नवी तारकब्रह्मणा यत्र रामेण स्नातमादरात्

svayaṁ bhagavatī yatra sannidhatte ca jāhnavī tārakabrahmaṇā yatra rāmeṇa snātamādarāt

जहाँ स्वयं देवी जाह्नवी (गंगा) निवास करती हैं, और जहाँ साक्षात तारकब्रह्मस्वरूप श्रीराम ने आदरपूर्वक स्नान किया था।

श्लोक 32 (skanda.3.27.32)

तस्य वै कोटितीर्थस्य महिमा केन कथ्यताम् यत्र स्नात्वा पुरा कृष्णो लोकसंग्रहणेच्छया

tasya vai koṭitīrthasya mahimā kena kathyatām yatra snātvā purā kṛṣṇo lokasaṁgrahaṇecchayā

उस कोटितीर्थ की महिमा भला कौन वर्णन कर सकता है, जहाँ प्राचीनकाल में भगवान कृष्ण ने लोकसंग्रह की इच्छा से स्नान करके,

श्लोक 33 (skanda.3.27.33)

मातुलस्य तु कंसस्य वधदोषाद्विमोचितः तस्य वै कोटितीर्थस्य महिमा केन कथ्यते

mātulasya tu kaṁsasya vadhadoṣādvimocitaḥ tasya vai koṭitīrthasya mahimā kena kathyate

अपने मामा कंस के वधजनित दोष से मुक्ति पाई - उस कोटितीर्थ की महिमा भला कौन कह सकता है?

श्लोक 34 (skanda.3.27.34)

ऋषय ऊचुः किमर्थमवधीत्कंसं मातुलं यदुनंदनः यद्दोषशांतये सूत सस्नौ कोटौ महामनाः

ṛṣaya ūcuḥ kimarthamavadhītkaṁsaṁ mātulaṁ yadunaṁdanaḥ yaddoṣaśāṁtaye sūta sasnau koṭau mahāmanāḥ

ऋषिगण बोले - हे सूत! यदुकुल के आनन्दस्वरूप कृष्ण ने अपने मामा कंस का वध किस कारण किया, और किस दोष की शांति हेतु उस महामना ने कोटि में स्नान किया?

श्लोक 35 (skanda.3.27.35)

श्रीसूत उवाच वसुदेव इति ख्यातः शूरपुत्रो यदोः कुले आसीत्स देवकसुतां देवकीमिति विश्रुताम्

śrīsūta uvāca vasudeva iti khyātaḥ śūraputro yadoḥ kule āsītsa devakasutāṁ devakīmiti viśrutām

श्रीसूत जी बोले - यदुकुल में शूरसेन के पुत्र वसुदेव नामक विख्यात पुरुष हुए; उन्होंने देवक की पुत्री, प्रसिद्ध देवकी से विवाह किया।

श्लोक 36 (skanda.3.27.36)

उद्वाह्य रथमारूढः स्वपुरं प्रस्थितः पुरा अथ सूतो बभूवाथ कंसो ह्यानकदुन्दुभेः

udvāhya rathamārūḍhaḥ svapuraṁ prasthitaḥ purā atha sūto babhūvātha kaṁso hyānakadundubheḥ

विवाह करके रथ पर आरूढ़ होकर वे प्राचीनकाल में अपने नगर की ओर चले, और आनकदुन्दुभि वसुदेव के लिए कंस स्वयं सारथी बना।

श्लोक 37 (skanda.3.27.37)

अशरीरा तदा वाणी कंसं सारथिमब्रवीत् भगिनीं च तथा भामं वाहयंतं रथोत्तमे

aśarīrā tadā vāṇī kaṁsaṁ sārathimabravīt bhaginīṁ ca tathā bhāmaṁ vāhayaṁtaṁ rathottame

तब उस उत्तम रथ पर अपनी बहन को ले जाते हुए सारथी कंस से एक आकाशवाणी हुई -

श्लोक 38 (skanda.3.27.38)

यामिमां वाहयस्यत्र रथेन त्वमरिंदम अस्यास्त्वामष्टमो गर्भो वधिष्यति न संशयः

yāmimāṁ vāhayasyatra rathena tvamariṁdama asyāstvāmaṣṭamo garbho vadhiṣyati na saṁśayaḥ

"हे शत्रुदमन! जिस बहन को तुम रथ में बिठाकर ले जा रहे हो, उसकी आठवीं संतान निश्चय ही तुम्हारा वध करेगी।"

श्लोक 39 (skanda.3.27.39)

इत्याकर्ण्य वचो दिव्यं कंसः खङ्गं प्रगृह्य च स्वसारं हंतुमुद्योगं चकार द्विजपुंगवाः

ityākarṇya vaco divyaṁ kaṁsaḥ khaṅgaṁ pragṛhya ca svasāraṁ haṁtumudyogaṁ cakāra dvijapuṁgavāḥ

हे द्विजश्रेष्ठो! यह दिव्य वाणी सुनकर कंस तलवार उठाकर अपनी बहन को मारने के लिए उद्यत हो गया।

श्लोक 40 (skanda.3.27.40)

ततः प्रोवाच तं कंसं वसुदेवः स सांत्वयन् वसुदेव उवाच अस्यां प्रसूतान्दास्यामि तुभ्यं कंस सुतानहम्

tataḥ provāca taṁ kaṁsaṁ vasudevaḥ sa sāṁtvayan vasudeva uvāca asyāṁ prasūtāndāsyāmi tubhyaṁ kaṁsa sutānaham

तब वसुदेव ने कंस को समझाते हुए कहा - वसुदेव बोले: "हे कंस! इससे उत्पन्न होने वाले पुत्रों को मैं तुम्हें सौंप दूँगा,

श्लोक 41 (skanda.3.27.41)

एनां स्वसारं मा हिंसीर्नास्यास्ते भीतिरस्ति हि श्रुत्वा तद्वचनं कंसो निवृत्तस्तद्वधात्तदा

enāṁ svasāraṁ mā hiṁsīrnāsyāste bhītirasti hi śrutvā tadvacanaṁ kaṁso nivṛttastadvadhāttadā

तुम अपनी इस बहन का वध मत करो; इससे तुम्हें कोई भय नहीं है।" यह वचन सुनकर कंस ने उसी समय वध करने से हाथ रोक लिया।

श्लोक 42 (skanda.3.27.42)

देवकीवसुदेवाभ्यां सहितः स्वपुरं ययौ पादावसक्तनिगडौ देवकीवसुदेवकौ

devakīvasudevābhyāṁ sahitaḥ svapuraṁ yayau pādāvasaktanigaḍau devakīvasudevakau

तत्पश्चात देवकी और वसुदेव को साथ लेकर वह अपने नगर गया; और देवकी-वसुदेव दोनों के पैरों में बेड़ियाँ डालकर,

श्लोक 43 (skanda.3.27.43)

स्थापयामास दुष्टात्मा कंसः कारागृहे तदा ततः कालेन महता वसुदेवाद्धि देवकी

sthāpayāmāsa duṣṭātmā kaṁsaḥ kārāgṛhe tadā tataḥ kālena mahatā vasudevāddhi devakī

उस दुष्टात्मा कंस ने उन्हें कारागार में डाल दिया। तत्पश्चात दीर्घ काल बीतने पर वसुदेव से देवकी ने,

श्लोक 44 (skanda.3.27.44)

षट्पुत्राञ्जनयामास क्रमेण मुनिपुंगवाः जातांस्तान्वसुदेवेन दत्तान्कंसोऽपि सोऽवधीत्

ṣaṭputrāñjanayāmāsa krameṇa munipuṁgavāḥ jātāṁstānvasudevena dattānkaṁso'pi so'vadhīt

क्रमशः छह पुत्रों को जन्म दिया, हे मुनिश्रेष्ठो; और जन्म लेते ही वसुदेव द्वारा सौंपे गए उन पुत्रों को कंस ने मार डाला।

श्लोक 45 (skanda.3.27.45)

हतेषु षट्सु पुत्रेषु देवक्युदरजन्मसु कंसेन क्रूरमतिना निष्कृपेण द्विजोत्तमाः

hateṣu ṣaṭsu putreṣu devakyudarajanmasu kaṁsena krūramatinā niṣkṛpeṇa dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! देवकी के गर्भ से उत्पन्न छहों पुत्रों का क्रूरचित्त और निर्दयी कंस द्वारा वध हो जाने पर,

श्लोक 46 (skanda.3.27.46)

शेषोऽभूत्सप्तमो गर्भो देवक्या जठरे तदा मायादेवी ततो गर्भं तं वै विष्णुप्रचोदिता

śeṣo'bhūtsaptamo garbho devakyā jaṭhare tadā māyādevī tato garbhaṁ taṁ vai viṣṇupracoditā

देवकी के गर्भ में सातवाँ गर्भ शेष रह गया; तब भगवान विष्णु से प्रेरित होकर देवी माया ने उस गर्भ को,

श्लोक 47 (skanda.3.27.47)

नंदगोपगृहस्थायां रोहिण्यां समवेशयत् देवक्याः सप्तमो गर्भः पतितो जठरादिति

naṁdagopagṛhasthāyāṁ rohiṇyāṁ samaveśayat devakyāḥ saptamo garbhaḥ patito jaṭharāditi

नंदगोप के घर में रहने वाली रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया। देवकी का सातवाँ गर्भ उदर से गिर गया - यह बात

श्लोक 48 (skanda.3.27.48)

लोके प्रसिद्धिरभवन्महती विष्णुलीलया देवकीजठरे पश्चाद्विष्णुर्गर्भत्वमाप्तवान्

loke prasiddhirabhavanmahatī viṣṇulīlayā devakījaṭhare paścādviṣṇurgarbhatvamāptavān

विष्णु की लीला से संसार में बड़ी प्रसिद्धि पा गई; तत्पश्चात स्वयं भगवान विष्णु देवकी के गर्भ में गर्भरूप से आ विराजे।

श्लोक 49 (skanda.3.27.49)

ततो दशसु मासेषु गतेषु हरिरव्ययः देवकीजठराज्जज्ञे कृष्ण इत्यभिविश्रुतः

tato daśasu māseṣu gateṣu hariravyayaḥ devakījaṭharājjajñe kṛṣṇa ityabhiviśrutaḥ

तत्पश्चात दस माह पूर्ण होने पर अविनाशी हरि देवकी के गर्भ से जन्मे, जो कृष्ण नाम से विख्यात हुए,

श्लोक 50 (skanda.3.27.50)

शंखचक्रगदाखङ्गविराजितचतुर्भुजः किरीटी वनमाली च पित्रोः शोकविनाशनः

śaṁkhacakragadākhaṅgavirājitacaturbhujaḥ kirīṭī vanamālī ca pitroḥ śokavināśanaḥ

शंख, चक्र, गदा और खड्ग से सुशोभित चार भुजाओं वाले, किरीट और वनमाला धारण किए हुए, अपने माता-पिता के शोक का नाश करने वाले।

श्लोक 51 (skanda.3.27.51)

तं दृष्ट्वा हरिमीशानं तुष्टावानकदुंदुभिः

taṁ dṛṣṭvā harimīśānaṁ tuṣṭāvānakaduṁdubhiḥ

उस ईश्वर हरि को देखकर आनकदुन्दुभि (वसुदेव) ने उनकी स्तुति की।

श्लोक 52 (skanda.3.27.52)

वसुदेव उवाच विश्वं भवान्विश्वपतिस्त्वमेव विश्वस्य योनिस्त्वयि विश्वमास्ते महान्प्रधानश्च विराट् स्वराट् च सम्राडसि त्वं भगवन्समस्तम्

vasudeva uvāca viśvaṁ bhavānviśvapatistvameva viśvasya yonistvayi viśvamāste mahānpradhānaśca virāṭ svarāṭ ca samrāḍasi tvaṁ bhagavansamastam

वसुदेव बोले - "तुम ही विश्व हो, तुम्हीं विश्व के स्वामी हो, तुम ही विश्व के आदिस्रोत हो और तुम में ही विश्व स्थित है। तुम ही महत्तत्त्व, प्रधान, विराट, स्वराट और सम्राट हो - हे भगवन्, तुम ही यह समस्त जगत हो।"

श्लोक 53 (skanda.3.27.53)

एवं जगत्कारणभूतधाम्ने नारायणायामितविक्रमाय श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय नमोनमः कृत्रिममानुषाय

evaṁ jagatkāraṇabhūtadhāmne nārāyaṇāyāmitavikramāya śrīśārṅgacakrāsigadādharāya namonamaḥ kṛtrimamānuṣāya

"जगत के कारणस्वरूप, अपरिमित पराक्रमशाली, शार्ङ्ग धनुष, चक्र, खड्ग और गदा धारण करने वाले नारायण को, जो यह कृत्रिम मनुष्यरूप धारण किए हुए हैं, बार-बार नमस्कार है।"

श्लोक 54 (skanda.3.27.54)

स्तुवन्तमेवं शौरिं तं वसुदेवं हरिस्तदा अवोचत्प्रीणयंस्तं च देवकीं च द्विजोत्तमाः

stuvantamevaṁ śauriṁ taṁ vasudevaṁ haristadā avocatprīṇayaṁstaṁ ca devakīṁ ca dvijottamāḥ

इस प्रकार शौरि (वसुदेव) द्वारा स्तुति किए जाने पर, हे द्विजोत्तमो, हरि ने वसुदेव और देवकी दोनों को प्रसन्न करते हुए कहा -

श्लोक 55 (skanda.3.27.55)

हरिरुवाच अहं कंसं वधिष्यामि मा भीर्वां पितराविति नन्दगोपस्य गृहिणी यशोदाऽजनयत्सुताम् मम मायां पूर्वदिने सर्वलोकविमोहिनीम्

hariruvāca ahaṁ kaṁsaṁ vadhiṣyāmi mā bhīrvāṁ pitarāviti nandagopasya gṛhiṇī yaśodā'janayatsutām mama māyāṁ pūrvadine sarvalokavimohinīm

हरि बोले - "मैं कंस का वध करूँगा; हे माता-पिता, तुम भयभीत मत होओ। सम्पूर्ण संसार को मोहित करने वाली मेरी माया के प्रभाव से नंदगोप की पत्नी यशोदा ने कल ही एक कन्या को जन्म दिया है।

श्लोक 56 (skanda.3.27.56)

मां तस्याः शयने न्यस्य यशोदायाः सुता तु ताम् आदाय देवकीशय्यां प्रापयस्व यदूत्तम

māṁ tasyāḥ śayane nyasya yaśodāyāḥ sutā tu tām ādāya devakīśayyāṁ prāpayasva yadūttama

उस पुत्री को मेरी शय्या पर रखकर, हे यदुश्रेष्ठ, तुम मुझे लेकर देवकी की शय्या में पहुँचा दो।"

श्लोक 57 (skanda.3.27.57)

एवमुक्तः स कृष्णेन तथैव ह्यकरोद्द्विजाः रुरोद माया तनया देवकीशयनेस्थिता

evamuktaḥ sa kṛṣṇena tathaiva hyakaroddvijāḥ ruroda māyā tanayā devakīśayanesthitā

कृष्ण द्वारा इस प्रकार आदेश दिए जाने पर वसुदेव ने वैसा ही किया, हे द्विजो; और वह मायारूपी कन्या देवकी की शय्या पर पड़ी हुई रो उठी।

श्लोक 58 (skanda.3.27.58)

अथ बालध्वनिं श्रुत्वा कंसः संकुलमानसः सूतिकागृहमागम्य तामादाय च दारिकाम्

atha bāladhvaniṁ śrutvā kaṁsaḥ saṁkulamānasaḥ sūtikāgṛhamāgamya tāmādāya ca dārikām

तब शिशु के रोने की ध्वनि सुनकर व्याकुलचित्त कंस प्रसूतिगृह में आया और उस बालिका को पकड़ लिया।

श्लोक 59 (skanda.3.27.59)

शिलायां पोथयामास निर्दयो निरपत्रपः अथ तद्धस्तमाच्छिद्य सायुधाष्टमहाभुजा महादेव्यब्रवीत्कंसं समाहूयातिकोपना

śilāyāṁ pothayāmāsa nirdayo nirapatrapaḥ atha taddhastamācchidya sāyudhāṣṭamahābhujā mahādevyabravītkaṁsaṁ samāhūyātikopanā

निर्दयी और निर्लज्ज कंस ने उसे शिला पर पटक दिया; परन्तु तब वह देवी अपना हाथ उसकी पकड़ से छुड़ाकर, आयुधों से युक्त अपनी आठ महान भुजाओं के साथ,

श्लोक 60 (skanda.3.27.60)

मायोवाच अरे रे कंस पापात्मन्दुर्बुद्धे मूढचेतन

māyovāca are re kaṁsa pāpātmandurbuddhe mūḍhacetana

उस महादेवी ने अत्यंत क्रोधित होकर कंस को पुकारकर कहा - माया बोलीं: "अरे पापात्मा, दुर्बुद्धि, मूढचित्त कंस!

श्लोक 61 (skanda.3.27.61)

यत्र कुत्रापि शत्रुस्ते वर्तते प्राणहारकः मार्गयस्वात्मनो मृत्युं तं शत्रुं कंस मा चिरम्

yatra kutrāpi śatruste vartate prāṇahārakaḥ mārgayasvātmano mṛtyuṁ taṁ śatruṁ kaṁsa mā ciram

तुम्हारा प्राणहारी शत्रु जहाँ कहीं भी हो, हे कंस, अपनी मृत्यु के उस शत्रु को शीघ्र ही खोजो, विलम्ब मत करो।"

श्लोक 62 (skanda.3.27.62)

इतीरयित्वा सा देवी दिव्यस्थानान्यवाप्य च लब्धपूजा मनुष्येभ्यो बभूवाभीष्टदायिनी

itīrayitvā sā devī divyasthānānyavāpya ca labdhapūjā manuṣyebhyo babhūvābhīṣṭadāyinī

ऐसा कहकर वह देवी दिव्य स्थानों को प्राप्त हुई, और मनुष्यों से पूजा प्राप्त कर अभीष्ट फल प्रदान करने वाली बन गई।

श्लोक 63 (skanda.3.27.63)

श्रुत्वा स देवीवचनं कंसोऽपि भृशमाकुलः बालग्रहान्पूतनादीन्स्वांतकं बाधितुं रिपुम्

śrutvā sa devīvacanaṁ kaṁso'pi bhṛśamākulaḥ bālagrahānpūtanādīnsvāṁtakaṁ bādhituṁ ripum

उस देवी के वचन सुनकर कंस भी अत्यंत व्याकुल हो उठा; उसने अपने अन्तक-स्वरूप शत्रु को बाधा पहुँचाने हेतु पूतना आदि बालग्रहों को,

श्लोक 64 (skanda.3.27.64)

प्रेषयामास देशेषु शिशूनन्यांश्च बाधितुम् ते च बालग्रहाः सर्वे प्रययुर्नंदगोकुलम्

preṣayāmāsa deśeṣu śiśūnanyāṁśca bādhitum te ca bālagrahāḥ sarve prayayurnaṁdagokulam

विभिन्न प्रदेशों में तथा अन्य शिशुओं को भी बाधित करने हेतु भेजा। और वे सभी बालग्रह नंद के गोकुल की ओर गए।

श्लोक 65 (skanda.3.27.65)

हताश्च कृष्णेन तदा प्रययुर्यमसादनम् ततः कतिपयाहस्सु गतेषु द्विजपुंगवाः

hatāśca kṛṣṇena tadā prayayuryamasādanam tataḥ katipayāhassu gateṣu dvijapuṁgavāḥ

कृष्ण द्वारा मारे जाकर वे यमलोक को चले गए; तत्पश्चात कुछ दिन बीतने पर, हे द्विजश्रेष्ठो,

श्लोक 66 (skanda.3.27.66)

रामकृष्णौ व्यवर्द्धेतां गोकुले बालकौ तदा अनेकबालक्रीडाभिश्चिक्रीडतुररिंदमौ

rāmakṛṣṇau vyavarddhetāṁ gokule bālakau tadā anekabālakrīḍābhiścikrīḍaturariṁdamau

राम और कृष्ण दोनों बालक गोकुल में साथ-साथ बड़े होने लगे, और वे दोनों शत्रुदमन अनेक बाल-क्रीड़ाओं से क्रीड़ा करने लगे।

श्लोक 67 (skanda.3.27.67)

कंचित्कालं वत्सपालौ वेणुनादमकुर्वताम् कंचित्कालं च गोपालौ गुंजातापि च्छभूषितौ

kaṁcitkālaṁ vatsapālau veṇunādamakurvatām kaṁcitkālaṁ ca gopālau guṁjātāpi cchabhūṣitau

कुछ समय तक दोनों बछड़े चराते हुए बाँसुरी बजाते रहे; कुछ समय तक दोनों गोपबालक गुंजाफलों से विभूषित होकर,

श्लोक 68 (skanda.3.27.68)

रेमाते बहुकालं तौ गोकुले रामकेशवौ कंसः कदाचिदक्रूरं गोकुले रामकेशवौ

remāte bahukālaṁ tau gokule rāmakeśavau kaṁsaḥ kadācidakrūraṁ gokule rāmakeśavau

गोकुल में इस प्रकार दीर्घकाल तक क्रीड़ा करते रहे, वे राम-केशव। किसी समय कंस ने राम-केशव को गोकुल से बुलवाने हेतु अक्रूर को भेजा।

श्लोक 69 (skanda.3.27.69)

प्रेषयामास विप्रेंद्राः समानयितुमंजसा आनयामास चाक्रूरो रामकृष्णौ स गोकुलात्

preṣayāmāsa vipreṁdrāḥ samānayitumaṁjasā ānayāmāsa cākrūro rāmakṛṣṇau sa gokulāt

हे विप्रेन्द्रो! कंस ने शीघ्र उन्हें लाने हेतु अक्रूर को भेजा; और अक्रूर गोकुल से राम-कृष्ण को लेकर,

श्लोक 70 (skanda.3.27.70)

मथुरां कंसनिर्देशात्स्वर्णतोरणराजिताम्

mathurāṁ kaṁsanirdeśātsvarṇatoraṇarājitām

कंस की आज्ञा से स्वर्ण-तोरणों से सुशोभित मथुरा नगरी की ओर ले गए।

श्लोक 71 (skanda.3.27.71)

ततः समानीय स रामकेशवौ ययौ पुरीं गांदिनिजस्तदग्रे दृष्ट्वा च कंसं विनिवेद्य कार्यं तस्मै स्वगेहं प्रविवेश पश्चात्

tataḥ samānīya sa rāmakeśavau yayau purīṁ gāṁdinijastadagre dṛṣṭvā ca kaṁsaṁ vinivedya kāryaṁ tasmai svagehaṁ praviveśa paścāt

तत्पश्चात उन्हें लेकर गांदिनीपुत्र अक्रूर राम-केशव से आगे नगर में गए; कंस को देखकर उन्हें अपना कार्य निवेदित करने के बाद वे पीछे अपने घर में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 72 (skanda.3.27.72)

अथापराह्णे वसुदेवपुत्रावन्येद्युरिष्टैः सह गोपपुत्रैः उपेयतुः सालनिखातयुक्तां संगोपुराट्टां मधुरापुरीं तौ

athāparāhṇe vasudevaputrāvanyedyuriṣṭaiḥ saha gopaputraiḥ upeyatuḥ sālanikhātayuktāṁ saṁgopurāṭṭāṁ madhurāpurīṁ tau

तत्पश्चात अगले दिन अपराह्न में वसुदेव के दोनों पुत्र, प्रिय गोपपुत्रों के साथ,

श्लोक 73 (skanda.3.27.73)

स्तोत्राणि शृण्वन्पुरयौवतानां कृष्णस्तु रामेण सहैव गत्वा धनुर्निवेशं सह सैव तत्र ददर्श चापं च महदृढज्यम्

stotrāṇi śṛṇvanpurayauvatānāṁ kṛṣṇastu rāmeṇa sahaiva gatvā dhanurniveśaṁ saha saiva tatra dadarśa cāpaṁ ca mahadṛḍhajyam

प्राचीरों और गोपुरों से युक्त उस मधुरापुरी के समीप पहुँचे। नगर की युवतियों की स्तुतियाँ सुनते हुए कृष्ण राम के साथ जाकर,

श्लोक 74 (skanda.3.27.74)

विद्राव्य सर्वानपि चापपालान्धनुः समादाय स लीलयाऽऽशु मौर्व्यां नियोक्तुं नमयांचकार तदंतरे भग्नमभूद्विधैव

vidrāvya sarvānapi cāpapālāndhanuḥ samādāya sa līlayā''śu maurvyāṁ niyoktuṁ namayāṁcakāra tadaṁtare bhagnamabhūdvidhaiva

वहाँ धनुष के आयोजनस्थल में दृढ़ प्रत्यंचा वाले उस विशाल धनुष को देखा। उस धनुष के सभी रक्षकों को भगाकर उन्होंने लीलापूर्वक शीघ्र ही उस धनुष को उठा लिया,

श्लोक 75 (skanda.3.27.75)

कोदंडभंगोत्थितशब्दमाशु श्रुत्वाभियातान्बलिनो निहंतुम् निजघ्नतुस्तौ प्रतिगृह्य खंडौ चापस्य पालान्बलिनौ द्विजेंद्राः

kodaṁḍabhaṁgotthitaśabdamāśu śrutvābhiyātānbalino nihaṁtum nijaghnatustau pratigṛhya khaṁḍau cāpasya pālānbalinau dvijeṁdrāḥ

और प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए झुकाते ही वह अपने-आप बीच से टूट गया। धनुष टूटने से उत्पन्न शब्द सुनकर तुरन्त उसे मारने दौड़े आए बलवान रक्षकों को,

श्लोक 76 (skanda.3.27.76)

ततः कुवलयापीडं गजं द्वारि स्थितं क्षणात् निहत्य रामकृष्णौ तौ महाबलपराक्रमौ

tataḥ kuvalayāpīḍaṁ gajaṁ dvāri sthitaṁ kṣaṇāt nihatya rāmakṛṣṇau tau mahābalaparākramau

उन दोनों बलवानों (राम-कृष्ण) ने धनुष के टूटे हुए टुकड़े लेकर उन रक्षकों को मार डाला, हे द्विजेन्द्रो। तत्पश्चात द्वार पर खड़े कुवलयापीड हाथी को क्षणभर में मारकर,

श्लोक 77 (skanda.3.27.77)

तस्य दंतौ समुत्पाट्य दधानौ करयोर्द्वयोः अंसे निधाय तौ दंतौ रंगं प्रययतुः क्षणात्

tasya daṁtau samutpāṭya dadhānau karayordvayoḥ aṁse nidhāya tau daṁtau raṁgaṁ prayayatuḥ kṣaṇāt

महान बल और पराक्रम वाले उन दोनों ने उसके दोनों दाँत उखाड़कर अपने दोनों हाथों में लेकर,

श्लोक 78 (skanda.3.27.78)

निहत्य मल्लं चाणूरं मुष्टिकं तोशलं तथा अन्यांश्च मल्लप्रवरान्निन्यतुर्यमसादनम्

nihatya mallaṁ cāṇūraṁ muṣṭikaṁ tośalaṁ tathā anyāṁśca mallapravarānninyaturyamasādanam

उन दाँतों को कंधे पर रखकर क्षणभर में रंगभूमि में प्रवेश किया। मल्ल चाणूर, मुष्टिक और तोशल को मारकर,

श्लोक 79 (skanda.3.27.79)

समारुरुहतुस्तूर्णं तुंगं मंचं च तौ तदा तत्र तुंगे समासीनमासने कंसमेत्य तौ तस्थतुस्तं तृणीकृत्य सिंहौ क्षुद्रमृगं यथा

samāruruhatustūrṇaṁ tuṁgaṁ maṁcaṁ ca tau tadā tatra tuṁge samāsīnamāsane kaṁsametya tau tasthatustaṁ tṛṇīkṛtya siṁhau kṣudramṛgaṁ yathā

तथा अन्य श्रेष्ठ मल्लों को भी यमलोक भेज दिया। तत्पश्चात दोनों शीघ्र ही ऊँचे मंच पर चढ़ गए; वहाँ ऊँचे आसन पर बैठे कंस के पास जाकर,

श्लोक 80 (skanda.3.27.80)

ततः कंसं समाकृष्य कृष्णो मंचोपरि स्थितम् पादौ गृहीत्वा वेगेन भ्रामयामास चांबरे

tataḥ kaṁsaṁ samākṛṣya kṛṣṇo maṁcopari sthitam pādau gṛhītvā vegena bhrāmayāmāsa cāṁbare

उन्होंने उसे तिनके के समान तुच्छ समझा, जैसे दो सिंह किसी क्षुद्र पशु को देखते हैं। तत्पश्चात कृष्ण ने मंच पर स्थित कंस को खींचकर,

श्लोक 81 (skanda.3.27.81)

ततस्तं पोथयामास स भूमौ गतजीवितम् कंसभ्रातॄन्बलोऽप्यष्टौ निजघ्ने मुष्टिना द्विजाः

tatastaṁ pothayāmāsa sa bhūmau gatajīvitam kaṁsabhrātṝnbalo'pyaṣṭau nijaghne muṣṭinā dvijāḥ

उसके पैर पकड़कर वेगपूर्वक आकाश में घुमाया, और फिर उसे भूमि पर पटक दिया, जिससे उसके प्राण निकल गए। बलराम ने भी कंस के आठों भाइयों को अपनी मुट्ठी से मार डाला, हे द्विजो।

श्लोक 82 (skanda.3.27.82)

एवं निहत्य तं कंसं कृष्णः परबलार्दनः पितरौ मोचयामास निगडादतिदुःखितौ

evaṁ nihatya taṁ kaṁsaṁ kṛṣṇaḥ parabalārdanaḥ pitarau mocayāmāsa nigaḍādatiduḥkhitau

इस प्रकार कंस का वध करके शत्रुसेना-विनाशक कृष्ण ने अत्यन्त दुःखी अपने माता-पिता को बेड़ियों से मुक्त कर दिया।

श्लोक 83 (skanda.3.27.83)

सर्वानास्थापयामास बलेन सह माधवः श्रीकृष्णेन हतं कंसं श्रुत्वा प्रापुः पुरीं तदा

sarvānāsthāpayāmāsa balena saha mādhavaḥ śrīkṛṣṇena hataṁ kaṁsaṁ śrutvā prāpuḥ purīṁ tadā

माधव ने बलराम के साथ सबको यथास्थान पुनः स्थापित किया; और श्रीकृष्ण द्वारा कंस के मारे जाने का समाचार सुनकर उस समय,

श्लोक 84 (skanda.3.27.84)

बांधवा मथुरायां ये पूर्वं कंसे न बाधिताः उग्रसेनं तथा राज्ये स्थापयामास केशवः

bāṁdhavā mathurāyāṁ ye pūrvaṁ kaṁse na bādhitāḥ ugrasenaṁ tathā rājye sthāpayāmāsa keśavaḥ

मथुरा में रहने वाले जो बांधव पहले कंस से पीड़ित नहीं हुए थे, वे नगर में आ गए; और केशव ने उग्रसेन को राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित किया।

श्लोक 85 (skanda.3.27.85)

असहिष्णुर्द्विजाः पित्रोरेवं कंसकृतागसम् जघान मातुलं कंसं देवब्राह्मणकंटकम्

asahiṣṇurdvijāḥ pitrorevaṁ kaṁsakṛtāgasam jaghāna mātulaṁ kaṁsaṁ devabrāhmaṇakaṁṭakam

हे द्विजो! माता-पिता के प्रति कंस द्वारा किए गए अपराध को सहन न कर सकने के कारण उन्होंने देव-ब्राह्मणों के कंटकस्वरूप मामा कंस का वध कर दिया।

श्लोक 86 (skanda.3.27.86)

ततः कदाचित्कृष्णोऽयमात्मानं द्रष्टुमागतान् नारदादीन्मुनीन्सर्वानिदं पप्रच्छ सत्तमः

tataḥ kadācitkṛṣṇo'yamātmānaṁ draṣṭumāgatān nāradādīnmunīnsarvānidaṁ papraccha sattamaḥ

तत्पश्चात एक समय उन सर्वश्रेष्ठ कृष्ण ने अपने दर्शन हेतु आए नारद आदि समस्त मुनियों से यह प्रश्न पूछा -

श्लोक 87 (skanda.3.27.87)

श्रीकृष्ण उवाच मयाऽयं मातुलो विप्रा हतः कंसोऽतिपापकृत् मातुलस्य वधे दोषः प्रोच्यते शास्त्रवित्तमैः

śrīkṛṣṇa uvāca mayā'yaṁ mātulo viprā hataḥ kaṁso'tipāpakṛt mātulasya vadhe doṣaḥ procyate śāstravittamaiḥ

श्रीकृष्ण बोले - "हे विप्रो! मेरे इस अत्यंत पापी मामा कंस का मेरे द्वारा वध हुआ है; शास्त्रवेत्ता विद्वानों ने कहा है कि मामा के वध में दोष लगता है।

श्लोक 88 (skanda.3.27.88)

प्रायश्चित्तमतो ब्रूत तद्दोषविनिवृत्तये अवोचन्नारदस्तत्र कृष्णमद्भुतविक्रमम् वाचा मधुरया विप्रा भक्तिप्रणयपूर्वकम्

prāyaścittamato brūta taddoṣavinivṛttaye avocannāradastatra kṛṣṇamadbhutavikramam vācā madhurayā viprā bhaktipraṇayapūrvakam

अतः उस दोष के निवारण हेतु प्रायश्चित्त बताइए।" तब नारद जी ने वहाँ, हे विप्रो, उन अद्भुत पराक्रमी कृष्ण से भक्ति और प्रेमपूर्वक मधुर वाणी में कहा -

श्लोक 89 (skanda.3.27.89)

नारद उवाच नित्यशुद्धश्च मुक्तश्च भद्रश्चैव भवान्सदा

nārada uvāca nityaśuddhaśca muktaśca bhadraścaiva bhavānsadā

नारद जी बोले - "तुम नित्य शुद्ध, नित्य मुक्त और सदा कल्याणस्वरूप हो -

श्लोक 90 (skanda.3.27.90)

सच्चिदानंदरूपश्च परमात्मा सनातनः पुण्यं पापं च ते नास्ति कृष्ण यादवनंदन

saccidānaṁdarūpaśca paramātmā sanātanaḥ puṇyaṁ pāpaṁ ca te nāsti kṛṣṇa yādavanaṁdana

तुम सच्चिदानन्दस्वरूप, सनातन परमात्मा हो; हे कृष्ण, यादवनन्दन, तुम्हारे लिए न कोई पुण्य है और न कोई पाप।

श्लोक 91 (skanda.3.27.91)

तथापि लोकशिक्षार्थं भवता गरुडध्वज प्रायश्चित्तं तु कर्तव्यं विधिनानेन माधव

tathāpi lokaśikṣārthaṁ bhavatā garuḍadhvaja prāyaścittaṁ tu kartavyaṁ vidhinānena mādhava

तथापि हे गरुड़ध्वज! लोकशिक्षा के लिए तुम्हें इस विधि के अनुसार प्रायश्चित्त करना चाहिए, हे माधव।

श्लोक 92 (skanda.3.27.92)

लोकसंग्रहणं तावत्कर्तव्यं भवताधुना रामसेतौ महापुण्ये गंधमादनपर्वते

lokasaṁgrahaṇaṁ tāvatkartavyaṁ bhavatādhunā rāmasetau mahāpuṇye gaṁdhamādanaparvate

लोकसंग्रह के लिए तुम्हें अभी यह करना चाहिए: अत्यंत पुण्यमय रामसेतु पर, गन्धमादन पर्वत पर जाओ,

श्लोक 93 (skanda.3.27.93)

रामेण स्थापितं लिंगं रामनाथाभिधं पुरा तस्याभिषेकतोयार्थं धनुष्कोट्या रघूद्वहः

rāmeṇa sthāpitaṁ liṁgaṁ rāmanāthābhidhaṁ purā tasyābhiṣekatoyārthaṁ dhanuṣkoṭyā raghūdvahaḥ

जहाँ प्राचीनकाल में राम ने रामनाथ नामक लिंग की स्थापना की थी; उसके अभिषेक हेतु जल के लिए राघव ने धनुष की नोक से,

श्लोक 94 (skanda.3.27.94)

गां भित्त्वोत्पादयामास तीर्थं कोटीति विश्रुतम् तव पूर्वावतारेण रामेणाक्लिष्टकर्मणा

gāṁ bhittvotpādayāmāsa tīrthaṁ koṭīti viśrutam tava pūrvāvatāreṇa rāmeṇākliṣṭakarmaṇā

पृथ्वी को भेदकर कोटि नाम से विख्यात तीर्थ को प्रकट किया - जो तुम्हारे पूर्व अवतार, अक्लिष्टकर्मा राम द्वारा,

श्लोक 95 (skanda.3.27.95)

ब्रह्महत्याविशुद्ध्यर्थं निर्मितं स्वयमेव यत् तत्र स्नानं कुरुष्व त्वं धर्म्ये पापविनाशने

brahmahatyāviśuddhyarthaṁ nirmitaṁ svayameva yat tatra snānaṁ kuruṣva tvaṁ dharmye pāpavināśane

ब्रह्महत्या-शुद्धि हेतु स्वयं निर्मित किया गया था। उस धर्मयुक्त, पापनाशक स्थान में तुम स्नान करो।

श्लोक 96 (skanda.3.27.96)

तेन ते मातुलवधाद्दोषः शीघ्रं विनंक्ष्यति कोटितीर्थे हरेः स्नानं ब्रह्महत्यादिशोधकम्

tena te mātulavadhāddoṣaḥ śīghraṁ vinaṁkṣyati koṭitīrthe hareḥ snānaṁ brahmahatyādiśodhakam

इससे तुम्हारा मामा-वध का दोष शीघ्र नष्ट हो जाएगा। कोटितीर्थ में हरि का स्नान ब्रह्महत्या आदि दोषों को शुद्ध करने वाला है;

श्लोक 97 (skanda.3.27.97)

स्वर्गमोक्षप्रदं पुंसामायुरारोग्यवर्धनम् इति श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं नारदस्य स माधवः

svargamokṣapradaṁ puṁsāmāyurārogyavardhanam iti śrutvā munervākyaṁ nāradasya sa mādhavaḥ

यह मनुष्यों को स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करता है, तथा आयु और आरोग्य को बढ़ाता है।" नारद मुनि के इस वचन को सुनकर माधव ने,

श्लोक 98 (skanda.3.27.98)

विसृज्य तानृषीन्सर्वांस्तस्मिन्नेव क्षणे द्विजाः रामसेतौ ययौ तूर्णं स्वदोषपरिशुद्धये

visṛjya tānṛṣīnsarvāṁstasminneva kṣaṇe dvijāḥ rāmasetau yayau tūrṇaṁ svadoṣapariśuddhaye

उसी क्षण उन सभी ऋषियों को विदा करके, हे द्विजो, अपने दोष की शुद्धि के लिए शीघ्र ही रामसेतु की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 99 (skanda.3.27.99)

दिनैः कतिपयैर्गत्वा कोटितीर्थं यदूद्वहः स्नात्वा संकल्पपूर्वं च दत्त्वा दानान्यनेकशः

dinaiḥ katipayairgatvā koṭitīrthaṁ yadūdvahaḥ snātvā saṁkalpapūrvaṁ ca dattvā dānānyanekaśaḥ

कुछ दिनों की यात्रा करके वे यदुकुल के अग्रणी कोटितीर्थ जा पहुँचे; वहाँ संकल्पपूर्वक स्नान करके तथा अनेक प्रकार के दान देकर,

श्लोक 100 (skanda.3.27.100)

स मातुलवधोत्पन्नदोषेभ्यो मुमुचे क्षणात् निषेव्य रामनाथं च स्वपुरं मथुरां ययौ

sa mātulavadhotpannadoṣebhyo mumuce kṣaṇāt niṣevya rāmanāthaṁ ca svapuraṁ mathurāṁ yayau

वे मामा-वध से उत्पन्न दोष से तत्क्षण मुक्त हो गए; और रामनाथ की उपासना करके अपने नगर मथुरा को लौट गए।

श्लोक 101 (skanda.3.27.101)

श्रीसूत उवाच एवं प्रभावं पुण्यं च कोटितीर्थं मुनीश्वराः ब्रह्महत्यादिभिः पापैः सद्यो मुच्येत मानवः नानेन सदृशं तीर्थमन्यदस्ति महीतले

śrīsūta uvāca evaṁ prabhāvaṁ puṇyaṁ ca koṭitīrthaṁ munīśvarāḥ brahmahatyādibhiḥ pāpaiḥ sadyo mucyeta mānavaḥ nānena sadṛśaṁ tīrthamanyadasti mahītale

श्रीसूत जी बोले - हे मुनीश्वरो! ऐसा है कोटितीर्थ का पुण्यमय प्रभाव; मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापों से तत्काल मुक्त हो जाता है। पृथ्वी पर इसके समान कोई अन्य तीर्थ नहीं है।

श्लोक 102 (skanda.3.27.102)

अत्र स्नानात्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुशिवा द्विजाः प्रीताः स्युरन्ये देवाश्च नात्र कार्या विचारणा

atra snānāttrayo devā brahmaviṣṇuśivā dvijāḥ prītāḥ syuranye devāśca nātra kāryā vicāraṇā

यहाँ स्नान करने से, हे द्विजो, ब्रह्मा, विष्णु और शिव - ये तीनों देवता प्रसन्न होते हैं, तथा अन्य देवता भी प्रसन्न होते हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 103 (skanda.3.27.103)

एवं वः कथितं चित्रं कोटितीर्थस्य वैभवम् यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवो भुवि

evaṁ vaḥ kathitaṁ citraṁ koṭitīrthasya vaibhavam yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate mānavo bhuvi

इस प्रकार मैंने तुम्हें कोटितीर्थ के अद्भुत वैभव का वर्णन सुनाया, जिसे सुनकर मनुष्य पृथ्वी पर सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 104 (skanda.3.27.104)

श्रुत्वेमं पुण्यमध्यायं पठित्वा च मुनीश्वराः ब्रह्महत्यादिभिः सत्यं मुच्यते पातकैर्नरः

śrutvemaṁ puṇyamadhyāyaṁ paṭhitvā ca munīśvarāḥ brahmahatyādibhiḥ satyaṁ mucyate pātakairnaraḥ

हे मुनीश्वरो! इस पुण्यमय अध्याय को सुनकर अथवा पढ़कर मनुष्य निश्चय ही ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाता है।

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