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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 30

धनुष्कोटि-वैभव-वर्णन

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

श्लोक 1 (skanda.3.30.1)

श्रीसूत उवाच विहिताभिषवो मर्त्यः सर्वतीर्थेऽतिपावने ब्रह्महत्यादिपापघ्नीं धनुष्कोटिं ततो व्रजेत्

śrīsūta uvāca vihitābhiṣavo martyaḥ sarvatīrthe'tipāvane brahmahatyādipāpaghnīṁ dhanuṣkoṭiṁ tato vrajet

श्रीसूत जी बोले - अत्यंत पवित्र सर्वतीर्थ में अभिषेक-स्नान करके मनुष्य तत्पश्चात ब्रह्महत्या आदि पापों का नाश करने वाले धनुष्कोटि तीर्थ की ओर जाए।

श्लोक 2 (skanda.3.30.2)

यस्याः स्मरणमात्रेण मुक्तः स्यान्मानवो भुवि धनुष्कोटिं प्रपश्यंति स्नांति वा कथयंति ये

yasyāḥ smaraṇamātreṇa muktaḥ syānmānavo bhuvi dhanuṣkoṭiṁ prapaśyaṁti snāṁti vā kathayaṁti ye

जिसके स्मरण मात्र से मनुष्य पृथ्वी पर मुक्त हो जाता है - जो लोग धनुष्कोटि का दर्शन करते हैं, वहाँ स्नान करते हैं, अथवा उसकी चर्चा करते हैं,

श्लोक 3 (skanda.3.30.3)

अष्टाविंशतिभेदांस्ते नरकान्नोपभुंजते तामिस्रमंधतामिस्रं महारौरवरौरवौ

aṣṭāviṁśatibhedāṁste narakānnopabhuṁjate tāmisramaṁdhatāmisraṁ mahārauravarauravau

वे अट्ठाईस प्रकार के नरकों को नहीं भोगते - तामिस्र, अंधतामिस्र, महारौरव और रौरव,

श्लोक 4 (skanda.3.30.4)

कुम्भीपाकं कालसूत्रमसिपत्रवनं तथा कृमिभक्षोंऽधकूपश्च संदंशं शाल्मली तथा

kumbhīpākaṁ kālasūtramasipatravanaṁ tathā kṛmibhakṣoṁ'dhakūpaśca saṁdaṁśaṁ śālmalī tathā

कुम्भीपाक, कालसूत्र तथा असिपत्रवन, इसी प्रकार कृमिभक्ष, अंधकूप, संदंश और शाल्मली,

श्लोक 5 (skanda.3.30.5)

सूर्मिर्वैतरणी प्राणरोधो विशसनं तथा लालाभक्षोऽप्यवीचिश्च सारमेयादनं तथा

sūrmirvaitaraṇī prāṇarodho viśasanaṁ tathā lālābhakṣo'pyavīciśca sārameyādanaṁ tathā

सूर्मि, वैतरणी, प्राणरोध तथा विशसन, लालाभक्ष एवं अवीचि, तथा सारमेयादन,

श्लोक 6 (skanda.3.30.6)

तथैव वज्रकणकं क्षारकर्दमपातनम् रक्षोगणाशनं चापि शूलप्रोतं वितोदनम्

tathaiva vajrakaṇakaṁ kṣārakardamapātanam rakṣogaṇāśanaṁ cāpi śūlaprotaṁ vitodanam

तथा वज्रकंटक, क्षारकर्दम में गिराया जाना, राक्षसगणों द्वारा भक्षण, तथा शूल में पिरोया जाना और पीड़ित होना,

श्लोक 7 (skanda.3.30.7)

दंदशूकाशनं चापि पर्यावर्तनसंज्ञितम् तिरोधानाभिधं विप्रास्तथा सूचीमुखाभिधम्

daṁdaśūkāśanaṁ cāpi paryāvartanasaṁjñitam tirodhānābhidhaṁ viprāstathā sūcīmukhābhidham

तथा विषैले सर्पों द्वारा भक्षण, पर्यावर्तन नामक नरक, तिरोधान नामक नरक, हे विप्रो, और सूचीमुख नामक नरक,

श्लोक 8 (skanda.3.30.8)

पूयशोणितभक्षं च विषाग्निपरिपीडनम् अष्टाविंशतिसंख्याकमेवं नरकसंचयम्

pūyaśoṇitabhakṣaṁ ca viṣāgniparipīḍanam aṣṭāviṁśatisaṁkhyākamevaṁ narakasaṁcayam

तथा पीब और रक्त खिलाया जाना, विष और अग्नि से पीड़ा - इस प्रकार यह अट्ठाईस नरकों का समूह,

श्लोक 9 (skanda.3.30.9)

न याति मनुजो विप्रा धनुष्कोटौ निमज्जनात् वित्तापत्यकलत्राणां योऽन्येषामपहारकः

na yāti manujo viprā dhanuṣkoṭau nimajjanāt vittāpatyakalatrāṇāṁ yo'nyeṣāmapahārakaḥ

मनुष्य, हे विप्रो, धनुष्कोटि में स्नान करने से नहीं भोगता। जो दूसरों के धन, संतान अथवा पत्नियों का अपहरण करता है -

श्लोक 10 (skanda.3.30.10)

स कालपाशनिर्बद्धो यमदूतैर्भयानकैः तामिस्रनरके घोरे पात्यते बहुवत्सरम्

sa kālapāśanirbaddho yamadūtairbhayānakaiḥ tāmisranarake ghore pātyate bahuvatsaram

वह काल के पाश में बंधा हुआ, यमदूतों के भयानक हाथों से, अनेक वर्षों तक भयंकर तामिस्र नरक में डाला जाता है -

श्लोक 11 (skanda.3.30.11)

स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते यो निहत्य तु भर्तारं भुंक्ते तस्य धनादिकान्

snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate yo nihatya tu bhartāraṁ bhuṁkte tasya dhanādikān

परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता। जो अपने स्वामी का वध कर उसके धन आदि का भोग करता है -

श्लोक 12 (skanda.3.30.12)

पात्यते सोंऽधतामिस्रे महादुःखसमाकुले स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते

pātyate soṁ'dhatāmisre mahāduḥkhasamākule snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate

वह घोर दुःखों से भरे अंधतामिस्र नरक में डाला जाता है; परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता।

श्लोक 13 (skanda.3.30.13)

भूतद्रोहेण यो मर्त्यः पुष्णाति स्वकुटुंबकम् स तानिह विहायाशु रौरवे पात्यते ध्रुवम्

bhūtadroheṇa yo martyaḥ puṣṇāti svakuṭuṁbakam sa tāniha vihāyāśu raurave pātyate dhruvam

जो मनुष्य प्राणियों के प्रति द्रोह करके अपने ही परिवार का पोषण करता है -

श्लोक 14 (skanda.3.30.14)

विषोल्बणमहासर्पसंकुले यमपूरुषैः स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते

viṣolbaṇamahāsarpasaṁkule yamapūruṣaiḥ snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate

वह उन्हें यहीं छोड़कर निश्चय ही शीघ्र विषैले महासर्पों से भरे रौरव नरक में डाला जाता है, यमपुरुषों के द्वारा;

श्लोक 15 (skanda.3.30.15)

यः स्वदेहंभरो मर्त्यो भार्यापुत्रादिकं विना स महारौरवे घोरे पात्यते निजमांसभुक्

yaḥ svadehaṁbharo martyo bhāryāputrādikaṁ vinā sa mahāraurave ghore pātyate nijamāṁsabhuk

परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता। जो मनुष्य पत्नी-पुत्र आदि की उपेक्षा कर केवल अपने ही शरीर का पोषण करता है -

श्लोक 16 (skanda.3.30.16)

स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते यः पशून्पक्षिणो वापि सप्राणान्निरुणद्धि वै

snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate yaḥ paśūnpakṣiṇo vāpi saprāṇānniruṇaddhi vai

वह भयंकर महारौरव में डाला जाता है, जहाँ वह अपना ही मांस खाता है; परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता। जो प्राणसहित पशुओं अथवा पक्षियों को बंदी बनाता है -

श्लोक 17 (skanda.3.30.17)

कृपालेशविहीनं तं क्रव्यादैरपि निंदितम् कुंभीपाके तप्ततैले पातयंति यमानुगाः

kṛpāleśavihīnaṁ taṁ kravyādairapi niṁditam kuṁbhīpāke taptataile pātayaṁti yamānugāḥ

लेशमात्र भी करुणा से रहित, मांसभक्षी जीवों द्वारा भी निंदित - उसे यमदूत कुम्भीपाक में, खौलते तेल में डालते हैं;

श्लोक 18 (skanda.3.30.18)

स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते मातरं पितरं विप्रान्यो द्वेष्टि पुरुषाधमः

snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate mātaraṁ pitaraṁ viprānyo dveṣṭi puruṣādhamaḥ

परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता। जो अधम पुरुष अपनी माता, पिता अथवा ब्राह्मणों से द्वेष करता है -

श्लोक 19 (skanda.3.30.19)

स कालसूत्रनरके विस्तृतायुतयोजने अधस्तादग्निसंतप्त उपर्यर्कमरीचिभिः

sa kālasūtranarake vistṛtāyutayojane adhastādagnisaṁtapta uparyarkamarīcibhiḥ

वह कालसूत्र नामक नरक में, जो दस हजार योजन विस्तृत है, नीचे अग्नि से और ऊपर सूर्य की किरणों से संतप्त होकर,

श्लोक 20 (skanda.3.30.20)

खले ताम्रमये विप्राः पात्यते क्षुधयार्दितः स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते

khale tāmramaye viprāḥ pātyate kṣudhayārditaḥ snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate

तांबे के खलिहान पर, हे विप्रो, भूख से पीड़ित होकर डाला जाता है; परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता।

श्लोक 21 (skanda.3.30.21)

यो वेदमार्गमुल्लंघ्य वर्तते कुपथे नरः सोऽसिपत्रवने घोरे पात्यते यमकिंकरैः

yo vedamārgamullaṁghya vartate kupathe naraḥ so'sipatravane ghore pātyate yamakiṁkaraiḥ

जो मनुष्य वेदमार्ग का उल्लंघन कर कुमार्ग पर चलता है - वह यमकिंकरों द्वारा भयंकर असिपत्रवन में डाला जाता है;

श्लोक 22 (skanda.3.30.22)

स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते यो राजा राजभृत्यो वा ह्यदंड्ये दंडमाचरेत्

snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate yo rājā rājabhṛtyo vā hyadaṁḍye daṁḍamācaret

परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता। जो राजा अथवा राजसेवक अदंड्य पर दंड देता है -

श्लोक 23 (skanda.3.30.23)

शरीरदंडं विप्रे वा स शूकरमुखे द्विजाः पात्यते नरके घोरे इक्षुवद्यंत्रपीडितः

śarīradaṁḍaṁ vipre vā sa śūkaramukhe dvijāḥ pātyate narake ghore ikṣuvadyaṁtrapīḍitaḥ

चाहे शारीरिक दंड हो या ब्राह्मण पर दंड, वह हे द्विजो, शूकरमुख नरक में गन्ने के समान यंत्र में पेरा जाकर डाला जाता है;

श्लोक 24 (skanda.3.30.24)

स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते ईश्वराधीनवृत्तीनां हिंसां यः प्राणिनां चरेत्

snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate īśvarādhīnavṛttīnāṁ hiṁsāṁ yaḥ prāṇināṁ caret

परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता। जो ईश्वराधीन वृत्ति वाले प्राणियों की हिंसा करता है -

श्लोक 25 (skanda.3.30.25)

तैरेव पीड्यमानोऽयं जंतुभिः स्वेन पीडितैः अंधकूपे महाभीमे पात्यते यमकिंकरैः

taireva pīḍyamāno'yaṁ jaṁtubhiḥ svena pīḍitaiḥ aṁdhakūpe mahābhīme pātyate yamakiṁkaraiḥ

उन्हीं जीवों से पीड़ित होकर, जिन्हें उसने स्वयं पीड़ा दी थी, वह यमकिंकरों द्वारा अत्यंत भयंकर अंधकूप में डाला जाता है;

श्लोक 26 (skanda.3.30.26)

तत्रांधकारबहुले विनिद्रो निर्वृतश्चरेत् स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते

tatrāṁdhakārabahule vinidro nirvṛtaścaret snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate

वहाँ, उस घोर अंधकारमय स्थान में, वह निद्राहीन और शांतिरहित होकर भटकता है; परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता।

श्लोक 27 (skanda.3.30.27)

योऽश्नाति पंक्तिभेदेन सस्यसूपादिकं नरः अकृत्वा पंचयज्ञं वा भुंक्ते मोहेन स द्विजाः

yo'śnāti paṁktibhedena sasyasūpādikaṁ naraḥ akṛtvā paṁcayajñaṁ vā bhuṁkte mohena sa dvijāḥ

जो मनुष्य पंक्तिभेद करके अन्न-व्यंजन आदि खाता है, अथवा पंचयज्ञ किए बिना ही मोहवश भोजन कर लेता है, हे द्विजो -

श्लोक 28 (skanda.3.30.28)

प्रपात्यते यमभटैर्नरके कृमिभोजने भक्ष्यमाणः कृमिशतैर्भक्षयन्कृमिसंचयान्

prapātyate yamabhaṭairnarake kṛmibhojane bhakṣyamāṇaḥ kṛmiśatairbhakṣayankṛmisaṁcayān

वह यमभटों द्वारा कृमिभोजन नामक नरक में गिराया जाता है, जहाँ वह सैकड़ों कीड़ों द्वारा खाया जाता है और स्वयं भी कृमिसमूहों को खाता है,

श्लोक 29 (skanda.3.30.29)

स्वयं च कृमिभूतः संस्तिष्ठेद्यावदघक्षयम् स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते

svayaṁ ca kṛmibhūtaḥ saṁstiṣṭhedyāvadaghakṣayam snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate

और स्वयं कीड़ा बनकर वह तब तक वहीं रहता है, जब तक उसका पाप क्षीण नहीं हो जाता; परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता।

श्लोक 30 (skanda.3.30.30)

यो हरेद्विप्रवित्तानि स्तेयेन बलतोऽपि वा अन्येषामपि वित्तानि राजा तत्पुरुषोऽपि वा

yo haredvipravittāni steyena balato'pi vā anyeṣāmapi vittāni rājā tatpuruṣo'pi vā

जो चोरी से या बलपूर्वक ब्राह्मण का धन हरण करता है, अथवा अन्य लोगों का भी धन हरण करता है - चाहे वह राजा हो या राजा का कोई पुरुष -

श्लोक 31 (skanda.3.30.31)

अयस्मयाग्निकुंडेषु संदंशैः सोऽतिपीडितः संदंशे नरके घोरे पात्यते यमपूरुषैः

ayasmayāgnikuṁḍeṣu saṁdaṁśaiḥ so'tipīḍitaḥ saṁdaṁśe narake ghore pātyate yamapūruṣaiḥ

वह लोहे की चिमटियों से अग्निकुंडों में अत्यंत पीड़ित होकर, यमपुरुषों द्वारा भयंकर संदंश नरक में डाला जाता है;

श्लोक 32 (skanda.3.30.32)

स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते अगम्यां योभिगच्छेत स्त्रियं वै पुरुषाधमः

snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate agamyāṁ yobhigaccheta striyaṁ vai puruṣādhamaḥ

परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता। जो अधम पुरुष किसी अगम्य स्त्री के पास जाता है,

श्लोक 33 (skanda.3.30.33)

अगम्यं पुरुषं योषिदभिगच्छेत वा द्विजाः तावयस्मयनारीं च पुरुषं चाप्ययस्मयम्

agamyaṁ puruṣaṁ yoṣidabhigaccheta vā dvijāḥ tāvayasmayanārīṁ ca puruṣaṁ cāpyayasmayam

अथवा हे द्विजो, जो स्त्री किसी अगम्य पुरुष के पास जाती है - उन दोनों को लोहे की स्त्री और लोहे के पुरुष के,

श्लोक 34 (skanda.3.30.34)

तप्तावालिंग्य तिष्ठंतौ यावच्चंद्रदिवाकरौ सूर्म्याख्ये नरके घोरे पात्येते बहुकंटके

taptāvāliṁgya tiṣṭhaṁtau yāvaccaṁdradivākarau sūrmyākhye narake ghore pātyete bahukaṁṭake

तपाए हुए उन स्वरूपों का आलिंगन कराया जाता है, और वे चंद्र-सूर्य के रहने तक उसी अवस्था में रहते हैं, कंटकों से भरे भयंकर सूर्मि नरक में डाले जाकर;

श्लोक 35 (skanda.3.30.35)

स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते बाधते सर्वजंतून्यो नानोपायैरुपद्रवैः

snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate bādhate sarvajaṁtūnyo nānopāyairupadravaiḥ

परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता। जो अनेक उपायों और उपद्रवों से समस्त प्राणियों को कष्ट पहुँचाता है -

श्लोक 36 (skanda.3.30.36)

शाल्मलीनरके घोरे पात्यते बहुकंटके स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते

śālmalīnarake ghore pātyate bahukaṁṭake snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate

वह कंटकों से भरे भयंकर शाल्मली नरक में डाला जाता है; परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता।

श्लोक 37 (skanda.3.30.37)

राजा वा राजभृत्यो वा यः पाषंडमनुव्रतः भेदको धर्मसेतूनां वैतरण्यां निपात्यते

rājā vā rājabhṛtyo vā yaḥ pāṣaṁḍamanuvrataḥ bhedako dharmasetūnāṁ vaitaraṇyāṁ nipātyate

जो राजा अथवा राजसेवक पाषंड (मिथ्या मत) का अनुसरण करता है, तथा जो धर्म की मर्यादाओं को तोड़ता है -

श्लोक 38 (skanda.3.30.38)

स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते वृषलीसंगदुष्टो यः शौचाद्याचारवर्जितः

snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate vṛṣalīsaṁgaduṣṭo yaḥ śaucādyācāravarjitaḥ

वह वैतरणी में डाला जाता है; परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता। जो वृषली (नीच स्त्री) के संग से दूषित, शौच आदि आचार से रहित है,

श्लोक 39 (skanda.3.30.39)

त्यक्तलज्जस्त्यक्तवेदः पशुचर्यारतस्तथा स पूयविष्ठामूत्रासृक्छ्लेष्मपित्तादिपूरिते

tyaktalajjastyaktavedaḥ paśucaryāratastathā sa pūyaviṣṭhāmūtrāsṛkchleṣmapittādipūrite

जो लज्जा त्यागकर, वेद त्यागकर, पशुतुल्य आचरण में रत रहता है - वह पीब, विष्ठा, मूत्र, रक्त, कफ, पित्त आदि से भरे अत्यंत घृणित नरक में,

श्लोक 40 (skanda.3.30.40)

अतिबीभत्सनरके पात्यते यमकिंकरैः स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते

atibībhatsanarake pātyate yamakiṁkaraiḥ snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate

यमकिंकरों द्वारा डाला जाता है; परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता।

श्लोक 41 (skanda.3.30.41)

अश्मभिर्मृगयुर्हन्याद्बाणैर्वा बाधते मृगान् स विध्यमानो बाणौघैः परत्र यमकिंकरैः

aśmabhirmṛgayurhanyādbāṇairvā bādhate mṛgān sa vidhyamāno bāṇaughaiḥ paratra yamakiṁkaraiḥ

जो शिकारी पत्थरों से मार डालता है, अथवा बाणों से मृगों को त्रस्त करता है - वह परलोक में यमकिंकरों द्वारा बाणों की झड़ी से बींधा जाकर,

श्लोक 42 (skanda.3.30.42)

प्राणरोधाख्यनरके पात्यते यमकिंकरैः स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते

prāṇarodhākhyanarake pātyate yamakiṁkaraiḥ snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate

यमकिंकरों द्वारा प्राणरोध नामक नरक में डाला जाता है; परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता।

श्लोक 43 (skanda.3.30.43)

दांभिको यः पशून्यज्ञे विध्यनुष्ठानवर्जितः हंत्यसौ परलोकेषु वैशसे नरके द्विजाः

dāṁbhiko yaḥ paśūnyajñe vidhyanuṣṭhānavarjitaḥ haṁtyasau paralokeṣu vaiśase narake dvijāḥ

जो पाखंडी विधिपूर्वक अनुष्ठान के बिना यज्ञ में पशुओं का वध करता है, हे द्विजो - वह परलोक में,

श्लोक 44 (skanda.3.30.44)

कृन्त्यमानो यमभटैः पात्यते दुःखसंकुले स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते

kṛntyamāno yamabhaṭaiḥ pātyate duḥkhasaṁkule snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate

यमभटों द्वारा टुकड़े-टुकड़े काटा जाकर, दुःखों से भरे वैशस नरक में डाला जाता है; परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता।

श्लोक 45 (skanda.3.30.45)

आत्मभार्यां सवर्णां यो रेतः पाययते तु सः परत्र रेतःपायी सन्रेतःकुंडे निपात्यते

ātmabhāryāṁ savarṇāṁ yo retaḥ pāyayate tu saḥ paratra retaḥpāyī sanretaḥkuṁḍe nipātyate

जो अपनी सजातीय पत्नी को वीर्यपान कराता है -

श्लोक 46 (skanda.3.30.46)

स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते यो दस्युमार्गमाश्रित्य गरदो ग्रामदाहकः

snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate yo dasyumārgamāśritya garado grāmadāhakaḥ

वह परलोक में स्वयं वीर्यपान कराया जाकर रेतःकुंड नामक नरक में डाला जाता है; परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता। जो डाकुओं का मार्ग अपनाता है, जो विष देता है, जो गाँव जलाता है,

श्लोक 47 (skanda.3.30.47)

वणिग्द्रव्यापहारी च स परत्र द्विजोत्तमाः वज्रदंष्ट्राहिकाभिख्ये नरके पात्यते चिरम्

vaṇigdravyāpahārī ca sa paratra dvijottamāḥ vajradaṁṣṭrāhikābhikhye narake pātyate ciram

तथा जो व्यापारी का माल लूटता है - वह, हे द्विजोत्तमो, परलोक में वज्रदंष्ट्राहिक नामक नरक में दीर्घकाल तक डाला जाता है;

श्लोक 48 (skanda.3.30.48)

स्नाति चेद्धनुषः कोटौ तस्मिन्नासौ निपात्यते विद्यंते यानि चान्यानि नरकाणि परत्र वै

snāti ceddhanuṣaḥ koṭau tasminnāsau nipātyate vidyaṁte yāni cānyāni narakāṇi paratra vai

परन्तु यदि वह धनुष्कोटि में स्नान करे, तो वह उसमें नहीं डाला जाता। इनके अतिरिक्त परलोक में जो भी अन्य नरक विद्यमान हैं -

श्लोक 49 (skanda.3.30.49)

तानि नाप्नोति मनुजो धनुष्कोटिनिमज्जनात् धनुष्कोटौ सकृत्स्नानादश्वमेधफलं लभेत्

tāni nāpnoti manujo dhanuṣkoṭinimajjanāt dhanuṣkoṭau sakṛtsnānādaśvamedhaphalaṁ labhet

उन्हें भी मनुष्य धनुष्कोटि में डुबकी लगाने से नहीं भोगता। धनुष्कोटि में एक बार भी स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है;

श्लोक 50 (skanda.3.30.50)

आत्मविद्या भवेत्साक्षान्मुक्तिश्चापि चतुर्विधा न पापे रमते बुद्धिर्न भवेद्दुःखमेव वा

ātmavidyā bhavetsākṣānmuktiścāpi caturvidhā na pāpe ramate buddhirna bhavedduḥkhameva vā

साक्षात आत्मविद्या प्राप्त होती है, तथा चतुर्विध मुक्ति भी प्राप्त होती है; बुद्धि पाप में रमण नहीं करती, न ही उसे दुःख होता है -

श्लोक 51 (skanda.3.30.51)

बुद्धेः प्रीतिर्भवेत्सम्यग्धनुष्कोटौ निमज्जनात् तुलापुरुषदानेन यत्फलं लभ्यते नरैः

buddheḥ prītirbhavetsamyagdhanuṣkoṭau nimajjanāt tulāpuruṣadānena yatphalaṁ labhyate naraiḥ

बुद्धि को सम्यक प्रीति प्राप्त होती है, धनुष्कोटि में स्नान करने से। तुलापुरुष-दान से मनुष्यों को जो फल प्राप्त होता है,

श्लोक 52 (skanda.3.30.52)

तत्फलं लभ्यते पुंभिर्धनुष्कोटौ निमज्जनात् गोसहस्रप्रदानेन यत्पुण्यं हि भवेन्नृणाम्

tatphalaṁ labhyate puṁbhirdhanuṣkoṭau nimajjanāt gosahasrapradānena yatpuṇyaṁ hi bhavennṛṇām

वही फल मनुष्यों को धनुष्कोटि में स्नान करने से प्राप्त होता है। एक सहस्र गौओं के दान से मनुष्यों को जो पुण्य प्राप्त होता है,

श्लोक 53 (skanda.3.30.53)

तत्पुण्यं लभते मर्त्यो धनुष्कोटौ निमज्जनात् धर्मार्थकाममोक्षेषु यंयमिच्छति पूरुषः

tatpuṇyaṁ labhate martyo dhanuṣkoṭau nimajjanāt dharmārthakāmamokṣeṣu yaṁyamicchati pūruṣaḥ

वही पुण्य मनुष्य को धनुष्कोटि में स्नान करने से प्राप्त होता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से मनुष्य जिस-जिस की इच्छा करता है,

श्लोक 54 (skanda.3.30.54)

तंतं सद्यः समाप्नोति धनुष्कोटौ निमज्जनात् महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः

taṁtaṁ sadyaḥ samāpnoti dhanuṣkoṭau nimajjanāt mahāpātakayukto vā yukto vā sarvapātakaiḥ

उस-उस को वह तत्काल प्राप्त कर लेता है, धनुष्कोटि में स्नान करने से। चाहे वह महापातक से युक्त हो या समस्त पापों से युक्त हो,

श्लोक 55 (skanda.3.30.55)

सद्यः पूतो भवेद्विप्रा धनुष्कोटौ निमज्जनात् प्रज्ञालक्ष्मीर्यशः संपज्ज्ञानं धर्मो विरक्तता

sadyaḥ pūto bhavedviprā dhanuṣkoṭau nimajjanāt prajñālakṣmīryaśaḥ saṁpajjñānaṁ dharmo viraktatā

वह तत्काल पवित्र हो जाता है, हे विप्रो, धनुष्कोटि में स्नान करने से। प्रज्ञा, लक्ष्मी, यश, संपत्ति, ज्ञान, धर्म, वैराग्य,

श्लोक 56 (skanda.3.30.56)

मनःशुद्धिर्भवेन्नॄणां धनुष्कोटिनिमज्जनात् ब्रह्महत्यायुतं चापि सुरापानायुतं तथा

manaḥśuddhirbhavennṝṇāṁ dhanuṣkoṭinimajjanāt brahmahatyāyutaṁ cāpi surāpānāyutaṁ tathā

तथा मन की शुद्धि मनुष्यों को धनुष्कोटि में स्नान करने से प्राप्त होती है। दस हजार ब्रह्महत्याओं के समान पाप, तथा दस हजार सुरापान के समान पाप,

श्लोक 57 (skanda.3.30.57)

अयुतं गुरुदाराणां गमनं पापकारणम् स्तेयायुतं सुवर्णानां तत्संसर्गश्च कोटिशः

ayutaṁ gurudārāṇāṁ gamanaṁ pāpakāraṇam steyāyutaṁ suvarṇānāṁ tatsaṁsargaśca koṭiśaḥ

गुरुपत्नीगमन के दस हजार पापकारण, दस हजार स्वर्णचोरियाँ, तथा ऐसे पापियों के साथ करोड़ों बार का संसर्ग -

श्लोक 58 (skanda.3.30.58)

शीघ्रं विलयमाप्नोति धनुष्कोटौ निमज्जनात् ब्रह्महत्यासमानानि सुरापानसमानि च

śīghraṁ vilayamāpnoti dhanuṣkoṭau nimajjanāt brahmahatyāsamānāni surāpānasamāni ca

ये सभी शीघ्र विलीन हो जाते हैं, धनुष्कोटि में स्नान करने से। ब्रह्महत्या के समान, सुरापान के समान,

श्लोक 59 (skanda.3.30.59)

गुरुस्त्रीगमनेनापि यानि तुल्यानि चास्तिकाः सुवर्णस्तेयतुल्यानि तत्संसर्गसमानि च

gurustrīgamanenāpi yāni tulyāni cāstikāḥ suvarṇasteyatulyāni tatsaṁsargasamāni ca

तथा हे आस्तिको! गुरुस्त्रीगमन के समान, स्वर्णचोरी के समान, तथा उनके संसर्ग के समान जो भी पाप हैं -

श्लोक 60 (skanda.3.30.60)

तानि सर्वाणि नश्यंति धनुष्कोटिनिमज्जनात् उक्तेष्वेतेषु संदेहो न कर्तव्यः कदाचन

tāni sarvāṇi naśyaṁti dhanuṣkoṭinimajjanāt ukteṣveteṣu saṁdeho na kartavyaḥ kadācana

वे सभी नष्ट हो जाते हैं, धनुष्कोटि में स्नान करने से। यहाँ कही गई इन बातों में कभी भी संदेह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 61 (skanda.3.30.61)

जिह्वाग्रे परशुं तप्तं धारयामि न संशयः अर्थवादमिमं सर्वं ब्रुवन्वै नारकी भवेत्

jihvāgre paraśuṁ taptaṁ dhārayāmi na saṁśayaḥ arthavādamimaṁ sarvaṁ bruvanvai nārakī bhavet

"मैं अपनी जिह्वा के अग्रभाग पर तपा हुआ फरसा धारण करता हूँ, इसमें संशय नहीं" - इस समस्त कथन को मात्र अतिशयोक्ति मानकर कहने वाला व्यक्ति नारकी होता है।

श्लोक 62 (skanda.3.30.62)

संकरः स हि विज्ञेयः सर्वकर्मबहिष्कृतः अहो मौर्ख्यमहो मौर्ख्यमहो मौर्ख्यं द्विजोत्तमाः

saṁkaraḥ sa hi vijñeyaḥ sarvakarmabahiṣkṛtaḥ aho maurkhyamaho maurkhyamaho maurkhyaṁ dvijottamāḥ

वह वर्णसंकर जानने योग्य है, जो समस्त कर्मों से बहिष्कृत है। अहो मूर्खता, अहो मूर्खता, अहो मूर्खता, हे द्विजोत्तमो,

श्लोक 63 (skanda.3.30.63)

धनुष्कोट्यभिधे तीर्थे सर्वपातकनाशने अद्वैतज्ञानदे पुंसां भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि

dhanuṣkoṭyabhidhe tīrthe sarvapātakanāśane advaitajñānade puṁsāṁ bhuktimuktipradāyini

कि जबकि धनुष्कोटि नामक तीर्थ, जो समस्त पापों का नाशक है, मनुष्यों को अद्वैत ज्ञान प्रदान करने वाला, भोग और मोक्ष देने वाला है,

श्लोक 64 (skanda.3.30.64)

इष्टकाम्यप्रदे नित्यं तथैवाज्ञाननाशने स्थितेऽपि तद्विहायायं रमतेऽन्यत्र वै जनः

iṣṭakāmyaprade nityaṁ tathaivājñānanāśane sthite'pi tadvihāyāyaṁ ramate'nyatra vai janaḥ

सदा इष्ट कामनाओं को देने वाला तथा अज्ञान का नाशक है, यहाँ विद्यमान होते हुए भी, लोग इसे छोड़कर अन्यत्र रमण करते हैं!

श्लोक 65 (skanda.3.30.65)

अहो मोहस्य माहात्म्यं मया वक्तुं न शक्यते स्नातस्य धनुषः कोटौ नांतकाद्भयमस्ति वै

aho mohasya māhātmyaṁ mayā vaktuṁ na śakyate snātasya dhanuṣaḥ koṭau nāṁtakādbhayamasti vai

अहो, मोह की महिमा - मैं उसका वर्णन करने में असमर्थ हूँ! धनुष्कोटि में स्नान किए हुए व्यक्ति को मृत्यु से भय नहीं रहता।

श्लोक 66 (skanda.3.30.66)

धनुष्कोटिं प्रपश्यंति तत्र स्नांति च ये नराः स्तुवंति च प्रशंसंति स्पृशंति च नमंति च न पिबंति हि ते स्तन्यं मातॄणां द्विजपुंगवाः

dhanuṣkoṭiṁ prapaśyaṁti tatra snāṁti ca ye narāḥ stuvaṁti ca praśaṁsaṁti spṛśaṁti ca namaṁti ca na pibaṁti hi te stanyaṁ mātṝṇāṁ dvijapuṁgavāḥ

जो मनुष्य धनुष्कोटि का दर्शन करते हैं, वहाँ स्नान करते हैं, उसकी स्तुति और प्रशंसा करते हैं, उसका स्पर्श करते हैं और उसे नमन करते हैं - वे, हे द्विजपुंगवो, माताओं का स्तनपान पुनः नहीं करते।

श्लोक 67 (skanda.3.30.67)

ऋषय ऊचुः धनुष्कोट्याभिधा तस्य कथं सूत समागता

ṛṣaya ūcuḥ dhanuṣkoṭyābhidhā tasya kathaṁ sūta samāgatā

ऋषिगण बोले - हे सूत! इस तीर्थ को 'धनुष्कोटि' नाम किस प्रकार प्राप्त हुआ?

श्लोक 68 (skanda.3.30.68)

तत्सर्वं ब्रूहि तत्त्वेन विस्तरान्मुनिपुंगव इति पृष्टो नैमिषीयैराह सूतः पुनश्च तान्

tatsarvaṁ brūhi tattvena vistarānmunipuṁgava iti pṛṣṭo naimiṣīyairāha sūtaḥ punaśca tān

हे मुनिश्रेष्ठ, यह सब हमें सत्यतापूर्वक और विस्तार से बताइए।" नैमिषेय ऋषियों द्वारा ऐसा पूछे जाने पर सूत जी ने पुनः उनसे कहा -

श्लोक 69 (skanda.3.30.69)

श्रीसूत उवाच रामेण निहते युद्धे रावणे लोककण्टके बिभीषणे च लंकायां राजनि स्थापिते ततः

śrīsūta uvāca rāmeṇa nihate yuddhe rāvaṇe lokakaṇṭake bibhīṣaṇe ca laṁkāyāṁ rājani sthāpite tataḥ

श्रीसूत जी बोले - जब युद्ध में राम द्वारा लोककंटक रावण का वध हो गया, और विभीषण लंका में राजा के पद पर प्रतिष्ठित कर दिए गए,

श्लोक 70 (skanda.3.30.70)

वैदेहीलक्ष्मणयुतो रामो दशरथात्मजः सुग्रीवप्रमुखैर्वीरैर्वानरैरपि संवृतः

vaidehīlakṣmaṇayuto rāmo daśarathātmajaḥ sugrīvapramukhairvīrairvānarairapi saṁvṛtaḥ

तब दशरथनंदन राम, वैदेही (सीता) और लक्ष्मण के साथ, सुग्रीव आदि वीर वानरों से घिरे हुए,

श्लोक 71 (skanda.3.30.71)

सिद्धचारणगन्धर्वदेवविद्याधरर्षिभिः अप्सरोभिश्च सततं स्तूयमाननिजाद्भुतः

siddhacāraṇagandharvadevavidyādhararṣibhiḥ apsarobhiśca satataṁ stūyamānanijādbhutaḥ

सिद्धों, चारणों, गंधर्वों, देवताओं, विद्याधरों, ऋषियों तथा अप्सराओं द्वारा अपने अद्भुत कार्यों के लिए निरंतर स्तुति किए जाते हुए,

श्लोक 72 (skanda.3.30.72)

लीलाविधृतकोदण्डस्त्रिपुरघ्नो यथा शिवः सर्वैः परिवृतो रामो गंधमादनमन्वगात्

līlāvidhṛtakodaṇḍastripuraghno yathā śivaḥ sarvaiḥ parivṛto rāmo gaṁdhamādanamanvagāt

लीलापूर्वक धनुष धारण किए, त्रिपुरनाशक शिव के समान, राम सबसे घिरे हुए गन्धमादन पर्वत की ओर गए।

श्लोक 73 (skanda.3.30.73)

तत्र स्थितं महात्मानं राघवं रावणांतकम् प्रांजलिः प्रार्थयामास धर्मज्ञोऽथ विभीषणः

tatra sthitaṁ mahātmānaṁ rāghavaṁ rāvaṇāṁtakam prāṁjaliḥ prārthayāmāsa dharmajño'tha vibhīṣaṇaḥ

वहाँ स्थित उस महात्मा राघव, रावणांतक से, धर्मज्ञ विभीषण ने हाथ जोड़कर यह प्रार्थना की -

श्लोक 74 (skanda.3.30.74)

सेतुनानेन ते राम राजानः सर्व एव हि बलोद्रिक्ताः समभ्येत्य पीडयेयुः पुरीं मम

setunānena te rāma rājānaḥ sarva eva hi balodriktāḥ samabhyetya pīḍayeyuḥ purīṁ mama

"हे राम! इस सेतु के माध्यम से सभी राजा, बलोन्मत्त होकर, एकत्र आकर मेरी नगरी को पीड़ित कर सकते हैं।

श्लोक 75 (skanda.3.30.75)

अतः सेतुमिमं भिंधि धनुष्कोट्या रघूद्वह इति संप्रार्थितस्तेन पौलस्त्येन स राघवः

ataḥ setumimaṁ bhiṁdhi dhanuṣkoṭyā raghūdvaha iti saṁprārthitastena paulastyena sa rāghavaḥ

अतः हे रघूद्वह! अपने धनुष की नोक से इस सेतु को तोड़ दीजिए।" पौलस्त्य विभीषण द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर राघव ने,

श्लोक 76 (skanda.3.30.76)

बिभेद धनुषः कोट्या स्वसेतुं रघुनंदनः अतो द्विजास्ततस्तीर्थं धनुष्कोटिरितिश्रुतम्

bibheda dhanuṣaḥ koṭyā svasetuṁ raghunaṁdanaḥ ato dvijāstatastīrthaṁ dhanuṣkoṭiritiśrutam

अपने धनुष की नोक से अपने ही सेतु को विदीर्ण कर दिया, वह रघुनंदन; और इसीलिए, हे द्विजो, वह तीर्थ तत्पश्चात धनुष्कोटि नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 77 (skanda.3.30.77)

श्रीरामधनुषः कोट्या यो रेखां पश्यते कृताम् अनेकक्लेशसंयुक्तं गर्भवासं न पश्यति

śrīrāmadhanuṣaḥ koṭyā yo rekhāṁ paśyate kṛtām anekakleśasaṁyuktaṁ garbhavāsaṁ na paśyati

जो श्रीराम के धनुष की नोक से बनी उस रेखा को देखता है, वह अनेक क्लेशों से युक्त गर्भवास को पुनः नहीं देखता।

श्लोक 78 (skanda.3.30.78)

धनुष्कोट्यां कृता रेखा रामेण लवणांबुधौ तद्दर्शनाद्भवेन्मुक्तिर्न जाने स्नानजं फलम्

dhanuṣkoṭyāṁ kṛtā rekhā rāmeṇa lavaṇāṁbudhau taddarśanādbhavenmuktirna jāne snānajaṁ phalam

लवण समुद्र में राम द्वारा धनुष्कोटि पर बनाई गई वह रेखा - उसके दर्शन मात्र से मुक्ति हो जाती है; मैं तो यह भी नहीं जानता कि वहाँ स्नान करने से क्या फल मिलता है!

श्लोक 79 (skanda.3.30.79)

नर्मदारोधसि तपो महापातकनाशनम् गंगातीरे तु मरणमपवर्गफलप्रदम्

narmadārodhasi tapo mahāpātakanāśanam gaṁgātīre tu maraṇamapavargaphalapradam

नर्मदा के तट पर तप महापातकों का नाशक है; गंगा के तट पर मरण अपवर्ग रूपी फल प्रदान करने वाला है;

श्लोक 80 (skanda.3.30.80)

दानं द्विजाः कुरुक्षेत्रे ब्रह्महत्यादिशोधकम् तपश्च मरणं दानं धनुष्कोटौ कृतं नरैः

dānaṁ dvijāḥ kurukṣetre brahmahatyādiśodhakam tapaśca maraṇaṁ dānaṁ dhanuṣkoṭau kṛtaṁ naraiḥ

कुरुक्षेत्र में दान, हे द्विजो, ब्रह्महत्या आदि पापों को शुद्ध करने वाला है; परन्तु धनुष्कोटि में मनुष्यों द्वारा किया गया तप, मरण और दान,

श्लोक 81 (skanda.3.30.81)

महापातकनाशाय मुक्त्यै चाभीष्टसिद्धये भवेत्समर्थं विप्रेंद्रा नात्र कार्या विचारणा

mahāpātakanāśāya muktyai cābhīṣṭasiddhaye bhavetsamarthaṁ vipreṁdrā nātra kāryā vicāraṇā

हे विप्रेन्द्रो, महापातकों के नाश, मुक्ति की प्राप्ति और अभीष्ट की सिद्धि - इन सबके लिए समर्थ हैं; इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 82 (skanda.3.30.82)

तावत्संपीड्यते जंतुः पातकैश्चोपपातकैः यावन्नालोक्यते राम धनुष्कोटिर्विमुक्तिदा

tāvatsaṁpīḍyate jaṁtuḥ pātakaiścopapātakaiḥ yāvannālokyate rāma dhanuṣkoṭirvimuktidā

तब तक ही जीव पातकों और उपपातकों से पीड़ित रहता है, जब तक वह मुक्तिदायिनी धनुष्कोटि का दर्शन नहीं कर लेता।

श्लोक 83 (skanda.3.30.83)

भिद्यते हृदयग्रंथिश्छिद्यंते सर्वसंशयाः क्षीयंते पापकर्माणि धनुष्कोट्यवलोकिनः

bhidyate hṛdayagraṁthiśchidyaṁte sarvasaṁśayāḥ kṣīyaṁte pāpakarmāṇi dhanuṣkoṭyavalokinaḥ

हृदय की ग्रंथि टूट जाती है, समस्त संशय छिन्न हो जाते हैं, तथा पापकर्म क्षीण हो जाते हैं, धनुष्कोटि का अवलोकन करने वाले के लिए।

श्लोक 84 (skanda.3.30.84)

दक्षिणांभोनिधौ सेतौ रामचन्द्रेण निर्मिता या रेखा धनुषः कोट्या विभीषणहिताय वै

dakṣiṇāṁbhonidhau setau rāmacandreṇa nirmitā yā rekhā dhanuṣaḥ koṭyā vibhīṣaṇahitāya vai

दक्षिण समुद्र में, सेतु पर, रामचंद्र द्वारा अपने धनुष की नोक से विभीषण के हित के लिए बनाई गई वह रेखा -

श्लोक 85 (skanda.3.30.85)

सैव कैलासपदवीं वैकुण्ठब्रह्मलोकयोः मार्गः स्वर्गस्य लोकस्य नात्र कार्या विचारणा

saiva kailāsapadavīṁ vaikuṇṭhabrahmalokayoḥ mārgaḥ svargasya lokasya nātra kāryā vicāraṇā

वही रेखा कैलास, वैकुण्ठ और ब्रह्मलोक का मार्ग है, स्वर्गलोक का भी मार्ग है; इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 86 (skanda.3.30.86)

तुल्यं यज्ञफलैः पुण्यैर्धनुष्कोट्यवगाहनम् सर्वमंत्राधिकं पुण्यं सर्वदानफलप्रदम्

tulyaṁ yajñaphalaiḥ puṇyairdhanuṣkoṭyavagāhanam sarvamaṁtrādhikaṁ puṇyaṁ sarvadānaphalapradam

धनुष्कोटि में अवगाहन यज्ञफलों के समान पुण्यदायी है; यह सभी मंत्रों से बढ़कर पुण्यमय तथा सर्वदा समस्त दानों का फल देने वाला है।

श्लोक 87 (skanda.3.30.87)

कायकलेशकरैः पुंसां किं तपोभिः किमध्वरैः किं वेदैः किमु वा शास्त्रैर्धनुष्कोट्यवलोकिनः

kāyakaleśakaraiḥ puṁsāṁ kiṁ tapobhiḥ kimadhvaraiḥ kiṁ vedaiḥ kimu vā śāstrairdhanuṣkoṭyavalokinaḥ

शरीर को क्लेश देने वाले तपों से मनुष्यों को क्या लाभ, यज्ञों से क्या, वेदों से क्या, अथवा शास्त्रों से भी क्या लाभ, धनुष्कोटि का दर्शन करने वाले के लिए?

श्लोक 88 (skanda.3.30.88)

रामचंद्रधनुष्कोटौ स्नानं चेल्लभ्यते नृणाम् सितासितसरित्पुण्यवारिभिः किं प्रयोजनम्

rāmacaṁdradhanuṣkoṭau snānaṁ cellabhyate nṛṇām sitāsitasaritpuṇyavāribhiḥ kiṁ prayojanam

यदि मनुष्यों को रामचंद्र के धनुष्कोटि में स्नान प्राप्त हो सकता है, तो श्वेत और श्याम नदियों (गंगा-यमुना) के पुण्य जल की क्या आवश्यकता है?

श्लोक 89 (skanda.3.30.89)

रामचंद्रधनुष्कोटिदर्शनं लभ्यते यदि काश्यां तु मरणान्मुक्तिः प्रार्थ्यते किं वृथा नरैः

rāmacaṁdradhanuṣkoṭidarśanaṁ labhyate yadi kāśyāṁ tu maraṇānmuktiḥ prārthyate kiṁ vṛthā naraiḥ

यदि रामचंद्र के धनुष्कोटि का दर्शन प्राप्त हो सकता है, तो फिर मनुष्य काशी में मरण द्वारा मुक्ति की व्यर्थ ही कामना क्यों करें?

श्लोक 90 (skanda.3.30.90)

अनिमज्ज्य धनुष्कोटावनुपोष्य दिनत्रयम् अदत्त्वा कांचनं गां च दरिद्रः स्यान्न संशयः

animajjya dhanuṣkoṭāvanupoṣya dinatrayam adattvā kāṁcanaṁ gāṁ ca daridraḥ syānna saṁśayaḥ

धनुष्कोटि में स्नान न करने पर, तीन दिन उपवास न करने पर, तथा स्वर्ण और गौ का दान न करने पर - मनुष्य निश्चय ही दरिद्र रह जाता है।

श्लोक 91 (skanda.3.30.91)

धनुष्कोट्यवगाहेन यत्फलं लभते नरः अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्ट्वापि बहुदक्षिणैः

dhanuṣkoṭyavagāhena yatphalaṁ labhate naraḥ agniṣṭomādibhiryajñairiṣṭvāpi bahudakṣiṇaiḥ

धनुष्कोटि में स्नान करने से मनुष्य को जो फल प्राप्त होता है - वह फल अग्निष्टोम आदि यज्ञों को प्रचुर दक्षिणा सहित संपन्न करने से भी प्राप्त नहीं होता,

श्लोक 92 (skanda.3.30.92)

न तत्फलमवाप्नोति सत्यंसत्यं वदाम्यहम् धनुष्कोट्यभिधं तीर्थं सर्वतीर्थाधिकं विदुः

na tatphalamavāpnoti satyaṁsatyaṁ vadāmyaham dhanuṣkoṭyabhidhaṁ tīrthaṁ sarvatīrthādhikaṁ viduḥ

यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ। धनुष्कोटि नामक तीर्थ को समस्त तीर्थों से बढ़कर जाना जाता है।

श्लोक 93 (skanda.3.30.93)

दशकोटिसहस्राणि संति तीर्थानि भूतले तेषां सान्निध्यमस्त्यत्र धनुष्कोटौ द्विजोत्तमाः

daśakoṭisahasrāṇi saṁti tīrthāni bhūtale teṣāṁ sānnidhyamastyatra dhanuṣkoṭau dvijottamāḥ

पृथ्वी पर करोड़ों-अरबों तीर्थ विद्यमान हैं; उन सबकी सन्निधि यहाँ, धनुष्कोटि में विद्यमान है, हे द्विजोत्तमो।

श्लोक 94 (skanda.3.30.94)

अष्टौ वसव आदित्या रुद्राश्च मरुतस्तथा साध्याश्च सह गन्धर्वाः सिद्धविद्याधरास्तथा

aṣṭau vasava ādityā rudrāśca marutastathā sādhyāśca saha gandharvāḥ siddhavidyādharāstathā

अष्ट वसु, आदित्यगण, रुद्रगण तथा मरुद्गण, साध्यगण गंधर्वों के साथ, तथा सिद्ध एवं विद्याधर -

श्लोक 95 (skanda.3.30.95)

एते चान्ये च ये देवाः सान्निध्यं कुर्वते सदा तीर्थेऽत्र धनुषः कोटौ नित्यमेव पितामहः

ete cānye ca ye devāḥ sānnidhyaṁ kurvate sadā tīrthe'tra dhanuṣaḥ koṭau nityameva pitāmahaḥ

ये तथा अन्य देवता भी सदा इस धनुष्कोटि तीर्थ में अपनी सन्निधि बनाए रखते हैं; पितामह ब्रह्मा भी नित्य -

श्लोक 96 (skanda.3.30.96)

सन्निधत्ते शिवो विष्णुरुमा मा च सरस्वती धनुष्कोटौ तपस्तप्त्वा देवाश्च ऋषयस्तथा

sannidhatte śivo viṣṇurumā mā ca sarasvatī dhanuṣkoṭau tapastaptvā devāśca ṛṣayastathā

शिव, विष्णु, उमा और सरस्वती वहाँ उपस्थित रहते हैं; देवगण और ऋषिगण भी धनुष्कोटि में तप करके,

श्लोक 97 (skanda.3.30.97)

विपुलां सिद्धिमगमंस्तत्फलेन मुनीश्वराः स्नायात्तत्र नरो यस्तु पितृदेवांश्च तर्पयेत्

vipulāṁ siddhimagamaṁstatphalena munīśvarāḥ snāyāttatra naro yastu pitṛdevāṁśca tarpayet

उसके फल से महान सिद्धियाँ प्राप्त हुईं, हे मुनीश्वरो। जो मनुष्य वहाँ स्नान कर पितरों और देवताओं को तर्पण देता है,

श्लोक 98 (skanda.3.30.98)

सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते अत्रैकं भोजयेद्विप्रं यो नरो भक्तिसंयुतः

sarvapāpavinirmukto brahmaloke mahīyate atraikaṁ bhojayedvipraṁ yo naro bhaktisaṁyutaḥ

वह समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में महिमामंडित होता है। जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर वहाँ केवल एक ब्राह्मण को भी भोजन कराता है,

श्लोक 99 (skanda.3.30.99)

इह लोके परत्रापि सोनंतसुखमश्नुते शाकमूलफले वृत्तिं यो न वर्तयते नरः

iha loke paratrāpi sonaṁtasukhamaśnute śākamūlaphale vṛttiṁ yo na vartayate naraḥ

वह इस लोक में तथा परलोक में भी अनंत सुख भोगता है। जो मनुष्य साग-मूल-फल पर अपना निर्वाह नहीं करता,

श्लोक 100 (skanda.3.30.100)

स नरो धनुषःकोटौ स्नायात्तत्फलसिद्धये अश्वमेधक्रतुं कर्तुं शक्तिर्यस्य न विद्यते

sa naro dhanuṣaḥkoṭau snāyāttatphalasiddhaye aśvamedhakratuṁ kartuṁ śaktiryasya na vidyate

उस फल की सिद्धि हेतु उसे धनुष्कोटि में स्नान करना चाहिए। जिसके पास अश्वमेध यज्ञ करने की सामर्थ्य नहीं है,

श्लोक 101 (skanda.3.30.101)

धनुष्कोटौ स हि स्नायात्तेन तत्फलमश्नुते ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वापि मुनीश्वराः

dhanuṣkoṭau sa hi snāyāttena tatphalamaśnute brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdro vāpi munīśvarāḥ

उसे धनुष्कोटि में ही स्नान करना चाहिए, और उससे वह वही फल प्राप्त करता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र भी, हे मुनीश्वरो -

श्लोक 102 (skanda.3.30.102)

निंद्ययोनौ न जायंते धनुष्कोट्वगाहनात् मकरस्थे रवौ माघे धनुष्कोटौ तु यो नरः

niṁdyayonau na jāyaṁte dhanuṣkoṭvagāhanāt makarasthe ravau māghe dhanuṣkoṭau tu yo naraḥ

धनुष्कोटि में स्नान करने से किसी की भी निंद्य योनि में जन्म नहीं होता। माघ मास में, सूर्य के मकर राशि में होने पर, धनुष्कोटि में जो मनुष्य,

श्लोक 103 (skanda.3.30.103)

स्नायात्पुण्यं निगदितुं तस्याहं न क्षमो द्विजाः माघमासे धनुष्कोटाववगाहेत यो नरः

snāyātpuṇyaṁ nigadituṁ tasyāhaṁ na kṣamo dvijāḥ māghamāse dhanuṣkoṭāvavagāheta yo naraḥ

स्नान करता है, उसे प्राप्त होने वाले पुण्य का वर्णन करने में मैं असमर्थ हूँ, हे द्विजो। जो मनुष्य माघ मास में धनुष्कोटि में स्नान करता है,

श्लोक 104 (skanda.3.30.104)

स स्नातः सर्वतीर्थेषु गंगादिषु मुनीश्वराः प्राप्नुयादक्षयाँल्लोकान्मोक्षं चापि लभेत सः

sa snātaḥ sarvatīrtheṣu gaṁgādiṣu munīśvarāḥ prāpnuyādakṣayā~llokānmokṣaṁ cāpi labheta saḥ

वह, हे मुनीश्वरो, मानो गंगा आदि समस्त तीर्थों में स्नान कर चुका हो; वह अक्षय लोकों को प्राप्त करता है, और उसे मोक्ष भी प्राप्त होता है।

श्लोक 105 (skanda.3.30.105)

जन्मप्रभृति यत्पापं स्त्रियो वा पुरुषस्य वा तत्सर्वं माघमासेऽत्र मज्जनाद्विलयं व्रजेत्

janmaprabhṛti yatpāpaṁ striyo vā puruṣasya vā tatsarvaṁ māghamāse'tra majjanādvilayaṁ vrajet

जन्म से लेकर जो भी पाप स्त्री अथवा पुरुष का हो, वह सब यहाँ माघ मास में स्नान करने से विलीन हो जाता है।

श्लोक 106 (skanda.3.30.106)

यथा सुराणां सर्वेषामुत्तमो रघुनंदनः तथैव च धनुष्कोटिः सर्वतीर्थोत्तमा स्मृता

yathā surāṇāṁ sarveṣāmuttamo raghunaṁdanaḥ tathaiva ca dhanuṣkoṭiḥ sarvatīrthottamā smṛtā

जैसे समस्त देवताओं में रघुनंदन (राम) सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे ही धनुष्कोटि को समस्त तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

श्लोक 107 (skanda.3.30.107)

तत्र स्नानं माघमासे सर्वाभीष्टप्रदायकम् त्रिंशद्दिनं माघमासे नियतोऽपि जितेंद्रियः

tatra snānaṁ māghamāse sarvābhīṣṭapradāyakam triṁśaddinaṁ māghamāse niyato'pi jiteṁdriyaḥ

वहाँ माघ मास में स्नान करना समस्त अभीष्ट कामनाओं को देने वाला है; माघ मास के पूरे तीस दिनों तक नियमपूर्वक तथा जितेन्द्रिय रहकर,

श्लोक 108 (skanda.3.30.108)

धनुष्कोटौ नरः स्नायादपुनर्भवसिद्धये एकभुक्तो जितक्रोधो माघमासेऽत्र यो नरः

dhanuṣkoṭau naraḥ snāyādapunarbhavasiddhaye ekabhukto jitakrodho māghamāse'tra yo naraḥ

मनुष्य को मोक्ष-प्राप्ति हेतु धनुष्कोटि में स्नान करना चाहिए। जो मनुष्य एक समय भोजन करते हुए तथा क्रोध पर विजय पाते हुए, माघ मास में यहाँ,

श्लोक 109 (skanda.3.30.109)

स्नानं करोति विप्रेंद्रा मुच्यते ब्रह्महत्यया श्रीरामधनुषः कोटी माघमासे नरस्तु यः

snānaṁ karoti vipreṁdrā mucyate brahmahatyayā śrīrāmadhanuṣaḥ koṭī māghamāse narastu yaḥ

स्नान करता है, हे विप्रेन्द्रो, वह ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य श्रीराम के धनुष्कोटि पर माघ मास में,

श्लोक 110 (skanda.3.30.110)

स्नात्वांते शिवरात्रौ च निराहारो जितेंद्रियः कृत्वा जागरणं रात्रौ प्रतियामं विशेषतः

snātvāṁte śivarātrau ca nirāhāro jiteṁdriyaḥ kṛtvā jāgaraṇaṁ rātrau pratiyāmaṁ viśeṣataḥ

स्नान करने के बाद शिवरात्रि को पूर्ण उपवास करते हुए तथा जितेन्द्रिय होकर, रात्रि में विशेष रूप से प्रत्येक प्रहर जागरण करते हुए,

श्लोक 111 (skanda.3.30.111)

रामनाथं महादेवमभ्यर्च्य विधिपूर्वकम् परेद्युरुदिते सूर्ये धनुष्कोटौ निमज्य च

rāmanāthaṁ mahādevamabhyarcya vidhipūrvakam paredyurudite sūrye dhanuṣkoṭau nimajya ca

विधिपूर्वक रामनाथ महादेव की पूजा करता है, और अगले दिन सूर्योदय होने पर पुनः धनुष्कोटि में डुबकी लगाता है,

श्लोक 112 (skanda.3.30.112)

अन्येष्वपि च तीर्थेषु स्नात्वा नियतमानसः निर्वर्त्य नित्यकर्माणि रामनाथं निषेव्य च

anyeṣvapi ca tīrtheṣu snātvā niyatamānasaḥ nirvartya nityakarmāṇi rāmanāthaṁ niṣevya ca

तथा वहाँ के अन्य तीर्थों में भी स्नान करता है, संयमित मन से, नित्यकर्मों को पूर्ण करके तथा रामनाथ की उपासना करके,

श्लोक 113 (skanda.3.30.113)

यथाशक्ति द्विजानन्नैर्भोजयित्वा द्विजोत्तमाः भूमिं गां च तिलान्धान्यं दत्त्वा वित्तं च शक्तितः

yathāśakti dvijānannairbhojayitvā dvijottamāḥ bhūmiṁ gāṁ ca tilāndhānyaṁ dattvā vittaṁ ca śaktitaḥ

अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर, हे द्विजोत्तमो, तथा भूमि, गौ, तिल, धान्य एवं धन का यथाशक्ति दान देकर,

श्लोक 114 (skanda.3.30.114)

ब्राह्मणैरप्यनुज्ञातः स्वयं भुंजति वाग्यतः एवं कृतवतः पुंसो रामनाथो महेश्वरः

brāhmaṇairapyanujñātaḥ svayaṁ bhuṁjati vāgyataḥ evaṁ kṛtavataḥ puṁso rāmanātho maheśvaraḥ

तथा ब्राह्मणों की अनुमति पाकर मौनपूर्वक स्वयं भोजन करता है - इस प्रकार आचरण करने वाले पुरुष को रामनाथ महेश्वर,

श्लोक 115 (skanda.3.30.115)

विमोच्य सर्वपापानि भुक्तिं मुक्तिं प्रयच्छति अतः सर्वप्रयत्नेन माघमासे मुनीश्वराः

vimocya sarvapāpāni bhuktiṁ muktiṁ prayacchati ataḥ sarvaprayatnena māghamāse munīśvarāḥ

समस्त पापों से मुक्त कर भोग और मोक्ष प्रदान करते हैं। अतः हे मुनीश्वरो, सर्वप्रयत्नपूर्वक माघ मास में,

श्लोक 116 (skanda.3.30.116)

स्नातव्यं हि धनुष्कोटौ नरैरत्र मुमुक्षुभिः धनुष्कोटौ नरः स्नानं सेतावर्धोदये तु यः

snātavyaṁ hi dhanuṣkoṭau narairatra mumukṣubhiḥ dhanuṣkoṭau naraḥ snānaṁ setāvardhodaye tu yaḥ

मुमुक्षु मनुष्यों को यहाँ धनुष्कोटि में अवश्य स्नान करना चाहिए। जो मनुष्य सेतु पर धनुष्कोटि में अर्धोदय के समय स्नान करता है,

श्लोक 117 (skanda.3.30.117)

करोति तस्य पापानि नश्यंत्येव क्षणाद्द्विजाः स्नानं महोदये चात्र भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्

karoti tasya pāpāni naśyaṁtyeva kṣaṇāddvijāḥ snānaṁ mahodaye cātra bhuktimuktiphalapradam

उसके पाप, हे द्विजो, उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं। यहाँ महोदय के समय स्नान करना भोग और मोक्ष रूपी फल प्रदान करने वाला है;

श्लोक 118 (skanda.3.30.118)

यः स्नायाद्धनुषः कोटावर्द्धोदयमहोदये तस्य वश्यास्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः

yaḥ snāyāddhanuṣaḥ koṭāvarddhodayamahodaye tasya vaśyāstrayo devā brahmaviṣṇumaheśvarāḥ

जो कोई धनुष्कोटि में अर्धोदय-महोदय के समय स्नान करता है - उसके अधीन तीनों देवता, ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हो जाते हैं।

श्लोक 119 (skanda.3.30.119)

धनुष्कोटौ द्विजाः स्नानमर्द्धोदयमहोदये विनाप्यद्वैतविज्ञानं सायुज्यप्राप्तिकारणम्

dhanuṣkoṭau dvijāḥ snānamarddhodayamahodaye vināpyadvaitavijñānaṁ sāyujyaprāptikāraṇam

धनुष्कोटि में अर्धोदय-महोदय के समय स्नान करना, हे द्विजो, अद्वैत ज्ञान के बिना भी सायुज्य-प्राप्ति का कारण है।

श्लोक 120 (skanda.3.30.120)

तत्र स्नानं द्विजाः पुंसामर्द्धोदयमहोदये मन्वाद्युक्तं विना सत्यं प्रायश्चित्तं हि पापिनाम्

tatra snānaṁ dvijāḥ puṁsāmarddhodayamahodaye manvādyuktaṁ vinā satyaṁ prāyaścittaṁ hi pāpinām

वहाँ, हे द्विजो, अर्धोदय-महोदय के समय मनुष्यों का स्नान, मनु आदि द्वारा कहे गए विधान के अनुसार, सत्य ही पापियों का प्रायश्चित्त है।

श्लोक 121 (skanda.3.30.121)

अत्र सेतौ धनुष्कोटावर्धोदयमहोदये स्नाति चेन्मनुजो विप्राः सत्यं यज्ञं विनाप्ययम्

atra setau dhanuṣkoṭāvardhodayamahodaye snāti cenmanujo viprāḥ satyaṁ yajñaṁ vināpyayam

यहाँ सेतु पर, धनुष्कोटि में, अर्धोदय-महोदय के समय, यदि मनुष्य स्नान करता है, हे विप्रो, तो सत्य ही, यज्ञ के बिना भी,

श्लोक 122 (skanda.3.30.122)

यज्ञानां फलमाप्नोति संपूर्णं नात्र संशयः चंद्रसूर्योपरागेषु यः स्नायादत्र मानवः

yajñānāṁ phalamāpnoti saṁpūrṇaṁ nātra saṁśayaḥ caṁdrasūryoparāgeṣu yaḥ snāyādatra mānavaḥ

वह यज्ञों का संपूर्ण फल प्राप्त कर लेता है - इसमें कोई संदेह नहीं है। चंद्र या सूर्य ग्रहण के समय जो मनुष्य यहाँ स्नान करता है,

श्लोक 123 (skanda.3.30.123)

तस्य पुण्यफलं वक्तुं शेषेणापि न शक्यते चंद्रसूर्योपरागेषु धनुष्कोट्यवगाहनम्

tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ śeṣeṇāpi na śakyate caṁdrasūryoparāgeṣu dhanuṣkoṭyavagāhanam

उसके पुण्यफल का वर्णन शेषनाग के लिए भी संभव नहीं है। चंद्र या सूर्य ग्रहण के समय धनुष्कोटि में स्नान करना,

श्लोक 124 (skanda.3.30.124)

ब्रह्महत्यादिपापानां प्रायश्चित्तमुदीरितम् श्रीरामधनुषः कोटौ चंद्रसूर्योपरागयोः

brahmahatyādipāpānāṁ prāyaścittamudīritam śrīrāmadhanuṣaḥ koṭau caṁdrasūryoparāgayoḥ

ब्रह्महत्या आदि पापों का प्रायश्चित्त कहा गया है। श्रीराम के धनुष्कोटि में चंद्र या सूर्य ग्रहण के समय स्नान करना,

श्लोक 125 (skanda.3.30.125)

स्नानं सायुज्यदं प्रोक्तं सर्वतीर्थफलप्रदम् चंद्रसूर्योपरागेषु अर्धोदयमहोदये

snānaṁ sāyujyadaṁ proktaṁ sarvatīrthaphalapradam caṁdrasūryoparāgeṣu ardhodayamahodaye

सायुज्य प्रदान करने वाला तथा समस्त तीर्थों का फल देने वाला बताया गया है। चंद्र या सूर्य ग्रहण के समय, अर्धोदय-महोदय पर,

श्लोक 126 (skanda.3.30.126)

स्नातव्यमत्र मनुजैर्भुक्तिमुक्तिफलेच्छुभिः अतः सर्वं परित्यज्य गच्छध्वं मुनिपुंगवाः

snātavyamatra manujairbhuktimuktiphalecchubhiḥ ataḥ sarvaṁ parityajya gacchadhvaṁ munipuṁgavāḥ

भोग और मोक्ष फल की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को यहाँ स्नान करना चाहिए। अतः हे मुनिश्रेष्ठो, सब कुछ त्यागकर,

श्लोक 127 (skanda.3.30.127)

धनुष्कोटिं महापुण्यां भुक्तिमुक्तिफलप्रदाम् तत्र गत्वा पितृभ्यश्च कुरुध्वं पिंडदापनम्

dhanuṣkoṭiṁ mahāpuṇyāṁ bhuktimuktiphalapradām tatra gatvā pitṛbhyaśca kurudhvaṁ piṁḍadāpanam

उस महापुण्यमय, भोग-मोक्ष-फलदायी धनुष्कोटि की ओर जाओ; वहाँ जाकर अपने पितरों को पिंडदान करो।

श्लोक 128 (skanda.3.30.128)

आकल्पं पितृतृप्तिः स्यादत्र पिंडनिवापनात् पितॄणां तृप्तिदं स्थानत्रयं रामेण निर्मितम्

ākalpaṁ pitṛtṛptiḥ syādatra piṁḍanivāpanāt pitṝṇāṁ tṛptidaṁ sthānatrayaṁ rāmeṇa nirmitam

वहाँ पिंडदान से पितरों की तृप्ति कल्पपर्यंत बनी रहती है। पितरों को तृप्ति देने वाले तीन स्थान राम द्वारा निर्मित किए गए हैं -

श्लोक 129 (skanda.3.30.129)

सेतुमूले धनुष्कोट्यां गंधमादनपर्वते पिंडं दत्त्वा पितृभ्योऽत्र ऋणान्मुक्तो भविष्यति

setumūle dhanuṣkoṭyāṁ gaṁdhamādanaparvate piṁḍaṁ dattvā pitṛbhyo'tra ṛṇānmukto bhaviṣyati

सेतु के मूल में, धनुष्कोटि पर, तथा गन्धमादन पर्वत पर; यहाँ पितरों को पिंड अर्पित करके मनुष्य उनके ऋण से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 130 (skanda.3.30.130)

सेतुमूलं धनुष्कोटिं गंधमादनमेव च ऋणमोक्ष इति ख्यातं त्रिस्थानं देवनिर्मितम्

setumūlaṁ dhanuṣkoṭiṁ gaṁdhamādanameva ca ṛṇamokṣa iti khyātaṁ tristhānaṁ devanirmitam

सेतु का मूल, धनुष्कोटि, तथा गन्धमादन - ये तीन देवनिर्मित स्थान ऋणमोक्ष के नाम से प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 131 (skanda.3.30.131)

अतः सर्वप्रयत्नेन धनुष्कोटिर्निषेव्यताम् अत्रागत्य धनुष्कोटौ स्नात्वा नियमपूर्वकम्

ataḥ sarvaprayatnena dhanuṣkoṭirniṣevyatām atrāgatya dhanuṣkoṭau snātvā niyamapūrvakam

अतः सर्वप्रयत्नपूर्वक धनुष्कोटि का सेवन करना चाहिए। यहाँ आकर नियमपूर्वक धनुष्कोटि में स्नान करके,

श्लोक 132 (skanda.3.30.132)

द्रोणाचार्यसुतः श्रीमानश्वत्थामा मुनीश्वराः सुप्तमारणदोषेण घोरेण मुमुचे क्षणात्

droṇācāryasutaḥ śrīmānaśvatthāmā munīśvarāḥ suptamāraṇadoṣeṇa ghoreṇa mumuce kṣaṇāt

द्रोणाचार्य के पुत्र श्रीमान अश्वत्थामा, हे मुनीश्वरो, सोए हुए लोगों के वध के भयंकर पाप से तत्क्षण मुक्त हो गए।

श्लोक 133 (skanda.3.30.133)

एवं वः कथितं विप्राः धनुष्कोटेस्तु वैभवम् भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणां सर्वपापनिबर्हणम्

evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāḥ dhanuṣkoṭestu vaibhavam bhuktimuktipradaṁ nṛṇāṁ sarvapāpanibarhaṇam

इस प्रकार हे विप्रो! मैंने तुम्हें धनुष्कोटि का वैभव बताया, जो मनुष्यों को भोग-मोक्ष प्रदान करने वाला तथा समस्त पापों का नाश करने वाला है।

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