Skip to main content

ब्रह्म खण्ड · अध्याय 40

गन्धमादन में गायत्री-सरस्वती का सान्निध्य

अध्याय 39अध्याय-सूचीअध्याय 41

श्लोक 1 (skanda.3.40.1)

श्रीसूत उवाच । अथातः संप्रवक्ष्यामि मुनयो लोकपावनम् । गायत्र्या च सरस्वत्या माहात्म्यं मुक्तिदं नृणाम्

śrīsūta uvāca athātaḥ sampravakṣyāmi munayo lokapāvanam gāyatryā ca sarasvatyā māhātmyaṁ muktidaṁ nṛṇām

श्री सूत जी ने कहा — हे मुनियो! अब मैं गायत्री और सरस्वती के उस लोक-पावन तथा मुक्तिदायक माहात्म्य का वर्णन करूँगा।

श्लोक 2 (skanda.3.40.2)

शृण्वतां पठतां चैव महापातकनाशनम् । महापुण्यप्रदं पुंसां नरकक्लेशनाशनम्

śṛṇvatāṁ paṭhatāṁ caiva mahāpātakanāśanam mahāpuṇyapradaṁ puṁsāṁ narakakleśanāśanam

यह माहात्म्य सुनने और पढ़ने वालों के महापातकों का नाश करने वाला है, मनुष्यों को महान पुण्य प्रदान करने वाला तथा नरक की पीड़ा का नाश करने वाला है।

श्लोक 3 (skanda.3.40.3)

गायत्र्यां च सरस्वत्यां ये स्नान्ति मनुजा मुदा । न तेषां गर्भवासः स्यात्किं तु मुक्तिर्भवेद्ध्रुवम्

gāyatryāṁ ca sarasvatyāṁ ye snānti manujā mudā na teṣāṁ garbhavāsaḥ syāt kiṁ tu muktir bhaved dhruvam

जो मनुष्य आनंदपूर्वक गायत्री और सरस्वती नामक तीर्थों में स्नान करते हैं, उनका पुनः गर्भवास नहीं होता, अपितु निश्चय ही मुक्ति होती है।

श्लोक 4 (skanda.3.40.4)

सरस्वत्याश्च गायत्र्या गन्धमादनपर्वते । ब्रह्मपत्न्योः सन्निधानात्तन्नाम्ना कथिते इमे

sarasvatyāś ca gāyatryā gandhamādanaparvate brahmapatnyoḥ sannidhānāt tannāmnā kathite ime

गन्धमादन पर्वत पर ब्रह्मा की दोनों पत्नियों — सरस्वती और गायत्री — के सान्निध्य के कारण, ये दोनों तीर्थ उन्हीं के नाम से कहे जाते हैं।

श्लोक 5 (skanda.3.40.5)

ऋषय ऊचुः । गायत्र्याश्च सरस्वत्या गन्धमादनपर्वते । किमर्थं संनिधानं वै सूताभूत्तद्वदस्व नः

ṛṣaya ūcuḥ gāyatryāś ca sarasvatyā gandhamādanaparvate kimarthaṁ sannidhānaṁ vai sūtābhūt tadvadasva naḥ

ऋषियों ने कहा — हे सूत! गन्धमादन पर्वत पर गायत्री और सरस्वती का सान्निध्य किस कारण हुआ? यह हमें बताइए।

श्लोक 6 (skanda.3.40.6)

सूत उवाच । प्रजापतिः पुरा विप्राः स्वां वै दुहितरं मुदा । वाङ्नाम्नीं कामुको भूत्वा स्पृहयामास मोहनः

sūta uvāca prajāpatiḥ purā viprāḥ svāṁ vai duhitaraṁ mudā vāṅnāmnīṁ kāmuko bhūtvā spṛhayāmāsa mohanaḥ

सूत जी ने कहा — हे विप्रो! पूर्वकाल में मोहग्रस्त प्रजापति अपनी ही पुत्री, वाक् नाम्नी (सरस्वती), के प्रति कामुक होकर उसकी कामना करने लगे।

श्लोक 7 (skanda.3.40.7)

अथ प्रजापतेः पुत्री स्वस्मिन्वै तस्य कामिताम् । विलोक्य लज्जिता भूत्वा रोहिद्रूपं दधार सा

atha prajāpateḥ putrī svasmin vai tasya kāmitām vilokya lajjitā bhūtvā rohidrūpaṁ dadhāra sā

तब प्रजापति की पुत्री अपने प्रति उसकी कामना को देखकर लज्जित हो गई और उसने हिरणी का रूप धारण कर लिया।

श्लोक 8 (skanda.3.40.8)

ब्रह्मापि हरिणो भूत्वा तया रन्तुमनास्तदा । गच्छतीमनुयातिस्म हरिणीरूपधारिणीम्

brahmāpi hariṇo bhūtvā tayā rantumanās tadā gacchatīm anuyāti sma hariṇīrūpadhāriṇīm

तब ब्रह्मा भी हिरण का रूप धारण कर, उसके साथ रमण करने की इच्छा से, हिरणी-रूपधारिणी उस पुत्री के पीछे चलने लगे।

श्लोक 9 (skanda.3.40.9)

तं दृष्ट्वा देवताः सर्वाः पुत्रीगमनसादरम् । करोत्यकार्यं ब्रह्मायं पुत्रीगमनलक्षणम्

taṁ dṛṣṭvā devatāḥ sarvāḥ putrīgamanasādaram karotyakāryaṁ brahmāyaṁ putrīgamanalakṣaṇam

उसे अपनी पुत्री के प्रति सहर्ष अग्रसर होते देखकर समस्त देवता कहने लगे — यह ब्रह्मा पुत्री-गमन रूप अकार्य कर रहा है।

श्लोक 10 (skanda.3.40.10)

इति निन्दन्ति तं विप्राः स्रष्टारं जगतां पतिम् । निषिद्धकृत्यनिरतं तं दृष्ट्वा परमेष्ठिनम्

iti nindanti taṁ viprāḥ sraṣṭāraṁ jagatāṁ patim niṣiddhakṛtyanirataṁ taṁ dṛṣṭvā parameṣṭhinam

इस प्रकार हे विप्रो! उस सृष्टिकर्ता जगत्पति परमेष्ठी ब्रह्मा को निषिद्ध कर्म में लीन देखकर सब उसकी निंदा करने लगे।

श्लोक 11 (skanda.3.40.11)

हरः पिनाकमादाय व्याधरूपधरः प्रभुः । आकर्णपूर्णकृष्टेन पिनाकधनुषा शरम्

haraḥ pinākam ādāya vyādharūpadharaḥ prabhuḥ ākarṇapūrṇakṛṣṭena pinākadhanuṣā śaram

तब प्रभु हर (शिव) ने पिनाक धनुष धारण कर व्याध का रूप धारण किया और कान तक खींचे हुए पिनाक धनुष पर बाण चढ़ाया।

श्लोक 12 (skanda.3.40.12)

संयोज्य वेधसं तेन विव्याध निशितेन सः । त्रिपुरान्तकबाणेन विद्धोऽसौ न्यपतद्भुवि

saṁyojya vedhasaṁ tena vivyādha niśitena saḥ tripurāntakabāṇena viddho'sau nyapatad bhuvi

उस तीक्ष्ण बाण से उसने ब्रह्मा को लक्ष्य बनाकर बींध दिया; त्रिपुरांतक के उस बाण से बिंधा हुआ वह हरिण-रूप ब्रह्मा भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 13 (skanda.3.40.13)

तस्य देहादथोत्थाय महज्ज्योतिर्महाप्रभम् । आकाशे मृगशीर्षाख्यं नक्षत्रमभवत्तदा

tasya dehād athotthāya mahajjyotir mahāprabham ākāśe mṛgaśīrṣākhyaṁ nakṣatram abhavat tadā

तब उसके शरीर से उठकर एक महान्, अत्यंत तेजस्वी ज्योति आकाश में मृगशीर्ष नामक नक्षत्र बन गई।

श्लोक 14 (skanda.3.40.14)

आर्द्रानक्षत्ररूपी सन्हरोऽप्यनुजगाम तम् । पीडयन्मृगशीर्षाख्यं नक्षत्रं ब्रह्मरूपिणम्

ārdrānakṣatrarūpī san haro'py anujagāma tam pīḍayan mṛgaśīrṣākhyaṁ nakṣatraṁ brahmarūpiṇam

हर भी आर्द्रा नक्षत्र का रूप धारण कर उस ब्रह्मरूपी मृगशीर्ष नक्षत्र के पीछे चलने लगे, उसे पीड़ा देते हुए।

श्लोक 15 (skanda.3.40.15)

अधुनापि मृगव्याधरूपेण त्रिपुरांतकः । अंबरे दृश्यते स्पष्टं मृगशीर्षांतिके द्विजाः

adhunāpi mṛgavyādharūpeṇa tripurāntakaḥ ambare dṛśyate spaṣṭaṁ mṛgaśīrṣāntike dvijāḥ

हे द्विजो! आज भी त्रिपुरांतक मृग-व्याध के रूप में आकाश में मृगशीर्ष नक्षत्र के समीप स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

श्लोक 16 (skanda.3.40.16)

एवं विनिहते तस्मिञ्च्छंभुना परमेष्ठिनि । अनंतरं तु गायत्रीसरस्वत्यौ शुचार्पिते

evaṁ vinihate tasmin śambhunā parameṣṭhini anantaraṁ tu gāyatrīsarasvatyau śucārpite

इस प्रकार शंभु द्वारा उस परमेष्ठी के मारे जाने पर, तत्पश्चात् गायत्री और सरस्वती दोनों शोक में डूब गईं।

श्लोक 17 (skanda.3.40.17)

भर्तृहीने मुनिश्रेष्ठा भर्तृजीवनकांक्षया । किं करिष्यावहे ह्यावामित्यन्योयं विचार्य तु

bhartṛhīne muniśreṣṭhā bhartṛjīvanakāṅkṣayā kiṁ kariṣyāvahe hyāvām ityanyonyaṁ vicārya tu

हे मुनिश्रेष्ठो! पति-विहीन हो जाने पर, अपने पति को पुनः जीवित करने की इच्छा से, वे दोनों परस्पर विचार करने लगीं — 'अब हम क्या करें?'

श्लोक 18 (skanda.3.40.18)

स्वपतिप्राणसिद्ध्यर्थं गायत्री च सरस्वती । सर्वोत्कृष्टं शिवस्थानं गन्धमादनपर्वतम्

svapatiprāṇasiddhyarthaṁ gāyatrī ca sarasvatī sarvotkṛṣṭaṁ śivasthānaṁ gandhamādanaparvatam

अपने पति के प्राणों की सिद्धि के लिए गायत्री और सरस्वती ने सबसे उत्कृष्ट शिव-स्थान गन्धमादन पर्वत को गंतव्य बनाया।

श्लोक 19 (skanda.3.40.19)

सर्वाभीष्टप्रदं पुंसां तपः कर्तुं समुद्यते । जग्मतुर्नियमोपेतं तपः कर्तुं शिवं प्रति

sarvābhīṣṭapradaṁ puṁsāṁ tapaḥ kartuṁ samudyate jagmatur niyamopetaṁ tapaḥ kartuṁ śivaṁ prati

मनुष्यों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले उस स्थान पर तप करने का संकल्प लेकर, वे दोनों नियमपूर्वक शिव को लक्ष्य कर तप करने के लिए वहाँ गईं।

श्लोक 20 (skanda.3.40.20)

स्नानार्थमात्मनो विप्रा गायत्री च सरस्वती । तीर्थद्वयं स्वनाम्ना वै चक्रतुः पापनाशनम्

snānārtham ātmano viprāḥ gāyatrī ca sarasvatī tīrthadvayaṁ svanāmnā vai cakratuḥ pāpanāśanam

हे विप्रो! अपने स्नान के लिए गायत्री और सरस्वती ने अपने ही नाम से दो पाप-नाशक तीर्थ बनाए।

श्लोक 21 (skanda.3.40.21)

तत्र त्रिषवणस्नानं प्रत्यहं चक्रतुर्मुदा । बहुकालमनाहारे कामक्रोधादिवर्जिते

tatra triṣavaṇasnānaṁ pratyahaṁ cakratur mudā bahukālam anāhāre kāmakrodhādivarjite

वहाँ वे प्रतिदिन आनंदपूर्वक तीनों संध्याओं में स्नान करने लगीं, दीर्घकाल तक निराहार रहकर, काम-क्रोध आदि से रहित होकर।

श्लोक 22 (skanda.3.40.22)

अत्युग्रनियमोपेते शिवध्यानपरायणे । पंचाक्षरमहामन्त्रजपैकनियते शुभे

atyugraniyamopete śivadhyānaparāyaṇe pañcākṣaramahāmantrajapaikaniyate śubhe

वे दोनों अत्यंत उग्र नियमों से युक्त, शिव-ध्यान में तत्पर, तथा पंचाक्षर महामंत्र के जप में एकनिष्ठ होकर उस शुभ तप में लगी रहीं।

श्लोक 23 (skanda.3.40.23)

स्वपतेर्जीवनार्थं वै गायत्री च सरस्वती । महादेवं समुद्दिश्य तप एवं प्रचक्रतुः

svapater jīvanārthaṁ vai gāyatrī ca sarasvatī mahādevaṁ samuddiśya tapa evaṁ pracakratuḥ

गायत्री और सरस्वती ने अपने पति के जीवन के लिए महादेव को लक्ष्य कर इस प्रकार तप किया।

श्लोक 24 (skanda.3.40.24)

तयोरथ तपस्तुष्टो महादेवो महेश्वरः । सन्निधत्ते महामूर्तिस्तपसां फलदित्सया

tayor atha tapastuṣṭo mahādevo maheśvaraḥ sannidhatte mahāmūrtis tapasāṁ phaladitsayā

तब उनके तप से संतुष्ट होकर महेश्वर महादेव अपनी महती मूर्ति में उनके तप का फल देने की इच्छा से वहाँ प्रकट हुए।

श्लोक 25 (skanda.3.40.25)

ततः सन्निहितं शंभुं पार्वतीरमणं शिवम् । गणेशकार्त्तिकेयाभ्यां पार्श्वयोः परिसेवितम्

tataḥ sannihitaṁ śambhuṁ pārvatīramaṇaṁ śivam gaṇeśakārtikeyābhyāṁ pārśvayoḥ parisevitam

तब पार्वती के प्रियतम शिव शंभु को, जो गणेश और कार्तिकेय द्वारा दोनों ओर से सेवित होकर वहाँ उपस्थित थे,

श्लोक 26 (skanda.3.40.26)

दृष्ट्वा संतुष्टचित्ते ते गायत्री च सरस्वती । स्तोत्रैस्तुष्टुवतुः स्तुत्यं महादेवं घृणानिधिम्

dṛṣṭvā santuṣṭacitte te gāyatrī ca sarasvatī stotrais tuṣṭuvatuḥ stutyaṁ mahādevaṁ ghṛṇānidhim

देखकर गायत्री और सरस्वती का चित्त संतुष्ट हो गया, और उन्होंने स्तुति योग्य, करुणा के भंडार महादेव की स्तोत्रों से स्तुति की।

श्लोक 27 (skanda.3.40.27)

गायत्रीसरस्वत्यावूचतुः । नमो दुर्वारसंसारध्वांतध्वंसैकहेतवे । ज्वलज्ज्वालावलीभीमकालकूटविषादिने

gāyatrīsarasvatyāv ūcatuḥ namo durvārasaṁsāradhvāntadhvaṁsaikahetave jvalajjvālāvalībhīmakālakūṭaviṣādine

गायत्री और सरस्वती ने कहा — जो अनिवार्य संसार-अंधकार के नाश के एकमात्र कारण हैं, तथा जिन्होंने जलती हुई ज्वालाओं-सी भयंकर कालकूट विष का पान किया, उन्हें नमस्कार है।

श्लोक 28 (skanda.3.40.28)

जगन्मोहन पंचास्त्रदेहनाथैकहेतवे । जगदंतकरक्रूर यमांतक नमोऽस्तु ते

jaganmohanapañcāstradehanāthaikahetave jagadantakarakrūra yamāntaka namo'stu te

जो जगत को मोहित करने वाले पंचबाण कामदेव के शरीर के नाश के एकमात्र कारण हैं — हे जगत का अंत करने वाले क्रूर, हे यम के भी अंतक, आपको नमस्कार हो।

श्लोक 29 (skanda.3.40.29)

गंगातरंगसंपृक्तजटामण्डलधारिणे । नमस्तेस्तु विरूपाक्ष बाल शीतांशुधारिणे

gaṅgātaraṅgasampṛktajaṭāmaṇḍaladhāriṇe namaste'stu virūpākṣa bālaśītāṁśudhāriṇe

गंगा की तरंगों से युक्त जटा-मंडल को धारण करने वाले, हे विरूपाक्ष, बाल-चंद्रमा को धारण करने वाले, आपको नमस्कार है।

श्लोक 30 (skanda.3.40.30)

पिनाकभीमटंकारत्रासितत्रिपुरौकसे । नमस्ते विविधाकारजगत्स्रष्टृशिरश्छिदे

pinākabhīmaṭaṅkāratrāsitatripuraukase namaste vividhākārajagatsraṣṭṛśiraśchide

पिनाक धनुष की भीषण टंकार से त्रिपुर-निवासियों को त्रस्त करने वाले, तथा नाना रूपों वाले जगत के स्रष्टा का शिरच्छेदन करने वाले, आपको नमस्कार है।

श्लोक 31 (skanda.3.40.31)

शांतामलकृपादृष्टिसंरक्षितमृकण्डुज । नमस्ते गिरिजानाथ रक्षावां शरणागते

śāntāmalakṛpādṛṣṭisaṁrakṣitamṛkaṇḍuja namaste girijānātha rakṣāvāṁ śaraṇāgate

शांत, निर्मल कृपा-दृष्टि से मृकण्डु-पुत्र मार्कण्डेय की रक्षा करने वाले, हे गिरिजानाथ, आपको नमस्कार है — शरणागत हम दोनों की रक्षा कीजिए।

श्लोक 32 (skanda.3.40.32)

महादेव जगन्नाथ त्रिपुरांतक शंकर । वामदेव महादेव रक्षावां शरणागते

mahādeva jagannātha tripurāntaka śaṅkara vāmadeva mahādeva rakṣāvāṁ śaraṇāgate

हे महादेव, हे जगन्नाथ, हे त्रिपुरांतक, हे शंकर, हे वामदेव, हे महादेव — शरणागत हम दोनों की रक्षा कीजिए।

श्लोक 33 (skanda.3.40.33)

इति ताभ्यां स्तुतः शम्भुर्देवदेवो महेश्वरः । अब्रवीत्प्रीतिसंयुक्तो गायत्रीं च सरस्वतीम्

iti tābhyāṁ stutaḥ śambhur devadevo maheśvaraḥ abravīt prītisaṁyukto gāyatrīṁ ca sarasvatīm

इस प्रकार उन दोनों के द्वारा स्तुत होकर देवों के देव महेश्वर शंभु ने प्रसन्न होकर गायत्री और सरस्वती से कहा।

श्लोक 34 (skanda.3.40.34)

महादेव उवाच । भोः सरस्वति गायत्रि प्रीतोऽस्मि युवयोरहम् । वरं वरयतं मत्तो यद्वा मनसि वर्तते

mahādeva uvāca bhoḥ sarasvati gāyatri prīto'smi yuvayor aham varaṁ varayataṁ matto yadvā manasi vartate

महादेव ने कहा — हे सरस्वती, हे गायत्री, मैं तुम दोनों से प्रसन्न हूँ। जो भी तुम्हारे मन में हो, वह वर मुझसे माँगो।

श्लोक 35 (skanda.3.40.35)

इत्युक्ते ते तु गायत्रीसरस्वत्यौ हरेण वै । अब्रूतां पार्वतीकांतं महादेवं घृणानिधिम्

ityukte te tu gāyatrīsarasvatyau hareṇa vai abrūtāṁ pārvatīkāntaṁ mahādevaṁ ghṛṇānidhim

हर के ऐसा कहने पर, गायत्री और सरस्वती ने पार्वती के प्रियतम, करुणा-निधि महादेव से कहा।

श्लोक 36 (skanda.3.40.36)

गायत्रीसरस्वत्यावूचतुः । भगन्नावयोर्देव भर्त्तारं चतुराननम् । सप्राणं कुरु सर्वेश कृपया करुणाकर

gāyatrīsarasvatyāv ūcatuḥ bhagavan āvayor deva bhartāraṁ caturānanam saprāṇaṁ kuru sarveśa kṛpayā karuṇākara

गायत्री और सरस्वती ने कहा — हे भगवन्, हे देव, हे सर्वेश, हे करुणाकर! कृपा करके हमारे पति चतुरानन को पुनः प्राणवान् कीजिए।

श्लोक 37 (skanda.3.40.37)

त्वमावयोः पिता देव तवाप्यावां सुते उभे । रक्षावां पतिदानेन तस्मात्त्वं त्रिपुरांतक

tvam āvayoḥ pitā deva tavāpyāvāṁ sute ubhe rakṣāvāṁ patidānena tasmāt tvaṁ tripurāntaka

हे देव, आप हमारे पिता हैं और हम दोनों आपकी पुत्रियाँ हैं। अतः हे त्रिपुरांतक, हमें पति प्रदान कर हमारी रक्षा कीजिए।

श्लोक 38 (skanda.3.40.38)

स एवं प्रार्थितः शम्भुस्ताभ्यां ब्राह्मणपुंगवाः । एवमस्त्विति संप्रोच्य गायत्रीं च सरस्वतीम्

sa evaṁ prārthitaḥ śambhus tābhyāṁ brāhmaṇapuṅgavāḥ evamastviti samprocya gāyatrīṁ ca sarasvatīm

हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! उन दोनों के द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए गए शंभु ने गायत्री और सरस्वती से 'ऐसा ही हो' कहकर,

श्लोक 39 (skanda.3.40.39)

तदेव वेधसः कायं शिरसा योक्तुमुत्सुकः । तत्रैव वेधसः कायं शिरोभिः सहसुव्रताः

tadeva vedhasaḥ kāyaṁ śirasā yoktum utsukaḥ tatraiva vedhasaḥ kāyaṁ śirobhiḥ sahasuvratāḥ

उत्सुक होकर उन्होंने वेधा के शरीर को सिर से जोड़ने का प्रयत्न किया — हे सुव्रत मुनियो! वहीं वेधा के शरीर को शीश के साथ जोड़ने के लिए

श्लोक 40 (skanda.3.40.40)

भूतैरानाययामास नंदिभृंगिमुखैस्तदा । शिरांसि तान्यनेकानि कायेन सह शंकरः

bhūtair ānāyayāmāsa nandibhṛṅgimukhais tadā śirāṁsi tāny anekāni kāyena saha śaṅkaraḥ

शंकर ने नंदी और भृंगी आदि गणों के द्वारा उन अनेक शिरों को उस शरीर के साथ वहाँ मंगवाया।

श्लोक 41 (skanda.3.40.41)

क्षणात्संधारयामास वाणीगायत्रिसंनिधौ । संधितोऽथ हरेणासौ चतुर्वक्त्रो जगत्पतिः

kṣaṇāt sandhārayāmāsa vāṇīgāyatrisannidhau sandhito'tha hareṇāsau caturvaktro jagatpatiḥ

क्षणभर में उसने वाणी और गायत्री के समक्ष उन्हें जोड़ दिया। तब हर के द्वारा जोड़े गए वे चतुर्मुख जगत्पति,

श्लोक 42 (skanda.3.40.42)

उत्तस्थौ तत्क्षणादेव सुप्तोत्थित इव द्विजाः । ततः प्रजापतिर्दृष्ट्वा शंकरं शशिभूषणम् । तुष्टाव वाग्भिरग्र्याभिर्भार्याभ्यां च समन्वितः

uttasthau tatkṣaṇād eva suptotthita iva dvijāḥ tataḥ prajāpatir dṛṣṭvā śaṅkaraṁ śaśibhūṣaṇam tuṣṭāva vāgbhir agryābhir bhāryābhyāṁ ca samanvitaḥ

हे द्विजो! उसी क्षण, जैसे नींद से जागा हो, वैसे ही उठ खड़ा हुआ। तब प्रजापति ने चंद्र-भूषण शंकर को देखकर, अपनी दोनों पत्नियों सहित, श्रेष्ठ वाणी से उनकी स्तुति की।

श्लोक 43 (skanda.3.40.43)

ब्रह्मोवाच । नमस्ते देवदेवेश करुणाकर शंकर

brahmovāca namaste devadeveśa karuṇākara śaṅkara

ब्रह्मा ने कहा — हे देवों के देव, हे ईश, हे करुणाकर शंकर, आपको नमस्कार है।

श्लोक 44 (skanda.3.40.44)

पाहि मां करुणासिंधो निषिद्धाचरणात्प्रभो । मम त्वत्कृपया शंभो निषिद्धाचरणे क्वचित्

pāhi māṁ karuṇāsindho niṣiddhācaraṇāt prabho mama tvatkṛpayā śambho niṣiddhācaraṇe kvacit

हे करुणासिंधु प्रभो! मुझे निषिद्ध आचरण से बचाइए। हे शंभो! आपकी कृपा से मेरी कभी भी निषिद्ध आचरण में

श्लोक 45 (skanda.3.40.45)

मा प्रवृत्तिर्भवेद्भूयो रक्ष मां त्वं तथा सदा । तथैवास्त्विति संप्राह ब्रह्माणं गिरिजापतिः

mā pravṛttir bhaved bhūyo rakṣa māṁ tvaṁ tathā sadā tathaivāstviti samprāha brahmāṇaṁ girijāpatiḥ

प्रवृत्ति हो — इस प्रकार सदा मेरी रक्षा कीजिए। तब गिरिजापति ने ब्रह्मा से 'ऐसा ही हो' कहा।

श्लोक 46 (skanda.3.40.46)

इतः परं प्रमादं त्वं मा कुरुष्व विधे पुनः । उत्पथं प्रतिपन्नानां पुंसां शास्तास्मि सर्वदा

itaḥ paraṁ pramādaṁ tvaṁ mā kuruṣva vidhe punaḥ utpathaṁ pratipannānāṁ puṁsāṁ śāstāsmi sarvadā

हे विधाता! अब से पुनः ऐसी भूल मत करना। मैं सदा उन्मार्गगामी पुरुषों का शासक हूँ।

श्लोक 47 (skanda.3.40.47)

एवमुक्त्वा चतुर्वक्त्रं महादेवो द्विजोत्तमाः । सरस्वतीं च गायत्रीं प्रोवाच प्रीणयन्गिरा

evamuktvā caturvaktraṁ mahādevo dvijottamāḥ sarasvatīṁ ca gāyatrīṁ provāca prīṇayan girā

हे द्विजोत्तमो! चतुर्मुख ब्रह्मा से इस प्रकार कहकर, महादेव ने प्रसन्न वाणी में सरस्वती और गायत्री से कहा।

श्लोक 48 (skanda.3.40.48)

महादेव उवाच । युवयोर्मत्प्रसादेन हे गायत्रि सरस्वति । अयं भर्ता समायातः सप्राणश्चतुराननः

mahādeva uvāca yuvayor matprasādena he gāyatri sarasvati ayaṁ bhartā samāyātaḥ saprāṇaś caturānanaḥ

महादेव ने कहा — हे गायत्री, हे सरस्वती! मेरी कृपा से तुम दोनों का यह पति, चतुरानन, प्राणसहित लौट आया है।

श्लोक 49 (skanda.3.40.49)

सहानेन ब्रह्मलोकं यातं मा भूद्विलंबता । युवयोः संनिधानेन सदा कुंडद्वयेऽत्र वै

sahānena brahmalokaṁ yātaṁ mā bhūd vilambatā yuvayoḥ sannidhānena sadā kuṇḍadvaye'tra vai

अब विलंब न करते हुए, इसके साथ ब्रह्मलोक को जाओ। तुम दोनों के इन दो कुंडों में सदा सान्निध्य रहने से,

श्लोक 50 (skanda.3.40.50)

भविष्यति नृणां मुक्तिः स्नानात्सायुज्यरूपिणी । युष्मन्नाम्ना च गायत्रीसरस्वत्याविति द्वयम्

bhaviṣyati nṛṇāṁ muktiḥ snānāt sāyujyarūpiṇī yuṣmannāmnā ca gāyatrīsarasvatyāv iti dvayam

मनुष्यों को स्नान मात्र से सायुज्यरूपी मुक्ति प्राप्त होगी, और ये दोनों कुंड तुम्हारे ही नाम से 'गायत्री-सरस्वती' कहलाएँगे।

श्लोक 51 (skanda.3.40.51)

इदं तीर्थं सर्वलोके ख्यातिं यास्यति शाश्वतीम् । सर्वेषामपि तीर्थानामिदं तीर्थद्वयं सदा

idaṁ tīrthaṁ sarvaloke khyātiṁ yāsyati śāśvatīm sarveṣām api tīrthānām idaṁ tīrthadvayaṁ sadā

यह तीर्थ समस्त संसार में शाश्वत ख्याति को प्राप्त होगा; यह तीर्थद्वय सदा समस्त तीर्थों में

श्लोक 52 (skanda.3.40.52)

शुद्धिप्रदं तथा भूयान्महापातकनाशनम् । महाशांतिकरं पुंसां सर्वाभीष्टप्रदायकम्

śuddhipradaṁ tathā bhūyān mahāpātakanāśanam mahāśāntikaraṁ puṁsāṁ sarvābhīṣṭapradāyakam

शुद्धि प्रदान करने वाले, महापातकों का नाश करने वाले, मनुष्यों को महाशांति देने वाले तथा सर्व अभीष्ट को प्रदान करने वाले होंगे।

श्लोक 53 (skanda.3.40.53)

मम प्रसादजननं विष्णुप्रीतिकरं तथा । एतत्तीर्थद्वयसमं न भूतं न भविष्यति

mama prasādajananaṁ viṣṇuprītikaraṁ tathā etat tīrthadvayasamaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati

मेरी प्रसन्नता उत्पन्न करने वाला तथा विष्णु को प्रिय करने वाला यह तीर्थद्वय — इसके समान न कभी हुआ है, न होगा।

श्लोक 54 (skanda.3.40.54)

अत्र स्नानाद्धि सर्वेषां सर्वाभीष्टं भविष्यति । इदं कुंडद्वयं लोके भवतीभ्यां कृतं महत्

atra snānād dhi sarveṣāṁ sarvābhīṣṭaṁ bhaviṣyati idaṁ kuṇḍadvayaṁ loke bhavatībhyāṁ kṛtaṁ mahat

यहाँ स्नान करने से सभी को समस्त अभीष्ट की प्राप्ति होगी। यह महान् कुंडद्वय संसार में तुम दोनों के द्वारा निर्मित हुआ है।

श्लोक 55 (skanda.3.40.55)

युष्मन्नाम्ना प्रसिद्धं च भविष्यति विमुक्तिदम् । गायत्र्युपास्तिरहिता वेदाभ्यासविवर्जिताः

yuṣmannāmnā prasiddhaṁ ca bhaviṣyati vimuktidam gāyatryupāstirahitā vedābhyāsavivarjitāḥ

तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होकर यह मुक्तिदायक होगा। जो गायत्री की उपासना से रहित हैं, वेदाभ्यास से वर्जित हैं,

श्लोक 56 (skanda.3.40.56)

औपासनविहीनाश्च पंचयज्ञविवर्जिताः । युष्मत्कुंडद्वये स्नानात्तत्तत्फलमवाप्नुयुः

aupāsanavihīnāś ca pañcayajñavivarjitāḥ yuṣmatkuṇḍadvaye snānāt tat tat phalam avāpnuyuḥ

जो औपासन से हीन हैं और पंचयज्ञों से वर्जित हैं — वे भी तुम्हारे इन दोनों कुंडों में स्नान करने से वह-वह फल प्राप्त करेंगे।

श्लोक 57 (skanda.3.40.57)

अन्ये च ये पातकिनो नित्यानुष्ठानवर्जिताः । स्नात्वा कुंडद्वये तत्र शुद्धाः स्युर्द्विजसत्तमाः

anye ca ye pātakino nityānuṣṭhānavarjitāḥ snātvā kuṇḍadvaye tatra śuddhāḥ syur dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो! और भी जो पापी हैं, नित्य अनुष्ठानों से वर्जित हैं, वे भी वहाँ उन दोनों कुंडों में स्नान करके शुद्ध हो जाएँगे।

श्लोक 58 (skanda.3.40.58)

सरस्वतीं च गायत्रीमेवमुक्त्वा महेश्वरः । क्षणादंतरधात्तत्र सर्वेषामेव पश्यताम्

sarasvatīṁ ca gāyatrīm evamuktvā maheśvaraḥ kṣaṇād antaradhāt tatra sarveṣām eva paśyatām

सरस्वती और गायत्री से इस प्रकार कहकर महेश्वर वहाँ सबके देखते-देखते क्षणभर में अंतर्धान हो गए।

श्लोक 59 (skanda.3.40.59)

पतिं लब्ध्वाऽथ गायत्रीसरस्वत्यौ मुदान्विते । तेन साकं ब्रह्मलोकं जग्मतुर्द्विजसत्तमाः

patiṁ labdhvā'tha gāyatrīsarasvatyau mudānvite tena sākaṁ brahmalokaṁ jagmatur dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो! तब अपने पति को पाकर हर्ष से युक्त गायत्री और सरस्वती उनके साथ ब्रह्मलोक को चली गईं।

श्लोक 60 (skanda.3.40.60)

श्रीसूत उवाच । एवं वः कथितं विप्रा गंधमादनपर्वते । संनिधानं सरस्वत्या गायत्र्याश्च सहेतुकम्

śrīsūta uvāca evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāḥ gandhamādanaparvate sannidhānaṁ sarasvatyā gāyatryāś ca sahetukam

श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें गन्धमादन पर्वत पर सरस्वती और गायत्री के सान्निध्य का कारण सहित वर्णन किया।

श्लोक 61 (skanda.3.40.61)

यः शृणोतीममध्यायं पठते वा सभक्तिकम् । एतत्तीर्थद्वयस्नानफलमाप्नोत्यसंशयः

yaḥ śṛṇotīmam adhyāyaṁ paṭhate vā sabhaktikam etat tīrthadvayasnānaphalam āpnoty asaṁśayaḥ

जो कोई भी इस अध्याय को भक्तिपूर्वक सुनता या पढ़ता है, वह निःसंदेह इस तीर्थद्वय में स्नान का फल प्राप्त करता है।

अध्याय 39अध्याय-सूचीअध्याय 41