ब्रह्म खण्ड · अध्याय 41
काश्यप के पाप-शांति का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.3.41.1)
श्रीसूत उवाच । अथातः संप्रवक्ष्यामि गायत्रीं च सरस्वतीम् । लक्ष्यीकृत्य कथामेकां पवित्रां द्विजसत्तमाः
śrīsūta uvāca athātaḥ sampravakṣyāmi gāyatrīṁ ca sarasvatīm lakṣyīkṛtya kathām ekāṁ pavitrāṁ dvijasattamāḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे द्विजसत्तमो! अब मैं गायत्री और सरस्वती को लक्ष्य कर एक पवित्र कथा कहूँगा।
श्लोक 2 (skanda.3.41.2)
कश्यपाख्यो द्विजः पूर्वमस्मिंस्तीर्थद्वये शुभे । स्नात्वातिमहतः पापाद्विमुक्तो नरकप्रदात्
kaśyapākhyo dvijaḥ pūrvam asmiṁs tīrthadvaye śubhe snātvātimahataḥ pāpād vimukto narakapradāt
पूर्वकाल में कश्यप नामक एक ब्राह्मण इस शुभ तीर्थद्वय में स्नान करके नरक देने वाले अत्यंत महान पाप से मुक्त हो गया था।
श्लोक 3 (skanda.3.41.3)
ऋषय ऊचुः । मुने कश्यपनामासावकरोत्किं हि पातकम् । स्नात्वा तीर्थद्वयेप्यत्र यस्मान्मुक्तोऽभवत्क्षणात्
ṛṣaya ūcuḥ mune kaśyapanāmāsāv akarot kiṁ hi pātakam snātvā tīrthadvaye'py atra yasmān mukto'bhavat kṣaṇāt
ऋषियों ने कहा — हे मुने! उस कश्यप नामक ने कौन-सा पाप किया था, जिससे वह इस तीर्थद्वय में स्नान करके क्षणभर में मुक्त हो गया?
श्लोक 4 (skanda.3.41.4)
एतन्नः श्रद्दधानानां ब्रूहि सूत कृपाबलात् । त्वद्वचोऽमृततृप्तानां न पिपासापि विद्यते
etan naḥ śraddadhānānāṁ brūhi sūta kṛpābalāt tvadvaco'mṛtatṛptānāṁ na pipāsāpi vidyate
हे सूत! श्रद्धा रखने वाले हम लोगों को यह कृपापूर्वक बताइए। आपके अमृत-वचनों से तृप्त होकर भी हमें कोई प्यास नहीं मिटती।
श्लोक 5 (skanda.3.41.5)
श्रीसूत उवाच । गायत्र्याश्च सरस्वत्या माहात्म्यप्रतिपादकम् । इतिहासं प्रवक्ष्यामि शृण्वतां पापनाशनम्
śrīsūta uvāca gāyatryāś ca sarasvatyā māhātmyapratipādakam itihāsaṁ pravakṣyāmi śṛṇvatāṁ pāpanāśanam
श्री सूत जी ने कहा — मैं गायत्री और सरस्वती के माहात्म्य को प्रतिपादित करने वाला वह इतिहास कहूँगा, जो सुनने वालों के पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 6 (skanda.3.41.6)
अभिमन्युसुतो राजा परीक्षिन्नाम नामतः । अध्यास्ते हास्तिनपुरं पालयन्धर्मतो महीम्
abhimanyusuto rājā parīkṣin nāma nāmataḥ adhyāste hāstinapuraṁ pālayan dharmato mahīm
अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित नामक राजा हस्तिनापुर में निवास करते हुए धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन करता था।
श्लोक 7 (skanda.3.41.7)
स राजा जातु विपिने चचार मृगया रतः । षष्टिवर्षवया भूपः क्षुत्तृष्णापरिपीडितः
sa rājā jātu vipine cacāra mṛgayā rataḥ ṣaṣṭivarṣavayā bhūpaḥ kṣuttṛṣṇāparipīḍitaḥ
एक बार वह राजा वन में मृगया में रत होकर विचरण करने लगा; साठ वर्ष की आयु वाला वह राजा भूख-प्यास से अत्यंत पीड़ित हो गया।
श्लोक 8 (skanda.3.41.8)
नष्टमेकं स विपिने मार्गयन्मृगमादरात् । ध्यानारूढं मुनिं दृष्ट्वा प्राह तं चीरवाससम्
naṣṭam ekaṁ sa vipine mārgayan mṛgam ādarāt dhyānārūḍhaṁ muniṁ dṛṣṭvā prāha taṁ cīravāsasam
वन में एक भागे हुए मृग को उत्सुकतापूर्वक खोजते हुए, उसने ध्यानमग्न, वल्कल-वस्त्रधारी एक मुनि को देखा और उनसे कहा।
श्लोक 9 (skanda.3.41.9)
मया बाणेन विपिने मृगो विद्धोऽधुना मुने । दृष्टः स किं त्वया विद्वन्विद्रुतो भयकातरः
mayā bāṇena vipine mṛgo viddho'dhunā mune dṛṣṭaḥ sa kiṁ tvayā vidvan vidruto bhayakātaraḥ
हे मुने! मैंने अभी वन में बाण से एक मृग को घायल किया था। हे विद्वन्! क्या भय से व्याकुल होकर भागते हुए उसे आपने देखा?
श्लोक 10 (skanda.3.41.10)
समाधिनिष्ठो मौनित्वान्न किं चिदपि सोऽब्रवीत् । ततो धनुरटन्याऽसौ स्कंधे तस्य महामुनेः
samādhiniṣṭho maunitvān na kiṁcid api so'bravīt tato dhanuraṭanyā'sau skandhe tasya mahāmuneḥ
समाधि में स्थित होने और मौनव्रत के कारण उसने कुछ भी नहीं कहा। तब क्रुद्ध राजा ने धनुष की नोक से उस महामुनि के कंधे पर
श्लोक 11 (skanda.3.41.11)
निधाय मृतसर्पं तु कुपितः स्वपुरं ययौ । मुनेस्तस्य सुतः कश्चिच्छृंगीनाम बभूव वै
nidhāya mṛtasarpaṁ tu kupitaḥ svapuraṁ yayau munes tasya sutaḥ kaścic chṛṅgīnāma babhūva vai
एक मृत सर्प रखकर वह क्रुद्ध राजा अपनी नगरी को लौट गया। उस मुनि का एक पुत्र था, जिसका नाम शृंगी था।
श्लोक 12 (skanda.3.41.12)
सखा तस्य कृशाख्योऽभूच्छृंगिणो द्विजसत्तमाः । सखायं शृङ्गिणं प्राह कृशाख्यः स सखा ततः
sakhā tasya kṛśākhyo'bhūc chṛṅgiṇo dvijasattamāḥ sakhāyaṁ śṛṅgiṇaṁ prāha kṛśākhyaḥ sa sakhā tataḥ
हे द्विजसत्तमो! शृंगी का एक मित्र था जिसका नाम कृश था। उस मित्र कृश ने अपने सखा शृंगी से कहा।
श्लोक 13 (skanda.3.41.13)
पिता तव मृतं सर्पं स्कंधेन वहतेऽधुना । मा भूद्दर्पस्तव सखे मा कृथास्त्वं मदं वृथा
pitā tava mṛtaṁ sarpaṁ skandhena vahate'dhunā mā bhūd darpas tava sakhe mā kṛthās tvaṁ madaṁ vṛthā
तुम्हारे पिता अभी एक मृत सर्प को अपने कंधे पर धारण किए हुए हैं। हे मित्र! तुम्हें इसका दर्प नहीं होना चाहिए, व्यर्थ अभिमान मत करो।
श्लोक 14 (skanda.3.41.14)
सोऽवदत्कुपितः शृंगी दित्सुश्शापं नृपाय वै । मत्ताते शवसर्पं यो न्यस्तवान्मूढचेतनः
so'vadat kupitaḥ śṛṅgī ditsuś śāpaṁ nṛpāya vai mattāte śavasarpaṁ yo nyastavān mūḍhacetanaḥ
यह सुनकर क्रुद्ध शृंगी, राजा को शाप देने की इच्छा से बोला — जिस मूढ़बुद्धि ने मेरे मत्त पिता पर मृत सर्प रखा,
श्लोक 15 (skanda.3.41.15)
स सप्तरात्रान्म्रियतां संदष्टस्तक्षकाहिना । शशापैवं मुनिसुतः सौभद्रेयं परीक्षितम्
sa saptarātrān mriyatāṁ sandaṣṭas takṣakāhinā śaśāpaivaṁ munisutaḥ saubhadreyaṁ parīkṣitam
वह सात रात्रि के भीतर तक्षक सर्प द्वारा दंशित होकर मर जाए। इस प्रकार उस मुनिपुत्र ने अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित को शाप दिया।
श्लोक 16 (skanda.3.41.16)
शमीकाख्यः पिता तस्य श्रुत्वा शप्तं सुतेन तम् । नृपं प्रोवाच तनयं शृंगिणं मुनिपुंगवः
śamīkākhyaḥ pitā tasya śrutvā śaptaṁ sutena tam nṛpaṁ provāca tanayaṁ śṛṅgiṇaṁ munipuṅgavaḥ
उसके पिता, शमीक नामक मुनिश्रेष्ठ, अपने पुत्र द्वारा राजा को शाप दिए जाने का समाचार सुनकर, अपने पुत्र शृंगी से बोले।
श्लोक 17 (skanda.3.41.17)
रक्षकं सर्वलोकानां नृपं किं शप्तवानसि । अराजके वयं लोके स्थास्यामः कथमंजसा
rakṣakaṁ sarvalokānāṁ nṛpaṁ kiṁ śaptavān asi arājake vayaṁ loke sthāsyāmaḥ katham añjasā
समस्त प्रजा के रक्षक राजा को तुमने क्यों शाप दे दिया? राजा-विहीन संसार में हम कैसे रह पाएँगे?
श्लोक 18 (skanda.3.41.18)
क्रोधेन पातकमभून्न त्वया प्राप्यते सुखम् । यः समुत्पादितं कोपं क्षमयैव निरस्यति
krodhena pātakam abhūn na tvayā prāpyate sukham yaḥ samutpāditaṁ kopaṁ kṣamayaiva nirasyati
क्रोध से पाप ही होता है, तुम्हें सुख नहीं मिलेगा। जो उत्पन्न हुए क्रोध को क्षमा से ही दूर कर देता है,
श्लोक 19 (skanda.3.41.19)
इह लोके परत्रासावत्यंतं सुखमेधते । क्षमायुक्ता हि पुरुषा लभंते श्रेय उत्तमम्
iha loke paratrāsāv atyantaṁ sukham edhate kṣamāyuktā hi puruṣā labhante śreya uttamam
वह इस लोक और परलोक दोनों में अत्यंत सुख को प्राप्त करता है। क्षमाशील पुरुष ही उत्तम कल्याण प्राप्त करते हैं।
श्लोक 20 (skanda.3.41.20)
ततः शमीकः स्वं शिष्यं प्राह गौरमुखाभिधम् । भो गौरमुख गत्वा त्वं वद भूपं परीक्षितम्
tataḥ śamīkaḥ svaṁ śiṣyaṁ prāha gauramukhābhidham bho gauramukha gatvā tvaṁ vada bhūpaṁ parīkṣitam
तब शमीक ने अपने शिष्य गौरमुख नामक से कहा — हे गौरमुख! तुम जाकर राजा परीक्षित से यह कहो।
श्लोक 21 (skanda.3.41.21)
इमं शापं मत्सुतोक्तं तक्षकाहिविदंशनम् । पुनरायाहि शीघ्रं त्वं मत्समीपे महामते
imaṁ śāpaṁ matsutoktaṁ takṣakāhividaṁśanam punar āyāhi śīghraṁ tvaṁ matsamīpe mahāmate
मेरे पुत्र द्वारा दिया गया यह शाप — तक्षक सर्प के दंश का — उसे बता दो। हे महामते! फिर शीघ्र मेरे समीप लौट आना।
श्लोक 22 (skanda.3.41.22)
एवमुक्तः शमीकेन ययौ गौरमुखो नृपम् । समेत्य चाब्रवीद्भूपं सौभद्रेयं परीक्षितम्
evam uktaḥ śamīkena yayau gauramukho nṛpam sametya cābravīd bhūpaṁ saubhadreyaṁ parīkṣitam
शमीक द्वारा ऐसा कहे जाने पर गौरमुख राजा के पास गया और अभिमन्यु-पुत्र राजा परीक्षित से जाकर बोला।
श्लोक 23 (skanda.3.41.23)
दृष्ट्वा सर्पं पितुः स्कन्धे त्वया विनिहितं मृतम् । शमीकस्य सुतः शृंगी शशाप त्वां रुषान्वितः
dṛṣṭvā sarpaṁ pituḥ skandhe tvayā vinihitaṁ mṛtam śamīkasya sutaḥ śṛṅgī śaśāpa tvāṁ ruṣānvitaḥ
तुमने मेरे पिता के कंधे पर जो मृत सर्प रखा था, उसे देखकर शमीक के पुत्र शृंगी ने क्रोधित होकर तुम्हें शाप दिया है।
श्लोक 24 (skanda.3.41.24)
एतद्दिनात्सप्तमेऽह्नि तक्षकेण महाहिना । दष्टो विषाग्निना दग्धो भूयादाश्वभिमन्युजः
etad dināt saptame'hni takṣakeṇa mahāhinā daṣṭo viṣāgninā dagdho bhūyād āśv abhimanyujaḥ
'आज से सातवें दिन महासर्प तक्षक द्वारा दंशित होकर अभिमन्यु-पुत्र शीघ्र ही विष-अग्नि से जलकर भस्म हो जाए' —
श्लोक 25 (skanda.3.41.25)
एवं शशाप त्वां राजञ्छृंगी तस्य मुनेः सुतः । एतद्वक्तुं पिता तस्य प्राहिणोन्मां त्वदंतिकम्
evaṁ śaśāpa tvāṁ rājañ chṛṅgī tasya muneḥ sutaḥ etad vaktuṁ pitā tasya prāhiṇon māṁ tvadantikam
हे राजन्! उस मुनि के पुत्र शृंगी ने तुम्हें इस प्रकार शाप दिया है। यह बताने के लिए ही उसके पिता ने मुझे तुम्हारे समीप भेजा है।
श्लोक 26 (skanda.3.41.26)
इतीरयित्वा तं भूपमाशु गौरमुखो ययौ । गते गौरमुखे पश्चाद्राजा शोकपरायणः
itīrayitvā taṁ bhūpam āśu gauramukho yayau gate gauramukhe paścād rājā śokaparāyaṇaḥ
इस प्रकार राजा से कहकर गौरमुख शीघ्र ही चला गया। गौरमुख के चले जाने के पश्चात् राजा शोकमग्न हो गया।
श्लोक 27 (skanda.3.41.27)
अभ्रंलिहमथोत्तुंगमेकस्तंभं सुविस्तृतम् । मध्येगंगं व्यतनुत मंडपं नृपपुंगवः
abhraṁlihamathottuṅgam ekastambhaṁ suvistṛtam madhyegaṅgaṁ vyatanuta maṇḍapaṁ nṛpapuṅgavaḥ
तब उस श्रेष्ठ राजा ने गंगा के मध्य में आकाश को छूने वाला, अत्यंत ऊँचा, एक-स्तंभ वाला, विशाल मंडप बनवाया।
श्लोक 28 (skanda.3.41.28)
महागारुडमंत्रज्ञैरौषधज्ञैश्चिकित्सकैः । तक्षकस्य विषं हंतुं यत्नं कुर्वन्समाहितः
mahāgāruḍamantrajñair auṣadhajñaiś cikitsakaiḥ takṣakasya viṣaṁ hantuṁ yatnaṁ kurvan samāhitaḥ
गरुड़-मंत्र के महाज्ञाता, औषधि-विशेषज्ञ चिकित्सकों के साथ, तक्षक के विष को नष्ट करने का प्रयत्न करते हुए, वह मन को एकाग्र किए रहा।
श्लोक 29 (skanda.3.41.29)
अनेकदेवब्रह्मर्षिराजर्षिप्रवरान्वितः । आस्ते तस्मिन्नृपस्तुंगे मंडपे विष्णुभक्तिमान्
anekadevabrahmarṣirājarṣipravarānvitaḥ āste tasmin nṛpas tuṅge maṇḍape viṣṇubhaktimān
अनेक देवताओं, ब्रह्मर्षियों तथा श्रेष्ठ राजर्षियों से युक्त, विष्णु-भक्त वह राजा उस ऊँचे मंडप में बैठा रहा।
श्लोक 30 (skanda.3.41.30)
तस्मिन्नवसरे विप्रः काश्यपो मांत्रिकोत्तमः । राजानं रक्षितुं प्रायात्तक्षकस्य महाविषात्
tasminn avasare vipraḥ kāśyapo māntrikottamaḥ rājānaṁ rakṣituṁ prāyāt takṣakasya mahāviṣāt
उसी अवसर पर काश्यप नामक एक श्रेष्ठ मंत्रवेत्ता ब्राह्मण, राजा को तक्षक के महाविष से बचाने के लिए वहाँ जाने लगा।
श्लोक 31 (skanda.3.41.31)
सप्तमेऽहनि विप्रेंद्रो दरिद्रो धनकामुकः । अत्रांतरे तक्षकोऽपि विप्ररूपी समाययौ
saptame'hani viprendro daridro dhanakāmukaḥ atrāntare takṣako'pi viprarūpī samāyayau
सातवें दिन वह श्रेष्ठ, निर्धन, धन का इच्छुक ब्राह्मण चला। इसी बीच तक्षक भी ब्राह्मण का रूप धारण कर वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 32 (skanda.3.41.32)
मध्येमार्गं विलोक्याथ कश्यपं प्रत्यभाषत । ब्राह्मण त्वं कुत्र यासि वद मेऽद्य महामुने
madhyemārgaṁ vilokyātha kaśyapaṁ pratyabhāṣata brāhmaṇa tvaṁ kutra yāsi vada me'dya mahāmune
मार्ग में उसे देखकर कश्यप से बोला — हे ब्राह्मण, हे महामुने! आज तुम कहाँ जा रहे हो, मुझे बताओ।
श्लोक 33 (skanda.3.41.33)
इति पृष्टस्तदावादीत्काश्यपस्तक्षकं द्विजाः । परीक्षितं महाराजं तक्षकोऽद्य विषाग्निना
iti pṛṣṭas tadāvādīt kāśyapas takṣakaṁ dvijāḥ parīkṣitaṁ mahārājaṁ takṣako'dya viṣāgninā
हे द्विजो! इस प्रकार पूछे जाने पर काश्यप ने तक्षक से कहा — आज तक्षक महाराज परीक्षित को विष-अग्नि से
श्लोक 34 (skanda.3.41.34)
दक्ष्यते तं शमयितुं तत्समीपमुपैम्यहम् । इत्युक्तवंतं तं विप्रं तक्षकः पुनरब्रवीत्
dhakṣyate taṁ śamayituṁ tatsamīpam upaimy aham ityuktavantaṁ taṁ vipraṁ takṣakaḥ punar abravīt
दंशित करेगा — इसीलिए मैं उसे शांत करने के लिए वहाँ जा रहा हूँ। ऐसा कहने वाले उस ब्राह्मण से तक्षक ने पुनः कहा।
श्लोक 35 (skanda.3.41.35)
तक्षकोहं द्विजश्रेष्ठ मया दष्टश्चिकित्सितुम् । न शक्यो ऽब्दशतेनापि महामंत्रायुतैरपि
takṣako'haṁ dvijaśreṣṭha mayā daṣṭaś cikitsitum na śakyo'bdaśatenāpi mahāmantrāyutair api
हे द्विजश्रेष्ठ! मैं ही तक्षक हूँ। मेरे द्वारा दंशित व्यक्ति की चिकित्सा सौ वर्षों में भी, अथवा दस हज़ार महामंत्रों से भी नहीं की जा सकती।
श्लोक 36 (skanda.3.41.36)
चिकित्सितुं चेन्मद्दष्टं शक्तिरस्ति तवाधुना । अनेकयोजनोच्छ्रायमिमं वटतरुं त्वहम्
cikitsituṁ cen maddaṣṭaṁ śaktir asti tavādhunā anekayojanocchrāyam imaṁ vaṭataruṁ tv aham
यदि अभी तुम्हारे पास मेरे द्वारा दंशित को ठीक करने की शक्ति है, तो अनेक योजन ऊँचे इस वटवृक्ष को मैं
श्लोक 37 (skanda.3.41.37)
दशाम्युज्जीवयैनं त्वं समर्थोऽस्ति ततो भवान् । इतीरयित्वा तं वृक्षमदशत्तक्षकस्तदा
daśāmy ujjīvayainaṁ tvaṁ samartho'sti tato bhavān itīrayitvā taṁ vṛkṣam adaśat takṣakas tadā
अभी दंशित करता हूँ; इसे तुम पुनर्जीवित कर दो, तभी तुम समर्थ माने जाओगे। ऐसा कहकर तक्षक ने तत्काल उस वृक्ष को दंशित कर दिया।
श्लोक 38 (skanda.3.41.38)
अभवद्भस्मसात्सोऽपि वृक्षोऽत्यंतं समूर्च्छितः । पूर्वमेव नरः कश्चित्तं वृक्षमधिरूढवान्
abhavad bhasmasāt so'pi vṛkṣo'tyantaṁ samūrcchitaḥ pūrvam eva naraḥ kaścit taṁ vṛkṣam adhirūḍhavān
वह वृक्ष अत्यंत भस्मीभूत होकर मूर्च्छित हो गया। इससे पहले ही कोई व्यक्ति उस वृक्ष पर चढ़ा हुआ था।
श्लोक 39 (skanda.3.41.39)
तक्षकस्य विषोल्काभिः सोऽपि दग्धोऽभवत्तदा । तं नरं न विजिज्ञाते तौ च काश्यपतक्षकौ
takṣakasya viṣolkābhiḥ so'pi dagdho'bhavat tadā taṁ naraṁ na vijijñāte tau ca kāśyapatakṣakau
तक्षक की विष-ज्वालाओं से वह भी उसी समय जल गया। काश्यप और तक्षक दोनों को ही उस व्यक्ति का पता नहीं चला।
श्लोक 40 (skanda.3.41.40)
काश्यपः प्रतिजज्ञेऽथ तक्षकस्यापि शृण्वतः । तन्मंत्रशक्तिं पश्यंतु सर्वे विप्रा हि नोऽधुना
kāśyapaḥ pratijajñe'tha takṣakasyāpi śṛṇvataḥ tanmantraśaktiṁ paśyantu sarve viprā hi no'dhunā
तब काश्यप ने तक्षक के सुनते हुए ही प्रतिज्ञा की — सभी ब्राह्मण अभी हमारी मंत्र-शक्ति को देखें।
श्लोक 41 (skanda.3.41.41)
इतीरयित्वा तं वृक्षं भस्मीभूतं विषाग्निना । अजीवयन्मन्त्रशक्त्या काश्यपो मांत्रिकोत्तमः
itīrayitvā taṁ vṛkṣaṁ bhasmībhūtaṁ viṣāgninā ajīvayan mantraśaktyā kāśyapo māntrikottamaḥ
ऐसा कहकर, विष-अग्नि से भस्मीभूत हुए उस वृक्ष को, मंत्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ काश्यप ने मंत्र-शक्ति से पुनर्जीवित कर दिया।
श्लोक 42 (skanda.3.41.42)
नरोऽपि तेन वृक्षेण साकमुज्जीवितोऽभवत् । अथाब्रवीत्तक्षकस्तं काश्यपं मंत्रकोविदम्
naro'pi tena vṛkṣeṇa sākam ujjīvito'bhavat athābravīt takṣakas taṁ kāśyapaṁ mantrakovidam
उस वृक्ष के साथ वह व्यक्ति भी पुनर्जीवित हो गया। तब तक्षक ने मंत्र-विशारद काश्यप से कहा।
श्लोक 43 (skanda.3.41.43)
यथा न मुनिवाङ्मिथ्या भवेदेवं कुरु द्विज । यत्ते राजा धनं दद्यात्ततोपि द्विगुणं धनम्
yathā na munivāṅ mithyā bhaved evaṁ kuru dvija yat te rājā dhanaṁ dadyāt tato'pi dviguṇaṁ dhanam
हे द्विज! ऐसा करो जिससे मुनि का वचन झूठा न हो। राजा तुम्हें जो धन देगा, उससे दुगना धन
श्लोक 44 (skanda.3.41.44)
ददाम्यहं निवर्तस्व शीघ्रमेव द्विजोत्तम । इत्युक्त्वानर्घ्यरत्नानि तस्मै दत्त्वा स तक्षकः
dadāmy ahaṁ nivartasva śīghram eva dvijottama ityuktvānarghyaratnāni tasmai dattvā sa takṣakaḥ
मैं तुम्हें देता हूँ; हे द्विजोत्तम! अभी शीघ्र लौट जाओ। ऐसा कहकर तक्षक ने उसे अमूल्य रत्न देकर,
श्लोक 45 (skanda.3.41.45)
न्यवर्तयत्काश्यपं तं ब्राह्मणं मंत्रको विदम् । अल्पायुषं नृपं मत्वा ज्ञानदृष्ट्या स काश्यपः
nyavartayat kāśyapaṁ taṁ brāhmaṇaṁ mantrakovidam alpāyuṣaṁ nṛpaṁ matvā jñānadṛṣṭyā sa kāśyapaḥ
और उस मंत्रवेत्ता ब्राह्मण काश्यप को लौटा दिया। ज्ञान-दृष्टि से राजा को अल्पायु जानकर वह काश्यप,
श्लोक 46 (skanda.3.41.46)
स्वाश्रमं प्रययौ तूष्णीं लब्धरत्नश्च तक्षकात् । सोऽब्रवीत्तक्षकः सर्वान्सर्पानाहूय तत्क्षणे
svāśramaṁ prayayau tūṣṇīṁ labdharatnaś ca takṣakāt so'bravīt takṣakaḥ sarvān sarpān āhūya tatkṣaṇe
तक्षक से रत्न प्राप्त कर चुपचाप अपने आश्रम को लौट गया। फिर उस तक्षक ने उसी क्षण सभी सर्पों को बुलाकर कहा।
श्लोक 47 (skanda.3.41.47)
यूयं तं नृपतिं प्राप्य मुनीनां वेषधारिणः । उपहारफलान्याशु प्रयच्छत परीक्षिते
yūyaṁ taṁ nṛpatiṁ prāpya munīnāṁ veṣadhāriṇaḥ upahāraphalāny āśu prayacchata parīkṣite
तुम सब मुनियों का वेश धारण कर, उस राजा के पास जाकर, शीघ्र ही परीक्षित को उपहार-स्वरूप फल भेंट करो।
श्लोक 48 (skanda.3.41.48)
तथेत्युक्त्वा सर्वसर्पा ददू राज्ञे फलान्यमी । तक्षकोपि तदा तत्र कस्मिंश्चिद्बदरीफले
tathety uktvā sarvasarpā dadū rājñe phalāny amī takṣako'pi tadā tatra kasmiṁścid badarīphale
'ऐसा ही होगा' कहकर उन सभी सर्पों ने राजा को वे फल भेंट किए। तक्षक भी उस समय वहाँ किसी एक बेर के फल में
श्लोक 49 (skanda.3.41.49)
कृमिवेषधरो भूत्वा व्यतिष्ठद्दंशितुं नृपम् । अथ राजा प्रदत्तानि सर्पैर्ब्राह्मणरूपकैः
kṛmiveṣadharo bhūtvā vyatiṣṭhad daṁśituṁ nṛpam atha rājā pradattāni sarpair brāhmaṇarūpakaiḥ
कीड़े का रूप धारण कर राजा को दंशित करने के लिए वहाँ स्थित हो गया। तब राजा ने ब्राह्मण-रूपधारी उन सर्पों द्वारा दिए गए
श्लोक 50 (skanda.3.41.50)
परीक्षिन्मंत्रवृद्धेभ्यो दत्त्वा सर्वफलान्यपि । कौतूहलेन जग्राह स्थूलमेकं फलं करे
parīkṣin mantravṛddhebhyo dattvā sarvaphalāny api kautūhalena jagrāha sthūlam ekaṁ phalaṁ kare
उन समस्त फलों को अपने मंत्री-वृद्धजनों को बाँटकर, कौतूहलवश एक बड़े फल को अपने हाथ में ले लिया।
श्लोक 51 (skanda.3.41.51)
अस्मिन्नवसरे सूर्योऽप्यस्ताचलमगाहत । मिथ्या ऋषिवचो मा भूदिति तत्रत्यमानवाः
asminn avasare sūryo'py astācalam agāhata mithyā ṛṣivaco mā bhūd iti tatratyamānavāḥ
इसी अवसर पर सूर्य भी अस्ताचल में डूबने लगा। 'ऋषि का वचन कहीं मिथ्या न हो जाए' — ऐसा वहाँ उपस्थित लोग
श्लोक 52 (skanda.3.41.52)
अन्योयमवदन्त्सर्वे ब्राह्मणाश्च नृपास्तथा । एवं वदत्सु सर्वेषु फले तस्मिन्नदृश्यत
anyonyam avadan sarve brāhmaṇāś ca nṛpās tathā evaṁ vadatsu sarveṣu phale tasminn adṛśyata
सभी ब्राह्मण और राजा एक-दूसरे से कहने लगे। इस प्रकार सबके कहते-कहते, उस फल में दिखाई दिया,
श्लोक 53 (skanda.3.41.53)
फले रक्तकृमिः सर्वे राज्ञा चापि परीक्षिता । अयं किं मां दशेदद्य कृमिरित्युक्तवान्नृपः
phale raktakṛmiḥ sarve rājñā cāpi parīkṣitā ayaṁ kiṁ māṁ daśed adya kṛmir ity uktavān nṛpaḥ
एक लाल कीड़ा, जिसे सभी ने और राजा परीक्षित ने भी देखा। 'क्या यह कीड़ा आज मुझे काटेगा?' — ऐसा कहते हुए राजा ने,
श्लोक 54 (skanda.3.41.54)
निदधे तत्फलं कर्णे सकृमि द्विजसत्तमाः । तक्षकोऽस्मिन्स्थितः पूर्वं कृमिरूपी फले तदा
nidadhe tat phalaṁ karṇe sakṛmi dvijasattamāḥ takṣako'smin sthitaḥ pūrvaṁ kṛmirūpī phale tadā
हे द्विजसत्तमो! उस कीड़े सहित फल को अपने कान के पास रख लिया। पहले से ही उसमें कीड़े का रूप धारण कर बैठे हुए तक्षक ने,
श्लोक 55 (skanda.3.41.55)
निर्गत्य तत्फलादाशु नृपदेहमवेष्टयत् । तक्षकावेष्टिते भूपे पार्श्वस्था दुद्रुवुर्भयात्
nirgatya tatphalād āśu nṛpadeham aveṣṭayat takṣakāveṣṭite bhūpe pārśvasthā dudruvur bhayāt
उस फल से तुरंत निकलकर राजा के शरीर को लपेट लिया। तक्षक द्वारा राजा के लिपटे जाने पर, पास खड़े लोग भय से भाग गए।
श्लोक 56 (skanda.3.41.56)
अनंतरं नृपो विप्रास्तक्षकस्य विषाग्निना । दग्धोऽभूद्भस्मसादाशु सप्रासादो बलीयसा
anantaraṁ nṛpo viprās takṣakasya viṣāgninā dagdho'bhūd bhasmasād āśu saprāsādo balīyasā
हे विप्रो! तत्पश्चात् उस बलवान तक्षक के विष-अग्नि से राजा अपने प्रासाद सहित शीघ्र ही जलकर भस्म हो गया।
श्लोक 57 (skanda.3.41.57)
कृत्वोर्ध्वदैहिकं तस्य नृपस्य सपुरोहिताः । मंत्रिणस्तत्सुतं राज्ये जनमेजयनामकम्
kṛtvordhvadaihikaṁ tasya nṛpasya sapurohitāḥ mantriṇas tatsutaṁ rājye janamejayanāmakam
पुरोहितों सहित मंत्रियों ने उस राजा का अंत्येष्टि-संस्कार करके, उसके पुत्र जनमेजय नामक को राज्य पर,
श्लोक 58 (skanda.3.41.58)
राजानमभ्यषिंचन्वै गजद्रक्ष णवांछया । तक्षकाद्रक्षितुं भूपमायातः काश्यपाभिधः
rājānam abhyaṣiñcan vai rājyarakṣaṇavāñchayā takṣakād rakṣituṁ bhūpam āyātaḥ kāśyapābhidhaḥ
राजा के रूप में अभिषिक्त किया। तक्षक से राजा (परीक्षित) की रक्षा हेतु आया हुआ वह काश्यप नामक ब्राह्मण,
श्लोक 59 (skanda.3.41.59)
यो ब्राह्मणो मुनिश्रेष्ठाः स सर्वैर्निंदितो जनैः । बभ्राम सकलान्देशाञ्छिष्टैः सर्वैश्च दूषितः
yo brāhmaṇo muniśreṣṭhāḥ sa sarvair nindito janaiḥ babhrāma sakalān deśāñ chiṣṭaiḥ sarvaiś ca dūṣitaḥ
हे मुनिश्रेष्ठो! वह ब्राह्मण सभी लोगों द्वारा निंदित हुआ, और सभी सज्जनों द्वारा दूषित मानकर वह समस्त देशों में भटकता रहा।
श्लोक 60 (skanda.3.41.60)
अवस्थानं न लेभेऽसौ ग्रामे वाप्याश्रमेऽपि वा । यान्यान्देशानसौ यातस्तत्रतत्रमहाजनैः
avasthānaṁ na lebhe'sau grāme vāpy āśrame'pi vā yān yān deśān asau yātas tatra tatra mahājanaiḥ
उसे न गाँव में, न आश्रम में कहीं भी ठहरने का स्थान मिला। वह जिस-जिस देश में गया, वहाँ-वहाँ के महाजनों द्वारा
श्लोक 61 (skanda.3.41.61)
तत्तद्देशान्निरस्तः स शाकल्यं शरणं ययौ । प्रणम्य शाकल्यमुनिं काश्यपो निन्दितो जनैः । इदं विज्ञापयामास शाकल्याय महात्मने
tattaddeśān nirastaḥ sa śākalyaṁ śaraṇaṁ yayau praṇamya śākalyamuniṁ kāśyapo nindito janaiḥ idaṁ vijñāpayāmāsa śākalyāya mahātmane
उस-उस देश से निकाल दिया गया। तब वह शाकल्य मुनि की शरण में गया। लोगों द्वारा निंदित काश्यप ने शाकल्य मुनि को प्रणाम कर, महात्मा शाकल्य से यह निवेदन किया।
श्लोक 62 (skanda.3.41.62)
काश्यप उवाच । भगवन्सर्वधर्मज्ञ शाकल्य हरिवल्लभ
kāśyapa uvāca bhagavan sarvadharmajña śākalya harivallabha
काश्यप ने कहा — हे भगवन्! हे सर्वधर्मज्ञ! हे शाकल्य! हे हरि के प्रिय!
श्लोक 63 (skanda.3.41.63)
मुनयो ब्राह्मणाश्चान्ये मां निंदंति सुहृज्जनाः । नास्याहं कारणं जाने किं मां निंदंति मानवाः
munayo brāhmaṇāś cānye māṁ nindanti suhṛjjanāḥ nāsyāhaṁ kāraṇaṁ jāne kiṁ māṁ nindanti mānavāḥ
मुनि, ब्राह्मण, और अन्य सुहृद-जन भी मेरी निंदा करते हैं। मुझे इसका कारण नहीं ज्ञात कि लोग मेरी निंदा क्यों करते हैं।
श्लोक 64 (skanda.3.41.64)
ब्रह्महत्या सुरापानं गुरुस्त्रीगमनं तथा । स्तेयं संसर्गदोषो वा मया नाचरितः क्वचित्
brahmahatyā surāpānaṁ gurustrīgamanaṁ tathā steyaṁ saṁsargadoṣo vā mayā nācaritaḥ kvacit
मैंने न कभी ब्रह्महत्या की, न सुरापान किया, न गुरुपत्नीगमन किया, न चोरी की, और न किसी संसर्ग-दोष का आचरण किया।
श्लोक 65 (skanda.3.41.65)
अन्यान्यपि हि पापानि न कृतानि मया मुने । तथापि निंदंति जना वृथा मां बांधवादयः
anyāny api hi pāpāni na kṛtāni mayā mune tathāpi nindanti janā vṛthā māṁ bāndhavādayaḥ
हे मुने! अन्य पाप भी मैंने नहीं किए हैं। फिर भी बंधु आदि लोग व्यर्थ ही मेरी निंदा करते हैं।
श्लोक 66 (skanda.3.41.66)
जानासि चेत्त्वं शाकल्य मया दोषं कृतं वद । उक्तोऽथ काश्यपेनैवं शाकल्याख्यो महामुनिः । क्षणं ध्यात्वा बभाषे तं काश्यपं द्विजसत्तमाः
jānāsi cet tvaṁ śākalya mayā doṣaṁ kṛtaṁ vada ukto'tha kāśyapenaivaṁ śākalyākhyo mahāmuniḥ kṣaṇaṁ dhyātvā babhāṣe taṁ kāśyapaṁ dvijasattamāḥ
हे शाकल्य! यदि आप जानते हों कि मैंने कौन-सा दोष किया है, तो बताइए। काश्यप द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, हे द्विजसत्तमो, महामुनि शाकल्य ने क्षणभर ध्यान करके काश्यप से कहा।
श्लोक 67 (skanda.3.41.67)
शाकल्य उवाच । परीक्षितं महाराजं तक्षकाद्रक्षितुं भवान्
śākalya uvāca parīkṣitaṁ mahārājaṁ takṣakād rakṣituṁ bhavān
शाकल्य ने कहा — महाराज परीक्षित की तक्षक से रक्षा करने के लिए आप
श्लोक 68 (skanda.3.41.68)
अयासीदर्धमार्गे तु तक्षकेण निवारितः । चिकित्सितुं समर्थोऽपि विषरोगादिपीडितम्
ayāsīd ardhamārge tu takṣakeṇa nivāritaḥ cikitsituṁ samartho'pi viṣarogādipīḍitam
गए, किंतु आधे मार्ग में ही तक्षक द्वारा रोक दिए गए, और विष-रोग से पीड़ित व्यक्ति की चिकित्सा में समर्थ होते हुए भी,
श्लोक 69 (skanda.3.41.69)
यो न रक्षति लोभेन तमाहुर्ब्रह्मघातकम् । क्रोधात्कामाद्भयाल्लोभान्मात्सर्यान्मोहतोऽपि वा
yo na rakṣati lobhena tam āhur brahmaghātakam krodhāt kāmād bhayāl lobhān mātsaryān mohato'pi vā
जो लोभवश रक्षा नहीं करता, उसे ब्रह्महत्यारा कहा जाता है — चाहे वह क्रोध से हो, काम से, भय से, लोभ से, ईर्ष्या से, अथवा मोह से भी।
श्लोक 70 (skanda.3.41.70)
यो न रक्षति विप्रेंद्र विषरोगातुरं नरम् । ब्रह्महा स सुरापी च स्तेयी च गुरुतल्पगः
yo na rakṣati viprendra viṣarogāturaṁ naram brahmahā sa surāpī ca steyī ca gurutalpagaḥ
हे विप्रेंद्र! जो व्यक्ति विष-रोग से पीड़ित मनुष्य की रक्षा नहीं करता, वह ब्रह्महत्यारा, सुरापायी, चोर, तथा गुरुपत्नीगामी के समान है।
श्लोक 71 (skanda.3.41.71)
संसर्गदोषदुष्टश्च नापि तस्य हि निष्कृतिः । कन्याविक्रयिणश्चापि हयविक्रयिणस्तथा
saṁsargadoṣaduṣṭaś ca nāpi tasya hi niṣkṛtiḥ kanyāvikrayiṇaś cāpi hayavikrayiṇas tathā
वह संसर्ग-दोष से भी दूषित माना जाता है, और उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है। कन्या-विक्रेता और अश्व-विक्रेता के लिए भी,
श्लोक 72 (skanda.3.41.72)
कृतघ्न स्यापि शास्त्रेषु प्रायश्चित्तं हि विद्यते । विषरोगातुरं यस्तु समर्थोपि न रक्षति
kṛtaghnasyāpi śāstreṣu prāyaścittaṁ hi vidyate viṣarogāturaṁ yas tu samartho'pi na rakṣati
और यहाँ तक कि कृतघ्न के लिए भी शास्त्रों में प्रायश्चित्त बताया गया है। किंतु जो समर्थ होते हुए भी विष-रोग से पीड़ित व्यक्ति की रक्षा नहीं करता,
श्लोक 73 (skanda.3.41.73)
न तस्य निष्कृतिः प्रोक्ता प्रायश्चित्तायुतैरपि । न तेन सह पंक्तौ च भुंजीत सुकृती जनः
na tasya niṣkṛtiḥ proktā prāyaścittāyutair api na tena saha paṅktau ca bhuñjīta sukṛtī janaḥ
उसके लिए दस हज़ार प्रायश्चित्तों से भी कोई निष्कृति नहीं बताई गई है। पुण्यात्मा जन उसके साथ एक पंक्ति में बैठकर भोजन न करे।
श्लोक 74 (skanda.3.41.74)
न तेन सह भाषेत न पश्येत्तं नरं क्वचित् । तत्संभाषणमात्रेण महापातकभाग्भवेत्
na tena saha bhāṣeta na paśyet taṁ naraṁ kvacit tatsambhāṣaṇamātreṇa mahāpātakabhāg bhavet
उससे बात न करे और उस व्यक्ति को कभी न देखे। उसके साथ केवल बातचीत करने मात्र से भी महापातक का भागी हो जाता है।
श्लोक 75 (skanda.3.41.75)
परीक्षित्स महाराजः पुण्यश्लोकश्च धार्मिकः । विष्णुभक्तो महायोगी चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता
parīkṣit sa mahārājaḥ puṇyaślokaś ca dhārmikaḥ viṣṇubhakto mahāyogī cāturvarṇyasya rakṣitā
वह महाराज परीक्षित पुण्यश्लोक, धार्मिक, विष्णु-भक्त, महायोगी, तथा चारों वर्णों का रक्षक था।
श्लोक 76 (skanda.3.41.76)
व्यासपुत्राद्धरिकथां श्रुतवान्भक्तिपूर्वकम् । अरक्षित्वा नृपं तं त्वं वचसा तक्षकस्य यत्
vyāsaputrād dharikathāṁ śrutavān bhaktipūrvakam arakṣitvā nṛpaṁ taṁ tvaṁ vacasā takṣakasya yat
उसने व्यास-पुत्र (शुकदेव) से भक्तिपूर्वक हरि-कथा सुनी थी। ऐसे राजा की रक्षा न करके, तक्षक के वचन मात्र से
श्लोक 77 (skanda.3.41.77)
निवृत्तस्तेन विप्रेंद्रैर्बांधवैरपि दूष्यसे । स परीक्षिन्महाराजो यद्यपि क्ष णजीवितः
nivṛttas tena viprendrair bāndhavair api dūṣyase sa parīkṣin mahārājo yadyapi kṣaṇajīvitaḥ
तुम लौट आए, इसीलिए श्रेष्ठ ब्राह्मणों और बंधुओं द्वारा भी दूषित माने जाते हो। यद्यपि वह महाराज परीक्षित क्षणभंगुर जीवन वाला था,
श्लोक 78 (skanda.3.41.78)
तथापि यावन्मरणं बुधैः कार्यं चिकित्सनम् । यावत्कण्ठगताः प्राणा मुमूर्षोर्मानवस्य हि
tathāpi yāvan maraṇaṁ budhaiḥ kāryaṁ cikitsanam yāvat kaṇṭhagatāḥ prāṇā mumūrṣor mānavasya hi
फिर भी मृत्यु होने तक बुद्धिमानों को चिकित्सा करते रहना चाहिए। मरणासन्न व्यक्ति के प्राण जब तक कंठ में स्थित हैं,
श्लोक 79 (skanda.3.41.79)
तावच्चिकित्सा कर्तव्या कालस्य कुटिला गतिः । इति प्राहुः पुरा श्लोकं भिषग्वैद्याब्धिपारगाः
tāvac cikitsā kartavyā kālasya kuṭilā gatiḥ iti prāhuḥ purā ślokaṁ bhiṣagvaidyābdhipāragāḥ
तब तक चिकित्सा करते रहना चाहिए, क्योंकि काल की गति कुटिल होती है — पूर्वकाल में वैद्य-शास्त्र के पारंगत वैद्यों ने ऐसा श्लोक कहा है।
श्लोक 80 (skanda.3.41.80)
अतश्चिकित्साशक्तोऽपि यस्मादकृतभेषजः । अर्धमार्गे निवृत्तस्त्वं तेन तं हतवानसि
ataś cikitsāśakto'pi yasmād akṛtabheṣajaḥ ardhamārge nivṛttas tvaṁ tena taṁ hatavān asi
इसलिए, चिकित्सा में समर्थ होते हुए भी, बिना औषधि दिए, तुम आधे मार्ग से ही लौट आए — इसी कारण तुमने उसकी हत्या की है।
श्लोक 81 (skanda.3.41.81)
शाकल्येनैवमुदितः काश्यपः प्रत्यभाषत । काश्यप उवाच । ममैतद्दोषशांत्यर्थमुपायं वद सुव्रत
śākalyenaivam uditaḥ kāśyapaḥ pratyabhāṣata kāśyapa uvāca mamaitad doṣaśāntyartham upāyaṁ vada suvrata
शाकल्य द्वारा ऐसा कहे जाने पर काश्यप ने उत्तर दिया — काश्यप ने कहा — हे सुव्रत! मेरे इस दोष की शांति का उपाय बताइए,
श्लोक 82 (skanda.3.41.82)
येन मां प्रतिगृह्णीयुर्बांधवाः ससुहृज्जनाः
yena māṁ pratigṛhṇīyur bāndhavāḥ sasuhṛjjanāḥ
जिससे मेरे बंधु और मित्रजन मुझे पुनः स्वीकार कर लें।
श्लोक 83 (skanda.3.41.83)
कृपां मयि कुरुष्व त्वं शाकल्य हरिवल्लभ । काश्यपेनैवमुक्तस्तु शाकल्योपि मुनीश्वरः । क्षणं ध्यात्वा जगादैवं काश्यपं कृपया तदा
kṛpāṁ mayi kuruṣva tvaṁ śākalya harivallabha kāśyapenaivam uktas tu śākalyo'pi munīśvaraḥ kṣaṇaṁ dhyātvā jagādaivaṁ kāśyapaṁ kṛpayā tadā
हे शाकल्य! हे हरि के प्रिय! मुझ पर कृपा कीजिए। काश्यप द्वारा ऐसा कहे जाने पर मुनीश्वर शाकल्य ने भी क्षणभर ध्यान करके, कृपापूर्वक काश्यप से यह कहा।
श्लोक 84 (skanda.3.41.84)
शाकल्य उवाच । अस्य पापस्य शात्यर्थमुपायं प्रवदामि ते
śākalya uvāca asya pāpasya śāntyartham upāyaṁ pravadāmi te
शाकल्य ने कहा — इस पाप की शांति के लिए मैं तुम्हें उपाय बताता हूँ।
श्लोक 85 (skanda.3.41.85)
तत्कर्त्तव्यं त्वया शीघ्रं विलंबं मा कृथा द्विज । दक्षिणांबुनिधौ सेतौ गंधमादनपर्वते
tat kartavyaṁ tvayā śīghraṁ vilambaṁ mā kṛthā dvija dakṣiṇāmbunidhau setau gandhamādanaparvate
हे द्विज! उसे तुम शीघ्र करो, विलंब मत करो। दक्षिण समुद्र के सेतु में, गन्धमादन पर्वत पर,
श्लोक 86 (skanda.3.41.86)
अस्ति तीर्थद्वयं विप्रा गायत्री च सरस्वती । तत्र त्वं स्नानमात्रेण शुद्धो भूयाश्च तत्क्षणे
asti tīrthadvayaṁ viprā gāyatrī ca sarasvatī tatra tvaṁ snānamātreṇa śuddho bhūyāś ca tatkṣaṇe
हे विप्रो! गायत्री और सरस्वती नामक दो तीर्थ हैं। वहाँ केवल स्नान करने मात्र से तुम उसी क्षण शुद्ध हो जाओगे।
श्लोक 87 (skanda.3.41.87)
गायत्र्या च सरस्वत्या जलवात स्पृशो नरः । विधूय सर्वपापानि स्वर्गं यास्यंति निर्मलाः
gāyatryā ca sarasvatyā jalavātaspṛśo naraḥ vidhūya sarvapāpāni svargaṁ yāsyanti nirmalāḥ
गायत्री और सरस्वती के जल का स्पर्श करने वाला मनुष्य समस्त पापों को धोकर निर्मल होकर स्वर्ग को जाता है।
श्लोक 88 (skanda.3.41.88)
तद्याहि शीघ्र विप्र त्वं गायत्रीं च सरस्वतीम् । इत्युक्तः काश्यपस्तेन शाकल्येन द्विजोत्तमाः
tad yāhi śīghraṁ vipra tvaṁ gāyatrīṁ ca sarasvatīm ityuktaḥ kāśyapas tena śākalyena dvijottamāḥ
अतः हे विप्र! तुम शीघ्र गायत्री और सरस्वती के पास जाओ। हे द्विजोत्तमो! शाकल्य द्वारा ऐसा कहे जाने पर काश्यप ने,
श्लोक 89 (skanda.3.41.89)
नत्वा मुनिं च शाकल्यं तमापृच्छ्य मुनीश्वरम् । तेन चैवाभ्यनुज्ञातः प्रययौ गन्धमादनम्
natvā muniṁ ca śākalyaṁ tam āpṛcchya munīśvaram tena caivābhyanujñātaḥ prayayau gandhamādanam
शाकल्य मुनि को प्रणाम कर और उस मुनीश्वर से आज्ञा लेकर, उनके द्वारा अनुज्ञात होकर गन्धमादन पर्वत की ओर चला गया।
श्लोक 90 (skanda.3.41.90)
तत्र गत्वा च गायत्रीसरस्वत्यौ च काश्यपः । नत्वा तीर्थद्वयं भक्त्या दण्डपाणिं च भैरवम्
tatra gatvā ca gāyatrīsarasvatyau ca kāśyapaḥ natvā tīrthadvayaṁ bhaktyā daṇḍapāṇiṁ ca bhairavam
वहाँ जाकर काश्यप ने गायत्री और सरस्वती दोनों तीर्थों को तथा दण्डपाणि भैरव को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया।
श्लोक 91 (skanda.3.41.91)
संकल्पपूर्वं तत्तीर्थे सस्नौ नियमसंयुतः । तीर्थद्वये स्नानमात्रान्मुक्तपापोऽथ काश्यपः
saṅkalpapūrvaṁ tattīrthe sasnau niyamasaṁyutaḥ tīrthadvaye snānamātrān muktapāpo'tha kāśyapaḥ
संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करते हुए उसने उस तीर्थ में स्नान किया। उन दोनों तीर्थों में स्नान करने मात्र से काश्यप पाप-मुक्त हो गया।
श्लोक 92 (skanda.3.41.92)
तीर्थद्वयस्य तीरेऽसौ किंचित्कालं तु तस्थिवान् । तस्मिन्काले च गायत्रीसरस्वत्यौ मुनीश्वराः
tīrthadvayasya tīre'sau kiṁcit kālaṁ tu tasthivān tasmin kāle ca gāyatrīsarasvatyau munīśvarāḥ
हे मुनीश्वरो! वह उन दोनों तीर्थों के तट पर कुछ काल तक ठहरा रहा। उसी समय गायत्री और सरस्वती,
श्लोक 93 (skanda.3.41.93)
प्रादुर्बभूवतुर्मूर्ते सर्वाभरणभूषिते । देव्यौ ते स नमस्कृत्य काश्यपो भक्तिपूर्वकम्
prādurbabhūvatur mūrte sarvābharaṇabhūṣite devyau te sa namaskṛtya kāśyapo bhaktipūrvakam
सर्व आभूषणों से विभूषित साकार रूप में प्रकट हुईं। उन दोनों देवियों को काश्यप ने भक्तिपूर्वक नमस्कार किया।
श्लोक 94 (skanda.3.41.94)
के युवां रूपसंपन्ने सर्वालंकारसंयुते । इति पप्रच्छ दृष्ट्वा ते काश्यपो हृष्टमानसः । तेन पृष्टे च गायत्रीसरस्वत्यौ तमूचतुः
ke yuvāṁ rūpasampanne sarvālaṅkārasaṁyute iti papraccha dṛṣṭvā te kāśyapo hṛṣṭamānasaḥ tena pṛṣṭe ca gāyatrīsarasvatyau tam ūcatuḥ
'रूप-संपन्न, सर्व अलंकारों से युक्त, आप दोनों कौन हैं?' — यह देखकर हर्षित मन वाले काश्यप ने पूछा। उसके द्वारा पूछे जाने पर गायत्री और सरस्वती ने उससे कहा।
श्लोक 95 (skanda.3.41.95)
गायत्रीसरस्वत्यावूचतुः । काश्यपावां हि गायत्रीसरस्वत्यौ विधिप्रिये
gāyatrīsarasvatyāv ūcatuḥ kāśyapāvāṁ hi gāyatrīsarasvatyau vidhipriye
गायत्री और सरस्वती ने कहा — हे काश्यप! हम दोनों ही गायत्री और सरस्वती हैं, विधाता की प्रिय।
श्लोक 96 (skanda.3.41.96)
एतत्तीर्थस्वरूपेण नित्यं वर्तावहे त्वतः । अत्र तीर्थद्वये स्नानादावां तुष्टे तवाधुना
etat tīrthasvarūpeṇa nityaṁ vartāvahe tvataḥ atra tīrthadvaye snānād āvāṁ tuṣṭe tavādhunā
हम सदा इसी तीर्थ-रूप में यहाँ निवास करती हैं। इन दोनों तीर्थों में तुम्हारे स्नान से अभी हम दोनों प्रसन्न हुई हैं।
श्लोक 97 (skanda.3.41.97)
वरं मत्तो वृणीष्व त्वं यदिष्टं काश्यप द्विज । स्नांति तीर्थद्वये येऽत्र दास्यावस्तदभीप्सितम्
varaṁ matto vṛṇīṣva tvaṁ yad iṣṭaṁ kāśyapa dvija snānti tīrthadvaye ye'tra dāsyāvas tad abhīpsitam
हे काश्यप द्विज! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर मुझसे माँगो। जो भी यहाँ इन दोनों तीर्थों में स्नान करेंगे, हम उन्हें उनका अभीष्ट प्रदान करेंगी।
श्लोक 98 (skanda.3.41.98)
श्रुत्वा वचस्तद्गायत्रीसरस्वत्योः स काश्यपः । तुष्टाव वाग्भिरग्र्याभिस्ते देव्यौ वेधसः प्रिये
śrutvā vacas tad gāyatrīsarasvatyoḥ sa kāśyapaḥ tuṣṭāva vāgbhir agryābhis te devyau vedhasaḥ priye
गायत्री और सरस्वती के उस वचन को सुनकर, काश्यप ने विधाता की उन दोनों प्रिय देवियों की श्रेष्ठ वाणी से स्तुति की।
श्लोक 99 (skanda.3.41.99)
काश्यप उवाच । चतुराननगेहिन्यौ जगद्धात्र्यौ नमाम्यहम् । विद्यास्वरूपे गायत्री सरस्वत्यौ शुभे उभे
kāśyapa uvāca caturānanagehinyau jagaddhātryau namāmyaham vidyāsvarūpe gāyatrī sarasvatyau śubhe ubhe
काश्यप ने कहा — चतुरानन ब्रह्मा की दोनों गृहिणी, जगत को धारण करने वाली, विद्या-स्वरूपिणी, शुभ गायत्री और सरस्वती दोनों को मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 100 (skanda.3.41.100)
सृष्टिस्थित्यंतकारिण्यौ जगतो वेदमातरौ । हव्यकव्यस्वरूपे च चंद्रादित्यविलोचने
sṛṣṭisthityantakāriṇyau jagato vedamātarau havyakavyasvarūpe ca candrādityavilocane
जो सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाली, जगत की वेदमाताएँ, हव्य और कव्य के स्वरूप, तथा चंद्र-सूर्य नेत्रों वाली हैं,
श्लोक 101 (skanda.3.41.101)
सर्वदेवाधिपे वाणी गायत्र्यौ सततं भजे । गिरिजा कमला चापि युवामेव जगद्धिते
sarvadevādhipe vāṇī gāyatryau satataṁ bhaje girijā kamalā cāpi yuvām eva jagaddhite
समस्त देवों की अधिष्ठात्री, हे वाणी, हे गायत्री, मैं सदा तुम दोनों को भजता हूँ। हे जगत के हित करने वाली, गिरिजा और कमला भी तुम्हीं दोनों का रूप हैं।
श्लोक 102 (skanda.3.41.102)
युष्मद्दर्शनमात्रेण जगत्सृष्ट्यादिकल्पनम् । युष्मन्निमेषात्सततं जगतां प्रलयो भवेत्
yuṣmaddarśanamātreṇa jagatsṛṣṭyādikalpanam yuṣman nimeṣāt satataṁ jagatāṁ pralayo bhavet
तुम्हारे दर्शन मात्र से ही जगत की सृष्टि आदि की कल्पना होती है। तुम्हारे निमेष मात्र से ही सतत जगतों का प्रलय हो जाता है।
श्लोक 103 (skanda.3.41.103)
उन्मेषात्सृष्टिरभवद्भोगायत्रि सरस्वति । युवयोर्दर्शनादद्य कृतार्थोऽभवमाशु वै
unmeṣāt sṛṣṭir abhavad bho gāyatri sarasvati yuvayor darśanād adya kṛtārtho'bhavam āśu vai
हे गायत्री, हे सरस्वती! तुम्हारे नेत्र-उन्मीलन से सृष्टि उत्पन्न होती है। आज तुम दोनों के दर्शन से मैं तत्काल कृतार्थ हो गया।
श्लोक 104 (skanda.3.41.104)
मामद्य पातकान्मुक्तं स्नानात्तीर्थ द्वयेऽत्र तु । स्वीकुर्वंतु मुनिश्रेष्ठा ब्राह्मणा बांधवास्तथा
mām adya pātakān muktaṁ snānāt tīrthadvaye'tra tu svīkurvantu muniśreṣṭhā brāhmaṇā bāndhavās tathā
इन दोनों तीर्थों में स्नान से आज पाप-मुक्त हुए मुझे, श्रेष्ठ मुनि, ब्राह्मण, तथा बंधुजन स्वीकार करें।
श्लोक 105 (skanda.3.41.105)
इतः परं पापकृत्ये मा मे बुद्धिः प्रवर्तताम् । धर्मे प्रवर्ततां नित्यमयमेव वरो मम
itaḥ paraṁ pāpakṛtye mā me buddhiḥ pravartatām dharme pravartatāṁ nityam ayam eva varo mama
अब से मेरी बुद्धि पाप-कर्म में प्रवृत्त न हो, अपितु सदा धर्म में ही प्रवृत्त हो — यही मेरा वर है।
श्लोक 106 (skanda.3.41.106)
दीयतां भो महादेव्यौ नान्यमिच्छाम्यहं वरम् । इति ते प्रार्थिते तेन काश्यपेन द्विजोत्तमाः
dīyatāṁ bho mahādevyau nānyam icchāmy ahaṁ varam iti te prārthite tena kāśyapena dvijottamāḥ
हे महादेवियो! यही मुझे प्रदान कीजिए, अन्य कोई वर मैं नहीं चाहता। हे द्विजोत्तमो! काश्यप द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर,
श्लोक 107 (skanda.3.41.107)
सरस्वती च गायत्री द्वे देव्यौ ब्रह्मणः प्रिये । काश्यपं प्रोचतुः प्रीते जनन्यौ जगतां सदा
sarasvatī ca gāyatrī dve devyau brahmaṇaḥ priye kāśyapaṁ procatuḥ prīte jananyau jagatāṁ sadā
ब्रह्मा की प्रिय वे दोनों देवियाँ सरस्वती और गायत्री, जो सदा जगत की माताएँ हैं, प्रसन्न होकर काश्यप से बोलीं।
श्लोक 108 (skanda.3.41.108)
काश्यपैतद्वरं सर्वं प्रार्थितं यत्त्वयाऽधुना । अनुग्रहादावयोस्तदचिरेण तवास्तु हि
kāśyapaitad varaṁ sarvaṁ prārthitaṁ yat tvayā'dhunā anugrahād āvayos tad acireṇa tavāstu hi
हे काश्यप! तुमने अभी जो यह सब वर माँगा है, वह हम दोनों की कृपा से शीघ्र ही तुम्हें प्राप्त हो।
श्लोक 109 (skanda.3.41.109)
इत्युक्त्वा तं तु गायत्रीसरस्वत्यौ क्षणेन वै । तिरोधानं गते विप्रास्तस्मिंस्तीर्थद्वये तदा
ityuktvā taṁ tu gāyatrīsarasvatyau kṣaṇena vai tirodhānaṁ gate viprās tasmiṁs tīrthadvaye tadā
हे विप्रो! उससे ऐसा कहकर गायत्री और सरस्वती दोनों उसी क्षण उन दोनों तीर्थों में अंतर्धान हो गईं।
श्लोक 110 (skanda.3.41.110)
काश्यपोऽपि कृतार्थः सन्स्व देशं प्रति निर्ययौ । बांधवा ब्राह्मणाः सर्वे काश्यपं गतकिल्बिषम्
kāśyapo'pi kṛtārthaḥ san sva deśaṁ prati niryayau bāndhavā brāhmaṇāḥ sarve kāśyapaṁ gatakilbiṣam
काश्यप भी कृतार्थ होकर अपने देश की ओर लौट गया। समस्त बंधुओं और ब्राह्मणों ने पाप-रहित हुए काश्यप को,
श्लोक 111 (skanda.3.41.111)
प्रत्यगृह्णंश्च गायत्रीसरस्वत्योर्निमज्जनात् । एवं वः कथितं विप्रा काश्यपस्य विमोक्षणम्
pratyagṛhṇaṁś ca gāyatrīsarasvatyor nimajjanāt evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā kāśyapasya vimokṣaṇam
गायत्री और सरस्वती में स्नान करने के कारण पुनः स्वीकार कर लिया। हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें काश्यप की मुक्ति की कथा सुनाई।
श्लोक 112 (skanda.3.41.112)
पातकेभ्यो हि गायत्रीसरस्त्योर्निमजनात् । पठते त्विममध्यायं शृणुते वा समाहितः
pātakebhyo hi gāyatrīsarasvatyor nimajjanāt paṭhate tv imam adhyāyaṁ śṛṇute vā samāhitaḥ
गायत्री और सरस्वती में स्नान करने से पापों से मुक्ति होती है। जो भी इस अध्याय को पढ़ता है या एकाग्रचित्त होकर सुनता है,
श्लोक 113 (skanda.3.41.113)
यो गायत्र्यां सरस्वत्यां स स्नातफलमश्नुते
yo gāyatryāṁ sarasvatyāṁ sa snātaphalam aśnute
वह गायत्री और सरस्वती में स्नान करने का फल प्राप्त करता है।