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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 42

ऋणमोचन आदि तीर्थों के माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43

श्लोक 1 (skanda.3.42.1)

श्रीसूत उवाच । अथातः सर्वतीर्थानां वैभवं प्रवदाम्यहम् । सेतुमध्यनिविष्टानामनुक्तानां मुनीश्वराः

śrīsūta uvāca athātaḥ sarvatīrthānāṁ vaibhavaṁ pravadāmy aham setumadhyaniviṣṭānām anuktānāṁ munīśvarāḥ

श्री सूत जी ने कहा — हे मुनीश्वरो! अब मैं सेतु के मध्य स्थित उन सभी अकथित तीर्थों के वैभव का वर्णन करूँगा।

श्लोक 2 (skanda.3.42.2)

अस्ति तीर्थं महापुण्यं नाम्ना तु ऋणमोचनम् । ऋणानि त्रीणि नश्यंति नराणामत्र मज्जनात्

asti tīrthaṁ mahāpuṇyaṁ nāmnā tu ṛṇamocanam ṛṇāni trīṇi naśyanti narāṇām atra majjanāt

यहाँ ऋणमोचन नामक एक अत्यंत पुण्यमय तीर्थ है। यहाँ स्नान करने से मनुष्यों के तीनों ऋण नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 3 (skanda.3.42.3)

द्विजस्य जायमानस्य ऋणानि त्रीणि संति हि । ऋषीणां देवतानां च पितॄणां च द्विजोत्तमाः

dvijasya jāyamānasya ṛṇāni trīṇi santi hi ṛṣīṇāṁ devatānāṁ ca pitṝṇāṁ ca dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! जन्म लेने वाले द्विज के तीन ऋण होते हैं — ऋषियों का, देवताओं का, और पितरों का।

श्लोक 4 (skanda.3.42.4)

ब्रह्मचर्याननुष्ठानादृषीणामृणवान्भवेत् । यज्ञादीनामकरणाद्देवानां च ऋणी भवेत्

brahmacaryānanuṣṭhānād ṛṣīṇām ṛṇavān bhavet yajñādīnām akaraṇād devānāṁ ca ṛṇī bhavet

ब्रह्मचर्य का पालन न करने से वह ऋषियों का ऋणी होता है; यज्ञ आदि न करने से देवताओं का ऋणी होता है।

श्लोक 5 (skanda.3.42.5)

पुत्रानुत्पादनाच्चैव पितृणामृणवान्भवेत् । विनापि ब्रह्मचर्येण विना यागं विना सुतम्

putrān utpādanāc caiva pitṛṇām ṛṇavān bhavet vinā'pi brahmacaryeṇa vinā yāgaṁ vinā sutam

पुत्र उत्पन्न न करने से पितरों का ऋणी होता है। परंतु बिना ब्रह्मचर्य के, बिना यज्ञ के, बिना पुत्र के भी,

श्लोक 6 (skanda.3.42.6)

ऋणमोक्षाभिधे तीर्थे स्नानमात्रेण मानवाः । ऋषिदेवपितॄणां तु ऋणेभ्यो मुक्तिमाप्नुयुः

ṛṇamokṣābhidhe tīrthe snānamātreṇa mānavāḥ ṛṣidevapitṝṇāṁ tu ṛṇebhyo muktim āpnuyuḥ

ऋणमोक्ष नामक इस तीर्थ में स्नान करने मात्र से मनुष्य ऋषि, देव, तथा पितरों के ऋणों से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।

श्लोक 7 (skanda.3.42.7)

ब्रह्मचर्येण यज्ञेन तथा पुत्रोद्भवेन च । नैव तुष्यन्ति ऋषयो देवाः पितृगणास्तथा

brahmacaryeṇa yajñena tathā putrodbhavena ca naiva tuṣyanti ṛṣayo devāḥ pitṛgaṇās tathā

जितने संतोष को ऋषि, देव, और पितृगण ब्रह्मचर्य, यज्ञ, तथा पुत्रोत्पत्ति से प्राप्त नहीं करते,

श्लोक 8 (skanda.3.42.8)

ऋणमोक्षे यथा स्नानादतुलां तुष्टिमाप्नुयुः । किं चात्र मज्जनात्तीर्थे दरिद्रा अधमर्णिनः

ṛṇamokṣe yathā snānād atulāṁ tuṣṭim āpnuyuḥ kiṁ cātra majjanāt tīrthe daridrā adhamarṇinaḥ

जितना संतोष ऋणमोक्ष तीर्थ में स्नान से प्राप्त करते हैं। और भी क्या, इस तीर्थ में स्नान करने से निर्धन तथा ऋणी लोग,

श्लोक 9 (skanda.3.42.9)

मुक्ता ऋणेभ्यः सर्वेभ्यो धनिनः स्युर्न संशयः । यदत्र मज्जनात्पुंसामृणमुक्तिः प्रजायते

muktā ṛṇebhyaḥ sarvebhyo dhaninaḥ syur na saṁśayaḥ yad atra majjanāt puṁsām ṛṇamuktiḥ prajāyate

समस्त ऋणों से मुक्त होकर निःसंदेह धनवान हो जाते हैं। क्योंकि यहाँ स्नान करने से मनुष्यों की ऋण-मुक्ति होती है।

श्लोक 10 (skanda.3.42.10)

तस्मादुक्तमिदं तीर्थमृणमोचनसंज्ञया । अतोऽत्र ऋणिभिः सर्वैः स्नातव्यं तद्विमुक्तये

tasmād uktam idaṁ tīrtham ṛṇamocanasaṁjñayā ato'tra ṛṇibhiḥ sarvaiḥ snātavyaṁ tadvimuktaye

इसीलिए इस तीर्थ को ऋणमोचन नाम से कहा गया है। अतः इससे मुक्ति के लिए सभी ऋणी जनों को यहाँ स्नान करना चाहिए।

श्लोक 11 (skanda.3.42.11)

एतत्तीर्थसमं तीर्थं न भूतं न भविष्यति । पांडवैः कृतमप्यत्र तीर्थमस्त्यपरं महत्

etattīrthasamaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati pāṇḍavaiḥ kṛtam apy atra tīrtham asty aparaṁ mahat

इस तीर्थ के समान कोई तीर्थ न कभी हुआ है, न होगा। यहाँ पांडवों द्वारा निर्मित एक और महान तीर्थ भी है।

श्लोक 12 (skanda.3.42.12)

यत्रेष्टं धर्मपुत्राद्यैः पांडवैः पंचभिः पुरा । तदेतत्तीर्थमुद्दिश्य भुक्तिमुक्ति फलप्रदम्

yatreṣṭaṁ dharmaputrādyaiḥ pāṇḍavaiḥ pañcabhiḥ purā tad etat tīrtham uddiśya bhuktimuktiphalapradam

जहाँ पूर्वकाल में धर्मराज-पुत्र आदि पाँचों पांडवों ने यज्ञ किया था, वह यह तीर्थ भोग और मोक्ष दोनों फल प्रदान करने वाला है।

श्लोक 13 (skanda.3.42.13)

दशकोटिसहस्राणि तीर्थान्यनुत्तमानि हि । पंचपांडवतीर्थेस्मिन्सान्निध्यं कुर्वते सदा

daśakoṭisahasrāṇi tīrthāny anuttamāni hi pañcapāṇḍavatīrthe'smin sānnidhyaṁ kurvate sadā

दस हज़ार करोड़ अनुत्तम तीर्थ इस पंच-पांडव तीर्थ में सदा सन्निधान करते हैं।

श्लोक 14 (skanda.3.42.14)

आदित्पा वसवो रुद्राः साध्याश्च समरुद्गणाः । पांडवानां महातीर्थे नित्यं सन्निहितास्तथा

ādityā vasavo rudrāḥ sādhyāś ca samarudgaṇāḥ pāṇḍavānāṁ mahātīrthe nityaṁ sannihitās tathā

आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, तथा मरुद्गणों सहित सभी देवता पांडवों के इस महातीर्थ में सदा उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 15 (skanda.3.42.15)

अत्राभिषेकं यः कुर्यात्पितृदेवांश्च तर्पयेत् । सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्म लोके स पूज्यते

atrābhiṣekaṁ yaḥ kuryāt pitṛdevāṁś ca tarpayet sarvapāpavinirmukto brahmaloke sa pūjyate

जो यहाँ अभिषेक करता है और पितरों-देवताओं को तर्पण देता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पूजित होता है।

श्लोक 16 (skanda.3.42.16)

अप्येकं भोजयेद्विप्रमेतत्तीर्थतटेऽमले । तेनासौ कर्मणा त्वत्र परत्रापि च मोदते

apy ekaṁ bhojayed vipram etat tīrthataṭe'male tenāsau karmaṇā tv atra paratrāpi ca modate

इस निर्मल तीर्थ के तट पर एक ही ब्राह्मण को भोजन कराने से, उस कर्म से मनुष्य इस लोक में और परलोक में भी आनंदित होता है।

श्लोक 17 (skanda.3.42.17)

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वाप्यन्य एव वा । अस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा वियोनिं न प्रयाति वै

brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdro vāpy anya eva vā asmiṁs tīrthavare snātvā viyoniṁ na prayāti vai

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अथवा कोई अन्य भी हो, इस श्रेष्ठ तीर्थ में स्नान करके निकृष्ट योनि को नहीं प्राप्त होता।

श्लोक 18 (skanda.3.42.18)

पांडवानां महातीर्थे पुण्ययोगेषु यो नरः । स्नायात्स मनुज श्रेष्ठो नरकं नैव पश्यति

pāṇḍavānāṁ mahātīrthe puṇyayogeṣu yo naraḥ snāyāt sa manujaśreṣṭho narakaṁ naiva paśyati

जो मनुष्य पांडवों के इस महातीर्थ में पुण्य योगों पर स्नान करता है, वह श्रेष्ठ पुरुष नरक को कभी नहीं देखता।

श्लोक 19 (skanda.3.42.19)

पांडवानां महातीर्थं सायं प्रातश्च यः स्मरेत् । स स्नातः सर्वतीर्थेषु गंगादिषु न संशयः

pāṇḍavānāṁ mahātīrthaṁ sāyaṁ prātaś ca yaḥ smaret sa snātaḥ sarvatīrtheṣu gaṅgādiṣu na saṁśayaḥ

जो व्यक्ति सायं और प्रातःकाल पांडवों के इस महातीर्थ का स्मरण करता है, वह निःसंदेह गंगा आदि सभी तीर्थों में स्नान का फल पाता है।

श्लोक 20 (skanda.3.42.20)

इंद्रादिदेवता भिश्च यत्रेष्टं दैत्यशांतये । तदन्यद्देवतीर्थाख्यं विद्यते गंधमादने

indrādidevatābhiś ca yatreṣṭaṁ daityaśāntaye tad anyad devatīrthākhyaṁ vidyate gandhamādane

जहाँ इंद्र आदि देवताओं ने दैत्यों की शांति के लिए यज्ञ किया, वह दूसरा देवतीर्थ नामक स्थान गन्धमादन पर्वत पर विद्यमान है।

श्लोक 21 (skanda.3.42.21)

देवतीर्थे नरः स्नात्वा सर्वपापविमोचितः । प्राप्नुयादक्षयाँल्लोकान्सर्व कामसमन्वितान्

devatīrthe naraḥ snātvā sarvapāpavimocitaḥ prāpnuyād akṣayāṁl lokān sarvakāmasamanvitān

देवतीर्थ में स्नान कर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर, सर्व कामनाओं से युक्त अक्षय लोकों को प्राप्त करता है।

श्लोक 22 (skanda.3.42.22)

जन्मप्रभृति यत्पापं स्त्रिया वा पुरुषेण वा । कृतं तद्देवकुंडेस्मिन्स्नानात्सद्यो विनश्यति

janmaprabhṛti yat pāpaṁ striyā vā puruṣeṇa vā kṛtaṁ tad devakuṇḍe'smin snānāt sadyo vinaśyati

जन्म से लेकर जो भी पाप स्त्री अथवा पुरुष के द्वारा किया गया हो, वह इस देवकुंड में स्नान करने से तत्काल नष्ट हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.3.42.23)

यथा सुराणां सर्वेषा मादिर्वै मधुसूदनः । तथादिः सर्वतीर्थानां देवकुंडमनुत्तमम्

yathā surāṇāṁ sarveṣām ādir vai madhusūdanaḥ tathādiḥ sarvatīrthānāṁ devakuṇḍam anuttamam

जैसे समस्त देवताओं में मधुसूदन आदि हैं, वैसे ही समस्त तीर्थों में यह अनुपम देवकुंड आदि है।

श्लोक 24 (skanda.3.42.24)

यस्तु वर्षशतं पूर्णमग्निहोत्रमुपासते । यस्त्वेको देवकुंडेस्मिन्कदाचित्स्नान माचरेत्

yas tu varṣaśataṁ pūrṇam agnihotram upāsate yas tv eko devakuṇḍe'smin kadācit snānam ācaret

जो पूर्ण सौ वर्षों तक अग्निहोत्र की उपासना करता है, और जो एक बार भी इस देवकुंड में स्नान करता है,

श्लोक 25 (skanda.3.42.25)

सममेव तयोः पुण्यं नात्र संदेहकारणम् । दुर्लभं देवतीर्थेस्मिन्दानं वासश्च दुर्लभः

samam eva tayoḥ puṇyaṁ nātra sandehakāraṇam durlabhaṁ devatīrthe'smin dānaṁ vāsaś ca durlabhaḥ

उन दोनों का पुण्य समान ही होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। इस देवतीर्थ में दान करना और निवास करना दोनों दुर्लभ हैं।

श्लोक 26 (skanda.3.42.26)

देवतीर्थाभिगमनं स्नानं चाप्य तिदुर्लभम् । देवतीर्थं समासाद्य देवर्षिपितृसेवितम्

devatīrthābhigamanaṁ snānaṁ cāpy atidurlabham devatīrthaṁ samāsādya devarṣipitṛsevitam

देवतीर्थ में जाना और वहाँ स्नान करना भी अत्यंत दुर्लभ है। देवताओं, ऋषियों, तथा पितरों द्वारा सेवित इस देवतीर्थ को प्राप्त कर,

श्लोक 27 (skanda.3.42.27)

अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति । द्विदिनं त्रिदिनं चापि पंच वाथ षडेव वा

aśvamedham avāpnoti viṣṇulokaṁ ca gacchati dvidinaṁ tridinaṁ cāpi pañca vātha ṣaḍ eva vā

मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है और विष्णुलोक को जाता है। दो दिन, तीन दिन, अथवा पाँच या छह दिन भी,

श्लोक 28 (skanda.3.42.28)

उषित्वा देवकुंडस्थतीरे नरकनाशने । न मातृयोनिमाप्नोति सिद्धिं चाप्नोत्यनुत्तमाम्

uṣitvā devakuṇḍasthatīre narakanāśane na mātṛyonim āpnoti siddhiṁ cāpnoty anuttamām

इस नरक-नाशक देवकुंड के तट पर रहकर, वह पुनः मातृ-गर्भ को प्राप्त नहीं होता, अपितु सर्वोत्तम सिद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 29 (skanda.3.42.29)

त्रिरात्रस्नानतो ह्यत्र वाजपेयफलं भवेत् । देवतीर्थस्मृतेः सद्यः पापेभ्यो मुच्यते नरः

trirātrasnānato hy atra vājapeyaphalaṁ bhavet devatīrthasmṛteḥ sadyaḥ pāpebhyo mucyate naraḥ

यहाँ तीन रात स्नान करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। देवतीर्थ के स्मरण मात्र से मनुष्य तत्काल पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 30 (skanda.3.42.30)

अर्चयित्वा पितॄन्देवानेतत्तीर्थतटे नरः । सर्वकामसमृद्धिः स्यात्सर्वयज्ञफलं लभेत्

arcayitvā pitṝn devān etat tīrthataṭe naraḥ sarvakāmasamṛddhiḥ syāt sarvayajñaphalaṁ labhet

इस तीर्थ के तट पर पितरों और देवताओं की पूजा कर मनुष्य समस्त कामनाओं से समृद्ध होता है और समस्त यज्ञों का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 31 (skanda.3.42.31)

एतत्तीर्थसमं पुण्यं न भूतं न भविष्यति । तस्मादवश्यं स्नातव्यं देवतीर्थे मुमुक्षुभिः

etattīrthasamaṁ puṇyaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati tasmād avaśyaṁ snātavyaṁ devatīrthe mumukṣubhiḥ

इस तीर्थ के समान पुण्य न कभी हुआ है, न होगा। अतः मुमुक्षुओं को अवश्य ही देवतीर्थ में स्नान करना चाहिए।

श्लोक 32 (skanda.3.42.32)

ऐहिकामुष्मिकफलप्राप्तिकामैश्च मानवैः । देवतीर्थस्य माहात्म्यं संक्षिप्य कथितं द्विजाः

aihikāmuṣmikaphalaprāptikāmaiś ca mānavaiḥ devatīrthasya māhātmyaṁ saṅkṣipya kathitaṁ dvijāḥ

इस लोक और परलोक दोनों के फल की कामना करने वाले मनुष्यों के लिए। हे द्विजो! मैंने देवतीर्थ के माहात्म्य को संक्षेप में कहा है।

श्लोक 33 (skanda.3.42.33)

विस्तरेणास्य माहात्म्यं मया वक्तुं न पार्य्यते । सुग्रीवतीर्थं वक्ष्यामि रामसेतौ विमुक्तिदे

vistareṇāsya māhātmyaṁ mayā vaktuṁ na pāryate sugrīvatīrthaṁ vakṣyāmi rāmasetau vimuktide

इसका माहात्म्य विस्तार से कहना मेरे लिए संभव नहीं है। अब मुक्तिदायक रामसेतु में स्थित सुग्रीव तीर्थ का वर्णन करूँगा।

श्लोक 34 (skanda.3.42.34)

अत्र स्नात्वा नरो भक्त्या सूर्यलोकं समश्नुते । सुग्रीवतीर्थे स्नानेन हयमेधफलं भवेत्

atra snātvā naro bhaktyā sūryalokaṁ samaśnute sugrīvatīrthe snānena hayamedhaphalaṁ bhavet

यहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य सूर्यलोक को प्राप्त करता है। सुग्रीव तीर्थ में स्नान करने से अश्वमेध का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 35 (skanda.3.42.35)

ब्रह्महत्यादि पापानां निष्कृतिश्चापि जायते । सुग्रीवतीर्थगमनाद्गोसहस्रफलं लभेत्

brahmahatyādi pāpānāṁ niṣkṛtiś cāpi jāyate sugrīvatīrthagamanād gosahasraphalaṁ labhet

ब्रह्महत्या आदि पापों का प्रायश्चित्त भी हो जाता है। सुग्रीव तीर्थ में जाने मात्र से सहस्र गौ-दान का फल मिलता है।

श्लोक 36 (skanda.3.42.36)

स्मरणात्तस्य वेदानां पारायणफलं लभेत् । दिनोपवासमात्रेण तस्य तीर्थस्य तीरतः

smaraṇāt tasya vedānāṁ pārāyaṇaphalaṁ labhet dinopavāsamātreṇa tasya tīrthasya tīrataḥ

उसके स्मरण मात्र से वेदों के पारायण का फल मिलता है। उस तीर्थ के तट पर मात्र एक दिन के उपवास से,

श्लोक 37 (skanda.3.42.37)

महापात कनाशः स्यात्प्रायश्चित्तं विना द्विजाः । तत्राभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवांश्च तर्पयेत्

mahāpātakanāśaḥ syāt prāyaścittaṁ vinā dvijāḥ tatrābhiṣekaṁ kurvāṇaḥ pitṛdevāṁś ca tarpayet

हे द्विजो! बिना किसी प्रायश्चित्त के महापातकों का नाश हो जाता है। वहाँ अभिषेक करते हुए जो पितरों और देवताओं को तर्पण देता है,

श्लोक 38 (skanda.3.42.38)

आप्तोर्यामस्य यज्ञस्य फलमष्टगुणं भवेत् । सुग्रीवतीर्थस्नानेन नरमेधफलं लभेत

āptoryāmasya yajñasya phalam aṣṭaguṇaṁ bhavet sugrīvatīrthasnānena naramedhaphalaṁ labhet

उसे आप्तोर्याम यज्ञ के फल का आठ गुना प्राप्त होता है। सुग्रीव तीर्थ में स्नान करने से नरमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 39 (skanda.3.42.39)

सुग्रीवतीर्थस्नानेन नरो जातिस्मरो भवेत् । सुग्रीवतीर्थं भो विप्राः प्रयाताभीष्टसिद्धये

sugrīvatīrthasnānena naro jātismaro bhavet sugrīvatīrthaṁ bho viprāḥ prayātābhīṣṭasiddhaye

सुग्रीव तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य को पूर्वजन्मों का स्मरण हो जाता है। हे विप्रो! अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए सुग्रीव तीर्थ को अवश्य जाओ।

श्लोक 40 (skanda.3.42.40)

सुग्रीवतीर्थमा हात्म्यमेवं वः कथितं द्विजाः । वैभवं नलतीर्थस्य त्विदानीं प्रब्रवीमि वः

sugrīvatīrthamāhātmyam evaṁ vaḥ kathitaṁ dvijāḥ vaibhavaṁ nalatīrthasya tv idānīṁ prabravīmi vaḥ

हे द्विजो! इस प्रकार मैंने तुम्हें सुग्रीव तीर्थ का माहात्म्य कहा। अब मैं तुम्हें नल तीर्थ के वैभव के बारे में बताता हूँ।

श्लोक 41 (skanda.3.42.41)

नलतीर्थे नरः स्नानात्स्वर्गलोकं समश्नुते । नलतीर्थे सकृत्सनानात्सर्वपापाविमोचितः

nalatīrthe naraḥ snānāt svargalokaṁ samaśnute nalatīrthe sakṛt snānāt sarvapāpair vimocitaḥ

नल तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य स्वर्गलोक को प्राप्त करता है। नल तीर्थ में एक बार स्नान करने से ही वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 42 (skanda.3.42.42)

अग्निष्टोमातिरात्रादिफलमाप्नोत्यनुत्तमम् । त्रिरात्रमुषितस्तस्मिंस्तर्पयन्पितृदेवताः

agniṣṭomātirātrādiphalam āpnoty anuttamam trirātram uṣitas tasmin tarpayan pitṛdevatāḥ

वह अग्निष्टोम और अतिरात्र आदि यज्ञों के सर्वोत्तम फल को प्राप्त करता है। वहाँ तीन रात रहकर पितरों और देवताओं को तर्पण देते हुए,

श्लोक 43 (skanda.3.42.43)

सूर्यवद्भासते विप्रा वाजिमेधफलं लभेत् । नीलतीर्थं प्रवक्ष्यामि महापातकनाशनम्

sūryavad bhāsate viprā vājimedhaphalaṁ labhet nīlatīrthaṁ pravakṣyāmi mahāpātakanāśanam

हे विप्रो! वह सूर्य के समान तेजस्वी होता है और अश्वमेध का फल प्राप्त करता है। अब मैं महापातकों का नाश करने वाले नील तीर्थ का वर्णन करूँगा।

श्लोक 44 (skanda.3.42.44)

अग्निपुत्रेण नीलेन कृतं सेतौ विमुक्तिदम् । नीलतीर्थे नरः स्नानात्सर्वपापविमोचितः

agniputreṇa nīlena kṛtaṁ setau vimuktidam nīlatīrthe naraḥ snānāt sarvapāpavimocitaḥ

अग्निपुत्र नील द्वारा सेतु में निर्मित यह मुक्तिदायक तीर्थ है। नील तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 45 (skanda.3.42.45)

बहुवर्ण्यस्य यागस्य फलं शतगुणं लभेत् । नीलतीर्थे नरः स्नात्वा सर्वा भीष्टप्रदायिनि

bahuvarṇyasya yāgasya phalaṁ śataguṇaṁ labhet nīlatīrthe naraḥ snātvā sarvābhīṣṭapradāyini

उसे बहुवर्ण्य यज्ञ के फल का सौ गुना प्राप्त होता है। सर्वाभीष्ट प्रदान करने वाले नील तीर्थ में स्नान कर मनुष्य,

श्लोक 46 (skanda.3.42.46)

अग्निलोकमवाप्नोति सर्वकामसमृद्धिमान् । गवाक्षेण कृतं तीर्थं गंधमादनपर्वते

agnilokam avāpnoti sarvakāmasamṛddhimān gavākṣeṇa kṛtaṁ tīrthaṁ gandhamādanaparvate

समस्त कामनाओं से समृद्ध होकर अग्निलोक को प्राप्त करता है। गन्धमादन पर्वत पर गवाक्ष द्वारा निर्मित एक तीर्थ है।

श्लोक 47 (skanda.3.42.47)

विद्यते स्नानमात्रेण नरकं नैव याति सः । अगदेन कृतं तीर्थमस्ति सेतौ विमुक्तिदे

vidyate snānamātreṇa narakaṁ naiva yāti saḥ agadena kṛtaṁ tīrtham asti setau vimuktide

यहाँ स्नान करने मात्र से वह नरक को कभी नहीं जाता। सेतु में अगद द्वारा निर्मित एक मुक्तिदायक तीर्थ भी है।

श्लोक 48 (skanda.3.42.48)

अत्र स्नानेन मनुजो देवेंद्रत्वं समश्नुते । गजेन गवयेनात्र शरभेण महौजसा

atra snānena manujo devendratvaṁ samaśnute gajena gavayenātra śarabheṇa mahaujasā

यहाँ स्नान करने से मनुष्य इंद्रत्व को प्राप्त करता है। गज, गवय, तथा महातेजस्वी शरभ के द्वारा,

श्लोक 49 (skanda.3.42.49)

कुमुदेन हरेणापि पनसेन बलीयसा । कृतानि यानि तीर्थानि तथाऽन्यैः सर्ववानरैः

kumudena hareṇāpi panasena balīyasā kṛtāni yāni tīrthāni tathā'nyaiḥ sarvavānaraiḥ

कुमुद, हर, तथा बलशाली पनस के द्वारा, और अन्य समस्त वानरों के द्वारा भी जो तीर्थ निर्मित किए गए हैं,

श्लोक 50 (skanda.3.42.50)

रामसेतौ महापुण्ये गन्धमादनपर्वते । तेषु तीर्थेषु यः स्नाति सोऽमृतत्वं समश्नुते

rāmasetau mahāpuṇye gandhamādanaparvate teṣu tīrtheṣu yaḥ snāti so'mṛtatvaṁ samaśnute

उस अत्यंत पुण्यमय रामसेतु में, गन्धमादन पर्वत पर, उन तीर्थों में जो स्नान करता है, वह अमरत्व को प्राप्त करता है।

श्लोक 51 (skanda.3.42.51)

विभीषणकृतं तीर्थमस्ति पापविमोचनम् । महादुःखप्रशमनं महारोगनिबर्हणम्

vibhīṣaṇakṛtaṁ tīrtham asti pāpavimocanam mahāduḥkhapraśamanaṁ mahāroganibarhaṇam

विभीषण द्वारा निर्मित एक तीर्थ है, जो पाप से मुक्ति देने वाला, महान दुःख को शांत करने वाला, तथा महान रोगों को नष्ट करने वाला है।

श्लोक 52 (skanda.3.42.52)

महापातकसंघानामनलोपममुत्तमम् । कुंभीपाकादिनरकक्लेशनाशनकारणम्

mahāpātakasaṅghānām analopamam uttamam kumbhīpākādinarakakleśanāśanakāraṇam

यह महापातकों के समूहों के लिए अग्नि के समान है और यह कुम्भीपाक आदि नरकों की पीड़ा का नाशक कारण है।

श्लोक 53 (skanda.3.42.53)

दुःस्वप्र नाशनं धन्यं महादारिद्र्यबाधनम् । तत्र यो मनुजः स्नायात्तस्य नास्तीह पातकम्

duḥsvapnanāśanaṁ dhanyaṁ mahādāridryabādhanam tatra yo manujaḥ snāyāt tasya nāstīha pātakam

यह दुःस्वप्नों का नाशक, धन्य, तथा महान दरिद्रता को दूर करने वाला है। जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है, उसका यहाँ कोई पाप शेष नहीं रहता।

श्लोक 54 (skanda.3.42.54)

स वैकुंठमवाप्नोति पुनरावृत्तिवर्जितम् । विभीषणस्य सचिवैः कृतं तीर्थचतुष्टयम्

sa vaikuṇṭham avāpnoti punarāvṛttivarjitam vibhīṣaṇasya sacivaiḥ kṛtaṁ tīrthacatuṣṭayam

वह पुनरावृत्ति से रहित वैकुंठ को प्राप्त करता है। विभीषण के मंत्रियों द्वारा चार तीर्थ भी निर्मित किए गए हैं।

श्लोक 55 (skanda.3.42.55)

तत्र स्नानेन मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते । सरयूश्च नदी विप्रा गंधमादनपर्वते

tatra snānena manujaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate sarayūś ca nadī viprā gandhamādanaparvate

वहाँ स्नान करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। हे विप्रो! सरयू नदी भी गन्धमादन पर्वत पर विद्यमान है,

श्लोक 56 (skanda.3.42.56)

रामनाथं महादेवं सेवितुं वर्तते सदा । तत्र स्नात्वा नराः सर्वे सर्वपातकवर्जिताः

rāmanāthaṁ mahādevaṁ sevituṁ vartate sadā tatra snātvā narāḥ sarve sarvapātakavarjitāḥ

जो महादेव रामनाथ की सेवा के लिए सदा वहाँ रहती है। वहाँ स्नान करके सभी मनुष्य समस्त पापों से रहित हो जाते हैं,

श्लोक 57 (skanda.3.42.57)

सर्वयज्ञतपस्तीर्थसेवाफलमवाप्नुयुः । दशकोटिसहस्राणि तीर्थानि द्विजसत्तमाः

sarvayajñatapastīrthasevāphalam avāpnuyuḥ daśakoṭisahasrāṇi tīrthāni dvijasattamāḥ

समस्त यज्ञों, तपस्याओं, तथा तीर्थ-सेवाओं का फल प्राप्त करते हैं। हे द्विजसत्तमो! दस हज़ार करोड़ तीर्थ,

श्लोक 58 (skanda.3.42.58)

वसंत्यस्मिन्महापुण्ये गन्धमादनपर्वते । गंगाद्याः सरितः सर्वास्तथा वै सप्तसागराः

vasanty asmin mahāpuṇye gandhamādanaparvate gaṅgādyāḥ saritaḥ sarvās tathā vai saptasāgarāḥ

इस महान पुण्यमय गन्धमादन पर्वत पर निवास करते हैं। गंगा आदि समस्त नदियाँ, तथा सातों समुद्र भी,

श्लोक 59 (skanda.3.42.59)

ऋष्याश्रमाणि पुण्यानि तथा पुण्यवनानि च । अनुत्तमानि क्षेत्राणि हीरशंकरयोस्तथा

ṛṣyāśramāṇi puṇyāni tathā puṇyavanāni ca anuttamāni kṣetrāṇi hariśaṅkarayos tathā

ऋषियों के पुण्य आश्रम, पुण्य वन, तथा हरि और शंकर के अनुपम क्षेत्र भी,

श्लोक 60 (skanda.3.42.60)

सान्निध्यं कुर्वते नित्यं गन्धमादनपर्वते । उपवीतांतरं तीर्थं प्रोक्तवांश्चतुराननः

sānnidhyaṁ kurvate nityaṁ gandhamādanaparvate upavītāntaraṁ tīrthaṁ proktavāṁś caturānanaḥ

गन्धमादन पर्वत पर सदा उपस्थित रहते हैं। उपवीतांतर नामक तीर्थ को स्वयं चतुरानन ब्रह्मा ने कहा है।

श्लोक 61 (skanda.3.42.61)

त्रयस्त्रिंशत्कोट्योऽत्र देवाः पितृगणैः सह । सर्वैश्च मुनिभिः सार्द्धं यक्षैः सिद्धैश्च किन्नरैः । वसंति सेतौ देवस्य रामच न्द्रस्य चाज्ञया

trayastriṁśatkoṭyo'tra devāḥ pitṛgaṇaiḥ saha sarvaiś ca munibhiḥ sārdhaṁ yakṣaiḥ siddhaiś ca kinnaraiḥ vasanti setau devasya rāmacandrasya cājñayā

यहाँ तैंतीस करोड़ देवता, पितृगणों सहित, समस्त मुनियों के साथ, तथा यक्षों, सिद्धों, और किन्नरों सहित, देव रामचंद्र की आज्ञा से सेतु में निवास करते हैं।

श्लोक 62 (skanda.3.42.62)

श्रीसूत उवाच । एवमुक्तं द्विजश्रेष्ठा तीर्थानां वैभवं मया

śrīsūta uvāca evam uktaṁ dvijaśreṣṭhā tīrthānāṁ vaibhavaṁ mayā

श्री सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो! इस प्रकार मैंने तुम्हें इन तीर्थों का वैभव कहा।

श्लोक 63 (skanda.3.42.63)

इदं पठन्वा शृण्वन्वा दुःखसंघाद्विमुच्यते । कैवल्यं च समाप्नोति पुनरावृत्तिवर्जितम्

idaṁ paṭhan vā śṛṇvan vā duḥkhasaṅghād vimucyate kaivalyaṁ ca samāpnoti punarāvṛttivarjitam

इसे पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य दुःखों के समूह से मुक्त हो जाता है और पुनरावृत्ति-रहित कैवल्य को प्राप्त करता है।

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