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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 43

रामनाथ की प्रशंसा का वर्णन

अध्याय 42अध्याय-सूचीअध्याय 44

श्लोक 1 (skanda.3.43.1)

श्रीसूत उवाच । अथेदानीं प्रवक्ष्यामि रामनाथस्य वैभवम् । यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवो भुवि

śrīsūta uvāca athedānīṁ pravakṣyāmi rāmanāthasya vaibhavam yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate mānavo bhuvi

श्री सूत जी ने कहा — अब मैं रामनाथ के वैभव का वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर मनुष्य इस भूतल पर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.3.43.2)

रामप्रतिष्ठितं लिंगं यः पश्यति नरः सकृत् । स नरो मुक्तिमाप्नोति शिवसायुज्यरूपिणीम्

rāmapratiṣṭhitaṁ liṅgaṁ yaḥ paśyati naraḥ sakṛt sa naro muktim āpnoti śivasāyujyarūpiṇīm

जो मनुष्य राम द्वारा प्रतिष्ठित लिंग को एक बार भी देखता है, वह शिव-सायुज्य रूप मुक्ति को प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (skanda.3.43.3)

दशवर्षैस्तु यत्पुण्यं क्रियते तु कृते युगे । त्रेतायामेकवर्षेण तत्पुण्यं साध्यते नृभिः

daśavarṣais tu yat puṇyaṁ kriyate tu kṛte yuge tretāyām ekavarṣeṇa tat puṇyaṁ sādhyate nṛbhiḥ

सत्ययुग में जो पुण्य दस वर्षों में अर्जित होता है, त्रेतायुग में मनुष्य उसे एक वर्ष में प्राप्त कर लेते हैं।

श्लोक 4 (skanda.3.43.4)

द्वापरे तच्च मासेन तद्दिनेन कलौ युगे । तत्फलं कोटिगुणितं निमिषे निमिषे नृणाम्

dvāpare tac ca māsena taddinena kalau yuge tatphalaṁ koṭiguṇitaṁ nimiṣe nimiṣe nṛṇām

द्वापर में वही एक मास में, और कलियुग में एक दिन में मिलता है। परंतु रामनाथ के दर्शन से मनुष्यों को प्रत्येक निमेष में वह फल करोड़ गुना मिलता है।

श्लोक 5 (skanda.3.43.5)

निःसंदेहं भवेदेवं रामनाथविलोकिनाम् । रामेश्वर महालिंगे तीर्थानि सकलान्यपि

niḥsandehaṁ bhaved evaṁ rāmanāthavilokinām rāmeśvara mahāliṅge tīrthāni sakalāny api

यह निःसंदेह रामनाथ के दर्शन करने वालों को प्राप्त होता है। रामेश्वर महालिंग में समस्त तीर्थ भी विद्यमान हैं,

श्लोक 6 (skanda.3.43.6)

विद्यंते सर्वदेवाश्च मुनयः पितरस्तथा । एककालद्विकालं वा त्रिकालं सर्वदैव वा

vidyante sarvadevāś ca munayaḥ pitaras tathā ekakāladvikālaṁ vā trikālaṁ sarvadaiva vā

समस्त देवता, मुनि, तथा पितर भी वहाँ विद्यमान हैं। जो एक बार, दो बार, तीन बार, अथवा सदैव

श्लोक 7 (skanda.3.43.7)

ये स्मरंति महादेवं रामनाथं विमुक्तिदम् । कीर्तयंत्यथवा विप्रास्ते विमुक्ताघपंजराः

ye smaranti mahādevaṁ rāmanāthaṁ vimuktidam kīrtayanty athavā viprās te vimuktāghapañjarāḥ

मुक्तिदायक महादेव रामनाथ का स्मरण करते हैं, अथवा हे विप्रो, उनका कीर्तन करते हैं, वे पाप के पिंजरे से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 8 (skanda.3.43.8)

सच्चिदानंदमद्वैतं सांबं रुद्रं प्रयांति वै । रामेश्वराख्यं यल्लिंगं रामचन्द्रेण पूजि तम्

saccidānandam advaitaṁ sāmbaṁ rudraṁ prayānti vai rāmeśvarākhyaṁ yal liṅgaṁ rāmacandreṇa pūjitam

वे सत्-चित्-आनंद रूप, अद्वैत, पार्वती सहित रुद्र को प्राप्त होते हैं। रामेश्वर नामक जो लिंग रामचंद्र द्वारा पूजित है,

श्लोक 9 (skanda.3.43.9)

यस्य स्मरणमात्रेण यमपीडापि नो भवेत् । रामेश्वरमहालिंगं येऽर्चयंति सकृन्नराः

yasya smaraṇamātreṇa yamapīḍāpi no bhavet rāmeśvaramahāliṅgaṁ ye'rcayanti sakṛn narāḥ

जिसके स्मरण मात्र से यम की पीड़ा भी नहीं होती। जो मनुष्य रामेश्वर महालिंग की एक बार भी पूजा करते हैं,

श्लोक 10 (skanda.3.43.10)

न मानुषास्ते विज्ञेयाः किं तु रुद्रा न संशयः । रामेश्वरमहालिंगं नार्चितं येन भक्तितः

na mānuṣās te vijñeyāḥ kiṁ tu rudrā na saṁśayaḥ rāmeśvaramahāliṅgaṁ nārcitaṁ yena bhaktitaḥ

वे मनुष्य नहीं, अपितु निःसंदेह रुद्र ही समझे जाने चाहिए। जिसने भक्तिपूर्वक रामेश्वर महालिंग की पूजा नहीं की,

श्लोक 11 (skanda.3.43.11)

चिरकालं स संसारे संसरेद्दुःखसंकुले । रामेश्वरमहालिंगं ये पश्यंति सकृन्नराः

cirakālaṁ sa saṁsāre saṁsared duḥkhasaṅkule rāmeśvaramahāliṅgaṁ ye paśyanti sakṛn narāḥ

वह दुःखों से भरे संसार में दीर्घकाल तक भटकता रहता है। जो मनुष्य रामेश्वर महालिंग को एक बार भी देखते हैं,

श्लोक 12 (skanda.3.43.12)

किं दानैः किं व्रतैस्तेषां किं तपोभिः किमध्वरैः । रामेश्वरमहालिंगं यो न चिंतयति क्षणम्

kiṁ dānaiḥ kiṁ vratais teṣāṁ kiṁ tapobhiḥ kim adhvaraiḥ rāmeśvaramahāliṅgaṁ yo na cintayati kṣaṇam

उनके लिए दान, व्रत, तप, अथवा यज्ञ का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। जो रामेश्वर महालिंग का एक क्षण भी चिंतन नहीं करता,

श्लोक 13 (skanda.3.43.13)

अज्ञानी स च पापी स्यात्स मूको बधिरस्तथा । स जडोंऽधश्च विज्ञेयश्छिद्रं तस्य सदा भवेत्

ajñānī sa ca pāpī syāt sa mūko badhiras tathā sa jaḍo'ndhaś ca vijñeyaś chidraṁ tasya sadā bhavet

वह अज्ञानी और पापी है, वह गूँगा और बहरा है। वह जड़ और अंधा समझा जाना चाहिए, उसमें सदा कोई न कोई छिद्र (दोष) रहता है।

श्लोक 14 (skanda.3.43.14)

धनक्षेत्रसुतादीनां तस्य हानिस्तथा भवेत् । रामेश्वरमहालिंगे सकृद्दृष्टे मुनीश्वराः

dhanakṣetrasutādīnāṁ tasya hānis tathā bhavet rāmeśvaramahāliṅge sakṛd dṛṣṭe munīśvarāḥ

उसे धन, क्षेत्र, पुत्र आदि की हानि भी होती है। हे मुनीश्वरो! रामेश्वर महालिंग का एक बार दर्शन कर लेने पर,

श्लोक 15 (skanda.3.43.15)

किं काश्या गयया किं वा प्रयागेणापि किं फलम् । दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं मानवा यत्र भूतले

kiṁ kāśyā gayayā kiṁ vā prayāgeṇāpi kiṁ phalam durlabhaṁ prāpya mānuṣyaṁ mānavā yatra bhūtale

काशी से क्या, गया से क्या, अथवा प्रयाग से भी क्या फल है? जिस भूतल पर मनुष्य दुर्लभ मनुष्य-जन्म प्राप्त कर,

श्लोक 16 (skanda.3.43.16)

रामनाथमहालिंगं नमस्यंत्यर्चयंति च । जन्म तेषां हि सफलं ते कृतार्थाश्च नेतरे

rāmanāthamahāliṅgaṁ namasyanty arcayanti ca janma teṣāṁ hi saphalaṁ te kṛtārthāś ca netare

रामनाथ महालिंग को नमस्कार करते हैं और पूजा करते हैं, उन्हीं का जन्म सफल है, वे ही कृतार्थ हैं, अन्य नहीं।

श्लोक 17 (skanda.3.43.17)

रामेश्वरमहालिंगे पूजिते वा स्मृतेपि वा । विष्णुना ब्रह्मणा किं वा शक्रेणाप्यखिलामरैः

rāmeśvaramahāliṅge pūjite vā smṛte'pi vā viṣṇunā brahmaṇā kiṁ vā śakreṇāpy akhilāmaraiḥ

रामेश्वर महालिंग की पूजा अथवा स्मरण मात्र हो जाने पर, विष्णु से, ब्रह्मा से, अथवा इंद्र और समस्त देवताओं से भी क्या अधिक फल हो सकता है?

श्लोक 18 (skanda.3.43.18)

रामनाथमहालिंगं भक्तियुक्ताश्च ये नराः । तेषां प्रणामस्मरणपूजायुक्तास्तु ये नराः

rāmanāthamahāliṅgaṁ bhaktiyuktāś ca ye narāḥ teṣāṁ praṇāmasmaraṇapūjāyuktās tu ye narāḥ

जो मनुष्य रामनाथ महालिंग के प्रति भक्तियुक्त हैं, जो प्रणाम, स्मरण, तथा पूजा से युक्त हैं,

श्लोक 19 (skanda.3.43.19)

न ते पश्यंति दुःखानि नैव यांति यमालयम् । ब्रह्महत्यासहस्राणि सुरापानायुतानि च

na te paśyanti duḥkhāni naiva yānti yamālayam brahmahatyāsahasrāṇi surāpānāyutāni ca

वे दुःखों को नहीं देखते और यमलोक को नहीं जाते। सहस्रों ब्रह्महत्याएँ और दस हज़ार सुरापान के पाप,

श्लोक 20 (skanda.3.43.20)

दृष्टे रामेश्वरे देवे विलयं यांति कृत्स्नशः । ये वांछंति सदा भोगं राज्यं च त्रिदशालये

dṛṣṭe rāmeśvare deve vilayaṁ yānti kṛtsnaśaḥ ye vāñchanti sadā bhogaṁ rājyaṁ ca tridaśālaye

देव रामेश्वर के दर्शन होने पर सर्वथा विलीन हो जाते हैं। जो सदा स्वर्गलोक में भोग और राज्य की कामना करते हैं,

श्लोक 21 (skanda.3.43.21)

रामे श्वरमहालिंगं ते नमंतु सकृन्मुदा । यानि कानि च पापानि जन्मकोटिकृतान्यपि

rāmeśvaramahāliṅgaṁ te namantu sakṛn mudā yāni kāni ca pāpāni janmakoṭikṛtāny api

उन्हें आनंदपूर्वक एक बार रामेश्वर महालिंग को नमस्कार करना चाहिए। करोड़ों जन्मों में किए गए जो भी पाप हैं,

श्लोक 22 (skanda.3.43.22)

तानि रामेश्वरे दृष्टे विलयं यांति सर्वदा । संपर्कात्कौतुकाल्लोभाद्भयाद्वापि च संस्मरन्

tāni rāmeśvare dṛṣṭe vilayaṁ yānti sarvadā samparkāt kautukāl lobhād bhayād vāpi ca saṁsmaran

वे रामेश्वर के दर्शन होने पर सदा के लिए विलीन हो जाते हैं। संसर्ग से, कौतूहल से, लोभ से, अथवा भय से भी स्मरण करने वाला,

श्लोक 23 (skanda.3.43.23)

रामेश्वरमहालिंगं नेहामुत्र च दुःखभाक् । रामेश्वरमहालिंगं कीर्तयन्नर्चयन्नपि

rāmeśvaramahāliṅgaṁ nehāmutra ca duḥkhabhāk rāmeśvaramahāliṅgaṁ kīrtayann arcayann api

रामेश्वर महालिंग का स्मरण करने वाला न इस लोक में, न परलोक में दुःख का भागी होता है। रामेश्वर महालिंग का कीर्तन करता हुआ, पूजा करता हुआ भी,

श्लोक 24 (skanda.3.43.24)

अवश्यं रुद्रसारूप्यं लभते नात्र संशयः । यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते क्षणात्

avaśyaṁ rudrasārūpyaṁ labhate nātra saṁśayaḥ yathaidhāṁsi samiddho'gnir bhasmasāt kurute kṣaṇāt

वह अवश्य ही रुद्र-सारूप्य को प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं। जैसे प्रज्ज्वलित अग्नि क्षणभर में इंधन को भस्म कर देती है,

श्लोक 25 (skanda.3.43.25)

तथा पापानि सर्वाणि रामेश्वरविलोकनात् । रामेश्वरमहालिंगभक्तिरष्टविधा स्मृता

tathā pāpāni sarvāṇi rāmeśvaravilokanāt rāmeśvaramahāliṅgabhaktir aṣṭavidhā smṛtā

वैसे ही रामेश्वर के दर्शन से समस्त पाप भस्म हो जाते हैं। रामेश्वर महालिंग की भक्ति आठ प्रकार की कही गई है —

श्लोक 26 (skanda.3.43.26)

तद्भक्तजनवात्सल्यं तत्पूजापरितोषणम् । स्वयं तत्पूजनं भक्त्या तदर्थे देहचेष्टितम्

tadbhaktajanavātsalyaṁ tatpūjāparitoṣaṇam svayaṁ tatpūjanaṁ bhaktyā tadarthe dehaceṣṭitam

उसके भक्तों के प्रति वात्सल्य, उसकी पूजा से संतोष, भक्तिपूर्वक स्वयं उसकी पूजा करना, तथा उसके लिए शरीर से सेवा करना,

श्लोक 27 (skanda.3.43.27)

तन्माहात्म्यकथानां च श्रवणेष्वादरस्तथा । स्वरनेत्रशरीरेषु विकारस्फुरणं तथा

tanmāhātmyakathānāṁ ca śravaṇeṣv ādaras tathā svaranetraśarīreṣu vikārasphuraṇaṁ tathā

उसकी माहात्म्य-कथाओं को सुनने में आदर, तथा स्वर, नेत्र, और शरीर में विकार का स्फुरण होना,

श्लोक 28 (skanda.3.43.28)

रामेश्वरमहालिंगस्मरणं संततं तथा । रामेश्वरमहालिंगमाश्रित्यैवोपजीवनम्

rāmeśvaramahāliṅgasmaraṇaṁ satataṁ tathā rāmeśvaramahāliṅgam āśrityaivopajīvanam

रामेश्वर महालिंग का निरंतर स्मरण, तथा रामेश्वर महालिंग का ही आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करना —

श्लोक 29 (skanda.3.43.29)

एवमष्टविधा भक्तिर्यस्मिन्म्लेच्छेऽपिविद्यते । स एव मुक्तिक्षेत्राणां दायभाक्परिकीर्त्यते

evam aṣṭavidhā bhaktir yasmin mlecche'pi vidyate sa eva muktikṣetrāṇāṁ dāyabhāk parikīrtyate

— यह आठ प्रकार की भक्ति। जिस म्लेच्छ में भी यह विद्यमान हो, वही मुक्ति-क्षेत्रों का उत्तराधिकारी कहा गया है।

श्लोक 30 (skanda.3.43.30)

भक्त्या त्वनन्यया मुक्तिर्ब्रह्मज्ञानेन निश्चिता । वेदांतशास्त्रश्रवणाद्यतीनामूर्ध्वरेतसाम्

bhaktyā tv ananyayā muktir brahmajñānena niścitā vedāntaśāstraśravaṇād yatīnām ūrdhvaretasām

अनन्य भक्ति से, ब्रह्मज्ञान से, तथा वेदांत-शास्त्र के श्रवण से — उन ऊर्ध्वरेता संन्यासियों की मुक्ति निश्चित होती है।

श्लोक 31 (skanda.3.43.31)

सा च मुक्तिर्विना ज्ञानदर्शनश्रवणोद्भवम् । यत्राश्रमं विना विप्रा विरक्तिं च विना तथा

sā ca muktir vinā jñānadarśanaśravaṇodbhavam yatrāśramaṁ vinā viprā viraktiṁ ca vinā tathā

किंतु वह मुक्ति, जो ज्ञान, दर्शन, और श्रवण से उत्पन्न होती है, वह यहाँ बिना आश्रम के और बिना वैराग्य के भी,

श्लोक 32 (skanda.3.43.32)

सर्वेषां चैव वर्णानामखिलाश्रमिणामपि । रामेश्वरमहालिंगदर्शनादेव केवलात्

sarveṣāṁ caiva varṇānām akhilāśramiṇām api rāmeśvaramahāliṅgadarśanād eva kevalāt

समस्त वर्णों तथा समस्त आश्रमियों को भी, केवल रामेश्वर महालिंग के दर्शन मात्र से,

श्लोक 33 (skanda.3.43.33)

अपुनर्भवदा मुक्तिर्भ विष्यत्यविलंबिता । कृमिकीटाश्च देवाश्च मुनयश्च तपोधनाः

apunarbhavadā muktir bhaviṣyaty avilambitā kṛmikīṭāś ca devāś ca munayaś ca tapodhanāḥ

बिना विलंब के पुनर्जन्म-रहित मुक्ति प्राप्त हो जाती है। कीड़े-मकोड़े, देवता, तथा तपस्वी मुनि —

श्लोक 34 (skanda.3.43.34)

तुल्या रामेश्वरक्षेत्रे रामनाथप्रसादतः । पापं कृतं मयानेकमिति मा क्रियतां भयम्

tulyā rāmeśvarakṣetre rāmanāthaprasādataḥ pāpaṁ kṛtaṁ mayānekam iti mā kriyatāṁ bhayam

रामेश्वर क्षेत्र में रामनाथ की कृपा से सब समान हैं। 'मैंने अनेक पाप किए हैं' — ऐसा भय न किया जाए,

श्लोक 35 (skanda.3.43.35)

मा गर्वः क्रियतां पुण्यं मयाकारीति वा जनैः । रामेश्वरमहालिंगे सांबरुद्रे विलोकिते

mā garvaḥ kriyatāṁ puṇyaṁ mayākārīti vā janaiḥ rāmeśvaramahāliṅge sāmbarudre vilokite

और न ही यह गर्व किया जाए कि 'मैंने पुण्य किया है' — क्योंकि पार्वती सहित रुद्र रूप रामेश्वर महालिंग के दर्शन होने पर,

श्लोक 36 (skanda.3.43.36)

न न्यूना नाधिकाश्च स्युः किं तु सर्वे जनाः समाः । रामेश्वरमहालिंगं यः पश्यति सभक्तिकम्

na nyūnā nādhikāś ca syuḥ kiṁ tu sarve janāḥ samāḥ rāmeśvaramahāliṅgaṁ yaḥ paśyati sabhaktikam

न कोई कम है और न कोई अधिक, अपितु सभी जन समान हैं। जो भक्तिपूर्वक रामेश्वर महालिंग का दर्शन करता है,

श्लोक 37 (skanda.3.43.37)

न तेन तुल्यतामेति चतुर्वेद्यपि भूतले । रामेश्वरमहालिंगे भक्तो यः श्वपचोऽपि सन्

na tena tulyatām eti caturvedy api bhūtale rāmeśvaramahāliṅge bhakto yaḥ śvapaco'pi san

उसकी समता इस भूतल पर चतुर्वेदी भी नहीं कर सकता। रामेश्वर महालिंग का जो भक्त चांडाल भी क्यों न हो,

श्लोक 38 (skanda.3.43.38)

तस्मै दानानि देयानि नान्यस्मै च त्रयीविदे । या गतिर्योगयुक्तानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्

tasmai dānāni deyāni nānyasmai ca trayīvide yā gatir yogayuktānāṁ munīnām ūrdhvaretasām

उसे ही दान देना चाहिए, न कि किसी अन्य त्रिवेदी को भी। योगयुक्त, ऊर्ध्वरेता मुनियों की जो गति होती है,

श्लोक 39 (skanda.3.43.39)

सा गतिः सर्वजंतूनां रामेश्वरविलोकिनाम् । रामनाथशिवक्षेत्रे ये वसंति नरा द्विजाः

sā gatiḥ sarvajantūnāṁ rāmeśvaravilokinām rāmanāthaśivakṣetre ye vasanti narā dvijāḥ

वही गति रामेश्वर के दर्शन करने वाले समस्त प्राणियों को प्राप्त होती है। हे द्विजो! रामनाथ के शिव-क्षेत्र में जो मनुष्य निवास करते हैं,

श्लोक 40 (skanda.3.43.40)

ते सर्वे पञ्चवक्त्राः स्युश्चंद्रालंकृतमस्तकाः । नागाभरणसंयुक्तास्तथैव वृषभध्वजाः

te sarve pañcavaktrāḥ syuś candrālaṅkṛtamastakāḥ nāgābharaṇasaṁyuktās tathaiva vṛṣabhadhvajāḥ

वे सभी पंचमुख, चंद्र से अलंकृत मस्तक वाले, नाग-आभूषणों से युक्त, तथा वृषभ-ध्वज वाले हो जाते हैं।

श्लोक 41 (skanda.3.43.41)

त्रिनेत्रा भस्मदिग्धांगाः कपालाकृतिशेखराः । साक्षात्सांबा महादेवा भवेयुर्नात्र संशयः

trinetrā bhasmadigdhāṅgāḥ kapālākṛtiśekharāḥ sākṣāt sāmbā mahādevā bhaveyur nātra saṁśayaḥ

तीन नेत्रों वाले, भस्म से लिप्त अंगों वाले, कपाल-आकृति से शोभित शिखर वाले — वे साक्षात् पार्वती सहित महादेव हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 42 (skanda.3.43.42)

रामनाथशिवक्षेत्रं ये व्रजंति नरा मुदा । पदेपदेऽश्वमेधानां प्राप्नुयुः सुकृतानि ते

rāmanāthaśivakṣetraṁ ye vrajanti narā mudā pade pade'śvamedhānāṁ prāpnuyuḥ sukṛtāni te

जो मनुष्य आनंदपूर्वक रामनाथ के शिव-क्षेत्र में जाते हैं, वे पग-पग पर अश्वमेध यज्ञों का पुण्य प्राप्त करते हैं।

श्लोक 43 (skanda.3.43.43)

रामसेतुं समाश्रित्य रामनाथस्य तुष्टये । ददाति ग्राममेकं यो ब्राह्मणाय सभक्तिकम्

rāmasetuṁ samāśritya rāmanāthasya tuṣṭaye dadāti grāmam ekaṁ yo brāhmaṇāya sabhaktikam

रामसेतु का आश्रय लेकर, रामनाथ की प्रसन्नता के लिए जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक एक ब्राह्मण को एक गाँव दान करता है,

श्लोक 44 (skanda.3.43.44)

तेन भूः सकला दत्ता सशैलवनकानना । पत्रं पुष्पं फलं तोयं रामनाथाय यो नरः

tena bhūḥ sakalā dattā saśailavanakānanā patraṁ puṣpaṁ phalaṁ toyaṁ rāmanāthāya yo naraḥ

उसके द्वारा पर्वत, वन, तथा कानन सहित समस्त पृथ्वी दान की गई मानी जाती है। जो मनुष्य रामनाथ को पत्र, पुष्प, फल, अथवा जल

श्लोक 45 (skanda.3.43.45)

भक्त्या ददाति तं रक्षेद्रामनाथो ह्यहर्निशम् । रामनाथमहालिंगे सांबे कारुणिके शिवे

bhaktyā dadāti taṁ rakṣed rāmanātho hy aharniśam rāmanāthamahāliṅge sāmbe kāruṇike śive

भक्तिपूर्वक देता है, उसकी रामनाथ रात-दिन रक्षा करते हैं। पार्वती सहित करुणानिधि शिव रूप रामनाथ महालिंग में,

श्लोक 46 (skanda.3.43.46)

अत्यंतदुर्लभा भक्तिस्तत्पूजाप्यतिदुर्लभा । स्तोत्रं च दुर्लभं प्रोक्तं स्मरणं चातिदुर्लभम्

atyantadurlabhā bhaktis tatpūjāpy atidurlabhā stotraṁ ca durlabhaṁ proktaṁ smaraṇaṁ cātidurlabham

भक्ति अत्यंत दुर्लभ है, और उसकी पूजा भी अत्यंत दुर्लभ है। उसका स्तोत्र दुर्लभ कहा गया है, और उसका स्मरण भी अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 47 (skanda.3.43.47)

रामनाथेश्वरं लिंगं महादेवं त्रिलोचनम् । शरणं ये प्रपद्यंते भक्तियुक्तेन चेतसा

rāmanātheśvaraṁ liṅgaṁ mahādevaṁ trilocanam śaraṇaṁ ye prapadyante bhaktiyuktena cetasā

त्रिनेत्र महादेव, रामनाथेश्वर लिंग की, जो भक्तियुक्त चित्त से शरण ग्रहण करते हैं,

श्लोक 48 (skanda.3.43.48)

लाभस्तेषां जयस्तेषा मिह लोके परत्र च । रामनाथमहालिंगविषया यस्य शेमुषी

lābhas teṣāṁ jayas teṣām iha loke paratra ca rāmanāthamahāliṅgaviṣayā yasya śemuṣī

उन्हें इस लोक और परलोक दोनों में लाभ और विजय प्राप्त होती है। जिसकी बुद्धि रामनाथ महालिंग विषयक होती है,

श्लोक 49 (skanda.3.43.49)

दिवारात्रं च भवति स वै धन्यतरो भुवि । रामनाथेश्वरं लिंगं यो न पूजयते शिवम्

divārātraṁ ca bhavati sa vai dhanyataro bhuvi rāmanātheśvaraṁ liṅgaṁ yo na pūjayate śivam

दिन और रात, वह पृथ्वी पर अत्यंत धन्य होता है। जो शिव रूप रामनाथेश्वर लिंग की पूजा नहीं करता,

श्लोक 50 (skanda.3.43.50)

नायं भुक्तेश्च मुक्तेश्च राज्यानामपि भाजनम् । रामेश्वरमहालिंगं यः पूजयति भक्तितः

nāyaṁ bhukteś ca mukteś ca rājyānām api bhājanam rāmeśvaramahāliṅgaṁ yaḥ pūjayati bhaktitaḥ

वह न भोग का, न मुक्ति का, न राज्य का भी पात्र होता है। जो भक्तिपूर्वक रामेश्वर महालिंग की पूजा करता है,

श्लोक 51 (skanda.3.43.51)

भुक्तिमुक्त्योश्च राज्यानामसौ परमभाजनम् । रामनाथार्चनसमं नाधिकं पुण्यमस्ति वै

bhuktimuktyoś ca rājyānām asau paramabhājanam rāmanāthārcanasamaṁ nādhikaṁ puṇyam asti vai

वह भोग, मुक्ति, तथा राज्य — सभी का सर्वोत्तम पात्र होता है। रामनाथ की पूजा के समान अधिक पुण्य कुछ भी नहीं है।

श्लोक 52 (skanda.3.43.52)

रामनाथेश्वरं लिंगं द्वेष्टि यो मोहमास्थितः । ब्रह्महत्यायुतं तेन कृतं नरककारणम्

rāmanātheśvaraṁ liṅgaṁ dveṣṭi yo mohamāsthitaḥ brahmahatyāyutaṁ tena kṛtaṁ narakakāraṇam

जो मोहग्रस्त होकर रामनाथेश्वर लिंग से द्वेष करता है, उसके द्वारा दस हज़ार ब्रह्महत्याएँ की गई मानी जाती हैं, जो नरक का कारण हैं।

श्लोक 53 (skanda.3.43.53)

तत्संभाषणमात्रेण मानवो नरकं व्रजेत् । रामनाथपरा देवा रामनाथपरा मखाः

tatsambhāṣaṇamātreṇa mānavo narakaṁ vrajet rāmanāthaparā devā rāmanāthaparā makhāḥ

उससे बात करने मात्र से भी मनुष्य नरक को जाता है। देवता रामनाथ में परायण हैं, यज्ञ भी रामनाथ में परायण हैं,

श्लोक 54 (skanda.3.43.54)

रामनाथपराः सर्वे तस्माद न्यन्न विद्यते । अतः सर्वं परित्यज्य रामनाथं समाश्रयेत्

rāmanāthaparāḥ sarve tasmād anyan na vidyate ataḥ sarvaṁ parityajya rāmanāthaṁ samāśrayet

सब कुछ रामनाथ में परायण है, उससे परे और कुछ भी विद्यमान नहीं है। अतः सब कुछ त्याग कर रामनाथ का ही आश्रय लेना चाहिए।

श्लोक 55 (skanda.3.43.55)

रामनाथमहालिंगं शरणं याति चेन्नरः । दौर्मत्यं तस्य नास्त्येव शिवलोकं च यास्यति

rāmanāthamahāliṅgaṁ śaraṇaṁ yāti cen naraḥ daurmatyaṁ tasya nāsty eva śivalokaṁ ca yāsyati

यदि मनुष्य रामनाथ महालिंग की शरण में जाता है, तो उसमें दुर्बुद्धि कभी नहीं रहती, और वह शिवलोक को जाता है।

श्लोक 56 (skanda.3.43.56)

सर्वयज्ञतपोदानतीर्थस्नानेषु यत्फलम् । तत्फलं कोटिगुणितं रामनाथस्य सेवया

sarvayajñatapodānatīrthasnāneṣu yat phalam tat phalaṁ koṭiguṇitaṁ rāmanāthasya sevayā

समस्त यज्ञों, तपस्याओं, दानों, तथा तीर्थ-स्नानों में जो फल है, वह फल रामनाथ की सेवा से करोड़ गुना प्राप्त होता है।

श्लोक 57 (skanda.3.43.57)

रामनाथेश्वरं लिंगं चिंतयन्घटिका द्वयम् । कुलैकवंशमुद्धृत्य शिवलोके महीयते

rāmanātheśvaraṁ liṅgaṁ cintayan ghaṭikā dvayam kulaikavaṁśam uddhṛtya śivaloke mahīyate

दो घड़ी तक रामनाथेश्वर लिंग का चिंतन करने वाला, अपने एक कुल-वंश का उद्धार कर, शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 58 (skanda.3.43.58)

दिनमेकं तु यः पश्येद्रामनाथं महेश्वरम् । इहैव धनवान्भूत्वा सोंऽते रुद्रश्च जायते

dinam ekaṁ tu yaḥ paśyed rāmanāthaṁ maheśvaram ihaiva dhanavān bhūtvā so'nte rudraś ca jāyate

जो एक दिन तक महेश्वर रामनाथ का दर्शन करता है, वह यहीं धनवान होकर अंत में रुद्र-रूप को प्राप्त होता है।

श्लोक 59 (skanda.3.43.59)

यः स्मरेत्प्रातरुत्थाय रामनाथं महेश्वरम् । अनेनैव शरीरेण स शिवो वर्तते भुवि

yaḥ smaret prātar utthāya rāmanāthaṁ maheśvaram anenaiva śarīreṇa sa śivo vartate bhuvi

जो प्रातःकाल उठकर महेश्वर रामनाथ का स्मरण करता है, वह इसी शरीर से पृथ्वी पर शिव-स्वरूप होकर विचरता है।

श्लोक 60 (skanda.3.43.60)

रामनाथमहालिंगद्रष्टुर्दर्शनमात्रतः । अन्येषां प्राणिनां पापं तत्क्षणादेव नश्यति

rāmanāthamahāliṅgadraṣṭur darśanamātrataḥ anyeṣāṁ prāṇināṁ pāpaṁ tatkṣaṇād eva naśyati

रामनाथ महालिंग के दर्शन करने वाले व्यक्ति के दर्शन मात्र से भी अन्य प्राणियों का पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है।

श्लोक 61 (skanda.3.43.61)

रामनाथेश्वरं लिंगं मध्याह्ने यस्तु पश्यति । सुरापानसहस्राणि तस्य नश्यंति तत्क्षणात्

rāmanātheśvaraṁ liṅgaṁ madhyāhne yas tu paśyati surāpānasahasrāṇi tasya naśyanti tatkṣaṇāt

जो दोपहर के समय रामनाथेश्वर लिंग का दर्शन करता है, उसके सहस्रों सुरापान के पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 62 (skanda.3.43.62)

सायंकाले पश्यति यो रामनाथं सभक्तिकम् । गुरुस्त्रीगमनोत्पन्नपातकं तस्य नश्यति

sāyaṅkāle paśyati yo rāmanāthaṁ sabhaktikam gurustrīgamanotpannapātakaṁ tasya naśyati

जो सायंकाल भक्तिपूर्वक रामनाथ का दर्शन करता है, उसका गुरुपत्नीगमन से उत्पन्न पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 63 (skanda.3.43.63)

सायंकाले महास्तोत्रैः स्तौति रामेश्वरं तु यः । स्वर्णस्तेयसहस्राणि तस्य नश्यंति तत्क्षणात्

sāyaṅkāle mahāstotraiḥ stauti rāmeśvaraṁ tu yaḥ svarṇasteyasahasrāṇi tasya naśyanti tatkṣaṇāt

जो सायंकाल महान स्तोत्रों से रामेश्वर की स्तुति करता है, उसके सहस्रों स्वर्ण-चोरी के पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 64 (skanda.3.43.64)

स्नानं च धनुषः कोटौ रामनाथस्य दर्शनम् । इति लभ्येत वै पुंसां किं गंगाजलसेवया

snānaṁ ca dhanuṣaḥ koṭau rāmanāthasya darśanam iti labhyeta vai puṁsāṁ kiṁ gaṅgājalasevayā

धनुष्कोटि में स्नान और रामनाथ का दर्शन — यह जब मनुष्यों को प्राप्त हो जाता है, तब गंगाजल की सेवा से क्या और आवश्यकता?

श्लोक 65 (skanda.3.43.65)

रामनाथमहालिंगसेवया यन्न लभ्यते । तदन्यद्धर्मजालेन नैव लभ्येत कर्हिचित्

rāmanāthamahāliṅgasevayā yan na labhyate tad anyad dharmajālena naiva labhyeta karhicit

जो सेवा रामनाथ महालिंग की सेवा से प्राप्त नहीं होता, वह अन्य किसी धर्म-जाल से भी कभी प्राप्त नहीं हो सकता।

श्लोक 66 (skanda.3.43.66)

रामनाथं महालिगं यः कदापि न पश्यति । संकरः स तु विज्ञेयो न पितुर्बीजसंभवः

rāmanāthaṁ mahāliṅgaṁ yaḥ kadāpi na paśyati saṅkaraḥ sa tu vijñeyo na pitur bījasambhavaḥ

जो कभी भी रामनाथ महालिंग का दर्शन नहीं करता, उसे संकर (वर्णसंकर) समझना चाहिए, वह अपने पिता के बीज से उत्पन्न नहीं समझा जाता।

श्लोक 67 (skanda.3.43.67)

रामनाथेतिशब्दं यस्त्रिः पठेत्प्रातरुत्थितः । तस्य पूर्वदिनोत्पन्नपातकं नश्यति क्षणात्

rāmanāthetiśabdaṁ yas triḥ paṭhet prātar utthitaḥ tasya pūrvadinotpannapātakaṁ naśyati kṣaṇāt

जो प्रातःकाल उठकर 'रामनाथ' शब्द को तीन बार पढ़ता है, उसके पूर्व दिन में उत्पन्न पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 68 (skanda.3.43.68)

रामनाथे महालिंगे भक्तरक्षणदीक्षिते । भोजने विद्यमानेऽपि याचनाः किं प्रयास्यथ

rāmanāthe mahāliṅge bhaktarakṣaṇadīkṣite bhojane vidyamāne'pi yācanāḥ kiṁ prayāsyatha

अपने भक्तों की रक्षा के लिए प्रतिज्ञाबद्ध रामनाथ महालिंग के रहते हुए, भोजन विद्यमान रहते हुए भी, तुम किसलिए याचना करने जाओगे?

श्लोक 69 (skanda.3.43.69)

रामनाथमहालिंगे प्रसन्ने करुणानिधौ । नश्यंति सकलाः क्लेशा यथा सूर्योदये हिमम्

rāmanāthamahāliṅge prasanne karuṇānidhau naśyanti sakalāḥ kleśā yathā sūryodaye himam

करुणा-निधि रामनाथ महालिंग के प्रसन्न होने पर, समस्त क्लेश वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होने पर हिम।

श्लोक 70 (skanda.3.43.70)

प्राणोत्क्रमणवेलायां रामनाथं स्मरेद्यदि । जन्मनेऽसौ न कल्पेत भूयः शंकरतामियात्

prāṇotkramaṇavelāyāṁ rāmanāthaṁ smared yadi janmane'sau na kalpeta bhūyaḥ śaṅkaratām iyāt

यदि मनुष्य प्राण-त्याग के समय रामनाथ का स्मरण करता है, तो वह पुनः जन्म के योग्य नहीं रहता, अपितु शंकर-रूप को प्राप्त होता है।

श्लोक 71 (skanda.3.43.71)

रामनाथ महादेव मां रक्ष करुणानिधे । इति यः सततं ब्रूयात्कलिनासौ न बाध्यते

rāmanātha mahādeva māṁ rakṣa karuṇānidhe iti yaḥ satataṁ brūyāt kalināsau na bādhyate

'हे रामनाथ महादेव! हे करुणानिधे! मेरी रक्षा कीजिए' — जो निरंतर ऐसा कहता है, वह कलि से बाधित नहीं होता।

श्लोक 72 (skanda.3.43.72)

रामनाथ जगन्नाथ धूर्जटे नीललोहित । इति यः सततं ब्रूयाद्बाध्यतेऽसौ न मायया

rāmanātha jagannātha dhūrjaṭe nīlalohita iti yaḥ satataṁ brūyād bādhyate'sau na māyayā

'हे रामनाथ! हे जगन्नाथ! हे धूर्जटे! हे नीललोहित!' — जो निरंतर ऐसा कहता है, वह माया से बाधित नहीं होता।

श्लोक 73 (skanda.3.43.73)

नीलकण्ठ महादेव रामेश्वरसदाशिव । इति ब्रुवन्सदा जंतुर्नैव कामेन बाध्यते

nīlakaṇṭha mahādeva rāmeśvarasadāśiva iti bruvan sadā jantur naiva kāmena bādhyate

'हे नीलकंठ महादेव! हे रामेश्वर सदाशिव!' — यह सदा कहता हुआ प्राणी काम से कभी बाधित नहीं होता।

श्लोक 74 (skanda.3.43.74)

रामेश्वर यमाराते कालकूटविषादन । इतीरयञ्जनो नित्यं न क्रोधेन प्रपीड्यते

rāmeśvara yamārāte kālakūṭaviṣādana itīrayañ jano nityaṁ na krodhena prapīḍyate

'हे रामेश्वर! हे यम के शत्रु! हे कालकूट-विष को पीने वाले!' — यह सदा कहने वाला व्यक्ति क्रोध से कभी पीड़ित नहीं होता।

श्लोक 75 (skanda.3.43.75)

रामनाथालयं यस्तु दारुभिः कुरुते नरः । स पुमान्स्वर्गमाप्नोति त्रिकोटिकुलसंयुतः

rāmanāthālayaṁ yas tu dārubhiḥ kurute naraḥ sa pumān svargam āpnoti trikoṭikulasaṁyutaḥ

जो मनुष्य लकड़ी से रामनाथ का मंदिर बनवाता है, वह पुरुष अपने तीन करोड़ पीढ़ियों के कुल सहित स्वर्ग को प्राप्त करता है।

श्लोक 76 (skanda.3.43.76)

इष्टकाभिस्तु यः कुर्यात्स वैकुण्ठमवाप्नुयात् । शिलाभिः कुरुते यस्तु स गच्छेद्ब्रह्मणः पदम्

iṣṭakābhis tu yaḥ kuryāt sa vaikuṇṭham avāpnuyāt śilābhiḥ kurute yas tu sa gacched brahmaṇaḥ padam

जो ईंटों से बनवाता है, वह वैकुंठ को प्राप्त करता है। जो शिलाओं से बनवाता है, वह ब्रह्मा के पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 77 (skanda.3.43.77)

स्फटिकादिशिलाभेदैः कुर्वन्नस्यालयं जनः । शिवलोकमवाप्नोति विमानवरमास्थितः

sphaṭikādiśilābhedaiḥ kurvann asyālayaṁ janaḥ śivalokam avāpnoti vimānavaram āsthitaḥ

स्फटिक आदि विभिन्न पाषाणों से इसका मंदिर बनवाने वाला जन, श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर शिवलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 78 (skanda.3.43.78)

रामनाथालयं ताम्रैः कुर्वन्भक्तिपुरःसरम् । शिवसामीप्यमाप्नोति शिवस्यार्द्धासनस्थितः

rāmanāthālayaṁ tāmraiḥ kurvan bhaktipuraḥsaram śivasāmīpyam āpnoti śivasyārdhāsanasthitaḥ

भक्तिपूर्वक ताम्र से रामनाथ का मंदिर बनवाने वाला, शिव के आसन के आधे भाग पर स्थित होकर शिव-सामीप्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 79 (skanda.3.43.79)

रामेश्वरालयं रूप्यैः कुर्वन्वै मानवो मुदा । शिवसारूप्यमाप्नोति शिववन्मोदते सदा

rāmeśvarālayaṁ rūpyaiḥ kurvan vai mānavo mudā śivasārūpyam āpnoti śivavan modate sadā

आनंदपूर्वक चाँदी से रामेश्वर का मंदिर बनवाने वाला मनुष्य शिव-सारूप्य को प्राप्त करता है और सदा शिव के समान आनंद करता है।

श्लोक 80 (skanda.3.43.80)

रामनाथालयं हेम्ना यः करोति सभक्तिकम् । स नरो मुक्तिमाप्नोति शिवसायुज्यरूपिणीम्

rāmanāthālayaṁ hemnā yaḥ karoti sabhaktikam sa naro muktim āpnoti śivasāyujyarūpiṇīm

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक स्वर्ण से रामनाथ का मंदिर बनवाता है, वह शिव-सायुज्य रूप मुक्ति को प्राप्त करता है।

श्लोक 81 (skanda.3.43.81)

रामनाथालयं हेम्ना धनाढ्यः कुरुते नरः । मृदा दरिद्रः कुरुते तयोः पुण्यं समं स्मृतम्

rāmanāthālayaṁ hemnā dhanāḍhyaḥ kurute naraḥ mṛdā daridraḥ kurute tayoḥ puṇyaṁ samaṁ smṛtam

धनवान मनुष्य स्वर्ण से रामनाथ का मंदिर बनवाता है, निर्धन मिट्टी से बनवाता है — उन दोनों का पुण्य समान माना गया है।

श्लोक 82 (skanda.3.43.82)

रामनाथमहालिंगस्नानकाले द्विजोत्तमाः । त्रिसंध्यं गेयनृत्ते च मुखवाद्यैश्च काहलम्

rāmanāthamahāliṅgasnānakāle dvijottamāḥ trisandhyaṁ geyanṛtte ca mukhavādyaiś ca kāhalam

हे द्विजोत्तमो! रामनाथ महालिंग के स्नान के समय, तीनों संध्याओं में गायन-नृत्य के साथ, मुख-वाद्यों तथा काहल के साथ,

श्लोक 83 (skanda.3.43.83)

वाद्यान्यन्यानि कुरुते यः पुमान्भक्तिपूर्वकम् । स महापातकैर्मुक्तो रुद्रलोके महीयते

vādyāny anyāni kurute yaḥ pumān bhaktipūrvakam sa mahāpātakair mukto rudraloke mahīyate

तथा अन्य वाद्यों को भक्तिपूर्वक बजाने वाला मनुष्य, महापातकों से मुक्त होकर रुद्रलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 84 (skanda.3.43.84)

योभिषेकस्य समये रामनाथस्य शूलिनः । रुद्राध्यायं च चमकं तथा पुरुषसूक्तकम्

yo'bhiṣekasya samaye rāmanāthasya śūlinaḥ rudrādhyāyaṁ ca camakaṁ tathā puruṣasūktakam

त्रिशूलधारी रामनाथ के अभिषेक के समय जो व्यक्ति रुद्राध्याय, चमक, तथा पुरुषसूक्त,

श्लोक 85 (skanda.3.43.85)

त्रिसुपर्णं पंचशांतिं पावमान्यादिकं तथा । जपेत्प्रीतियुतो विप्रा नरकं न समश्नुते

trisuparṇaṁ pañcaśāntiṁ pāvamānyādikaṁ tathā japet prītiyuto viprā narakaṁ na samaśnute

त्रिसुपर्ण, पंचशांति, तथा पावमानी आदि का जप प्रेमपूर्वक करता है, हे विप्रो! वह नरक को नहीं प्राप्त होता।

श्लोक 86 (skanda.3.43.86)

गवां क्षीरेण दध्ना च पंचगव्यैर्घृतैस्तथा । रामनाथमहालिंगस्नानं नरकनाशनम्

gavāṁ kṣīreṇa dadhnā ca pañcagavyair ghṛtais tathā rāmanāthamahāliṅgasnānaṁ narakanāśanam

गायों के दूध से, दही से, पंचगव्य से, तथा घृत से रामनाथ महालिंग का स्नान करना नरक का नाशक है।

श्लोक 87 (skanda.3.43.87)

रामनाथमहालिंगं घृतेन स्नापयेच्च यः । कल्पजन्मार्जितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति

rāmanāthamahāliṅgaṁ ghṛtena snāpayec ca yaḥ kalpajanmārjitaṁ pāpaṁ tatkṣaṇād eva naśyati

जो घृत से रामनाथ महालिंग को स्नान कराता है, उसके कल्पों के जन्मों में अर्जित पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 88 (skanda.3.43.88)

रामनाथमहालिंगं गोक्षीरैः स्नापयन्नरः । कुलैकविंशमुत्तार्य शिवलोके महीयते

rāmanāthamahāliṅgaṁ gokṣīraiḥ snāpayan naraḥ kulaikaviṁśam uttārya śivaloke mahīyate

गोदुग्ध से रामनाथ महालिंग को स्नान कराने वाला मनुष्य, अपने इक्कीस पीढ़ियों के कुल का उद्धार कर, शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 89 (skanda.3.43.89)

रामनाथमहालिंगं दध्ना संस्नापयन्नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते

rāmanāthamahāliṅgaṁ dadhnā saṁsnāpayan naraḥ sarvapāpavinirmukto viṣṇuloke mahīyate

दही से रामनाथ महालिंग को स्नान कराने वाला मनुष्य, समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 90 (skanda.3.43.90)

अभ्यंगं तिलतैलेन रामेश्वरशिवस्य यः । करोति हि सकृद्भक्त्या स कुबेरगृहे वसेत्

abhyaṅgaṁ tilatailena rāmeśvaraśivasya yaḥ karoti hi sakṛd bhaktyā sa kuberagṛhe vaset

जो तिल के तेल से रामेश्वर शिव का मालिश एक बार भी भक्तिपूर्वक करता है, वह कुबेर के गृह में निवास करता है।

श्लोक 91 (skanda.3.43.91)

रामनाथमहालिंगे स्नानमिक्षुरसेन यः । सकृदप्याचरेद्भ क्त्या चन्द्रलोकं समश्नुते

rāmanāthamahāliṅge snānam ikṣurasena yaḥ sakṛd apy ācared bhaktyā candralokaṁ samaśnute

जो रामनाथ महालिंग को गन्ने के रस से एक बार भी भक्तिपूर्वक स्नान कराता है, वह चंद्रलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 92 (skanda.3.43.92)

लिकुचाम्ररसोत्पन्नसारेण स्नापयन्नरः । रामनाथमहालिंगं पितृलोकं समश्नुते

likucāmrarasotpannasāreṇa snāpayan naraḥ rāmanāthamahāliṅgaṁ pitṛlokaṁ samaśnute

लिकुच और आम के रस से उत्पन्न सार से रामनाथ महालिंग को स्नान कराने वाला मनुष्य पितृलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 93 (skanda.3.43.93)

नालिकेरजलैः स्नानं रामनाथमहेश्वरे । ब्रह्महत्यादिपापानां नाशनं परिकीर्तितम्

nālikerajalaiḥ snānaṁ rāmanāthamaheśvare brahmahatyādipāpānāṁ nāśanaṁ parikīrtitam

नारियल के जल से महेश्वर रामनाथ को स्नान कराना, ब्रह्महत्या आदि पापों का नाशक कहा गया है।

श्लोक 94 (skanda.3.43.94)

रामनाथमहालिंगं रंभापक्वैर्विमर्दयन् । विनाश्य सकलं पापं वायुलोके मही यते

rāmanāthamahāliṅgaṁ rambhāpakvair vimardayan vināśya sakalaṁ pāpaṁ vāyuloke mahīyate

पके हुए केलों से रामनाथ महालिंग का मर्दन करने वाला व्यक्ति, समस्त पापों को नष्ट कर वायुलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 95 (skanda.3.43.95)

वस्त्रपूतेन तोयेन रामनाथं महेश्वरम् । स्नापयन्वारुणं लोकमाप्नोति द्विजसत्तमाः

vastrapūtena toyena rāmanāthaṁ maheśvaram snāpayan vāruṇaṁ lokam āpnoti dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो! वस्त्र से छाने हुए जल से महेश्वर रामनाथ को स्नान कराने वाला वरुण-लोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 96 (skanda.3.43.96)

चंदनोदकधाराभी रामनाथं महेश्वरम् । स्नापयेत्पुरुषो विप्रा गांधर्वं लोकमाप्नुयात्

candanodakadhārābhī rāmanāthaṁ maheśvaram snāpayet puruṣo viprā gāndharvaṁ lokam āpnuyāt

चंदन-जल की धाराओं से महेश्वर रामनाथ को स्नान कराने वाला पुरुष, हे विप्रो! गंधर्वलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 97 (skanda.3.43.97)

पुष्पवासिततोयेन हेमसंपृक्तवारिणा । पद्मवासिततोयेन स्नानाद्रामेश्वरस्य तु

puṣpavāsitatoyena hemasampṛktavāriṇā padmavāsitatoyena snānād rāmeśvarasya tu

पुष्पों से सुवासित जल से, स्वर्ण-मिश्रित जल से, तथा कमल से सुवासित जल से रामेश्वर के स्नान से,

श्लोक 98 (skanda.3.43.98)

महेंद्रासनमारुह्य तेनैव सह मोदते । पाटलोत्पलकल्हारपुन्नागकरवीरकैः

mahendrāsanam āruhya tenaiva saha modate pāṭalotpalakalhārapunnāgakaravīrakaiḥ

मनुष्य इंद्र के आसन पर आरूढ़ होकर उन्हीं के साथ आनंद करता है। पाटल, कमल, कल्हार, पुन्नाग, तथा कनेर के फूलों से,

श्लोक 99 (skanda.3.43.99)

वासितैर्वारिभिर्विप्रा रामेश्वरमहेश्वरम् । अभिषिच्य महद्भिश्च पातकैः स विमुच्यते

vāsitair vāribhir viprā rāmeśvaramaheśvaram abhiṣicya mahadbhiś ca pātakaiḥ sa vimucyate

हे विप्रो! सुवासित जल से महेश्वर रामेश्वर का अभिषेक करके, वह व्यक्ति महापातकों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 100 (skanda.3.43.100)

यानि चान्यानि पुष्पाणि सुरभीणि महांति च । तद्गंधवासितैस्तोयैरभिषिच्य दयानिधिम्

yāni cānyāni puṣpāṇi surabhīṇi mahānti ca tadgandhavāsitais toyair abhiṣicya dayānidhim

और भी जो अन्य सुगंधित तथा महान पुष्प हैं, उनकी सुगंध से सुवासित जल से दया-निधि रामेश्वर का अभिषेक करके,

श्लोक 101 (skanda.3.43.101)

रामेश्वरमहालिंगं शिवलोके महीयते । एलाकर्पूरलामज्जवासितैः शुद्धवारिभिः

rāmeśvaramahāliṅgaṁ śivaloke mahīyate elākarpūralāmajjavāsitaiḥ śuddhavāribhiḥ

रामेश्वर महालिंग को स्नान कराने वाला शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है। इलायची, कपूर, तथा लामज्ज गंधद्रव्य से सुवासित शुद्ध जल से,

श्लोक 102 (skanda.3.43.102)

रामेश्वरमहालिंगमभिषिच्य विशुद्धधीः । आग्नेयं लोकमासाद्य सर्वाकामा न्समश्नुते

rāmeśvaramahāliṅgam abhiṣicya viśuddhadhīḥ āgneyaṁ lokam āsādya sarvākāmān samaśnute

शुद्ध बुद्धि वाला व्यक्ति रामेश्वर महालिंग का अभिषेक करके, अग्नि-लोक को प्राप्त कर समस्त कामनाओं को पाता है।

श्लोक 103 (skanda.3.43.103)

रामनाथाभिषेकार्थं मृद्धटान्यः प्रयच्छति । इह लोके शतायुः स्यात्सर्वकाम समृद्धिमान्

rāmanāthābhiṣekārthaṁ mṛdghaṭān yaḥ prayacchati iha loke śatāyuḥ syāt sarvakāmasamṛddhimān

जो रामनाथ के अभिषेक के लिए मिट्टी के घड़े देता है, वह इस लोक में सौ वर्ष की आयु और समस्त कामनाओं से समृद्ध होता है।

श्लोक 104 (skanda.3.43.104)

ताम्रकुंभप्रदानेन देवेंद्रत्वमवा प्नुयात् । रौप्यकुंभप्रदानेन ब्रह्मलोकं समश्नुते

tāmrakumbhapradānena devendratvam avāpnuyāt raupyakumbhapradānena brahmalokaṁ samaśnute

ताम्र-घट के दान से इंद्रत्व प्राप्त होता है। रजत-घट के दान से ब्रह्मलोक प्राप्त होता है।

श्लोक 105 (skanda.3.43.105)

हेमकुंभप्रदानेन शिवलोके महीयते । रत्नकुंभप्रदानेन शिवसामीप्यमश्नुते

hemakumbhapradānena śivaloke mahīyate ratnakumbhapradānena śivasāmīpyam aśnute

स्वर्ण-घट के दान से शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। रत्न-घट के दान से शिव-सामीप्य प्राप्त होता है।

श्लोक 106 (skanda.3.43.106)

रामनाथाभिषेकार्थं नैवेद्यार्थमपि द्विजाः । यो गां पयस्विनीं दद्यात्सोऽश्वमेधफलं लभेत्

rāmanāthābhiṣekārthaṁ naivedyārtham api dvijāḥ yo gāṁ payasvinīṁ dadyāt so'śvamedhaphalaṁ labhet

हे द्विजो! जो रामनाथ के अभिषेक के लिए, अथवा नैवेद्य के लिए, दूध देने वाली गाय दान करता है, वह अश्वमेध का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 107 (skanda.3.43.107)

प्राप्नोति शिववेषं च देहांते शिवलोकभाक् । रामसेतौ धनुष्कोटौ रामनाथेत्युदीर्य यः

prāpnoti śivaveṣaṁ ca dehānte śivalokabhāk rāmasetau dhanuṣkoṭau rāmanātheti udīrya yaḥ

वह शिव-रूप को प्राप्त करता है और देहांत होने पर शिवलोक का भागी होता है। रामसेतु में, धनुष्कोटि में, जो 'रामनाथ' कहता हुआ,

श्लोक 108 (skanda.3.43.108)

यत्र क्वाप्याचरेत्स्नानं सेतुस्नानफलं लभेत् । सुधाप्रलिप्तं यः कुर्याद्रामनाथशिवालयम्

yatra kvāpy ācaret snānaṁ setusnānaphalaṁ labhet sudhāpraliptaṁ yaḥ kuryād rāmanāthaśivālayam

कहीं भी स्नान करता है, वह सेतु-स्नान का फल प्राप्त करता है। जो चूने से लीपा हुआ रामनाथ का शिवालय बनवाता है,

श्लोक 109 (skanda.3.43.109)

तत्पुण्यं गदितुं नाहं शक्तो वर्षशतादपि । नवीकरोति यो मर्त्यो रामनाथशिवालयम्

tatpuṇyaṁ gadituṁ nāhaṁ śakto varṣaśatād api navīkaroti yo martyo rāmanāthaśivālayam

उसके पुण्य को मैं सौ वर्षों में भी कहने में समर्थ नहीं हूँ। जो मनुष्य रामनाथ के शिवालय का जीर्णोद्धार करता है,

श्लोक 110 (skanda.3.43.110)

कर्तुः शतगुणं ज्ञेयं तस्य पुण्यफलं द्विजाः । छिन्नं भिन्नं च यः सम्यग्रामनाथशिवालयम्

kartuḥ śataguṇaṁ jñeyaṁ tasya puṇyaphalaṁ dvijāḥ chinnaṁ bhinnaṁ ca yaḥ samyag rāmanāthaśivālayam

हे द्विजो! उसका पुण्य-फल निर्माता के फल से सौ गुना जानना चाहिए। जो टूटे-फूटे रामनाथ के शिवालय को भली-भाँति

श्लोक 111 (skanda.3.43.111)

करोति भक्त्या पुरुषो ब्रह्महत्यायुतं दहेत् । रामनाथस्य पुरतो दीपानारोपयन्मुदा

karoti bhaktyā puruṣo brahmahatyāyutaṁ dahet rāmanāthasya purato dīpān āropayan mudā

भक्तिपूर्वक ठीक करता है, वह पुरुष दस हज़ार ब्रह्महत्याओं को भस्म कर देता है। रामनाथ के सम्मुख आनंदपूर्वक दीप जलाने वाला,

श्लोक 112 (skanda.3.43.112)

अविद्यापटलं भित्त्वा याति ब्रह्म सनातनम् । घृतं तैलं तथा मुद्गाञ्छर्करास्तंडुलान्गुडान्

avidyāpaṭalaṁ bhittvā yāti brahma sanātanam ghṛtaṁ tailaṁ tathā mudgāñ charkarās taṇḍulān guḍān

अविद्या के आवरण को भेदकर सनातन ब्रह्म को प्राप्त होता है। घी, तेल, मूँग, शक्कर, चावल, तथा गुड़

श्लोक 113 (skanda.3.43.113)

प्रयच्छन्रामनाथाय देवेंद्रपदमश्नुते । रामनाथमहालिंगदर्शनादर्चनात्स्मृतेः

prayacchan rāmanāthāya devendrapadam aśnute rāmanāthamahāliṅgadarśanād arcanāt smṛteḥ

रामनाथ को अर्पित करने वाला, इंद्र के पद को प्राप्त करता है। रामनाथ महालिंग के दर्शन, अर्चन, स्मरण,

श्लोक 114 (skanda.3.43.114)

स्पर्शनादपि पापानि विलयं यांति तत्क्षणात् । रामनाथाय यो दद्यान्महाघंटां च दर्पणम्

sparśanād api pāpāni vilayaṁ yānti tatkṣaṇāt rāmanāthāya yo dadyān mahāghaṇṭāṁ ca darpaṇam

अथवा स्पर्श से भी पाप उसी क्षण विलीन हो जाते हैं। जो रामनाथ को महाघंटा तथा दर्पण अर्पित करता है,

श्लोक 115 (skanda.3.43.115)

विमानशतसं भोगैश्चिरं शिवपुरे वसेत् । भेरीमृदंगपटह निःसाणमुरजादिकम्

vimānaśatasaṁbhogaiś ciraṁ śivapure vaset bherīmṛdaṅgapaṭahaniḥsāṇamurajādikam

वह सौ विमानों के भोगों सहित दीर्घकाल तक शिवपुर में निवास करता है। भेरी, मृदंग, पटह, निःसाण, मुरज आदि,

श्लोक 116 (skanda.3.43.116)

वंशकांस्यादिवादित्रं तथा वाद्यांतराणि च । प्रयच्छन्रामनाथाय महादे वाय सादरम्

vaṁśakāṁsyādivāditraṁ tathā vādyāntarāṇi ca prayacchan rāmanāthāya mahādevāya sādaram

बाँसुरी, कांस्य आदि वाद्य, तथा अन्य वाद्ययंत्रों को भी, महादेव रामनाथ को श्रद्धापूर्वक अर्पित करने वाला,

श्लोक 117 (skanda.3.43.117)

स विमानैर्महाभोगैर्वाद्यघोषसमन्वितैः । अनेकयुगपर्यंतं शिवलोके महीयते

sa vimānair mahābhogair vādyaghoṣasamanvitaiḥ anekayugaparyantaṁ śivaloke mahīyate

वह विमानों, महान भोगों, तथा वाद्य-घोष से युक्त होकर अनेक युगों तक शिवलोक में प्रतिष्ठित रहता है।

श्लोक 118 (skanda.3.43.118)

रामनाथं समुद्दिश्य यद्दत्तं स्वल्प मादरात् । तदनंतफलं दातुः परत्र भवति ध्रुवम्

rāmanāthaṁ samuddiśya yad dattaṁ svalpam ādarāt tad anantaphalaṁ dātuḥ paratra bhavati dhruvam

रामनाथ को लक्ष्य कर जो कुछ भी थोड़ा-सा श्रद्धापूर्वक दिया जाता है, वह परलोक में देने वाले के लिए निश्चय ही अनंत फल वाला होता है।

श्लोक 119 (skanda.3.43.119)

रामेश्वरे महाक्षेत्रे रामनाथस्य सन्निधौ । वसन्मुक्तिमवाप्नोति पुनरावृत्तिवर्जिताम्

rāmeśvare mahākṣetre rāmanāthasya sannidhau vasan muktim avāpnoti punarāvṛttivarjitām

रामेश्वर के महाक्षेत्र में, रामनाथ के सान्निध्य में निवास करता हुआ मनुष्य, पुनरावृत्ति-रहित मुक्ति को प्राप्त करता है।

श्लोक 120 (skanda.3.43.120)

आयुः प्रयाति त्वरितं त्वरितं याति यौवनम् । त्वरितं संपदो यांति दारपुत्रादयस्तथा

āyuḥ prayāti tvaritaṁ tvaritaṁ yāti yauvanam tvaritaṁ sampado yānti dāraputrādayas tathā

आयु शीघ्रता से बीतती है, यौवन शीघ्रता से चला जाता है। संपत्ति भी शीघ्रता से चली जाती है, तथा पत्नी, पुत्र आदि भी।

श्लोक 121 (skanda.3.43.121)

राजादिभिर्धनं बाध्यं गृहक्षेत्रादिकं तथा । सर्वं च क्षणिकं विप्रा गृहोपकरणादिकम्

rājādibhir dhanaṁ bādhyaṁ gṛhakṣetrādikaṁ tathā sarvaṁ ca kṣaṇikaṁ viprā gṛhopakaraṇādikam

राजा आदि के द्वारा धन, गृह, क्षेत्र आदि छीने जा सकते हैं। हे विप्रो! गृह-उपकरण आदि सब कुछ क्षणिक है।

श्लोक 122 (skanda.3.43.122)

तस्मात्सर्वं परित्यज्य संसारस्योपलालनम् । रामेश्वरमहालिंगमापन्नार्तिहरं नृणाम्

tasmāt sarvaṁ parityajya saṁsārasyopalālanam rāmeśvaramahāliṅgam āpannārtiharaṁ nṛṇām

अतः सांसारिक मोह-ममता को सर्वथा त्यागकर, मनुष्यों के आपत्ति-दुःखों का हरण करने वाले रामेश्वर महालिंग को,

श्लोक 123 (skanda.3.43.123)

श्रोतव्यं कीर्तितव्यं च स्मर्तव्यं च मनीषिभिः । रामेश्वराय देवाय यो वै ग्रामान्प्रयच्छति

śrotavyaṁ kīrtitavyaṁ ca smartavyaṁ ca manīṣibhiḥ rāmeśvarāya devāya yo vai grāmān prayacchati

बुद्धिमानों को उसे सुनना, कीर्तन करना, तथा स्मरण करना चाहिए। जो देव रामेश्वर को गाँव दान करता है,

श्लोक 124 (skanda.3.43.124)

स हि प्रारब्धदेहांते शिव एव प्रजा यते । पात्राणामुत्तमं पात्रं रामनाथो महेश्वरः

sa hi prārabdhadehānte śiva eva prajāyate pātrāṇām uttamaṁ pātraṁ rāmanātho maheśvaraḥ

वह प्रारब्ध-देह के अंत में साक्षात् शिव ही हो जाता है। पात्रों में उत्तम पात्र महेश्वर रामनाथ हैं,

श्लोक 125 (skanda.3.43.125)

तस्मै दत्त्वा द्विजाः सत्यमनंतं सुखमश्नुते । रामनाथमहालिंगदर्शनावधि पातकम्

tasmai dattvā dvijāḥ satyam anantaṁ sukham aśnute rāmanāthamahāliṅgadarśanāvadhi pātakam

हे द्विजो! उन्हें अर्पण कर मनुष्य निश्चय ही अनंत सुख प्राप्त करता है। रामनाथ महालिंग के दर्शन तक जो भी पाप हो,

श्लोक 126 (skanda.3.43.126)

दत्त्वा तस्मै जनः किंचित्सार्वभौमो भवेद्ध्रुवम् । तालवृंतं ध्वजं छत्रं चंदनं गुग्गुलुं तथा

dattvā tasmai janaḥ kiñcit sārvabhaumo bhaved dhruvam tālavṛntaṁ dhvajaṁ chatraṁ candanaṁ guggulaṁ tathā

उसे कुछ भी अर्पित कर मनुष्य निश्चय ही सार्वभौम सम्राट होता है। पंखा, ध्वज, छत्र, चंदन, तथा गुग्गुल,

श्लोक 127 (skanda.3.43.127)

ताम्रकांस्यादिरजतहेमरत्नमयान्ध टान् । प्रयच्छंत्यभिषेकार्थं रामनाथस्य ये नराः

tāmrakāṁsyādirajatahemaratnamayān ghaṭān prayacchanty abhiṣekārthaṁ rāmanāthasya ye narāḥ

ताम्र, कांस्य, चाँदी, सोने, तथा रत्नों से बने घड़ों को रामनाथ के अभिषेक के लिए अर्पित करने वाले जो मनुष्य हैं,

श्लोक 128 (skanda.3.43.128)

भूमंडलाधिपतयो जायंते ते भवांतरे । रामनाथस्य पूजार्थं पुष्पाण्युत्पादयंति ये

bhūmaṇḍalādhipatayo jāyante te bhavāntare rāmanāthasya pūjārthaṁ puṣpāṇy utpādayanti ye

वे अगले जन्म में भूमंडल के अधिपति होते हैं। जो रामनाथ की पूजा के लिए पुष्प उत्पन्न करते हैं,

श्लोक 129 (skanda.3.43.129)

अश्वमेधादियागानां फलान्यद्धाप्नुवंति ते । रामेश्वरे महालिंगे पूजिते नमिते स्मृते

aśvamedhādiyāgānāṁ phalāny addhāpnuvanti te rāmeśvare mahāliṅge pūjite namite smṛte

वे अश्वमेध आदि यज्ञों के फलों को स्पष्ट रूप से प्राप्त करते हैं। रामेश्वर महालिंग की पूजा, नमन, अथवा स्मरण होने पर,

श्लोक 130 (skanda.3.43.130)

श्रुते दृष्टे च विप्रेंद्रा दुर्लभं नास्ति किंचन । रामनाथमहालिंगं सेवितुं यः पुमान्व्रजेत्

śrute dṛṣṭe ca viprendrā durlabhaṁ nāsti kiñcana rāmanāthamahāliṅgaṁ sevituṁ yaḥ pumān vrajet

हे विप्रेंद्रो! सुना अथवा देखा गया हो, तब कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। जो पुरुष रामनाथ महालिंग की सेवा के लिए जाता है,

श्लोक 131 (skanda.3.43.131)

तं दृष्ट्वा भयमाप्नोति तस्य पापौघ आशु वै । रामनाथो महादेवो दृष्टो यदि भवेन्नृभिः

taṁ dṛṣṭvā bhayam āpnoti tasya pāpaugha āśu vai rāmanātho mahādevo dṛṣṭo yadi bhaven nṛbhiḥ

उसे देखकर उसके पाप-समूह को तत्काल भय प्राप्त हो जाता है। यदि महादेव रामनाथ मनुष्यों द्वारा देखे जाएँ,

श्लोक 132 (skanda.3.43.132)

किंवेदैः किमु वा शास्त्रैः किं वा तीर्थनिषेवणैः । चंदनं कुंकुमं कोष्ठं कस्तूरीं गुग्गुलुं तथा

kiṁ vedaiḥ kim u vā śāstraiḥ kiṁ vā tīrthaniṣevaṇaiḥ candanaṁ kuṅkumaṁ koṣṭhaṁ kastūrīṁ guggulaṁ tathā

तब वेदों से क्या, शास्त्रों से क्या, अथवा तीर्थ-सेवा से भी क्या और प्राप्त होगा? चंदन, कुंकुम, कोष्ठ, कस्तूरी, तथा गुग्गुल,

श्लोक 133 (skanda.3.43.133)

मृगनाभिं च सरलं दद्याद्रामेश्वराय यः । स भूमाविह जायेत धनाढ्यो वेदपारगः

mṛganābhiṁ ca saralaṁ dadyād rāmeśvarāya yaḥ sa bhūmāv iha jāyeta dhanāḍhyo vedapāragaḥ

तथा मृगनाभि (कस्तूरी) और देवदारु को जो रामेश्वर को अर्पित करता है, वह इस भूमि पर धनाढ्य तथा वेदपारंगत होकर जन्म लेता है।

श्लोक 134 (skanda.3.43.134)

मुक्ताभरणवस्त्राणि महार्हाणि ददाति यः । रामनाथाय देवाय नासौ दौर्गत्यमाप्नुयात्

muktābharaṇavastrāṇi mahārhāṇi dadāti yaḥ rāmanāthāya devāya nāsau daurgatyam āpnuyāt

जो देव रामनाथ को मुक्ता-आभूषण तथा अत्यंत मूल्यवान वस्त्र अर्पित करता है, वह कभी दरिद्रता को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 135 (skanda.3.43.135)

रामनाथमहालिंगं गंगातोयैः समाहृतैः । योऽभिषिंचत्यसौ पूज्यः शिवस्यापि न संशयः

rāmanāthamahāliṅgaṁ gaṅgātoyaiḥ samāhṛtaiḥ yo'bhiṣiñcaty asau pūjyaḥ śivasyāpi na saṁśayaḥ

जो गंगाजल लाकर रामनाथ महालिंग का अभिषेक करता है, वह शिव के लिए भी पूज्य होता है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 136 (skanda.3.43.136)

यावन्न याति मरणं यावन्नाक्रमते जरा । यावन्नेंद्रियवैकल्यं तावदेव द्विजोत्तमाः

yāvan na yāti maraṇaṁ yāvan nākramate jarā yāvan nendriyavaikalyaṁ tāvad eva dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! जब तक मृत्यु नहीं आती, जब तक बुढ़ापा नहीं आक्रमण करता, जब तक इंद्रियों की विकलता नहीं होती, तब तक ही,

श्लोक 137 (skanda.3.43.137)

तावदेव महादेवो रामनाथो मुमुक्षुभिः । वन्द्यः पूज्यश्च मंतव्यः स्तुत्यश्च सततं शिवः

tāvad eva mahādevo rāmanātho mumukṣubhiḥ vandyaḥ pūjyaś ca mantavyaḥ stutyaś ca satataṁ śivaḥ

मुमुक्षुओं द्वारा महादेव रामनाथ, वह शिव, सदा वंदनीय, पूज्य, मननीय, तथा स्तुत्य हैं।

श्लोक 138 (skanda.3.43.138)

रामेश्वरमहालिंगपूजातुल्यो न विद्यते । धर्मः सर्वपुराणेषु सर्वशास्त्रेषु वै तथा

rāmeśvaramahāliṅgapūjātulyo na vidyate dharmaḥ sarvapurāṇeṣu sarvaśāstreṣu vai tathā

रामेश्वर महालिंग की पूजा के समान कोई धर्म समस्त पुराणों में, तथा समस्त शास्त्रों में भी विद्यमान नहीं है।

श्लोक 139 (skanda.3.43.139)

रामनाथेश्वरं देवं महाकारुणिकं प्रभुम् । भक्त्या भजंति ये नित्यं ते भूलोके सुखान्विताः

rāmanātheśvaraṁ devaṁ mahākāruṇikaṁ prabhum bhaktyā bhajanti ye nityaṁ te bhūloke sukhānvitāḥ

महाकारुणिक प्रभु देव रामनाथेश्वर को जो भक्तिपूर्वक सदा भजते हैं, वे भूलोक में सुख से युक्त रहते हैं।

श्लोक 140 (skanda.3.43.140)

भुक्त्वा भोगान्बहुसुखान्पुत्रदारयुता भृशम् । एतच्छरीरपातांते मुक्तिं यास्यंति शाश्वतीम्

bhuktvā bhogān bahusukhān putradārayutā bhṛśam etac charīrapātānte muktiṁ yāsyanti śāśvatīm

पुत्र-पत्नी सहित अत्यंत सुखमय भोगों को भोगकर, इस शरीर के पतन के अंत में वे शाश्वत मुक्ति को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 141 (skanda.3.43.141)

श्रीसूत उवाच । एवं वः कथितं विप्रा रामनाथस्य वैभवम् । यस्त्वेतच्छृणुयान्नित्यं पठते च सभक्तिकम्

śrīsūta uvāca evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā rāmanāthasya vaibhavam yas tv etac chṛṇuyān nityaṁ paṭhate ca sabhaktikam

श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें रामनाथ का वैभव कहा। जो कोई भी इसे नित्य सुनता है अथवा भक्तिपूर्वक पढ़ता है,

श्लोक 142 (skanda.3.43.142)

स रामनाथसेवायाः फलमाप्नोत्यनुत्तमम् । धनुष्कोटिमहातीर्थस्नानपुण्यं च यास्यति

sa rāmanāthasevāyāḥ phalam āpnoty anuttamam dhanuṣkoṭimahātīrthasnānapuṇyaṁ ca yāsyati

वह रामनाथ की सेवा का सर्वोत्तम फल प्राप्त करता है, तथा धनुष्कोटि महातीर्थ में स्नान के पुण्य को प्राप्त होता है।

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