ब्रह्म खण्ड · अध्याय 44
रामनाथ-लिंग-प्रतिष्ठा-विधि का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.3.44.1)
ऋषय ऊचुः । सर्ववेदार्थतत्त्वज्ञ पुराणार्णवपारग । व्यासपादांबुजद्वंद्वनमस्कारहृताशुभ
ṛṣaya ūcuḥ sarvavedārthatattvajña purāṇārṇavapāraga vyāsapādāmbujadvandvanamaskārahṛtāśubha
ऋषियों ने कहा — हे समस्त वेदों के अर्थ-तत्त्व के ज्ञाता! हे पुराण-सागर के पारगामी! हे व्यास के चरण-कमल-युगल को नमस्कार करने से समस्त अशुभ का हरण करने वाले!
श्लोक 2 (skanda.3.44.2)
पुराणार्थोपदेशेन सर्वप्राण्युपकारक । त्वया ह्यनुगृहीताः स्म पुराणकथनाद्वयम्
purāṇārthopadeśena sarvaprāṇyupakāraka tvayā hy anugṛhītāḥ sma purāṇakathanād vayam
पुराण के अर्थ का उपदेश देकर समस्त प्राणियों का उपकार करने वाले! हम दोनों पुराण-कथन से आपके द्वारा अनुगृहीत हुए हैं।
श्लोक 3 (skanda.3.44.3)
अधुना सेतुमाहात्म्यकथनात्सुतरां मुने । वयं कृतार्थाः संजाता व्यासशिष्य महामते
adhunā setumāhātmyakathanāt sutarāṁ mune vayaṁ kṛtārthāḥ saṁjātā vyāsaśiṣya mahāmate
हे मुने! अब सेतु के माहात्म्य के कथन से हम अत्यंत कृतार्थ हो गए हैं। हे महामति! हे व्यास-शिष्य!
श्लोक 4 (skanda.3.44.4)
यथा प्रातिष्ठिपल्लिंगं रामो दशरथात्मजः । तच्छ्रोतुं वयमिच्छामस्त्वमिदानीं वदस्व नः
yathā prātiṣṭhipal liṅgaṁ rāmo daśarathātmajaḥ tac chrotuṁ vayam icchāmas tvam idānīṁ vadasva naḥ
दशरथ-पुत्र राम ने जिस प्रकार लिंग की प्रतिष्ठा की, उसे सुनने की हम इच्छा रखते हैं। अब आप हमें वह बताइए।
श्लोक 5 (skanda.3.44.5)
श्रीसूत उवाच । यदर्थं स्थापितं लिंगं गन्धमादनपर्वते । रामचन्द्रेण विप्रेंद्र तदिदानीं ब्रवीमि वः
śrīsūta uvāca yadarthaṁ sthāpitaṁ liṅgaṁ gandhamādanaparvate rāmacandreṇa viprendra tad idānīṁ bravīmi vaḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रेंद्रो! रामचंद्र द्वारा गन्धमादन पर्वत पर जिस प्रयोजन से लिंग स्थापित किया गया, वह अब मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 6 (skanda.3.44.6)
हृतभार्यो वनाद्रामो रावणेन बलीयसा । कपिसेनायुतो धीरः ससौमि त्रिर्महाबलः
hṛtabhāryo vanād rāmo rāvaṇena balīyasā kapisenāyuto dhīraḥ sasaumitrir mahābalaḥ
वन से बलशाली रावण द्वारा हरी गई पत्नी वाले, धीर, वानर-सेना से युक्त, सुमित्रा-पुत्र सहित महाबली राम,
श्लोक 7 (skanda.3.44.7)
महेंद्रं गिरिमासाद्य व्यलोकयत वारिधिम् । तस्मिन्नपारे जलधौ कृत्वा सेतुं रघूद्वहः
mahendraṁ girim āsādya vyalokayata vāridhim tasminn apāre jaladhau kṛtvā setuṁ raghūdvahaḥ
महेंद्र पर्वत पर पहुँचकर समुद्र को देखने लगे। उस अपार समुद्र में सेतु का निर्माण कर रघुकुल-श्रेष्ठ राम,
श्लोक 8 (skanda.3.44.8)
तेन गत्वा पुरीं लंकां रावणेनाभिरक्षि ताम् । अस्तंगते सहस्रांशौ पौर्णमास्यां निशामुखे
tena gatvā purīṁ laṅkāṁ rāvaṇenābhirakṣitām astaṅgate sahasrāṁśau paurṇamāsyāṁ niśāmukhe
उस सेतु से रावण द्वारा सुरक्षित लंका नगरी में जाकर, पूर्णिमा की रात्रि के प्रारंभ में सूर्य के अस्त हो जाने पर,
श्लोक 9 (skanda.3.44.9)
रामः ससैनिको विप्राः सुवेलगिरिमारुहत् । ततः सौधस्थितं रात्रौ दृष्ट्वा लंकेश्वरं बली
rāmaḥ sasainiko viprāḥ suvelagirim āruhat tataḥ saudhasthitaṁ rātrau dṛṣṭvā laṅkeśvaraṁ balī
हे विप्रो! राम अपनी सेना सहित सुवेल पर्वत पर चढ़ गए। तब रात्रि में महल में स्थित लंकेश्वर को देखकर बलवान,
श्लोक 10 (skanda.3.44.10)
सूर्यपुत्रोऽस्य मुकुटं पातयास भूतले । राक्षसो भग्नमुकुटः प्रविवेश गृहोदरम्
sūryaputro'sya mukuṭaṁ pātayāsa bhūtale rākṣaso bhagnamukuṭaḥ praviveśa gṛhodaram
सूर्यपुत्र ने उसके मुकुट को गिरा दिया। मुकुट टूट जाने पर वह राक्षस अपने महल के भीतर चला गया।
श्लोक 11 (skanda.3.44.11)
गृहं प्रविष्टे लंकेशे रामः सुग्रीवसंयुतः । सानुजः सेनया सार्द्धमवरुह्य गिरेस्तटात्
gṛhaṁ praviṣṭe laṅkeśe rāmaḥ sugrīvasaṁyutaḥ sānujaḥ senayā sārdham avaruhya girestaṭāt
लंकेश्वर के महल में प्रवेश कर जाने पर, राम, सुग्रीव सहित, अनुज सहित, सेना के साथ पर्वत के तट से उतरकर,
श्लोक 12 (skanda.3.44.12)
सेनां न्यवेशयद्वीरो रामो लंकासमीपतः । ततो निवेशमानांस्तान्वानरान्रावणानुगाः
senāṁ nyaveśayad vīro rāmo laṅkāsamīpataḥ tato niveśamānāṁs tān vānarān rāvaṇānugāḥ
वीर राम ने लंका के समीप अपनी सेना का पड़ाव डाला। तब पड़ाव डालते हुए उन वानरों पर रावण के अनुयायी,
श्लोक 13 (skanda.3.44.13)
अभिजग्मुर्महाकायाः सायुधाः सहसैनिकाः । पर्वणः पूतनो जृंभः खरः क्रोधवशो हरिः
abhijagmur mahākāyāḥ sāyudhāḥ sahasainikāḥ parvaṇaḥ pūtano jṛmbhaḥ kharaḥ krodhavaśo hariḥ
महाकाय, शस्त्रधारी, सैनिकों सहित उन पर आक्रमण करने लगे — पर्वण, पूतन, जृंभ, खर, क्रोधवश, हरि,
श्लोक 14 (skanda.3.44.14)
प्रारुजश्चारुजश्चैव प्रहस्तश्चेतरे तथा । ततोऽभिपततां तेषामदृश्यानां दुरात्मनाम्
prārujaś cārujaś caiva prahastaś cetare tathā tato'bhipatatāṁ teṣām adṛśyānāṁ durātmanām
प्रारुज, आरुज, प्रहस्त, तथा अन्य भी। तब उन अदृश्य दुरात्माओं के आक्रमण करने पर,
श्लोक 15 (skanda.3.44.15)
अन्तर्धानवधं तत्र चकार स्म विभीषणः । ते दृश्यमाना बलिभिर्हरिभिर्दूरपातिभिः
antardhānavadhaṁ tatra cakāra sma vibhīṣaṇaḥ te dṛśyamānā balibhir haribhir dūrapātibhiḥ
विभीषण ने वहाँ उनके अंतर्धान का नाश किया। दृश्यमान हो जाने पर वे शक्तिशाली, दूर तक प्रहार करने वाले वानरों द्वारा,
श्लोक 16 (skanda.3.44.16)
निहताः सर्वतश्चैते न्यपतन्वै गतासवः । अमृष्यमाणः सबलो रावणो निर्ययावथ
nihatāḥ sarvataś caite nyapatan vai gatāsavaḥ amṛṣyamāṇaḥ sabalo rāvaṇo niryayāv atha
सब ओर से मारे जाकर प्राणहीन होकर गिर पड़े। यह सहन न कर सकने वाला बलशाली रावण तब बाहर निकला,
श्लोक 17 (skanda.3.44.17)
व्यूह्य तान्वानरान्सर्वान्न्यवारयत सायकैः । राघवस्त्वथ निर्याय व्यूढानीको दशाननम्
vyūhya tān vānarān sarvān nyavārayata sāyakaiḥ rāghavas tv atha niryāya vyūḍhānīko daśānanam
और उन सभी वानरों को व्यूहबद्ध कर बाणों से रोकने लगा। तब राघव भी सेना का व्यूह बनाकर निकले और दशानन के साथ
श्लोक 18 (skanda.3.44.18)
प्रत्ययुध्यत वेगेन द्वंद्वयुद्धमभूत्तदा । युयुधे लक्ष्मणेनाथ इंद्रजिद्रावणात्मजः
pratyayudhyata vegena dvandvayuddham abhūt tadā yuyudhe lakṣmaṇenātha indrajid rāvaṇātmajaḥ
वेग से युद्ध करने लगे, तब द्वंद्वयुद्ध हुआ। फिर रावण-पुत्र इंद्रजित ने लक्ष्मण के साथ युद्ध किया।
श्लोक 19 (skanda.3.44.19)
विरूपाक्षेण सुग्रीवस्तारेयेणापि खर्वटः । पौंड्रेण च नलस्तत्र पुटेशः पनसेन च
virūpākṣeṇa sugrīvas tāreyeṇāpi kharvaṭaḥ pauṇḍreṇa ca nalas tatra puṭeśaḥ panasena ca
सुग्रीव विरूपाक्ष के साथ, खर्वट तारेय के साथ, नल पौण्ड्र के साथ, तथा पुटेश पनस के साथ,
श्लोक 20 (skanda.3.44.20)
अन्येपि कपयो वीरा राक्षसैर्द्वंद्वमेत्य तु । चक्रुर्युद्धं सुतुमुलं भीरूणां भयवर्द्धनम्
anye'pi kapayo vīrā rākṣasair dvandvam etya tu cakrur yuddhaṁ sutumulaṁ bhīrūṇāṁ bhayavardhanam
अन्य वीर वानर भी राक्षसों के साथ द्वंद्व-युद्ध करने लगे, और भयभीत लोगों के भय को बढ़ाने वाला घोर युद्ध हुआ।
श्लोक 21 (skanda.3.44.21)
अथ रक्षांसि भिन्नानि वानरैर्भीमविक्रमैः । प्रदुद्रुवू रणादाशु लंकां रावणपालिताम्
atha rakṣāṁsi bhinnāni vānarair bhīmavikramaiḥ pradudruvū raṇād āśu laṅkāṁ rāvaṇapālitām
तब भीषण पराक्रमी वानरों द्वारा तोड़े गए राक्षस युद्ध-भूमि से भागकर तुरंत रावण-पालित लंका में चले गए।
श्लोक 22 (skanda.3.44.22)
भग्नेषु सर्वसैन्येषु रावणप्रेरितेन वै । पुत्रेणेंद्रजिता युद्धे नागास्त्रैरतिदारुणैः
bhagneṣu sarvasainyeṣu rāvaṇapreritena vai putreṇendrajitā yuddhe nāgāstrair atidāruṇaiḥ
समस्त सेनाओं के भग्न हो जाने पर, रावण द्वारा भेजे गए पुत्र इंद्रजित ने युद्ध में अत्यंत भयंकर नागास्त्रों से,
श्लोक 23 (skanda.3.44.23)
विद्धौ दाशरथी विप्रा उभौ तौ रामलक्ष्मणौ । मोचितौ वैनतेयेन गरुडेन महात्मना
viddhau dāśarathī viprā ubhau tau rāmalakṣmaṇau mocitau vainateyena garuḍena mahātmanā
हे विप्रो! दशरथ के दोनों पुत्रों राम और लक्ष्मण को बींध दिया। तब महात्मा विनता-पुत्र गरुड़ द्वारा उन्हें मुक्त किया गया।
श्लोक 24 (skanda.3.44.24)
तत्र प्रहस्तस्तरसा समभ्येत्य विभीषणम् । गदया ताडयामास विनद्य रणकर्कशः
tatra prahastas tarasā samabhyetya vibhīṣaṇam gadayā tāḍayāmāsa vinadya raṇakarkaśaḥ
वहाँ प्रहस्त ने वेग से विभीषण के पास पहुँचकर, युद्ध में निपुण उसने गर्जना करते हुए गदा से उन्हें प्रहार किया।
श्लोक 25 (skanda.3.44.25)
स तयाभिहतो धीमान्गदया भामिवेगया । नाकंपत महाबाहुर्हिमवानिव सुस्थितः
sa tayābhihato dhīmān gadayā bhīmavegayā nākampata mahābāhur himavān iva susthitaḥ
उस भीमवेगी गदा से आहत होने पर भी वह बुद्धिमान, महाबाहु विभीषण हिमालय के समान अटल स्थिर रहा, कंपित नहीं हुआ।
श्लोक 26 (skanda.3.44.26)
ततः प्रगृह्य विपुलामष्टघंटां विभीषणः । अभिमंत्र्य महाशक्तिं चिक्षे पास्य शिरः प्रति
tataḥ pragṛhya vipulām aṣṭaghaṇṭāṁ vibhīṣaṇaḥ abhimantrya mahāśaktiṁ cikṣepāsya śiraḥ prati
तब विभीषण ने विशाल अष्ट-घंटा वाली महाशक्ति को ग्रहण कर, उसका अभिमंत्रण कर, उसे उसके सिर पर फेंका।
श्लोक 27 (skanda.3.44.27)
पतंत्या स तया वेगाद्राक्षसोऽशनिना यथा । हृतोत्तमांगो ददृशे वातरुग्ण इव द्रुमः
patantyā sa tayā vegād rākṣaso'śaninā yathā hṛtottamāṅgo dadṛśe vātarugṇa iva drumaḥ
उसके वेग से गिरने पर वह राक्षस, वज्र से आहत होकर उत्तमांग से रहित हो गया, और तूफ़ान से टूटे हुए वृक्ष के समान दिखाई देने लगा।
श्लोक 28 (skanda.3.44.28)
तं दृष्ट्वा निहतं संख्ये प्रहस्तं क्षणदाचरम् । अभिदुद्राव धूम्राक्षो वेगेन महता कपीन्
taṁ dṛṣṭvā nihataṁ saṅkhye prahastaṁ kṣaṇadācaram abhidudrāva dhūmrākṣo vegena mahatā kapīn
युद्ध में मारे गए उस निशाचर प्रहस्त को देखकर, धूम्राक्ष महान वेग से वानरों पर टूट पड़ा।
श्लोक 29 (skanda.3.44.29)
कपिसैन्यं समालोक्य विद्रुतं पवनात्मजः । धूम्राक्षमाजघानाशु शरेण रणमूर्धनि
kapisainyaṁ samālokya vidrutaṁ pavanātmajaḥ dhūmrākṣam ājaghānāśu śareṇa raṇamūrdhani
वानर-सेना को भागते देखकर पवनपुत्र हनुमान ने युद्ध के मोर्चे पर धूम्राक्ष को शीघ्र ही बाण से मार गिराया।
श्लोक 30 (skanda.3.44.30)
धूम्राक्षं निहतं दृष्ट्वा हतशेषा निशाचराः । सर्वं राज्ञे यथावृत्तं रावणाय न्यवेदयन्
dhūmrākṣaṁ nihataṁ dṛṣṭvā hataśeṣā niśācarāḥ sarvaṁ rājñe yathāvṛttaṁ rāvaṇāya nyavedayan
धूम्राक्ष को मारा गया देखकर, बचे हुए राक्षसों ने जो कुछ घटित हुआ था, वह सब राजा रावण को बता दिया।
श्लोक 31 (skanda.3.44.31)
ततः शयानं लंकेशः कुम्भकर्णमबोधयत् । प्रबुद्धं प्रेषयामास युद्धाय स च रावणः
tataḥ śayānaṁ laṅkeśaḥ kumbhakarṇam abodhayat prabuddhaṁ preṣayāmāsa yuddhāya sa ca rāvaṇaḥ
तब लंकेश्वर ने सोए हुए कुंभकर्ण को जगाया। जग जाने पर रावण ने उसे युद्ध के लिए भेज दिया।
श्लोक 32 (skanda.3.44.32)
आगतं कुम्भकर्णं तं ब्रह्मास्त्रेण तु लक्ष्मणः । जघान समरे क्रुद्धो गतासुर्न्यपतच्च सः
āgataṁ kumbhakarṇaṁ taṁ brahmāstreṇa tu lakṣmaṇaḥ jaghāna samare kruddho gatāsur nyapatac ca saḥ
आए हुए उस कुंभकर्ण को क्रुद्ध लक्ष्मण ने युद्ध में ब्रह्मास्त्र से मार दिया, और वह प्राणहीन होकर गिर पड़ा।
श्लोक 33 (skanda.3.44.33)
दूषणस्यानुजौ तत्र वत्रवेगप्रमाथिनौ । हनुमन्नीलनिहतौ रावणप्रतिमौ रणे
dūṣaṇasyānujau tatra vātravegapramāthinau hanumannīlanihatau rāvaṇapratimau raṇe
वहाँ दूषण के दोनों छोटे भाई, वज्र के समान वेगशाली, रावण के तुल्य, युद्ध में हनुमान और नील द्वारा मारे गए।
श्लोक 34 (skanda.3.44.34)
वज्रदंष्ट्रं समवधीद्विश्वकर्मसुतो नलः । अकंपनं च न्यहनत्कुमुदो वानरर्षभः
vajradaṁṣṭraṁ samavadhīd viśvakarmasuto nalaḥ akampanaṁ ca nyahanat kumudo vānararṣabhaḥ
विश्वकर्मा-पुत्र नल ने वज्रदंष्ट्र को मारा, और वानर-श्रेष्ठ कुमुद ने अकंपन को मार गिराया।
श्लोक 35 (skanda.3.44.35)
षष्ठ्यां पराजितो राजा प्राविशच्च पुरीं ततः । अतिकायो लक्ष्मणेन हतश्च त्रिशिरास्तथा
ṣaṣṭhyāṁ parājito rājā prāviśac ca purīṁ tataḥ atikāyo lakṣmaṇena hataś ca triśirās tathā
छठे दिन पराजित होकर राजा नगरी में प्रवेश कर गया। अतिकाय और त्रिशिरा भी लक्ष्मण द्वारा मारे गए।
श्लोक 36 (skanda.3.44.36)
सुग्रीवेण हतौ युद्धे देवांत कनरांतकौ । हनूमता हतौ युद्धे कुम्भकर्णसुतावुभौ
sugrīveṇa hatau yuddhe devāntakanarāntakau hanūmatā hatau yuddhe kumbhakarṇasutāv ubhau
देवांतक और नरांतक दोनों सुग्रीव द्वारा युद्ध में मारे गए। कुंभकर्ण के दोनों पुत्र हनुमान द्वारा युद्ध में मारे गए।
श्लोक 37 (skanda.3.44.37)
विभीषणेन निहतो मकराक्षः खरात्मजः । तत इन्द्रजितं पुत्रं चोदयामास रावणः
vibhīṣaṇena nihato makarākṣaḥ kharātmajaḥ tata indrajitaṁ putraṁ codayāmāsa rāvaṇaḥ
खर-पुत्र मकराक्ष विभीषण द्वारा मारा गया। तब रावण ने अपने पुत्र इंद्रजित को युद्ध के लिए प्रेरित किया।
श्लोक 38 (skanda.3.44.38)
इन्द्रजिन्मोहयित्वा तौ भ्रातरौ रामलक्षमणौ । घोरैः शरैरंगदेन हतवाहो दिवि स्थितः
indrajin mohayitvā tau bhrātarau rāmalakṣmaṇau ghoraiḥ śarair aṅgadena hatavāho divi sthitaḥ
इंद्रजित ने राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को मोहित कर, घोर बाणों से उनके रथ को नष्ट कर, आकाश में स्थित होकर,
श्लोक 39 (skanda.3.44.39)
कुमुदांगदसुग्रीवनलजांबवदादिभिः । सहिता वानराः सर्वे न्यपतंस्तेन घातिताः
kumudāṅgadasugrīvanalajāmbavadādibhiḥ sahitā vānarāḥ sarve nyapatams tena ghātitāḥ
कुमुद, अंगद, सुग्रीव, नल, जांबवान आदि के साथ मौजूद सभी वानर, उसके द्वारा घायल होकर गिर पड़े।
श्लोक 40 (skanda.3.44.40)
एवं निहत्य समरे ससैन्यौ रामलक्ष्मणौ । अंतर्दधे तदा व्योम्नि मेघनादो महाबलः
evaṁ nihatya samare sasainyau rāmalakṣmaṇau antardadhe tadā vyomni meghanādo mahābalaḥ
इस प्रकार युद्ध में सेना सहित राम और लक्ष्मण को घायल कर, महाबली मेघनाद आकाश में अंतर्धान हो गया।
श्लोक 41 (skanda.3.44.41)
ततो विभीषणो राममिक्ष्वाकुकुलभूषणम् । उवाच प्रांजलिर्वाक्यं प्रणम्य च पुनःपुनः
tato vibhīṣaṇo rāmam ikṣvākukulabhūṣaṇam uvāca prāñjalir vākyaṁ praṇamya ca punaḥ punaḥ
तब विभीषण ने इक्ष्वाकु-कुल के भूषण राम से हाथ जोड़कर, बार-बार प्रणाम करते हुए यह वचन कहा।
श्लोक 42 (skanda.3.44.42)
अयमंभो गृहीत्वा तु राजराजस्य शासनात् । गुह्यकोऽभ्यागतो राम त्वत्सकाशमरिंदम
ayam ambho gṛhītvā tu rājarājasya śāsanāt guhyako'bhyāgato rāma tvatsakāśam ariṁdama
हे शत्रुदमन राम! राजराज की आज्ञा से यह जल लेकर एक गुह्यक तुम्हारे समीप आया है।
श्लोक 43 (skanda.3.44.43)
इदमंभः कुबेरस्ते महाराज प्रयच्छति । अंतर्हितानां भूतानां दर्शनार्थं परं तप
idam ambhaḥ kuberas te mahārāja prayacchati antarhitānāṁ bhūtānāṁ darśanārthaṁ paraṁ tapa
हे महाराज! यह जल कुबेर तुम्हें अर्पित करते हैं, हे परम तपस्वी! यह अंतर्धान हुए प्राणियों को देखने के लिए है।
श्लोक 44 (skanda.3.44.44)
अनेन स्पृष्टनयनो भूतान्यंतर्हितान्यपि । भवान्द्रक्ष्यति यस्मै वा भवानेतत्प्रदास्यति
anena spṛṣṭanayano bhūtāny antarhitāny api bhavān drakṣyati yasmai vā bhavān etat pradāsyati
इससे नेत्र स्पर्श करके आप अंतर्धान हुए प्राणियों को भी देख सकेंगे, और जिसे भी आप इसे देंगे,
श्लोक 45 (skanda.3.44.45)
सोऽपि द्रक्ष्यति भूतानि वियत्त्यंतर्हितानि वै । तथेति रामस्तद्वारि प्रतिगृह्याथ सत्कृतम्
so'pi drakṣyati bhūtāni viyaty antarhitāni vai tatheti rāmas tad vāri pratigṛhyātha satkṛtam
वह भी आकाश में अंतर्धान हुए प्राणियों को देख सकेगा। 'ऐसा ही हो' कहकर राम ने उस सम्मानित जल को ग्रहण कर,
श्लोक 46 (skanda.3.44.46)
चकार नेत्रयोः शौचं लक्ष्मणश्च महाबलः । सुग्रीवजांबवन्तौ च हनुमानंगदस्तथा
cakāra netrayoḥ śaucaṁ lakṣmaṇaś ca mahābalaḥ sugrīvajāmbavantau ca hanumān aṅgadas tathā
अपने नेत्रों को पवित्र किया, और महाबली लक्ष्मण, सुग्रीव और जाम्बवान, तथा हनुमान और अंगद ने भी,
श्लोक 47 (skanda.3.44.47)
मैंदद्विविदनीलाश्च ये चान्ये वानरास्तथा । ते सर्वे रामदत्तेन वारिणा शुद्धचक्षुषः
maindadvividanīlāś ca ye cānye vānarās tathā te sarve rāmadattena vāriṇā śuddhacakṣuṣaḥ
मैंद, द्विविद, नील, तथा अन्य समस्त वानरों ने भी। वे सभी राम द्वारा दिए गए जल से पवित्र-नेत्र होकर,
श्लोक 48 (skanda.3.44.48)
आकाशेंतर्हितं वीरमपश्यन्रावणा त्मजम् । ततस्तमभिदुद्राव सौमित्रिर्दृष्टिगोचरम्
ākāśe'ntarhitaṁ vīram apaśyan rāvaṇātmajam tatas tam abhidudrāva saumitrir dṛṣṭigocaram
आकाश में अंतर्धान हुए वीर रावण-पुत्र को देखने लगे। तब दृष्टिगोचर हुए उस पर सुमित्रा-पुत्र दौड़ पड़े।
श्लोक 49 (skanda.3.44.49)
ततो जघान संकुद्धो लक्ष्मणः कृतलक्षणः । कुवेरप्रेषितजलैः पवित्रीकृतलोचनः
tato jaghāna saṅkruddho lakṣmaṇaḥ kṛtalakṣaṇaḥ kuberapreṣitajalaiḥ pavitrīkṛtalocanaḥ
तब कुबेर द्वारा भेजे गए जल से पवित्र-नेत्र हुए, निशान बना चुके, अत्यंत क्रुद्ध लक्ष्मण ने उसे मार डाला।
श्लोक 50 (skanda.3.44.50)
ततः समभवद्युद्धं लक्ष्मणेंद्रजितोर्महत् । अतीव चित्रमाश्चर्यं शक्रप्रह्लादयोरिव
tataḥ samabhavad yuddhaṁ lakṣmaṇendrajitor mahat atīva citram āścaryaṁ śakraprahlādayor iva
तब लक्ष्मण और इंद्रजित के बीच महान युद्ध हुआ, अत्यंत विचित्र और आश्चर्यकारी, इंद्र और प्रह्लाद के युद्ध के समान।
श्लोक 51 (skanda.3.44.51)
ततस्तृतीयदिवसे यत्नेन महता द्विजाः । इंद्रजिन्निहतो युद्धे लक्ष्मणेन बलीयसा
tatas tṛtīyadivase yatnena mahatā dvijāḥ indrajin nihato yuddhe lakṣmaṇena balīyasā
हे द्विजो! तब तीसरे दिन, महान प्रयत्न से, बलवान लक्ष्मण द्वारा युद्ध में इंद्रजित मारा गया।
श्लोक 52 (skanda.3.44.52)
ततो मूलबलं सर्वं हतं रामेण धीमता । अथ क्रुद्धो दशग्रीवः प्रियपुत्रे निपातिते
tato mūlabalaṁ sarvaṁ hataṁ rāmeṇa dhīmatā atha kruddho daśagrīvaḥ priyaputre nipātite
तब बुद्धिमान राम द्वारा समस्त मूल सेना को नष्ट कर दिया गया। तब अपने प्रिय पुत्र के गिर जाने पर क्रुद्ध हुआ दशग्रीव,
श्लोक 53 (skanda.3.44.53)
निर्ययौ रथमास्थाय नगराद्बहुसैनिकः । रावणो जानकीं हन्तुमुद्युक्तो विंध्यवारितः
niryayau ratham āsthāya nagarād bahusainikaḥ rāvaṇo jānakīṁ hantum udyukto vindhyavāritaḥ
बहुत से सैनिकों सहित रथ पर चढ़कर नगर से निकल पड़ा। सीता को मारने के लिए उद्यत रावण को विंध्य ने रोक दिया।
श्लोक 54 (skanda.3.44.54)
ततो हर्यश्वयुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा । उपतस्थे रणे रामं मातलिः शक्रसारथिः
tato haryaśvayuktena rathenādityavarcasā upatasthe raṇe rāmaṁ mātaliḥ śakrasārathiḥ
तब इंद्र के सारथी मातलि, आदित्य के समान तेजस्वी, हरे घोड़ों से युक्त रथ के साथ, युद्ध में राम के समीप उपस्थित हुए।
श्लोक 55 (skanda.3.44.55)
ऐन्द्रं रथं समारुह्य रामो धर्मभृतां वरः । शिरांसि राक्षसेन्द्रस्य ब्रह्मास्त्रेणावधीद्रणे
aindraṁ rathaṁ samāruhya rāmo dharmabhṛtāṁ varaḥ śirāṁsi rākṣasendrasya brahmāstreṇāvadhīd raṇe
धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ राम उस इंद्र के रथ पर चढ़कर, राक्षसराज के सिरों को युद्ध में ब्रह्मास्त्र से मार डाला।
श्लोक 56 (skanda.3.44.56)
ततो हतदशग्रीवं रामं दशरथात्मजम् । आशीर्भिर्जययुक्ताभिर्देवाः सर्षिपुरोगमाः
tato hatadaśagrīvaṁ rāmaṁ daśarathātmajam āśīrbhir jayayuktābhir devāḥ sarṣipurogamāḥ
तब दशग्रीव को मार गिराने वाले, दशरथ-पुत्र राम की, विजय-युक्त आशीर्वादों से, ऋषियों सहित देवताओं ने,
श्लोक 57 (skanda.3.44.57)
तुष्टुवुः परिसंतुष्टाः सिद्धविद्याधरास्तथा । रामं कमलपत्राक्षं पुष्प वर्षेरवाकिरन्
tuṣṭuvuḥ parisantuṣṭāḥ siddhavidyādharās tathā rāmaṁ kamalapatrākṣaṁ puṣpavarṣair avākiran
अत्यंत संतुष्ट होकर स्तुति की, तथा सिद्धों और विद्याधरों ने भी। कमल-नेत्र राम पर उन्होंने पुष्प-वर्षा की।
श्लोक 58 (skanda.3.44.58)
रामस्तैः सुरसंघातैः सहितः सैनिकैर्वृतः । सीतासौमित्रिसहितः समारुह्य च पुष्पकम्
rāmas taiḥ surasaṅghātaiḥ sahitaḥ sainikair vṛtaḥ sītāsaumitrisahitaḥ samāruhya ca puṣpakam
उन देव-समूहों के साथ, सैनिकों से घिरे हुए, सीता तथा सुमित्रा-पुत्र सहित, राम पुष्पक विमान पर चढ़कर,
श्लोक 59 (skanda.3.44.59)
तथाभिषिच्य राजानं लंकायां च विभीषणम् । कपिसेनावृतो रामो गन्धमादनमन्वगात्
tathābhiṣicya rājānaṁ laṅkāyāṁ ca vibhīṣaṇam kapisenāvṛto rāmo gandhamādanam anvagāt
और लंका में विभीषण को राजा के रूप में अभिषिक्त कर, वानर-सेना से घिरे हुए राम गन्धमादन पर्वत की ओर चले गए।
श्लोक 60 (skanda.3.44.60)
परिशोध्य च वैदेहीं गंधमादनपर्वते । रामं कमलपत्राक्षं स्थितवानर संवृतम्
pariśodhya ca vaidehīṁ gandhamādanaparvate rāmaṁ kamalapatrākṣaṁ sthitavānarasaṁvṛtam
गन्धमादन पर्वत पर वैदेही की शुद्धि करवाकर, वहाँ स्थित कमल-नेत्र राम को, वानरों से घिरे हुए,
श्लोक 61 (skanda.3.44.61)
हतलंकेश्वरं वीरं सानुजं सविभीषणम् । सभार्यं देववृंदैश्च सेवितं मुनिपुंगवैः
hatalaṅkeśvaraṁ vīraṁ sānujaṁ savibhīṣaṇam sabhāryaṁ devavṛndaiś ca sevitaṁ munipuṅgavaiḥ
लंकेश्वर का वध करने वाले वीर, अनुज सहित, विभीषण सहित, पत्नी सहित, देव-समूहों तथा मुनिश्रेष्ठों द्वारा सेवित,
श्लोक 62 (skanda.3.44.62)
मुनयोऽभ्यागता द्रष्टुं दंडकारण्य वासिनः । अगस्त्यं ते पुरस्कृत्य तुष्टुवुर्मैथिलीपतिम्
munayo'bhyāgatā draṣṭuṁ daṇḍakāraṇyavāsinaḥ agastyaṁ te puraskṛtya tuṣṭuvur maithilīpatim
दंडकारण्य-निवासी मुनि उन्हें देखने के लिए आए, और अगस्त्य को आगे कर मैथिली के पति की स्तुति की।
श्लोक 63 (skanda.3.44.63)
मुनय ऊचुः । नमस्ते रामचंद्राय लोकानुग्रहकारिणे । अरावणं जगत्कर्तुमवतीर्णाय भूतले
munaya ūcuḥ namaste rāmacandrāya lokānugrahakāriṇe arāvaṇaṁ jagat kartum avatīrṇāya bhūtale
मुनियों ने कहा — लोक पर अनुग्रह करने वाले, जगत को रावण-रहित करने के लिए भूतल पर अवतरित हुए रामचंद्र को नमस्कार है।
श्लोक 64 (skanda.3.44.64)
ताटिकादेहसंहर्त्रे गाधिजाध्वररक्षिणे । नमस्ते जितमारीच सुवाहुप्राणहारिणे
tāṭikādehasaṁhartre gādhijādhvararakṣiṇe namaste jitamārīca suvāhuprāṇahāriṇe
ताड़का के शरीर के संहारक, गाधि-पुत्र के यज्ञ की रक्षा करने वाले, मारीच को जीतने वाले, सुबाहु के प्राणों का हरण करने वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक 65 (skanda.3.44.65)
अहल्यामुक्तिसंदायिपादपंकजरेणवे । नमस्ते हरकोदण्डलीलाभञ्जनकारिणे
ahalyāmuktisandāyipādapaṅkajareṇave namaste harakodaṇḍalīlābhañjanakāriṇe
अहल्या को मुक्ति देने वाले चरण-कमल की रज वाले, शिव के धनुष को लीलामात्र से तोड़ने वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक 66 (skanda.3.44.66)
नमस्ते मैथिलीपाणिग्रहणोत्सवशालिने । नमस्ते रेणुकापुत्रपराजयविधायिने
namaste maithilīpāṇigrahaṇotsavaśāline namaste reṇukāputraparājayavidhāyine
मैथिली के पाणिग्रहण के उत्सव से युक्त, रेणुका-पुत्र को पराजित करने वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक 67 (skanda.3.44.67)
सहलक्ष्मणसीताभ्यां कैकेय्यास्तु वरद्वयात् । सत्यं पितृवचः कर्तुं नमो वनमुपे युषे
sahalakṣmaṇasītābhyāṁ kaikeyyās tu varadvayāt satyaṁ pitṛvacaḥ kartuṁ namo vanam upeyuṣe
लक्ष्मण और सीता सहित, कैकेयी के दो वरों के कारण, पिता के वचन को सत्य करने के लिए वन में जाने वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक 68 (skanda.3.44.68)
भरतप्रार्थनादत्तपादुकायुगुलाय ते । नमस्ते शरभंगस्य स्वर्गप्राप्त्यैकहेतवे
bharataprārthanādattapādukāyugulāya te namaste śarabhaṅgasya svargaprāptyaikahetave
भरत की प्रार्थना पर उन्हें पादुकाओं का युगल देने वाले, आपको नमस्कार है। शरभंग के स्वर्ग-प्राप्ति के एकमात्र कारण, आपको नमस्कार है।
श्लोक 69 (skanda.3.44.69)
नमो विराधसंहर्त्रे गृधराजस खाय ते । मायामृगमहाक्रूरमारीचांगविदारिणे
namo virādhasaṁhartre gṛdharājasakhāya te māyāmṛgamahākrūramārīcāṅgavidāriṇe
विराध के संहारक, गृध्रराज के मित्र, मायावी अत्यंत क्रूर मृग-रूपी मारीच के अंगों को विदीर्ण करने वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक 70 (skanda.3.44.70)
सीतापहारिलोकेशयुद्धत्यक्तकलेवरम् । जटायुषं तु संदह्य तत्कैवल्यप्रदायिने
sītāpahārilokeśayuddhatyaktakalevaram jaṭāyuṣaṁ tu saṁdahya tatkaivalyapradāyine
सीता-हरण करने वाले लोकेश से युद्ध कर शरीर त्यागने वाले जटायु का दाह-संस्कार कर, उसे कैवल्य प्रदान करने वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक 71 (skanda.3.44.71)
नमः कबंधसंहर्त्रे शवरीपूजितांघ्रये । प्राप्तसुग्रीवसख्याय कृतवालिवधाय ते
namaḥ kabandhasaṁhartre śavarīpūjitāṅghraye prāptasugrīvasakhyāya kṛtavālivadhāya te
कबंध के संहारक, शबरी द्वारा पूजित चरणों वाले, सुग्रीव की मित्रता प्राप्त करने वाले, वालि का वध करने वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक 72 (skanda.3.44.72)
नमः कृतवते सेतुं समुद्रे वरुणालये । सर्वराक्षससंहर्त्रे रावणप्राणहारिणे
namaḥ kṛtavate setuṁ samudre varuṇālaye sarvarākṣasasaṁhartre rāvaṇaprāṇahāriṇe
वरुण के आलय समुद्र में सेतु बनाने वाले, समस्त राक्षसों के संहारक, रावण के प्राणों का हरण करने वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक 73 (skanda.3.44.73)
संसारांबुधिसंतारपोतपादांबुजाय ते । नमो भक्तार्तिसंहर्त्रे सच्चिदानंदरूपिणे
saṁsārāmbudhisaṁtārapotapādāmbujāya te namo bhaktārtisaṁhartre saccidānandarūpiṇe
संसार-सागर से पार उतारने के लिए नौका-रूप चरण-कमल वाले, भक्तों के दुःख के संहारक, सत्-चित्-आनंद-स्वरूप, आपको नमस्कार है।
श्लोक 74 (skanda.3.44.74)
नमस्ते राम भद्राय जगतामृद्धिहेतवे । रामादिपुण्यनामानि जपतां पापहारिणे
namaste rāma bhadrāya jagatām ṛddhihetave rāmādipuṇyanāmāni japatāṁ pāpahāriṇe
हे राम! कल्याणकारी, जगत की समृद्धि के कारण, 'राम' आदि पुण्य नामों का जप करने वालों के पापों को हरने वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक 75 (skanda.3.44.75)
नमस्ते सर्वलोकानां सृष्टिस्थित्यंतकारिणे । नमस्ते करुणामूर्ते भक्तरक्षणदीक्षित
namaste sarvalokānāṁ sṛṣṭisthityantakāriṇe namaste karuṇāmūrte bhaktarakṣaṇadīkṣita
समस्त लोकों की सृष्टि, स्थिति, और संहार करने वाले, आपको नमस्कार है। हे करुणामूर्ते! हे भक्तों की रक्षा के लिए प्रतिज्ञाबद्ध! आपको नमस्कार है।
श्लोक 76 (skanda.3.44.76)
ससीताय नमस्तुभ्यं विभीषणसुखप्रद । लंकेश्वरवधाद्राम पालितं हि जगत्त्वया
sasītāya namas tubhyaṁ vibhīṣaṇasukhaprada laṅkeśvaravadhād rāma pālitaṁ hi jagat tvayā
सीता सहित आपको नमस्कार है, हे विभीषण को सुख देने वाले! हे राम! लंकेश्वर के वध से आपने ही जगत का पालन किया है।
श्लोक 77 (skanda.3.44.77)
रक्षरक्ष जगन्नाथ पाह्य स्माञ्जानकीपते । स्तुत्वैवं मुनयः सर्वे तूष्णीं तस्थुर्द्विजोत्तमाः
rakṣa rakṣa jagannātha pāhy asmāñ jānakīpate stutvaivaṁ munayaḥ sarve tūṣṇīṁ tasthur dvijottamāḥ
हे जगन्नाथ! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। हे जानकीपति! हमारी रक्षा कीजिए। हे द्विजोत्तमो! इस प्रकार स्तुति कर सभी मुनि मौन होकर बैठ गए।
श्लोक 78 (skanda.3.44.78)
श्रीसूत उवाच । य इदं रामचन्द्रस्य स्तोत्रं मुनिभिरीरितम् । त्रिसंध्यं पठते भक्त्या भुक्तिं मुक्तिं च विंदति
śrīsūta uvāca ya idaṁ rāmacandrasya stotraṁ munibhir īritam trisandhyaṁ paṭhate bhaktyā bhuktiṁ muktiṁ ca vindati
श्री सूत जी ने कहा — जो कोई इस मुनियों द्वारा कहे गए रामचंद्र के स्तोत्र को तीनों संध्याओं में भक्तिपूर्वक पढ़ता है, वह भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है।
श्लोक 79 (skanda.3.44.79)
प्रयाणकाले पठतो न भीतिरुपजायते । एतत्स्तोत्रस्य पठनाद्भूतवेतालकादयः
prayāṇakāle paṭhato na bhītir upajāyate etat stotrasya paṭhanād bhūtavetālakādayaḥ
मृत्यु के समय इसे पढ़ने वाले को कोई भय नहीं होता। इस स्तोत्र के पढ़ने से भूत-वेताल आदि,
श्लोक 80 (skanda.3.44.80)
नश्यंति रोगा नश्यंति नश्यते पापसंचयः । पुत्रकामो लभेत्पुत्रं कन्या विंदति सत्पतिम्
naśyanti rogā naśyanti naśyate pāpasañcayaḥ putrakāmo labhet putraṁ kanyā vindati satpatim
नष्ट हो जाते हैं, रोग नष्ट हो जाते हैं, तथा पाप-संचय नष्ट हो जाता है। पुत्र की कामना करने वाला पुत्र प्राप्त करता है, कन्या सत्पति प्राप्त करती है।
श्लोक 81 (skanda.3.44.81)
मोक्षकामो लभेन्मोक्षं धनकामो धनं लभेत् । सर्वान्कामानवाप्नोति पठन्भक्त्या त्विमं स्तवम्
mokṣakāmo labhen mokṣaṁ dhanakāmo dhanaṁ labhet sarvān kāmān avāpnoti paṭhan bhaktyā tv imaṁ stavam
मोक्ष की कामना करने वाला मोक्ष प्राप्त करता है, धन की कामना करने वाला धन प्राप्त करता है। भक्तिपूर्वक इस स्तव को पढ़ने वाला समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।
श्लोक 82 (skanda.3.44.82)
ततो रामो मुनीन्प्राह प्रणम्य च कृतांजलिः । अहं विशुद्धये प्राप्यः सकलैरपि मानवैः
tato rāmo munīn prāha praṇamya ca kṛtāñjaliḥ ahaṁ viśuddhaye prāpyaḥ sakalair api mānavaiḥ
तब हाथ जोड़कर प्रणाम कर राम ने मुनियों से कहा — मैं समस्त मनुष्यों द्वारा भी विशुद्धि के लिए प्राप्तव्य हूँ।
श्लोक 83 (skanda.3.44.83)
मद्दृष्टिगोचरो जन्तुर्नित्यमोक्षस्य भाजनम् । तथापि मुनयो नित्यं भक्तियुक्तेन चेतसा
maddṛṣṭigocaro jantur nityamokṣasya bhājanam tathāpi munayo nityaṁ bhaktiyuktena cetasā
जो प्राणी मेरी दृष्टि के विषय होते हैं, वे नित्य-मोक्ष के भागी हैं। फिर भी हे मुनियो! भक्तियुक्त चित्त से नित्य,
श्लोक 84 (skanda.3.44.84)
स्वात्मलाभेन संतुष्टान्साधून्भूतसुहृत्तमान् । निरहंकारिणः शांतान्नमस्याम्यूर्ध्वरेतसः
svātmalābhena santuṣṭān sādhūn bhūtasuhṛttamān nirahaṅkāriṇaḥ śāntān namasyāmy ūrdhvaretasaḥ
आत्मलाभ से संतुष्ट, समस्त प्राणियों के परम मित्र, निरहंकारी, शांत, ऊर्ध्वरेता साधुओं को मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 85 (skanda.3.44.85)
यस्माद्ब्रह्मण्यदेवोऽहमतो विप्रान्भजे सदा । युष्मान्पृच्छाम्यहं किंचित्तद्वदध्वं विचार्य तु
yasmād brahmaṇyadevo'ham ato viprān bhaje sadā yuṣmān pṛcchāmy ahaṁ kiñcit tad vadadhvaṁ vicārya tu
क्योंकि मैं ब्रह्मण्यदेव हूँ, इसलिए मैं सदा ब्राह्मणों को भजता हूँ। मैं आप लोगों से कुछ पूछता हूँ, विचार कर बताइए।
श्लोक 86 (skanda.3.44.86)
रावणस्य वधाद्विप्रा यत्पापं मम वर्तते । तस्य मे निष्कृतिं ब्रूत पौलस्त्यवधजस्य हि । यत्कृत्वा तेन पापे न मुच्येऽहं मुनिपुंगवाः
rāvaṇasya vadhād viprā yat pāpaṁ mama vartate tasya me niṣkṛtiṁ brūta paulastyavadhajasya hi yat kṛtvā tena pāpe na mucye'haṁ munipuṅgavāḥ
हे विप्रो! रावण के वध से जो पाप मुझ पर लगा है, हे मुनिपुंगवो! पुलस्त्य-वंशज के वध से उत्पन्न उस पाप की निष्कृति मुझे बताइए, जिसे करके मैं उस पाप से मुक्त हो जाऊँ।
श्लोक 87 (skanda.3.44.87)
मुनय ऊचुः । सत्यव्रत जगन्नाथ जगद्रक्षाधुरंधर
munaya ūcuḥ satyavrata jagannātha jagadrakṣādhuraṁdhara
मुनियों ने कहा — हे सत्यव्रत! हे जगन्नाथ! हे जगत की रक्षा का भार धारण करने वाले!
श्लोक 88 (skanda.3.44.88)
सर्वलोकोपकारार्थं कुरु राम शिवार्चनम् । गन्धमादनशृंगेऽस्मिन्महापुण्ये विमुक्तिदे
sarvalokopakārārthaṁ kuru rāma śivārcanam gandhamādanaśṛṅge'smin mahāpuṇye vimuktide
हे राम! समस्त लोक के उपकार के लिए, इस अत्यंत पुण्यमय, मुक्तिदायक गन्धमादन शिखर पर शिव-अर्चना कीजिए।
श्लोक 89 (skanda.3.44.89)
शिवलिंगप्रतिष्ठां त्वं लोकसंग्रहकाम्यया । कुरु राम दशग्रीववधदोषापनुत्तये
śivaliṅgapratiṣṭhāṁ tvaṁ lokasaṅgrahakāmyayā kuru rāma daśagrīvavadhadoṣāpanuttaye
हे राम! लोक-संग्रह की कामना से, दशग्रीव के वध के दोष को दूर करने के लिए, आप शिवलिंग की प्रतिष्ठा कीजिए।
श्लोक 90 (skanda.3.44.90)
लिंगस्थापनजं पुण्यं चतुर्वक्त्रोऽपि भाषितुम् । न शक्नोति ततो वक्तुं किं पुनर्मनुजेश्वर
liṅgasthāpanajaṁ puṇyaṁ caturvaktro'pi bhāṣitum na śaknoti tato vaktuṁ kiṁ punar manujeśvara
लिंग-स्थापना से उत्पन्न पुण्य को चतुर्मुख ब्रह्मा भी कहने में समर्थ नहीं हैं; तो हे मनुजेश्वर! और कौन कह सकता है?
श्लोक 91 (skanda.3.44.91)
यत्त्वया स्थाप्यते लिगं गन्धमादनपर्वते । अस्य संदर्शनं पुंसां काशीलिंगावलोकनात्
yat tvayā sthāpyate liṅgaṁ gandhamādanaparvate asya sandarśanaṁ puṁsāṁ kāśīliṅgāvalokanāt
गन्धमादन पर्वत पर आपके द्वारा जो लिंग स्थापित किया जाएगा, उसके दर्शन मात्र से मनुष्यों को काशी के लिंग के दर्शन से,
श्लोक 92 (skanda.3.44.92)
अधिकं कोटिगुणितं फलवत्स्यान्न संशयः । तव नाम्ना त्विदं लिंगं लोके ख्यातिं समश्नुताम्
adhikaṁ koṭiguṇitaṁ phalavat syān na saṁśayaḥ tava nāmnā tv idaṁ liṅgaṁ loke khyātiṁ samaśnutām
करोड़ों गुना अधिक फलदायक होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। आपके ही नाम से यह लिंग संसार में ख्याति प्राप्त करे,
श्लोक 93 (skanda.3.44.93)
नाशकं पुण्यपापाख्यकाष्ठानां दहनोपमम् । इदं रामेश्वरं लिंगं ख्यातं लोके भविष्यति
nāśakaṁ puṇyapāpākhyakāṣṭhānāṁ dahanopamam idaṁ rāmeśvaraṁ liṅgaṁ khyātaṁ loke bhaviṣyati
जो पुण्य-पाप रूपी काष्ठ को अग्नि के समान नष्ट करने वाला हो। यह रामेश्वर नामक लिंग संसार में विख्यात होगा।
श्लोक 94 (skanda.3.44.94)
मा विलंबं कुरुष्वातो लिंगस्थापनकर्मणि । रामचंद्र महाभाग करुणापूर्णविग्रह
mā vilambaṁ kuruṣvāto liṅgasthāpanakarmaṇi rāmacandra mahābhāga karuṇāpūrṇavigraha
हे रामचंद्र! हे महाभाग्यशाली! हे करुणा से परिपूर्ण मूर्ति! अतः लिंग-स्थापना के कार्य में विलंब मत कीजिए।
श्लोक 95 (skanda.3.44.95)
श्रीसूत उवाच । इति श्रुत्वा वचो रामो मुनीनां तं मुनीश्वराः । पुण्यकालं विचार्याथ द्विमुहूर्तं जगत्पतिः
śrīsūta uvāca iti śrutvā vaco rāmo munīnāṁ taṁ munīśvarāḥ puṇyakālaṁ vicāryātha dvimuhūrtaṁ jagatpatiḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे मुनीश्वरो! मुनियों के इस वचन को सुनकर, जगत्पति राम ने दो मुहूर्तों के पुण्यकाल का विचार कर,
श्लोक 96 (skanda.3.44.96)
कैलासं प्रेषयामास हनुमन्तं शिवालयम् । शिवलिंगं समानेतुं स्थापनार्थं रघूद्वहः
kailāsaṁ preṣayāmāsa hanumantaṁ śivālayam śivaliṅgaṁ samānetuṁ sthāpanārthaṁ raghūdvahaḥ
शिव के निवास कैलास को हनुमान को भेजा। रघुकुल-श्रेष्ठ राम ने स्थापना के लिए शिवलिंग को लाने हेतु उन्हें भेजा।
श्लोक 97 (skanda.3.44.97)
राम उवाच । हनूमन्नंजनीसूनो वायुपुत्र महाबल । कैलासं त्वरितो गत्वा लिंगमानय मा चिरम्
rāma uvāca hanūman añjanīsūno vāyuputra mahābala kailāsaṁ tvarito gatvā liṅgam ānaya mā ciram
राम ने कहा — हे हनुमान! हे अंजनी-पुत्र! हे वायु-पुत्र! हे महाबली! शीघ्रता से कैलास जाकर लिंग को लाओ, विलंब मत करो।
श्लोक 98 (skanda.3.44.98)
इत्याज्ञप्तस्स रामेण भुजावास्फाल्य वीर्यवान् । मुहूर्तद्वितयं ज्ञात्वा पुण्यकालं कपीश्वरः
ity ājñaptas sa rāmeṇa bhujāv āsphālya vīryavān muhūrtadvitayaṁ jñātvā puṇyakālaṁ kapīśvaraḥ
राम द्वारा इस प्रकार आज्ञप्त होकर, वीर्यवान वानरराज हनुमान ने अपनी भुजाओं को फड़काकर, दो मुहूर्तों के पुण्यकाल को जानकर,
श्लोक 99 (skanda.3.44.99)
पश्यतां सर्वदेवानामृषीणां च महात्मनाम् । उत्पपात महावेगश्चालयन्गंधमादनम्
paśyatāṁ sarvadevānām ṛṣīṇāṁ ca mahātmanām utpapāta mahāvegaś cālayan gandhamādanam
समस्त देवताओं तथा महात्मा ऋषियों के देखते-देखते, गन्धमादन पर्वत को हिलाता हुआ, महावेग से आकाश में उड़ चला।
श्लोक 100 (skanda.3.44.100)
लंघयन्स वियन्मार्गं कैलासं पर्वतं ययौ । न ददर्श महादेवं लिंगरूपधरं कपिः
laṅghayan sa viyanmārgaṁ kailāsaṁ parvataṁ yayau na dadarśa mahādevaṁ liṅgarūpadharaṁ kapiḥ
आकाश-मार्ग को लाँघते हुए वह कैलास पर्वत पर पहुँचा। किंतु उस वानर को लिंग-रूपधारी महादेव का दर्शन नहीं हुआ।
श्लोक 101 (skanda.3.44.101)
कैलासे पर्वते तस्मिन्पुण्ये शंकरपालिते । आंजनेयस्तपस्तेपे लिंगप्राप्त्यर्थमादरात्
kailāse parvate tasmin puṇye śaṅkarapālite āñjaneyas tapas tepe liṅgaprāptyartham ādarāt
उस पुण्यमय, शंकर-पालित कैलास पर्वत पर, आंजनेय ने लिंग-प्राप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक तप किया।
श्लोक 102 (skanda.3.44.102)
प्रागग्रेषु समासीनः कुशेषु मुनिपुंगवाः । ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बो निरुच्छ्वासो जितेंद्रियः
prāgagreṣu samāsīnaḥ kuśeṣu munipuṅgavāḥ ūrdhvabāhur nirālambo nirucchvāso jitendriyaḥ
हे मुनिश्रेष्ठो! पूर्व की ओर अग्रभाग वाले कुशों पर बैठकर, ऊर्ध्वबाहु, निरालंब, श्वास-रहित, जितेंद्रिय होकर,
श्लोक 103 (skanda.3.44.103)
प्रसादयन्महादेवं लिंगं लेभे स मारुतिः । एतस्मिन्नंतरे विप्रा मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः
prasādayan mahādevaṁ liṅgaṁ lebhe sa mārutiḥ etasminn antare viprā munibhis tattvadarśibhiḥ
महादेव को प्रसन्न करते हुए, वह मारुति लिंग को प्राप्त करने लगा। इसी बीच, हे विप्रो! तत्त्वदर्शी मुनियों द्वारा,
श्लोक 104 (skanda.3.44.104)
अनागतं हनूमंतं कालं स्वल्पावशेषितम् । ज्ञात्वा प्रकथितं तत्र रामं प्रति महामतिम्
anāgataṁ hanūmantaṁ kālaṁ svalpāvaśeṣitam jñātvā prakathitaṁ tatra rāmaṁ prati mahāmatim
हनुमान के न लौटने और शेष रह गए अल्प समय को जानकर, वहाँ महामति राम से यह कहा गया।
श्लोक 105 (skanda.3.44.105)
रामराम महाबाहो कालो ह्यत्येति सांप्रतम् । जानक्या यत्कृतं लिंगं सैकतं लीलया विभो
rāmarāma mahābāho kālo hy atyeti sāmpratam jānakyā yat kṛtaṁ liṅgaṁ saikataṁ līlayā vibho
हे राम, राम! हे महाबाहो! अभी समय बीता जा रहा है। हे विभो! जानकी द्वारा लीलामात्र से जो बालू का लिंग बनाया गया है,
श्लोक 106 (skanda.3.44.106)
तल्लिंगं स्थापयस्वाद्य महालिंगमनुत्तमम् । श्रुत्वैतद्वचनं रामो जानक्या सह सत्वरम्
tal liṅgaṁ sthāpayasvādya mahāliṅgam anuttamam śrutvaitad vacanaṁ rāmo jānakyā saha satvaram
उस उत्तम महालिंग को ही आज स्थापित कर दीजिए। यह वचन सुनकर राम, जानकी के साथ तत्काल,
श्लोक 107 (skanda.3.44.107)
मुनिभिः सहितः प्रीत्या कृतकौतुकमंगलः । ज्येष्ठे मासे सिते पक्षे दशम्यां बुधहस्तयोः
munibhiḥ sahitaḥ prītyā kṛtakautukamaṅgalaḥ jyeṣṭhe māse site pakṣe daśamyāṁ budhahastayoḥ
मुनियों के साथ प्रसन्नतापूर्वक, मंगल-उत्सव करते हुए, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को, बुधवार तथा हस्त नक्षत्र में,
श्लोक 108 (skanda.3.44.108)
गरानंदे व्यतीपाते कन्या चन्द्रे वृषे रवौ । दशयोगे महापुण्ये गन्धमादनपर्वते
garānande vyatīpāte kanyā candre vṛṣe ravau daśayoge mahāpuṇye gandhamādanaparvate
गर तिथि, आनंद योग, व्यतीपात, कन्या राशि में चंद्रमा, वृष राशि में सूर्य — इस अत्यंत पुण्यमय दस-योग में, गन्धमादन पर्वत पर,
श्लोक 109 (skanda.3.44.109)
सेतुमध्ये महादेवं लिंगरूपधरं हरम् । ईशानं कृत्तिवसनं गंगाचंद्रकलाधरम्
setumadhye mahādevaṁ liṅgarūpadharaṁ haram īśānaṁ kṛttivasanaṁ gaṅgācandrakalādharam
सेतु के मध्य में, लिंग-रूपधारी महादेव हर को, ईशान को, गजचर्म-वस्त्रधारी को, गंगा और चंद्रकला को धारण करने वाले को,
श्लोक 110 (skanda.3.44.110)
रामो वै स्थापयामास शिवलिंगमनुत्तमम् । लिंगस्थं पूजयामास राघवः सांबमीश्वरम्
rāmo vai sthāpayāmāsa śivaliṅgam anuttamam liṅgasthaṁ pūjayāmāsa rāghavaḥ sāmbam īśvaram
राम ने ही उस अनुपम शिवलिंग को स्थापित किया। राघव ने लिंगस्थ पार्वती सहित ईश्वर की पूजा की।
श्लोक 111 (skanda.3.44.111)
लिंगस्थः स महादेवः पार्वत्या सह शंकरः । प्रत्यक्षमेव भगवान्दत्तवान्वरमुत्तमम्
liṅgasthaḥ sa mahādevaḥ pārvatyā saha śaṅkaraḥ pratyakṣam eva bhagavān dattavān varam uttamam
लिंग में स्थित वह महादेव शंकर, पार्वती सहित, स्वयं प्रत्यक्ष होकर भगवान ने उत्तम वर प्रदान किया।
श्लोक 112 (skanda.3.44.112)
सर्वलोकशरण्याय राघवाय महात्मने । त्वयात्र स्थापितं लिंगं ये पश्यंति रघूद्वह
sarvalokaśaraṇyāya rāghavāya mahātmane tvayātra sthāpitaṁ liṅgaṁ ye paśyanti raghūdvaha
समस्त लोकों के शरण्य, महात्मा राघव को — हे रघुकुल-श्रेष्ठ! तुम्हारे द्वारा यहाँ स्थापित इस लिंग को जो भी देखेंगे,
श्लोक 113 (skanda.3.44.113)
महापातकयुक्ताश्च तेषां पापं प्रणश्यति । सर्वाण्यपि हि पापानि धनुष्कोटौ निमज्जनात्
mahāpātakayuktāś ca teṣāṁ pāpaṁ praṇaśyati sarvāṇy api hi pāpāni dhanuṣkoṭau nimajjanāt
चाहे वे महापातकों से युक्त ही क्यों न हों, उनका पाप नष्ट हो जाएगा। धनुष्कोटि में स्नान करने से भी समस्त पाप,
श्लोक 114 (skanda.3.44.114)
दर्शनाद्रामलिंगस्य पातकानि महांत्यपि । विलयं यांति राजेंद्र रामचन्द्र न संशयः
darśanād rāmaliṅgasya pātakāni mahānty api vilayaṁ yānti rājendra rāmacandra na saṁśayaḥ
और राम-लिंग के दर्शन से, महान पाप भी विलीन हो जाते हैं, हे राजेंद्र रामचंद्र! इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 115 (skanda.3.44.115)
प्रादादेवं हि रामाय वरं देवोंऽबिकापतिः । तदग्रे नंदिकेशं च स्थापयामास राघवः
prādād evaṁ hi rāmāya varaṁ devo'mbikāpatiḥ tad agre nandikeśaṁ ca sthāpayāmāsa rāghavaḥ
इस प्रकार अंबिका के पति देव ने राम को वर प्रदान किया। तब राघव ने उसके सामने नंदिकेश्वर की भी स्थापना की।
श्लोक 116 (skanda.3.44.116)
ईश्वरस्याभिषेकार्थं धनुष्कोट्याथ राघवः । एकं कूपं धरां भित्त्वा जनयामास वै द्विजाः
īśvarasyābhiṣekārthaṁ dhanuṣkoṭyātha rāghavaḥ ekaṁ kūpaṁ dharāṁ bhittvā janayāmāsa vai dvijāḥ
हे द्विजो! तब राघव ने ईश्वर के अभिषेक के लिए धनुष्कोटि में पृथ्वी को भेदकर एक कुआँ उत्पन्न किया।
श्लोक 117 (skanda.3.44.117)
तस्माज्जलमुपादाय स्नापयामास शंकरम् । कोटितीर्थमिति प्रोक्तं तत्तीर्थं पुण्यमुत्तमम्
tasmāj jalam upādāya snāpayāmāsa śaṅkaram koṭitīrtham iti proktaṁ tat tīrthaṁ puṇyam uttamam
उससे जल लेकर शंकर को स्नान कराया। वह अत्यंत पुण्यमय तीर्थ कोटितीर्थ कहा गया।
श्लोक 118 (skanda.3.44.118)
उक्तं तद्वैभवं पूर्वमस्माभिर्मुनिपुंगवाः । देवाश्च मुनयो नागा गन्धर्वाप्स रसां गणाः
uktaṁ tad vaibhavaṁ pūrvam asmābhir munipuṅgavāḥ devāś ca munayo nāgā gandharvāpsarasāṁ gaṇāḥ
हे मुनिपुंगवो! उसका वैभव हमने पहले ही कहा है। देवता, मुनि, नाग, गंधर्व, तथा अप्सरा-गणों ने,
श्लोक 119 (skanda.3.44.119)
सर्वेपि वानरा लिंगमेकैकं चक्रुरादरात् । श्रीसूत उवाच । एवं वः कथितं विप्रा यथा रामेण धीमत
sarve'pi vānarā liṅgam ekaikaṁ cakrur ādarāt śrīsūta uvāca evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā yathā rāmeṇa dhīmatā
तथा समस्त वानरों ने भी श्रद्धापूर्वक एक-एक लिंग की स्थापना की। श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें बताया कि किस प्रकार बुद्धिमान राम ने,
श्लोक 120 (skanda.3.44.120)
स्थापितं शिवलिंगं वै भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । इमां लिंगप्रतिष्ठां यः शृणोति पठतेऽथवा
sthāpitaṁ śivaliṅgaṁ vai bhuktimuktipradāyakam imāṁ liṅgapratiṣṭhāṁ yaḥ śṛṇoti paṭhate'thavā
भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला शिवलिंग स्थापित किया। जो कोई भी इस लिंग-प्रतिष्ठा को सुनता या पढ़ता है,
श्लोक 121 (skanda.3.44.121)
स रामेश्वरलिंगस्य सेवाफलमवाप्नुयात् । सायुज्यं च समाप्नोति रामनाथस्य वैभवात्
sa rāmeśvaraliṅgasya sevāphalam avāpnuyāt sāyujyaṁ ca samāpnoti rāmanāthasya vaibhavāt
वह रामेश्वर लिंग की सेवा का फल प्राप्त करता है, और रामनाथ के वैभव से सायुज्य को भी प्राप्त करता है।