ब्रह्म खण्ड · अध्याय 45
रामचन्द्र द्वारा तत्त्वज्ञान का उपदेश
श्लोक 1 (skanda.3.45.1)
श्रीसूत उवाच । एवं प्रतिष्ठिते लिंगे रामेणाक्लिष्टकारिणा । लिंगं वरं समादाय मारुतिः सहसाऽऽययौ
śrīsūta uvāca evaṁ pratiṣṭhite liṅge rāmeṇākliṣṭakāriṇā liṅgaṁ varaṁ samādāya mārutiḥ sahasā'yayau
श्री सूत जी ने कहा — इस प्रकार अनायास-कर्ता राम द्वारा लिंग की प्रतिष्ठा हो जाने पर, श्रेष्ठ लिंग लेकर मारुति सहसा आ पहुँचे।
श्लोक 2 (skanda.3.45.2)
रामं दाशरथिं वीरमभिवाद्य स मारुतिः । वैदेहीलक्ष्मणौ पश्चात्सुग्रीवं प्रणनाम च
rāmaṁ dāśarathiṁ vīram abhivādya sa mārutiḥ vaidehīlakṣmaṇau paścāt sugrīvaṁ praṇanāma ca
उस मारुति ने वीर दशरथ-पुत्र राम को प्रणाम कर, फिर वैदेही और लक्ष्मण को, तथा सुग्रीव को भी प्रणाम किया।
श्लोक 3 (skanda.3.45.3)
सीता सैकतलिंगं तत्पूजयंतं रघूद्वहम् । दृष्ट्वाथ मुनिभिः सार्द्धं चुकोप पवनात्मजः
sītā saikataliṅgaṁ tat pūjayantaṁ raghūdvaham dṛṣṭvātha munibhiḥ sārdhaṁ cukopa pavanātmajaḥ
सीता द्वारा बनाए गए बालू के उस लिंग की पूजा करते हुए रघुकुल-श्रेष्ठ राम को मुनियों सहित देखकर, पवनपुत्र क्रुद्ध हो गए।
श्लोक 4 (skanda.3.45.4)
अत्यंतं खेदखिन्नः सन्वृथाकृतपरिश्रमः । उवाच रामं धर्मज्ञं हनूमानंजनात्मजः
atyantaṁ khedakhinnaḥ san vṛthākṛtapariśramaḥ uvāca rāmaṁ dharmajñaṁ hanūmān añjanātmajaḥ
अत्यंत खेद से खिन्न, अपना परिश्रम व्यर्थ हुआ समझते हुए, अंजना-पुत्र हनुमान ने धर्मज्ञ राम से कहा।
श्लोक 5 (skanda.3.45.5)
हनूमानुवाच । दुर्जातोऽहं वृथा राम लोके क्लेशाय केवलम् । खिन्नोऽस्मि बहुशो देव राक्षसैः क्रूरकर्मभिः
hanūmān uvāca durjāto'haṁ vṛthā rāma loke kleśāya kevalam khinno'smi bahuśo deva rākṣasaiḥ krūrakarmabhiḥ
हनुमान ने कहा — हे राम! मैं व्यर्थ ही, केवल संसार में क्लेश के लिए जन्मा हूँ। हे देव! मैं क्रूरकर्मा राक्षसों द्वारा बार-बार खिन्न किया गया हूँ।
श्लोक 6 (skanda.3.45.6)
मा स्म सीमंतिनी काचिज्जनयेन्मादृशं सुतम् । यतोऽनुभूयते दुःखमनंतं भवसागरे
mā sma sīmantinī kācij janayen mādṛśaṁ sutam yato'nubhūyate duḥkham anantaṁ bhavasāgare
कोई भी सुहागिन स्त्री मेरे जैसा पुत्र कभी न उत्पन्न करे, जिससे इस भवसागर में अनंत दुःख का अनुभव करना पड़े।
श्लोक 7 (skanda.3.45.7)
खिन्नोऽस्मि सेवया पूर्वं युद्धेनापि ततोधिकम् । अनन्तं दुःखमधुना यतो मामवमन्यसे
khinno'smi sevayā pūrvaṁ yuddhenāpi tato'dhikam anantaṁ duḥkham adhunā yato mām avamanyase
पूर्व में सेवा से खिन्न हुआ, फिर उससे भी अधिक युद्ध से; और अब अनंत दुःख हुआ है, क्योंकि आप मेरा अपमान कर रहे हैं।
श्लोक 8 (skanda.3.45.8)
सुग्रीवेण च भार्यार्थं राज्यार्थं राक्षसेन च । रावणावरजेन त्वं सेवितो ऽसि रघूद्वह
sugrīveṇa ca bhāryārthaṁ rājyārthaṁ rākṣasena ca rāvaṇāvarajena tvaṁ sevito'si raghūdvaha
हे रघुकुल-श्रेष्ठ! आप सुग्रीव द्वारा पत्नी की प्राप्ति के लिए, तथा रावण के छोटे भाई राक्षस विभीषण द्वारा राज्य की प्राप्ति के लिए सेवित हुए हैं।
श्लोक 9 (skanda.3.45.9)
मया निर्हेतुकं राम सेवितोऽसि महामते । वानराणामनेकेषु त्वयाज्ञप्तोऽहमद्य वै
mayā nirhetukaṁ rāma sevito'si mahāmate vānarāṇām anekeṣu tvayājñapto'ham adya vai
हे राम! हे महामते! मेरे द्वारा तो निष्काम भाव से ही आपकी सेवा की गई है। आज आपने अनेक वानरों में से मुझे ही आज्ञा दी थी,
श्लोक 10 (skanda.3.45.10)
शिवलिंगं समानेतुं कैलासात्पर्वतो त्तमात् । कैलासं त्वरितो गत्वा न चापश्यं पिनाकिनम्
śivaliṅgaṁ samānetuṁ kailāsāt parvatottamāt kailāsaṁ tvarito gatvā na cāpaśyaṁ pinākinam
शिवलिंग को उत्तम पर्वत कैलास से लाने के लिए। शीघ्रता से कैलास जाकर, मुझे पिनाकधारी शिव के दर्शन नहीं हुए।
श्लोक 11 (skanda.3.45.11)
तपसा प्रीणयित्वा तं सांबं वृषभवाहनम् । प्राप्तलिंगो रघुपते त्वरितः समु पागतः
tapasā prīṇayitvā taṁ sāmbaṁ vṛṣabhavāhanam prāptaliṅgo raghupate tvaritaḥ samupāgataḥ
तप से पार्वती सहित वृषभ-वाहन शिव को प्रसन्न कर, हे रघुपते! लिंग को प्राप्त कर मैं शीघ्रता से यहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 12 (skanda.3.45.12)
अन्यलिंगं त्वमधुना प्रतिष्ठाप्य तु सैकतम् । मुनिभिर्देवगन्धर्वैः साकं पूजयसे विभो
anyaliṅgaṁ tvam adhunā pratiṣṭhāpya tu saikatam munibhir devagandharvaiḥ sākaṁ pūjayase vibho
किंतु हे विभो! आपने अभी एक अन्य बालू के लिंग की प्रतिष्ठा कर, मुनियों, देवताओं, तथा गंधर्वों सहित उसकी पूजा की।
श्लोक 13 (skanda.3.45.13)
मयानीतमिदं लिंगं कैलासा त्पर्वताद्वृथा । अहो भाराय मे देहो मन्दभाग्यस्यजायते
mayānītam idaṁ liṅgaṁ kailāsāt parvatād vṛthā aho bhārāya me deho mandabhāgyasya jāyate
कैलास पर्वत से लाया गया यह मेरा लिंग व्यर्थ हो गया। अहो! मंदभाग्य मेरा यह शरीर भार-रूप ही हो गया है।
श्लोक 14 (skanda.3.45.14)
भूतलस्य महाराज जानकीरमण प्रभो । इदं दुःखमहं सोढुं न शक्नोमि रघूद्वह
bhūtalasya mahārāja jānakīramaṇa prabho idaṁ duḥkham ahaṁ soḍhuṁ na śaknomi raghūdvaha
हे भूतल के महाराज! हे जानकी के प्रियतम! हे प्रभु! हे रघुकुल-श्रेष्ठ! मैं इस दुःख को सहन करने में समर्थ नहीं हूँ।
श्लोक 15 (skanda.3.45.15)
किं करिष्यामि कुत्राहं गमिष्यामि न मे गतिः । अतः शरीरं त्यक्ष्यामि त्वयाहमवमानितः
kiṁ kariṣyāmi kutrāhaṁ gamiṣyāmi na me gatiḥ ataḥ śarīraṁ tyakṣyāmi tvayāham avamānitaḥ
अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? मेरे लिए कोई गति नहीं है। अतः मैं अपने शरीर का त्याग करूँगा, क्योंकि आपके द्वारा मेरा अपमान किया गया है।
श्लोक 16 (skanda.3.45.16)
श्रीसूत उवाच । एवं स बहुशो विप्राः क्रुशित्वा पवनात्मजः । दण्डवत्प्रणतो भूमौ क्रोधशोकाकुलोऽभवत्
śrīsūta uvāca evaṁ sa bahuśo viprāḥ kruśitvā pavanātmajaḥ daṇḍavat praṇato bhūmau krodhaśokākulo'bhavat
श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रो! इस प्रकार बार-बार विलाप कर, पवनपुत्र भूमि पर दंडवत् प्रणत होकर, क्रोध और शोक से व्याकुल हो गए।
श्लोक 17 (skanda.3.45.17)
तं दृष्ट्वा रघुनाथोऽपि प्रहसन्निदमब्रवीत् । पश्यतां सवदेवानां मुनीनां कपिरक्षसाम् । सांत्वयन्मारुतिं तत्र दुःखं चास्य प्रमार्जयन्
taṁ dṛṣṭvā raghunātho'pi prahasann idam abravīt paśyatāṁ savadevānāṁ munīnāṁ kapirakṣasām sāntvayan mārutiṁ tatra duḥkhaṁ cāsya pramārjayan
उसे देखकर रघुनाथ भी हँसते हुए, समस्त देवताओं, मुनियों, वानरों, तथा राक्षसों के देखते-देखते, मारुति को सांत्वना देते हुए और उसके दुःख को दूर करते हुए, यह कहा।
श्लोक 18 (skanda.3.45.18)
श्रीराम उवाच । सर्वं जानाम्यहं कार्यमात्मनोऽपि परस्य च
śrīrāma uvāca sarvaṁ jānāmy ahaṁ kāryam ātmano'pi parasya ca
श्रीराम ने कहा — मैं अपने और दूसरों के, दोनों के, समस्त कार्यों को जानता हूँ।
श्लोक 19 (skanda.3.45.19)
जातस्य जायमानस्य मृतस्यापि सदा कपे । जायते म्रियते जन्तुरेक एव स्वकर्मणा
jātasya jāyamānasya mṛtasyāpi sadā kape jāyate mriyate jantur eka eva svakarmaṇā
हे वानर! उत्पन्न हो चुके, उत्पन्न हो रहे, तथा मरे हुए प्राणी का — प्राणी अकेला ही अपने कर्म से जन्म लेता है और मरता है।
श्लोक 20 (skanda.3.45.20)
प्रयाति नरकं चापि परमात्मा तु निर्गुणः । एवं तत्त्वं विनिश्चित्य शोकं मा कुरु वानर
prayāti narakaṁ cāpi paramātmā tu nirguṇaḥ evaṁ tattvaṁ viniścitya śokaṁ mā kuru vānara
और वह अकेला ही नरक को जाता है; किंतु परमात्मा तो निर्गुण है। इस तत्त्व का निश्चय कर, हे वानर! शोक मत करो।
श्लोक 21 (skanda.3.45.21)
लिंगत्रयविनिर्मुक्तं ज्योतिरेकं निरंजनम् । निराश्रयं निर्विकारमात्मानं पश्य नित्यशः
liṅgatrayavinirmuktaṁ jyotir ekaṁ nirañjanam nirāśrayaṁ nirvikāram ātmānaṁ paśya nityaśaḥ
तीनों लिंग (शरीरों) से मुक्त, एकमात्र निरंजन ज्योति-स्वरूप, आश्रय-रहित, निर्विकार आत्मा को सदा देखो।
श्लोक 22 (skanda.3.45.22)
किमर्थं कुरुषे शोकं तत्त्वज्ञानस्य बाधकम् । तत्त्वज्ञाने सदा निष्ठां कुरु वानरसत्तम
kim arthaṁ kuruṣe śokaṁ tattvajñānasya bādhakam tattvajñāne sadā niṣṭhāṁ kuru vānarasattama
तत्त्वज्ञान का बाधक शोक तुम क्यों करते हो? हे वानरश्रेष्ठ! तत्त्वज्ञान में सदा निष्ठा रखो।
श्लोक 23 (skanda.3.45.23)
स्वयंप्रकाशमात्मानं ध्यायस्व सततं कपे । देहादौ ममतां मुंच तत्त्वज्ञानविरोधिनीम्
svayamprakāśam ātmānaṁ dhyāyasva satataṁ kape dehādau mamatāṁ muñca tattvajñānavirodhinīm
हे वानर! स्वयं-प्रकाश आत्मा का सदा ध्यान करो। तत्त्वज्ञान के विरोधी शरीर आदि में ममता को त्याग दो।
श्लोक 24 (skanda.3.45.24)
धर्मं भजस्व सततं प्राणिहिंसां परित्यज । सेवस्व साधुपुरुषाञ्जहि सर्वेंद्रियाणि च
dharmaṁ bhajasva satatam prāṇihiṁsāṁ parityaja sevasva sādhupuruṣāñ jahi sarvendriyāṇi ca
सदा धर्म का पालन करो, प्राणि-हिंसा को त्याग दो। साधु पुरुषों की सेवा करो, तथा समस्त इंद्रियों को वश में करो।
श्लोक 25 (skanda.3.45.25)
परित्यजस्व सततमन्येषां दोषकीर्तनम् । शिवविष्ण्वादिदेवानामर्चां कुरु सदा कपे
parityajasva satatam anyeṣāṁ doṣakīrtanam śivaviṣṇvādidevānām arcāṁ kuru sadā kape
अन्यों के दोष-कीर्तन को सदा त्याग दो। हे वानर! शिव-विष्णु आदि देवताओं की पूजा सदा करते रहो।
श्लोक 26 (skanda.3.45.26)
सत्यं वदस्व सततं परित्यज शुचं कपे । प्रत्यग्ब्रह्मैकताज्ञानं मोहवस्तुसमुद्गतम्
satyaṁ vadasva satataṁ parityaja śucaṁ kape pratyagbrahmaikatājñānaṁ mohavastusamudgatam
सदा सत्य बोलो, हे वानर! शोक को त्याग दो। मोह-रूप वस्तु से उत्पन्न होने वाला अंतरात्मा और ब्रह्म की एकता का ज्ञान,
श्लोक 27 (skanda.3.45.27)
शोभनाशोभना भ्रांतिः कल्पि तास्मिन्यथार्थवत् । अध्यास्ते शोभनत्वेन पदार्थे मोहवैभवात्
śobhanāśobhanā bhrāntiḥ kalpitāsmin yathārthavat adhyāste śobhanatvena padārthe mohavaibhavāt
शुभ-अशुभ की भ्रांति उस पर यथार्थ की तरह कल्पित होती है। मोह के वैभव से पदार्थ में शुभत्व का अध्यास होता है।
श्लोक 28 (skanda.3.45.28)
रोगो विजायते नृणां भ्रांतानां कपिसत्तम । रागद्वेषबलाद्बद्धा धर्मा धर्मवशंगताः
rogo vijāyate nṛṇāṁ bhrāntānāṁ kapisattama rāgadveṣabalād baddhā dharmā dharmavaśaṅgatāḥ
हे वानरश्रेष्ठ! भ्रम में पड़े मनुष्यों को रोग उत्पन्न होता है। राग-द्वेष के बल से बंधे हुए, धर्म-अधर्म के वशीभूत मनुष्य,
श्लोक 29 (skanda.3.45.29)
देवतिर्यङ्मनुष्याद्या निरयं यांति मानवाः । चंदनागरुकर्पूरप्रमुखा अतिशोभनाः
devatiryaṅmanuṣyādyā nirayaṁ yānti mānavāḥ candanāgarukarpūrapramukhā atiśobhanāḥ
मनुष्य देव-योनि, तिर्यक्-योनि, मनुष्य-योनि आदि में, तथा नरक में भी जाते हैं। चंदन, अगर, कपूर आदि अत्यंत सुंदर पदार्थ,
श्लोक 30 (skanda.3.45.30)
मलं भवंति यत्स्पर्शात्तच्छरीरं कथं सुखम् । भक्ष्यभोज्यादयः सर्वे पदार्था अतिशोभनाः
malaṁ bhavanti yat sparśāt tac charīraṁ kathaṁ sukham bhakṣyabhojyādayaḥ sarve padārthā atiśobhanāḥ
जिनके स्पर्श से भी शरीर मल बन जाता है — वह शरीर कैसे सुख का साधन हो सकता है? भक्ष्य, भोज्य आदि समस्त अत्यंत सुंदर पदार्थ,
श्लोक 31 (skanda.3.45.31)
विष्ठा भवंति यत्संगात्तच्छरीरं कथं सुखम् । सुगंधि शीतलं तोयं मूत्रं यत्संगमाद्भवेत्
viṣṭhā bhavanti yat saṅgāt tac charīraṁ kathaṁ sukham sugandhi śītalaṁ toyaṁ mūtraṁ yat saṅgamād bhavet
जिनके संग से विष्ठा बन जाते हैं — वह शरीर कैसे सुख का साधन हो सकता है? सुगंधित, शीतल जल भी, जिसके संग से मूत्र बन जाता है,
श्लोक 32 (skanda.3.45.32)
तत्कथं शोभनं पिंडं भवेद्ब्रूहि कपेऽधुना । अतीव धवलाः शुद्धाः पटा यत्संगमेनहि
tat kathaṁ śobhanaṁ piṇḍaṁ bhaved brūhi kape'dhunā atīva dhavalāḥ śuddhāḥ paṭā yat saṅgamena hi
तो वह पिंड कैसे सुंदर हो सकता है? हे वानर! अभी मुझे बताओ। अत्यंत श्वेत, शुद्ध वस्त्र भी, जिसके संगम से,
श्लोक 33 (skanda.3.45.33)
भवंति मलिनाः स्वेदात्तत्कथं शोभनं भवेत । श्रूयतां परमार्थो मे हनूमन्वायुनंदन
bhavanti malināḥ svedāt tat kathaṁ śobhanaṁ bhaveta śrūyatāṁ paramārtho me hanūman vāyunandana
पसीने से मलिन हो जाते हैं — वह कैसे सुंदर हो सकता है? हे हनुमान! हे वायु-नंदन! मेरा परमार्थ सुनो।
श्लोक 34 (skanda.3.45.34)
अस्मिन्संसारगर्ते तु किंचित्सौख्यं न विद्यते । प्रथमं जंतुराप्नोति जन्म बाल्यं ततः परम्
asmin saṁsāragarte tu kiñcit saukhyaṁ na vidyate prathamaṁ jantur āpnoti janma bālyaṁ tataḥ param
इस संसार-गर्त में कोई भी सुख विद्यमान नहीं है। पहले प्राणी जन्म प्राप्त करता है, फिर उसके बाद बाल्यावस्था,
श्लोक 35 (skanda.3.45.35)
पश्चाद्यौवनमाप्नोति ततो वार्धक्यमश्नुते । पश्चान्मृत्युमवाप्नोति पुनर्जन्म तदश्नुते
paścād yauvanam āpnoti tato vārdhakyam aśnute paścān mṛtyum avāpnoti punarjanma tad aśnute
फिर वह यौवन प्राप्त करता है, तत्पश्चात् वृद्धावस्था को प्राप्त होता है। फिर मृत्यु को प्राप्त होता है, और फिर पुनर्जन्म को प्राप्त होता है।
श्लोक 36 (skanda.3.45.36)
अज्ञानवैभवादेव दुःखमाप्नोति मानवः । तदज्ञान निवृत्तौ तु प्राप्नोति सुखमुत्तमम्
ajñānavaibhavād eva duḥkham āpnoti mānavaḥ tad ajñānanivṛttau tu prāpnoti sukham uttamam
अज्ञान के वैभव से ही मनुष्य दुःख प्राप्त करता है। उस अज्ञान की निवृत्ति होने पर ही वह उत्तम सुख प्राप्त करता है।
श्लोक 37 (skanda.3.45.37)
अज्ञानस्य निवृत्तिस्तु ज्ञानादेव न कर्मणा । ज्ञानं नाम परं ब्रह्म ज्ञानं वेदांतवाक्यजम्
ajñānasya nivṛttis tu jñānād eva na karmaṇā jñānaṁ nāma paraṁ brahma jñānaṁ vedāntavākyajam
अज्ञान की निवृत्ति ज्ञान से ही होती है, कर्म से नहीं। ज्ञान का अर्थ है परब्रह्म; ज्ञान वेदांत-वाक्यों से उत्पन्न होता है।
श्लोक 38 (skanda.3.45.38)
तज्ज्ञानं च विरक्तस्य जायते नेतरस्य हि । मुख्याधिकारिणः सत्यमाचार्यस्य प्रसादतः
taj jñānaṁ ca viraktasya jāyate netarasya hi mukhyādhikāriṇaḥ satyam ācāryasya prasādataḥ
और वह ज्ञान विरक्त पुरुष को ही उत्पन्न होता है, अन्य को नहीं — सच्चे मुख्य अधिकारी को, आचार्य की कृपा से।
श्लोक 39 (skanda.3.45.39)
यदा सर्वे प्रमुच्यंते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः । तदा मर्त्योऽमृतोऽत्रैव परं ब्रह्म समश्नुते
yadā sarve pramucyante kāmā ye'sya hṛdi sthitāḥ tadā martyo'mṛto'traiva paraṁ brahma samaśnute
जब उसके हृदय में स्थित समस्त कामनाएँ त्याग दी जाती हैं, तब मरणशील मनुष्य यहीं अमर होकर परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 40 (skanda.3.45.40)
जाग्रतं च स्वपंतं च भुंजंतं च स्थितं तथा । इमं जनं सदा क्रूरः कृतांतः परिकर्षति
jāgrataṁ ca svapantaṁ ca bhuñjantaṁ ca sthitaṁ tathā imaṁ janaṁ sadā krūraḥ kṛtāntaḥ parikarṣati
जागते हुए, सोते हुए, भोग करते हुए, तथा स्थित रहते हुए भी, इस जन को क्रूर काल सदा खींचता रहता है।
श्लोक 41 (skanda.3.45.41)
सर्वे क्षयांता निचयाः पतनांताः समुच्छ्रयाः । संयोगा विप्रयोगांता मरणांतं च जीवितम्
sarve kṣayāntā nicayāḥ patanāntāḥ samucchrayāḥ saṁyogā viprayogāntā maraṇāntaṁ ca jīvitam
समस्त संचय क्षय में अंत होते हैं, समस्त उन्नति पतन में अंत होती है, समस्त संयोग वियोग में अंत होते हैं, और जीवन मृत्यु में अंत होता है।
श्लोक 42 (skanda.3.45.42)
यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद्भयम् । यथा नराणां जातानां नान्यत्र पतनाद्भयम्
yathā phalānāṁ pakvānāṁ nānyatra patanād bhayam yathā narāṇāṁ jātānāṁ nānyatra patanād bhayam
जैसे पके हुए फलों को गिरने के अतिरिक्त और कोई भय नहीं होता, वैसे ही जन्मे हुए मनुष्यों को मृत्यु के अतिरिक्त और कोई भय नहीं होता।
श्लोक 43 (skanda.3.45.43)
यथा गृहं दृढस्तंभं जीर्णं काले विनश्यति । एवं विनश्यंति नरा जरामृत्युवशंगताः
yathā gṛhaṁ dṛḍhastambhaṁ jīrṇaṁ kāle vinaśyati evaṁ vinaśyanti narā jarāmṛtyuvaśaṅgatāḥ
जैसे दृढ़ स्तंभों वाला घर भी काल पाकर जीर्ण होकर नष्ट हो जाता है, वैसे ही मनुष्य भी बुढ़ापे और मृत्यु के वश होकर नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 44 (skanda.3.45.44)
अहोरात्रस्य गमनान्नृणामायुर्विनश्यति । आत्मानमनुशोच त्वं किमन्यमनुशोचसि
ahorātrasya gamanān nṛṇām āyur vinaśyati ātmānam anuśoca tvaṁ kim anyam anuśocasi
दिन-रात के बीतने से मनुष्यों की आयु नष्ट होती जाती है। तुम अपने आप के लिए शोक करो, दूसरे के लिए क्यों शोक करते हो?
श्लोक 45 (skanda.3.45.45)
नश्यत्यायुः स्थितस्यापि धावतोऽपि कपीश्वर । सहैव मृत्युर्व्रजति सह मृत्युर्निषीदति
naśyaty āyuḥ sthitasyāpi dhāvato'pi kapīśvara sahaiva mṛtyur vrajati saha mṛtyur niṣīdati
हे वानरराज! स्थिर बैठे हुए का भी और दौड़ते हुए का भी आयु नष्ट होती जाती है। मृत्यु साथ ही चलती है, साथ ही बैठती है।
श्लोक 46 (skanda.3.45.46)
चरित्वा दूरदेशं च सह मृत्युर्निवर्तते । शरीरे वलयः प्राप्ताः श्वेता जाताः शिरोरुहाः
caritvā dūradeśaṁ ca saha mṛtyur nivartate śarīre valayaḥ prāptāḥ śvetā jātāḥ śiroruhāḥ
दूर देश में विचरण कर, मृत्यु साथ ही लौट आती है। शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, सिर के बाल श्वेत हो जाते हैं,
श्लोक 47 (skanda.3.45.47)
जीर्यते जरया देहः श्वासकासादिना तथा । यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ
jīryate jarayā dehaḥ śvāsakāsādinā tathā yathā kāṣṭhaṁ ca kāṣṭhaṁ ca sameyātāṁ mahodadhau
बुढ़ापे से, तथा श्वास-खाँसी आदि से शरीर जीर्ण होता जाता है। जैसे महासागर में दो काष्ठ आकर मिल जाते हैं,
श्लोक 48 (skanda.3.45.48)
समेत्य च व्यपेयातां कालयोगेन वानर । एवं भार्या च पुत्रश्च वधुक्षेत्रधनानि च
sametya ca vyapeyātāṁ kālayogena vānara evaṁ bhāryā ca putraś ca vadhukṣetradhanāni ca
हे वानर! और फिर काल-योग से अलग हो जाते हैं, वैसे ही पत्नी, पुत्र, पुत्रवधू, क्षेत्र, तथा धन भी,
श्लोक 49 (skanda.3.45.49)
क्वचित्संभूय गच्छंति पुनरन्यत्र वानर । यथा हि पांथं गच्छंतं पथि कश्चित्पथि स्थितः
kvacit sambhūya gacchanti punar anyatra vānara yathā hi pānthaṁ gacchantaṁ pathi kaścit pathi sthitaḥ
हे वानर! कहीं मिलकर, फिर अन्यत्र चले जाते हैं। जैसे मार्ग पर चलते हुए किसी पथिक से मार्ग पर खड़ा कोई और,
श्लोक 50 (skanda.3.45.50)
अहमप्या गमिष्यामि भवद्भिः साकमित्यथ । कंचित्कालं समेतौ तौ पुनरन्यत्र गच्छतः
aham apy āgamiṣyāmi bhavadbhiḥ sākam ity atha kañcit kālaṁ sametau tau punar anyatra gacchataḥ
यह कहकर 'मैं भी आपके साथ चलूँगा' — कुछ काल तक वे दोनों साथ रहकर फिर अलग-अलग दिशा में चले जाते हैं।
श्लोक 51 (skanda.3.45.51)
एवं भार्यासुतादीनां संगमो नश्वरः कपे । शरीरजन्मना साकं मृत्युः संजायते ध्रुवम्
evaṁ bhāryāsutādīnāṁ saṅgamo naśvaraḥ kape śarīrajanmanā sākaṁ mṛtyuḥ sañjāyate dhruvam
हे वानर! इसी प्रकार पत्नी, पुत्र आदि का संगम भी नश्वर है। शरीर के जन्म के साथ ही मृत्यु भी निश्चय ही उत्पन्न हो जाती है।
श्लोक 52 (skanda.3.45.52)
अवश्यंभाविमरणे न हि जातु प्रतिक्रिया । एतच्छरीरपाते तु देही कर्मगतिं गतः
avaśyaṁbhāvimaraṇe na hi jātu pratikriyā etac charīrapāte tu dehī karmagatiṁ gataḥ
अवश्यंभावी मृत्यु का कभी कोई प्रतिकार नहीं होता। इस शरीर के पतन होने पर, देही अपने कर्मों की गति को प्राप्त होता है,
श्लोक 53 (skanda.3.45.53)
प्राप्य पिंडांतरं वत्स पूर्वपिंडं त्यजत्यसौ । प्राणिनां न सदैकत्र वासो भवति वानर
prāpya piṇḍāntaraṁ vatsa pūrvapiṇḍaṁ tyajaty asau prāṇināṁ na sadaikatra vāso bhavati vānara
हे वत्स! नया शरीर पाकर, वह पूर्व शरीर को त्याग देता है। हे वानर! प्राणियों का सदा एक ही स्थान पर निवास नहीं होता।
श्लोक 54 (skanda.3.45.54)
स्वस्वकर्मवशात्सर्वे वियुज्यंते पृथक्पृथक् । यथा प्राणिशरीराणि नश्यंति च भवंति च
svasvakarmavaśāt sarve viyujyante pṛthak pṛthak yathā prāṇiśarīrāṇi naśyanti ca bhavanti ca
अपने-अपने कर्म के वशीभूत होकर सभी अलग-अलग हो जाते हैं। जैसे प्राणियों के शरीर नष्ट होते हैं और उत्पन्न होते हैं,
श्लोक 55 (skanda.3.45.55)
आत्मनो जन्ममरणे नैव स्तः कपिसत्तम । अतस्त्वमंजनासूनो विशोकं ज्ञानमद्वयं
ātmano janmamaraṇe naiva staḥ kapisattama atas tvam añjanāsūno viśokaṁ jñānam advayam
हे वानरश्रेष्ठ! आत्मा का जन्म-मरण कभी नहीं होता। अतः हे अंजना-पुत्र! तुम शोक-रहित, अद्वैत ज्ञान-स्वरूप,
श्लोक 56 (skanda.3.45.56)
सद्रूपममलं ब्रह्म चिंतयस्व दिवानिशम् । त्वत्कृतं मत्कृतं कर्म मत्कृतं त्वाकृतं तथा
sadrūpam amalaṁ brahma cintayasva divāniśam tvatkṛtaṁ matkṛtaṁ karma matkṛtaṁ tvatkṛtaṁ tathā
सत्-स्वरूप, निर्मल ब्रह्म का दिन-रात चिंतन करो। तुम्हारे द्वारा किया गया कर्म मेरे द्वारा किया गया है, और मेरे द्वारा किया गया तुम्हारे द्वारा किया गया है —
श्लोक 57 (skanda.3.45.57)
मल्लिंगस्थापनं तस्मात्त्वल्लिंग स्थापनं कपे । मुहूर्तातिक्रमाल्लिंगं सैकतं सीतया कृतम्
malliṅgasthāpanaṁ tasmāt tvalliṅgasthāpanaṁ kape muhūrtātikramāl liṅgaṁ saikataṁ sītayā kṛtam
हे वानर! इसलिए मेरे द्वारा लिंग की स्थापना तुम्हारे द्वारा ही लिंग की स्थापना है। मुहूर्त बीत जाने के कारण, सीता द्वारा बनाया गया बालू का लिंग,
श्लोक 58 (skanda.3.45.58)
मयात्र स्थापितं तस्मात्कोपं दुःखं च मा कुरु । कैलासादागतं लिंगं स्थापयास्मिच्छुभे दिने
mayātra sthāpitaṁ tasmāt kopaṁ duḥkhaṁ ca mā kuru kailāsād āgataṁ liṅgaṁ sthāpayāsminn chubhe dine
मेरे द्वारा यहाँ स्थापित किया गया; अतः क्रोध और दुःख मत करो। कैलास से लाए गए इस लिंग को इस शुभ दिन में स्थापित करो।
श्लोक 59 (skanda.3.45.59)
तव नाम्ना त्विदं लिंगं यातु लोकत्रये प्रथाम् । हनूमदीश्वरं दृष्ट्वा द्रष्टव्यो राघवेश्वरः
tava nāmnā tv idaṁ liṅgaṁ yātu lokatraye prathām hanūmadīśvaraṁ dṛṣṭvā draṣṭavyo rāghaveśvaraḥ
तुम्हारे ही नाम से यह लिंग तीनों लोकों में प्रसिद्धि को प्राप्त करे। हनुमदीश्वर का दर्शन कर, फिर राघवेश्वर का भी दर्शन करना चाहिए।
श्लोक 60 (skanda.3.45.60)
ब्रह्मराक्षसयूथानि हतानि भवता कपे । अतः स्वनाम्ना लिंगस्य स्थापनात्त्वं प्रमोक्ष्यसे
brahmarākṣasayūthāni hatāni bhavatā kape ataḥ svanāmnā liṅgasya sthāpanāt tvaṁ pramokṣyase
हे वानर! तुमने ब्राह्मण-राक्षसों के समूहों का वध किया है। अतः अपने नाम से लिंग की स्थापना करने से तुम उससे मुक्त हो जाओगे।
श्लोक 61 (skanda.3.45.61)
स्वयं हरेण दत्तं तु हनूमन्नामकं शिवम् । संपश्यन्रामनाथं च कृतकृत्यो भवेन्नरः
svayaṁ hareṇa dattaṁ tu hanūmannāmakaṁ śivam sampaśyan rāmanāthaṁ ca kṛtakṛtyo bhaven naraḥ
स्वयं हर द्वारा दिया गया हनुमान नामक शिव, और उसके साथ रामनाथ का दर्शन करने वाला मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।
श्लोक 62 (skanda.3.45.62)
योजनानां सहस्रेऽपि स्मृत्वा लिंगं हनूमतः । रामनाथेश्वरं चापि स्मृत्वा सायुज्यमाप्नुयात्
yojanānāṁ sahasre'pi smṛtvā liṅgaṁ hanūmataḥ rāmanātheśvaraṁ cāpi smṛtvā sāyujyam āpnuyāt
हज़ार योजन दूर से भी हनुमान के लिंग का, तथा रामनाथेश्वर का भी स्मरण करके मनुष्य सायुज्य प्राप्त करता है।
श्लोक 63 (skanda.3.45.63)
तेनेष्टं सर्वयज्ञैश्च तपश्चाकारि कृत्स्नशः । येन दृष्टौ महादेवौ हनूमद्राघवेश्वरौ
teneṣṭaṁ sarvayajñaiś ca tapaś cākāri kṛtsnaśaḥ yena dṛṣṭau mahādevau hanūmadrāghaveśvarau
जिसने भी हनुमदीश्वर और राघवेश्वर दोनों महादेवों का दर्शन किया, उसके द्वारा समस्त यज्ञ किए गए और सर्वथा तप किया गया माना जाता है।
श्लोक 64 (skanda.3.45.64)
हनूमता कृतं लिंगं यच्च लिंगं मया कृतम् । जानकीयं च यल्लिंगं यल्लिंगं लक्ष्मणेश्वरम्
hanūmatā kṛtaṁ liṅgaṁ yac ca liṅgaṁ mayā kṛtam jānakīyaṁ ca yal liṅgaṁ yal liṅgaṁ lakṣmaṇeśvaram
हनुमान द्वारा बनाया गया लिंग, तथा जो लिंग मेरे द्वारा बनाया गया, जानकी का लिंग, तथा जो लक्ष्मणेश्वर लिंग है,
श्लोक 65 (skanda.3.45.65)
सुग्रीवेण कृतं यच्च सेतुकर्त्रा नलेन च । अंगदेन च नीलेन तथा जांबवता कृतम्
sugrīveṇa kṛtaṁ yac ca setukartrā nalena ca aṅgadena ca nīlena tathā jāmbavatā kṛtam
सुग्रीव द्वारा बनाया गया, सेतु-निर्माता नल द्वारा, अंगद द्वारा, नील द्वारा, तथा जाम्बवान द्वारा बनाया गया,
श्लोक 66 (skanda.3.45.66)
विभीषणेन यच्चापि रत्नलिंगं प्रतिष्ठितम् । इन्द्राद्यैश्च कृतं लिंगं यच्छेषाद्यैः प्रतिष्ठितम्
vibhīṣaṇena yac cāpi ratnaliṅgaṁ pratiṣṭhitam indrādyaiś ca kṛtaṁ liṅgaṁ yac cheṣādyaiḥ pratiṣṭhitam
विभीषण द्वारा जो रत्न-लिंग प्रतिष्ठित किया गया, इंद्र आदि द्वारा बनाया गया लिंग, तथा शेषनाग आदि द्वारा प्रतिष्ठित लिंग —
श्लोक 67 (skanda.3.45.67)
इत्येकादशरूपोऽयं शिवः साक्षाद्विभासते । सदा ह्येतेषु लिंगेषु संनिधत्ते महेश्वरः
ity ekādaśarūpo'yaṁ śivaḥ sākṣād vibhāsate sadā hy eteṣu liṅgeṣu sannidhatte maheśvaraḥ
इस प्रकार यह शिव ग्यारह रूपों में साक्षात् प्रकाशित होते हैं। इन समस्त लिंगों में महेश्वर सदा उपस्थित रहते हैं।
श्लोक 68 (skanda.3.45.68)
तत्स्वपापौघशुद्ध्यर्थं स्थापयस्व महेश्वरम् । अथ चेत्त्वं महाभाग लिंगमुत्सादयिष्यसि
tat svapāpaughaśuddhyarthaṁ sthāpayasva maheśvaram atha cet tvaṁ mahābhāga liṅgam utsādayiṣyasi
अतः अपने पाप-समूह की शुद्धि के लिए महेश्वर को स्थापित करो। हे महाभाग्यशाली! यदि तुम इस लिंग को उखाड़ोगे,
श्लोक 69 (skanda.3.45.69)
मयात्र स्थापितं वत्स सीतया सैकतं कृतम् । स्थापयिष्यामि च ततो लिंगमेतत्त्वया कृतम्
mayātra sthāpitaṁ vatsa sītayā saikataṁ kṛtam sthāpayiṣyāmi ca tato liṅgam etat tvayā kṛtam
हे वत्स! मेरे द्वारा यहाँ स्थापित, सीता द्वारा बनाए गए बालू के लिंग को, तो मैं तुम्हारे द्वारा लाया गया यह लिंग तब स्थापित करूँगा।
श्लोक 70 (skanda.3.45.70)
पातालं सुतलं प्राप्य वितलं च रसातलम् । तलातलं च तदिदं भेदयित्वा तु तिष्ठति
pātālaṁ sutalaṁ prāpya vitalaṁ ca rasātalam talātalaṁ ca tad idaṁ bhedayitvā tu tiṣṭhati
यह लिंग पाताल, सुतल, वितल, रसातल, तथा तलातल को भेदकर स्थित है।
श्लोक 71 (skanda.3.45.71)
प्रतिष्ठितं मया लिंगं भेत्तुं कस्य बलं भवेत् । उत्तिष्ठ लिंगमुद्वास्य मयैतत्स्थापितं कपे
pratiṣṭhitaṁ mayā liṅgaṁ bhettuṁ kasya balaṁ bhavet uttiṣṭha liṅgam udvāsya mayaitat sthāpitaṁ kape
मेरे द्वारा प्रतिष्ठित इस लिंग को भेदने की शक्ति किसमें है? हे वानर! उठो, मेरे द्वारा स्थापित इस लिंग को उखाड़ो,
श्लोक 72 (skanda.3.45.72)
त्वया समाहृतं लिंगं स्थापयस्वाशु मा शुचः । इत्युक्तस्तं प्रणम्याथाज्ञातसत्त्वोऽथ वानरः
tvayā samāhṛtaṁ liṅgaṁ sthāpayasvāśu mā śucaḥ ityuktas taṁ praṇamyātha jñātasattvo'tha vānaraḥ
और तुम्हारे द्वारा लाए गए लिंग को शीघ्र स्थापित करो, शोक मत करो। इस प्रकार कहे जाने पर, राम को प्रणाम कर, अपने बल को न जानते हुए, वह वानर,
श्लोक 73 (skanda.3.45.73)
उद्वासयामि वेगेन सैकतं लिंगमुत्त मम् । संस्थापयामि कैलासादानीतं लिंगमादरात्
udvāsayāmi vegena saikataṁ liṅgam uttamam saṁsthāpayāmi kailāsād ānītaṁ liṅgam ādarāt
(सोचने लगा) — 'मैं इस उत्तम बालू के लिंग को वेग से उखाड़ दूँगा, और कैलास से लाए गए लिंग को श्रद्धापूर्वक स्थापित करूँगा।'
श्लोक 74 (skanda.3.45.74)
उद्वासने सैकतस्य कियान्भारो भवेन्मम । चेतसैवं विचार्यायं हनूमान्मारुता त्मजः
udvāsane saikatasya kiyān bhāro bhaven mama cetasaivaṁ vicāryāyaṁ hanūmān mārutātmajaḥ
बालू को उखाड़ने में मुझे कितना ही भार होगा? — मन में इस प्रकार विचार कर वह हनुमान, वायु-पुत्र,
श्लोक 75 (skanda.3.45.75)
पश्यतां सर्वदेवानां मुनीनां कपिरक्षसाम् । पश्यतो रामचन्द्रस्य लक्ष्मणस्यापि पश्यतः
paśyatāṁ sarvadevānāṁ munīnāṁ kapirakṣasām paśyato rāmacandrasya lakṣmaṇasyāpi paśyataḥ
समस्त देवताओं, मुनियों, वानरों, तथा राक्षसों के देखते-देखते, रामचंद्र के देखते हुए, लक्ष्मण के भी देखते हुए,
श्लोक 76 (skanda.3.45.76)
पश्यंत्या अपि वैदेह्या लिंगं तत्सैकतं बलात् । पाणिना सर्वयत्नेन जग्राह तरसा बली
paśyantyā api vaidehyā liṅgaṁ tat saikataṁ balāt pāṇinā sarvayatnena jagrāha tarasā balī
तथा वैदेही के भी देखते हुए, उस बालू के लिंग को बलपूर्वक, अपने हाथ से समस्त प्रयत्न के साथ, बलवान हनुमान ने वेग से पकड़ा।
श्लोक 77 (skanda.3.45.77)
यत्नेन महता चायं चालयन्नपि मारुतिः । नालं चालयितुं ह्यासीत्सैकतं लिंगमोजसा
yatnena mahatā cāyaṁ cālayann api mārutiḥ nālaṁ cālayituṁ hy āsīt saikataṁ liṅgam ojasā
महान प्रयत्न से यह मारुति उसे हिलाने का प्रयत्न करते हुए भी, अपने बल से उस बालू के लिंग को हिलाने में समर्थ नहीं हुए।
श्लोक 78 (skanda.3.45.78)
ततः किलकिलाशब्दं कुर्वन्वानरपुंगवः । पुच्छमुद्यम्य पाणिभ्यां निरास्थत्तन्निजौजसा
tataḥ kilakilāśabdaṁ kurvan vānarapuṅgavaḥ pucchamudyamya pāṇibhyāṁ nirāsthat tannijaujasā
तब किल-किल शब्द करते हुए उस वानर-श्रेष्ठ ने अपनी पूँछ उठाकर, दोनों हाथों से अपने बल से उसे उखाड़ने का प्रयत्न किया।
श्लोक 79 (skanda.3.45.79)
इत्यनेकप्रकारेण चाल यन्नपि वानरः । नैव चालयितुं शक्तो बभूव पवनात्मजः
ity anekaprakāreṇa cālayann api vānaraḥ naiva cālayituṁ śakto babhūva pavanātmajaḥ
इस प्रकार अनेक उपायों से हिलाने का प्रयत्न करते हुए भी, वह वानर, पवनपुत्र, उसे हिलाने में समर्थ नहीं हो सका।
श्लोक 80 (skanda.3.45.80)
तद्वेष्टयित्वा पुच्छेन पाणिभ्यां धरणीं स्पृशन् । उत्पपाताथ तरसा व्योम्नि वायुसुतः कपिः
tad veṣṭayitvā pucchena pāṇibhyāṁ dharaṇīṁ spṛśan utpapātātha tarasā vyomni vāyusutaḥ kapiḥ
उसे पूँछ से लपेटकर, दोनों हाथों से धरती का स्पर्श करते हुए, वह वायुपुत्र वानर वेग से आकाश में उछल पड़ा।
श्लोक 81 (skanda.3.45.81)
कंपयन्स धरां सर्वां सप्तद्वीपां सपर्वतम् । लिंगस्य क्रोशमात्रे तु मूर्च्छितो रुधिरं वमन्
kampayan sa dharāṁ sarvāṁ saptadvīpāṁ saparvatam liṅgasya krośamātre tu mūrcchito rudhiraṁ vaman
सातों द्वीपों तथा पर्वतों सहित समस्त पृथ्वी को कंपाते हुए, लिंग से एक कोस की दूरी पर ही, मूर्च्छित होकर रक्त वमन करते हुए,
श्लोक 82 (skanda.3.45.82)
पपात हनुमान्विप्राः कंपितांगो धरातले । पततो वायुपुत्रस्य वक्त्राच्च नयनद्वयात्
papāta hanumān viprāḥ kampitāṅgo dharātale patato vāyuputrasya vaktrāc ca nayanadvayāt
हे विप्रो! हनुमान अपने कंपित अंगों सहित धरातल पर गिर पड़े। गिरते हुए उस वायुपुत्र के मुख से तथा दोनों नेत्रों से,
श्लोक 83 (skanda.3.45.83)
नासापुटाच्छ्रोत्ररंध्रादपानाच्च द्विजोत्तमाः । रुधिरौघः प्रसुस्राव रक्तकुण्ड मभूच्च तत्
nāsāpuṭāc chrotrarandhrād apānāc ca dvijottamāḥ rudhiraughaḥ prasusrāva raktakuṇḍam abhūc ca tat
हे द्विजोत्तमो! नासिका के छिद्रों से, कानों के छिद्रों से, तथा गुदा से भी, रक्त की धारा बह निकली, और वह एक रक्त-कुंड बन गया।
श्लोक 84 (skanda.3.45.84)
ततो हाहाकृतं सर्वं सदेवासुरमानुषम् । धावंतौ कपिभिः सार्द्धमुभौ तौ रामलक्ष्मणौ
tato hāhākṛtaṁ sarvaṁ sadevāsuramānuṣam dhāvantau kapibhiḥ sārdham ubhau tau rāmalakṣmaṇau
तब देवताओं, असुरों, तथा मनुष्यों सहित समस्त लोक हाहाकार कर उठा। वानरों सहित दौड़ते हुए वे दोनों राम और लक्ष्मण,
श्लोक 85 (skanda.3.45.85)
जानकीसहितौ विप्रा ह्यास्तां शोकाकुलौ तदा । सीतया सहितौ वीरौ वानरैश्च महाबलौ
jānakīsahitau viprā hy āstāṁ śokākulau tadā sītayā sahitau vīrau vānaraiś ca mahābalau
हे विप्रो! जानकी सहित उस समय शोक से व्याकुल हो गए। सीता सहित, वानरों सहित, वे दोनों महाबली वीर,
श्लोक 86 (skanda.3.45.86)
रुरुचाते तदा विप्रा गन्धमादनपर्वते । यथा तारागणयुतौ रजन्यां शशि भास्करौ
rurucāte tadā viprā gandhamādanaparvate yathā tārāgaṇayutau rajanyāṁ śaśibhāskarau
हे विप्रो! उस समय गन्धमादन पर्वत पर वैसे ही शोभित हुए, जैसे रात्रि में तारागणों सहित चंद्र और सूर्य।
श्लोक 87 (skanda.3.45.87)
ददर्शतुर्हनूमंतं चूर्णीकृतकलेवरम् । मूर्च्छितं पतितं भूमौ वमन्तं रुधिरं मुखात्
dadarśatur hanūmantaṁ cūrṇīkṛtakalevaram mūrcchitaṁ patitaṁ bhūmau vamantaṁ rudhiraṁ mukhāt
उन दोनों ने हनुमान को देखा, जिनका शरीर चूर्ण हो गया था, जो मूर्च्छित होकर भूमि पर गिरे थे, और मुख से रक्त वमन कर रहे थे।
श्लोक 88 (skanda.3.45.88)
विलोक्य कपयः सर्वे हाहाकृत्वाऽपतन्भुवि । कराभ्यां सदयं सीता हनूमंतं मरुत्सुतम्
vilokya kapayaḥ sarve hāhākṛtvā'patan bhuvi karābhyāṁ sadayaṁ sītā hanūmantaṁ marutsutam
यह देखकर समस्त वानर हाहाकार करते हुए भूमि पर गिर पड़े। सीता ने दोनों हाथों से करुणापूर्वक वायु-पुत्र हनुमान को,
श्लोक 89 (skanda.3.45.89)
ताततातेति पस्पर्श पतितं धरणीतले । रामोऽपि दृष्ट्वा पतितं हनूमंतं कपीश्वरम्
tātatāteti pasparśa patitaṁ dharaṇītale rāmo'pi dṛṣṭvā patitaṁ hanūmantaṁ kapīśvaram
'हे तात, हे तात' कहते हुए स्पर्श किया, जो धरातल पर गिरे हुए थे। राम भी वानरराज हनुमान को गिरा हुआ देखकर,
श्लोक 90 (skanda.3.45.90)
आरोप्यांकं स्वपाणिभ्यामाममर्श कलेवरम् । विमुंचन्नेत्रजं वारि वायुजं चाव्रवीद्द्विजाः
āropyāṅkaṁ svapāṇibhyām āmamarśa kalevaram vimuñcan netrajaṁ vāri vāyujaṁ cāvravīd dvijāḥ
उन्हें अपनी गोद में उठाकर, अपने ही हाथों से उनके शरीर को सहलाने लगे। हे द्विजो! नेत्रों से जल बहाते हुए राम ने वायु-पुत्र से यह कहा —