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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 46

रामनाथ-लिंग-प्रतिष्ठा के कारण का वर्णन

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

श्लोक 1 (skanda.3.46.1)

श्रीराम उवाच । पंपारण्ये वयं दीनास्त्वया वानरपुंगव । आश्वासिताः कारयित्वा सख्यमादित्यसूनुना

śrīrāma uvāca pampāraṇye vayaṁ dīnās tvayā vānarapuṅgava āśvāsitāḥ kārayitvā sakhyam ādityasūnunā

श्रीराम ने कहा — हे वानरश्रेष्ठ! पंपा वन में दीन-दशा में पड़े हम लोगों को, आदित्य-पुत्र सुग्रीव से मित्रता कराकर, तुमने आश्वस्त किया।

श्लोक 2 (skanda.3.46.2)

त्वां दृष्ट्वा पितरं बन्धून्कौसल्यां जननीमपि । न स्मरामो वयं सर्वान्मे त्वयोपकृतं बहु

tvāṁ dṛṣṭvā pitaraṁ bandhūn kausalyāṁ jananīm api na smarāmo vayaṁ sarvān me tvayopakṛtaṁ bahu

तुम्हें देखकर हम अपने पिता, बंधुओं, तथा माता कौसल्या को भी नहीं याद करते। तुमने मेरा बहुत उपकार किया है।

श्लोक 3 (skanda.3.46.3)

मदर्थं सागरस्तीर्णो भवता बहु योजनः । तलप्रहाराभिहतो मैनाकोऽपि नगोत्तमः

madarthaṁ sāgaras tīrṇo bhavatā bahuyojanaḥ talaprahārābhihato maināko'pi nagottamaḥ

मेरे लिए तुमने अनेक योजन के समुद्र को पार किया। तुम्हारे तल-प्रहार से आहत होकर पर्वत-श्रेष्ठ मैनाक भी,

श्लोक 4 (skanda.3.46.4)

नागमाता च सुरसा मदर्थं भवता जिता । छायाग्रहां महाक्रूराम वधीद्राक्षसीं भवान्

nāgamātā ca surasā madarthaṁ bhavatā jitā chāyāgrahāṁ mahākrūrām avadhīd rākṣasīṁ bhavān

नागों की माता सुरसा भी मेरे लिए तुम्हारे द्वारा जीती गई। तुमने अत्यंत क्रूर छाया-ग्राहिणी राक्षसी का वध किया।

श्लोक 5 (skanda.3.46.5)

सायं सुवेलमासाद्य लंकामाहत्य पाणिना । अयासी रावणगृहं मदर्थं त्वं महाकपे

sāyaṁ suvelam āsādya laṅkām āhatya pāṇinā ayāsī rāvaṇagṛhaṁ madarthaṁ tvaṁ mahākape

हे महावानर! शाम को सुवेल पर्वत पर पहुँचकर, हाथ से लंका को थपथपाकर, तुम मेरे लिए रावण के घर गए।

श्लोक 6 (skanda.3.46.6)

सीतामन्विष्य लंकायां रात्रौ गतभयो भवान् । अदृष्ट्वा जानकीं पश्चादशोकवनिकां ययौ

sītām anviṣya laṅkāyāṁ rātrau gatabhayo bhavān adṛṣṭvā jānakīṁ paścād aśokavanikāṁ yayau

लंका में रात्रि में निर्भय होकर तुमने सीता को खोजा। जानकी को न पाकर, फिर तुम अशोक-वाटिका में गए।

श्लोक 7 (skanda.3.46.7)

नमस्कृत्य च वैदेहीमभिज्ञानं प्रदाय च । चूडामणिं समादाय मदर्थं जानकीकरात्

namaskṛtya ca vaidehīm abhijñānaṁ pradāya ca cūḍāmaṇiṁ samādāya madarthaṁ jānakīkarāt

वैदेही को नमस्कार कर, तथा पहचान-चिह्न देकर, मेरे लिए जानकी के हाथ से चूड़ामणि लेकर,

श्लोक 8 (skanda.3.46.8)

अशोकवनिकावृक्षानभांक्षीस्त्वं महाकपे । ततस्त्वशीतिसाहस्रान्किंकरान्नाम राक्षसान्

aśokavanikāvṛkṣān abhāṅkṣīs tvaṁ mahākape tatas tv aśītisāhasrān kiṅkarān nāma rākṣasān

हे महावानर! तुमने अशोक-वाटिका के वृक्षों को तोड़ दिया। फिर तुमने अस्सी हज़ार किंकर नामक राक्षसों को,

श्लोक 9 (skanda.3.46.9)

रावणप्रतिमान्युद्धे पत्यश्वेभरथाकुलान् । अवधीस्त्वं मदर्थे वै महाबलपराक्रमान्

rāvaṇapratimān yuddhe patyaśvebharathākulān avadhīs tvaṁ madarthe vai mahābalaparākramān

जो रावण के समान थे, पैदल, अश्व, हाथी, तथा रथों से युक्त थे, तथा महाबल-पराक्रमी थे — उन्हें युद्ध में मेरे लिए तुमने मार डाला।

श्लोक 10 (skanda.3.46.10)

ततः प्रहस्ततनयं जंबुमालिनमागतम् । अवधीन्मंत्रितनयान्सप्त सप्तार्चिवर्चसः

tataḥ prahastatanayaṁ jambumālinam āgatam avadhīn mantritanayān sapta saptārcivarcasaḥ

फिर प्रहस्त के पुत्र जंबुमालि के आ जाने पर, तुमने उसे मार डाला, तथा अग्नि के समान तेजस्वी सात मंत्री-पुत्रों को भी मार डाला।

श्लोक 11 (skanda.3.46.11)

पंच सेनापतीन्पश्चादनयस्त्वं यमालयम् । कुमारमक्षमवधीस्ततस्त्वं रणमूर्धनि

pañca senāpatīn paścād anayas tvaṁ yamālayam kumāram akṣam avadhīs tatas tvaṁ raṇamūrdhani

फिर पाँच सेनापतियों को तुमने यमलोक भेज दिया। तत्पश्चात् तुमने युद्ध के मोर्चे पर कुमार अक्ष को मार डाला।

श्लोक 12 (skanda.3.46.12)

तत इन्द्रजिता नीतो राक्षसेंद्र सभां शुभाम् । तत्र लंकेश्वरं वाचा तृणीकृत्यावमन्य च

tata indrajitā nīto rākṣasendrasabhāṁ śubhām tatra laṅkeśvaraṁ vācā tṛṇīkṛtyāvamanya ca

तब इंद्रजित द्वारा राक्षसराज की शुभ सभा में लाए जाकर, वहाँ लंकेश्वर को वाणी से तृणतुल्य कर और उसका अपमान कर,

श्लोक 13 (skanda.3.46.13)

अभांक्षीस्त्वं पुरीं लंकां मदर्थं वायुनंदन । पुनः प्रतिनिवृत्तस्त्वमृष्यमूकं महागिरिम्

abhāṅkṣīs tvaṁ purīṁ laṅkāṁ madarthaṁ vāyunandana punaḥ pratinivṛttas tvam ṛṣyamūkaṁ mahāgirim

हे वायु-नंदन! तुमने मेरे लिए लंका नगरी को जला दिया। फिर तुम लौटकर ऋष्यमूक महापर्वत पर आए।

श्लोक 14 (skanda.3.46.14)

एवमादि महादुःखं मदर्थं प्राप्तवानसि । त्वमत्र भूतले शेषे मम शोकमुदीरयन्

evamādi mahāduḥkhaṁ madarthaṁ prāptavān asi tvam atra bhūtale śeṣe mama śokam udīrayan

इस प्रकार आदि से लेकर तुमने मेरे लिए महान दुःख प्राप्त किया है। अब तुम इस भूतल पर मेरे शोक को बढ़ाते हुए पड़े हो,

श्लोक 15 (skanda.3.46.15)

अहं प्राणान्परित्यक्ष्ये मृतोऽसि यदि वायुज । सीतया मम किं कार्यं लक्ष्मणेनानुजेन वा

ahaṁ prāṇān parityakṣye mṛto'si yadi vāyuja sītayā mama kiṁ kāryaṁ lakṣmaṇenānujena vā

हे वायुपुत्र! यदि तुम मृत हो, तो मैं भी अपने प्राणों का त्याग करूँगा। सीता से मुझे क्या प्रयोजन है, अथवा अनुज लक्ष्मण से भी क्या?

श्लोक 16 (skanda.3.46.16)

भरतेनापि किं कार्यं शत्रुघ्नेन श्रियापि वा । राज्येनापि न मे कार्यं परेतस्त्वं कपे यदि

bharatenāpi kiṁ kāryaṁ śatrughnena śriyāpi vā rājyenāpi na me kāryaṁ paretas tvaṁ kape yadi

भरत से भी क्या प्रयोजन, अथवा शत्रुघ्न से, अथवा राज्य-लक्ष्मी से भी क्या? हे वानर! यदि तुम प्राणहीन हो, तो मुझे राज्य से भी कोई प्रयोजन नहीं है।

श्लोक 17 (skanda.3.46.17)

उत्तिष्ठ हनुमन्वत्स किं शेषेऽद्य महीतले । शय्यां कुरु महाबाहो निद्रार्थं मम वानर

uttiṣṭha hanuman vatsa kiṁ śeṣe'dya mahītale śayyāṁ kuru mahābāho nidrārthaṁ mama vānara

हे वत्स हनुमान! उठो, आज पृथ्वी पर क्यों पड़े हो? हे महाबाहो! हे वानर! मेरी निद्रा के लिए शय्या तैयार करो।

श्लोक 18 (skanda.3.46.18)

कन्दमूलफलानि त्वमाहारार्थं ममाहर । स्नातुमद्य गमिष्यामि शीघ्रं कलशमानय

kandamūlaphalāni tvam āhārārthaṁ mamāhara snātum adya gamiṣyāmi śīghraṁ kalaśam ānaya

मेरे भोजन के लिए कंद-मूल-फल लाओ। आज मैं स्नान करने जाऊँगा, शीघ्र ही कलश ले आओ।

श्लोक 19 (skanda.3.46.19)

अजिनानि च वासांसि दर्भांश्च समुपाहर । ब्रह्मास्त्रेणावबद्धोऽहं मोचितश्च त्वया हरे

ajināni ca vāsāṁsi darbhāṁś ca samupāhara brahmāstreṇāvabaddho'haṁ mocitaś ca tvayā hare

मृगचर्म, वस्त्र, तथा कुश-घास ले आओ। हे वानर! ब्रह्मास्त्र से बंधे हुए मुझे तुमने ही मुक्त किया था,

श्लोक 20 (skanda.3.46.20)

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा ह्यौषधानयनेन वै । लक्ष्मणप्राणदाता त्वं पौलस्त्यमदनाशनः

lakṣmaṇena saha bhrātrā hy auṣadhānayanena vai lakṣmaṇaprāṇadātā tvaṁ paulastyamadanāśanaḥ

भाई लक्ष्मण सहित, औषधि लाने के द्वारा। तुम ही लक्ष्मण के प्राणदाता हो, और पुलस्त्य-वंशज के मद का नाशक हो।

श्लोक 21 (skanda.3.46.21)

सहायेन त्वया युद्धे राक्षसा न्रावणादिकान् । निहत्यातिबलान्वीरानवापं मैथिलीमहम्

sahāyena tvayā yuddhe rākṣasān rāvaṇādikān nihatyātibalān vīrān avāpaṁ maithilīm aham

युद्ध में तुम्हारी सहायता से रावण आदि अत्यंत बलशाली वीर राक्षसों का वध कर, मैंने मैथिली को प्राप्त किया।

श्लोक 22 (skanda.3.46.22)

हनूमन्नंजनासूनो सीताशोकविनाशन । कथमेवं परित्यज्य लक्ष्मणं मां च जानकीम्

hanūman añjanāsūno sītāśokavināśana katham evaṁ parityajya lakṣmaṇaṁ māṁ ca jānakīm

हे हनुमान! हे अंजना-पुत्र! हे सीता के शोक का नाश करने वाले! इस प्रकार लक्ष्मण को, मुझे, तथा जानकी को छोड़कर,

श्लोक 23 (skanda.3.46.23)

अप्रापयित्वायोध्यां त्वं किमर्थं गतवानसि । क्व गतोसि महावीर महाराक्षसकण्टक

aprāpayitvāyodhyāṁ tvaṁ kimarthaṁ gatavān asi kva gato'si mahāvīra mahārākṣasakaṇṭaka

अयोध्या तक न पहुँचाकर, तुम किसलिए चले गए हो? हे महावीर! हे महाराक्षसों के कंटक! तुम कहाँ चले गए हो?

श्लोक 24 (skanda.3.46.24)

इति पश्यन्मुखं तस्य निर्वाक्यं रघुनंदनः । प्ररुदन्नश्रुजालेन सेचयामास वायुजम्

iti paśyan mukhaṁ tasya nirvākyaṁ raghunandanaḥ prarudann aśrujālena secayāmāsa vāyujam

इस प्रकार उसके निर्वाक मुख को देखते हुए, रघुनंदन रो पड़े और आँसुओं की धारा से वायुपुत्र को सींचने लगे।

श्लोक 25 (skanda.3.46.25)

वायुपुत्रस्ततो मूर्च्छामपहाय शनैर्द्विजाः । पौलस्त्यभयसंत्रस्तलोकरक्षार्थमागतम्

vāyuputras tato mūrcchām apahāya śanair dvijāḥ paulastyabhayasaṁtrastalokarakṣārtham āgatam

हे द्विजो! तब वायुपुत्र धीरे-धीरे मूर्च्छा से मुक्त होकर, पुलस्त्य-वंशज के भय से त्रस्त लोक की रक्षा के लिए आए हुए,

श्लोक 26 (skanda.3.46.26)

आश्रित्य मानुषं भावं नारायणमजं विभुम् । जानकीलक्ष्मणयुतं कपिभिः परिवारितम्

āśritya mānuṣaṁ bhāvaṁ nārāyaṇam ajaṁ vibhum jānakīlakṣmaṇayutaṁ kapibhiḥ parivāritam

मानव-भाव को धारण करने वाले, अजन्मा, सर्वव्यापी नारायण को, जानकी और लक्ष्मण सहित, वानरों से घिरे हुए,

श्लोक 27 (skanda.3.46.27)

कालांभोधरसंकाशं रणधूलिसमुक्षितम् । जटामण्डलशोभाढ्यं पुण्डरीकायतेक्षणम्

kālāmbhodharasaṅkāśaṁ raṇadhūlisamukṣitam jaṭāmaṇḍalaśobhāḍhyaṁ puṇḍarīkāyatekṣaṇam

काले मेघ के समान श्याम, युद्ध की धूल से आच्छादित, जटा-मंडल की शोभा से युक्त, कमल-नयन,

श्लोक 28 (skanda.3.46.28)

खिन्नं च बहुशो युद्धे ददर्श रघुनंदनम् । स्तूयमानममित्रघ्नं देवर्षिपितृकिन्नरैः

khinnaṁ ca bahuśo yuddhe dadarśa raghunandanam stūyamānam amitraghnaṁ devarṣipitṛkinnaraiḥ

युद्ध में बार-बार क्लांत, शत्रुओं के नाशक रघुनंदन को देवताओं, ऋषियों, पितरों, तथा किन्नरों द्वारा स्तुत होते हुए देखा।

श्लोक 29 (skanda.3.46.29)

दृष्ट्वा दाशरथिं रामं कृपाबहुलचेतसम् । रघुनाथकरस्पर्शपूर्णगात्रः स वानरः

dṛṣṭvā dāśarathiṁ rāmaṁ kṛpābahulacetasam raghunāthakaraspaśapūrṇagātraḥ sa vānaraḥ

करुणा से परिपूर्ण चित्त वाले दशरथ-पुत्र राम को देखकर, रघुनाथ के हाथ के स्पर्श से परिपूर्ण अंगों वाला वह वानर,

श्लोक 30 (skanda.3.46.30)

पतित्वा दण्डवद्भूमौ कृतांजलिपुटो द्विजाः । अस्तौषीज्जानकीनाथं स्तोत्रैः श्रुतिमनोहरैः

patitvā daṇḍavad bhūmau kṛtāñjaliputo dvijāḥ astauṣīj jānakīnāthaṁ stotraiḥ śrutimanoharaiḥ

हे द्विजो! भूमि पर दंडवत् गिरकर, हाथ जोड़कर, कर्ण-प्रिय स्तोत्रों से जानकी-नाथ की स्तुति करने लगा।

श्लोक 31 (skanda.3.46.31)

हनूमानुवाच । नमो रामाय हरये विष्णवे प्रभविष्णवे । आदिदेवाय देवाय पुराणाय गदाभृते

hanūmān uvāca namo rāmāya haraye viṣṇave prabhaviṣṇave ādidevāya devāya purāṇāya gadābhṛte

हनुमान ने कहा — राम को, हरि को, विष्णु को, समर्थ को, आदिदेव को, देव को, पुराण-पुरुष को, गदाधारी को नमस्कार है।

श्लोक 32 (skanda.3.46.32)

विष्टरे पुष्पकं नित्यं निविष्टाय महात्मने । प्रहृष्टवानरानीकजुष्टपादांबुजाय ते

viṣṭare puṣpakaṁ nityaṁ niviṣṭāya mahātmane prahṛṣṭavānarānīkajuṣṭapādāmbujāya te

पुष्पक विमान के आसन पर सदा विराजमान, महात्मा, हर्षित वानर-सेना द्वारा सेवित चरण-कमलों वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 33 (skanda.3.46.33)

निष्पिष्ट राक्षसेंद्राय जगदिष्टविधायिने । नमः सहस्रशिरसे सहस्रचरणाय च

niṣpiṣṭarākṣasendrāya jagadiṣṭavidhāyine namaḥ sahasraśirase sahasracaraṇāya ca

राक्षसराज को कुचलने वाले, जगत के अभीष्ट को सिद्ध करने वाले, सहस्र-सिर वाले, सहस्र-चरण वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 34 (skanda.3.46.34)

सहस्राक्षाय शुद्धाय राघवाय च विष्णवे । भक्तार्तिहारिणे तुभ्यं सीतायाः पतये नमः

sahasrākṣāya śuddhāya rāghavāya ca viṣṇave bhaktārtihāriṇe tubhyaṁ sītāyāḥ pataye namaḥ

सहस्र-नेत्र वाले, शुद्ध, राघव, विष्णु, भक्तों की पीड़ा हरने वाले, सीता के पति आपको नमस्कार है।

श्लोक 35 (skanda.3.46.35)

हरये नारसिंहाय दैत्यराजविदारिणे । नमस्तुभ्यं वराहाय दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धर

haraye nārasiṁhāya daityarājavidāriṇe namas tubhyaṁ varāhāya daṁṣṭroddhṛtavasundhara

हरि को, नरसिंह-रूप को, दैत्यराज को विदीर्ण करने वाले को नमस्कार है। दाढ़ से पृथ्वी का उद्धार करने वाले वराह-रूप आपको नमस्कार है।

श्लोक 36 (skanda.3.46.36)

त्रिविक्रमाय भवते बलियज्ञ विभेदिने । नमो वामनरूपाय नमो मंदरधारिणे

trivikramāya bhavate baliyajñavibhedine namo vāmanarūpāya namo mandaradhāriṇe

त्रिविक्रम-रूप, बलि के यज्ञ को भंग करने वाले आपको नमस्कार है। वामन-रूप को नमस्कार है, मंदराचल को धारण करने वाले को नमस्कार है।

श्लोक 37 (skanda.3.46.37)

नमस्ते मत्स्यरूपाय त्रयीपालनकारिणे । नमः परशुरामाय क्षत्रियांतकराय ते

namaste matsyarūpāya trayīpālanakāriṇe namaḥ paraśurāmāya kṣatriyāntakarāya te

त्रिवेद की रक्षा करने वाले मत्स्य-रूप आपको नमस्कार है। क्षत्रियों का अंत करने वाले परशुराम-रूप आपको नमस्कार है।

श्लोक 38 (skanda.3.46.38)

नमस्ते राक्षसघ्नाय नमो राघवरूपिणे । महादेव महाभीम महाकोदण्डभेदिने

namaste rākṣasaghnāya namo rāghavarūpiṇe mahādeva mahābhīma mahākodaṇḍabhedine

राक्षसों के नाशक आपको नमस्कार है, राघव-रूप को नमस्कार है। हे महादेव! हे महाभीम! हे महान धनुष को तोड़ने वाले!

श्लोक 39 (skanda.3.46.39)

क्षत्रियांतकरक्रूरभार्गवत्रासकारिणे । नमोऽस्त्वहिल्या संतापहारिणे चापहारिणे

kṣatriyāntakarakrūrabhārgavatrāsakāriṇe namo'stv ahilyāsantāpahāriṇe cāpahāriṇe

क्षत्रियों का अंत करने वाले क्रूर भार्गव को भी त्रास देने वाले आपको नमस्कार हो। अहल्या के संताप को हरने वाले, धनुष को धारण करने वाले को नमस्कार है।

श्लोक 40 (skanda.3.46.40)

नागायुतवलोपेतताटकादेहहारिणे । शिलाकठिनविस्तारवालिवक्षोविभेदिने

nāgāyutabalopetatāṭakādehahāriṇe śilākaṭhinavistāravālivakṣovibhedine

दस हज़ार हाथियों के बल से युक्त ताड़का के शरीर को नष्ट करने वाले, शिला के समान कठोर, विशाल वालि के वक्ष को भेदने वाले,

श्लोक 41 (skanda.3.46.41)

नमो माया मृगोन्माथकारिणेऽज्ञानहारिणे । दशस्यंदनदुःखाब्धिशोषणागस्त्यरूपिणे

namo māyāmṛgonmāthakāriṇe'jñānahāriṇe daśasyandanaduḥkhābdhiśoṣaṇāgastyarūpiṇe

मायावी मृग को नष्ट करने वाले, अज्ञान को हरने वाले, दशानन-रूपी रथ के दुःख-सागर को सुखाने वाले अगस्त्य-रूप को नमस्कार है।

श्लोक 42 (skanda.3.46.42)

अनेकोर्मिसमाधूतसमुद्रमदहारिणे । मैथिलीमानसां भोजभानवे लोकसाक्षिणे

anekormisamādhūtasamudramadahāriṇe maithilīmānasāṁbhojabhānave lokasākṣiṇe

अनेक लहरों से आंदोलित समुद्र के मद को हरने वाले, मैथिली के मानस-कमल के लिए सूर्य के समान, लोक-साक्षी को,

श्लोक 43 (skanda.3.46.43)

राजेंद्राय नमस्तुभ्यं जानकीपतये हरे । तारकब्रह्मणे तुभ्यं नमो राजीवलोचन

rājendrāya namas tubhyaṁ jānakīpataye hare tārakabrahmaṇe tubhyaṁ namo rājīvalocana

हे राजेंद्र! आपको नमस्कार है। हे जानकीपति हरि! हे तारक-ब्रह्म-रूप! आपको नमस्कार है। हे राजीव-लोचन!

श्लोक 44 (skanda.3.46.44)

रामाय रामचन्द्राय वरेण्याय सुखात्मने । विश्वामित्रप्रियायेदं नमः खरविदारिणे

rāmāya rāmacandrāya vareṇyāya sukhātmane viśvāmitrapriyāyedaṁ namaḥ kharavidāriṇe

राम को, रामचंद्र को, वरणीय को, सुख-स्वरूप को, विश्वामित्र के प्रिय को, खर को विदीर्ण करने वाले को यह नमस्कार है।

श्लोक 45 (skanda.3.46.45)

प्रसीद देवदेवेश भक्तानामभयप्रद । रक्ष मां करु णासिंधो रामचन्द्र नमोऽस्तु ते

prasīda devadeveśa bhaktānām abhayaprada rakṣa māṁ karuṇāsindho rāmacandra namo'stu te

हे देवों के देवेश! हे भक्तों को अभय देने वाले! प्रसन्न होइए। हे करुणासिंधु रामचंद्र! मेरी रक्षा कीजिए, आपको नमस्कार है।

श्लोक 46 (skanda.3.46.46)

रक्ष मां वेदवचसामप्यगोचर राघव । पाहि मां कृपया राम शरणं त्वामुपैम्यहम्

rakṣa māṁ vedavacasām apy agocara rāghava pāhi māṁ kṛpayā rāma śaraṇaṁ tvām upaimy aham

हे राघव! हे वेद-वाणी के लिए भी अगोचर! मेरी रक्षा कीजिए। हे राम! कृपापूर्वक मेरी रक्षा कीजिए, मैं आपकी शरण में आता हूँ।

श्लोक 47 (skanda.3.46.47)

रघुवीर महामोहमपाकुरु ममाधुना । स्नाने चाचमने भुक्तो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु

raghuvīra mahāmoham apākuru mamādhunā snāne cācamane bhukto jāgratsvapnasuṣuptiṣu

हे रघुवीर! अब मेरे महामोह को दूर कीजिए। स्नान में, आचमन में, भोजन में, जाग्रत, स्वप्न, तथा सुषुप्ति अवस्थाओं में,

श्लोक 48 (skanda.3.46.48)

सर्वावस्थासु सर्वत्र पाहि मां रघुनंदन । महिमानं तव स्तोतुं कः समर्थो जगत्त्रये

sarvāvasthāsu sarvatra pāhi māṁ raghunandana mahimānaṁ tava stotuṁ kaḥ samartho jagattraye

हे रघुनंदन! समस्त अवस्थाओं में, सर्वत्र मेरी रक्षा कीजिए। तीनों लोकों में आपकी महिमा का वर्णन करने में कौन समर्थ है?

श्लोक 49 (skanda.3.46.49)

त्वमेव त्वन्महत्त्वं वै जानासि रघुनंदन । इति स्तुत्वा वायुपुत्रो रामचंद्रं घृणानिधिम्

tvam eva tvanmahattvaṁ vai jānāsi raghunandana iti stutvā vāyuputro rāmacandraṁ ghṛṇānidhim

हे रघुनंदन! आप ही अपनी महानता को जानते हैं। इस प्रकार करुणा-निधि रामचंद्र की स्तुति कर वायुपुत्र ने,

श्लोक 50 (skanda.3.46.50)

सीतामप्यभितुष्टाव भक्तियुक्तेन चेतसा । जानकि त्वां नमस्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम्

sītām apy abhituṣṭāva bhaktiyuktena cetasā jānaki tvāṁ namasyāmi sarvapāpapraṇāśinīm

भक्तियुक्त चित्त से सीता की भी स्तुति की — 'हे जानकी! समस्त पापों का नाश करने वाली आपको मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 51 (skanda.3.46.51)

दारिद्र्यरणसंहर्त्रीं भक्तानामिष्टदायिनीम् । विदेहराजतनयां राघवानंदकारिणीम्

dāridryaraṇasaṁhartrīṁ bhaktānām iṣṭadāyinīm videgharājatanayāṁ rāghavānandakāriṇīm

दरिद्रता और युद्ध का नाश करने वाली, भक्तों को अभीष्ट देने वाली, विदेहराज की पुत्री, राघव को आनंद देने वाली,

श्लोक 52 (skanda.3.46.52)

भूमेर्दुहितरं विद्यां नमामि प्रकृतिं शिवाम् । पौलस्त्यैश्वर्यसंहर्त्रीं भक्ताभीष्टां सरस्वतीम्

bhūmer duhitaraṁ vidyāṁ namāmi prakṛtiṁ śivām paulastyaiśvaryasaṁhartrīṁ bhaktābhīṣṭāṁ sarasvatīm

पृथ्वी की पुत्री, विद्या-स्वरूपिणी, कल्याणकारी प्रकृति को मैं नमस्कार करता हूँ। पुलस्त्य-वंशज के ऐश्वर्य का नाश करने वाली, भक्तों को अभीष्ट, सरस्वती-स्वरूपिणी को,

श्लोक 53 (skanda.3.46.53)

पतिव्रताधुरीणां त्वां नमामि जनकात्मजाम् । अनुग्रहपरामृद्धिमनघां हरिवल्लभाम्

pativratādhurīṇāṁ tvāṁ namāmi janakātmajām anugrahaparām ṛddhim anaghāṁ harivallabhām

पतिव्रताओं में श्रेष्ठ, जनक-पुत्री, आपको मैं नमस्कार करता हूँ। अनुग्रह में तत्पर, समृद्धि-स्वरूपा, पाप-रहित, हरि की प्रिया,

श्लोक 54 (skanda.3.46.54)

आत्मविद्यां त्रयीरूपामुमारूपां नमाम्य हम् । प्रसादाभिमुखीं लक्ष्मीं क्षीराब्धितनयां शुभाम्

ātmavidyāṁ trayīrūpām umārūpāṁ namāmy aham prasādābhimukhīṁ lakṣmīṁ kṣīrābdhitanayāṁ śubhām

आत्मविद्या-स्वरूपिणी, त्रयी-रूपा, उमा-रूपा को मैं नमस्कार करता हूँ। प्रसाद के सम्मुख, लक्ष्मी-स्वरूपा, क्षीरसागर-पुत्री, शुभ,

श्लोक 55 (skanda.3.46.55)

नमामि चन्द्रभगिनीं सीतां सर्वांगसुंदरीम् । नमामि धर्मनिलयां करुणां वेदमातरम्

namāmi candrabhaginīṁ sītāṁ sarvāṅgasundarīm namāmi dharmanilayāṁ karuṇāṁ vedamātaram

चंद्रमा की बहन, सर्वांग-सुंदरी सीता को मैं नमस्कार करता हूँ। धर्म के निवासस्थान, करुणा-स्वरूपा, वेद-माता को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 56 (skanda.3.46.56)

पद्मालयां पद्महस्तां विष्णुवक्षस्थलालयाम् । नमामि चन्द्रनिलयां सीतां चन्द्रनिभाननाम्

padmālayāṁ padmahastāṁ viṣṇuvakṣasthalālayām namāmi candranilayāṁ sītāṁ candranibhānanām

कमल में निवास करने वाली, कमल-हस्ता, विष्णु के वक्षस्थल में निवास करने वाली, चंद्र के समान मुख वाली, चंद्र-निवासिनी सीता को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 57 (skanda.3.46.57)

आह्लादरूपिणीं सिद्धिं शिवां शिवकरीं सतीम् । नमामि विश्वजननीं रामचन्द्रेष्टवल्लभाम् । सीतां सर्वानवद्यांगीं भजामि सततं हृदा

āhlādarūpiṇīṁ siddhiṁ śivāṁ śivakarīṁ satīm namāmi viśvajananīṁ rāmacandreṣṭavallabhām sītāṁ sarvānavadyāṅgīṁ bhajāmi satataṁ hṛdā

आनंद-स्वरूपा, सिद्धि-रूपा, कल्याणकारी, कल्याण करने वाली, सती, विश्व की जननी, रामचंद्र की अत्यंत प्रिय पत्नी को मैं नमस्कार करता हूँ। समस्त अंगों में निर्दोष सीता को मैं सदा हृदय से भजता हूँ।

श्लोक 58 (skanda.3.46.58)

श्रीसूत उवाच । स्तुत्वैवं हनुमान्सीतारामचन्द्रौ सभक्तिकम्

śrīsūta uvāca stutvaivaṁ hanumān sītārāmacandrau sabhaktikam

श्री सूत जी ने कहा — इस प्रकार भक्तिपूर्वक सीता और रामचंद्र की स्तुति कर हनुमान,

श्लोक 59 (skanda.3.46.59)

आनंदाश्रुपरिक्लिन्नस्तूष्णीमास्ते द्विजोत्तमाः । य इदं वायुपुत्रेण कथितं पापनाशनम्

ānandāśruparikliṇṇas tūṣṇīm āste dvijottamāḥ ya idaṁ vāyuputreṇa kathitaṁ pāpanāśanam

हे द्विजोत्तमो! आनंद के आँसुओं से भीगे हुए मौन बैठ गए। वायुपुत्र द्वारा कहा गया पाप-नाशक यह जो,

श्लोक 60 (skanda.3.46.60)

स्तोत्रं श्रीरामचंद्रस्य सीतायाः पठतेऽन्वहम् । स नरो महदैश्वर्यमश्नुते वांछितं स दा

stotraṁ śrīrāmacandrasya sītāyāḥ paṭhate'nvaham sa naro mahadaiśvaryam aśnute vāñchitaṁ sadā

श्रीरामचंद्र और सीता का यह स्तोत्र जो प्रतिदिन पढ़ता है, वह मनुष्य महान ऐश्वर्य को, अपनी वांछित वस्तु को सदा प्राप्त करता है।

श्लोक 61 (skanda.3.46.61)

अनेकक्षेत्रधान्यानि गाश्च दोग्ध्रीः पयस्विनीः । आयुर्विद्याश्च पुत्रांश्च भार्यामपि मनोरमाम्

anekakṣetradhānyāni gāś ca dogdhrīḥ payasvinīḥ āyurvidyāś ca putrāṁś ca bhāryām api manoramām

अनेक खेतों का अन्न, दुधारू दूध देने वाली गायें, आयु, विद्याएँ, पुत्र, तथा मनोहर पत्नी भी,

श्लोक 62 (skanda.3.46.62)

एतत्स्तोत्रं सकृ द्विप्राः पठन्नाप्नोत्यसंशयः । एतत्स्तोत्रस्य पाठेन नरकं नैव यास्यति

etat stotraṁ sakṛd viprāḥ paṭhann āpnoty asaṁśayaḥ etat stotrasya pāṭhena narakaṁ naiva yāsyati

हे विप्रो! इस स्तोत्र को एक बार पढ़ने वाला निःसंदेह प्राप्त कर लेता है। इस स्तोत्र के पाठ से मनुष्य नरक को नहीं जाता।

श्लोक 63 (skanda.3.46.63)

ब्रह्महत्यादिपापानि नश्यंति सुमहांत्यपि । सर्वपापविनिर्मुक्तो देहांते मुक्तिमाप्नुयात्

brahmahatyādipāpāni naśyanti sumahānty api sarvapāpavinirmukto dehānte muktim āpnuyāt

ब्रह्महत्या आदि अत्यंत महान पाप भी नष्ट हो जाते हैं। समस्त पापों से मुक्त होकर वह देहांत होने पर मुक्ति प्राप्त करता है।

श्लोक 64 (skanda.3.46.64)

इति स्तुतो जगन्नाथो वायुपुत्रेण राघवः । सीतया सहितो विप्रा हनूमंतमथाब्रवीत्

iti stuto jagannātho vāyuputreṇa rāghavaḥ sītayā sahito viprā hanūmantam athābravīt

इस प्रकार वायुपुत्र द्वारा स्तुत जगन्नाथ राघव ने, हे विप्रो! सीता सहित हनुमान से यह कहा।

श्लोक 65 (skanda.3.46.65)

श्रीराम उवाच । अज्ञानाद्वा नरश्रेष्ठ त्वयेदं साहसं कृतम् । ब्रह्मणा विष्णुना वापि शक्रादित्रिदशैरपि

śrīrāma uvāca ajñānād vā naraśreṣṭha tvayedaṁ sāhasaṁ kṛtam brahmaṇā viṣṇunā vāpi śakrādi tridaśair api

श्रीराम ने कहा — हे नरश्रेष्ठ! अज्ञान से तुमने यह साहस किया है। ब्रह्मा से, विष्णु से, अथवा इंद्र आदि समस्त देवताओं से भी,

श्लोक 66 (skanda.3.46.66)

नेदं लिंगं समुद्धर्तुं शक्यते स्थापितं मया । महादेवापराधेन पतितोऽस्यद्य मूर्च्छितः

nedaṁ liṅgaṁ samuddhartuṁ śakyate sthāpitaṁ mayā mahādevāparādhena patito'sy adya mūrcchitaḥ

मेरे द्वारा स्थापित यह लिंग उखाड़ा नहीं जा सकता। महादेव के अपराध से ही आज तुम मूर्च्छित होकर गिरे हो।

श्लोक 67 (skanda.3.46.67)

इतः परं मा क्रियतां द्रोहः सांबस्य शूलिनः । अद्यारभ्य त्विदं कुंडं तव नाम्ना जगत्त्रये

itaḥ paraṁ mā kriyatāṁ drohaḥ sāmbasya śūlinaḥ adyārabhya tv idaṁ kuṇḍaṁ tava nāmnā jagattraye

अब से आगे पार्वती सहित शूलधारी शिव के प्रति द्रोह मत करो। आज से यह कुंड तुम्हारे ही नाम से तीनों लोकों में,

श्लोक 68 (skanda.3.46.68)

ख्यातिं प्रयातु यत्र त्वं पतितो वानरोत्तम । महापातकसंघानां नाशः स्यादत्र मज्जनात्

khyātiṁ prayātu yatra tvaṁ patito vānarottama mahāpātakasaṅghānāṁ nāśaḥ syād atra majjanāt

प्रसिद्धि प्राप्त करे, जहाँ हे वानरश्रेष्ठ! तुम गिरे थे। यहाँ स्नान करने से महापातकों के समूहों का नाश होगा।

श्लोक 69 (skanda.3.46.69)

महादेवजटाजाता गौतमी सरितां वरा । अश्वमेधसहस्रस्य फलदा स्नायिनां नृणाम्

mahādevajaṭājātā gautamī saritāṁ varā aśvamedhasahasrasya phaladā snāyināṁ nṛṇām

महादेव की जटाओं से उत्पन्न, नदियों में श्रेष्ठ गौतमी, स्नान करने वाले मनुष्यों को सहस्र अश्वमेध का फल देने वाली है।

श्लोक 70 (skanda.3.46.70)

ततः शतगुणा गंगा यमुना च सरस्वती । एतन्नदीत्रयं यत्र स्थले प्रवहते कपे

tataḥ śataguṇā gaṅgā yamunā ca sarasvatī etan nadītrayaṁ yatra sthale pravahate kape

उससे सौ गुना अधिक फलदायी गंगा, यमुना, तथा सरस्वती हैं। हे वानर! जिस स्थल पर ये तीनों नदियाँ प्रवाहित होती हैं,

श्लोक 71 (skanda.3.46.71)

मिलित्वा तत्र तु स्नानं सहस्रगुणितं स्मृतम् । नदीष्वेतासु यत्स्नानात्फलं पुंसां भवेत्कपे

militvā tatra tu snānaṁ sahasraguṇitaṁ smṛtam nadīṣv etāsu yat snānāt phalaṁ puṁsāṁ bhavet kape

मिलकर, वहाँ स्नान का फल सहस्र गुना कहा गया है। हे वानर! इन नदियों में स्नान से मनुष्यों को जो फल प्राप्त होता है,

श्लोक 72 (skanda.3.46.72)

तत्फलं तव कुंडेऽस्मिन्स्नानात्प्राप्नोत्यसंशयम् । दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं हनूमत्कुंडतीरतः

tat phalaṁ tava kuṇḍe'smin snānāt prāpnoty asaṁśayam durlabhaṁ prāpya mānuṣyaṁ hanūmatkuṇḍatīrataḥ

वही फल तुम्हारे इस कुंड में स्नान से निःसंशय प्राप्त होता है। दुर्लभ मनुष्य-जन्म प्राप्त कर, हनुमत्कुंड के तट पर,

श्लोक 73 (skanda.3.46.73)

श्राद्धं न कुरुते यस्तु भक्तियुक्तेन चेतसा । निराशास्तस्य पितरः प्रयांति कुपिताः कपे

śrāddhaṁ na kurute yas tu bhaktiyuktena cetasā nirāśās tasya pitaraḥ prayānti kupitāḥ kape

जो भक्तियुक्त चित्त से श्राद्ध नहीं करता, हे वानर! उसके पितर निराश और क्रुद्ध होकर लौट जाते हैं।

श्लोक 74 (skanda.3.46.74)

कुप्यंति मुनयोऽप्यस्मै देवाः सेंद्राः सचारणाः । न दत्तं न हुतं येन हनूमत्कुंडतीरतः

kupyanti munayo'py asmai devāḥ sendrāḥ sacāraṇāḥ na dattaṁ na hutaṁ yena hanūmatkuṇḍatīrataḥ

इंद्र सहित देवता, चारण सहित मुनि भी उस पर क्रुद्ध होते हैं, जिसने हनुमत्कुंड के तट पर न दान दिया, न हवन किया।

श्लोक 75 (skanda.3.46.75)

वृथाजीवित एवासाविहामुत्र च दुःखभाक् । हनूमत्कुंडसविधे येन दत्तं तिलोदकम् । मोदंते पितरस्तस्य घृतकुल्याः पिबंति च

vṛthājīvita evāsāv ihāmutra ca duḥkhabhāk hanūmatkuṇḍasavidhe yena dattaṁ tilodakam modante pitaras tasya ghṛtakulyāḥ pibanti ca

वह व्यर्थ ही जीवित है, और यहाँ तथा परलोक दोनों में दुःख का भागी होता है। जिसने हनुमत्कुंड के समीप तिल-जल अर्पित किया, उसके पितर आनंदित होते हैं, और घृत की धाराओं का पान करते हैं।

श्लोक 76 (skanda.3.46.76)

श्रीसूत उवाच । श्रुत्वैतद्वचनं विप्रा रामेणोक्तं स वायुजः

śrīsūta uvāca śrutvaitad vacanaṁ viprā rāmeṇoktaṁ sa vāyujaḥ

श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रो! राम द्वारा कहे गए इस वचन को सुनकर वह वायुपुत्र,

श्लोक 77 (skanda.3.46.77)

उत्तरे रामनाथस्य लिंगं स्वेनाहृतं मुदा । आज्ञया रामचन्द्रस्य स्थापयामास वायुजः

uttare rāmanāthasya liṅgaṁ svenāhṛtaṁ mudā ājñayā rāmacandrasya sthāpayāmāsa vāyujaḥ

रामनाथ के उत्तर में, अपने द्वारा लाए गए लिंग को, रामचंद्र की आज्ञा से आनंदपूर्वक वायुपुत्र ने स्थापित किया।

श्लोक 78 (skanda.3.46.78)

प्रत्यक्षमेव सर्वेषां कपिलांगूलवेष्टितम् । हरोपि तत्पुच्छजा तं बिभर्ति च वलित्रयम् । तदुत्तरायां ककुभि गौरीं संस्थापयन्मुदा

pratyakṣam eva sarveṣāṁ kapilāṅgūlaveṣṭitam haro'pi tatpucchajā taṁ bibharti ca valitrayam tad uttarāyāṁ kakubhi gaurīṁ saṁsthāpayan mudā

सबके प्रत्यक्ष ही, वानर की पूँछ से लिपटा हुआ। शिव भी उसकी पूँछ से उत्पन्न उन तीन वलयों को धारण करते हैं। उसके उत्तर दिशा में आनंदपूर्वक गौरी की स्थापना की गई।

श्लोक 79 (skanda.3.46.79)

श्रीसूत उवाच । एवं वः कथितं विप्रा यदर्थं राघवेण तु । लिंगं प्रतिष्ठितं सेतौ भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम्

śrīsūta uvāca evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā yadarthaṁ rāghaveṇa tu liṅgaṁ pratiṣṭhitaṁ setau bhuktimuktipradaṁ nṛṇām

श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें बताया कि किस प्रयोजन से राघव द्वारा सेतु में भोग-मोक्ष प्रदान करने वाला लिंग प्रतिष्ठित किया गया।

श्लोक 80 (skanda.3.46.80)

यः पठेदिममध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः । स विधूयेह पापानि शिवलोके महीयते

yaḥ paṭhed imam adhyāyaṁ śṛṇuyād vā samāhitaḥ sa vidhūyeha pāpāni śivaloke mahīyate

जो इस अध्याय को पढ़ता है अथवा एकाग्रचित्त होकर सुनता है, वह यहाँ पापों को धोकर शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है।

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