ब्रह्म खण्ड · अध्याय 47
राम की ब्रह्महत्या की उत्पत्ति के कारण का निरूपण
श्लोक 1 (skanda.3.47.1)
ऋषय ऊचुः । राक्षसस्य वधात्सूत रावणस्य महामुने । ब्रह्महत्या कथमभूद्राघवस्य महात्मनः
ṛṣaya ūcuḥ rākṣasasya vadhāt sūta rāvaṇasya mahāmune brahmahatyā katham abhūd rāghavasya mahātmanaḥ
ऋषियों ने कहा — हे सूत! हे महामुने! राक्षस रावण के वध से महात्मा राघव को ब्रह्महत्या कैसे लगी?
श्लोक 2 (skanda.3.47.2)
ब्राह्मणस्य वधात्सूत ब्रह्महत्याभिजायते । न ब्राह्मणो दशग्रीवः कथं तद्वद नो मुने
brāhmaṇasya vadhāt sūta brahmahatyābhijāyate na brāhmaṇo daśagrīvaḥ kathaṁ tad vada no mune
हे सूत! ब्राह्मण के वध से ही ब्रह्महत्या उत्पन्न होती है। दशग्रीव तो ब्राह्मण नहीं था; हे मुने! यह हमें बताइए।
श्लोक 3 (skanda.3.47.3)
ब्रह्महत्या भवेत्क्रूरा रामचंद्रस्य धीमतः । एतन्नः श्रद्दधानानां वद कारुण्यतोऽधुना
brahmahatyā bhavet krūrā rāmacandrasya dhīmataḥ etan naḥ śraddadhānānāṁ vada kāruṇyato'dhunā
बुद्धिमान रामचंद्र को क्रूर ब्रह्महत्या कैसे हुई? हम श्रद्धावान हैं; अब करुणापूर्वक हमें यह बताइए।
श्लोक 4 (skanda.3.47.4)
इति पृष्टस्ततः सूतो नैमिषारण्यवासिभिः । वक्तुं प्रचक्रमे तेषां प्रश्नस्योत्तरमुत्तमम्
iti pṛṣṭas tataḥ sūto naimiṣāraṇyavāsibhiḥ vaktuṁ pracakrame teṣāṁ praśnasyottaram uttamam
नैमिषारण्य-निवासियों द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर सूत जी उनके प्रश्न का उत्तम उत्तर देने लगे।
श्लोक 5 (skanda.3.47.5)
श्रीसूत उवाच । ब्रह्मपुत्रो महातेजाः पुलस्त्योनाम वै द्विजाः । बभूव तस्य पुत्रोऽभूद्विश्रवा इति विश्रुतः
śrīsūta uvāca brahmaputro mahātejāḥ pulastyo nāma vai dvijāḥ babhūva tasya putro'bhūd viśravā iti viśrutaḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे द्विजो! ब्रह्मा के पुत्र, महातेजस्वी पुलस्त्य नामक थे। उनके पुत्र हुए, जो विश्रवा नाम से विख्यात थे।
श्लोक 6 (skanda.3.47.6)
तस्य पुत्रः पुलस्त्य स्य विश्रवा मुनिपुंगवाः । चिरकालं तपस्तेपे देवैरपि सुदुष्करम्
tasya putraḥ pulastyasya viśravā munipuṅgavāḥ ciraṁ kālaṁ tapas tepe devair api suduṣkaram
हे मुनिश्रेष्ठो! पुलस्त्य के उस पुत्र विश्रवा ने दीर्घकाल तक ऐसा तप किया, जो देवताओं के लिए भी अत्यंत दुष्कर था।
श्लोक 7 (skanda.3.47.7)
तपः कुर्वति तस्मिंस्तु सुमाली नाम राक्षसः । पाताललोकाद्भूलोकं सर्वं वै विचचार ह
tapaḥ kurvati tasmiṁs tu sumālī nāma rākṣasaḥ pātālalokād bhūlokaṁ sarvaṁ vai vicacāra ha
उसके तप करते रहने पर, सुमाली नामक राक्षस पाताल-लोक से भूलोक तक सर्वत्र विचरण करने लगा।
श्लोक 8 (skanda.3.47.8)
हेमनिष्कांगदधरः कालमेघनिभच्छविः । समादाय सुतां कन्यां पद्महीनामिव श्रियम्
hemaniṣkāṅgadadharaḥ kālameghanibhacchaviḥ samādāya sutāṁ kanyāṁ padmahīnām iva śriyam
स्वर्ण-निष्क तथा अंगद धारण करने वाला, काले मेघ के समान वर्ण वाला, वह अपनी पुत्री कन्या को, कमल-रहित लक्ष्मी के समान, साथ लेकर,
श्लोक 9 (skanda.3.47.9)
विचरन्स महीपृष्ठे कदाचित्पुष्पकस्थितम् । दृष्ट्वा विश्रवसः पुत्रं कुबेरं वै धनेश्वरम्
vicaran sa mahīpṛṣṭhe kadācit puṣpakasthitam dṛṣṭvā viśravasaḥ putraṁ kuberaṁ vai dhaneśvaram
पृथ्वी की सतह पर विचरण करते हुए, एक बार उसने विश्रवा के पुत्र, पुष्पक-विमान में स्थित धनेश्वर कुबेर को देखा।
श्लोक 10 (skanda.3.47.10)
चिंतयामास विप्रेंद्राः सुमाली स तु राक्षसः । कुबेरसदृशः पुत्रो यद्यस्माकं भविष्यति
cintayāmāsa viprendrāḥ sumālī sa tu rākṣasaḥ kuberasadṛśaḥ putro yady asmākaṁ bhaviṣyati
हे विप्रेंद्रो! वह राक्षस सुमाली सोचने लगा — यदि हमारा भी कुबेर के समान पुत्र हो जाए,
श्लोक 11 (skanda.3.47.11)
वयं वर्द्धामहे सर्वे राक्षसा ह्यकुतोभयाः । विचार्यैवं निजसुतामब्रवीद्राक्षसेश्वरः
vayaṁ vardhāmahe sarve rākṣasā hy akutobhayāḥ vicāryaivaṁ nijasutām abravīd rākṣaseśvaraḥ
तो हम सभी राक्षस निर्भय होकर समृद्ध हो जाएँगे। इस प्रकार विचार कर उस राक्षसराज ने अपनी पुत्री से कहा।
श्लोक 12 (skanda.3.47.12)
सुते प्रदानकालोऽद्य तव कैकसि शोभने । अद्य ते यौवनं प्राप्तं तद्देया त्वं वराय हि
sute pradānakālo'dya tava kaikasi śobhane adya te yauvanaṁ prāptaṁ tad deyā tvaṁ varāya hi
हे पुत्री कैकसी! हे शोभने! आज तुम्हारा विवाह का समय है। आज तुमने यौवन प्राप्त किया है, अतः तुम्हें किसी वर को देना चाहिए।
श्लोक 13 (skanda.3.47.13)
अप्रदानेन पुत्रीणां पितरो दुःखमाप्नुयुः । किं च सर्वगुणोत्कृष्टा लक्ष्मीरिव सुते शुभे
apradānena putrīṇāṁ pitaro duḥkham āpnuyuḥ kiṁ ca sarvaguṇotkṛṣṭā lakṣmīr iva sute śubhe
पुत्रियों को विवाह में न देने से पिता दुःख प्राप्त करते हैं। और भी, हे शुभे पुत्री! समस्त गुणों में उत्कृष्ट, लक्ष्मी के समान होने के कारण,
श्लोक 14 (skanda.3.47.14)
प्रत्याख्यानभयात्पुंभिर्न च त्वं प्रार्थ्यसे शुभे । कन्यापितृत्वं दुःखाय सर्वेषां मानकांक्षिणाम्
pratyākhyānabhayāt puṁbhir na ca tvaṁ prārthyase śubhe kanyāpitṛtvaṁ duḥkhāya sarveṣāṁ mānakāṅkṣiṇām
अस्वीकृति के भय से पुरुष तुमसे विवाह की याचना नहीं करते, हे शुभे। कन्या का पिता होना, मान की कामना करने वाले सबके लिए दुःखदायी है।
श्लोक 15 (skanda.3.47.15)
न जानेऽहं वरः को वा वरयेदिति कन्यके । सा त्वं पुलस्त्यतनयं मुनिं विश्रवसं द्विजम्
na jāne'haṁ varaḥ ko vā varayed iti kanyake sā tvaṁ pulastyatanayaṁ muniṁ viśravasaṁ dvijam
हे कन्या! मैं नहीं जानता कि कौन वर तुम्हें वरण करेगा। अतः तुम स्वयं पुलस्त्य-पुत्र मुनि विश्रवा नामक ब्राह्मण का,
श्लोक 16 (skanda.3.47.16)
पितामहकुलोद्भूतं वरयस्व स्वयंगता । कुबेरतुल्यास्तनया भवेयुस्ते न संशयः
pitāmahakulodbhūtaṁ varayasva svayaṅgatā kuberatulyās tanayā bhaveyus te na saṁśayaḥ
पितामह के कुल में उत्पन्न, स्वयं जाकर वरण करो। तुम्हारे पुत्र कुबेर के तुल्य होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 17 (skanda.3.47.17)
कैकसी तद्वचः श्रुत्वा सा कन्या पितृगौरवात् । अंगीचकार तद्वाक्यं तथास्त्विति शुचिस्मिता
kaikasī tad vacaḥ śrutvā sā kanyā pitṛgauravāt aṅgīcakāra tad vākyaṁ tathāstv iti śucismitā
कैकसी उस वचन को सुनकर, पिता के प्रति सम्मान से, उस वाक्य को स्वीकार करते हुए 'ऐसा ही हो' कहा — वह पवित्र-हास्य वाली कन्या।
श्लोक 18 (skanda.3.47.18)
पर्णशालां मुनिश्रेष्ठा गत्वा विश्रवसो मुनेः । अतिष्ठदंतिके तस्य लज्जमाना ह्यधोमुखी
parṇaśālāṁ muniśreṣṭhā gatvā viśravaso muneḥ atiṣṭhad antike tasya lajjamānā hy adhomukhī
हे मुनिश्रेष्ठो! मुनि विश्रवा की पर्णशाला में जाकर, वह लज्जा से मुख नीचे किए हुए उनके समीप खड़ी हो गई।
श्लोक 19 (skanda.3.47.19)
तस्मिन्नवसरे विप्राः पुलस्त्यतनयः सुधीः । अग्निहोत्रमुपास्ते स्म ज्वलत्पावकसन्निभः
tasminn avasare viprāḥ pulastyatanayaḥ sudhīḥ agnihotram upāste sma jvalatpāvakasannibhaḥ
हे विप्रो! उसी समय पुलस्त्य के बुद्धिमान पुत्र, प्रज्ज्वलित अग्नि के समान, अग्निहोत्र की उपासना कर रहे थे।
श्लोक 20 (skanda.3.47.20)
संध्याकालमतिक्रूरमविचिंत्य तु कैकसी । अभ्येत्य तं मुनिं सुभ्रूः पितुर्वचनगौरवात्
sandhyākālam atikrūram avicintya tu kaikasī abhyetya taṁ munim subhrūḥ pitur vacanagauravāt
अत्यंत क्रूर संध्याकाल का विचार किए बिना, कैकसी, पिता के वचन के सम्मान से, उस सुंदर भ्रू वाली उस मुनि के पास आकर,
श्लोक 21 (skanda.3.47.21)
तस्थावधोमुखी भूमिं लिखत्यंगुष्ठकोटिना । विश्रवास्तां विलोक्याथ कैकसीं तनुमध्यमाम् । उवाच सस्मितो विप्राः पूर्णचंद्रनिभाननाम्
tasthāv adhomukhī bhūmiṁ likhaty aṅguṣṭhakoṭinā viśravās tāṁ vilokyātha kaikasīṁ tanumadhyamām uvāca sasmito viprāḥ pūrṇacandranibhānanām
अपने पैर के अंगूठे की नोक से भूमि को कुरेदते हुए, मुख नीचे किए हुए खड़ी रही। हे विप्रो! विश्रवा ने कृशोदरी, पूर्णचंद्र के समान मुख वाली, उस कैकसी को देखकर मुस्कुराते हुए यह कहा।
श्लोक 22 (skanda.3.47.22)
विश्रवा उवाच । शोभने कस्य पुत्री त्वं कुतो वा त्वमिहागता
viśravā uvāca śobhane kasya putrī tvaṁ kuto vā tvam ihāgatā
विश्रवा ने कहा — हे शोभने! तुम किसकी पुत्री हो, और यहाँ कहाँ से आई हो?
श्लोक 23 (skanda.3.47.23)
कार्यं किं वा त्वमुद्दिश्य वर्तसेऽत्र शुचिस्मिते । यथार्थतो वदस्वाद्य मम सर्वमनिंदिते
kāryaṁ kiṁ vā tvam uddiśya vartase'tra śucismite yathārthato vadasvādya mama sarvam anindite
हे पवित्र-हास्य वाली! किस प्रयोजन से तुम यहाँ खड़ी हो? हे अनिंदिते! आज मुझे यथार्थ रूप से सब कुछ बताओ।
श्लोक 24 (skanda.3.47.24)
इतीरिता कैकसी सा कन्या बद्धांजलिर्द्विजाः । उवाच तं मुनिं प्रह्वा विनयेन समन्विता
itīritā kaikasī sā kanyā baddhāñjalir dvijāḥ uvāca taṁ muniṁ prahvā vinayena samanvitā
हे द्विजो! इस प्रकार पूछी गई वह कन्या कैकसी हाथ जोड़कर, विनम्रता से युक्त होकर, उस मुनि से कहने लगी।
श्लोक 25 (skanda.3.47.25)
तपः प्रभावेन मुने मदभिप्रायमद्य तु । वेत्तुमर्हसि सम्यक्त्वं पुलस्त्यकुलदीपन
tapaḥ prabhāveṇa mune madabhiprāyam adya tu vettum arhasi samyak tvaṁ pulastyakuladīpana
हे मुने! हे पुलस्त्य-कुल के दीपक! अपने तप के प्रभाव से आज आप मेरे अभिप्राय को भली-भाँति जान सकते हैं।
श्लोक 26 (skanda.3.47.26)
अहं तु कैकसी नाम सुमालिदुहिता मुने । मत्तातस्याज्ञया ब्रह्मंस्तवांतिकमुपागता
ahaṁ tu kaikasī nāma sumālidudhitā mune mattātasyājñayā brahman tavāntikam upāgatā
हे मुने! मैं कैकसी नामक सुमाली की पुत्री हूँ। हे ब्रह्मन्! अपने पिता की आज्ञा से आपके समीप आई हूँ।
श्लोक 27 (skanda.3.47.27)
शेष त्वं ज्ञानदृष्ट्याद्य ज्ञातुमर्हस्यसंशयः । क्षणं ध्यात्वा मुनिः प्राह विश्रवाः स तु कैकसीम्
śeṣaṁ tvaṁ jñānadṛṣṭyādya jñātum arhasy asaṁśayaḥ kṣaṇaṁ dhyātvā muniḥ prāha viśravāḥ sa tu kaikasīm
शेष तुम आज अपनी ज्ञान-दृष्टि से जान सकते हो, इसमें कोई संदेह नहीं। क्षणभर ध्यान कर उस मुनि विश्रवा ने कैकसी से कहा।
श्लोक 28 (skanda.3.47.28)
मया ते विदितं सुभ्रूर्मनोगतमभीप्सितम् । पुत्राभिलाषिणी सा त्वं मामगाः सांप्रतम् शुभे
mayā te viditaṁ subhrūr manogatam abhīpsitam putrābhilāṣiṇī sā tvaṁ mām agāḥ sāmprataṁ śubhe
हे सुभ्रु! मुझे तुम्हारे मन का अभीष्ट ज्ञात हो गया है। पुत्र की अभिलाषी होकर, हे शुभे! तुम अभी मेरे पास आई हो।
श्लोक 29 (skanda.3.47.29)
सायंकालेऽधुना क्रूरे यस्मान्मां त्वमुपागता । पुत्राभिलाषिणी भूत्वा तस्मात्त्वां प्रब्रवीम्यहम्
sāyaṅkāle'dhunā krūre yasmān māṁ tvam upāgatā putrābhilāṣiṇī bhūtvā tasmāt tvāṁ prabravīmy aham
किंतु चूँकि तुम इस क्रूर संध्याकाल में मेरे पास पुत्र की अभिलाषा लेकर आई हो, इसलिए मैं तुम्हें यह बताता हूँ।
श्लोक 30 (skanda.3.47.30)
शृणुष्वावहिता रामे कैकसी त्वमनिंदिते । दारुणान्दारुणाकारान्दारुणाभिजनप्रियान्
śṛṇuṣvāvahitā rāme kaikasī tvam aninditе dāruṇān dāruṇākārān dāruṇābhijanapriyān
हे कैकसी! हे अनिंदिते! सावधानी से सुनो — तुम भयंकर, भयंकर आकार वाले, भयंकर आचरण में प्रिय,
श्लोक 31 (skanda.3.47.31)
जनयिष्यसि पुत्रांस्त्वं राक्षसान्क्रूरकर्मणः । श्रुत्वा तद्वचनं सा तु कैकसी प्रणिपत्य तम्
janayiṣyasi putrāṁs tvaṁ rākṣasān krūrakarmaṇaḥ śrutvā tad vacanaṁ sā tu kaikasī praṇipatya tam
क्रूर-कर्मा राक्षस पुत्रों को उत्पन्न करोगी। यह वचन सुनकर, वह कैकसी उन्हें प्रणाम कर,
श्लोक 32 (skanda.3.47.32)
पुलस्त्यतनयं प्राह कृतांजलिपुटा द्विजाः । भगवदीदृशाः पुत्रास्त्वत्तः प्राप्तुं न युज्यते
pulastyatanayaṁ prāha kṛtāñjaliputā dvijāḥ bhagavad īdṛśāḥ putrās tvattaḥ prāptuṁ na yujyate
हे द्विजो! हाथ जोड़कर पुलस्त्य-पुत्र से बोली — हे भगवन्! ऐसे पुत्र आपसे प्राप्त करना उचित नहीं है।
श्लोक 33 (skanda.3.47.33)
इत्युक्तः स मुनिः प्राह कैकसीं तां सुमध्यमाम् । मद्वंशानुगुणः पुत्रः पश्चिमस्ते भविष्यति
ityuktaḥ sa muniḥ prāha kaikasīṁ tāṁ sumadhyamām madvaṁśānuguṇaḥ putraḥ paścimas te bhaviṣyati
ऐसा कहे जाने पर, वह मुनि उस श्रेष्ठ कैकसी से बोले — तुम्हारा अंतिम पुत्र मेरे वंश के अनुरूप होगा,
श्लोक 34 (skanda.3.47.34)
धार्मिकः शास्त्रविच्छांतो न तु राक्षसचेष्टितः । इत्युक्ता कैकसी विप्राः काले कतिपये गते
dhārmikaḥ śāstravic chānto na tu rākṣasaceṣṭitaḥ ityuktā kaikasī viprāḥ kāle katipaye gate
धार्मिक, शास्त्रों का ज्ञाता, शांत, तथा राक्षसों के आचरण से रहित। हे विप्रो! ऐसा कहे जाने पर, कैकसी ने कुछ समय बीतने पर,
श्लोक 35 (skanda.3.47.35)
सुषुवे तनयं क्रूरं रक्षोरूपं भयंकरम् । द्विपंचशीर्षं कुमतिं विंशद्बाहुं भयानकम्
suṣuve tanayaṁ krūraṁ rakṣorūpaṁ bhayaṅkaram dvipañcaśīrṣaṁ kumatiṁ viṁśadbāhuṁ bhayānakam
एक क्रूर, राक्षस-रूप, भयंकर पुत्र को जन्म दिया, जो दस सिरों वाला, दुर्बुद्धि, बीस भुजाओं वाला, भयानक था।
श्लोक 36 (skanda.3.47.36)
ताम्रोष्ठं कृष्णवदनं रक्तश्मश्रु शिरोरुहम् । महादंष्ट्रं महाकायं लोकत्रासकरं सदा
tāmroṣṭhaṁ kṛṣṇavadanaṁ raktaśmaśruśiroruham mahādaṁṣṭraṁ mahākāyaṁ lokatrāsakaraṁ sadā
ताम्र होंठों वाला, काले मुख वाला, लाल दाढ़ी-बाल वाला, महादंष्ट्रवाला, महाकाय, सदा लोकों को त्रास देने वाला।
श्लोक 37 (skanda.3.47.37)
दशग्रीवाभिधः सोऽभूत्तथा रावण नामवान् । रावणानंतरं जातः कुम्भकर्णाभिधः सुतः
daśagrīvābhidhaḥ so'bhūt tathā rāvaṇanāmavān rāvaṇānantaraṁ jātaḥ kumbhakarṇābhidhaḥ sutaḥ
वह दशग्रीव नामक हुआ, और रावण नाम से भी विख्यात हुआ। रावण के पश्चात् कुंभकर्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।
श्लोक 38 (skanda.3.47.38)
ततः शूर्पणखा नाम्ना क्रूरा जज्ञे च राक्षसी । ततो बभूव कैकस्या विभीषण इति श्रुतः
tataḥ śūrpaṇakhā nāmnā krūrā jajñe ca rākṣasī tato babhūva kaikasyā vibhīṣaṇa iti śrutaḥ
फिर शूर्पणखा नामक क्रूर राक्षसी उत्पन्न हुई। फिर कैकसी को विभीषण नामक पुत्र हुआ, ऐसा सुना जाता है।
श्लोक 39 (skanda.3.47.39)
पश्चिमस्तनयो धीमान्धार्मिको वेदशास्त्रवित् । एते विश्रवसः पुत्रा दशग्रीवादयो द्विजाः
paścimas tanayo dhīmān dhārmiko vedaśāstravit ete viśravasaḥ putrā daśagrīvādayo dvijāḥ
वह अंतिम पुत्र बुद्धिमान, धार्मिक, वेद-शास्त्र का ज्ञाता था। हे द्विजो! ये सभी दशग्रीव आदि विश्रवा के पुत्र थे।
श्लोक 40 (skanda.3.47.40)
अतो दशग्रीववधात्कुम्भकर्णवधादपि । ब्रह्महत्या समभवद्रामस्याक्लिष्टकर्मणः
ato daśagrīvavadhāt kumbhakarṇavadhād api brahmahatyā samabhavad rāmasyākliṣṭakarmaṇaḥ
अतः दशग्रीव के वध से, तथा कुंभकर्ण के वध से भी, अनायास-कर्ता राम को ब्रह्महत्या हुई,
श्लोक 41 (skanda.3.47.41)
अतस्तच्छांतये रामो लिंगं रामेश्वराभिधम् । स्थापयामास विधिना वैदिकेन द्विजोत्तमाः
atas tacchāntaye rāmo liṅgaṁ rāmeśvarābhidham sthāpayāmāsa vidhinā vaidikena dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो! इसीलिए उसकी शांति के लिए राम ने वैदिक विधि से रामेश्वर नामक लिंग की स्थापना की।
श्लोक 42 (skanda.3.47.42)
एवं रावणघातेन ब्रह्महत्यासमुद्भवः । समभूद्रामचंद्रस्य लोककांतस्य धीमतः
evaṁ rāvaṇaghātena brahmahatyāsamudbhavaḥ samabhūd rāmacandrasya lokakāntasya dhīmataḥ
इस प्रकार रावण के वध से, लोकों को प्रिय, बुद्धिमान रामचंद्र को ब्रह्महत्या की उत्पत्ति हुई।
श्लोक 43 (skanda.3.47.43)
तत्सहैतुकमाख्यातं भवतां ब्रह्मघातजम् । पापं यच्छांतये रामो लिंगं प्रातिष्ठिपत्स्वयम्
tat sahaitukam ākhyātaṁ bhavatāṁ brahmaghātajam pāpaṁ yac chāntaye rāmo liṅgaṁ prātiṣṭhipat svayam
यह उसके कारण सहित तुम्हें बताया गया — वह पाप जो ब्रह्महत्या से उत्पन्न हुआ, जिसकी शांति के लिए राम ने स्वयं लिंग की स्थापना की।
श्लोक 44 (skanda.3.47.44)
एवं लिंगं प्रतिष्ठाप्य रामचन्द्रोऽतिधार्मिकः । मेने कृतार्थमात्मानं ससीता वरजो द्विजाः
evaṁ liṅgaṁ pratiṣṭhāpya rāmacandro'tidhārmikaḥ mene kṛtārtham ātmānaṁ sasītaḥ svānujo dvijāḥ
हे द्विजो! इस प्रकार लिंग की प्रतिष्ठा कर अत्यंत धार्मिक रामचंद्र ने, सीता तथा भाई सहित, अपने आप को कृतार्थ माना।
श्लोक 45 (skanda.3.47.45)
ब्रह्महत्या गता यत्र रामचंद्रस्य भूपतेः । तत्र तीर्थमभूत्किंचिद्ब्रह्महत्याविमोचनम्
brahmahatyā gatā yatra rāmacandrasya bhūpateḥ tatra tīrtham abhūt kiñcid brahmahatyāvimocanam
जहाँ राजा रामचंद्र की ब्रह्महत्या गई, वहाँ एक तीर्थ बना, जो ब्रह्महत्या से मुक्ति देने वाला है।
श्लोक 46 (skanda.3.47.46)
तत्र स्नानं महापुण्यं ब्रह्महत्याविनाशनम् । दृश्यते रावणोऽद्यापि छायारूपेण तत्र वै
tatra snānaṁ mahāpuṇyaṁ brahmahatyāvināśanam dṛśyate rāvaṇo'dyāpi chāyārūpeṇa tatra vai
वहाँ स्नान करना अत्यंत पुण्यमय, ब्रह्महत्या का नाशक है। रावण भी आज तक वहाँ छाया-रूप में दिखाई देता है।
श्लोक 47 (skanda.3.47.47)
तदग्रे नागलोकस्य बिलमस्ति महत्तरम् । दशग्रीववधोत्पन्नां ब्रह्महत्यां बलीयसीम्
tad agre nāgalokasya bilam asti mahattaram daśagrīvavadhotpannāṁ brahmahatyāṁ balīyasīm
उसके आगे नागलोक का एक अत्यंत विशाल बिल है। दशग्रीव के वध से उत्पन्न, अत्यंत प्रबल ब्रह्महत्या को,
श्लोक 48 (skanda.3.47.48)
तद्बिलं प्रापयामास जानकीरमणो द्विजाः । तस्योपरि बिलस्याथ कृत्वा मण्डपमुत्तमम्
tad bilaṁ prāpayāmāsa jānakīramaṇo dvijāḥ tasyopari bilasyātha kṛtvā maṇḍapam uttamam
हे द्विजो! जानकी के प्रियतम ने उस बिल में प्रवेश करा दिया। फिर उस बिल के ऊपर एक उत्तम मंडप बनवाकर,
श्लोक 49 (skanda.3.47.49)
भैरवं स्थापयामास रक्षार्थं तत्र राघवः । भैरवाज्ञापरित्रस्ता ब्रह्महत्या भयंकरी
bhairavaṁ sthāpayāmāsa rakṣārthaṁ tatra rāghavaḥ bhairavājñāparitrastā brahmahatyā bhayaṅkarī
राघव ने उसकी रक्षा के लिए वहाँ भैरव की स्थापना की। भैरव की आज्ञा से भयभीत हुई भयंकर ब्रह्महत्या,
श्लोक 50 (skanda.3.47.50)
नाशक्नोत्तद्बिलादूर्ध्वं निर्गंतुं द्विजसत्तमाः । तस्मिन्नेव बिले तस्थौ ब्रह्महत्या निरुद्यमा
nāśaknot tad bilād ūrdhvaṁ nirgantuṁ dvijasattamāḥ tasminn eva bile tasthau brahmahatyā nirudyamā
हे द्विजसत्तमो! उस बिल से ऊपर निकलने में समर्थ नहीं हुई। उसी बिल में ब्रह्महत्या निष्क्रिय होकर स्थित रही।
श्लोक 51 (skanda.3.47.51)
रामनाथमहालिंगं दक्षिणे गिरिजा मुदा । वर्तते परमानंदशिवस्यार्धशरीरिणी
rāmanāthamahāliṅgaṁ dakṣiṇe girijā mudā vartate paramānandaśivasyārdhaśarīriṇī
रामनाथ महालिंग के दक्षिण में आनंदपूर्वक गिरिजा, परमानंद-स्वरूप शिव के आधे शरीर-स्वरूपिणी, विराजमान हैं।
श्लोक 52 (skanda.3.47.52)
आदित्यसोमौ वर्तेते पार्श्वयोस्तत्र शूलिनः । देवस्य पुरतो वह्नी रामनाथस्य वर्तते
ādityasomau vartete pārśvayos tatra śūlinaḥ devasya purato vahnī rāmanāthasya vartate
उस शूलधारी देव के दोनों ओर सूर्य और चंद्र विराजमान हैं। रामनाथ देव के सम्मुख अग्नि विराजमान है।
श्लोक 53 (skanda.3.47.53)
आस्ते शतक्रतुः प्राच्यामाग्नेयां च तथाऽनलः । आस्ते यमो दक्षिणस्यां रामनाथस्य सेवकः
āste śatakratuḥ prācyām āgneyāṁ ca tathānalaḥ āste yamo dakṣiṇasyāṁ rāmanāthasya sevakaḥ
पूर्व दिशा में इंद्र विराजमान हैं, तथा आग्नेय दिशा में अग्नि। दक्षिण दिशा में रामनाथ के सेवक यम विराजमान हैं।
श्लोक 54 (skanda.3.47.54)
नैर्ऋते निर्ऋतिर्विप्रा वर्तते शंकरस्य तु । वारुण्यां वरुणो भक्त्या सेवते राघवेश्वरम्
nairṛte nirṛtir viprā vartate śaṅkarasya tu vāruṇyāṁ varuṇo bhaktyā sevate rāghaveśvaram
हे विप्रो! नैऋत्य दिशा में शंकर के निर्ऋति विराजमान हैं। वरुण-दिशा में वरुण भक्तिपूर्वक राघवेश्वर की सेवा करते हैं।
श्लोक 55 (skanda.3.47.55)
वायव्ये तु दिशो भागे वायुरास्ते शिवस्य तु । उत्तरस्यां च धनदो रामनाथस्य वर्तते
vāyavye tu diśo bhāge vāyur āste śivasya tu uttarasyāṁ ca dhanado rāmanāthasya vartate
वायव्य दिशा के भाग में शिव के वायु विराजमान हैं। उत्तर दिशा में रामनाथ के धनद कुबेर विराजमान हैं।
श्लोक 56 (skanda.3.47.56)
ईशान्येऽस्य च दिग्भागे महेशो वर्तते द्विजाः । विनायक कुमारौ च महादेवसुतावुभौ
īśānye'sya ca digbhāge maheśo vartate dvijāḥ vināyakakumārau ca mahādevasutāv ubhau
हे द्विजो! इसकी ईशान दिशा में महेश स्वयं विराजमान हैं। महादेव के दोनों पुत्र विनायक और कुमार,
श्लोक 57 (skanda.3.47.57)
यथाप्रदेशं वर्तेते रामनाथालयेऽधुना । वीरभद्रादयः सर्वे महेश्वरगणेश्वराः
yathāpradeśaṁ vartete rāmanāthālaye'dhunā vīrabhadrādayaḥ sarve maheśvaragaṇeśvarāḥ
अभी अपने-अपने स्थान पर रामनाथ के मंदिर में विराजमान हैं। वीरभद्र आदि महेश्वर के समस्त गण-ईश्वर,
श्लोक 58 (skanda.3.47.58)
यथाप्रदेशं वर्तंते रामनाथालये सदा । मुनयः पन्नगाः सिद्धा गन्धर्वाप्सरसां गणाः
yathāpradeśaṁ vartante rāmanāthālaye sadā munayaḥ pannagāḥ siddhā gandharvāpsarasāṁ gaṇāḥ
सदा अपने-अपने स्थान पर रामनाथ के मंदिर में विराजमान हैं। मुनि, नाग, सिद्ध, गंधर्व, तथा अप्सरा-गण,
श्लोक 59 (skanda.3.47.59)
संतुष्यमाणहृदया यथेष्टं शिवसन्निधौ । वर्तंते रामनाथस्य सेवार्थं भक्तिपूर्वकम्
santuṣyamāṇahṛdayā yatheṣṭaṁ śivasannidhau vartante rāmanāthasya sevārthaṁ bhaktipūrvakam
संतुष्ट हृदय से, यथेच्छ शिव के सान्निध्य में, रामनाथ की सेवा के लिए भक्तिपूर्वक विराजमान रहते हैं।
श्लोक 60 (skanda.3.47.60)
रामनाथस्य पूजार्थं श्रोत्रियान्ब्राह्मणान्बहून् । रामेश्वरे रघुपतिः स्थापयामास पूजकान्
rāmanāthasya pūjārthaṁ śrotriyān brāhmaṇān bahūn rāmeśvare raghupatiḥ sthāpayāmāsa pūjakān
रामनाथ की पूजा के लिए, रघुपति ने रामेश्वर में अनेक श्रोत्रिय ब्राह्मणों को पूजक के रूप में स्थापित किया।
श्लोक 61 (skanda.3.47.61)
रामप्रतिष्ठितान्विप्रान्हव्यकव्यादिनार्चयेत् । तुष्टास्ते तोषिताः सर्वा पितृभिः सहदेवताः
rāmapratiṣṭhitān viprān havyakavyādinārcayet tuṣṭās te toṣitāḥ sarvā pitṛbhiḥ sahadevatāḥ
राम द्वारा प्रतिष्ठित उन ब्राह्मणों की हव्य-कव्य आदि से पूजा करनी चाहिए। संतुष्ट होकर वे सभी पितरों सहित देवताओं को भी संतुष्ट करते हैं।
श्लोक 62 (skanda.3.47.62)
तेभ्यो बहुधनान्ग्रामान्प्रददौ जानकीपतिः । रामनाथमहादेव नैवेद्यार्थमपि द्विजाः
tebhyo bahudhanān grāmān pradadau jānakīpatiḥ rāmanāthamahādeva naivedyārtham api dvijāḥ
उन्हें जानकीपति ने बहुत धन-संपन्न गाँव दिए। हे द्विजो! रामनाथ महादेव के नैवेद्य के लिए भी,
श्लोक 63 (skanda.3.47.63)
बहून्ग्रामान्बहुधनं प्रददौ लक्ष्मणाग्रजः । हारकेयूरकटकनिष्काद्याभरणानि च
bahūn grāmān bahudhanaṁ pradadau lakṣmaṇāgrajaḥ hārakeyūrakaṭakaniṣkādyābharaṇāni ca
लक्ष्मण के अग्रज ने अनेक गाँव तथा बहुत धन दिया। हार, केयूर, कड़े, निष्क आदि आभूषण भी,
श्लोक 64 (skanda.3.47.64)
अनेकपट्ट वस्त्राणि क्षौमाणि विविधानि च । रामनाथाय देवाय ददौ दशरथात्मजः
anekapaṭṭavastrāṇi kṣaumāṇi vividhāni ca rāmanāthāya devāya dadau daśarathātmajaḥ
अनेक रेशमी वस्त्र, तथा विविध क्षौम वस्त्र भी, दशरथ-पुत्र ने देव रामनाथ को अर्पित किए।
श्लोक 65 (skanda.3.47.65)
गंगा च यमुना पुण्या सरयूश्च सरस्वती । सेतौ रामेश्वरं देवं भजंते स्वाघशांतये
gaṅgā ca yamunā puṇyā sarayūś ca sarasvatī setau rāmeśvaraṁ devaṁ bhajante svāghaśāntaye
गंगा, पवित्र यमुना, सरयू, तथा सरस्वती — ये सेतु में देव रामेश्वर को अपने पापों की शांति के लिए भजती हैं।
श्लोक 66 (skanda.3.47.66)
एतदध्यायपठनाच्छ्रवणादपि मानवः । विमुक्तः सर्वपापेभ्यः सायुज्यं लभते हरेः
etad adhyāyapaṭhanāc chravaṇād api mānavaḥ vimuktaḥ sarvapāpebhyaḥ sāyujyaṁ labhate hareḥ
इस अध्याय के पठन अथवा श्रवण से भी मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर हरि के साथ सायुज्य प्राप्त करता है।