ब्रह्म खण्ड · अध्याय 48
राजा शंकर की स्त्री-हत्या और ब्रह्म-हत्या के दोष की शांति
श्लोक 1 (skanda.3.48.1)
श्रीसूत उवाच । रामनाथं समुद्दिश्य कथां पापविनाशिनीम् । प्रवक्ष्यामि मुनिश्रेष्ठाः शृणुध्वं सुसमाहिताः
śrīsūta uvāca rāmanāthaṁ samuddiśya kathāṁ pāpavināśinīm pravakṣyāmi muniśreṣṭhāḥ śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठो! अब मैं रामनाथ को लक्ष्य कर एक पाप-नाशक कथा कहूँगा; एकाग्रचित्त होकर सुनो।
श्लोक 2 (skanda.3.48.2)
पांड्यदेशाधिपो राजा पुरासीच्छंकराभिधः । ब्रह्मण्यः सत्यसंधश्च यायजूकश्च धार्मिकः
pāṇḍyadeśādhipo rājā purāsīc chaṅkarābhidhaḥ brahmaṇyaḥ satyasandhaś ca yāyajūkaś ca dhārmikaḥ
पूर्वकाल में पांड्य देश का अधिपति शंकर नामक राजा था, जो ब्राह्मणों का हितैषी, सत्यप्रतिज्ञ, यज्ञ करने वाला, तथा धार्मिक था।
श्लोक 3 (skanda.3.48.3)
वेदवेदांगतत्त्वज्ञः परसैन्यविदारणः । चतुरोऽप्याश्रमान्वर्णान्धर्मतः परिपालयन्
vedavedāṅgatattvajñaḥ parasainyavidāraṇaḥ caturo'py āśramān varṇān dharmataḥ paripālayan
वेद-वेदांगों के तत्त्व का ज्ञाता, शत्रु-सेनाओं का विदारक, चारों आश्रमों और वर्णों का धर्मपूर्वक पालन करने वाला था।
श्लोक 4 (skanda.3.48.4)
वैदिकाचारनिरतः पुराणस्मृतिपारगः । शिवविष्ण्वर्चको नित्यमन्यदैवतपूजकः
vaidikācāranirataḥ purāṇasmṛtipāragaḥ śivaviṣṇvarcako nityam anyadaivatapūjakaḥ
वैदिक आचार में तत्पर, पुराण-स्मृतियों में पारंगत, नित्य शिव-विष्णु का पूजक, तथा अन्य देवताओं का भी पूजक था।
श्लोक 5 (skanda.3.48.5)
महादानप्रदो नित्यं ब्राह्मणानां महात्मनाम् । मृगयार्थं ययौ धीमान्स कदाचित्तपोवनम्
mahādānapradoo nityaṁ brāhmaṇānāṁ mahātmanām mṛgayārthaṁ yayau dhīmān sa kadācit tapovanam
महात्मा ब्राह्मणों को नित्य महान दान देने वाला वह बुद्धिमान राजा एक बार मृगया के लिए तपोवन में गया।
श्लोक 6 (skanda.3.48.6)
सिंहव्याघ्रेभमहिष क्रूरसत्वभयंकरम् । झिल्लिकाभीषणरवं सरीसृपसमाकुलम्
siṁhavyāghrebhamahiṣakrūrasattvabhayaṅkaram jhillikābhīṣaṇaravaṁ sarīsṛpasamākulam
सिंह, व्याघ्र, हाथी, भैंसे आदि क्रूर जंतुओं से भयंकर, झींगुरों के भीषण शब्द से युक्त, सरीसृपों से भरे हुए,
श्लोक 7 (skanda.3.48.7)
भीमश्वापदसंपूर्णं दावानलभयंकरम् । महारण्यं प्रविश्याथ शंकरो राजशेखरः
bhīmaśvāpadasampūrṇaṁ dāvānalabhayaṅkaram mahāraṇyaṁ praviśyātha śaṅkaro rājaśekharaḥ
भयानक वन्य-पशुओं से परिपूर्ण, दावाग्नि से भयंकर, उस महावन में प्रवेश कर राजशिरोमणि शंकर,
श्लोक 8 (skanda.3.48.8)
अनेकसैनिकोपेत आखेटिकुलसंकुलः । पादुकागूढचरणो रक्तोष्णीषो हरिच्छदः
anekasainikopeta ākheṭikulasaṅkulaḥ pādukāgūḍhacaraṇo raktoṣṇīṣo haricchadaḥ
अनेक सैनिकों सहित, आखेट करने वालों के समूह से युक्त, पादुकाओं से ढके पैरों वाला, लाल पगड़ी वाला, हरे वस्त्र वाला,
श्लोक 9 (skanda.3.48.9)
बद्धगोधांगुलित्राणो धृतकोदण्डसायकः । कक्ष्याबद्धमहाखङ्गः श्वेताश्ववरमास्थितः
baddhagodhāṅgulitrāṇo dhṛtakodaṇḍasāyakaḥ kakṣyābaddhamahākhaḍgaḥ śvetāśvavaram āsthitaḥ
गोधा-चर्म के अंगुलित्राण बाँधे हुए, धनुष-बाण धारण किए हुए, कमर में महाखड्ग बाँधे हुए, श्वेत श्रेष्ठ अश्व पर आरूढ़,
श्लोक 10 (skanda.3.48.10)
सुवेषधारी सन्नद्धः पत्तिसंघसमावृतः । कांतारेषु च सर्वेषु पर्वतेषु गुहासु च
suveṣadhārī sannaddhaḥ pattisaṅghasamāvṛtaḥ kāntāreṣu ca sarveṣu parvateṣu guhāsu ca
सुसज्जित वेशधारी, कवचयुक्त, पैदल सैनिकों के समूह से घिरा हुआ, समस्त वनों में, पर्वतों में, गुफाओं में,
श्लोक 11 (skanda.3.48.11)
समुत्तीर्ण महास्रोता युवा सिंहपराक्रमः । विचचार बलैः साकं दरीषु मृगयन्मृगान्
samuttīrṇamahāsrotā yuvā siṁhaparākramaḥ vicacāra balaiḥ sākaṁ darīṣu mṛgayan mṛgān
महान् नदी-धाराओं को पार करने वाला, सिंह के समान पराक्रमी युवा राजा, सेना सहित घाटियों में मृगों को खोजते हुए विचरण करने लगा।
श्लोक 12 (skanda.3.48.12)
बध्यतां वध्यतामेष याति वेगान्मृगो वने । एवं वदत्सु सैन्येषु स्वयमुत्प्लुत्य शंकरः
badhyatāṁ vadhyatām eṣa yāti vegān mṛgo vane evaṁ vadatsu sainyeṣu svayam utplutya śaṅkaraḥ
'इसे मार डालो, मार डालो — यह मृग वेग से वन में जा रहा है' — इस प्रकार सेना के कहने पर, स्वयं आगे बढ़कर शंकर,
श्लोक 13 (skanda.3.48.13)
मृगं हंति महाराजो विगाह्य विपिनस्थलीम् । सिंहान्वराहान्महिषान्कुञ्जराच्छरभांस्तथा
mṛgaṁ hanti mahārājo vigāhya vipinasthalīm siṁhān varāhān mahiṣān kuñjarāc charabhāṁs tathā
वन की भूमि में प्रवेश कर मृग का वध करता रहा। सिंहों, वराहों, भैंसों, हाथियों, तथा शरभों को भी,
श्लोक 14 (skanda.3.48.14)
विनिघ्नन्स मृगानन्यान्वन्याञ्छंकरभूपतिः । कुत्रचिद्विपिनोद्देशे दरीमध्यनिवासिनम्
vinighnan sa mṛgān anyān vanyāñ chaṅkarabhūpatiḥ kutracid vipinoddeśe darīmadhyanivāsinam
तथा अन्य वन्य मृगों को भी मारते हुए राजा शंकर, वन के किसी स्थान में एक गुफा के मध्य निवास करने वाले,
श्लोक 15 (skanda.3.48.15)
व्याघ्रचर्मधरं शांतं मुनिं नियतमानसम् । व्याघ्रबुद्ध्या जघानाशु शरेणानतपर्वणा
vyāghracarmadharaṁ śāntaṁ muniṁ niyatamānasam vyāghrabuddhyā jaghānāśu śareṇānataparvaṇā
व्याघ्रचर्म धारण करने वाले, शांत, संयत मन वाले एक मुनि को, व्याघ्र समझकर, वक्रपर्व बाण से तत्काल मार डाला।
श्लोक 16 (skanda.3.48.16)
अतिवेगेन विप्रेंद्रास्तत्पत्नीं च ससायकः । निजघान पतिप्राणां निविष्टां पत्युरंतिके
ativegena viprendrās tatpatnīṁ ca sasāyakaḥ nijaghāna patiprāṇāṁ niviṣṭāṁ patyur antike
हे विप्रेंद्रो! अत्यंत वेग से उसकी पत्नी को भी, जो पति के समीप बैठी हुई अपने पति के प्राणों के समान थी, बाण से मार डाला।
श्लोक 17 (skanda.3.48.17)
विलोक्य मातापितरौ तत्पुत्रो निहतौ वने । रुरोद भृशदुःखार्तो विललाप च कातरः
vilokya mātāpitarau tatputro nihatau vane ruroda bhṛśaduḥkhārto vilalāpa ca kātaraḥ
वन में अपने माता-पिता को मारा गया देखकर, उनका पुत्र अत्यंत दुःख से पीड़ित होकर रोने लगा और अत्यंत विह्वल होकर विलाप करने लगा।
श्लोक 18 (skanda.3.48.18)
भोस्तात मातर्मां हित्वा युवां यातौ क्व वाधुना । अहं कुत्र गमिष्यामि को वा मे शरणं भवेत्
bhostāta mātar māṁ hitvā yuvāṁ yātau kva vādhunā ahaṁ kutra gamiṣyāmi ko vā me śaraṇaṁ bhavet
हे तात! हे मात! मुझे छोड़कर तुम दोनों अभी कहाँ चले गए? मैं अब कहाँ जाऊँगा, कौन मेरी शरण होगा?
श्लोक 19 (skanda.3.48.19)
को मामध्यापयेद्वेदाञ्छास्त्रं वा पाठयेत्पितः । अंब मे भोजनं का वा दास्यते सोपदेशकम्
ko mām adhyāpayed vedāñ chāstraṁ vā pāṭhayet pitaḥ amba me bhojanaṁ kā vā dāsyate sopadeśakam
हे पिता! अब मुझे वेद कौन पढ़ाएगा, अथवा शास्त्र कौन सिखाएगा? हे माता! मुझे उपदेश सहित भोजन अब कौन देगी?
श्लोक 20 (skanda.3.48.20)
आचाराञ्च्छिक्षयेत्को वा तात त्वयि मृतेऽधुना । अंब बालं प्रकुपितं का वा मामुपलाप()येत्
ācārāñ chikṣayet ko vā tāta tvayi mṛte'dhunā amba bālaṁ prakupitaṁ kā vā mām upalāpayet
हे तात! अब आपके मरने पर, आचार कौन सिखाएगा? हे माता! क्रुद्ध बालक को अब कौन समझाएगी?
श्लोक 21 (skanda.3.48.21)
युवां निरागसावद्य केन पापेन सायकैः । निहतौ वै तपोनिष्ठौ मत्प्राणौ मद्गुरू वने
yuvāṁ nirāgasāv adya kena pāpena sāyakaiḥ nihatau vai taponiṣṭhau matprāṇau madgurū vane
निर्दोष, तपोनिष्ठ, मेरे प्राण-स्वरूप, मेरे गुरु — तुम दोनों को आज किस पापी ने बाणों से वन में मार डाला?
श्लोक 22 (skanda.3.48.22)
एवं तयोः सुतो विप्रा मुक्तकण्ठं रुरोद वै । अथ प्रलपितं श्रुत्वा शंकरो विपिने चरन्
evaṁ tayoḥ suto viprā muktakaṇṭhaṁ ruroda vai atha pralapitaṁ śrutvā śaṅkaro vipine caran
हे विप्रो! इस प्रकार उन दोनों का पुत्र फूट-फूटकर रोने लगा। तब उस विलाप को सुनकर, वन में विचरण करते हुए शंकर,
श्लोक 23 (skanda.3.48.23)
तच्छब्दाभिमुखः सद्यः प्रययौ स दरीमुखम् । तत्रत्या मुनयोऽप्याशु समागच्छंस्तमाश्रमम्
tacchabdābhimukhaḥ sadyaḥ prayayau sa darīmukham tatratyā munayo'py āśu samāgacchaṁs tam āśramam
उस शब्द की ओर मुख करके तत्काल उस गुफा के मुख की ओर गया। वहाँ के मुनि भी शीघ्र ही उस आश्रम में आ पहुँचे।
श्लोक 24 (skanda.3.48.24)
ते दृष्ट्वा मुनयः सर्वे शरेण निहतं मुनिम् । तत्पत्नीं च हतां विप्रा राजानं च धनुर्धरम्
te dṛṣṭvā munayaḥ sarve śareṇa nihataṁ munim tatpatnīṁ ca hatāṁ viprā rājānaṁ ca dhanurdharam
हे विप्रो! वे सभी मुनि, बाण से मारे गए मुनि को, उनकी मारी गई पत्नी को, तथा धनुर्धारी राजा को,
श्लोक 25 (skanda.3.48.25)
विलपंतं सुतं चापि विलोक्य भृशविह्वलाः । पुत्रमाश्वासयामासुर्मा रोदीरिति कातरम्
vilapantaṁ sutaṁ cāpi vilokya bhṛśavihvalāḥ putram āśvāsayāmāsur mā rodīr iti kātaram
तथा विलाप करते हुए पुत्र को भी देखकर, अत्यंत विह्वल हो गए। उन्होंने उस दुःखी पुत्र को 'मत रोओ' कहकर सांत्वना दी।
श्लोक 26 (skanda.3.48.26)
मुनय ऊचुः । आढ्ये वापि दरिद्रे वा मूर्खे वा पंडितेऽपि वा । पीने वाथ कृशे वापि समवर्ती परेतराट्
munaya ūcuḥ āḍhye vāpi daridre vā mūrkhe vā paṇḍite'pi vā pīne vātha kṛśe vāpi samavartī paretarāṭ
मुनियों ने कहा — धनवान अथवा निर्धन, मूर्ख अथवा पंडित, स्थूल अथवा कृश — मृत्यु का राजा सबके प्रति समान व्यवहार करता है।
श्लोक 27 (skanda.3.48.27)
वने वा नगरे ग्रामे पर्वते वा स्थलांतरे । मृत्योर्वशे प्रयातव्यं सर्वैरपि हि जंतुभिः
vane vā nagare grāme parvate vā sthalāntare mṛtyor vaśe prayātavyaṁ sarvair api hi jantubhiḥ
वन में, नगर में, ग्राम में, पर्वत पर, अथवा किसी अन्य स्थान में — सभी प्राणियों को मृत्यु के अधीन जाना ही पड़ता है।
श्लोक 28 (skanda.3.48.28)
वत्स नित्यं च गर्भस्थैर्जातैरपि च जंतुभिः । युवभिः स्थविरैः सर्वैर्यातव्यं यमपत्तनम्
vatsa nityaṁ ca garbhasthair jātair api ca jantubhiḥ yuvabhiḥ sthavirai sarvair yātavyaṁ yamapattanam
हे वत्स! गर्भस्थ प्राणियों को, जन्मे हुए प्राणियों को, युवाओं को, तथा वृद्धों को — सभी को यमपुरी को जाना पड़ता है।
श्लोक 29 (skanda.3.48.29)
वर्णिभिश्च गृहस्थैश्च वानप्रस्थैश्च भिक्षुभिः । काले प्राप्ते त्वयं देहस्त्यक्तव्यो द्विजपुत्रक
varṇibhiś ca gṛhasthaiś ca vānaprasthaiś ca bhikṣubhiḥ kāle prāpte tv ayaṁ dehas tyaktavyo dvijaputraka
ब्रह्मचारियों, गृहस्थों, वानप्रस्थों, तथा संन्यासियों को भी — हे द्विजपुत्र! समय आने पर यह शरीर त्यागना ही पड़ता है।
श्लोक 30 (skanda.3.48.30)
ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैरपि च संकरैः । यातव्यं प्रेतनिलये द्विजपुत्र महामते
brāhmaṇaiḥ kṣatriyair vaiśyaiḥ śūdrair api ca saṅkaraiḥ yātavyaṁ pretanilaye dvijaputra mahāmate
ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों, तथा वर्णसंकरों को भी — हे महामति द्विजपुत्र! प्रेत-लोक को जाना ही पड़ता है।
श्लोक 31 (skanda.3.48.31)
देवाश्च मुनयो यक्षा गंधर्वोरगराक्षसाः । अन्ये च जंतवः सर्वे ब्रह्मविष्णुहरादयः
devāś ca munayo yakṣā gandharvoragarākṣasāḥ anye ca jantavaḥ sarve brahmaviṣṇuharādayaḥ
देवता, मुनि, यक्ष, गंधर्व, नाग, राक्षस, तथा अन्य समस्त प्राणी, यहाँ तक कि ब्रह्मा-विष्णु-हर आदि भी,
श्लोक 32 (skanda.3.48.32)
सर्वे यास्यंति विलयं न त्वं शोचितुमर्हसि । अद्वयं सच्चिदानंदं यद्ब्रह्मोपनिषद्गतम्
sarve yāsyanti vilayaṁ na tvaṁ śocitum arhasi advayaṁ saccidānandaṁ yad brahmopaniṣadgatam
सभी विलय को प्राप्त होंगे; तुम्हें शोक करना उचित नहीं है। जो अद्वैत, सत्-चित्-आनंद ब्रह्म उपनिषदों में वर्णित है,
श्लोक 33 (skanda.3.48.33)
न तस्य विलयो जन्म वर्धनं चापि सत्तम । मलभांडे नवद्वारे पूयासृक्छोणितालये
na tasya vilayo janma vardhanaṁ cāpi sattama malabhāṇḍe navadvāre pūyāsṛkśoṇitālaye
हे सत्तम! उसका न विलय होता है, न जन्म, न वृद्धि। नौ द्वारों वाले, मल के पात्र, पीब और रक्त के आगार,
श्लोक 34 (skanda.3.48.34)
देहेऽस्मिन्बुद्बुदाकारे कृमियूथसमाकुले । कामक्रोधभयद्रोहमोहमात्सर्यकारिणि
dehe'smin budbudākāre kṛmiyūthasamākule kāmakrodhabhayadrohamohamātsaryakāriṇi
बुदबुदे के समान, कृमियों के समूह से व्याप्त, काम-क्रोध-भय-द्रोह-मोह-ईर्ष्या उत्पन्न करने वाले इस शरीर में,
श्लोक 35 (skanda.3.48.35)
परदारपरक्षेत्रपरद्रव्यैकलोलुपे । हिंसासूयाशुचिव्याप्ते विष्ठामूत्रैकभाजने
paradāraparakṣetraparadravyaikalolupe hiṁsāsūyāśuciwyāpte viṣṭhāmūtraikabhājane
जो पराई स्त्री, पराए क्षेत्र, तथा पराए द्रव्य के लिए ही लोलुप है, हिंसा-असूया-अशुद्धि से व्याप्त है, और विष्ठा-मूत्र का ही पात्र है,
श्लोक 36 (skanda.3.48.36)
यः कुर्याच्छोभनधियं स मूढः स च दुर्मतिः । बहुच्छिद्रघटाकारे देहेऽस्मिन्नशुचौ सदा
yaḥ kuryāc chobhanadhiyaṁ sa mūḍhaḥ sa ca durmatiḥ bahucchidraghaṭākāre dehe'sminn aśucau sadā
जो कोई इस शरीर में शुभ-बुद्धि रखता है, वह मूढ़ है और दुर्बुद्धि है। अनेक छिद्रों वाले घड़े के समान, सदा अशुद्ध इस शरीर में,
श्लोक 37 (skanda.3.48.37)
वायोरवस्थितिः किं स्यात्प्राणाख्यस्य चिरं द्विज । अतो मा कुरु शोकं त्वं जननीं पितरं प्रति
vāyor avasthitiḥ kiṁ syāt prāṇākhyasya ciraṁ dvija ato mā kuru śokaṁ tvaṁ jananīṁ pitaraṁ prati
हे द्विज! प्राण-रूपी वायु का दीर्घकाल तक निवास कहाँ हो सकता है? अतः तुम अपनी माता और पिता के लिए शोक मत करो।
श्लोक 38 (skanda.3.48.38)
तौ स्वकर्मवशाद्यातौ गृहं त्यक्त्वा त्विदं क्वचित् । तव कर्मवशात्त्वं च तिष्ठस्यस्मिन्महीतले
tau svakarmavaśād yātau gṛhaṁ tyaktvā tv idaṁ kvacit tava karmavaśāt tvaṁ ca tiṣṭhasy asmin mahītale
वे दोनों अपने-अपने कर्मों के वशीभूत होकर, इस घर को त्यागकर, कहीं और चले गए। तुम भी अपने कर्मों के वशीभूत होकर इस भूतल पर स्थित हो।
श्लोक 39 (skanda.3.48.39)
यदा कर्मक्षयस्ते स्यात्तदा त्वं च मरिष्यसि । मरिष्यमाणप्रेतो हि मृतप्रेतस्य शोचति
yadā karmakṣayas te syāt tadā tvaṁ ca mariṣyasi mariṣyamāṇapreto hi mṛtapretasya śocati
जब तुम्हारा भी कर्म-क्षय हो जाएगा, तब तुम भी मर जाओगे। मरणासन्न प्राणी ही मृत प्राणी के लिए शोक करता है।
श्लोक 40 (skanda.3.48.40)
यस्मिन्काले समुत्पन्नौ तव माता पिता तथा । न तस्मिंस्त्वं समुत्पन्नस्ततो भिन्ना गतिर्हि वः
yasmin kāle samutpannau tava mātā pitā tathā na tasmiṁs tvaṁ samutpannas tato bhinnā gatir hi vaḥ
जिस काल में तुम्हारे माता-पिता उत्पन्न हुए थे, उस काल में तुम उत्पन्न नहीं हुए थे; अतः तुम्हारी और उनकी गति भिन्न-भिन्न है।
श्लोक 41 (skanda.3.48.41)
यदि तुल्या गतिस्ते स्यात्ताभ्यां सह महामते । तर्हि त्वयापि यातव्यं मृतौ यत्र हि तौ गतौ
yadi tulyā gatis te syāt tābhyāṁ saha mahāmate tarhi tvayāpi yātavyaṁ mṛtau yatra hi tau gatau
हे महामते! यदि तुम्हारी गति उनके समान होती, तो जहाँ वे दोनों मृत्यु में गए, वहाँ तुम्हें भी जाना पड़ता।
श्लोक 42 (skanda.3.48.42)
मृतानां बांधवा ये तु मुंचंत्यश्रूणि भूतले । पिबंत्यश्रूणि तान्यद्धा मृताः प्रेताः परत्र वै
mṛtānāṁ bāndhavā ye tu muñcanty aśrūṇi bhūtale pibanty aśrūṇi tāny addhā mṛtāḥ pretāḥ paratra vai
मृतकों के जो बंधु इस भूतल पर आँसू बहाते हैं, वे मृत प्रेत परलोक में सचमुच वे आँसू ही पीते हैं।
श्लोक 43 (skanda.3.48.43)
अतः शोकं परित्यज्य धृतिं कृत्वा समाहितः । अनयोः प्रेतकार्याणि कुरु त्वं वैदिकानि तु
ataḥ śokaṁ parityajya dhṛtiṁ kṛtvā samāhitaḥ anayoḥ pretakāryāṇi kuru tvaṁ vaidikāni tu
अतः शोक को त्यागकर, धैर्य धारण कर, एकाग्रचित्त होकर, तुम इन दोनों के वैदिक प्रेत-कार्य करो।
श्लोक 44 (skanda.3.48.44)
शरघातान्मृतावेतौ यस्मात्ते जननी पिता । अतस्तद्दोषशांत्यर्थमस्थीन्यादाय वै तयोः
śaraghātān mṛtāv etau yasmāt te jananī pitā atas tad doṣaśāntyartham asthīny ādāya vai tayoḥ
चूँकि तुम्हारे माता-पिता बाण-आघात से मरे हैं, अतः उस दोष की शांति के लिए, उनकी अस्थियों को लेकर,
श्लोक 45 (skanda.3.48.45)
रामनाथशिवक्षेत्रे रामसेतौ विमुक्तिदे । स्थापयस्व तथा श्राद्धं सपिंडीकरणादिकम्
rāmanāthaśivakṣetre rāmasetau vimuktide sthāpayasva tathā śrāddhaṁ sapiṇḍīkaraṇādikam
मुक्तिदायक रामसेतु में, रामनाथ के शिव-क्षेत्र में, उन्हें विसर्जित करो, तथा वहीं श्राद्ध, सपिंडीकरण आदि करो।
श्लोक 46 (skanda.3.48.46)
तत्रैव कुरु शुद्ध्यर्थं तयोर्बाह्मणपुत्रक । तेन दुर्मृत्युदोषस्य शांतिर्भवति नान्यथा
tatraiva kuru śuddhyarthaṁ tayor brāhmaṇaputraka tena durmṛtyudoṣasya śāntir bhavati nānyathā
हे ब्राह्मण-पुत्र! उनकी शुद्धि के लिए वहीं यह करो। इसी से दुर्मृत्यु के दोष की शांति होती है, अन्यथा नहीं।
श्लोक 47 (skanda.3.48.47)
श्रीसूत उवाच । एवमुक्तः स मुनिभिः शाकल्यस्य सुतो द्विजाः । जांगलाख्यस्तयोः सर्वं पितृमेधं चकार वै
śrīsūta uvāca evam uktaḥ sa munibhiḥ śākalyasya suto dvijāḥ jāṅgalākhyas tayoḥ sarvaṁ pitṛmedhaṁ cakāra vai
श्री सूत जी ने कहा — हे द्विजो! मुनियों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, शाकल्य के पुत्र, जांगल नामक ने, अपने माता-पिता का समस्त अंत्येष्टि-संस्कार किया।
श्लोक 48 (skanda.3.48.48)
अन्येद्युरस्थीन्यादाय हालास्यं प्रययौ च सः । तस्माद्रामेश्वरं सद्यो गत्वाऽयं जांगलो द्विजः
anyedyur asthīny ādāya hālāsyaṁ prayayau ca saḥ tasmād rāmeśvaraṁ sadyo gatvā'yaṁ jāṅgalo dvijaḥ
अगले दिन अस्थियों को लेकर वह हालास्य (मदुरा) गया। वहाँ से यह जांगल ब्राह्मण तत्काल रामेश्वर को गया।
श्लोक 49 (skanda.3.48.49)
मुनिप्रोक्तप्रकारेण तस्मिन्रामेश्वरस्थले । निधाय पित्रोरस्थीनि श्राद्धादीन्यकरोत्तथा
muniproktaprakāreṇa tasmin rāmeśvarasthale nidhāya pitror asthīni śrāddhādīny akarot tathā
मुनि द्वारा बताई गई विधि के अनुसार, उस रामेश्वर स्थल में अपने माता-पिता की अस्थियों को विसर्जित कर, उसने श्राद्ध आदि किए।
श्लोक 50 (skanda.3.48.50)
प्रथमाब्दिकपर्यंतं कार्यं तत्राकरोच्च सः । स्थित्वाब्दं स मुनेः पुत्र एको जांगलसंज्ञकः
prathamābdikaparyantaṁ kāryaṁ tatrākarocca saḥ sthitvābdaṁ sa muneḥ putra eko jāṅgalasaṁjñakaḥ
पहले वार्षिक श्राद्ध तक का कार्य वहीं किया। एक वर्ष तक वहाँ रहकर, मुनि का वह पुत्र जांगल नामक,
श्लोक 51 (skanda.3.48.51)
आब्दिकांते दिने विप्रो रात्रौ स्वप्ने विलोक्य तु । स्वमातरं च पितरं शंखचक्रगदाधरौ
ābdikānte dine vipro rātrau svapne vilokya tu svamātaraṁ ca pitaraṁ śaṅkhacakragadādharau
वार्षिक श्राद्ध के अंतिम दिन, रात्रि में स्वप्न में, अपने माता और पिता को शंख-चक्र-गदा धारण किए हुए देखा,
श्लोक 52 (skanda.3.48.52)
गरुडोपरि संविष्टौ पद्ममालाविभूषितौ । शोभितौ तुलसीदाम्ना स्फुरन्मकरकुंडलौ
garuḍopari saṁviṣṭau padmamālāvibhūṣitau śobhitau tulasīdāmnā sphuranmakarakuṇḍalau
गरुड़ पर आरूढ़, कमल-माला से विभूषित, तुलसी-माला से शोभित, चमकते मकर-कुंडलों वाले,
श्लोक 53 (skanda.3.48.53)
कौस्तुभालंकृतोरस्कौ पीतांबरविराजितौ । एवं दृष्ट्वा मुनिसुतो जांगलः सुप्रसन्नधीः
kaustubhālaṅkṛtoraskau pītāmbaravirājitau evaṁ dṛṣṭvā munisuto jāṅgalaḥ suprasannadhīḥ
कौस्तुभ-मणि से अलंकृत वक्षस्थल वाले, पीतांबर से सुशोभित। इस प्रकार देखकर, अत्यंत प्रसन्नचित्त मुनि-पुत्र जांगल,
श्लोक 54 (skanda.3.48.54)
स्वाश्रमं पुनरागत्य सुखेन न्यवसद्द्विजाः । स्वप्नदृष्टं च वृत्तांतं मातापित्रोः स जांगलः
svāśramaṁ punar āgatya sukhena nyavasad dvijāḥ svapnadṛṣṭaṁ ca vṛttāntaṁ mātāpitror sa jāṅgalaḥ
हे द्विजो! अपने आश्रम को लौटकर सुखपूर्वक रहने लगा। अपने माता-पिता के विषय में स्वप्न में देखे गए वृत्तांत को उस जांगल ने,
श्लोक 55 (skanda.3.48.55)
तेभ्यो न्यवेदयत्सर्वं ब्राह्मणेभ्योऽतिहर्षितः । श्रुत्वा ते मुनयो वृत्तमासन्संप्रीतमानसाः
tebhyo nyavedayat sarvaṁ brāhmaṇebhyo'tiharṣitaḥ śrutvā te munayo vṛttam āsan samprītamānasāḥ
अत्यंत हर्षित होकर उन सभी ब्राह्मणों को बताया। उस वृत्तांत को सुनकर वे मुनि अत्यंत प्रसन्नचित्त हुए।
श्लोक 56 (skanda.3.48.56)
अथ राजानमालोक्य सर्वे तेऽपि महर्षयः । अवदन्कुपिता विप्राः शपंतः शंकरं नृपम्
atha rājānam ālokya sarve te'pi maharṣayaḥ avadan kupitā viprāḥ śapantaḥ śaṅkaraṁ nṛpam
तब उन महर्षियों ने भी राजा को देखकर, हे विप्रो! क्रुद्ध होकर, राजा शंकर को शाप देते हुए कहा।
श्लोक 57 (skanda.3.48.57)
पांड्यभूप महामूर्ख क्रौर्याद्ब्राह्मणघातक । स्त्रीहत्या ब्रह्महत्या च कृता यस्मात्त्वयाधुना
pāṇḍyabhūpa mahāmūrkha kraurayād brāhmaṇaghātaka strīhatyā brahmahatyā ca kṛtā yasmāt tvayādhunā
हे पांड्य-भूप! हे महामूर्ख! हे क्रूरता से ब्राह्मण का घात करने वाले! चूँकि अभी तुमने स्त्री-हत्या तथा ब्रह्म-हत्या की है,
श्लोक 58 (skanda.3.48.58)
अतः शरीरसंत्यागं कुरु त्वं हव्यवाहने । नोचेत्तव न शुद्धिः स्यात्प्रायश्चित्तशतैरपि
ataḥ śarīrasantyāgaṁ kuru tvaṁ havyavāhane nocet tava na śuddhiḥ syāt prāyaścittaśatair api
इसलिए तुम अग्नि में अपने शरीर का त्याग करो। नहीं तो सौ प्रायश्चित्तों से भी तुम्हारी शुद्धि नहीं होगी।
श्लोक 59 (skanda.3.48.59)
त्वत्संभाषणमात्रेण ब्रह्महत्यायुतं भवेत् । अस्मत्सकाशाद्गच्छ त्वं पांड्यानां कुलपांसन
tvatsambhāṣaṇamātreṇa brahmahatyāyutaṁ bhavet asmatsakāśād gaccha tvaṁ pāṇḍyānāṁ kulapāṁsana
तुमसे बात करने मात्र से भी दस हज़ार ब्रह्महत्याओं का पाप हो जाता है। हे पांड्य-कुल के कलंक! तुम हमारे समीप से चले जाओ।
श्लोक 60 (skanda.3.48.60)
इत्युक्तो मुनिभिः पांड्यः शंकरो द्विजपुंगवाः । तथास्तु देहसंत्यागं करिष्ये हव्यवाहने
ityukto munibhiḥ pāṇḍyaḥ śaṅkaro dvijapuṅgavāḥ tathāstu dehasantyāgaṁ kariṣye havyavāhane
हे द्विजपुंगवो! मुनियों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, पांड्य राजा शंकर ने कहा — 'ऐसा ही हो, मैं अग्नि में अपने शरीर का त्याग करूँगा।
श्लोक 61 (skanda.3.48.61)
ब्रह्महत्याविशुद्ध्यर्थं भवतां सन्निधावहम् । अनुग्रहं मे कुर्वंतु भवंतो मुनिसत्तमाः
brahmahatyāviśuddhyarthaṁ bhavatāṁ sannidhāv aham anugrahaṁ me kurvantu bhavanto munisattamāḥ
ब्रह्महत्या की शुद्धि के लिए आपकी उपस्थिति में मैं ऐसा करूँगा। हे मुनिसत्तमो! आप मुझ पर अनुग्रह कीजिए।
श्लोक 62 (skanda.3.48.62)
तथा शरीर संत्यागात्पातकं मे लयं व्रजेत् । एवमुक्त्वा मुनीन्सर्वाञ्च्छंकरः पांड्यभूपतिः
tathā śarīrasantyāgāt pātakaṁ me layaṁ vrajet evam uktvā munīn sarvāñ chaṅkaraḥ pāṇḍyabhūpatiḥ
इस प्रकार शरीर-त्याग से मेरा पाप विलीन हो जाए।' समस्त मुनियों से यह कहकर पांड्य-राजा शंकर,
श्लोक 63 (skanda.3.48.63)
स्वान्मंत्रिणः समाहूय बभाषे वचनं त्विदम् । भो मंत्रिणो ब्रह्महत्या मयाऽकार्यविचारतः
svān mantriṇaḥ samāhūya babhāṣe vacanaṁ tv idam bho mantriṇo brahmahatyā mayā'kāryavicārataḥ
अपने मंत्रियों को बुलाकर यह वचन कहा — 'हे मंत्रियो! बिना विचार किए अकार्य करने से मेरे द्वारा ब्रह्महत्या,
श्लोक 64 (skanda.3.48.64)
स्त्रीहत्या च तथा क्रूरा महानरकदायिनी । एतत्पातकशुद्ध्यर्थं मुनीनां वचनादहम्
strīhatyā ca tathā krūrā mahānarakadāyinī etat pātakaśuddhyarthaṁ munīnāṁ vacanād aham
तथा वह क्रूर, महानरक-दायिनी स्त्री-हत्या भी हो गई है। इस पाप की शुद्धि के लिए मुनियों के वचन से मैं,
श्लोक 65 (skanda.3.48.65)
प्रदीप्ते ऽग्नौ महाज्वाले परित्यक्ष्ये कलेवरम् । काष्ठान्यानयत क्षिप्रं तैरग्निश्च समिध्यताम्
pradīpte'gnau mahājvāle parityakṣye kalevaram kāṣṭhāny ānayata kṣipraṁ tair agniś ca samidhyatām
प्रज्ज्वलित महाज्वाला वाली अग्नि में अपने शरीर का त्याग करूँगा। शीघ्र काष्ठ लाओ, उनसे अग्नि प्रज्ज्वलित की जाए।
श्लोक 66 (skanda.3.48.66)
मम पुत्रं च सुरुचिं राज्ये स्थापयताचिरात् । मा शोकं कुरुतामात्या दैवतं दुरतिक्रमम्
mama putraṁ ca suruciṁ rājye sthāpayatācirāt mā śokaṁ kurutāmātyā daivataṁ duratikramam
मेरे पुत्र सुरुचि को शीघ्र राज्य पर स्थापित करो। हे मंत्रियो! शोक मत करो, दैव अलंघनीय है।
श्लोक 67 (skanda.3.48.67)
इतीरिता नृपतिना मंत्रिणो रुरुदुस्तदा । पांड्यनाथ महाराज रिपूणामपि वत्सल
itīritā nṛpatinā mantriṇo rurudus tadā pāṇḍyanātha mahārāja ripūṇām api vatsala
राजा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर मंत्री तब रो पड़े — 'हे पांड्यनाथ! हे महाराज! शत्रुओं के प्रति भी वत्सल!
श्लोक 68 (skanda.3.48.68)
वयं हि भवता नित्यं पुत्रवत्परिपालिताः । त्वां विना न प्रवेक्ष्याम पुरीं देवपुरोपमाम्
vayaṁ hi bhavatā nityaṁ putravat paripālitāḥ tvāṁ vinā na praveṣyāma purīṁ devapuropamām
हम आपके द्वारा सदा पुत्रवत् पालित हुए हैं। आपके बिना हम देवपुरी के समान इस नगरी में प्रवेश नहीं करेंगे।
श्लोक 69 (skanda.3.48.69)
हव्यवाहं प्रवेक्ष्यामो महा काष्ठसमेधितम् । तेषां प्रलपितं श्रुत्वा पांड्य शंकरभूपतिः । प्रोवाच मंत्रिणः सर्वान्वचनं सांत्वपूर्वकम्
havyavāhaṁ praveṣyāmo mahākāṣṭhasamedhitam teṣāṁ pralapitaṁ śrutvā pāṇḍya śaṅkarabhūpatiḥ provāca mantriṇaḥ sarvān vacanaṁ sāntvapūrvakam
हम भी काष्ठों से प्रज्ज्वलित उस महान अग्नि में प्रवेश करेंगे।' उनके इस विलाप को सुनकर पांड्य-राजा शंकर ने समस्त मंत्रियों से सांत्वनापूर्ण वचन कहे।
श्लोक 70 (skanda.3.48.70)
शंकर उवाच । किं करिष्यथ भोऽमात्या महापातकिना मया
śaṅkara uvāca kiṁ kariṣyatha bho'mātyā mahāpātakinā mayā
शंकर ने कहा — हे मंत्रियो! महापातकी मेरे साथ रहकर तुम क्या करोगे?
श्लोक 71 (skanda.3.48.71)
सिंहासनं समारुह्य न कर्तुं युज्यते बत । चतुरर्णवपर्यंतधरापालनमंजसा
siṁhāsanaṁ samāruhya na kartuṁ yujyate bata caturarṇavaparyantadharāpālanam añjasā
सिंहासन पर आरूढ़ होकर चारों समुद्रों तक पृथ्वी का पालन करना — अहो! यह मेरे लिए उचित नहीं है।
श्लोक 72 (skanda.3.48.72)
मत्पुत्रं सुरुचिं शीघ्रमतः स्थापयतासने । काष्ठान्यानयत क्षिप्रं प्रवेष्टुं हव्यवाहनम्
matputraṁ suruciṁ śīghram ataḥ sthāpayatāsane kāṣṭhāny ānayata kṣipraṁ praveṣṭuṁ havyavāhanam
अतः मेरे पुत्र सुरुचि को शीघ्र सिंहासन पर स्थापित करो। अग्नि में प्रवेश करने के लिए शीघ्र काष्ठ लाओ।
श्लोक 73 (skanda.3.48.73)
मम मंत्रिवरा यूयं विलंबं त्यजताधुना । इत्युक्ता मंत्रिणः काष्ठं समानिन्युः क्षणेन ते
mama mantrivarā yūyaṁ vilambaṁ tyajatādhunā ityuktā mantriṇaḥ kāṣṭhaṁ samāninyuḥ kṣaṇena te
हे मेरे श्रेष्ठ मंत्रियो! अभी विलंब मत करो।' ऐसा कहे जाने पर मंत्री क्षणभर में काष्ठ ले आए।
श्लोक 74 (skanda.3.48.74)
अग्निं प्रज्वलितं काष्ठैर्दृष्ट्वा शंकरभूपतिः । स्नात्वाचम्य विशुद्धात्मा मुनीनां संनिधौ तदा
agniṁ prajvalitaṁ kāṣṭhair dṛṣṭvā śaṅkarabhūpatiḥ snātvācamya viśuddhātmā munīnāṁ sannidhau tadā
काष्ठों से प्रज्ज्वलित अग्नि को देखकर, राजा शंकर, स्नान और आचमन कर विशुद्धात्मा होकर, मुनियों की उपस्थिति में तब,
श्लोक 75 (skanda.3.48.75)
अग्निं प्रदक्षिणीकृत्य तान्मुनीनपि सत्वरम् । अग्निं मुनीन्नमस्कृत्य ध्यात्वा देवमुमापतिम्
agniṁ pradakṣiṇīkṛtya tān munīn api satvaram agniṁ munīn namaskṛtya dhyātvā devam umāpatim
अग्नि की परिक्रमा कर, तथा उन मुनियों को भी शीघ्रता से, अग्नि को और मुनियों को नमस्कार कर, उमापति देव का ध्यान कर,
श्लोक 76 (skanda.3.48.76)
अग्नौ पतितुमारेभे धैर्यमालंब्य भूपतिः । तस्मिन्नवसरे विप्रा मुनीनामपि शृण्वताम्
agnau patitum ārebhe dhairyam ālambya bhūpatiḥ tasminn avasare viprā munīnām api śṛṇvatām
धैर्य धारण कर राजा अग्नि में गिरने के लिए उद्यत हुआ। हे विप्रो! उसी अवसर पर, मुनियों के भी सुनते-सुनते,
श्लोक 77 (skanda.3.48.77)
अशरीरा समुदभूद्वाणी भैरवनादिनी । भोः शंकर महीपाल मानलं प्रविशाधुना
aśarīrā samudabhūd vāṇī bhairavanādinī bhoḥ śaṅkara mahīpāla mānalaṁ praviśādhunā
एक भैरव-नाद के समान अशरीरी वाणी उत्पन्न हुई — 'हे राजा शंकर! अभी अग्नि में प्रवेश मत करो।
श्लोक 78 (skanda.3.48.78)
ब्रह्महत्यानिमित्तं ते भयं मा भून्महामते । तवोपदेशं वक्ष्यामि रहस्यं वेदसंमितम्
brahmahatyānimittaṁ te bhayaṁ mā bhūn mahāmate tavopadeśaṁ vakṣyāmi rahasyaṁ vedasammitam
हे महामते! ब्रह्महत्या के निमित्त तुम्हें भय न हो। मैं तुम्हें वेद-सम्मत रहस्यमय उपदेश दूँगा।
श्लोक 79 (skanda.3.48.79)
शृणुष्वावहितो राजन्मदुक्तं क्रियतां त्वया । दक्षिणांबुनिधेस्तीरे गंधमादनपर्वते
śṛṇuṣvāvahito rājan maduktaṁ kriyatāṁ tvayā dakṣiṇāmbunidhes tīre gandhamādanaparvate
हे राजन्! सावधानी से सुनो, और मेरे कहे को करो। दक्षिण समुद्र के तट पर, गन्धमादन पर्वत पर,
श्लोक 80 (skanda.3.48.80)
रामसेतौ महापुण्ये महापातकनाशने । रामप्रतिष्ठितं लिगं रामनाथं महेश्वरम्
rāmasetau mahāpuṇye mahāpātakanāśane rāmapratiṣṭhitaṁ liṅgaṁ rāmanāthaṁ maheśvaram
अत्यंत पुण्यमय, महापातकों का नाशक रामसेतु में, राम द्वारा प्रतिष्ठित लिंग, महेश्वर रामनाथ की,
श्लोक 81 (skanda.3.48.81)
सेवस्व वर्षमेकं त्वं त्रिकालं भक्तिपूर्वकम् । प्रदक्षिणप्रक्रमणं नमस्कारं च वै कुरु
sevasva varṣam ekaṁ tvaṁ trikālaṁ bhaktipūrvakam pradakṣiṇaprakramaṇaṁ namaskāraṁ ca vai kuru
एक वर्ष तक तीनों संध्याओं में भक्तिपूर्वक सेवा करो। प्रदक्षिणा और नमस्कार भी करो।
श्लोक 82 (skanda.3.48.82)
महाभिषेकः क्रियतां रामनाथस्य वै त्वया । नैवेद्यं विविधं राजन्क्रियतां च दिनेदिने
mahābhiṣekaḥ kriyatāṁ rāmanāthasya vai tvayā naivedyaṁ vividhaṁ rājan kriyatāṁ ca dine dine
तुम्हें रामनाथ का महाभिषेक करना चाहिए। हे राजन्! प्रतिदिन विविध नैवेद्य भी अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 83 (skanda.3.48.83)
चन्दनागरुकर्पूरै रामलिंगं प्रपूजय । भारद्वयेन गव्येन ह्याज्येन त्वभिषेचय
candanāgarukarpūrai rāmaliṅgaṁ prapūjaya bhāradvayena gavyena hy ājyena tv abhiṣecaya
चंदन, अगर, तथा कपूर से राम-लिंग की पूजा करो। दो भार गव्य घी से अभिषेक करो।
श्लोक 84 (skanda.3.48.84)
प्रत्यहं च गवां क्षीरैर्द्विभारपरिसंमितैः । मधुद्रोणेन तल्लिंगं प्रत्यहं स्नापय प्रभोः
pratyahaṁ ca gavāṁ kṣīrair dvibhāraparisammitaiḥ madhudroṇena tal liṅgaṁ pratyahaṁ snāpaya prabhoḥ
प्रतिदिन दो भार परिमाण के गोदुग्ध से, तथा एक द्रोण मधु से, प्रभु के उस लिंग को प्रतिदिन स्नान कराओ।
श्लोक 85 (skanda.3.48.85)
प्रत्यहं पायसान्नेन नैवेद्यं कुरु भूपते । प्रत्यहं तिलतैलेन दीपाराधनमाचर
pratyahaṁ pāyasānnena naivedyaṁ kuru bhūpate pratyahaṁ tilatailena dīpārādhanam ācara
हे राजन्! प्रतिदिन खीर से नैवेद्य अर्पित करो। प्रतिदिन तिल के तेल से दीप-आराधना करो।
श्लोक 86 (skanda.3.48.86)
एतेन तव राजेंद्र रामनाथस्य शूलिनः । स्त्रीहत्य्रा ब्रह्महत्या च तत्क्षणादेव नश्यतः
etena tava rājendra rāmanāthasya śūlinaḥ strīhatyā brahmahatyā ca tatkṣaṇād eva naśyataḥ
हे राजेंद्र! इससे त्रिशूलधारी रामनाथ की कृपा से तुम्हारी स्त्री-हत्या और ब्रह्म-हत्या उसी क्षण नष्ट हो जाएँगी।
श्लोक 87 (skanda.3.48.87)
दर्शनाद्रामनाथस्य भ्रूणहत्याशतानि च । अयुतं ब्रह्महत्यानां सुरापानायुतं तथा
darśanād rāmanāthasya bhrūṇahatyāśatāni ca ayutaṁ brahmahatyānāṁ surāpānāyutaṁ tathā
रामनाथ के दर्शन से सैकड़ों भ्रूणहत्याएँ, दस हज़ार ब्रह्महत्याएँ, तथा दस हज़ार सुरापान के पाप भी,
श्लोक 88 (skanda.3.48.88)
स्वर्णस्तेयायुतं राजन्गुरुस्त्रीगमनायुतम् । एतत्संसर्गदोषाश्च विनश्यंति क्षणाद्विभो
svarṇasteyāyutaṁ rājan gurustrīgamanāyutam etatsaṁsargadoṣāś ca vinaśyanti kṣaṇād vibho
हे राजन्! दस हज़ार स्वर्ण-चोरी के, तथा दस हज़ार गुरुपत्नीगमन के, तथा संसर्ग-दोष भी, हे विभो! क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 89 (skanda.3.48.89)
महापातकतुल्यानि यानि पापानि संति वै । तानि सर्वाणि नश्यंति रामनाथस्य सेवया
mahāpātakatulyāni yāni pāpāni santi vai tāni sarvāṇi naśyanti rāmanāthasya sevayā
जितने भी पाप महापातकों के तुल्य हैं, वे सभी रामनाथ की सेवा से नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 90 (skanda.3.48.90)
महती रामनाथस्य सेवा लभ्येत चेन्नृणाम् । किं गंगया च गयया प्रयागेणाध्वरेण वा
mahatī rāmanāthasya sevā labhyeta cen nṛṇām kiṁ gaṅgayā ca gayayā prayāgeṇādhvareṇa vā
यदि मनुष्यों को रामनाथ की महान सेवा प्राप्त हो जाए, तो गंगा से, गया से, प्रयाग से, अथवा यज्ञ से भी क्या?
श्लोक 91 (skanda.3.48.91)
तद्गच्छ रामसेतुं त्वं रामनाथं भजानिशम् । विलंबं मा कुरु विभो गमने च त्वरां कुरु
tad gaccha rāmasetuṁ tvaṁ rāmanāthaṁ bhajāniśam vilambaṁ mā kuru vibho gamane ca tvarāṁ kuru
अतः तुम रामसेतु को जाओ, और रामनाथ को दिन-रात भजो। हे विभो! विलंब मत करो, जाने में शीघ्रता करो।
श्लोक 92 (skanda.3.48.92)
इत्युक्त्वा विररामाथ सापि वागशरीरिणी । तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे त्वरयंति स्म भूपतिम्
ityuktvā virarāmātha sāpi vāg aśarīriṇī tac chrutvā munayaḥ sarve tvarayanti sma bhūpatim
इस प्रकार कहकर वह अशरीरी वाणी भी शांत हो गई। यह सुनकर समस्त मुनि राजा को शीघ्रता के लिए प्रेरित करने लगे।
श्लोक 93 (skanda.3.48.93)
गच्छ शीघं महाराज रामसेतुं विमुक्तिदम् । रामनाथस्य माहात्म्यमज्ञात्वास्माभिरीरितम्
gaccha śīghraṁ mahārāja rāmasetuṁ vimuktidam rāmanāthasya māhātmyam ajñātvāsmābhir īritam
'हे महाराज! मुक्तिदायक रामसेतु को शीघ्र जाओ। रामनाथ के माहात्म्य को न जानते हुए ही हमने,
श्लोक 94 (skanda.3.48.94)
देहत्यागं कुरुष्वेति वह्नौ प्रज्वलितेऽधुना । अनुज्ञातो मुनिवरैरिति राजा स शंकरः
dehatyāgaṁ kuruṣveti vahnau prajvalite'dhunā anujñāto munivarair iti rājā sa śaṅkaraḥ
अभी प्रज्ज्वलित अग्नि में देह-त्याग करने के लिए कहा था।' इस प्रकार श्रेष्ठ मुनियों द्वारा अनुज्ञात होकर वह राजा शंकर,
श्लोक 95 (skanda.3.48.95)
चतुरंगबलं पुर्यां प्रापयित्वा त्वरान्वितः । नमस्कृत्य मुनीन्सर्वान्प्रहृष्टेनांतरात्मना
caturaṅgabalaṁ puryāṁ prāpayitvā tvarānvitaḥ namaskṛtya munīn sarvān prahṛṣṭenāntarātmanā
अपनी चतुरंग सेना को नगर में भेजकर, शीघ्रता से, समस्त मुनियों को नमस्कार कर, प्रसन्न अंतरात्मा से,
श्लोक 96 (skanda.3.48.96)
वृतः कतिपयैः सैन्यैः समादाय धनं बहु । रामनाथस्य सेवार्थमयासीद्गंधमादनम्
vṛtaḥ katipayaiḥ sainyaiḥ samādāya dhanaṁ bahu rāmanāthasya sevārtham ayāsīd gandhamādanam
कुछ सैनिकों से घिरा हुआ, बहुत धन लेकर, रामनाथ की सेवा के लिए गन्धमादन को चला गया।
श्लोक 97 (skanda.3.48.97)
उवास वर्षमेकं च रामसेतौ विशुद्धिदे । एकभुक्तो जितक्रोधो विजितेंद्रियसंचयः
uvāsa varṣam ekaṁ ca rāmasetau viśuddhide ekabhukto jitakrodho vijitendriyasañcayaḥ
शुद्धि देने वाले रामसेतु में एक वर्ष तक निवास किया, एक बार भोजन करते हुए, क्रोध को जीतते हुए, समस्त इंद्रियों को वश में करते हुए।
श्लोक 98 (skanda.3.48.98)
त्रिसंध्यं रामनाथं च सेवमानः सभक्तिकम् । प्रददौ रामनाथाय दशभारं धनं मुदा
trisandhyaṁ rāmanāthaṁ ca sevamānaḥ sabhaktikam pradadau rāmanāthāya daśabhāraṁ dhanaṁ mudā
तीनों संध्याओं में भक्तिपूर्वक रामनाथ की सेवा करते हुए, उसने आनंदपूर्वक रामनाथ को दस भार धन अर्पित किया।
श्लोक 99 (skanda.3.48.99)
प्रत्यहं रामनाथस्य महापूजामकारयत् । अकरोच्च धनुष्कोटौ प्रत्यहं भक्तिपूर्वकम्
pratyahaṁ rāmanāthasya mahāpūjām akārayat akaroc ca dhanuṣkoṭau pratyahaṁ bhaktipūrvakam
प्रतिदिन रामनाथ की महापूजा करवाता रहा। धनुष्कोटि में भी प्रतिदिन भक्तिपूर्वक,
श्लोक 100 (skanda.3.48.100)
स्नानं प्रतिदिनं चान्नं ब्राह्मणेभ्य ददौ मुदा । अशरीरावचःप्रोक्तमखिलं पूजनं तथा
snānaṁ pratidinaṁ cānnaṁ brāhmaṇebhyo dadau mudā aśarīrāvacaḥproktam akhilaṁ pūjanaṁ tathā
स्नान करता रहा, और प्रतिदिन आनंदपूर्वक ब्राह्मणों को अन्न देता रहा। अशरीरी वाणी द्वारा बताई गई समस्त पूजा-विधि को भी,
श्लोक 101 (skanda.3.48.101)
एवं कृतवतस्तस्य वर्षमेकं गतं द्विजाः । वर्षांते स शुचिर्भूत्वा शंकरस्तुष्टमानसः
evaṁ kṛtavatas tasya varṣam ekaṁ gataṁ dvijāḥ varṣānte sa śucir bhūtvā śaṅkaras tuṣṭamānasaḥ
हे द्विजो! इस प्रकार करते हुए उसका एक वर्ष बीत गया। वर्ष के अंत में शुद्ध होकर, प्रसन्नचित्त शंकर,
श्लोक 102 (skanda.3.48.102)
तुष्टाव परमेशानं रामनाथं घृणानिधिम्
tuṣṭāva parameśānaṁ rāmanāthaṁ ghṛṇānidhim
करुणा-निधि, परमेश्वर रामनाथ की स्तुति करने लगा।
श्लोक 103 (skanda.3.48.103)
शंकर उवाच । नमामि रुद्रमीशानं रामनाथमुमापतिम्
śaṅkara uvāca namāmi rudram īśānaṁ rāmanātham umāpatim
शंकर ने कहा — रुद्र, ईशान, उमापति रामनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 104 (skanda.3.48.104)
पाहि मां कृपया देव ब्रह्महत्यां दहाशु मे । त्रिपुरघ्न महादेव कालकूटविषादन
pāhi māṁ kṛpayā deva brahmahatyāṁ dahāśu me tripuraghna mahādeva kālakūṭaviṣādana
हे देव! कृपापूर्वक मेरी रक्षा कीजिए। मेरी ब्रह्महत्या को शीघ्र भस्म कर दीजिए। हे त्रिपुर के नाशक! हे महादेव! हे कालकूट-विष के पान करने वाले!
श्लोक 105 (skanda.3.48.105)
रक्ष मां त्वं दयासिंधो स्त्रीहत्यां मे विमोचय । गंगाधर विरूपाक्ष रामनाथ त्रिलोचन
rakṣa māṁ tvaṁ dayāsindho strīhatyāṁ me vimocaya gaṅgādhara virūpākṣa rāmanātha trilocana
हे दया के सागर! मेरी रक्षा कीजिए, मुझे स्त्री-हत्या से मुक्त कीजिए। हे गंगाधर! हे विरूपाक्ष! हे रामनाथ! हे त्रिनेत्र!
श्लोक 106 (skanda.3.48.106)
मां पालय कृपादृष्ट्या छिन्धि मत्पातकं विभो । कामारे कामसंदायिन्भक्तानां राघवेश्वर
māṁ pālaya kṛpādṛṣṭyā chindhi matpātakaṁ vibho kāmāre kāmasaṁdāyin bhaktānāṁ rāghaveśvara
अपनी कृपा-दृष्टि से मेरा पालन कीजिए, मेरे पाप को काट दीजिए। हे कामारि! हे भक्तों को अभीष्ट देने वाले! हे राघवेश्वर!
श्लोक 107 (skanda.3.48.107)
कटाक्षं पातय मयि शुद्धं मां कुरु धूर्जटे । मार्कंडेयभयत्राण मृत्युंजय शिवाव्यय
kaṭākṣaṁ pātaya mayi śuddhaṁ māṁ kuru dhūrjaṭe mārkaṇḍeyabhayatrāṇa mṛtyuñjaya śivāvyaya
मुझ पर अपनी कटाक्ष-दृष्टि डालिए, मुझे शुद्ध कीजिए, हे धूर्जटि! हे मार्कण्डेय के भय से रक्षक! हे मृत्युंजय! हे अविनाशी शिव!
श्लोक 108 (skanda.3.48.108)
नमस्ते गिरिजार्धाय निष्पापं कुरु मां सदा । रुद्राक्षमालाभरण चन्द्रशेखर शंकर
namaste girijārdhāya niṣpāpaṁ kuru māṁ sadā rudrākṣamālābharaṇa candraśekhara śaṅkara
पार्वती-अर्धांग को नमस्कार है, मुझे सदा पापरहित कीजिए। हे रुद्राक्ष-माला से अलंकृत! हे चंद्रशेखर! हे शंकर!
श्लोक 109 (skanda.3.48.109)
वेदोक्तसम्यगाचारयोग्यं मां कुरु ते नमः । सूर्यदंतभिदे तुभ्यं भारतीनासिकाच्छिदे
vedoktasamyagācārayogyaṁ māṁ kuru te namaḥ sūryadantabhide tubhyaṁ bhāratīnāsikācchide
मुझे वेदोक्त सम्यक् आचार के योग्य बनाइए, आपको नमस्कार है। सूर्य के दाँत तोड़ने वाले, तथा भारती की नासिका काटने वाले आपको,
श्लोक 110 (skanda.3.48.110)
रामेश्वराय देवाय नमो मे शुद्धिदो भव । आनंदं सच्चिदानंदं रामनाथं वृषध्वजम्
rāmeśvarāya devāya namo me śuddhido bhava ānandaṁ saccidānandaṁ rāmanāthaṁ vṛṣadhvajam
देव रामेश्वर को नमस्कार है; मेरी शुद्धि करने वाले हो जाइए। आनंद-स्वरूप, सत्-चित्-आनंद, वृषभ-ध्वज रामनाथ को,
श्लोक 111 (skanda.3.48.111)
भूयोभूयो नमस्यामि पातकं मे विनश्यतु । भक्त्यैवं स्तुवतस्तस्य रामनाथं महेश्वरम्
bhūyo bhūyo namasyāmi pātakaṁ me vinaśyatu bhaktyaivaṁ stuvatas tasya rāmanāthaṁ maheśvaram
मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ; मेरा पाप नष्ट हो जाए। इस प्रकार भक्तिपूर्वक महेश्वर रामनाथ की स्तुति करते हुए उस राजा के,
श्लोक 112 (skanda.3.48.112)
निर्जगाम मुखाद्राज्ञो ब्रह्महत्यातिभीषणा । नीलवस्त्रधरा क्रूरा महारक्तशिरोरुहा
nirjagāma mukhād rājño brahmahatyātibhīṣaṇā nīlavastradharā krūrā mahāraktaśiroruhā
राजा के मुख से अत्यंत भयंकर ब्रह्महत्या निकली, जो नीले वस्त्र धारण किए हुए, क्रूर, तथा अत्यंत लाल बालों वाली थी।
श्लोक 113 (skanda.3.48.113)
तां ब्रह्महत्यां बीभत्सां नृपवक्त्राद्विनिर्गताम् । निजघान त्रिशूलेन भैरवो रुद्रशासनात्
tāṁ brahmahatyāṁ bībhatsāṁ nṛpavaktrād vinirgatām nijaghāna triśūlena bhairavo rudraśāsanāt
राजा के मुख से निकली उस घृणित ब्रह्महत्या को, रुद्र की आज्ञा से भैरव ने त्रिशूल से मार डाला।
श्लोक 114 (skanda.3.48.114)
हतायां ब्रह्महत्यायां भैरवेण शिवाज्ञया । रामनाथो नृपं प्राह स्तुत्या तस्य प्रसन्नधीः
hatāyāṁ brahmahatyāyāṁ bhairaveṇa śivājñayā rāmanātho nṛpaṁ prāha stutyā tasya prasannadhīḥ
शिव की आज्ञा से भैरव द्वारा ब्रह्महत्या के मारे जाने पर, उसकी स्तुति से प्रसन्नचित्त रामनाथ ने राजा से कहा।
श्लोक 115 (skanda.3.48.115)
श्रीरामनाथ उवाच । पांड्यभूप महाराज स्तोत्रेणानेन तेऽनघ । प्रसन्नोऽहं वरं दास्ये तुभ्यं वरय चेप्सितम्
śrīrāmanātha uvāca pāṇḍyabhūpa mahārāja stotreṇānena te'nagha prasanno'haṁ varaṁ dāsye tubhyaṁ varaya cepsitam
श्री रामनाथ ने कहा — हे पांड्यराज! हे महाराज! हे निष्पाप! इस स्तोत्र से मैं प्रसन्न हूँ, मैं तुम्हें वर दूँगा; अपना अभीष्ट माँगो।
श्लोक 116 (skanda.3.48.116)
स्त्रीहत्याब्रह्महत्याभ्यां यस्ते दोषः स निर्गतः । शुद्धो विधूतपापोऽसि राज्यं पालय पूर्ववत्
strīhatyābrahmahatyābhyāṁ yas te doṣaḥ sa nirgataḥ śuddho vidhūtapāpo'si rājyaṁ pālaya pūrvavat
स्त्री-हत्या और ब्रह्म-हत्या से जो तुम्हारा दोष था, वह निकल गया है। तुम शुद्ध हो, पापों से धुले हुए हो; पूर्व की भाँति राज्य का पालन करो।
श्लोक 117 (skanda.3.48.117)
ये मामत्र निषेवंते भक्तियुक्तेन चेतसा । नाशयामि नृणां तेषां ब्रह्महत्यायुतान्यपि
ye mām atra niṣevante bhaktiyuktena cetasā nāśayāmi nṛṇāṁ teṣāṁ brahmahatyāyutāny api
जो भी यहाँ भक्तियुक्त चित्त से मेरी सेवा करते हैं, उन मनुष्यों की दस-दस हज़ार ब्रह्महत्याएँ भी मैं नष्ट कर देता हूँ।
श्लोक 118 (skanda.3.48.118)
सुरापानायुतं भूप गुरुस्त्रीगमनायुतम् । स्वर्णस्तेयायुतमपि तत्संसर्गायुतं तथा
surāpānāyutaṁ bhūpa gurustrīgamanāyutam svarṇasteyāyutam api tatsaṁsargāyutaṁ tathā
हे राजन्! दस हज़ार सुरापान के, दस हज़ार गुरुपत्नीगमन के, दस हज़ार स्वर्ण-चोरी के, तथा दस हज़ार उनके संसर्ग के पाप भी,
श्लोक 119 (skanda.3.48.119)
अन्यान्यपि च पापानि नाशयामि न संशयः । मत्सेविनो नरा राजन्न भूयः संसरंति ते
anyāny api ca pāpāni nāśayāmi na saṁśayaḥ matsevino narā rājan na bhūyaḥ saṁsaranti te
अन्य पापों को भी मैं नष्ट कर देता हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं। हे राजन्! मेरे सेवक मनुष्य पुनः संसार में नहीं भटकते।
श्लोक 120 (skanda.3.48.120)
किं तु सायुज्यरूपां मे मुक्तिं यास्यन्त्यसंशयम् । स्तुवंत्यनेन स्तोत्रेण ये मां भक्तिपुरःसरम्
kiṁ tu sāyujyarūpāṁ me muktiṁ yāsyanty asaṁśayam stuvanty anena stotreṇa ye māṁ bhaktipuraḥsaram
अपितु वे निःसंदेह मेरे सायुज्य-रूप मुक्ति को प्राप्त करते हैं। जो भी भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करते हैं,
श्लोक 121 (skanda.3.48.121)
नाशयाम्यहमेतेषां महापातकसंचयम् । प्रीतोऽहं तव भक्त्या च स्तोत्रेण मनुजेश्वर
nāśayāmy aham eteṣāṁ mahāpātakasañcayam prīto'haṁ tava bhaktyā ca stotreṇa manujeśvara
उनके महापातकों के संचय को मैं नष्ट कर देता हूँ। हे मनुजेश्वर! तुम्हारी भक्ति और स्तोत्र से मैं प्रसन्न हूँ।
श्लोक 122 (skanda.3.48.122)
यथेष्टं प्रार्थय वरं मत्तस्त्वं वरदान्नृप । एवमुक्तः शिवेनाथ शंकरो नृपपुंगवः
yatheṣṭaṁ prārthaya varaṁ mattas tvaṁ varadān nṛpa evam uktaḥ śivenātha śaṅkaro nṛpapuṅgavaḥ
हे राजन्! वरदाता मुझसे यथेच्छ वर माँगो।' इस प्रकार शिव द्वारा कहे जाने पर, राजाओं में श्रेष्ठ शंकर,
श्लोक 123 (skanda.3.48.123)
रामनाथं बभाषे तं शंकरं करुणानिधिम्
rāmanāthaṁ babhāṣe taṁ śaṅkaraṁ karuṇānidhim
करुणा-निधि उस रामनाथ शंकर से यह कहने लगा।
श्लोक 124 (skanda.3.48.124)
नृप उवाच । तव संदर्शनेनाहं कृतार्थोऽस्मि महेश्वर
nṛpa uvāca tava saṁdarśanenāhaṁ kṛtārtho'smi maheśvara
राजा ने कहा — हे महेश्वर! आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया हूँ।
श्लोक 125 (skanda.3.48.125)
इतः परं प्रार्थनीयं मम नास्त्यधुनाधिकम् । मृकण्डुसुतसंतापहारि पादयुगं तव
itaḥ paraṁ prārthanīyaṁ mama nāsty adhunādhikam mṛkaṇḍusutasaṁtāpahāri pādayugaṁ tava
अब मेरे लिए इससे अधिक प्रार्थना करने योग्य कुछ भी नहीं है। मृकण्डु-पुत्र मार्कण्डेय के संताप को हरने वाला आपका चरण-युगल,
श्लोक 126 (skanda.3.48.126)
दृष्टं मया महादेव नातः प्रार्थ्यं विभोस्ति वै । त्वत्पादपद्मयुगुले निश्चला भक्तिरस्तु मे
dṛṣṭaṁ mayā mahādeva nātaḥ prārthyaṁ vibhos ti vai tvatpādapadmayugule niścalā bhaktir astu me
हे महादेव! मैंने देख लिया है; अतः हे विभो! इससे अधिक कुछ भी माँगने योग्य नहीं है। आपके चरण-कमल-युगल में मेरी भक्ति अटल हो।
श्लोक 127 (skanda.3.48.127)
न पुनर्जन्म मे भूयान्मातॄणामुदरेऽशुचौ । ये मत्कृतमिदं स्तोत्रं कीर्तयंति तव प्रभो
na punarjanma me bhūyān mātṝṇām udare'śucau ye matkṛtam idaṁ stotraṁ kīrtayanti tava prabho
अशुद्ध माताओं के उदर में मेरा पुनर्जन्म न हो। हे प्रभो! जो कोई भी मेरे द्वारा रचित इस स्तोत्र का आपके लिए कीर्तन करते हैं,
श्लोक 128 (skanda.3.48.128)
ते नराः पापनिर्मुक्तास्त्वत्सेवाफलमाप्नुयुः
te narāḥ pāpanirmuktās tvatsevāphalam āpnuyuḥ
वे मनुष्य पापों से मुक्त होकर आपकी सेवा के फल को प्राप्त करें।
श्लोक 129 (skanda.3.48.129)
श्रीसूत उवाच । तथास्त्वित्यनुगृह्यैनं रामनाथो द्विजोत्तमाः । नीलकण्ठो विरूपाक्षो लिंगरूपे तिरोहितः
śrīsūta uvāca tathāstv ity anugṛhyainaṁ rāmanātho dvijottamāḥ nīlakaṇṭho virūpākṣo liṅgarūpe tirohitaḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो! 'ऐसा ही हो' कहकर उस पर अनुग्रह कर, नीलकंठ विरूपाक्ष रामनाथ लिंग-रूप में अंतर्धान हो गए।
श्लोक 130 (skanda.3.48.130)
राजापि रामनाथेन विहितानुग्रहस्ततः । रामनाथं नमस्कृत्य कृतार्थेनांतरात्मना
rājāpi rāmanāthena vihitānugrahas tataḥ rāmanāthaṁ namaskṛtya kṛtārthenāntarātmanā
रामनाथ द्वारा अनुग्रहीत हुआ वह राजा भी, रामनाथ को नमस्कार कर, कृतार्थ अंतरात्मा से,
श्लोक 131 (skanda.3.48.131)
स सेनासंवृतः प्रीतः प्रययावात्मनः पुरीम् । वृत्तांतमेतमवदन्मुनीनां वनवासिनाम्
sa senāsaṁvṛtaḥ prītaḥ prayayāv ātmanaḥ purīm vṛttāntam etam avadan munīnāṁ vanavāsinām
सेना से घिरा हुआ, प्रसन्न होकर अपनी नगरी को चला गया। वन-निवासी मुनियों को यह सारा वृत्तांत सुनाया।
श्लोक 132 (skanda.3.48.132)
तेभ्यषिंचन्नृपं राज्ये मुनयः प्रीतमानसाः । पुत्रदारयुतो राजा प्राप्य राज्यमकण्टकम्
tebhyo'ṣiñcan nṛpaṁ rājye munayaḥ prītamānasāḥ putradārayuto rājā prāpya rājyam akaṇṭakam
प्रसन्नचित्त मुनियों ने राजा का पुनः राज्याभिषेक किया। पुत्र-पत्नी सहित राजा ने निष्कंटक राज्य प्राप्त कर,
श्लोक 133 (skanda.3.48.133)
मंत्रिभिः सहितो विप्रा ररक्ष पृथिवीं चिरम् । ततोंतकाले संप्राप्ते ध्यायन्रामेश्वरं शिवम्
mantribhiḥ sahito viprā rarakṣa pṛthivīṁ ciram tato'ntakāle samprāpte dhyāyan rāmeśvaraṁ śivam
हे विप्रो! मंत्रियों सहित दीर्घकाल तक पृथ्वी का पालन किया। तत्पश्चात् अंतकाल के प्राप्त होने पर, शिव रामेश्वर का ध्यान करते हुए,
श्लोक 134 (skanda.3.48.134)
देहांते रामनाथस्य सायुज्यं प्रययौ शुभम् । एवं वः कथितं विप्रा रामनाथस्य वैभवम्
dehānte rāmanāthasya sāyujyaṁ prayayau śubham evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā rāmanāthasya vaibhavam
देह के अंत में रामनाथ के शुभ सायुज्य को प्राप्त हुआ। हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें रामनाथ का वैभव कहा,
श्लोक 135 (skanda.3.48.135)
चरितं पुण्यमाख्यानं शंकराख्य नृपस्य च । शृण्वन्पठन्वा मनुजस्त्विममध्यायमादरात्
caritaṁ puṇyam ākhyānaṁ śaṅkarākhya nṛpasya ca śṛṇvan paṭhan vā manujas tvam adhyāyam ādarāt
तथा शंकर नामक राजा का पुण्य चरितानुवाद भी। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस अध्याय को सुनता या पढ़ता है,
श्लोक 136 (skanda.3.48.136)
सर्वपापविनिर्मुक्तो रामनाथं समश्नुते
sarvapāpavinirmukto rāmanāthaṁ samaśnute
वह समस्त पापों से मुक्त होकर रामनाथ को प्राप्त करता है।