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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 49

राम आदि द्वारा रामनाथ-स्तोत्र का कथन

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50

श्लोक 1 (skanda.3.49.1)

श्रीसूत उवाच । अथातः संप्रवक्ष्यामि रामनाथस्य शूलिनः । स्तोत्राध्यायं महापुण्यं शृणुत श्रद्धया द्विजाः

śrīsūta uvāca athātaḥ sampravakṣyāmi rāmanāthasya śūlinaḥ stotrādhyāyaṁ mahāpuṇyaṁ śṛṇuta śraddhayā dvijāḥ

श्री सूत जी ने कहा — हे द्विजो! अब मैं त्रिशूलधारी रामनाथ के अत्यंत पुण्यमय स्तोत्र-अध्याय का वर्णन करूँगा; श्रद्धापूर्वक सुनो।

श्लोक 2 (skanda.3.49.2)

रामः प्रतिष्ठिते लिंगे तुष्टाव परमेश्वरम् । लक्ष्मणो जानकी सीता सुग्रीवाद्याः कपीश्वराः

rāmaḥ pratiṣṭhite liṅge tuṣṭāva parameśvaram lakṣmaṇo jānakī sītā sugrīvādyāḥ kapīśvarāḥ

लिंग की प्रतिष्ठा हो जाने पर राम ने परमेश्वर की स्तुति की। लक्ष्मण, जानकी सीता, तथा सुग्रीव आदि वानरराजों ने भी,

श्लोक 3 (skanda.3.49.3)

ब्रह्मप्रभृतयो देवाः कुम्भजाद्या महर्षयः । अस्तुवन्भक्तिसंयुक्ताः प्रत्येकं राघवेश्वरम्

brahmaprabhṛtayo devāḥ kumbhajādyā maharṣayaḥ astuvan bhaktisaṁyuktāḥ pratyekaṁ rāghaveśvaram

ब्रह्मा आदि देवताओं तथा अगस्त्य आदि महर्षियों ने भी भक्तियुक्त होकर प्रत्येक ने राघवेश्वर की स्तुति की।

श्लोक 4 (skanda.3.49.4)

तद्वक्ष्याम्यानुपूर्व्येण शृणुतादरपूर्वकम् । एतच्छ्रवणमात्रेण मुक्तः स्या न्मानवो द्विजाः

tad vakṣyāmy ānupūrvyeṇa śṛṇutādarapūrvakam etac chravaṇamātreṇa muktaḥ syān mānavo dvijāḥ

मैं उसे क्रमशः कहूँगा; श्रद्धापूर्वक सुनो। हे द्विजो! इसे सुनने मात्र से मनुष्य मुक्त हो जाता है।

श्लोक 5 (skanda.3.49.5)

श्रीराम उवाच । नमो महात्मने तुभ्यं महामायाय शूलिने । स्वपदांबुजभक्तार्तिहारिणे सर्प हारिणे

śrīrāma uvāca namo mahātmane tubhyaṁ mahāmāyāya śūline svapadāmbujabhaktārtihāriṇe sarpahāriṇe

श्रीराम ने कहा — हे महात्मन्! हे महामाया! हे त्रिशूलधारी! अपने चरण-कमल के भक्तों की पीड़ा हरने वाले, सर्प धारण करने वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 6 (skanda.3.49.6)

नमो देवाधिदेवाय रामनाथाय साक्षिणे । नमो वेदांतवेद्याय योगिनां तत्त्वदायिने

namo devādhidevāya rāmanāthāya sākṣiṇe namo vedāntavedyāya yogināṁ tattvadāyine

देवों के अधिदेव रामनाथ, साक्षी-स्वरूप को नमस्कार है। वेदांत से जानने योग्य, योगियों को तत्त्व प्रदान करने वाले को नमस्कार है।

श्लोक 7 (skanda.3.49.7)

सर्वदानंदपूर्णाय विश्वनाथाय शंभवे । नमो भक्तभयच्छेदहेतुपादाब्जरेणवे

sarvadānandapūrṇāya viśvanāthāya śambhave namo bhaktabhayacchedahetupādābjareṇave

सदा आनंद से परिपूर्ण, विश्वनाथ, शंभु-स्वरूप को नमस्कार है। भक्तों के भय को काटने के कारण-स्वरूप चरण-कमल की रज वाले को नमस्कार है।

श्लोक 8 (skanda.3.49.8)

नमस्तेऽखिलनाथाय नमः साक्षात्परात्मने । नमस्तेऽद्भुतवीर्याय महापातकनाशिने

namaste'khilanāthāya namaḥ sākṣāt parātmane namaste'dbhutavīryāya mahāpātakanāśine

समस्त लोक के स्वामी आपको नमस्कार है, साक्षात् परमात्मा-स्वरूप को नमस्कार है। अद्भुत वीर्य वाले, महापातकों के नाशक आपको नमस्कार है।

श्लोक 9 (skanda.3.49.9)

कालकालाय कालाय कालातीताय ते नमः । नमोऽविद्यानिहंत्रे ते नमः पापहराय च

kālakālāya kālāya kālātītāya te namaḥ namo'vidyānihantre te namaḥ pāpaharāya ca

काल के भी काल, काल-स्वरूप, काल से परे आपको नमस्कार है। अविद्या के नाशक आपको नमस्कार है, तथा पाप को हरने वाले को भी नमस्कार है।

श्लोक 10 (skanda.3.49.10)

नमः संसारतप्तानां तापनाशैकहेतवे । नमो मद्ब्रह्महत्याविनाशिने च विषाशिने

namaḥ saṁsārataptānāṁ tāpanāśaikahetave namo madbrahmahatyāvināśine ca viṣāśine

संसार से संतप्त प्राणियों के ताप के नाश के एकमात्र कारण-स्वरूप को नमस्कार है। मेरी ब्रह्महत्या के नाशक तथा विष का पान करने वाले को नमस्कार है।

श्लोक 11 (skanda.3.49.11)

नमस्ते पार्वतीनाथ कैलासनिलयाव्यय । गंगाधर विरूपाक्ष मां रक्ष सकलापदः

namaste pārvatīnātha kailāsanilayāvyaya gaṅgādhara virūpākṣa māṁ rakṣa sakalāpadaḥ

हे पार्वतीनाथ! हे कैलास-निवासी! हे अविनाशी! आपको नमस्कार है। हे गंगाधर! हे विरूपाक्ष! मुझे समस्त आपदाओं से बचाइए।

श्लोक 12 (skanda.3.49.12)

तुभ्यं पिनाकहस्ताय नमो मदनहारिणे । भूयोभूयो नमस्तुभ्यं सर्वावस्थासु सर्वदा

tubhyaṁ pinākahastāya namo madanahāriṇe bhūyo bhūyo namas tubhyaṁ sarvāvasthāsu sarvadā

पिनाक-धनुष को हाथ में धारण करने वाले, कामदेव का नाश करने वाले आपको नमस्कार है। समस्त अवस्थाओं में, सदा, आपको बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 13 (skanda.3.49.13)

लक्ष्मण उवाच । नमस्ते रामनाथाय त्रिपुरघ्नाय शंभवे । पार्वतीजीवितेशाय गणेशस्कन्दसूनवे

lakṣmaṇa uvāca namaste rāmanāthāya tripuraghnāya śambhave pārvatījīviteśāya gaṇeśaskandasūnave

लक्ष्मण ने कहा — हे रामनाथ! हे त्रिपुर के नाशक! हे शंभु! हे पार्वती के जीवनेश! हे गणेश-स्कंद के पिता! आपको नमस्कार है।

श्लोक 14 (skanda.3.49.14)

नमस्ते सूर्यचद्राग्निलोचनाय कपर्दिने । नमः शिवाय सोमाय मार्कंडेय भयच्छिदे

namaste sūryacandrāgnilocanāya kapardine namaḥ śivāya somāya mārkaṇḍeyabhayacchide

सूर्य-चंद्र-अग्नि नेत्रों वाले, जटाधारी आपको नमस्कार है। शिव, सोम-स्वरूप, मार्कण्डेय के भय को काटने वाले को नमस्कार है।

श्लोक 15 (skanda.3.49.15)

नमः सर्वप्रपंचस्य सृष्टिस्थित्यंतहेतवे । नम उग्राय भीमाय महादेवाय साक्षिणे

namaḥ sarvaprapañcasya sṛṣṭisthityantahetave nama ugrāya bhīmāya mahādevāya sākṣiṇe

समस्त जगत की सृष्टि, स्थिति, और संहार के कारण-स्वरूप को नमस्कार है। उग्र, भीम, साक्षी-स्वरूप महादेव को नमस्कार है।

श्लोक 16 (skanda.3.49.16)

सर्वज्ञाय वरेण्याय वरदाय वराय ते । श्रीकण्ठाय नमस्तुभ्यं पंचपातकभेदिने

sarvajñāya vareṇyāya varadāya varāya te śrīkaṇṭhāya namas tubhyaṁ pañcapātakabhedine

सर्वज्ञ, वरणीय, वरदाता, श्रेष्ठ आपको नमस्कार है। श्रीकंठ, पाँचों महापातकों को नष्ट करने वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 17 (skanda.3.49.17)

नमस्तेऽस्तु परानंदसत्यविज्ञानरूपिणे । नमस्ते भवरोगघ्न स्नायूनां पतये नमः

namaste'stu parānandasatyavijñānarūpiṇe namaste bhavarogaghna snāyūnāṁ pataye namaḥ

परम आनंद, सत्य-विज्ञान-स्वरूप आपको नमस्कार हो। हे संसार-रोग के नाशक! आपको नमस्कार है। स्नायुओं के स्वामी को नमस्कार है।

श्लोक 18 (skanda.3.49.18)

पतये तस्कराणां ते वनानां पतये नमः । गणानां पतये तुभ्यं विश्वरूपायसाक्षिणे

pataye taskarāṇāṁ te vanānāṁ pataye namaḥ gaṇānāṁ pataye tubhyaṁ viśvarūpāya sākṣiṇe

चोरों के स्वामी को, वनों के स्वामी को नमस्कार है। गणों के स्वामी, विश्वरूप, साक्षी-स्वरूप आपको नमस्कार है।

श्लोक 19 (skanda.3.49.19)

कर्मणा प्रेरितः शम्भो जनिष्ये यत्रयत्र तु । तत्रतत्र पदद्वंद्वे भवतो भक्तिरस्तु मे

karmaṇā preritaḥ śambho janiṣye yatra yatra tu tatra tatra padadvandve bhavato bhaktir astu me

हे शंभु! कर्म से प्रेरित होकर मैं जहाँ-जहाँ भी जन्म लूँ, वहाँ-वहाँ आपके चरण-युगल में मेरी भक्ति बनी रहे।

श्लोक 20 (skanda.3.49.20)

असन्मार्गे रतिर्मा भूद्भवतः कृपया मम । वैदिकाचारमार्गे च रतिः स्याद्भवते नमः

asanmārge ratir mā bhūd bhavataḥ kṛpayā mama vaidikācāramārge ca ratiḥ syād bhavate namaḥ

आपकी कृपा से मेरी रति अधर्म-मार्ग में न हो, अपितु वैदिक आचार के मार्ग में ही मेरी रति हो। आपको नमस्कार है।

श्लोक 21 (skanda.3.49.21)

सीतोवाच । परमकारण शंकर धूर्जटे गिरिसुतास्तनकुंकुमशोभित । मम पतौ परिदेहि मतिं सदा न विषमां परपूरुषगोचराम्

sītovāca paramakāraṇa śaṅkara dhūrjaṭe girisutāstanakuṅkumaśobhita mama patau paridehi matiṁ sadā na viṣamāṁ parapūruṣagocarām

सीता ने कहा — हे परम-कारण! हे शंकर! हे धूर्जटि! हे गिरि-पुत्री के स्तन के कुंकुम से शोभित! मेरी बुद्धि सदा मेरे पति में ही स्थिर रहे, कभी अन्य पुरुष की ओर विषम न हो, ऐसा वर दीजिए।

श्लोक 22 (skanda.3.49.22)

गंगाधर विरूपाक्ष नीललोहित शंकर । रामनाथ नमस्तुभ्यं रक्ष मा करुणाकर

gaṅgādhara virūpākṣa nīlalohita śaṅkara rāmanātha namas tubhyaṁ rakṣa mā karuṇākara

हे गंगाधर! हे विरूपाक्ष! हे नीललोहित! हे शंकर! हे रामनाथ! आपको नमस्कार है, हे करुणाकर! मेरी रक्षा कीजिए।

श्लोक 23 (skanda.3.49.23)

नमस्ते देवदेवेश नमस्ते करुणालय । नमस्ते भवभीतानां भवभीतिविमर्दन

namaste devadeveśa namaste karuṇālaya namaste bhavabhītānāṁ bhavabhītivimardana

हे देवों के देवेश! आपको नमस्कार है। हे करुणा के आगार! आपको नमस्कार है। हे संसार से भयभीतों के भय को मर्दन करने वाले! आपको नमस्कार है।

श्लोक 24 (skanda.3.49.24)

नाथ त्वदीयचरणांबुजचिंतनेन निर्द्धूय भास्करसुताद्भयमाशु शम्भो । नित्यत्वमाशु गतवान्स मृकंडुपुत्रः किं वा न सिध्यति तवाश्रयणात्परेश

nātha tvadīyacaraṇāmbujacintanena nirdhūya bhāskarasutād bhayam āśu śambho nityatvam āśu gatavān sa mṛkaṇḍuputraḥ kiṁ vā na sidhyati tavāśrayaṇāt pareśa

हे नाथ! हे शंभु! आपके चरण-कमल के चिंतन से भास्कर-पुत्र यम के भय को शीघ्र दूर कर, वह मृकण्डु-पुत्र मार्कण्डेय शीघ्र ही नित्यत्व को प्राप्त हुआ। हे परेश! आपकी शरण लेने से क्या सिद्ध नहीं होता?

श्लोक 25 (skanda.3.49.25)

परेशपरमानंद शरणागतपालक । पातिव्रत्यं मम सदा देहि तुभ्यं नमोनमः

pareśaparamānanda śaraṇāgatapālaka pātivratyaṁ mama sadā dehi tubhyaṁ namo namaḥ

हे परमेश्वर! हे परमानंद! हे शरणागतों के पालक! मुझे सदा पातिव्रत्य प्रदान कीजिए। आपको बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 26 (skanda.3.49.26)

हनूमानुवाच । देवदेव जगन्नाथ रामनाथ कृपानिधे । त्वत्पादांभोरुहगता निश्चला भक्तिरस्तु मे

hanūmān uvāca devadeva jagannātha rāmanātha kṛpānidhe tvatpādāmbhoruhagatā niścalā bhaktir astu me

हनुमान ने कहा — हे देवों के देव! हे जगन्नाथ! हे रामनाथ! हे कृपा-निधि! आपके चरण-कमल में गई हुई मेरी भक्ति अटल हो।

श्लोक 27 (skanda.3.49.27)

यं विना न जगत्सत्ता तद्भानमपि नो भवेत् । नमः सद्भानरूपाय रामनाथाय शंभवे

yaṁ vinā na jagatsattā tadbhānam api no bhavet namaḥ sadbhānarūpāya rāmanāthāya śambhave

जिसके बिना जगत का अस्तित्व नहीं है, और जिसका ज्ञान भी नहीं होता — सत्-रूप, ज्ञान-स्वरूप रामनाथ शंभु को नमस्कार है।

श्लोक 28 (skanda.3.49.28)

अंगद उवाच । यस्य भासा जगद्भानं यत्प्रकाशं विना जगत् । न भासते नमस्तस्मै रामनाथाय शंभवे

aṅgada uvāca yasya bhāsā jagadbhānaṁ yatprakāśaṁ vinā jagat na bhāsate namas tasmai rāmanāthāya śambhave

अंगद ने कहा — जिसकी प्रभा से जगत का ज्ञान होता है, जिसके प्रकाश के बिना जगत प्रकाशित नहीं होता — उस रामनाथ शंभु को नमस्कार है।

श्लोक 29 (skanda.3.49.29)

जांबुवानुवाच । सर्वानंदो यदानंदो भासते परमार्थतः । नमो रामेश्वरायास्मै परमानंदरूपिणे

jāmbuvān uvāca sarvānando yad ānando bhāsate paramārthataḥ namo rāmeśvarāyāsmai paramānandarūpiṇe

जाम्बवान ने कहा — जिससे समस्त आनंद परमार्थ रूप से प्रकाशित होता है — उस परमानंद-स्वरूप रामेश्वर को नमस्कार है।

श्लोक 30 (skanda.3.49.30)

नील उवाच । यद्देशकालदिग्भेदैरभिन्नं सर्वदा द्वयम् । तस्मै रामेश्वरायास्मै नमोऽभिन्नस्व रूपिणे

nīla uvāca yad deśakāladigbhedair abhinnaṁ sarvadā dvayam tasmai rāmeśvarāyāsmai namo'bhinnasvarūpiṇe

नील ने कहा — जो देश, काल, तथा दिशा के भेदों से सदा अभिन्न, अद्वैत है — उस अभिन्न-स्वरूप रामेश्वर को नमस्कार है।

श्लोक 31 (skanda.3.49.31)

नल उवाच । ब्रह्मविष्णुमहेशाना यदविद्याविजृंभिताः । नमोऽविद्याविहीनाय तस्मै रामेश्वराय ते

nala uvāca brahmaviṣṇumaheśānā yad avidyāvijṛmbhitāḥ namo'vidyāvihīnāya tasmai rāmeśvarāya te

नल ने कहा — जिस अविद्या के कारण ब्रह्मा-विष्णु-महेश के भेद प्रकट हुए हैं — उस अविद्या-रहित रामेश्वर को नमस्कार है।

श्लोक 32 (skanda.3.49.32)

कुमुद उवाच । यस्त्वरूपापरिज्ञानात्प्रधानं कारणत्वतः । कल्पितं कारणायास्मै रामनाथाय शंभवे

kumuda uvāca yas tv arūpāparijñānāt pradhānaṁ kāraṇatvataḥ kalpitaṁ kāraṇāyāsmai rāmanāthāya śambhave

कुमुद ने कहा — जिस स्वरूप के अपरिज्ञान से प्रधान को कारणत्व से कल्पित किया जाता है — उस कारण-स्वरूप रामनाथ शंभु को नमस्कार है।

श्लोक 33 (skanda.3.49.33)

पनस उवाच । जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादियदविद्याविजृंभितम् । जाग्रदादिविहीनाय नमोऽस्मै ज्ञानरूपिणे

panasa uvāca jāgratsvapnasuṣuptyādi yad avidyāvijṛmbhitam jāgradādivihīnāya namo'smai jñānarūpiṇe

पनस ने कहा — जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि जिस अविद्या से प्रकट होते हैं — जाग्रत आदि से रहित, ज्ञान-स्वरूप उसे नमस्कार है।

श्लोक 34 (skanda.3.49.34)

गज उवाच । यत्स्वरूपापरिज्ञानात्कार्याणां परमा णवः । कल्पिताः कारणत्वेन तार्किकापसदैर्वृथा

gaja uvāca yat svarūpāparijñānāt kāryāṇāṁ paramāṇavaḥ kalpitāḥ kāraṇatvena tārkikāpasadair vṛthā

गज ने कहा — जिसके स्वरूप के अपरिज्ञान से नीच तार्किकों द्वारा व्यर्थ ही परमाणुओं को कार्यों के कारण-रूप में कल्पित किया जाता है,

श्लोक 35 (skanda.3.49.35)

तमहं परमानंदं रामनाथं महेश्वरम् । आत्मरूपतया नित्यमुपासे सर्वसाक्षिणम्

tam ahaṁ paramānandaṁ rāmanāthaṁ maheśvaram ātmarūpatayā nityam upāse sarvasākṣiṇam

उस परमानंद-स्वरूप, सर्व-साक्षी महेश्वर रामनाथ की मैं आत्म-रूप से सदा उपासना करता हूँ।

श्लोक 36 (skanda.3.49.36)

गवाक्ष उवाच । अज्ञानपाशबद्धानां पशूनां पाशमोचकम् । रामेश्वरं शिवं शांतमुपैमि शरणं सदा

gavākṣa uvāca ajñānapāśabaddhānāṁ paśūnāṁ pāśamocakam rāmeśvaraṁ śivaṁ śāntam upaimi śaraṇaṁ sadā

गवाक्ष ने कहा — अज्ञान-पाश से बंधे हुए पशुओं के पाश को मुक्त करने वाले, शांत रामेश्वर शिव की मैं सदा शरण लेता हूँ।

श्लोक 37 (skanda.3.49.37)

गवय उवाच । साध्वस्तजगदाधारं चंद्रचूडमुमापतिम् । रामनाथं शिवं वन्दे संसारामयभेषजम्

gavaya uvāca sādhvastajagadādhāraṁ candracūḍam umāpatim rāmanāthaṁ śivaṁ vande saṁsārāmayabheṣajam

गवय ने कहा — साधु-जनों द्वारा प्रशंसित, जगत के आधार, चंद्र-चूड़, उमापति, संसार-रोग की औषधि-स्वरूप रामनाथ शिव को मैं वंदन करता हूँ।

श्लोक 38 (skanda.3.49.38)

शरभ उवाच । अंतःकरणमात्मेति यदज्ञानाद्विमोहितैः । भण्यते रामनाथं तमात्मानं प्रणमाम्यहम्

śarabha uvāca antaḥkaraṇam ātmeti yad ajñānād vimohitaiḥ bhaṇyate rāmanāthaṁ tam ātmānaṁ praṇamāmy aham

शरभ ने कहा — जिसे अज्ञान से मोहित लोग अंतःकरण को ही आत्मा कहते हैं — उस आत्म-स्वरूप रामनाथ को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 39 (skanda.3.49.39)

गन्धमादन उवाच । रामनाथमुमानाथं गणनाथं च त्र्यंबकम् । सर्वपातकशुद्ध्यर्थमुपासे जगदीश्वरम्

gandhamādana uvāca rāmanātham umānāthaṁ gaṇanāthaṁ ca tryambakam sarvapātakaśuddhyartham upāse jagadīśvaram

गन्धमादन ने कहा — उमानाथ, गणनाथ, त्रिनेत्र, जगदीश्वर रामनाथ की मैं समस्त पापों की शुद्धि के लिए उपासना करता हूँ।

श्लोक 40 (skanda.3.49.40)

सुग्रीव उवाच । संसारांभोधि मध्ये मां जन्ममृत्युजले भये । पुत्रदारधनक्षेत्रवीचिमालासमाकुले

sugrīva uvāca saṁsārāmbodhi madhye māṁ janmamṛtyujale bhaye putradāradhanakṣetravīcimālāsamākule

सुग्रीव ने कहा — जन्म-मृत्यु रूपी भयावह जल वाले, पुत्र-पत्नी-धन-क्षेत्र रूपी लहरों की माला से व्याप्त, इस संसार-सागर के मध्य,

श्लोक 41 (skanda.3.49.41)

मज्जद्ब्रह्मांडखंडे च पतितं नाप्तपारकम् । क्रोशंतमवशं दीनं विषयव्या लकातरम्

majjadbrahmāṇḍakhaṇḍe ca patitaṁ nāptapārakam krośantam avaśaṁ dīnaṁ viṣayavyālakātaram

ब्रह्मांड के टुकड़ों में डूबे हुए, गिरे हुए, तट न पाने वाले, चिल्लाते हुए, असहाय, दीन, विषय-सर्पों से व्याकुल मुझे,

श्लोक 42 (skanda.3.49.42)

व्याधिनक्रसमुद्विग्नं तापत्रयझषार्तिदम् । मां रक्ष गिरिजानाथ रामनाथ नमोऽस्तु ते

vyādhinakrasamudvignaṁ tāpatrayajhaṣārtidam māṁ rakṣa girijānātha rāmanātha namo'stu te

रोग रूपी मगरमच्छों से उद्विग्न, त्रिविध ताप रूपी मछलियों से पीड़ित मुझे — हे गिरिजानाथ! हे रामनाथ! मेरी रक्षा कीजिए, आपको नमस्कार है।

श्लोक 43 (skanda.3.49.43)

विभीषण उवाच । संसारवनमध्ये मां विनष्टनिजमार्गके । व्याधिचौरे क्रोधसिंहे जन्मव्याघ्रे लयोरगे

vibhīṣaṇa uvāca saṁsāravanamadhye māṁ vinaṣṭanijamārgake vyādhicaure krodhasiṁhe janmavyāghre layorage

विभीषण ने कहा — जिसका अपना मार्ग नष्ट हो गया है, ऐसे मुझ को, रोग रूपी चोर, क्रोध रूपी सिंह, जन्म रूपी व्याघ्र, तथा प्रलय रूपी सर्प वाले इस संसार-वन के मध्य में,

श्लोक 44 (skanda.3.49.44)

बाल्ययौवनवार्धक्यमहाभीमांधकूपके । क्रोधेर्ष्या लोभवह्नौ च विषयक्रूरपर्वते

bālyayauvanavārdhakyamahābhīmāndhakūpake krodherṣyālobhavahnau ca viṣayakrūraparvate

बाल्य-यौवन-वार्धक्य रूपी महाभयंकर अंधे कुएँ वाले, क्रोध-ईर्ष्या-लोभ रूपी अग्नि वाले, विषय रूपी क्रूर पर्वत वाले,

श्लोक 45 (skanda.3.49.45)

त्रासभूकंटकाढ्ये च सीदंतमधुनांधकम् । शोभनां पदवीं शंभो नय रामेश्वराधुना

trāsabhūkaṇṭakāḍhye ca sīdantam adhunāndhakam śobhanāṁ padavīṁ śambho naya rāmeśvarādhunā

भय रूपी भूमि के काँटों से भरे हुए इस वन में, अंधे होकर डूबते हुए मुझे, हे शंभु! हे रामेश्वर! अभी शोभन पद पर ले चलिए।

श्लोक 46 (skanda.3.49.46)

सर्वे वानरा ऊचुः । निंद्यानिंद्येषु सर्वत्र जनित्वा योनिषु प्रभो । कुंभीपाकादिनरके पतित्वा च पुनस्तथा

sarve vānarā ūcuḥ nindyānindyeṣu sarvatra janitvā yoniṣu prabho kumbhīpākādinarake patitvā ca punas tathā

समस्त वानरों ने कहा — हे प्रभो! निंद्य और अनिंद्य, समस्त योनियों में जन्म लेकर, तथा कुंभीपाक आदि नरकों में गिरकर, फिर उसी प्रकार,

श्लोक 47 (skanda.3.49.47)

जनित्वा च पुनर्योनौ कर्मशेषेण कुत्सिते । संसारे पतितानस्मान्रामनाथ दयानिधे

janitvā ca punar yonau karmaśeṣeṇa kutsite saṁsāre patitān asmān rāmanātha dayānidhe

शेष कर्मों के कारण फिर किसी नीच योनि में जन्म लेकर, इस संसार में गिरे हुए हम सबको, हे रामनाथ! हे दया-निधि!

श्लोक 48 (skanda.3.49.48)

अनाथान्विवशान्दीनान्क्रोशतः पाहि शंकर । नमस्तेस्तु दयासिंधो रामनाथ महेश्वर

anāthān vivaśān dīnān krośataḥ pāhi śaṅkara namaste'stu dayāsindho rāmanātha maheśvara

अनाथ, असहाय, दीन, चिल्लाते हुए हम सबकी रक्षा कीजिए, हे शंकर! आपको नमस्कार हो, हे दया के सागर! हे रामनाथ महेश्वर!

श्लोक 49 (skanda.3.49.49)

ब्रह्मोवाच । नमस्ते लोकनाथाय रामनाथाय शंभवे । प्रसीद मम सर्वेश मदविद्यां विनाशय

brahmovāca namaste lokanāthāya rāmanāthāya śambhave prasīda mama sarveśa madavidyāṁ vināśaya

ब्रह्मा ने कहा — लोकनाथ, रामनाथ, शंभु-स्वरूप आपको नमस्कार है। हे सर्वेश! प्रसन्न होइए, मेरी अविद्या का नाश कीजिए।

श्लोक 50 (skanda.3.49.50)

इंद्र उवाच । यस्य शक्तिरुमा देवी जगन्माता त्रयीमयी । तमहं शंकरं वंदे रामनाथमुमापतिम्

indra uvāca yasya śaktir umā devī jaganmātā trayīmayī tam ahaṁ śaṅkaraṁ vande rāmanātham umāpatim

इंद्र ने कहा — जिनकी शक्ति देवी उमा हैं, जगत की माता, त्रयी-स्वरूपा — उस उमापति शंकर रामनाथ को मैं वंदन करता हूँ।

श्लोक 51 (skanda.3.49.51)

यम उवाच । पुत्रौ गणेश्वरस्कंदौ वृषो यस्य च वाहनम् । तं वै रामेश्वरं सेवे सर्वाज्ञाननिवृत्तये

yama uvāca putrau gaṇeśvaraskandau vṛṣo yasya ca vāhanam taṁ vai rāmeśvaraṁ seve sarvājñānanivṛttaye

यम ने कहा — गणेश्वर और स्कंद जिनके पुत्र हैं, वृषभ जिनका वाहन है — उस रामेश्वर की मैं समस्त अज्ञान की निवृत्ति के लिए सेवा करता हूँ।

श्लोक 52 (skanda.3.49.52)

वरुण उवाच । यस्य पूजाप्रभावेन जित मृत्युर्मृकंडुजः । मृत्युंजयमुपासेऽहं रामनाथं हृदा तु तम्

varuṇa uvāca yasya pūjāprabhāveṇa jitamṛtyur mṛkaṇḍujaḥ mṛtyuñjayam upāse'haṁ rāmanāthaṁ hṛdā tu tam

वरुण ने कहा — जिनकी पूजा के प्रभाव से मृकण्डु-पुत्र मार्कण्डेय ने मृत्यु को जीत लिया — उस मृत्युंजय रामनाथ की मैं हृदय से उपासना करता हूँ।

श्लोक 53 (skanda.3.49.53)

कुबेर उवाच । ईश्वराय लसत्कर्णकुंडलाभरणाय ते । लाक्षारुणशरीराय नमो रामेश्वराय वै

kubera uvāca īśvarāya lasatkarṇakuṇḍalābharaṇāya te lākṣāruṇaśarīrāya namo rāmeśvarāya vai

कुबेर ने कहा — ईश्वर, चमकते कर्ण-कुंडल आभूषण वाले, लाक्षा के समान लाल शरीर वाले, रामेश्वर आपको नमस्कार है।

श्लोक 54 (skanda.3.49.54)

आदित्य उवाच । नमस्तेऽस्तु महादेव रामनाथ त्रियंबक । दक्षाध्वरविनाशाय नमस्ते पाहि मां शिव

āditya uvāca namaste'stu mahādeva rāmanātha triyambaka dakṣādhvaravināśāya namaste pāhi māṁ śiva

आदित्य ने कहा — हे महादेव! हे रामनाथ! हे त्रिनेत्र! आपको नमस्कार हो। दक्ष के यज्ञ के विनाशक को नमस्कार है, हे शिव! मेरी रक्षा कीजिए।

श्लोक 55 (skanda.3.49.55)

सोम उवाच । नमस्ते भस्मदिग्धाय शूलिने सर्पमालिने । रामनाथ दयांभोधे स्मशाननिलयाय ते

soma uvāca namaste bhasmadigdhāya śūline sarpamāline rāmanātha dayāmbhodhe śmaśānanilayāya te

सोम ने कहा — भस्म से लिप्त, त्रिशूलधारी, सर्प-माला वाले आपको नमस्कार है। हे रामनाथ! हे दया के सागर! श्मशान-निवासी आपको नमस्कार है।

श्लोक 56 (skanda.3.49.56)

अग्निरुवाच । इन्द्राद्यखिलदिक्पालसंसेवितपदांबुज । रामनाथाय शुद्धाय नमो दिग्वाससे सदा

agnir uvāca indrādyakhiladikpālasaṁsevitapadāmbuja rāmanāthāya śuddhāya namo digvāsase sadā

अग्नि ने कहा — इंद्र आदि समस्त दिक्पालों द्वारा सेवित चरण-कमल वाले, शुद्ध, दिशाओं को ही वस्त्र मानने वाले रामनाथ को सदा नमस्कार है।

श्लोक 57 (skanda.3.49.57)

वायुरुवाच । हराय हरिरूपाय व्याघ्रचर्मांबराय च । रामनाथ नमस्तुभ्यं ममाभीष्टप्रदो भव

vāyur uvāca harāya harirūpāya vyāghracarmāmbarāya ca rāmanātha namas tubhyaṁ mamābhīṣṭaprado bhava

वायु ने कहा — हर, विष्णु-रूप, व्याघ्रचर्म-वस्त्रधारी को नमस्कार। हे रामनाथ! आपको नमस्कार है, मेरे अभीष्ट को प्रदान करने वाले होइए।

श्लोक 58 (skanda.3.49.58)

बृहस्पतिरुवाच । अहंतासाक्षिणे नित्यं प्रत्यगद्वयवस्तुने । रामनाथ ममाज्ञानमाशु नाशय ते नमः

bṛhaspatir uvāca ahantāsākṣiṇe nityaṁ pratyagadvayavastune rāmanātha mamājñānam āśu nāśaya te namaḥ

बृहस्पति ने कहा — अहंता के साक्षी, नित्य, अंतरात्मा-रूप अद्वैत वस्तु-स्वरूप को नमस्कार है। हे रामनाथ! मेरे अज्ञान को शीघ्र नष्ट कीजिए, आपको नमस्कार है।

श्लोक 59 (skanda.3.49.59)

शुक्र उवाच । वंचकानामलभ्याय महामंत्रार्थरूपिणे । नमो द्वैतविहीनाय रामनाथाय शंभवे

śukra uvāca vañcakānām alabhyāya mahāmantrārtharūpiṇe namo dvaitavihīnāya rāmanāthāya śambhave

शुक्र ने कहा — छलियों को अप्राप्य, महामंत्र के अर्थ-स्वरूप, द्वैत-रहित रामनाथ शंभु को नमस्कार है।

श्लोक 60 (skanda.3.49.60)

अश्विनावूचतुः । आत्मरूपतया नित्यं योगिनां भासते हृदि । अनन्य भानवेद्याय नमस्ते राघवेश्वर

aśvinau ūcatuḥ ātmarūpatayā nityaṁ yogināṁ bhāsate hṛdi ananyabhānavedyāya namaste rāghaveśvara

अश्विनी कुमारों ने कहा — जो आत्म-रूप से सदा योगियों के हृदय में प्रकाशित होते हैं, अनन्य ज्ञान से जानने योग्य आपको, हे राघवेश्वर! नमस्कार है।

श्लोक 61 (skanda.3.49.61)

अगस्त्य उवाच । आदिदेव महादेव विश्वेश्वर शिवाव्यय । रामनाथांबिकानाथ प्रसीद वृष भध्वज

agastya uvāca ādideva mahādeva viśveśvara śivāvyaya rāmanāthāmbikānātha prasīda vṛṣabhadhvaja

अगस्त्य ने कहा — हे आदिदेव! हे महादेव! हे विश्वेश्वर! हे अविनाशी शिव! हे रामनाथ! हे अंबिका-नाथ! प्रसन्न होइए, हे वृषभ-ध्वज!

श्लोक 62 (skanda.3.49.62)

अपराधसहस्रं मे क्षमस्व विधुशेखर । ममाहमिति पुत्रादावहंतां मम मोचय

aparādhasahasraṁ me kṣamasva vidhuśekhara mamāham iti putrādāv ahantāṁ mama mocaya

हे विधुशेखर! मेरे हज़ारों अपराधों को क्षमा कीजिए। पुत्र आदि में 'मैं' और 'मेरा' की जो अहंता है, उससे मुझे मुक्त कीजिए।

श्लोक 63 (skanda.3.49.63)

सुतीक्ष्ण उवाच । क्षेत्राणि रत्नानि धनानि दारा मित्राणि वस्त्राणि गवाश्वपुत्राः । नैवोपकाराय हि रामनाथ मह्यं प्रयच्छ त्वमतो विरक्तिम्

sutīkṣṇa uvāca kṣetrāṇi ratnāni dhanāni dārā mitrāṇi vastrāṇi gavāśvaputrāḥ naivopakārāya hi rāmanātha mahyaṁ prayaccha tvam ato viraktim

सुतीक्ष्ण ने कहा — क्षेत्र, रत्न, धन, पत्नी, मित्र, वस्त्र, गाय, अश्व, पुत्र — ये सब उपकार के लिए नहीं हैं। हे रामनाथ! अतः आप मुझे इनसे विरक्ति प्रदान कीजिए।

श्लोक 64 (skanda.3.49.64)

विश्वामित्र उवाच । श्रुतानि शास्त्राण्यपि निष्फलानि त्रय्यप्यधीता विफलैव नूनम् । त्वयीश्वरे चेन्न भवेद्धि भक्तिः श्रीरामनाथे शिव मानुषस्य

viśvāmitra uvāca śrutāni śāstrāṇy api niṣphalāni trayy apy adhītā viphalaiva nūnam tvayīśvare cen na bhaved dhi bhaktiḥ śrīrāmanāthe śiva mānuṣasya

विश्वामित्र ने कहा — यदि मनुष्य की भक्ति ईश्वर श्री रामनाथ शिव में न हो, तो सुने हुए शास्त्र भी निष्फल हैं, तथा पढ़ी हुई त्रयी भी निश्चय ही निष्फल है।

श्लोक 65 (skanda.3.49.65)

गालव उवाच । दानानि यज्ञा नियमास्तपांसि गंगादितीर्थेषु निमज्जनानि । रामेश्वरं त्वां न नमंति ये तु व्यर्थानि तेषामिति निश्चयोऽत्र

gālava uvāca dānāni yajñā niyamās tapāṁsi gaṅgāditīrtheṣu nimajjanāni rāmeśvaraṁ tvāṁ na namanti ye tu vyarthāni teṣām iti niścayo'tra

गालव ने कहा — जो लोग रामेश्वर आपको नमस्कार नहीं करते, उनके दान, यज्ञ, नियम, तप, तथा गंगा आदि तीर्थों में स्नान — ये सब व्यर्थ हैं, ऐसा यहाँ निश्चय है।

श्लोक 66 (skanda.3.49.66)

वसिष्ठ उवाच । कृत्वापि पापान्यखिलानि लोकस्त्वामेत्य रामेश्वर भक्तियुक्तः । नमेत चेत्तानि लयं व्रजेयुर्यथांधकारो रवितेजसाऽद्धा

vasiṣṭha uvāca kṛtvāpi pāpāny akhilāni lokas tvām etya rāmeśvara bhaktiyuktaḥ nameta cet tāni layaṁ vrajeyur yathāndhakāro ravitejasāddhā

वसिष्ठ ने कहा — हे रामेश्वर! समस्त पाप करके भी, यदि मनुष्य आपके पास आकर भक्तियुक्त होकर नमस्कार करे, तो वे पाप वैसे ही विलीन हो जाएँ, जैसे सूर्य के तेज से अंधकार सचमुच विलीन हो जाता है।

श्लोक 67 (skanda.3.49.67)

अत्रिरुवाच । दृष्ट्वा तु रामेश्वरमेकदापि स्पृष्ट्वा नमस्कृत्य भवंतमीशम् । पुनर्न गर्भं स नरः प्रयायात्किं त्वद्वयं ते लभतं स्वरूपम्

atrir uvāca dṛṣṭvā tu rāmeśvaram ekadāpi spṛṣṭvā namaskṛtya bhavantam īśam punar na garbhaṁ sa naraḥ prayāyāt kiṁ tv advayaṁ te labhataṁ svarūpam

अत्रि ने कहा — रामेश्वर का एक बार भी दर्शन कर, स्पर्श कर, हे ईश! आपको नमस्कार कर, वह मनुष्य पुनः गर्भ को नहीं प्राप्त होता — तो क्या वह आपके अद्वैत स्वरूप को नहीं प्राप्त करता?

श्लोक 68 (skanda.3.49.68)

अंगिरा उवाच । यो रामनाथं मनुजो भवंतमुपेत्य बंधून्प्रणमन्स्मरेत । संतारयेत्तानपि सर्वपापात्किम द्भुतं तस्य कृतार्थतायाम्

aṅgirā uvāca yo rāmanāthaṁ manujo bhavantam upetya bandhūn praṇaman smareta saṁtārayet tān api sarvapāpāt kim adbhutaṁ tasya kṛtārthatāyām

अंगिरा ने कहा — जो मनुष्य आप रामनाथ के पास आकर अपने बंधुओं को प्रणाम करते हुए स्मरण करता है, वह उन्हें भी समस्त पापों से पार कर देता है — उसकी कृतार्थता में कौन-सा आश्चर्य है?

श्लोक 69 (skanda.3.49.69)

गौतम उवाच । श्रीरामनाथेश्वर गूढमेत्तद्रहस्यभूतं परमं विशोकम् । त्वत्पादमूलं भजतां नृणां ये सेवां प्रकुर्वंति हि तेऽपि धन्याः

gautama uvāca śrīrāmanātheśvara gūḍham etad rahasyabhūtaṁ paramaṁ viśokam tvatpādamūlaṁ bhajatāṁ nṛṇāṁ ye sevāṁ prakurvanti hi te'pi dhanyāḥ

गौतम ने कहा — हे श्री रामनाथेश्वर! यह गूढ़, रहस्य-भूत, परम शोक-रहित है। आपके चरण-मूल को भजने वाले मनुष्यों की जो सेवा करते हैं, वे भी धन्य हैं।

श्लोक 70 (skanda.3.49.70)

शतानंद उवाच । वेदांतविज्ञानरहस्यविद्भिर्विज्ञेयमेतद्धि मुमुक्षुभिस्तु । शास्त्राणि सर्वाणि विहाय देव त्वत्सेवनं यद्रघुवीरनाथ

śatānanda uvāca vedāntavijñānarahasyavidbhir vijñeyam etaddhi mumukṣubhis tu śāstrāṇi sarvāṇi vihāya deva tvatsevanaṁ yad raghuvīranātha

शतानंद ने कहा — वेदांत-विज्ञान के रहस्य को जानने वाले मुमुक्षुओं द्वारा ही यह जानने योग्य है, हे देव! हे रघुवीर-नाथ! कि समस्त शास्त्रों को त्यागकर भी आपकी सेवा ही सर्वोपरि है।

श्लोक 71 (skanda.3.49.71)

भृगुरुवाच । रामनाथ तव पादपंकजं द्वंद्वचिंतनविधूतकल्मषः । निर्भयं व्रजति सत्सुखाद्वयं सुप्रभं त्वथ अमोघचिद्धनम्

bhṛgur uvāca rāmanātha tava pādapaṅkajaṁ dvandvacintanavidhūtakalmaṣaḥ nirbhayaṁ vrajati satsukhādvayaṁ suprabhaṁ tv atha amoghacidghanam

भृगु ने कहा — हे रामनाथ! आपके चरण-कमल-युगल का चिंतन कर, पाप से रहित हुआ मनुष्य निर्भय होकर, सत्-सुख से अभिन्न, तेजस्वी, अमोघ चित्-घन स्वरूप को प्राप्त होता है।

श्लोक 72 (skanda.3.49.72)

कुत्स उवाच । रामनाथ तव पादसेवनं भोगमोक्षवरदं नृणां सदा । रौरवादिनरकप्रणाशनं कः पुमान्न भजते रसग्रहः

kutsa uvāca rāmanātha tava pādasevanaṁ bhogamokṣavaradaṁ nṛṇāṁ sadā rauravādinarakapraṇāśanaṁ kaḥ pumān na bhajate rasagrahaḥ

कुत्स ने कहा — हे रामनाथ! आपके चरणों की सेवा मनुष्यों को सदा भोग और मोक्ष दोनों देने वाली है, रौरव आदि नरकों का नाशक है। कौन-सा रस-ग्राही पुरुष इसे नहीं भजेगा?

श्लोक 73 (skanda.3.49.73)

काश्यप उवाच । रामनाथ तव पादसेविनां किं व्रतैरुत तपोभिरध्वरैः । वेदशास्त्र जपचिन्तया च किं स्वर्गसिन्धुपयसापि किं फलम्

kāśyapa uvāca rāmanātha tava pādasevināṁ kiṁ vratair uta tapobhir adhvaraiḥ vedaśāstrajapacintayā ca kiṁ svargasindhupayasāpi kiṁ phalam

काश्यप ने कहा — हे रामनाथ! आपके चरणों की सेवा करने वालों को व्रतों से क्या, तपों से क्या, यज्ञों से क्या? वेद-शास्त्र, जप, चिंतन से भी क्या, तथा स्वर्ग-गंगा के जल से भी क्या फल?

श्लोक 74 (skanda.3.49.74)

श्रीरामनाथ त्वमागत्य शीघ्रं ममोत्क्रांतिकाले भवान्या च साकम् । मां प्रापय स्वात्मपादारविन्दं विशोकं विमोहं सुखं चित्स्वरूपम्

śrīrāmanātha tvam āgatya śīghraṁ mamotkrāntikāle bhavānyā ca sākam māṁ prāpaya svātmapādāravindaṁ viśokaṁ vimohaṁ sukhaṁ cit svarūpam

हे श्री रामनाथ! मेरी मृत्यु के समय भवानी सहित शीघ्र पधारकर, मुझे अपने चरण-कमल तक, शोक-रहित, मोह-रहित, सुखमय, चित्-स्वरूप तक पहुँचाइए।

श्लोक 75 (skanda.3.49.75)

गन्धर्वा ऊचुः । रामनाथ त्वमस्माकं भजतां भवसागरे । अपारे दुःखकल्लोले न त्वत्तोन्या गतिर्हि नः

gandharvā ūcuḥ rāmanātha tvam asmākaṁ bhajatāṁ bhavasāgare apāre duḥkhakallole na tvattonyā gatir hi naḥ

गंधर्वों ने कहा — हे रामनाथ! दुःख की लहरों वाले, अपार भव-सागर में, आपको भजने वाले हम लोगों की, आपके अतिरिक्त और कोई गति नहीं है।

श्लोक 76 (skanda.3.49.76)

किन्नरा ऊचुः । रामनाथ भवारण्ये व्याधिव्याघ्रभयानके । त्वामंतरेण नास्माकं पदवीदर्शको भवेत्

kinnarā ūcuḥ rāmanātha bhavāraṇye vyādhivyāghrabhayānake tvām antareṇa nāsmākaṁ padavīdarśako bhavet

किन्नरों ने कहा — हे रामनाथ! रोग रूपी व्याघ्रों से भयानक इस संसार-वन में, आपके बिना हमारे लिए मार्ग दिखाने वाला कोई नहीं है।

श्लोक 77 (skanda.3.49.77)

यक्षा ऊचुः । रामनाथेंद्रियारातिबाधा नो दुःसहा सदा । तान्विजेतुं सहायस्त्वमस्माकं भव धूर्जटे

yakṣā ūcuḥ rāmanāthendriyārātibādhā no duḥsahā sadā tān vijetuṁ sahāyas tvam asmākaṁ bhava dhūrjaṭe

यक्षों ने कहा — हे रामनाथ! इंद्रिय-शत्रुओं की बाधा हमारे लिए सदा असह्य है। हे धूर्जटि! उन्हें जीतने के लिए आप हमारे सहायक होइए।

श्लोक 78 (skanda.3.49.78)

नागा ऊचुः । अचिन्त्यमहिमानं त्वा रामनाथ वयं कथम् । स्तोतुमल्पधियः शक्ता भविष्यामोंऽबिकापते

nāgā ūcuḥ acintyamahimānaṁ tvā rāmanātha vayaṁ katham stotum alpadhiyaḥ śaktā bhaviṣyāmo'mbikāpate

नागों ने कहा — हे रामनाथ! अचिंत्य महिमा वाले आपकी स्तुति करने में हम अल्प-बुद्धि वाले कैसे समर्थ हो सकते हैं, हे अंबिकापते!

श्लोक 79 (skanda.3.49.79)

किंपुरुषा ऊचुः । नानायोनौ च जननं मरणं चाप्यनेकशः । विनाशय तथाऽज्ञानं रामनाथ नमोऽस्तु ते

kiṁpuruṣā ūcuḥ nānāyonau ca jananaṁ maraṇaṁ cāpy anekaśaḥ vināśaya tathājñānaṁ rāmanātha namo'stu te

किंपुरुषों ने कहा — नाना योनियों में बार-बार जन्म और मरण को, तथा उसी प्रकार अज्ञान को भी, हे रामनाथ! नष्ट कीजिए, आपको नमस्कार है।

श्लोक 80 (skanda.3.49.80)

विद्याधरा ऊचुः । अंबिकापतये तुभ्यमसंगाय महात्मने । नमस्ते रामनाथाय प्रसीद वृषभध्वज

vidyādharā ūcuḥ ambikāpataye tubhyam asaṅgāya mahātmane namaste rāmanāthāya prasīda vṛṣabhadhvaja

विद्याधरों ने कहा — अंबिका के पति, असंग, महात्मा आपको नमस्कार है। हे रामनाथ! हे वृषभ-ध्वज! प्रसन्न होइए।

श्लोक 81 (skanda.3.49.81)

वसव ऊचुः । रामनाथगणेशाय गणवृंदार्चितांघ्रये । गंगाधराय गुह्याय नमस्ते पाहि नः सदा

vasava ūcuḥ rāmanāthagaṇeśāya gaṇavṛndārcitāṅghraye gaṅgādharāya guhyāya namaste pāhi naḥ sadā

वसुओं ने कहा — रामनाथ के गणों के स्वामी, गण-समूहों द्वारा पूजित चरणों वाले, गंगाधर, गुह्य आपको नमस्कार है। सदा हमारी रक्षा कीजिए।

श्लोक 82 (skanda.3.49.82)

विश्वेदेवा ऊचुः । ज्ञप्तिमात्रैकनिष्ठानां मुक्तिदाय सुयोगिनाम् । रामनाथाय सांबाय नमोऽस्मान्रक्ष शंकर

viśvedevā ūcuḥ jñaptimātraikaniṣṭhānāṁ muktidāya suyoginām rāmanāthāya sāmbāya namo'smān rakṣa śaṅkara

विश्वेदेवों ने कहा — केवल शुद्ध ज्ञान में स्थित सुयोगियों को मुक्ति देने वाले, पार्वती सहित रामनाथ को नमस्कार है। हे शंकर! हमारी रक्षा कीजिए।

श्लोक 83 (skanda.3.49.83)

मरुत ऊचुः । परतत्त्वाय तत्त्वानां तत्त्वभूताय वस्तुतः । नमस्ते रामनाथाय स्वयंभानाय शंभवे

maruta ūcuḥ paratattvāya tattvānāṁ tattvabhūtāya vastutaḥ namaste rāmanāthāya svayaṁbhānāya śambhave

मरुतों ने कहा — तत्त्वों के भी परम तत्त्व, वास्तव में तत्त्व-स्वरूप, स्वयं-प्रकाश रामनाथ शंभु को नमस्कार है।

श्लोक 84 (skanda.3.49.84)

साध्या ऊचुः । स्वातिरिक्तविहीनाय जगत्सत्ताप्रदायिने । रामेश्वराय देवाय नमोऽविद्या विभेदिने

sādhyā ūcuḥ svātiriktavihīnāya jagatsattāpradāyine rāmeśvarāya devāya namo'vidyāvibhedine

साध्यों ने कहा — जिसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, जगत को सत्ता प्रदान करने वाले, अविद्या को भेदने वाले देव रामेश्वर को नमस्कार है।

श्लोक 85 (skanda.3.49.85)

सर्वे देवा ऊचुः । सच्चिदानंदसंपूर्णं द्वैतवस्तुविवर्जितम् । ब्रह्मात्मानं स्वयंभानमादिमध्यांतवर्जितम्

sarve devā ūcuḥ saccidānandasampūrṇaṁ dvaitavastuvivarjitam brahmātmānaṁ svayaṁbhānam ādimadhyāntavarjitam

समस्त देवताओं ने कहा — सत्-चित्-आनंद से परिपूर्ण, द्वैत वस्तु से रहित, ब्रह्म-आत्म-स्वरूप, स्वयं-प्रकाश, आदि-मध्य-अंत से रहित,

श्लोक 86 (skanda.3.49.86)

अविक्रियमसंगं च परिशुद्धं सनातनम् । आकाशादिप्रपंचानां साक्षिभूतं परामृतम्

avikriyam asaṅgaṁ ca pariśuddhaṁ sanātanam ākāśādiprapañcānāṁ sākṣibhūtaṁ parāmṛtam

निर्विकार, असंग, परिशुद्ध, सनातन, आकाश आदि पंच-भूतों के साक्षी-स्वरूप, परम अमृत,

श्लोक 87 (skanda.3.49.87)

प्रमातीतं प्रमाणानामपि बोधप्रदायिनम् । आविर्भावतिरोभाव संकोचरहितं सदा

pramātītaṁ pramāṇānām api bodhapradāyinam āvirbhāvatirobhāvasaṅkocarahitaṁ sadā

प्रमाणों से भी परे, प्रमाणों को भी बोध प्रदान करने वाले, प्रकट होने-अंतर्धान होने तथा संकोच से सदा रहित,

श्लोक 88 (skanda.3.49.88)

स्वस्मिन्नध्यस्तरूपस्य प्रपंचस्यास्य साक्षिणम् । निर्लेपं परमानंदं निरस्तसकलक्रियम्

svasminn adhyastarūpasya prapañcasyāsya sākṣiṇam nirlepaṁ paramānandaṁ nirastasakalakriyam

अपने ऊपर अध्यस्त इस जगत-रूपी प्रपंच के साक्षी, निर्लेप, परमानंद-स्वरूप, समस्त क्रिया से रहित,

श्लोक 89 (skanda.3.49.89)

भूमानंदं महात्मानं चिद्रूपं भोगवर्जितम् । रामनाथं वयं सर्वे स्वपातकविशुद्धये

bhūmānandaṁ mahātmānaṁ cidrūpaṁ bhogavarjitam rāmanāthaṁ vayaṁ sarve svapātakaviśuddhaye

अनंत आनंद-स्वरूप, महात्मा, चित्-स्वरूप, भोग-रहित रामनाथ का हम सब अपने पापों की शुद्धि के लिए,

श्लोक 90 (skanda.3.49.90)

चिन्तयामः सदा चित्ते स्वात्मानंदबुभुत्सवः । रक्षास्मान्करुणासिन्धो राम नाथ नमोऽस्तु ते

cintayāmaḥ sadā citte svātmānandabubhutsavaḥ rakṣāsmān karuṇāsindho rāmanātha namo'stu te

अपने आत्म-आनंद को जानने की इच्छा से सदा चित्त में चिंतन करते हैं। हे करुणा के सागर! हमारी रक्षा कीजिए, हे रामनाथ! आपको नमस्कार हो।

श्लोक 91 (skanda.3.49.91)

रामनाथाय रुद्राय नमः संसारहारिणे । ब्रह्मविष्ण्वादिरूपेण विभिन्नाय स्वमायया

rāmanāthāya rudrāya namaḥ saṁsārahāriṇe brahmaviṣṇvādirūpeṇa vibhinnāya svamāyayā

रामनाथ, रुद्र, संसार का हरण करने वाले को नमस्कार है, जो अपनी माया से ब्रह्मा-विष्णु आदि रूपों में भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं।

श्लोक 92 (skanda.3.49.92)

विभीषणसचिवा ऊचुः । वरदाय वरेण्याय त्रिनेत्राय त्रिशूलिने । योगिध्येयाय नित्याय रामनाथाय ते नमः

vibhīṣaṇasacivā ūcuḥ varadāya vareṇyāya trinetrāya triśūline yogidhyeyāya nityāya rāmanāthāya te namaḥ

विभीषण के मंत्रियों ने कहा — वरदाता, वरणीय, त्रिनेत्र, त्रिशूलधारी, योगियों के ध्येय, नित्य, रामनाथ आपको नमस्कार है।

श्लोक 93 (skanda.3.49.93)

सूत उवाच । इति रामादिभिः सर्वैः स्तुतो रामेश्वरः शिवः । प्राह सर्वान्समाहूय रामादीन्द्विजसत्तमाः

sūta uvāca iti rāmādibhiḥ sarvaiḥ stuto rāmeśvaraḥ śivaḥ prāha sarvān samāhūya rāmādīn dvijasattamāḥ

सूत जी ने कहा — हे द्विजसत्तमो! इस प्रकार राम आदि सभी के द्वारा स्तुत होकर, शिव रामेश्वर ने राम आदि सबको बुलाकर कहा।

श्लोक 94 (skanda.3.49.94)

रामराम महाभाग जानकीरमण प्रभो । सौमित्रे जानकि शुभे हे सुग्रीव मुखास्तथा

rāmarāma mahābhāga jānakīramaṇa prabho saumitre jānaki śubhe he sugrīvamukhās tathā

हे राम, राम! हे महाभाग्यशाली! हे जानकी के प्रियतम! हे प्रभो! हे सुमित्रा-पुत्र! हे शुभे जानकी! हे सुग्रीव आदि!

श्लोक 95 (skanda.3.49.95)

अन्ये ब्रह्ममुखा यूयं शृणुध्वं सुसमास्थिताः । स्तोत्राध्यायमिमं पुण्यं युष्माभिः कृतमादरात्

anye brahmamukhā yūyaṁ śṛṇudhvaṁ susamāsthitāḥ stotrādhyāyam imaṁ puṇyaṁ yuṣmābhiḥ kṛtam ādarāt

तथा हे ब्रह्मा आदि अन्य सब! सावधानी से सुनो। आप सबके द्वारा श्रद्धापूर्वक रचित यह पुण्य स्तोत्र-अध्याय,

श्लोक 96 (skanda.3.49.96)

ये पठंति च शृण्वंति श्रावयंति च मानवाः । मदर्चनफलं तेषां भविष्यति न संशयः

ye paṭhanti ca śṛṇvanti śrāvayanti ca mānavāḥ madarcanaphalaṁ teṣāṁ bhaviṣyati na saṁśayaḥ

जो मनुष्य इसे पढ़ते हैं, सुनते हैं, तथा सुनाते हैं, उन्हें मेरी पूजा का फल प्राप्त होगा, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 97 (skanda.3.49.97)

रामचंद्रधनुष्कोटिस्नानपुण्यं च वै भवेत् । वर्षमेकं रामसेतौ वासपुण्यं भविष्यति

rāmacandradhanuṣkoṭisnānapuṇyaṁ ca vai bhavet varṣam ekaṁ rāmasetau vāsapuṇyaṁ bhaviṣyati

रामचंद्र के धनुष्कोटि में स्नान का पुण्य भी प्राप्त होगा। एक वर्ष तक रामसेतु में निवास का पुण्य भी प्राप्त होगा।

श्लोक 98 (skanda.3.49.98)

गन्धमादनमध्यस्थसर्वर्तीर्थाभिमज्जनात् । यत्पुण्यं तद्भवेत्तेन नात्र संशयकारणम्

gandhamādanamadhyasthasarvatīrthābhimajjanāt yat puṇyaṁ tad bhavet tena nātra saṁśayakāraṇam

गन्धमादन के मध्य में स्थित समस्त तीर्थों में स्नान करने से जो पुण्य होता है, वह उसे प्राप्त होगा, इसमें संदेह का कोई कारण नहीं है।

श्लोक 99 (skanda.3.49.99)

उक्त्वैवं रामनाथोऽपि स्वात्मलिंगे तिरोदधे । स्तोत्राध्यायमिमं पुण्यं नित्यं संकीर्तयन्नरः

uktvaivaṁ rāmanātho'pi svātmaliṅge tirodadhe stotrādhyāyam imaṁ puṇyaṁ nityaṁ saṅkīrtayan naraḥ

इस प्रकार कहकर रामनाथ भी अपने ही लिंग-स्वरूप में अंतर्धान हो गए। इस पुण्य स्तोत्र-अध्याय का जो मनुष्य नित्य कीर्तन करता है,

श्लोक 100 (skanda.3.49.100)

जरामरणनिर्मुक्तो जन्मदुःखविवर्जितः । रामनाथस्य सायुज्यमुक्तिं प्राप्नोत्यसंशयः

jarāmaraṇanirmukto janmaduḥkhavivarjitaḥ rāmanāthasya sāyujyamuktiṁ prāpnoty asaṁśayaḥ

वह बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्त होकर, जन्म के दुःख से रहित होकर, रामनाथ के सायुज्य-रूप मुक्ति को निःसंदेह प्राप्त करता है।

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