ब्रह्म खण्ड · अध्याय 50
सेतुमाधव-प्रशंसा में पुण्यनिधि के चरित्र का कथन
श्लोक 1 (skanda.3.50.1)
श्रीसूत उवाच । अथातः संप्रवक्ष्यामि सेतुमाधववैभवम् । शृणुध्वं मुनयो भक्त्या पुण्यं पापहरं परम्
śrīsūta uvāca athātaḥ sampravakṣyāmi setumādhavavaibhavam śṛṇudhvaṁ munayo bhaktyā puṇyaṁ pāpaharaṁ param
श्री सूत जी ने कहा — अब मैं सेतुमाधव के वैभव का वर्णन करूँगा। हे मुनियो! भक्तिपूर्वक सुनो, यह परम पुण्यमय, पाप-हारी है।
श्लोक 2 (skanda.3.50.2)
पुरा पुण्यनिधिर्नाम राजा सोमकुलोद्भवः । मधुरां पालयामास हालास्येश्वरभूषिताम्
purā puṇyanidhir nāma rājā somakulodbhavaḥ madhurāṁ pālayāmāsa hālāsyeśvarabhūṣitām
पूर्वकाल में पुण्यनिधि नामक एक राजा था, जो सोम-वंश में उत्पन्न हुआ था। वह हालास्येश्वर से सुशोभित मदुरा नगरी का पालन करता था।
श्लोक 3 (skanda.3.50.3)
कदाचित्स महीपालश्चतुरंगबलान्वितः । सांऽतःपुरपरीवारो मधुरायां निजं सुतम्
kadācit sa mahīpālaś caturaṅgabalānvitaḥ sāntaḥpuraparīvāro madhurāyāṁ nijaṁ sutam
एक बार वह राजा चतुरंग सेना सहित, अंतःपुर के परिवार सहित, मदुरा में अपने पुत्र को,
श्लोक 4 (skanda.3.50.4)
स्थापयित्वा रामसेतुं प्रययौ स्नानकौतुकी । तत्र गत्वा धनुष्कोटौ स्नात्वा संकल्पपूर्वकम्
sthāpayitvā rāmasetuṁ prayayau snānakautukī tatra gatvā dhanuṣkoṭau snātvā saṅkalpapūrvakam
स्थापित कर, स्नान की उत्सुकता से रामसेतु की ओर गया। वहाँ जाकर धनुष्कोटि में संकल्पपूर्वक स्नान कर,
श्लोक 5 (skanda.3.50.5)
अन्येष्वपि च तीर्थेषु तत्रत्येषु नृपोत्तमः । सस्नौ रामेश्वरं देवं सिषेवे च सभक्तिकम्
anyeṣv api ca tīrtheṣu tatratyeṣu nṛpottamaḥ sasnau rāmeśvaraṁ devaṁ siṣeve ca sabhaktikam
उस उत्तम राजा ने वहाँ के अन्य तीर्थों में भी स्नान किया, तथा देव रामेश्वर की भक्तिपूर्वक सेवा की।
श्लोक 6 (skanda.3.50.6)
एवं स बहुकालं वै तत्रैव न्यवसत्सुखम् । रामसेतौ वसन्पुण्ये गन्धमादनपर्वते
evaṁ sa bahukālaṁ vai tatraiva nyavasat sukham rāmasetau vasan puṇye gandhamādanaparvate
इस प्रकार वह बहुत काल तक वहीं सुखपूर्वक निवास करता रहा, पुण्यमय गन्धमादन पर्वत पर रामसेतु में निवास करते हुए।
श्लोक 7 (skanda.3.50.7)
विष्णुप्रीतिकरं यज्ञं कदाचिदकरोन्नृपः । यज्ञावसाने राजासौ मुदावभृथकौतुकी
viṣṇuprītikaraṁ yajñaṁ kadācid akaron nṛpaḥ yajñāvasāne rājāsau mudāvabhṛthakautukī
एक बार राजा ने विष्णु को प्रसन्न करने वाला यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर वह राजा अवभृथ-स्नान की उत्सुकता से आनंदित होकर,
श्लोक 8 (skanda.3.50.8)
सस्नौ रामधनुष्कोटौ सदारः सपरिच्छदः । सेवित्वा रामनाथं च स वेश्म प्रययौ द्विजाः
sasnau rāmadhanuṣkoṭau sadāraḥ saparicchadaḥ sevitvā rāmanāthaṁ ca sa veśma prayayau dvijāḥ
पत्नी सहित, परिवार सहित, राम के धनुष्कोटि में स्नान किया। हे द्विजो! रामनाथ की सेवा कर वह अपने घर लौट गया।
श्लोक 9 (skanda.3.50.9)
एवं निवसमानेऽस्मिन्राज्ञि पुण्यनिधौ तदा । कदाचिद्धरिणा लक्ष्मीर्विनोदकलहाकुला
evaṁ nivasamāne'smin rājñi puṇyanidhau tadā kadācid dhariṇā lakṣmīr vinodakalahākulā
इस प्रकार पुण्यनिधि राजा के वहाँ निवास करते हुए, एक बार हरि के साथ लक्ष्मी विनोद-कलह में व्याकुल हो गईं।
श्लोक 10 (skanda.3.50.10)
हरिणा समयं कृत्वा नृपभक्तिं परीक्षितुम् । विष्णुना प्रेषिता लक्ष्मीर्वैकुंठात्कमलालया
hariṇā samayaṁ kṛtvā nṛpabhaktiṁ parīkṣitum viṣṇunā preṣitā lakṣmīr vaikuṇṭhāt kamalālayā
हरि द्वारा वचन देकर, राजा की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए, विष्णु द्वारा भेजी गई कमला-निवासिनी लक्ष्मी वैकुंठ से,
श्लोक 11 (skanda.3.50.11)
अष्टवर्षवयोरूपा प्रययौ गंधमादने । तत्रागत्य धनुष्कोटौ तस्थौ सा कमलालया
aṣṭavarṣavayorūpā prayayau gandhamādane tatrāgatya dhanuṣkoṭau tasthau sā kamalālayā
आठ वर्ष की आयु के रूप में गन्धमादन पर्वत की ओर गईं। वहाँ आकर वह कमला-निवासिनी धनुष्कोटि में ठहरीं।
श्लोक 12 (skanda.3.50.12)
तस्मिन्नवसरे राजा ययौ गुणनिधिर्द्विजाः । स्नातुं रामधनुष्कोटौ सदारः सहसैनिकः
tasminn avasare rājā yayau guṇanidhir dvijāḥ snātuṁ rāmadhanuṣkoṭau sadāraḥ sahasainikaḥ
हे द्विजो! उसी अवसर पर गुणनिधि राजा पत्नी और सैनिकों सहित राम के धनुष्कोटि में स्नान करने के लिए गया।
श्लोक 13 (skanda.3.50.13)
तत्र गत्वा स राजाऽयं स्नात्वा नियमपूर्वकम् । तुलापुरुषमुख्यानि कृत्वा दानानि कृत्स्नशः
tatra gatvā sa rājā'yaṁ snātvā niyamapūrvakam tulāpuruṣamukhyāni kṛtvā dānāni kṛtsnaśaḥ
वहाँ जाकर उस राजा ने नियमपूर्वक स्नान कर, तुलापुरुष आदि प्रमुख दान सर्वथा किए।
श्लोक 14 (skanda.3.50.14)
प्रयातुकामो भवनं कन्यां कांचिद्ददर्श सः । अतीवरूपसंपन्नामष्टवर्षां शुचिस्मिताम्
prayātukāmo bhavanaṁ kanyāṁ kāñcid dadarśa saḥ atīvarūpasampannām aṣṭavarṣāṁ śucismitām
अपने भवन को लौटने की इच्छा रखते हुए, उसने एक कन्या को देखा, जो अत्यंत रूपवती, आठ वर्ष की, तथा पवित्र-हास्य वाली थी।
श्लोक 15 (skanda.3.50.15)
दृष्ट्वा नृपस्तां पप्रच्छ कन्यां चारुविलोचनाम् । चारुस्मितां चारुदतीं बिंबोष्ठीं तनुमध्यमाम्
dṛṣṭvā nṛpas tāṁ papraccha kanyāṁ cāruvilocanām cārusmitāṁ cārudatīṁ bimboṣṭhīṁ tanumadhyamām
उस सुंदर-नेत्र, सुंदर-हास्य, सुंदर-दंत, बिंबफल-सी ओष्ठ वाली, कृशोदरी कन्या को देखकर राजा ने पूछा।
श्लोक 16 (skanda.3.50.16)
पुण्यनिधिरुवाच । का त्वं कन्ये सुता कस्य कुतो वा त्वमिहागता । अत्रागमेन किं कार्यं तव वत्से शुचिस्मिते
puṇyanidhir uvāca kā tvaṁ kanye sutā kasya kuto vā tvam ihāgatā atrāgamena kiṁ kāryaṁ tava vatse śucismite
पुण्यनिधि ने कहा — हे कन्ये! तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो, और यहाँ कहाँ से आई हो? हे वत्से! हे पवित्र-हास्य वाली! यहाँ आने का तुम्हारा क्या प्रयोजन है?
श्लोक 17 (skanda.3.50.17)
एवं नृपस्तां पप्रच्छ कन्यामुत्पललोच नाम् । एवं पृष्टा तदा कन्या नृपं तमवदद्विजाः
evaṁ nṛpas tāṁ papraccha kanyām utpalalocanām evaṁ pṛṣṭā tadā kanyā nṛpaṁ tam avadad dvijāḥ
इस प्रकार राजा ने कमल-नयन वाली उस कन्या से पूछा। हे द्विजो! इस प्रकार पूछी जाने पर उस कन्या ने राजा से कहा।
श्लोक 18 (skanda.3.50.18)
न मे माता पिता नास्ति न च मे बांधवास्तथा । अनाथाहं महाराज भविष्यामि च ते सुता
na me mātā pitā nāsti na ca me bāndhavās tathā anāthāhaṁ mahārāja bhaviṣyāmi ca te sutā
मेरी न माता है, न पिता है, न ही मेरे बंधु-बांधव हैं। हे महाराज! मैं अनाथ हूँ, और आपकी पुत्री बनूँगी।
श्लोक 19 (skanda.3.50.19)
त्वद्गृहेऽहं निवत्स्यामि तात त्वां पश्यतीसदा । हठात्कृष्यति यो वा मां ग्रहीष्यति करेण तम्
tvadgṛhe'haṁ nivatsyāmi tāta tvāṁ paśyatī sadā haṭhāt kṛṣyati yo vā māṁ grahīṣyati kareṇa tam
हे तात! मैं आपके घर में रहूँगी, सदा आपको देखते हुए। जो भी मुझे बलपूर्वक खींचे या हाथ से पकड़े,
श्लोक 20 (skanda.3.50.20)
यदि शासिष्यसे भूप तदाहं तव मंदिरे । वत्स्यामि ते सुता भूत्वा पितर्गुणनिधे चिरम्
yadi śāsiṣyase bhūpa tadāhaṁ tava mandire vatsyāmi te sutā bhūtvā pitar guṇanidhe ciram
यदि हे राजन्! उसे आप दंडित करेंगे, तो मैं आपके भवन में, हे गुणनिधि पिता! आपकी पुत्री बनकर दीर्घकाल तक रहूँगी।
श्लोक 21 (skanda.3.50.21)
एवमुक्तस्तदा प्राह कन्यां गुणनिधिर्नृपः । अहं सर्वं करिष्यामि त्वदुक्तं कन्यके शुभे
evam uktas tadā prāha kanyāṁ guṇanidhir nṛpaḥ ahaṁ sarvaṁ kariṣyāmi tvaduktaṁ kanyake śubhe
इस प्रकार कहे जाने पर, राजा गुणनिधि ने उस कन्या से कहा — हे शुभे कन्ये! मैं तुम्हारा कहा सब कुछ करूँगा।
श्लोक 22 (skanda.3.50.22)
ममापि दुहिता नास्ति पुत्रोऽस्त्येकः कुलोद्वहः । तव यस्मिन्रुचिर्भद्रे त्वां तस्मै प्रददाम्यहम्
mamāpi duhitā nāsti putro'sty eko kulodvahaḥ tava yasmin rucir bhadre tvāṁ tasmai pradadāmy aham
मेरी भी कोई पुत्री नहीं है, केवल एक कुल-रक्षक पुत्र है। हे भद्रे! जिसमें भी तुम्हारी रुचि हो, मैं तुम्हें उसी को दे दूँगा।
श्लोक 23 (skanda.3.50.23)
आगच्छ मद्गृहं कन्ये मम चांतःपुरे वस । मद्भार्यायाः सुता भूत्वा यथाकाममनिंदिते
āgaccha madgṛhaṁ kanye mama cāntaḥpure vasa madbhāryāyāḥ sutā bhūtvā yathākāmam aninditе
हे कन्ये! मेरे घर आओ और मेरे अंतःपुर में निवास करो। हे अनिंदिते! मेरी पत्नी की पुत्री बनकर यथेच्छ रहो।
श्लोक 24 (skanda.3.50.24)
इत्युक्ता सा नृपेणाथ कन्या कमललोचना । तथा स्त्विति नृपं प्रोच्य तेन साकं ययौ गृहम्
ityuktā sā nṛpeṇātha kanyā kamalalocanā tathāstv iti nṛpaṁ procya tena sākaṁ yayau gṛham
राजा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, कमल-नयन वाली उस कन्या ने 'ऐसा ही हो' कहकर राजा से, उनके साथ घर को प्रस्थान किया।
श्लोक 25 (skanda.3.50.25)
राजा स्वभार्याहस्ते तां प्रददौ कन्यकां शुभाम् । अब्रवीच्च स्वकां भार्यां राजा विन्ध्यावलिं तदा
rājā svabhāryāhaste tāṁ pradadau kanyakāṁ śubhām abravīc ca svakāṁ bhāryāṁ rājā vindhyāvaliṁ tadā
राजा ने उस शुभ कन्या को अपनी पत्नी के हाथ में सौंप दिया। तब राजा ने अपनी पत्नी विंध्यावलि से कहा।
श्लोक 26 (skanda.3.50.26)
आवयोः कन्यका चेयं राज्ञि विंध्यावले शुभे । रक्षेमां सर्वथा त्वं वै पुरुषांतरतः प्रिये
āvayoḥ kanyakā ceyaṁ rājñi vindhyāvale śubhe rakṣemāṁ sarvathā tvaṁ vai puruṣāntarataḥ priye
हे रानी विंध्यावलि! हे शुभे! यह हम दोनों की पुत्री है। हे प्रिये! तुम इसे सर्वथा अन्य पुरुषों से बचाओ।
श्लोक 27 (skanda.3.50.27)
इतीरिता नृपेणासौ भार्या विंध्या वलिस्तदा । ओमित्युक्त्वाथ तां कन्यां पुत्रीं जग्राह पाणिना
itīritā nṛpeṇāsau bhāryā vindhyāvalis tadā om ity uktvātha tāṁ kanyāṁ putrīṁ jagrāha pāṇinā
राजा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, पत्नी विंध्यावलि ने 'ऐसा ही हो' कहकर उस कन्या को पुत्री के रूप में हाथ से ग्रहण किया।
श्लोक 28 (skanda.3.50.28)
पोषिता पालिता राज्ञा सुतवत्कन्यका च सा । न्यवात्सीत्सुसुखं राज्ञो भवने लालिता सदा
poṣitā pālitā rājñā sutavat kanyakā ca sā nyavātsīt susukhaṁ rājño bhavane lālitā sadā
राजा द्वारा पुत्री के समान पोषित तथा पालित वह कन्या, राजा के भवन में सदा लाड़-प्यार से सुखपूर्वक रहने लगी।
श्लोक 29 (skanda.3.50.29)
अथ विष्णुर्जगन्नाथो लक्ष्मीमन्वेष्टुमादरात् । आरूढविनतानन्दो वैकुंठान्निर्ययौ द्विजाः
atha viṣṇur jagannātho lakṣmīm anveṣṭum ādarāt ārūḍhavinatānando vaikuṇṭhān niryayau dvijāḥ
तब जगन्नाथ विष्णु, लक्ष्मी को खोजने के लिए, श्रद्धापूर्वक विनता के आनंद-स्वरूप गरुड़ पर आरूढ़ होकर, हे द्विजो! वैकुंठ से निकल पड़े।
श्लोक 30 (skanda.3.50.30)
विनिर्गत्य स वैकुंठा द्विलंघितवियत्पथः । बभ्राम च बहून्देशाल्लँक्ष्मीं तत्र न दृष्टवान्
vinirgatya sa vaikuṇṭhād vilaṅghitaviyatpathaḥ babhrāma ca bahūn deśāl lakṣmīṁ tatra na dṛṣṭavān
वैकुंठ से निकलकर, आकाश-मार्ग को लाँघते हुए, उन्होंने अनेक देशों में भ्रमण किया, किंतु वहाँ लक्ष्मी को नहीं देखा।
श्लोक 31 (skanda.3.50.31)
रामसेतुमथागच्छद्गंधमादनपर्वते । अन्विष्य सर्वतो रामसेतुं बभ्राम चेंदि राम्
rāmasetum athāgacchad gandhamādanaparvate aniṣya sarvato rāmasetuṁ babhrāma cendirām
तब वे गन्धमादन पर्वत पर रामसेतु को पहुँचे। रामसेतु में सर्वत्र इंदिरा को खोजते हुए भ्रमण करने लगे।
श्लोक 32 (skanda.3.50.32)
एतस्मिन्नेव काले सा पुष्पावचयकौतुकात् । सखीभिः कन्यकायासीद्भवनोद्यानपादपान्
etasminn eva kāle sā puṣpāvacayakautukāt sakhībhiḥ kanyakāyāsīd bhavanodyānapādapān
इसी समय, फूल तोड़ने की उत्सुकता से, वह कन्या सखियों सहित भवन के उद्यान के वृक्षों की ओर गई।
श्लोक 33 (skanda.3.50.33)
पुष्पाण्यवचिनोति स्म सखीभिः सह कानने । तत्रागत्य ततो विष्णुर्विप्ररूपधरो द्विजाः
puṣpāṇy avacinoti sma sakhībhiḥ saha kānane tatrāgatya tato viṣṇur vipra rūpadharo dvijāḥ
वह सखियों सहित वन में पुष्प चुनने लगी। हे द्विजो! तभी वहाँ ब्राह्मण-रूपधारी विष्णु आ पहुँचे।
श्लोक 34 (skanda.3.50.34)
गंगांभो विदधत्स्कंधे वहञ्छत्रं करंण च । गंगास्नायिद्विजस्येव रचयन्वेषमात्मनः
gaṅgāmbho vidadhat skandhe vahañ chatraṁ karaṇa ca gaṅgāsnāyidvijasyeva racayan veṣam ātmanaḥ
कंधे पर गंगाजल धारण किए हुए, हाथ में छाता लिए हुए, गंगा-स्नानार्थी ब्राह्मण के समान अपना वेश धारण करते हुए,
श्लोक 35 (skanda.3.50.35)
धारयन्दक्षिणे पाणौ कुशाग्रंथिपवित्रकम् । भस्मोद्धूलितसर्वांगस्त्रिपुण्ड्रावलिशोभितः
dhārayan dakṣiṇe pāṇau kuśāgranthipavitrakam bhasmoddhūlitasarvāṅgas tripuṇḍrāvaliśobhitaḥ
दाहिने हाथ में कुश-गाँठ वाला पवित्रक धारण किए हुए, भस्म से लिप्त समस्त अंगों वाला, त्रिपुण्ड्र-रेखाओं से सुशोभित,
श्लोक 36 (skanda.3.50.36)
प्रजपञ्छिवनामानि धृतरुद्राक्ष मालिकः । सोत्तरीयः शुचिर्विप्राः समायातो जनार्दनः
prajapañ śivanāmāni dhṛtarudrākṣamālikaḥ sottarīyaḥ śucir viprāḥ samāyāto janārdanaḥ
शिव के नामों का जप करते हुए, रुद्राक्ष की माला धारण किए हुए, उत्तरीय सहित, हे विप्रो! पवित्र जनार्दन वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 37 (skanda.3.50.37)
तमागतं द्विजं दृष्ट्वा स्तब्धाऽतिष्ठत कन्यका । अपश्यदष्टवर्षां तां वल्लभां पुष्प हारिणीम्
tam āgataṁ dvijaṁ dṛṣṭvā stabdhātiṣṭhata kanyakā apaśyad aṣṭavarṣāṁ tāṁ vallabhāṁ puṣpahāriṇīm
उस आए हुए ब्राह्मण को देखकर वह कन्या स्तब्ध होकर खड़ी रह गई। उस आठ वर्ष की, प्रिय, पुष्प हरण करती कन्या को उन्होंने देखा।
श्लोक 38 (skanda.3.50.38)
दृष्ट्वा स त्वरया विप्रः कन्यां मधुरभाषिणीम् । हठात्कृत्य करेणासौ जग्राह गरुडध्वजः
dṛṣṭvā sa tvarayā vipraḥ kanyāṁ madhurabhāṣiṇīm haṭhāt kṛtya kareṇāsau jagrāha garuḍadhvajaḥ
उस मधुर-भाषिणी कन्या को देखकर वह ब्राह्मण-रूपधारी गरुड़-ध्वज तत्काल हाथ से बलपूर्वक पकड़ने लगा।
श्लोक 39 (skanda.3.50.39)
तदा चुक्रोश सा कन्या सखीभिः सह कानने । तमाक्रोशं समाकर्ण्य राजा स तु समागतः
tadā cukrośa sā kanyā sakhībhiḥ saha kānane tam ākrośaṁ samākarṇya rājā sa tu samāgataḥ
तब वह कन्या सखियों सहित वन में चिल्ला उठी। उस पुकार को सुनकर राजा वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 40 (skanda.3.50.40)
प्रययौ भवनोद्यानं वृतः कतिपयैर्भटैः । गत्वा पप्रच्छ तां कन्यां तत्सखीरपि भूपतिः
prayayau bhavanodyānaṁ vṛtaḥ katipayair bhaṭaiḥ gatvā papraccha tāṁ kanyāṁ tatsakhīr api bhūpatiḥ
कुछ सैनिकों से घिरा हुआ राजा भवन के उद्यान में गया। वहाँ जाकर राजा ने उस कन्या से तथा उसकी सखियों से पूछा।
श्लोक 41 (skanda.3.50.41)
किमर्थमधुना क्रुष्टं सखीभिः सह कन्यके । त्वया तु भवनोद्याने तत्र कारणमुच्यताम्
kimartham adhunā kruṣṭaṁ sakhībhiḥ saha kanyake tvayā tu bhavanodyāne tatra kāraṇam ucyatām
हे कन्ये! अभी सखियों सहित तुमने भवन के उद्यान में किस कारण चीत्कार किया? वह कारण बताओ।
श्लोक 42 (skanda.3.50.42)
केन त्वं परिभूतासि हठात्कृष्य सुते मम । इति पृष्टा तमाचष्ट कन्या गुणनिधिं नृपम् । बाष्पपूर्णानना खिन्ना रुषिता भृशकातरा
kena tvaṁ paribhūtāsi haṭhāt kṛṣya sute mama iti pṛṣṭā tam ācaṣṭa kanyā guṇanidhiṁ nṛpam bāṣpapūrṇānanā khinnā ruṣitā bhṛśakātarā
हे पुत्री! किसने तुम्हें बलपूर्वक खींचकर तंग किया है? इस प्रकार पूछे जाने पर, अश्रुपूर्ण मुख वाली, खिन्न, क्रुद्ध, अत्यंत व्याकुल उस कन्या ने राजा गुणनिधि से कहा।
श्लोक 43 (skanda.3.50.43)
कन्योवाच । अयं विप्रो हठात्कृत्य जगृहे पांड्यनाथ माम्
kanyovāca ayaṁ vipro haṭhāt kṛtya jagṛhe pāṇḍyanātha mām
कन्या ने कहा — हे पांड्यनाथ! इस ब्राह्मण ने बलपूर्वक मुझे पकड़ लिया।
श्लोक 44 (skanda.3.50.44)
तातात्र वृक्षमूलेऽसौ स तिष्ठत्यकुतोभयः । तदाकर्ण्य वचस्तस्या राजा गुणनिधिः सुधीः
tātātra vṛkṣamūle'sau sa tiṣṭhaty akutobhayaḥ tad ākarṇya vacas tasyā rājā guṇanidhiḥ sudhīḥ
हे तात! यह वृक्ष के मूल में निर्भय होकर खड़ा है। उसका यह वचन सुनकर बुद्धिमान राजा गुणनिधि ने,
श्लोक 45 (skanda.3.50.45)
जग्राह तरसा विप्रमविद्वांस्तद्बलं हठात् । रामनाथालयं नीत्वा निगृह्य च हठात्तदा
jagrāha tarasā vipram avidvāṁs tadbalaṁ haṭhāt rāmanāthālayaṁ nītvā nigṛhya ca haṭhāt tadā
उस ब्राह्मण के बल को न जानते हुए, तत्काल उसे बलपूर्वक पकड़ लिया, और उसे रामनाथ के मंदिर में ले जाकर, बलपूर्वक बंदी बनाकर,
श्लोक 46 (skanda.3.50.46)
बद्ध्वा निगडपाशाभ्या मानयन्मंडपं च तम् । आत्मपुत्रीं समाश्वास्य शुद्धांतमनयन्नृपः
baddhvā nigaḍapāśābhyām ānayan maṇḍapaṁ ca tam ātmaputrīṁ samāśvāsya śuddhāntam anayan nṛpaḥ
बेड़ियों तथा रस्सी से बाँधकर, उसे मंडप में लाया। अपनी पुत्री को सांत्वना देकर राजा ने उसे अंतःपुर में भेज दिया।
श्लोक 47 (skanda.3.50.47)
स्वयं च प्रययौ रम्यं भवनं नृपपुंगवः । ततो रात्रौ स्वपन्राजा स्वप्ने विप्रं ददर्श तम्
svayaṁ ca prayayau ramyaṁ bhavanaṁ nṛpapuṅgavaḥ tato rātrau svapan rājā svapne vipraṁ dadarśa tam
और स्वयं वह श्रेष्ठ राजा अपने रमणीय भवन को चला गया। फिर रात्रि में सोते हुए राजा ने स्वप्न में उस ब्राह्मण को देखा,
श्लोक 48 (skanda.3.50.48)
शंखचक्रगदापद्मवनमालाविभूषितम् । कौस्तुभालंकृतोरस्कं पीतांबरधरं हरिम्
śaṅkhacakragadāpadmavanamālāvibhūṣitam kaustubhālaṅkṛtoraskaṁ pītāmbaradharaṁ harim
शंख-चक्र-गदा-पद्म तथा वनमाला से विभूषित, कौस्तुभ-मणि से अलंकृत वक्षस्थल वाले, पीतांबर धारण करने वाले हरि के रूप में,
श्लोक 49 (skanda.3.50.49)
कालमेघच्छविं कांतं गरुडोपरि संस्थितम् । चारुस्मितं चारुदंतं लसन्मकरकुण्डलम्
kālameghacchaviṁ kāntaṁ garuḍopari saṁsthitam cārusmitaṁ cārudantaṁ lasanmakarakuṇḍalam
काले मेघ के समान वर्ण वाले, सुंदर, गरुड़ पर आरूढ़, सुंदर मुस्कान वाले, सुंदर दाँतों वाले, चमकते मकर-कुंडलों वाले,
श्लोक 50 (skanda.3.50.50)
विष्वक्सेनप्रभृतिभिः किंकरैरुपसेवितम् । शेषपर्यंकशयनं नारदादि मुनिस्तुतम्
viṣvaksenaprabhṛtibhiḥ kiṅkarair upasevitam śeṣaparyaṅkaśayanaṁ nāradādimunistutam
विष्वक्सेन आदि सेवकों द्वारा सेवित, शेषनाग की शय्या पर शयन करने वाले, नारद आदि मुनियों द्वारा स्तुत,
श्लोक 51 (skanda.3.50.51)
ददर्श च स्वकां कन्यां विकासिकमलस्थिताम् । धृतपंकजहस्तां तां नीलकुञ्चितमूर्धजाम्
dadarśa ca svakāṁ kanyāṁ vikāsikamalasthitām dhṛtapaṅkajahastāṁ tāṁ nīlakuñcitamūrdhajām
और साथ ही उन्होंने अपनी ही पुत्री को खिले हुए कमल पर स्थित, हाथ में कमल धारण किए हुए, नीले घुँघराले बालों वाली देखा।
श्लोक 52 (skanda.3.50.52)
विष्णुवक्षस्थल्रावासां समुन्नतपयोधराम् । दिग्गजैरभिषिक्तांगीं श्यामां पीतांबरावृताम्
viṣṇuvakṣasthalāvāsāṁ samunnatapayodharām diggajair abhiṣiktāṅgīṁ śyāmāṁ pītāmbarāvṛtām
विष्णु के वक्षस्थल में निवास करने वाली, उन्नत स्तनों वाली, दिग्गजों द्वारा अभिषिक्त अंगों वाली, श्याम वर्ण, पीतांबर से आच्छादित,
श्लोक 53 (skanda.3.50.53)
स्वर्णपंकजसंक्लृप्तमालालंकृतमूर्धजाम् । दिव्याभरणशोभाढ्यां चारुहा रविभूषिताम्
svarṇapaṅkajasaṅkḷptamālālaṅkṛtamūrdhajām divyābharaṇaśobhāḍhyāṁ cāruhāravibhūṣitām
स्वर्ण-कमलों से बनी माला से अलंकृत केशों वाली, दिव्य आभूषणों की शोभा से युक्त, सुंदर हार से विभूषित,
श्लोक 54 (skanda.3.50.54)
अनर्घरत्नसंक्लृप्तनासाभरणशोभिताम् । सुवर्णनिष्काभरणां कांचीनूपुरराजिताम्
anargharatnasaṅkḷptanāsābharaṇaśobhitām suvarṇaniṣkābharaṇāṁ kāñcīnūpurarājitām
अनमोल रत्नों से बने नासा-आभूषण से सुशोभित, स्वर्ण-निष्क आभूषण वाली, करधनी और नूपुरों से सुशोभित,
श्लोक 55 (skanda.3.50.55)
महालक्ष्मीं ददर्शासौ राजा रात्रौ स्वकां सुताम् । एवं दृष्ट्वा नृपः स्वप्ने विप्रं तं स्वसुतामपि
mahālakṣmīṁ dadarśāsau rājā rātrau svakāṁ sutām evaṁ dṛṣṭvā nṛpaḥ svapne vipraṁ taṁ svasutām api
उस राजा ने रात्रि में अपनी ही पुत्री को महालक्ष्मी के रूप में देखा। स्वप्न में उस ब्राह्मण को और अपनी पुत्री को इस प्रकार देखकर,
श्लोक 56 (skanda.3.50.56)
उत्थितः सहसा तल्पात्कन्यागृहमवाप च । तथैव दृष्टवान्कन्यां यथा स्वप्ने ददर्श ताम्
utthitaḥ sahasā talpāt kanyāgṛham avāpa ca tathaiva dṛṣṭavān kanyāṁ yathā svapne dadarśa tām
वह तत्काल शय्या से उठ खड़ा हुआ और कन्या के गृह में पहुँच गया। उसने कन्या को वैसी ही देखा, जैसा उसने स्वप्न में देखा था।
श्लोक 57 (skanda.3.50.57)
अथोदिते सवितरि कन्यामादाय भूमिपः । रामनाथालयं प्राप ब्राह्मणं न्यस्तवान्यतः
athodite savitari kanyām ādāya bhūmipaḥ rāmanāthālayaṁ prāpa brāhmaṇaṁ nyastavān yataḥ
फिर सूर्योदय होने पर राजा उस कन्या को लेकर रामनाथ के मंदिर पहुँचा, जहाँ उसने ब्राह्मण को बंदी बनाकर रखा था।
श्लोक 58 (skanda.3.50.58)
स मंडपवरे विप्रं ददर्श हरिरूपिणम् । यथा ददर्श स्वप्ने तं वनमालादिचिह्नितम् । विष्णुं विज्ञाय तुष्टाव नृपतिर्हरिमीश्वरम्
sa maṇḍapavare vipraṁ dadarśa harirūpiṇam yathā dadarśa svapne taṁ vanamālādicihnitam viṣṇuṁ vijñāya tuṣṭāva nṛpatir harim īśvaram
उस उत्तम मंडप में उसने ब्राह्मण को हरि-स्वरूप में देखा, जैसे उसने स्वप्न में वनमाला आदि चिह्नों से युक्त देखा था। विष्णु को पहचानकर राजा ने हरि-ईश्वर की स्तुति की।
श्लोक 59 (skanda.3.50.59)
पुण्यनिधिरुवाच । नमस्ते कमलाकांत प्रसीद गरुडध्वज
puṇyanidhir uvāca namaste kamalākānta prasīda garuḍadhvaja
पुण्यनिधि ने कहा — हे कमला के प्रियतम! आपको नमस्कार है। हे गरुड़-ध्वज! प्रसन्न होइए।
श्लोक 60 (skanda.3.50.60)
शार्ङ्गपाणे नमस्तुभ्यमपराधं क्षमस्व मे । नमस्ते पुण्डरीकाक्ष चक्रपाणे श्रियःपते
śārṅgapāṇe namas tubhyam aparādhaṁ kṣamasva me namaste puṇḍarīkākṣa cakrapāṇe śriyaḥpate
हे शार्ङ्ग-धनुष-धारी! आपको नमस्कार है, मेरे अपराध को क्षमा कीजिए। हे कमल-नयन! हे चक्रपाणि! हे लक्ष्मीपति! आपको नमस्कार है।
श्लोक 61 (skanda.3.50.61)
कौस्तुभालंकृतांकाय नमः श्रीवत्सलक्ष्मणे । नमस्ते ब्रह्मपुत्राय दैत्यसंघविदारिणे
kaustubhālaṅkṛtāṅkāya namaḥ śrīvatsalakṣmaṇe namaste brahmaputrāya daityasaṅghavidāriṇe
कौस्तुभ से अलंकृत वक्षस्थल वाले, श्रीवत्स-चिह्न वाले आपको नमस्कार है। ब्रह्मा के पुत्र, दैत्य-समूहों को विदीर्ण करने वाले आपको नमस्कार है।
श्लोक 62 (skanda.3.50.62)
अशेषभुवनावासनाभिपंकजशालिने । मधुकैटभसंहर्त्रे रावणांतकराय ते
aśeṣabhuvanāvāsanābhipaṅkajaśāline madhukaiṭabhasaṁhartre rāvaṇāntakarāya te
समस्त भुवनों के निवास-स्वरूप नाभि-कमल वाले, मधु-कैटभ का संहार करने वाले, रावण का अंत करने वाले आपको,
श्लोक 63 (skanda.3.50.63)
प्रह्रादरक्षिणे तुभ्यं धरित्रीपतये नमः । निर्गुणायाप्रमेयाय विष्णवे बुद्धिसाक्षिणे
prahrādarakṣiṇe tubhyaṁ dharitrīpataye namaḥ nirguṇāyāprameyāya viṣṇave buddhisākṣiṇe
प्रह्लाद की रक्षा करने वाले, पृथ्वी के स्वामी आपको नमस्कार है। निर्गुण, अप्रमेय, बुद्धि के साक्षी विष्णु को नमस्कार है।
श्लोक 64 (skanda.3.50.64)
नमस्ते श्रीनिवासाय जग द्धात्रे परात्मने। नारायणाय देवाय कृष्णाय मधुविद्विषे
namaste śrīnivāsāya jagaddhātre parātmane nārāyaṇāya devāya kṛṣṇāya madhuvidviṣe
श्रीनिवास, जगत को धारण करने वाले, परमात्मा-स्वरूप आपको नमस्कार है। नारायण, देव, कृष्ण, मधु के शत्रु को नमस्कार है।
श्लोक 65 (skanda.3.50.65)
नमः पंकजनाभाय नमः पंकजचक्षुषे। नमः पंकजहस्तायाः पतये पंकजांघ्रये
namaḥ paṅkajanābhāya namaḥ paṅkajacakṣuṣe namaḥ paṅkajahastāyāḥ pataye paṅkajāṅghraye
कमल-नाभि वाले को नमस्कार है, कमल-नेत्र वाले को नमस्कार है। कमल-हस्ता के पति, कमल-चरण वाले को नमस्कार है।
श्लोक 66 (skanda.3.50.66)
भूयोभूयो जगन्नाथ नमः पंकजमालिने । दयामूर्त्ते नमस्तुभ्यमपराधं क्षमस्व मे
bhūyo bhūyo jagannātha namaḥ paṅkajamāline dayāmūrte namas tubhyam aparādhaṁ kṣamasva me
हे जगन्नाथ! बार-बार कमल-माला धारण करने वाले को नमस्कार है। हे दया-मूर्ति! आपको नमस्कार है, मेरे अपराध को क्षमा कीजिए।
श्लोक 67 (skanda.3.50.67)
मया निगडपाशाभ्यां यः कृतो मधुसूदन । अनयस्त्वत्स्वरूपमविदित्वा कृतः प्रभो
mayā nigaḍapāśābhyāṁ yaḥ kṛto madhusūdana anayas tvatsvarūpam aviditvā kṛtaḥ prabho
हे मधुसूदन! मैंने बेड़ी और रस्सी से जो अन्याय किया, वह हे प्रभो! आपके स्वरूप को न जानते हुए किया गया।
श्लोक 68 (skanda.3.50.68)
अतो मदपराधोऽयं क्षंतव्यो मधुसूदन । एवं स्तुत्वा महाविष्णुं राजा पुण्यनिधिर्द्विजाः
ato madaparādho'yaṁ kṣantavyo madhusūdana evaṁ stutvā mahāviṣṇuṁ rājā puṇyanidhir dvijāḥ
अतः हे मधुसूदन! मेरा यह अपराध क्षमा किए जाने योग्य है। हे द्विजो! इस प्रकार महाविष्णु की स्तुति कर राजा पुण्यनिधि ने,
श्लोक 69 (skanda.3.50.69)
लक्ष्मीं तुष्टाव जननीं सर्वेषां प्राणिनां मुदा । नमो देवि जगद्धात्रि विष्णुवक्षस्थलालये
lakṣmīṁ tuṣṭāva jananīṁ sarveṣāṁ prāṇinām mudā namo devi jagaddhātri viṣṇuvakṣasthalālaye
समस्त प्राणियों की माता लक्ष्मी की भी आनंदपूर्वक स्तुति की — हे देवी! हे जगत को धारण करने वाली! हे विष्णु के वक्षस्थल में निवास करने वाली! आपको नमस्कार है।
श्लोक 70 (skanda.3.50.70)
नमोब्धिसंभवे तुभ्यं महालक्ष्मि हरिप्रिये । सिद्ध्यै पुष्ट्यै स्वधायै च स्वाहायै सततं नमः
namobdhisambhave tubhyaṁ mahālakṣmi haripriye siddhyai puṣṭyai svadhāyai ca svāhāyai satataṁ namaḥ
समुद्र से उत्पन्न महालक्ष्मी, हरि की प्रिया आपको नमस्कार है। सिद्धि, पुष्टि, स्वधा, तथा स्वाहा को सदा नमस्कार है।
श्लोक 71 (skanda.3.50.71)
संध्यायै च प्रभायै च धात्र्यै भूत्यै नमोनमः । श्रद्धायै चैव मेधायै सरस्वत्यै नमोनमः
sandhyāyai ca prabhāyai ca dhātryai bhūtyai namo namaḥ śraddhāyai caiva medhāyai sarasvatyai namo namaḥ
संध्या को, प्रभा को, धात्री को, भूति को बार-बार नमस्कार है। श्रद्धा को, मेधा को, सरस्वती को बार-बार नमस्कार है।
श्लोक 72 (skanda.3.50.72)
यज्ञविद्ये महाविद्ये गुह्यविद्येतिशोभने । आत्मविद्ये च देवेशि मुक्तिदे सर्वदेहिनाम्
yajñavidye mahāvidye guhyavidyeti śobhane ātmavidye ca deveśi muktide sarvadehinām
हे यज्ञविद्या! हे महाविद्या! हे गुह्यविद्या! हे शोभने! हे आत्मविद्या! हे देवेशि! हे समस्त देहधारियों को मुक्ति देने वाली!
श्लोक 73 (skanda.3.50.73)
त्रयीरूपे जगन्मातर्जगद्रक्षाविधायिनि । रक्ष मां त्वं कृपादृष्ट्या सृष्टिस्थित्यंतकारिणि
trayīrūpe jaganmātar jagadrakṣāvidhāyini rakṣa māṁ tvaṁ kṛpādṛṣṭyā sṛṣṭisthityantakāriṇi
हे त्रयी-स्वरूपा! हे जगन्माता! हे जगत की रक्षा करने वाली! हे सृष्टि-स्थिति-संहार करने वाली! अपनी कृपा-दृष्टि से मेरी रक्षा कीजिए।
श्लोक 74 (skanda.3.50.74)
भूयोभूयो नमस्तुभ्यं ब्रह्ममात्रे महेश्वरि । इति स्तुत्वा महालक्ष्मीं प्रार्थयामास माधवम्
bhūyo bhūyo namas tubhyaṁ brahmamātre maheśvari iti stutvā mahālakṣmīṁ prārthayāmāsa mādhavam
हे ब्रह्म-स्वरूपा महेश्वरी! बार-बार आपको नमस्कार है। इस प्रकार महालक्ष्मी की स्तुति कर, माधव से उसने प्रार्थना की।
श्लोक 75 (skanda.3.50.75)
यदज्ञानान्मया विष्णो त्वयि दोषः कृतोऽधुना । पादे निगडबंधेन स द्रोहः क्षम्यतां त्वया
yad ajñānān mayā viṣṇo tvayi doṣaḥ kṛto'dhunā pāde nigaḍabandhena sa drohaḥ kṣamyatāṁ tvayā
हे विष्णु! अज्ञान से मैंने अभी आपके प्रति जो दोष किया है, चरणों में बेड़ी बाँधकर जो द्रोह किया है, उसे आप क्षमा कीजिए।
श्लोक 76 (skanda.3.50.76)
लोकास्ते शिशवः सर्वे त्वं पिता जगतां हरे। सुताऽपराधः पितृभिः क्षंतव्यो मधुसूदन
lokās te śiśavaḥ sarve tvaṁ pitā jagatāṁ hare sutāparādhaḥ pitṛbhiḥ kṣantavyo madhusūdana
समस्त लोक आपकी संतान हैं, हे हरि! आप जगत के पिता हैं। हे मधुसूदन! पिता को पुत्र के अपराध को क्षमा करना चाहिए।
श्लोक 77 (skanda.3.50.77)
अपराधिनां च दैत्यानां स्वरूपमपि दत्तवान् । भवान्विष्णो ममापीममपराधं क्षमस्व वै
aparādhināṁ ca daityānāṁ svarūpam api dattavān bhavān viṣṇo mamāpīmam aparādhaṁ kṣamasva vai
आपने अपराधी दैत्यों को भी अपना ही स्वरूप प्रदान किया है। हे विष्णु! मेरे इस अपराध को भी आप क्षमा कीजिए।
श्लोक 78 (skanda.3.50.78)
जिघांसयापि भगवन्नागतां पूतनां पुरा । अनयस्त्वत्पदांभोजं तन्मां रक्ष कृपानिधे । लक्ष्मीकांत कृपादृष्टिं मयि पातय केशव
jighāṁsayāpi bhagavann āgatāṁ pūtanāṁ purā anayas tvatpadāmbhojaṁ tan māṁ rakṣa kṛpānidhe lakṣmīkānta kṛpādṛṣṭiṁ mayi pātaya keśava
हे भगवन्! पूर्वकाल में वध की इच्छा से आई हुई पूतना को भी आपने अपने चरण-कमल तक पहुँचाया था। इसलिए हे कृपानिधे! मेरी रक्षा कीजिए। हे लक्ष्मीकांत! हे केशव! मुझ पर कृपा-दृष्टि डालिए।
श्लोक 79 (skanda.3.50.79)
श्रीसूत उवाच । इति संप्रार्थितो विष्णु राज्ञा तेन द्विजोत्तमाः । प्राह गंभीरया वाचा नृपं पुण्यनिधिं ततः
śrīsūta uvāca iti samprārthito viṣṇu rājñā tena dvijottamāḥ prāha gambhīrayā vācā nṛpaṁ puṇyanidhiṁ tataḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो! उस राजा द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए गए विष्णु ने गंभीर वाणी में राजा पुण्यनिधि से कहा।
श्लोक 80 (skanda.3.50.80)
विष्णुरुवाच । राजन्न भीस्त्वया कार्या मद्बंधननिमित्तजा
viṣṇur uvāca rājan na bhīs tvayā kāryā madbandhananimittajā
विष्णु ने कहा — हे राजन्! मेरे बंधन के कारण उत्पन्न भय तुम्हें नहीं करना चाहिए।
श्लोक 81 (skanda.3.50.81)
भक्तवश्यत्वमधुना तव प्रतिहितं मया । मम प्रीतिकरं यज्ञमकरोद्यद्भवानिह
bhaktavaśyatvam adhunā tava pratihitaṁ mayā mama prītikaraṁ yajñam akarod yad bhavān iha
मैंने अभी भक्तों के वश्यत्व को तुम्हारे लिए प्रदर्शित किया है। चूँकि तुमने यहाँ मेरी प्रसन्नता के लिए यज्ञ किया था,
श्लोक 82 (skanda.3.50.82)
अतस्त्वं मम भक्तोसि राजन्पुण्यनिधेऽधुना । तेनाहं तव वश्योऽस्मि भक्तिपाशेन यंत्रितः
atas tvaṁ mama bhakto'si rājan puṇyanidhe'dhunā tenāhaṁ tava vaśyo'smi bhaktipāśena yantritaḥ
इसलिए हे राजा पुण्यनिधे! अब तुम मेरे भक्त हो। उसी से मैं भक्ति के पाश से बंधकर तुम्हारे वश में हो गया हूँ।
श्लोक 83 (skanda.3.50.83)
भक्तापराधं सततं क्षमाम्यहमरिं दम । त्वद्भक्तिं ज्ञातुकामेन मया संप्रेरिता त्वियम्
bhaktāparādhaṁ satataṁ kṣamāmy aham ariṁdama tvadbhaktiṁ jñātukāmena mayā sampreritā tv iyam
हे शत्रु-दमन! मैं सदा भक्तों के अपराध को क्षमा करता हूँ। तुम्हारी भक्ति को जानने की इच्छा से ही मैंने इसे भेजा था।
श्लोक 84 (skanda.3.50.84)
लक्ष्मीर्मम प्रिया राजंस्त्वयासंरक्षिताऽधुना । तेनाहं तव तुष्टोऽस्मि मत्स्वरूपा त्वियं सदा
lakṣmīr mama priyā rājaṁs tvayāsaṁrakṣitādhunā tenāhaṁ tava tuṣṭo'smi matsvarūpā tv iyaṁ sadā
हे राजन्! मेरी प्रिया लक्ष्मी की तुमने अभी भलीभाँति रक्षा की है। इसी से मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; यह सदा मेरा ही स्वरूप है।
श्लोक 85 (skanda.3.50.85)
अस्यां यो भक्तिमांल्लोके स मद्भक्तोऽभिधीयते । अस्यां यो विमुखो राजन्स मद्द्वेषी स्मृतः सदा
asyāṁ yo bhaktimāṁl loke sa madbhakto'bhidhīyate asyāṁ yo vimukho rājan sa madveṣī smṛtaḥ sadā
इस लोक में जो इसके प्रति भक्तिमान है, वही मेरा भक्त कहा जाता है। हे राजन्! जो इससे विमुख है, वह सदा मेरा द्वेषी माना जाता है।
श्लोक 86 (skanda.3.50.86)
त्वमिमां भक्तिसं युक्तो यस्मात्पूजितवानसि । मत्पूजापि कृता तस्मान्मदभिन्ना त्वियं यतः
tvam imāṁ bhaktisaṁyukto yasmāt pūjitavān asi matpūjāpi kṛtā tasmān madabhinnā tv iyaṁ yataḥ
चूँकि तुमने भक्तियुक्त होकर इसकी पूजा की है, इसलिए मेरी पूजा भी तुमने की है, क्योंकि यह मुझसे अभिन्न है।
श्लोक 87 (skanda.3.50.87)
अतस्त्वया नापराधः कृतो मयि नरेश्वर । किं तु पूजैव विहिता तां त्वयार्चयता मम
atas tvayā nāparādhaḥ kṛto mayi nareśvara kiṁ tu pūjaiva vihitā tāṁ tvayārcayatā mama
अतः हे नरेश्वर! तुमने मेरे प्रति कोई अपराध नहीं किया। अपितु उसकी पूजा करते हुए तुमने मेरी ही पूजा की है।
श्लोक 88 (skanda.3.50.88)
त्वया मद्भार्यया साकं संकेतोऽकारि यत्पुरा । तत्संकेताभिगुत्यर्थं मां यद्बंधितवानसि
tvayā madbhāryayā sākaṁ saṅketo'kāri yat purā tatsaṅketābhiguptyarthaṁ māṁ yad bandhitavān asi
मेरी पत्नी के साथ पूर्वकाल में जो प्रतिज्ञा की गई थी, उस प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए ही तुमने मुझे बांधा है।
श्लोक 89 (skanda.3.50.89)
तेन प्रीतोस्मि ते राजँल्लक्ष्मीः संरक्षिताऽधुना । मत्स्वरूपा च सा लक्ष्मीर्जगन्माता त्रयीमयी
tena prītosmi te rājaḻ lakṣmīḥ saṁrakṣitādhunā matsvarūpā ca sā lakṣmīr jaganmātā trayīmayī
इससे हे राजन्! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; अभी लक्ष्मी सुरक्षित हुई है। वह लक्ष्मी मेरी ही स्वरूपा, जगत की माता, त्रयी-स्वरूपा है।
श्लोक 90 (skanda.3.50.90)
तद्रक्षां कुर्वता भूप त्वया यद्बंधनं मम । तत्प्रियं मम राजेंद्र मा भयं क्रियतां त्वया
tadrakṣāṁ kurvatā bhūpa tvayā yad bandhanaṁ mama tat priyaṁ mama rājendra mā bhayaṁ kriyatāṁ tvayā
हे राजन्! उसकी रक्षा करते हुए तुमने जो मुझे बांधा, वह मुझे प्रिय है। हे राजेंद्र! तुम भय मत करो।
श्लोक 91 (skanda.3.50.91)
इयं लक्ष्मीस्तव सुता सत्यमेव न संशयः । इतीरितेऽथ हरिणा लक्ष्मीः प्रोवाच भूपतिम्
iyaṁ lakṣmīs tava sutā satyam eva na saṁśayaḥ itīrite'tha hariṇā lakṣmīḥ provāca bhūpatim
यह लक्ष्मी सचमुच तुम्हारी पुत्री है, इसमें कोई संदेह नहीं।' हरि द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, लक्ष्मी ने राजा से कहा।
श्लोक 92 (skanda.3.50.92)
लक्ष्मीरुवाच । राजन्प्रीतास्मि ते चाहं रक्षिता यद्गृहे त्वया । त्वद्भक्तिशोधनार्थं वा अहं विष्णुरुभावपि
lakṣmīr uvāca rājan prītāsmi te cāhaṁ rakṣitā yad gṛhe tvayā tvadbhaktiśodhanārthaṁ vā ahaṁ viṣṇur ubhāv api
लक्ष्मी ने कहा — हे राजन्! तुमने अपने घर में मेरी जो रक्षा की, उससे मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारी भक्ति की परीक्षा के लिए ही मैं और विष्णु दोनों,
श्लोक 93 (skanda.3.50.93)
विनोद कलहव्याजादागताविह भूपते । तव योगेन भक्त्या च तुष्टावावां परंतप
vinodakalahavyājād āgatāv iha bhūpate tava yogena bhaktyā ca tuṣṭāvāvāṁ parantapa
हे राजन्! विनोद-कलह के बहाने यहाँ आए थे। हे शत्रु-संतापक! तुम्हारे योग और भक्ति से हम दोनों प्रसन्न हुए।
श्लोक 94 (skanda.3.50.94)
आवयोः कृपया राजन्सुखं ते भवतात्सदा । सर्वभूमंडलैश्वर्यं सदा ते भवतु ध्रुवम्
āvayoḥ kṛpayā rājan sukhaṁ te bhavatāt sadā sarvabhūmaṇḍalaiśvaryaṁ sadā te bhavatu dhruvam
हे राजन्! हम दोनों की कृपा से तुम्हें सदा सुख प्राप्त हो। सम्पूर्ण भूमंडल का ऐश्वर्य सदा तुम्हें निश्चय ही प्राप्त हो।
श्लोक 95 (skanda.3.50.95)
आवयोः पादयुगले भक्तिर्भवतु ते ध्रुवा । देहांते मम सायुज्यं पुनरावृत्तिवर्जितम्
āvayoḥ pādayugale bhaktir bhavatu te dhruvā dehānte mama sāyujyaṁ punarāvṛttivarjitam
हम दोनों के चरण-युगल में तुम्हारी भक्ति सुदृढ़ हो। देहांत होने पर पुनरावृत्ति-रहित मेरा सायुज्य प्राप्त हो।
श्लोक 96 (skanda.3.50.96)
नित्यं भवतु ते राजन्मा भूत्ते पापधीस्तथा । सदा धर्मे भव धीर्विष्णुभक्तियुता तव
nityaṁ bhavatu te rājan mā bhūt te pāpadhīs tathā sadā dharme bhava dhīr viṣṇubhaktiyutā tava
हे राजन्! तुम्हारी बुद्धि सदा नित्य रहे, तुम्हें पापबुद्धि कभी न हो। तुम्हारी बुद्धि सदा विष्णु-भक्ति से युक्त होकर धर्म में स्थिर रहे।
श्लोक 97 (skanda.3.50.97)
एवमुक्त्वा नृपं लक्ष्मीर्विष्णोर्वक्षस्थलं ययौ । अथ विष्णुरुवाचेदं राजानं द्विज पुंगवाः
evam uktvā nṛpaṁ lakṣmīr viṣṇor vakṣasthalaṁ yayau atha viṣṇur uvācedaṁ rājānaṁ dvijapuṅgavāḥ
राजा से इस प्रकार कहकर लक्ष्मी विष्णु के वक्षस्थल में समा गईं। हे द्विजपुंगवो! तब विष्णु ने राजा से यह कहा।
श्लोक 98 (skanda.3.50.98)
यथा त्वयात्र बद्धोहं निगडेन नृपोतम । तद्रूपेणैव वत्स्यामि सेतुमाधवसंज्ञितः
yathā tvayātra baddho'haṁ nigaḍena nṛpottama tadrūpeṇaiva vatsyāmi setumādhavasaṁjñitaḥ
हे उत्तम राजा! जैसे मैं यहाँ तुम्हारे द्वारा बेड़ी से बांधा गया, उसी रूप में मैं सेतुमाधव नाम से यहाँ निवास करूँगा।
श्लोक 99 (skanda.3.50.99)
मयैव कारितः सेतुस्तद्रक्षार्थमहं नृप । भूतराक्षससंघेभ्यो भयानामुपशांतये
mayaiva kāritaḥ setus tadrakṣārtham ahaṁ nṛpa bhūtarākṣasasaṅghebhyo bhayānām upaśāntaye
हे राजन्! यह सेतु मेरे ही द्वारा बनवाया गया है; उसकी रक्षा के लिए, तथा भूत-राक्षसों के समूहों से उत्पन्न भयों की शांति के लिए,
श्लोक 100 (skanda.3.50.100)
ब्रह्मापि सेतुरक्षार्थं वसत्यत्रदिवानिशम्। शंकरो रामनाथाख्यो नित्यं सेतौ वसत्यथ
brahmāpi seturakṣārthaṁ vasaty atra divāniśam śaṅkaro rāmanāthākhyo nityaṁ setau vasaty atha
ब्रह्मा भी सेतु की रक्षा के लिए यहाँ दिन-रात निवास करते हैं। शंकर भी रामनाथ नाम से सदा सेतु में निवास करते हैं।
श्लोक 101 (skanda.3.50.101)
इंद्रादिलोकपालाश्च वसंत्यत्रमुदान्विताः । अतोऽहमत्रवत्स्यामि सेतुमाधवसंज्ञया
indrādilokapālāś ca vasanty atra mudānvitāḥ ato'ham atra vatsyāmi setumādhavasaṁjñayā
इंद्र आदि लोकपाल भी आनंदपूर्वक यहाँ निवास करते हैं। अतः मैं भी सेतुमाधव नाम से यहाँ निवास करूँगा,
श्लोक 102 (skanda.3.50.102)
सेतुसंरक्षणार्थं वै सर्वोपद्रवशांतये । सर्वेषामिष्टसिद्ध्यर्थं सर्वपापोपशांतये
setusaṁrakṣaṇārthaṁ vai sarvopadravaśāntaye sarveṣām iṣṭasiddhyarthaṁ sarvapāpopaśāntaye
सेतु की रक्षा के लिए, समस्त उपद्रवों की शांति के लिए, सबकी अभीष्ट-सिद्धि के लिए, तथा समस्त पापों की शांति के लिए।
श्लोक 103 (skanda.3.50.103)
त्वया निगडबद्धं मां सेवते येऽत्र मानवाः । ते यांति मम सायुज्यं सर्वाभीष्टं तथा नृप
tvayā nigaḍabaddhaṁ māṁ sevate ye'tra mānavāḥ te yānti mama sāyujyaṁ sarvābhīṣṭaṁ tathā nṛpa
तुम्हारे द्वारा बेड़ी से बंधे हुए मुझे जो मनुष्य यहाँ सेवा करते हैं, वे मेरे सायुज्य को प्राप्त होते हैं, तथा हे राजन्! समस्त अभीष्ट को भी प्राप्त करते हैं।
श्लोक 104 (skanda.3.50.104)
मम लक्ष्म्यास्तव तथा चरितं ये पठंति वै। न ते यास्यंति दारिद्र्यं किं त्वैश्वर्यं व्रजंति ते
mama lakṣmyās tava tathā caritaṁ ye paṭhanti vai na te yāsyanti dāridryaṁ kiṁ tv aiśvaryaṁ vrajanti te
जो कोई मेरे और लक्ष्मी के, तथा तुम्हारे इस चरित्र को पढ़ते हैं, वे दरिद्रता को प्राप्त नहीं होते, अपितु वे ऐश्वर्य को ही प्राप्त करते हैं।
श्लोक 105 (skanda.3.50.105)
त्वत्कृतं यदिदं स्तोत्रं मम लक्ष्म्या विशांपते । ये पठंति च शृण्वंति लिखंति च मुदान्विताः
tvatkṛtaṁ yad idaṁ stotraṁ mama lakṣmyā viśāṁpate ye paṭhanti ca śṛṇvanti likhanti ca mudānvitāḥ
हे राजन्! तुम्हारे द्वारा रचित मेरा और लक्ष्मी का यह स्तोत्र, जो आनंदपूर्वक पढ़ते हैं, सुनते हैं, तथा लिखते हैं,
श्लोक 106 (skanda.3.50.106)
न तेषां पुनरावृत्तिर्मम लोकात्कदाचन । इत्युक्त्वा स हरिस्तत्र नृपं पुण्यनिधिं तदा
na teṣāṁ punarāvṛttir mama lokāt kadācana ityuktvā sa haris tatra nṛpaṁ puṇyanidhiṁ tadā
उनकी मेरे लोक से पुनरावृत्ति कभी नहीं होती।' ऐसा कहकर हरि ने वहाँ राजा पुण्यनिधि को,
श्लोक 107 (skanda.3.50.107)
तत्रैव पूर्णरूपेण संनि धत्ते स्म सर्वदा । नृपः पुण्यनिधिर्विप्राः सेतुमाधवरूपिणम्
tatraiva pūrṇarūpeṇa sannidhatte sma sarvadā nṛpaḥ puṇyanidhir viprāḥ setumādhavarūpiṇam
उसी स्थान पर सदा पूर्ण-रूप से उपस्थित रहने लगे। हे विप्रो! राजा पुण्यनिधि ने सेतुमाधव-रूपी,
श्लोक 108 (skanda.3.50.108)
विष्णुं प्रणम्य भक्त्या तु महापूजां विधाय च । सेवित्वा रामनाथं च स्वमेव भवनं ययौ
viṣṇuṁ praṇamya bhaktyā tu mahāpūjāṁ vidhāya ca sevitvā rāmanāthaṁ ca svam eva bhavanaṁ yayau
विष्णु को भक्तिपूर्वक प्रणाम कर, महापूजा विधिपूर्वक कर, तथा रामनाथ की सेवा कर, अपने ही भवन को लौट गया।
श्लोक 109 (skanda.3.50.109)
यावज्जीवमसौ तत्र सेतौ न्यवसदुत्तमे । मधुरायां निजं पुत्रं स्थापयामास पालकम्
yāvajjīvam asau tatra setau nyavasad uttame madhurāyāṁ nijaṁ putraṁ sthāpayāmāsa pālakam
वह जीवनभर उस उत्तम सेतु में निवास करता रहा। मदुरा में अपने पुत्र को शासक के रूप में स्थापित किया।
श्लोक 110 (skanda.3.50.110)
तत्रैव निवसन्राजा देहांते मुक्तिमाप्तवान् । विंध्यावलिश्च तत्पत्नी तमेवानुममार सा । पतिव्रता पतिप्राणा प्रययौ सापि सद्गतिम्
tatraiva nivasan rājā dehānte muktim āptavān vindhyāvaliś ca tatpatnī tam evānumamāra sā pativratā patiprāṇā prayayau sāpi sadgatim
वहीं निवास करते हुए राजा ने देहांत होने पर मुक्ति प्राप्त की। उसकी पत्नी विंध्यावलि भी उसका अनुसरण करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुई। पतिव्रता, पति-प्राणा वह भी सद्गति को प्राप्त हुई।
श्लोक 111 (skanda.3.50.111)
श्रीसूत उवाच । येत्र भक्तियुता नित्यं सेवंते सेतुमाधवम्
śrīsūta uvāca yatra bhaktiyutā nityaṁ sevante setumādhavam
श्री सूत जी ने कहा — जो लोग यहाँ भक्तियुक्त होकर सदा सेतुमाधव की सेवा करते हैं,
श्लोक 112 (skanda.3.50.112)
न तेषां पुनरावृत्तिः कैलासाज्जातु जायते । सेतुमाधवसेवा ये न कुर्वंत्यत्र मानवाः
na teṣāṁ punarāvṛttiḥ kailāsāj jātu jāyate setumādhavasevā ye na kurvanty atra mānavāḥ
उनकी कैलास से पुनरावृत्ति कभी नहीं होती। जो मनुष्य यहाँ सेतुमाधव की सेवा नहीं करते,
श्लोक 113 (skanda.3.50.113)
न तेषां रामनाथस्य सेवा फलवती भवेत् । गृहीत्वा सैकतं सेतोर्गंगायां निक्षिपेद्यदि
na teṣāṁ rāmanāthasya sevā phalavatī bhavet gṛhītvā saikataṁ setor gaṅgāyāṁ nikṣiped yadi
उनकी रामनाथ की सेवा भी सफल नहीं होती। यदि कोई सेतु की बालू लेकर गंगा में डाले,
श्लोक 114 (skanda.3.50.114)
विभज्य माधवपुरे वैकुंठे स वसेन्नरः । गंगां जिगमिषुर्विप्राः सेतुमाधवसन्निधौ
vibhajya mādhavapure vaikuṇṭhe sa vasen naraḥ gaṅgāṁ jigamiṣur viprāḥ setumādhavasannidhau
वह मनुष्य माधवपुर में वैकुंठ में निवास करता है। हे विप्रो! गंगा जाने के इच्छुक व्यक्ति को सेतुमाधव के सान्निध्य में,
श्लोक 115 (skanda.3.50.115)
संकल्प्य गंगां निर्गच्छेत्सा यात्रा सफला भवेत्। आनीय गंगासलिलं रामेशमभि षिच्य च
saṅkalpya gaṅgāṁ nirgacchet sā yātrā saphalā bhavet ānīya gaṅgāsalilaṁ rāmeśam abhiṣicya ca
संकल्प कर गंगा के लिए प्रस्थान करे; उसकी वह यात्रा सफल होगी। गंगा-जल लाकर रामेश्वर का अभिषेक कर,
श्लोक 116 (skanda.3.50.116)
सेतौ निक्षिप्य तद्भारं ब्रह्म प्राप्नोत्यसंशयः । इति वः कथितं विप्राः सेतुमाधववैभवम्
setau nikṣipya tadbhāraṁ brahma prāpnoty asaṁśayaḥ iti vaḥ kathitaṁ viprāḥ setumādhavavaibhavam
उसके भार को सेतु में डालकर, वह निःसंदेह ब्रह्म को प्राप्त होता है। हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें सेतुमाधव का वैभव कहा।
श्लोक 117 (skanda.3.50.117)
एतत्पठन्वा शृण्वन्वा वैकुंठे लभते गतिम्
etat paṭhan vā śṛṇvan vā vaikuṇṭhe labhate gatim
इसे पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य वैकुंठ में गति प्राप्त करता है।