ब्रह्म खण्ड · अध्याय 51
सेतु-यात्रा-क्रम का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.3.51.1)
सूत उवाच । अथातः संप्रवक्ष्यामि सेतुयात्राक्रमं द्विजाः । यं श्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवः क्षणात्
sūta uvāca athātaḥ sampravakṣyāmi setuyātrākramaṁ dvijāḥ yaṁ śrutvā sarvapāpebhyo mucyate mānavaḥ kṣaṇāt
सूत जी ने कहा — हे द्विजो! अब मैं सेतु-यात्रा के क्रम का वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर मनुष्य क्षणभर में समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.3.51.2)
स्नात्वाचम्य विशुद्धात्मा कृतनित्यविधिः सुधीः । रामनाथस्य तुष्ट्यर्थं प्रीत्यर्थं राघवस्य च
snātvācamya viśuddhātmā kṛtanityavidhiḥ sudhīḥ rāmanāthasya tuṣṭyarthaṁ prītyarthaṁ rāghavasya ca
स्नान और आचमन कर, विशुद्ध आत्मा वाला, नित्य विधि को पूर्ण करने वाला बुद्धिमान पुरुष, रामनाथ की तुष्टि तथा राघव की प्रीति के लिए,
श्लोक 3 (skanda.3.51.3)
भोजयित्वा यथाशक्ति ब्राह्मणान्वेदपारगान् । भस्मोद्धूलितसर्वांगस्त्रिपुंड्रांकितमस्तकः
bhojayitvā yathāśakti brāhmaṇān vedapāragān bhasmoddhūlitasarvāṅgas tripuṇḍrāṅkitamastakaḥ
यथाशक्ति वेद-पारंगत ब्राह्मणों को भोजन कराकर, समस्त अंगों में भस्म लगाए हुए, मस्तक पर त्रिपुण्ड्र अंकित किए हुए,
श्लोक 4 (skanda.3.51.4)
गोपीचन्दनलिप्तो वा स्वभालेऽप्यूर्ध्वपुंड्रकः । रुद्राक्षमालाभरणः सपवित्रकरः शुचिः
gopīcandanalipto vā svabhāle'py ūrdhvapuṇḍrakaḥ rudrākṣamālābharaṇaḥ sapavitrakaraḥ śuciḥ
अथवा अपने ललाट पर गोपीचंदन से ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाए हुए, रुद्राक्ष-माला से अलंकृत, हाथ में पवित्रक धारण किए हुए, पवित्र,
श्लोक 5 (skanda.3.51.5)
सेतुयात्रां करिष्येऽहमिति संकल्प्य भक्तितः । स्वगृहात्प्रव्रजेन्मौनी जपन्नष्टाक्षरं मनुम्
setuyātrāṁ kariṣye'ham iti saṅkalpya bhaktitaḥ svagṛhāt pravrajen maunī japann aṣṭākṣaraṁ manum
'मैं सेतु-यात्रा करूँगा' — ऐसा संकल्प भक्तिपूर्वक करके, मौन धारण किए हुए, अष्टाक्षर मंत्र का जप करते हुए, अपने घर से प्रस्थान करे।
श्लोक 6 (skanda.3.51.6)
पंचाक्षरं नाममंत्रं जपेन्नियतमानसः । एकवारं हविष्याशी जितक्रोधो जितेंद्रियः
pañcākṣaraṁ nāmamantraṁ japen niyatamānasaḥ ekavāraṁ haviṣyāśī jitakrodho jitendriyaḥ
संयत मन से पंचाक्षर नाम-मंत्र का जप करे। एक बार हविष्यान्न खाने वाला, क्रोध पर विजय पाने वाला, इंद्रियों को जीतने वाला,
श्लोक 7 (skanda.3.51.7)
पादुकाछत्ररहितस्तांबूलपरिवर्जितः । तैलाभ्यंगविहीनश्च स्त्रीसंगादिविवर्जितः
pādukāchatrarahitas tāmbūlaparivarjitaḥ tailābhyaṅgavihīnaś ca strīsaṅgādivivarjitaḥ
पादुका और छाता रहित, पान से रहित, तेल-मालिश से रहित, तथा स्त्री-संग आदि से रहित,
श्लोक 8 (skanda.3.51.8)
शौचाद्याचारसंयुक्तः सन्ध्योपास्तिपरायणः । गायत्र्युपास्तिं कुर्वाणस्त्रिसंध्यं रामचिंतकः
śaucādyācārasaṁyuktaḥ sandhyopāstiparāyaṇaḥ gāyatryupāstiṁ kurvāṇas trisandhyaṁ rāmacintakaḥ
शौच आदि आचारों से युक्त, संध्या-उपासना में तत्पर, गायत्री की उपासना करता हुआ, त्रिकाल संध्या में राम का चिंतन करने वाला,
श्लोक 9 (skanda.3.51.9)
मध्येमार्गं पठन्नित्यं सेतुमाहात्म्यमादरात् । पठन्रामायणं वापि पुराणांतरमेव वा
madhyemārgaṁ paṭhan nityaṁ setumāhātmyam ādarāt paṭhan rāmāyaṇaṁ vāpi purāṇāntaram eva vā
मार्ग में सदा आदरपूर्वक सेतु-माहात्म्य का पाठ करते हुए, अथवा रामायण का, अथवा किसी अन्य पुराण का पाठ करते हुए,
श्लोक 10 (skanda.3.51.10)
व्यर्थवाक्यानि संत्यज्य सेतुं गच्छेद्विशुद्धये । प्रतिग्रहं न गृह्णीयान्नाचारांश्च परित्यजेत्
vyarthavākyāni santyajya setuṁ gacched viśuddhaye pratigrahaṁ na gṛhṇīyān nācārāṁś ca parityajet
व्यर्थ वचनों को त्यागकर, शुद्धि के लिए सेतु की ओर जाए। दान ग्रहण न करे, तथा सदाचार को न त्यागे।
श्लोक 11 (skanda.3.51.11)
कुर्यान्मार्गे यथाशक्ति शिवविष्ण्वादिपूजनम् । वैश्वदेवादिकर्माणि यथाशक्ति समाचरेत्
kuryān mārge yathāśakti śivaviṣṇvādipūjanam vaiśvadevādikarmāṇi yathāśakti samācaret
मार्ग में यथाशक्ति शिव-विष्णु आदि का पूजन करे। यथाशक्ति वैश्वदेव आदि कर्मों का आचरण करे।
श्लोक 12 (skanda.3.51.12)
ब्रह्मयज्ञमुखान्धर्मान्प्रकुर्याच्चाग्निपूजनम् । अतिथिभ्योऽन्नपानादि संप्रदद्याद्यथाबलम्
brahmayajñamukhān dharmān prakuryāc cāgnipūjanam atithibhyo'nnapānādi sampradadyād yathābalam
ब्रह्मयज्ञ आदि धर्मों का तथा अग्नि-पूजन का पालन करे। अतिथियों को यथाशक्ति अन्न-पान आदि प्रदान करे।
श्लोक 13 (skanda.3.51.13)
दद्याद्भिक्षां यतिभ्योऽपि वित्तशाठ्यं परित्यजन् । शिवविष्ण्वादिनामानि स्तोत्राणि च पठेत्पथि
dadyād bhikṣāṁ yatibhyo'pi vittaśāṭhyaṁ parityajan śivaviṣṇvādināmāni stotrāṇi ca paṭhet pathi
धन के प्रति कंजूसी त्यागते हुए, संन्यासियों को भी भिक्षा दे। मार्ग में शिव-विष्णु आदि के नामों तथा स्तोत्रों का पाठ करे।
श्लोक 14 (skanda.3.51.14)
धर्ममेव सदा कुर्यान्निषिद्धानि परित्यजेत् । इत्यादिनियमोपेतः सेतुमूलं ततो व्रजेत्
dharmam eva sadā kuryān niṣiddhāni parityajet ityādiniyamopetaḥ setumūlaṁ tato vrajet
सदा धर्म का ही आचरण करे, निषिद्ध कर्मों को त्यागे। इन आदि नियमों से युक्त होकर तब सेतु के मूल स्थान की ओर जाए।
श्लोक 15 (skanda.3.51.15)
पाषाणं प्रथमं दद्यात्तत्र गत्वा समाहितः । तत्रावाह्य समुद्रं च प्रणमेत्तदनंतरम्
pāṣāṇaṁ prathamaṁ dadyāt tatra gatvā samāhitaḥ tatrāvāhya samudraṁ ca praṇamet tadanantaram
वहाँ जाकर, एकाग्रचित्त होकर, पहले एक पाषाण अर्पित करे। वहाँ समुद्र का आवाहन कर, उसके पश्चात् प्रणाम करे।
श्लोक 16 (skanda.3.51.16)
अर्घ्यं दद्यात्समुद्राय प्रार्थयेत्तदनंतरम् । अनुज्ञां च ततः कुर्यात्ततः स्नायान्महोदधौ
arghyaṁ dadyāt samudrāya prārthayet tadanantaram anujñāṁ ca tataḥ kuryāt tataḥ snāyān mahodadhau
समुद्र को अर्घ्य दे, उसके पश्चात् प्रार्थना करे। फिर अनुज्ञा प्राप्त करे, फिर महासागर में स्नान करे।
श्लोक 17 (skanda.3.51.17)
मुनीनामथ देवानां कपीनां पितृणां तथा । प्रकुर्यात्तर्पणं विप्रा मनसा संस्मरन्हरिम्
munīnām atha devānāṁ kapīnāṁ pitṛṇāṁ tathā prakuryāt tarpaṇaṁ viprā manasā saṁsmaran harim
हे विप्रो! मन से हरि का स्मरण करते हुए, मुनियों, देवों, वानरों, तथा पितरों का तर्पण करे।
श्लोक 18 (skanda.3.51.18)
पाषाणसप्तकं दद्यादेकं वा विप्रपुंगवाः । पाषाणदानात्सफलं स्नानं भवति नान्यथा
pāṣāṇasaptakaṁ dadyād ekaṁ vā viprapuṅgavāḥ pāṣāṇadānāt saphalaṁ snānaṁ bhavati nānyathā
[पाषाण-संख्या] हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! सात पाषाण अथवा एक पाषाण अर्पित करे। पाषाण-दान से ही स्नान सफल होता है, अन्यथा नहीं।
श्लोक 19 (skanda.3.51.19)
पिप्पलादसमुत्पन्ने कृत्ये लोकभयंकरे । पाषाणं ते मया दत्तमाहारार्थं प्रकल्प्यताम्
pippalādasamutpanne kṛtye lokabhayaṅkare pāṣāṇaṁ te mayā dattam āhārārthaṁ prakalpyatām
[पाषाण-दान-मंत्र] "हे पिप्पलाद से उत्पन्न, लोक को भयभीत करने वाली कृत्या! यह पाषाण मेरे द्वारा तुम्हें दिया गया है, आहार के रूप में स्वीकार किया जाए।"
श्लोक 20 (skanda.3.51.20)
विश्वार्चिस्त्वं घृताचिस्त्वं विश्वयोने विशांपते । सान्निध्यं कुरु मे देव सागरे लवणांभसि
viśvārcis tvaṁ ghṛtācis tvaṁ viśvayone viśāṁpate sānnidhyaṁ kuru me deva sāgare lavaṇāmbhasi
[सान्निध्य-प्रार्थना-मंत्र] "हे विश्व-अर्चि! हे घृत-अर्चि! हे विश्व-योनि! हे प्रजापते! हे देव! लवण-जल वाले सागर में मेरे लिए सान्निध्य कीजिए।"
श्लोक 21 (skanda.3.51.21)
नमस्ते विश्वगुप्ताय नमो विष्णो ह्यपांपते । नमो हिरण्यशृंगाय नदीनां पतये नमः । समुद्राय वयूनाय प्रोच्चार्य प्रणमेत्तथा
namaste viśvaguptāya namo viṣṇo hy apāṁpate namo hiraṇyaśṛṅgāya nadīnāṁ pataye namaḥ samudrāya vayūnāya proccārya praṇamet tathā
[नमस्कार-मंत्र] "हे विश्व की रक्षा करने वाले, आपको नमस्कार है। हे विष्णु! हे जलों के स्वामी! हे हिरण्यशृंग! हे नदियों के पति! आपको नमस्कार है।" समुद्र तथा वयून का उच्चारण कर इस प्रकार प्रणाम करे।
श्लोक 22 (skanda.3.51.22)
सर्वरत्नमय श्रीमन्सर्वरत्नाकराकर । सर्वरत्नप्रधानस्त्वं गृहाणार्घ्यं महोदधे
sarvaratnamaya śrīman sarvaratnākarākara sarvaratnapradhānas tvaṁ gṛhāṇārghyaṁ mahodadhe
[अर्घ्य-मंत्र] "हे सर्व-रत्नमय! हे श्रीमन्! हे सर्व-रत्नों की खान की खान! तुम सर्व-रत्नों में प्रधान हो; हे महासागर! अर्घ्य ग्रहण करो।"
श्लोक 23 (skanda.3.51.23)
अशेषजगदाधार शंखचक्रगदाधर । देहि देव ममानुज्ञां युष्मत्तीर्थनिषेवणे
aśeṣajagadādhāra śaṅkhacakragadādhara dehi deva mamānujñāṁ yuṣmattīrthaniṣevaṇe
[अनुज्ञापन-मंत्र] "हे समस्त जगत के आधार! हे शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले! हे देव! मुझे आपके तीर्थ के सेवन की अनुज्ञा दीजिए।"
श्लोक 24 (skanda.3.51.24)
प्राच्यां दिशि च सुग्रीवं दक्षिणस्यां नलं स्मरेत्
prācyāṁ diśi ca sugrīvaṁ dakṣiṇasyāṁ nalaṁ smaret
[प्रार्थना-मंत्र] पूर्व दिशा में सुग्रीव का, दक्षिण दिशा में नल का स्मरण करे।
श्लोक 25 (skanda.3.51.25)
प्रतीच्यां मैंदनामानमुदीच्यां द्विविदं तथा । रामं च लक्ष्मणं चैव सीतामपि यशस्विनीम्
pratīcyāṁ maindanāmānam udīcyāṁ dvividaṁ tathā rāmaṁ ca lakṣmaṇaṁ caiva sītām api yaśasvinīm
पश्चिम में मैंद नामक वानर का, उत्तर में द्विविद का, तथा राम, लक्ष्मण, और यशस्विनी सीता का भी स्मरण करे।
श्लोक 26 (skanda.3.51.26)
अंगदं वायुतनयं स्मरेन्मध्ये विभीषणम् । पृथिव्यां यानि तीर्थानि प्राविशंस्त्वा महोदधे
aṅgadaṁ vāyutanayaṁ smaren madhye vibhīṣaṇam pṛthivyāṁ yāni tīrthāni prāviśaṁs tvā mahodadhe
मध्य में अंगद, पवनपुत्र (हनुमान), तथा विभीषण का स्मरण करे। पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं, हे महासागर! वे तुझमें प्रविष्ट हुए हैं।
श्लोक 27 (skanda.3.51.27)
स्नानस्य मे फलं देहि सर्वस्मात्त्राहि मांहसः । हिरण्यशृंगमित्याभ्यां नाभ्यां नारायणं स्मरेत्
snānasya me phalaṁ dehi sarvasmāt trāhi māṁ hasaḥ hiraṇyaśṛṅgam ity ābhyāṁ nābhyāṁ nārāyaṇaṁ smaret
"मुझे स्नान का फल दो, और मुझे समस्त पापों से बचाओ।" 'हिरण्यशृंग' — इन दोनों नामों से नारायण का स्मरण करे।
श्लोक 28 (skanda.3.51.28)
ध्यायन्नारायणं देवं स्नानादिषु च कर्मसु । ब्रह्मलोकमवाप्नोति जायते नेह वै पुनः
dhyāyan nārāyaṇaṁ devaṁ snānādiṣu ca karmasu brahmalokam avāpnoti jāyate neha vai punaḥ
स्नान आदि कर्मों में देव नारायण का ध्यान करते हुए मनुष्य ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है, वह पुनः यहाँ जन्म नहीं लेता।
श्लोक 29 (skanda.3.51.29)
सर्वेषामपि पापानां प्रायश्चित्तं भवेत्ततः । प्रह्लादं नारदं व्यासमंबरीषं शुकं तथा । अन्यांश्च भगवद्भक्तांश्चिंतयेदेकमानसः
sarveṣām api pāpānāṁ prāyaścittaṁ bhavet tataḥ prahlādaṁ nāradaṁ vyāsam ambarīṣaṁ śukaṁ tathā anyāṁś ca bhagavadbhaktāṁś cintayed ekamānasaḥ
इससे समस्त पापों का प्रायश्चित्त हो जाता है। एकाग्रचित्त होकर प्रह्लाद, नारद, व्यास, अम्बरीष, शुक, तथा अन्य भगवद्-भक्तों का चिंतन करे।
श्लोक 30 (skanda.3.51.30)
वेदादिर्यो वेदवसिष्ठयोनिः सरित्पतिः सागररत्नयोनिः । अग्निश्च तेजश्च इलां च तेजो रेतोधा विष्णुरमृतस्य नाभिः
vedādir yo vedavasiṣṭhayoniḥ saritpatiḥ sāgararatnayoniḥ agniś ca tejaś ca ilāṁ ca tejo retodhā viṣṇur amṛtasya nābhiḥ
[स्नान-मंत्र] जो वेदों का आदि है, वेद-वसिष्ठ का उद्गम है, नदियों का स्वामी, सागर-रत्नों का उद्गम है; अग्नि है, तेज है, पृथ्वी को तेज देने वाला है, वीर्य-धारक विष्णु अमृत की नाभि है।
श्लोक 31 (skanda.3.51.31)
इदं ते अन्याभिरसमानमद्भिर्याः काश्च सिंधुं प्रविशंत्यापः । सर्पो जीर्णामिव त्वचं जहामि पापं शरीरात्सशिरस्कोऽभ्युपेत्य
idaṁ te anyābhir asamānam adbhir yāḥ kāśca sindhuṁ praviśanty āpaḥ sarpo jīrṇām iva tvacaṁ jahāmi pāpaṁ śarīrāt saśiraskо'bhyupetya
यह जल तुम्हारे अन्य जलों से अतुल्य है, जो भी जल सिंधु में प्रवेश करते हैं। सिर सहित उसमें उतरकर मैं शरीर से पाप को वैसे ही त्याग देता हूँ, जैसे सर्प पुरानी त्वचा को त्यागता है।
श्लोक 32 (skanda.3.51.32)
समुद्राय वयूनाय नमस्कुर्यात्पुनर्द्विजाः । सर्वतीर्थमयं शुद्धं नदीनां पतिमंबुधिम्
samudrāya vayūnāya namaskuryāt punar dvijāḥ sarvatīrthamayaṁ śuddhaṁ nadīnāṁ patim ambudhim
हे द्विजो! फिर समुद्र तथा वयून को नमस्कार करे — जो समस्त तीर्थों से युक्त, शुद्ध, नदियों के स्वामी सागर हैं।
श्लोक 33 (skanda.3.51.33)
द्वौ समुद्राविति पुनः प्रोच्चार्य स्नानमाचरेत् । ब्रह्मांडोदरतीर्थानि करस्पृष्टानि ते रवे
dvau samudrāv iti punaḥ proccārya snānam ācaret brahmāṇḍodaratīrthāni karaspṛṣṭāni te rave
'दो समुद्र' — यह पुनः उच्चारण कर स्नान करे। "हे रवि! ब्रह्मांड के भीतर के तीर्थ आपके द्वारा स्पर्श किए गए हैं।"
श्लोक 34 (skanda.3.51.34)
तेन सत्येन मे सेतौ तीर्थं देहि दिवाकर । प्राच्यां दिशि च सुग्रीवमित्यादिक्रमयोगतः
tena satyena me setau tīrthaṁ dehi divākara prācyāṁ diśi ca sugrīvam ity ādikramayogataḥ
"उस सत्य से, हे दिवाकर! मुझे सेतु में तीर्थ प्रदान करो।" 'पूर्व दिशा में सुग्रीव' आदि क्रम के अनुसार,
श्लोक 35 (skanda.3.51.35)
स्मृत्वा भूयो द्विजाः सेतौ तृतीयं स्नानमाचरेत् । देवीपत्तनमारभ्य प्रव्रजेद्यदि मानवः
smṛtvā bhūyo dvijāḥ setau tṛtīyaṁ snānam ācaret devīpattanam ārabhya pravrajed yadi mānavaḥ
हे द्विजो! फिर उनका स्मरण कर सेतु में तीसरा स्नान करे। यदि मनुष्य देवीपत्तन से यात्रा आरम्भ करे,
श्लोक 36 (skanda.3.51.36)
तदा तु नवपाषाणमध्ये सेतौ विमुक्तिदे । स्नानमंबुनिधौ कुर्यात्स्वपापौघापनुत्तये
tadā tu navapāṣāṇamadhye setau vimuktide snānam ambunidhau kuryāt svapāpaughāpanuttaye
तो मुक्ति देने वाले सेतु में, नौ पाषाणों के मध्य, अपने पाप-समूह के नाश के लिए, महासागर में स्नान करे।
श्लोक 37 (skanda.3.51.37)
दर्भशय्यापदव्या चेद्गच्छेत्सेतुं विमुक्तिदम् । तदा तत्रोदधावेव स्नानं कुर्याद्विमुक्तये
darbhaśayyāpadavyā ced gacchet setuṁ vimuktidam tadā tatrodadhāv eva snānaṁ kuryād vimuktaye
यदि दर्भशय्या के मार्ग से मुक्ति देने वाले सेतु की ओर जाए, तो वहाँ भी सागर में ही मुक्ति के लिए स्नान करे।
श्लोक 38 (skanda.3.51.38)
पिप्पलादं कविं कण्वं कृतांतं जीवितेश्वरम् । मन्युं च कालरात्रिं च विद्यां चाहर्गणेश्वरम्
pippalādaṁ kaviṁ kaṇvaṁ kṛtāntaṁ jīviteśvaram manyuṁ ca kālarātriṁ ca vidyāṁ cāhargaṇeśvaram
[तर्पण-विधि] पिप्पलाद, कवि, कण्व, कृतांत, जीवितेश्वर, मन्यु, कालरात्रि, विद्या, तथा अहर्गणेश्वर —
श्लोक 39 (skanda.3.51.39)
वसिष्ठं वामदेवं च पराशरमुमापतिम् । वाल्मिकिं नारदं चैव वालखिल्यान्मुनींस्तथा
vasiṣṭhaṁ vāmadevaṁ ca parāśaram umāpatim vālmikiṁ nāradaṁ caiva vālakhilyān munīṁs tathā
वसिष्ठ, वामदेव, पराशर, उमापति (शिव), वाल्मीकि, नारद, तथा वालखिल्य मुनियों को भी —
श्लोक 40 (skanda.3.51.40)
नलं नीलं गवाक्षं च गवयं गन्धमादनम् । मैंदं च द्विविदं चैव शरभं चर्षभं तथा
nalaṁ nīlaṁ gavākṣaṁ ca gavayaṁ gandhamādanam maindaṁ ca dvividaṁ caiva śarabhaṁ carṣabhaṁ tathā
नल, नील, गवाक्ष, गवय, गंधमादन, मैंद, द्विविद, शरभ, तथा ऋषभ को भी —
श्लोक 41 (skanda.3.51.41)
सुग्रीवं च हनूमंतं वेगदर्शनमेव च । रामं च लक्ष्मणं सीतां महाभागां यशस्विनीम्
sugrīvaṁ ca hanūmantaṁ vegadarśanam eva ca rāmaṁ ca lakṣmaṇaṁ sītāṁ mahābhāgāṁ yaśasvinīm
सुग्रीव, हनुमान, वेगदर्शन, राम, लक्ष्मण, तथा महाभागा यशस्विनी सीता को —
श्लोक 42 (skanda.3.51.42)
त्रिः कृत्वा तर्पयेदेतान्मंत्रानुक्त्वा यथाक्रमम् । विभोश्च तत्तन्नामानि चतुर्थ्यंतानि वै द्विजाः
triḥ kṛtvā tarpayed etān mantrān uktvā yathākramam vibhoś ca tattannāmāni caturthyantāni vai dvijāḥ
इन सभी को तीन बार, यथाक्रम मंत्रों का उच्चारण कर, तर्पण दे। हे द्विजो! उस विभु के उन-उन नामों को चतुर्थी-विभक्ति में उच्चारण करे।
श्लोक 43 (skanda.3.51.43)
देवा नृषीन्पितॄंश्चैव विधिवच्च तिलोदकैः । द्वितीयांतानि नामानि चोक्त्वा तर्पयेद्द्विजाः
devān nṛṣīn pitṝṁś caiva vidhivac ca tilodakaiḥ dvitīyāntāni nāmāni coktvā tarpayed dvijāḥ
हे द्विजो! देवों, राजर्षियों, तथा पितरों को विधिपूर्वक तिल-मिश्रित जल से, द्वितीया-विभक्ति में नामों का उच्चारण कर, तर्पण दे।
श्लोक 44 (skanda.3.51.44)
तर्पयेत्सपवित्रस्तु जले स्थित्वा प्रसन्नधीः । तर्पणात्सर्वतीर्थेषु स्नानस्य फलमाप्नुयात्
tarpayet sapavitras tu jale sthitvā prasannadhīḥ tarpaṇāt sarvatīrtheṣu snānasya phalam āpnuyāt
पवित्रक सहित, जल में खड़े होकर, प्रसन्न-चित्त से तर्पण दे। तर्पण से समस्त तीर्थों में स्नान का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 45 (skanda.3.51.45)
एवमेतांस्तर्पयित्वा नमस्कृत्योत्तरेज्जलात् । आर्द्रवस्त्रं परित्यज्य शुष्कवासःसमावृतः
evam etāṁs tarpayitvā namaskṛtyottarej jalāt ārdravastraṁ parityajya śuṣkavāsaḥsamāvṛtaḥ
इस प्रकार इन सबको तर्पण देकर, नमस्कार कर, जल से बाहर आए। गीले वस्त्र को त्यागकर, सूखे वस्त्र से आवृत होकर,
श्लोक 46 (skanda.3.51.46)
आचम्य सपवित्रश्च विधिवच्छ्राद्धमाचरेत् । पिंडान्पितृभ्यो दद्याच्च तिलतण्डुलकैस्तथा
ācamya sapavitraś ca vidhivac chrāddham ācaret piṇḍān pitṛbhyo dadyāc ca tilataṇḍulakais tathā
आचमन कर, पवित्रक सहित विधिपूर्वक श्राद्ध करे। पितरों को तिल तथा चावल से बने पिंड अर्पित करे।
श्लोक 47 (skanda.3.51.47)
एतच्छ्राद्धमशक्तस्य मया प्रोक्तं द्विजोत्तमाः । धनाढ्योऽन्नेन वै श्राद्धं षड्रसेन समाचरेत्
etac chrāddham aśaktasya mayā proktaṁ dvijottamāḥ dhanāḍhyo'nnena vai śrāddhaṁ ṣaḍrasena samācaret
हे द्विजोत्तमो! यह श्राद्ध मैंने असमर्थ व्यक्ति के लिए कहा है। धनवान पुरुष षड्-रसों से युक्त अन्न से श्राद्ध करे।
श्लोक 48 (skanda.3.51.48)
गोभूतिलहिरण्यादिदानं कुर्यात्समृद्धिमान् । रामचन्द्रधनुष्कोटावेवमेव समाचरेत्
gobhūtilahiraṇyādidānaṁ kuryāt samṛddhimān rāmacandradhanuṣkoṭāv evam eva samācaret
समृद्धिशाली पुरुष गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि का दान करे। रामचन्द्र के धनुष्कोटि में भी इसी प्रकार आचरण करे।
श्लोक 49 (skanda.3.51.49)
पाषाणदानपूर्वाणि तर्पणांतानि वै द्विजाः । सेतुमूले यथैतानि विधिवद्व्यतनोद्द्विजाः
pāṣāṇadānapūrvāṇi tarpaṇāntāni vai dvijāḥ setumūle yathaitāni vidhivad vyatanod dvijāḥ
हे द्विजो! ये सब रीतियाँ, जो पाषाण-दान से आरंभ होकर तर्पण पर समाप्त होती हैं, सेतु के मूल में जैसे विधिपूर्वक की गई हैं,
श्लोक 50 (skanda.3.51.50)
चक्रतीर्थं ततो गत्वा तत्रापि स्नानमाचरेत् । पश्येच्च सेत्वधिपतिं देवं नारायणं हरिम्
cakratīrthaṁ tato gatvā tatrāpi snānam ācaret paśyec ca setvadhipatiṁ devaṁ nārāyaṇaṁ harim
फिर चक्रतीर्थ जाकर वहाँ भी स्नान करे। तथा सेतु के अधिपति देव नारायण हरि का दर्शन करे।
श्लोक 51 (skanda.3.51.51)
गच्छन्पश्चिममार्गेण तत्रत्ये चक्रतीर्थके । स्नात्वा दर्भशयं देवं प्रपश्येद्भक्तिपूर्वकम्
gacchan paścimamārgeṇa tatratye cakratīrthake snātvā darbhaśayaṁ devaṁ prapaśyed bhaktipūrvakam
पश्चिम मार्ग से जाते हुए, वहाँ के चक्रतीर्थ में स्नान कर, भक्तिपूर्वक दर्भशय देव का दर्शन करे।
श्लोक 52 (skanda.3.51.52)
कपितीर्थं ततः प्राप्य तत्रापि स्नानमाचरेत् । सीताकुंडं ततः प्राप्य तत्रापि स्नानमाचरेत्
kapitīrthaṁ tataḥ prāpya tatrāpi snānam ācaret sītākuṇḍaṁ tataḥ prāpya tatrāpi snānam ācaret
फिर कपितीर्थ को प्राप्त कर वहाँ भी स्नान करे। फिर सीताकुण्ड को प्राप्त कर वहाँ भी स्नान करे।
श्लोक 53 (skanda.3.51.53)
ऋणमोचनतीर्थं तु ततः प्राप्य महाफलम् । स्नात्वा प्रणम्य रामं च जानकीरमणं प्रभुम्
ṛṇamocanatīrthaṁ tu tataḥ prāpya mahāphalam snātvā praṇamya rāmaṁ ca jānakīramaṇaṁ prabhum
फिर महाफल देने वाले ऋणमोचन-तीर्थ को प्राप्त कर, स्नान कर, जानकी के रमण प्रभु राम को प्रणाम कर,
श्लोक 54 (skanda.3.51.54)
गच्छेल्लक्ष्मणतीर्थं तु कण्ठादुपरि वापनम् । कृत्वा स्नायाच्च तत्रापि दुष्कृतान्यपि चिन्तयन्
gacchel lakṣmaṇatīrthaṁ tu kaṇṭhād upari vāpanam kṛtvā snāyāc ca tatrāpi duṣkṛtāny api cintayan
लक्ष्मणतीर्थ की ओर जाए, कंठ से ऊपर मुंडन कराकर, अपने दुष्कृत्यों का चिंतन करते हुए वहाँ भी स्नान करे।
श्लोक 55 (skanda.3.51.55)
ततः स्नात्वा रामतीर्थे ततो देवालयं व्रजेत् । स्नात्वा पापविनाशने च गंगायमुनयोस्तथा
tataḥ snātvā rāmatīrthe tato devālayaṁ vrajet snātvā pāpavināśane ca gaṅgāyamunayos tathā
फिर रामतीर्थ में स्नान कर, तब देवालय की ओर जाए। पापविनाशन-तीर्थ में तथा गंगा-यमुना में भी स्नान कर,
श्लोक 56 (skanda.3.51.56)
सावित्र्यां च सरस्वत्यां गायत्र्यां च द्विजोत्तमाः । स्नात्वा च हनुमत्कुण्डे ततः स्नायान्महाफले । ब्रह्मकुण्डं ततः प्राप्य स्नायाद्विधिपुरःसरम्
sāvitryāṁ ca sarasvatyāṁ gāyatryāṁ ca dvijottamāḥ snātvā ca hanumatkuṇḍe tataḥ snāyān mahāphale brahmakuṇḍaṁ tataḥ prāpya snāyād vidhipuraḥsaram
हे द्विजोत्तमो! सावित्री, सरस्वती, तथा गायत्री तीर्थों में स्नान कर, फिर हनुमत्कुण्ड में स्नान करे। फिर महाफल देने वाले ब्रह्मकुण्ड को प्राप्त कर विधिपूर्वक स्नान करे।
श्लोक 57 (skanda.3.51.57)
नागकुण्डं ततः प्राप्य सर्वपापविनाशनम् । स्नानं कुर्यान्नरो विप्रा नरकक्लेशनाशनम् । गंगाद्याः सरितः सर्वास्तीर्थानि सकलान्यपि
nāgakuṇḍaṁ tataḥ prāpya sarvapāpavināśanam snānaṁ kuryān naro viprā narakakleśanāśanam gaṅgādyāḥ saritaḥ sarvās tīrthāni sakalāny api
फिर सर्व-पापों का नाश करने वाले नागकुण्ड को प्राप्त कर, हे विप्रो! नरक-क्लेश का नाश करने वाला स्नान करे। गंगा आदि समस्त नदियाँ तथा समस्त तीर्थ,
श्लोक 58 (skanda.3.51.58)
सर्वदा नागकुंडे तु वसंति स्वाघशांतये । अनंतादिमहानागैरष्टाभिरिदमुत्तमम्
sarvadā nāgakuṇḍe tu vasanti svāghaśāntaye anantādimahānāgair aṣṭābhir idam uttamam
सदा नागकुण्ड में अपने-अपने पापों की शांति के लिए निवास करती हैं। अनंत आदि आठ महानागों द्वारा यह उत्तम,
श्लोक 59 (skanda.3.51.59)
कल्पितं मुक्तिदं तीर्थं रामसेतौ शिवंकरम् । अगस्त्यकुण्डं संप्राप्य ततः स्नायादनुत्तमम्
kalpitaṁ muktidaṁ tīrthaṁ rāmasetau śivaṅkaram agastyakuṇḍaṁ samprāpya tataḥ snāyād anuttamam
मुक्तिदायक, कल्याणकारी तीर्थ रामसेतु में बनाया गया है। फिर अगस्त्यकुण्ड को प्राप्त कर वहाँ अनुपम स्नान करे।
श्लोक 60 (skanda.3.51.60)
अथाग्नितीर्थमासाद्य सर्वदुष्कर्मनाशनम् । स्नात्वा संतर्प्य विधिवच्छ्राद्धं कुर्यात्पितॄन्स्मरन्
athāgnitīrtham āsādya sarvaduṣkarmanāśanam snātvā santarpya vidhivac chrāddhaṁ kuryāt pitṝn smaran
फिर सर्व-दुष्कर्मों का नाश करने वाले अग्नितीर्थ को प्राप्त कर, स्नान और तर्पण कर, पितरों का स्मरण करते हुए विधिपूर्वक श्राद्ध करे।
श्लोक 61 (skanda.3.51.61)
गोभूहिरण्यधान्यादि ब्राह्मणेभ्यः स्वशक्तितः । दत्त्वाग्नितीर्थतीरे तु सर्वपापैः प्रमुच्यते
gobhūhiraṇyadhānyādi brāhmaṇebhyaḥ svaśaktitaḥ dattvāgnitīrthatīre tu sarvapāpaiḥ pramucyate
अग्नितीर्थ के तट पर अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को गौ, भूमि, स्वर्ण, धान्य आदि देकर, समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 62 (skanda.3.51.62)
अथवा यानि तीर्थानि चक्रतीर्थमुखानि वै । अनुक्रांतानि विप्रेंद्राः सर्वपापहराणि तु
athavā yāni tīrthāni cakratīrthamukhāni vai anukrāntāni viprendrāḥ sarvapāpaharāṇi tu
अथवा, हे श्रेष्ठ विप्रो! चक्रतीर्थ से आरंभ होने वाले जो तीर्थ पूर्व में वर्णित किए गए हैं, जो समस्त पापों को हरने वाले हैं,
श्लोक 63 (skanda.3.51.63)
स्नायात्तदनुपूर्वेण स्नायाद्वापि यथारुचि । स्नात्वैवं सर्वतीर्थेषु श्राद्धादीनि समाचरेत्
snāyāt tadanupūrveṇa snāyād vāpi yathāruci snātvaivaṁ sarvatīrtheṣu śrāddhādīni samācaret
उनके क्रम के अनुसार, अथवा अपनी रुचि के अनुसार स्नान करे। इस प्रकार समस्त तीर्थों में स्नान कर श्राद्ध आदि का आचरण करे।
श्लोक 64 (skanda.3.51.64)
पश्चाद्रामेश्वरं प्राप्य निषेव्य परमेश्वरम् । सेतुमाधवमागत्य तथा रामं च लक्ष्मणम्
paścād rāmeśvaraṁ prāpya niṣevya parameśvaram setumādhavam āgatya tathā rāmaṁ ca lakṣmaṇam
फिर रामेश्वर को प्राप्त कर, परमेश्वर की सेवा कर, सेतुमाधव के पास आकर, तथा राम और लक्ष्मण के,
श्लोक 65 (skanda.3.51.65)
सीतां प्रभंजनसुतं तथान्यान्कपिसत्तमान् । तत्रत्य सर्वतीर्थेषु स्नात्वा नियमपूर्वकम्
sītāṁ prabhañjanasutaṁ tathānyān kapisattamān tatratya sarvatīrtheṣu snātvā niyamapūrvakam
सीता, पवनपुत्र (हनुमान), तथा अन्य श्रेष्ठ वानरों के — वहाँ के समस्त तीर्थों में नियमपूर्वक स्नान कर,
श्लोक 66 (skanda.3.51.66)
प्रणम्य रामनाथं च रामचंद्रं तथापरान् । नमस्कृत्य धनुष्कोटिं ततः स्नातुं व्रजेन्नरः
praṇamya rāmanāthaṁ ca rāmacandraṁ tathāparān namaskṛtya dhanuṣkoṭiṁ tataḥ snātuṁ vrajen naraḥ
रामनाथ, रामचंद्र, तथा अन्य को प्रणाम कर, धनुष्कोटि को नमस्कार कर, फिर मनुष्य स्नान करने के लिए जाए।
श्लोक 67 (skanda.3.51.67)
तत्र पाषाणदानादिपूर्वोक्तनियमं चरेत् । धनुष्कोटौ च दानानि दद्याद्वित्तानुसारतः
tatra pāṣāṇadānādipūrvoktaniyamaṁ caret dhanuṣkoṭau ca dānāni dadyād vittānusārataḥ
वहाँ पाषाण-दान आदि पूर्व-कथित नियम का पालन करे। धनुष्कोटि में भी अपने धन के अनुसार दान दे।
श्लोक 68 (skanda.3.51.68)
क्षत्रं गाश्च तथान्यानि वस्त्राण्यन्यानि चादरात् । ब्राह्मणेभ्यो वेदविद्भ्यो दद्याद्वित्तानुसारतः
kṣatraṁ gāś ca tathānyāni vastrāṇy anyāni cādarāt brāhmaṇebhyo vedavidbhyo dadyād vittānusārataḥ
भूमि, गौएँ, तथा अन्य वस्त्र आदि, आदरपूर्वक, वेद के ज्ञाता ब्राह्मणों को अपने धन के अनुसार दे।
श्लोक 69 (skanda.3.51.69)
कोटितीर्थं ततः प्राप्य स्नायान्नियमपूर्वकम् । ततो रामेश्वरं देवं प्रणमेद्वृषभध्वजम्
koṭitīrthaṁ tataḥ prāpya snāyān niyamapūrvakam tato rāmeśvaraṁ devaṁ praṇamed vṛṣabhadhvajam
फिर कोटितीर्थ को प्राप्त कर नियमपूर्वक स्नान करे। फिर वृषभ-ध्वज देव रामेश्वर को प्रणाम करे।
श्लोक 70 (skanda.3.51.70)
विभवे सति विप्रेभ्यो दद्यात्सौवर्णदक्षिणाम् । तिलान्धान्यं च गां क्षेत्रं वस्त्राण्यन्यानि तंडुलान्
vibhave sati viprebhyo dadyāt sauvarṇadakṣiṇām tilān dhānyaṁ ca gāṁ kṣetraṁ vastrāṇy anyāni taṇḍulān
यदि सामर्थ्य हो तो ब्राह्मणों को स्वर्ण-दक्षिणा दे। तिल, धान्य, गौ, खेत, वस्त्र, तथा चावल भी दे।
श्लोक 71 (skanda.3.51.71)
दद्याद्वित्तानुसारेण वित्तलोभविवर्जितः । धूपं दीपं च नैवेद्यं पूजोपकरणानि च
dadyād vittānusāreṇa vittalobhavivarjitaḥ dhūpaṁ dīpaṁ ca naivedyaṁ pūjopakaraṇāni ca
धन के प्रति लोभ त्यागकर अपने धन के अनुसार दे। धूप, दीप, नैवेद्य, तथा पूजा की अन्य सामग्री,
श्लोक 72 (skanda.3.51.72)
रामेश्वराय देवाय दद्याद्वित्तानुसारतः । स्तुत्वा रामेश्वरं देवं प्रणम्य च सभक्तिकम्
rāmeśvarāya devāya dadyād vittānusārataḥ stutvā rāmeśvaraṁ devaṁ praṇamya ca sabhaktikam
देव रामेश्वर को अपने धन के अनुसार अर्पित करे। देव रामेश्वर की स्तुति कर, तथा भक्तिपूर्वक प्रणाम कर,
श्लोक 73 (skanda.3.51.73)
अनुज्ञाप्य ततो गच्छत्सेतुमाधवसंनिधिम् । तस्मै दत्त्वा च धूपादीननुज्ञाप्य च माधवम्
anujñāpya tato gacchat setumādhavasannidhim tasmai dattvā ca dhūpādīn anujñāpya ca mādhavam
अनुज्ञा लेकर फिर सेतुमाधव के सान्निध्य में जाए। उन्हें धूप आदि अर्पित कर, तथा माधव से अनुज्ञा लेकर,
श्लोक 74 (skanda.3.51.74)
पूर्वोक्तनियमोपेतः पुनरायात्स्वकं गृहम् । ब्राह्मणान्भोजयेदन्नैः षड्रसैः परिपूरितैः
pūrvoktaniyamopetaḥ punar āyāt svakaṁ gṛham brāhmaṇān bhojayed annaiḥ ṣaḍrasaiḥ paripūritaiḥ
पूर्व-कथित नियमों से युक्त होकर पुनः अपने घर लौटे। षड्-रसों से युक्त अन्न से ब्राह्मणों को भोजन कराए।
श्लोक 75 (skanda.3.51.75)
तेनैव रामनाथोऽस्मै प्रीतोऽभीष्टं प्रयच्छति । नारकं चास्य नास्त्येव दारिद्र्यं च विनश्यति
tenaiva rāmanātho'smai prīto'bhīṣṭaṁ prayacchati nārakaṁ cāsya nāsty eva dāridryaṁ ca vinaśyati
इसी से रामनाथ उससे प्रसन्न होकर उसकी अभीष्ट कामना प्रदान करते हैं। उसे नरक की प्राप्ति नहीं होती, तथा उसकी दरिद्रता नष्ट हो जाती है।
श्लोक 76 (skanda.3.51.76)
संततिर्वर्धते तस्य पुरुषस्य द्विजोत्तमाः । संसारमवधूयाशु सायुज्यमपि यास्यति
saṁtatir vardhate tasya puruṣasya dvijottamāḥ saṁsāram avadhūyāśu sāyujyam api yāsyati
हे द्विजोत्तमो! उस पुरुष की संतान बढ़ती है। वह शीघ्र ही संसार को त्यागकर सायुज्य को भी प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 77 (skanda.3.51.77)
अत्रागन्तुमशक्तश्चेच्छ्रुतिस्मृत्यागमेषु यत् । ग्रंथजातं महापुण्यं सेतुमाहात्म्यसूचकम्
atrāgantum aśaktaś cec chrutismṛtyāgameṣu yat granthajātaṁ mahāpuṇyaṁ setumāhātmyasūcakam
यदि यहाँ आने में असमर्थ हो, तो श्रुति, स्मृति, तथा आगमों में जो महापुण्य ग्रंथ-समूह सेतु-माहात्म्य का सूचक है,
श्लोक 78 (skanda.3.51.78)
तं ग्रंथं पाठयेद्विप्रा महापातकनाशनम् । इदं वा सेतुमाहात्म्यं पठेद्भक्तिपुरःसरम्
taṁ granthaṁ pāṭhayed viprā mahāpātakanāśanam idaṁ vā setumāhātmyaṁ paṭhed bhaktipuraḥsaram
हे विप्रो! उस महापातक-नाशक ग्रंथ का पाठ कराए, अथवा इस सेतु-माहात्म्य को भक्तिपूर्वक पढ़े।
श्लोक 79 (skanda.3.51.79)
सेतुस्नानफलं पुण्यं तेनाप्नोति न संशयः । अंधपंग्वादिविषयमेतत्प्रोक्तं मनीषिभिः
setusnānaphalaṁ puṇyaṁ tenāpnoti na saṁśayaḥ andhapaṅgvādiviṣayam etat proktaṁ manīṣibhiḥ
उसी से वह सेतु-स्नान के पुण्य-फल को निःसंदेह प्राप्त कर लेता है। यह बात मनीषियों द्वारा अंधे, लंगड़े आदि के विषय में कही गई है।
श्लोक 80 (skanda.3.51.80)
श्रीसूत उवाच । एवं वः कथितो विप्राः सेतुयात्राक्रमो द्विजाः । एतत्पठन्वा शृण्वन्वा सर्वदुःखाद्विमुच्यते
śrīsūta uvāca evaṁ vaḥ kathito viprāḥ setuyātrākramo dvijāḥ etat paṭhan vā śṛṇvan vā sarvaduḥkhād vimucyate
श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रो! हे द्विजो! इस प्रकार मैंने तुम्हें सेतु-यात्रा का क्रम बताया। इसे पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य समस्त दुःखों से मुक्त हो जाता है।