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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 52

सेतु-वैभव तथा सेतु-माहात्म्य का उपसंहार

अध्याय 51अध्याय-सूचीअध्याय 53

श्लोक 1 (skanda.3.52.1)

श्रीसूत उवाच । भूयोऽप्यहं प्रवक्ष्यामि सेतुमुद्दिश्य वैभवम् । युष्माकमादरेणाहं शृणुध्वं मुनिपुंगवाः

śrīsūta uvāca bhūyo'py ahaṁ pravakṣyāmi setum uddiśya vaibhavam yuṣmākam ādareṇāhaṁ śṛṇudhvaṁ munipuṅgavāḥ

श्री सूत जी ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठो! मैं पुनः तुम्हारे आदर के लिए सेतु के वैभव के विषय में कहूँगा; सुनो।

श्लोक 2 (skanda.3.52.2)

स्थानानामपि सर्वेषामेतत्स्थानं महत्तरम् । अत्र जप्तं हुतं तप्तं दत्तं चाक्षयमुच्यते

sthānānām api sarveṣām etat sthānaṁ mahattaram atra japtaṁ hutaṁ taptaṁ dattaṁ cākṣayam ucyate

सभी स्थानों में भी यह स्थान महानतम है। यहाँ किया गया जप, हवन, तप, तथा दान अक्षय कहा गया है।

श्लोक 3 (skanda.3.52.3)

अस्मिन्नेव महास्थाने धनुष्कोटौ निमज्जनात् । वाराणस्यां दशसमावासपुण्यफलं भवेत्

asminn eva mahāsthāne dhanuṣkoṭau nimajjanāt vārāṇasyāṁ daśasamāvāsapuṇyaphalaṁ bhavet

इसी महास्थान में, धनुष्कोटि में डुबकी लगाने से, वाराणसी में दस वर्ष निवास करने का पुण्य-फल प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (skanda.3.52.4)

तस्मिंस्थले धनुष्कोटौ स्नात्वा रामेश्वरं शिवम् । दृष्ट्वा नरो भक्तियुक्तस्त्रिदिनानि वसेद्द्विजाः

tasmiṁsthale dhanuṣkoṭau snātvā rāmeśvaraṁ śivam dṛṣṭvā naro bhaktiyuktas tridināni vased dvijāḥ

उस स्थान धनुष्कोटि में स्नान कर, शिव रामेश्वर का दर्शन कर, हे द्विजो! भक्तियुक्त मनुष्य तीन दिन वहाँ निवास करे।

श्लोक 5 (skanda.3.52.5)

पुण्डरीकपुरे तेन दशवत्सरवासजम् । पुण्यं भवति विप्रेंद्रा महापातकनाशनम्

puṇḍarīkapure tena daśavatsaravāsajam puṇyaṁ bhavati viprendrā mahāpātakanāśanam

हे श्रेष्ठ विप्रो! उससे पुण्डरीकपुर में दस वर्ष निवास करने से उत्पन्न, महापातकों का नाश करने वाला पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 6 (skanda.3.52.6)

अष्टोत्तरसहस्रं तु मंत्रमाद्यं षडक्षरम् । अत्र जप्त्वा नरो भक्त्या शिवसायुज्यमाप्नुयात्

aṣṭottarasahasraṁ tu mantram ādyaṁ ṣaḍakṣaram atra japtvā naro bhaktyā śivasāyujyam āpnuyāt

यहाँ भक्तिपूर्वक आदि षडक्षर मंत्र का एक हजार आठ बार जप कर मनुष्य शिव का सायुज्य प्राप्त करता है।

श्लोक 7 (skanda.3.52.7)

मध्यार्जुने कुंभकोणे मायूरे श्वेतकानने । हालास्ये च गजारण्ये वेदारण्ये च नैमिषे

madhyārjune kumbhakoṇe māyūre śvetakānane hālāsye ca gajāraṇye vedāraṇye ca naimiṣe

मध्यार्जुन, कुंभकोण, मायूर, श्वेतकानन, हालास्य, गजारण्य, वेदारण्य, तथा नैमिष में,

श्लोक 8 (skanda.3.52.8)

श्रीपर्वते च श्रीरंगे श्रीमद्वृद्धगिरौ तथा । चिदंबरे च वल्मीके शेषाद्रावरुणाचले

śrīparvate ca śrīraṅge śrīmadvṛddhagirau tathā cidambare ca valmīke śeṣādrāv aruṇācale

श्रीपर्वत, श्रीरंग, श्रीमद्-वृद्धगिरि, चिदंबरम्, वल्मीक, शेषाद्रि, तथा अरुणाचल में,

श्लोक 9 (skanda.3.52.9)

श्रीमद्दक्षिणकैलासे वेंकटाद्रौ हरिस्थले । कांचीपुरे ब्रह्मपुरे वैद्येश्वरपुरे तथा

śrīmaddakṣiṇakailāse veṅkaṭādrau haristhale kāñcīpure brahmapure vaidyeśvarapure tathā

श्रीमद्-दक्षिण-कैलास, वेंकटाद्रि, हरिस्थल, कांचीपुर, ब्रह्मपुर, तथा वैद्येश्वरपुर में,

श्लोक 10 (skanda.3.52.10)

अन्यत्रापि शिवस्थाने विष्णुस्थाने च सत्तमाः । वर्षवासभवं पुण्यं धनुष्कोटौ नरो मुदा

anyatrāpi śivasthāne viṣṇusthāne ca sattamāḥ varṣavāsabhavaṁ puṇyaṁ dhanuṣkoṭau naro mudā

हे सत्तमो! अन्य किसी भी शिव-स्थान या विष्णु-स्थान में एक वर्ष निवास करने से जो पुण्य उत्पन्न होता है, उसे मनुष्य धनुष्कोटि में आनंदपूर्वक,

श्लोक 11 (skanda.3.52.11)

माघमासे यदि स्नायादाप्नोत्येव न संशयः । इमं सेतुं समुद्दिश्य द्वौ समुद्राविति श्रुतिः

māghamāse yadi snāyād āpnoty eva na saṁśayaḥ imaṁ setuṁ samuddiśya dvau samudrāv iti śrutiḥ

यदि वह माघ मास में स्नान करे, तो निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। इस सेतु को लक्ष्य कर 'दो समुद्र' — यह श्रुति-वचन है,

श्लोक 12 (skanda.3.52.12)

विद्यते ब्राह्मणश्रेष्ठा मातृभूता सनातनी । अदो यद्दारुरित्यन्या यत्रास्ति मुनिपुंगवाः

vidyate brāhmaṇaśreṣṭhā mātṛbhūtā sanātanī ado yaddārur ity anyā yatrāsti munipuṅgavāḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! यह सनातन, मातृ-स्वरूपा श्रुति विद्यमान है। हे मुनिश्रेष्ठो! 'अदो यद्दारु' यह जिसमें दूसरी है,

श्लोक 13 (skanda.3.52.13)

विष्णोः कर्माणि पश्यंती सेतुवैभवशंसिनी । श्रुतिरस्ति तथान्यापि तद्विष्णोरिति चापरा

viṣṇoḥ karmāṇi paśyantī setuvaibhavaśaṁsinī śrutir asti tathānyāpi tadviṣṇor iti cāparā

जो विष्णु के कर्मों को देखती हुई सेतु के वैभव की घोषणा करती है। इसी प्रकार 'तद्विष्णोः' यह अन्य श्रुति भी है,

श्लोक 14 (skanda.3.52.14)

इतिहासपुराणानि स्मृतयश्च तपोधनाः । एकवाक्यतया सेतुमाहात्म्यं प्रबुवंति हि

itihāsapurāṇāni smṛtayaś ca tapodhanāḥ ekavākyatayā setumāhātmyaṁ pravadanti hi

हे तपोधनो! इतिहास, पुराण, तथा स्मृतियाँ एक स्वर से सेतु के माहात्म्य की घोषणा करते हैं।

श्लोक 15 (skanda.3.52.15)

चंद्रसूर्योपरागेषु कुर्वन्सेत्ववगाहनम् । अविमुक्ते दशाब्दं तु गंगास्नानफलं लभेत्

candrasūryoparāgeṣu kurvan setvavagāhanam avimukte daśābdaṁ tu gaṅgāsnānaphalaṁ labhet

चंद्र तथा सूर्य के ग्रहणों में सेतु में स्नान करने से, अविमुक्त (काशी) में दस वर्ष तक गंगा-स्नान का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 16 (skanda.3.52.16)

कोटिजन्मकृतं पापं तत्क्षणेनैव नश्यति । अश्वमेधसहस्रस्य फलमाप्नोत्यनुत्तमम्

koṭijanmakṛtaṁ pāpaṁ tatkṣaṇenaiva naśyati aśvamedhasahasrasya phalam āpnoty anuttamam

करोड़ों जन्मों में किया गया पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है, तथा हजार अश्वमेध यज्ञों का अनुपम फल प्राप्त होता है।

श्लोक 17 (skanda.3.52.17)

विषुवायनसंक्रांतौ शशिवारे च पर्वणि । सेतुदर्शनमात्रेण सप्तजन्मार्जिताशुभम्

viṣuvāyanasaṅkrāntau śaśivāre ca parvaṇi setudarśanamātreṇa saptajanmārjitāśubham

विषुव तथा अयन-संक्रांति में, सोमवार को, तथा पर्व के दिन, केवल सेतु के दर्शन मात्र से सात जन्मों में अर्जित अशुभ,

श्लोक 18 (skanda.3.52.18)

नश्यते स्वर्गतिं चैव प्रयांति द्विजपुंगवाः । मकरस्थे रवौ माघे किंचिदभ्युदिते रवौ

naśyate svargatiṁ caiva prayānti dvijapuṅgavāḥ makarasthe ravau māghe kiṁcid abhyudite ravau

नष्ट हो जाता है, तथा हे श्रेष्ठ द्विजो! वे स्वर्ग-गति को प्राप्त करते हैं। मकर राशि में सूर्य के होने पर, माघ मास में, सूर्य के कुछ ही उदय होने पर,

श्लोक 19 (skanda.3.52.19)

स्नात्वा दिनत्रयं मर्त्यो धनुष्कोटौ विपातकः । गंगादिसर्वतीर्थेषु स्नानपुण्यमवाप्नुयात्

snātvā dinatrayaṁ martyo dhanuṣkoṭau vipātakaḥ gaṅgādisarvatīrtheṣu snānapuṇyam avāpnuyāt

तीन दिन धनुष्कोटि में स्नान कर, पातकों से रहित हुआ मर्त्य-मनुष्य, गंगा आदि समस्त तीर्थों में स्नान का पुण्य प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 20 (skanda.3.52.20)

धनुष्कोटौ नरः कुर्यात्स्नानं पंचदिनेषु यः । अश्वमेधादिपुण्यं च प्राप्नुयाद्ब्राह्मणोत्तमाः

dhanuṣkoṭau naraḥ kuryāt snānaṁ pañcadineṣu yaḥ aśvamedhādipuṇyaṁ ca prāpnuyād brāhmaṇottamāḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो मनुष्य धनुष्कोटि में पाँच दिनों तक स्नान करता है, वह अश्वमेध आदि यज्ञों का पुण्य प्राप्त करता है।

श्लोक 21 (skanda.3.52.21)

चांद्रायणादिकृच्छ्राणामनुष्ठानफलं लभेत् । चतुर्णामपि वेदानां पारायणफलं तथा

cāndrāyaṇādikṛcchrāṇām anuṣṭhānaphalaṁ labhet caturṇām api vedānāṁ pārāyaṇaphalaṁ tathā

वह चांद्रायण आदि व्रतों के अनुष्ठान का फल प्राप्त करता है, तथा चारों वेदों के पारायण का फल भी।

श्लोक 22 (skanda.3.52.22)

माघमासे दशाहःसु धनुष्कोटौ निमज्जनात् । ब्रह्महत्यायुतं नश्येन्नात्र कार्या विचारणा

māghamāse daśāhaḥsu dhanuṣkoṭau nimajjanāt brahmahatyāyutaṁ naśyen nātra kāryā vicāraṇā

माघ मास में दस दिनों तक धनुष्कोटि में डुबकी लगाने से दस हजार ब्रह्महत्याओं का नाश हो जाता है, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए।

श्लोक 23 (skanda.3.52.23)

माघमासे धनुष्कोटौ दशपंचदिनानि यः । स्नानं करोति मनुजः स वैकुंठमवाप्नुयात्

māghamāse dhanuṣkoṭau daśapañcadināni yaḥ snānaṁ karoti manujaḥ sa vaikuṇṭham avāpnuyāt

माघ मास में जो मनुष्य धनुष्कोटि में पंद्रह दिनों तक स्नान करता है, वह वैकुंठ को प्राप्त करता है।

श्लोक 24 (skanda.3.52.24)

माघमासे रामसेतौ स्नानं विंशद्दिनं चरन् । शिवसामीप्यमाप्नोति शिवेन सह मोदते

māghamāse rāmasetau snānaṁ viṁśaddinaṁ caran śivasāmīpyam āpnoti śivena saha modate

माघ मास में रामसेतु में बीस दिनों तक स्नान करते हुए, वह शिव-सामीप्य प्राप्त करता है, तथा शिव के साथ आनंद करता है।

श्लोक 25 (skanda.3.52.25)

पंचविंशद्दिनं स्नानं कुर्वन्सारूप्यमाप्नुयात् । स्नानं त्रिंशद्दिनं कुर्वन्सायुज्यं लभते ध्रुवम्

pañcaviṁśaddinaṁ snānaṁ kurvan sārūpyam āpnuyāt snānaṁ triṁśaddinaṁ kurvan sāyujyaṁ labhate dhruvam

पच्चीस दिनों तक स्नान करते हुए सारूप्य प्राप्त करता है। तीस दिनों तक स्नान करते हुए निश्चय ही सायुज्य प्राप्त करता है।

श्लोक 26 (skanda.3.52.26)

अतोऽवश्यं रामसेतौ माघमासे द्विजोत्तमाः । स्नानं समाचरेद्विद्वान्किंचिदभ्युदिते रवौ

ato'vaśyaṁ rāmasetau māghamāse dvijottamāḥ snānaṁ samācared vidvān kiṁcid abhyudite ravau

अतः हे द्विजोत्तमो! विद्वान पुरुष को अवश्य ही माघ मास में रामसेतु में, सूर्य के कुछ उदय होने पर, स्नान करना चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.3.52.27)

चंद्रसूर्योपरागे च तथैवार्द्धोदये द्विजाः । महोदये रामसेतौ स्नानं कुर्वन्द्विजोत्तमाः

candrasūryoparāge ca tathaivārddhodaye dvijāḥ mahodaye rāmasetau snānaṁ kurvan dvijottamāḥ

हे द्विजो! चंद्र-सूर्य के ग्रहण में, तथा अर्धोदय और महोदय (योगों) में रामसेतु में स्नान करते हुए, हे द्विजोत्तमो!

श्लोक 28 (skanda.3.52.28)

अनेकक्लेशसंयुक्तं गर्भवासं न पश्यति । ब्रह्महत्यादिपापानां नाशकं च प्रकीर्तितम्

anekakleśasaṁyuktaṁ garbhavāsaṁ na paśyati brahmahatyādipāpānāṁ nāśakaṁ ca prakīrtitam

वह अनेक क्लेशों से युक्त गर्भवास को नहीं देखता। यह ब्रह्महत्या आदि पापों का नाशक कहा गया है।

श्लोक 29 (skanda.3.52.29)

सर्वेषां नरकाणां च बाधकं परिकीर्तितम् । संपदामपि सर्वासां निदानं परिकीर्तितम्

sarveṣāṁ narakāṇāṁ ca bādhakaṁ parikīrtitam sampadām api sarvāsāṁ nidānaṁ parikīrtitam

यह समस्त नरकों को रोकने वाला घोषित किया गया है, तथा समस्त संपत्तियों का मूल कारण भी घोषित किया गया है।

श्लोक 30 (skanda.3.52.30)

इन्द्रादिसर्वलोकानां सालोक्यादिप्रदं तथा । चंद्रसूर्योपरागे च तथैवार्द्धोदये द्विजाः

indrādisarvalokānāṁ sālokyādipradaṁ tathā candrasūryoparāge ca tathaivārddhodaye dvijāḥ

यह इंद्र आदि समस्त लोकों की सालोक्यता आदि को देने वाला भी है। हे द्विजो! चंद्र-सूर्य के ग्रहण में, तथा अर्धोदय में,

श्लोक 31 (skanda.3.52.31)

महोदये धनुष्कोटौ मज्जनं त्वतिनिश्चितम् । रावणस्य विनाशार्थं पुरा रामेण निर्मितम्

mahodaye dhanuṣkoṭau majjanaṁ tv atiniścitam rāvaṇasya vināśārthaṁ purā rāmeṇa nirmitam

तथा महोदय में धनुष्कोटि में डुबकी लगाना अत्यंत निश्चित (फलदायी) है। यह पूर्वकाल में रावण के विनाश के लिए राम द्वारा निर्मित किया गया था।

श्लोक 32 (skanda.3.52.32)

सिद्धचारणगंधर्वकिन्नरोरगसेवितम् । ब्रह्मदेवर्षिराजर्षिपितृसंघनिषेवितम्

siddhacāraṇagandharvakinnaroragasevitam brahmadevarṣirājarṣipitṛsaṅghaniṣevitam

यह सिद्धों, चारणों, गंधर्वों, किन्नरों, तथा नागों द्वारा सेवित है; ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों, राजर्षियों, तथा पितृ-समूहों द्वारा भी सेवित है।

श्लोक 33 (skanda.3.52.33)

ब्रह्मादिदेवतावृंदैस्सेवितं भक्तिपूर्वकम् । पुण्यं यो रामसेतुं वै संस्मरन्पुरुषो द्विजाः

brahmādidevatāvṛndaiḥ sevitaṁ bhaktipūrvakam puṇyaṁ yo rāmasetuṁ vai saṁsmaran puruṣo dvijāḥ

यह ब्रह्मा आदि देवताओं के समूहों द्वारा भक्तिपूर्वक सेवित है। हे द्विजो! जो पुरुष इस पुण्यमय रामसेतु का स्मरण करता है,

श्लोक 34 (skanda.3.52.34)

स्नायाच्च यत्र कुत्रापि तटाकादौ जलाशये । न तस्य दुष्कृतं किंचिद्भविष्यति कदाचन

snāyāc ca yatra kutrāpi taṭākādau jalāśaye na tasya duṣkṛtaṁ kiṁcid bhaviṣyati kadācana

तथा किसी भी स्थान पर, तालाब आदि किसी जलाशय में स्नान करता है, उसका कोई भी दुष्कर्म कभी नहीं होता।

श्लोक 35 (skanda.3.52.35)

सेतुमध्यस्थतीर्थेषु मुष्टिमात्रप्रदानतः । नश्यंति सकला रोगा भ्रूणहत्यादयस्तथा

setumadhyasthatīrtheṣu muṣṭimātrapradānataḥ naśyanti sakalā rogā bhrūṇahatyādayas tathā

सेतु के मध्य में स्थित तीर्थों में मुट्ठी-भर दान देने मात्र से समस्त रोग, तथा भ्रूणहत्या आदि पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 36 (skanda.3.52.36)

रामेण धनुषः पुण्यां यो रेखां पश्यते कृताम् । न तस्य पुनरावृत्तिर्वैकुंठात्स्यात्कदाचन

rāmeṇa dhanuṣaḥ puṇyāṁ yo rekhāṁ paśyate kṛtām na tasya punarāvṛttir vaikuṇṭhāt syāt kadācana

जो कोई राम के धनुष द्वारा खींची गई पुण्य-रेखा को देखता है, उसकी वैकुंठ से कभी पुनरावृत्ति नहीं होती।

श्लोक 37 (skanda.3.52.37)

धनुष्कोटिरिति ख्याता या लोके पापनाशिनी । विभीषणप्रार्थनया कृता रामेण धीमता

dhanuṣkoṭir iti khyātā yā loke pāpanāśinī vibhīṣaṇaprārthanayā kṛtā rāmeṇa dhīmatā

जो लोक में पाप-नाशिनी 'धनुष्कोटि' के नाम से प्रसिद्ध है, वह विभीषण की प्रार्थना पर बुद्धिमान राम द्वारा बनाई गई थी।

श्लोक 38 (skanda.3.52.38)

धनुष्कोटिर्महापुण्या तस्यां स्नात्वा सभक्तिकम् । दद्याद्दानानि वित्तानां क्षेत्राणां च गवां तथा

dhanuṣkoṭir mahāpuṇyā tasyāṁ snātvā sabhaktikam dadyād dānāni vittānāṁ kṣetrāṇāṁ ca gavāṁ tathā

धनुष्कोटि महान् पुण्यमयी है; वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान कर, धन, खेत, तथा गौओं के दान दे,

श्लोक 39 (skanda.3.52.39)

तिलानां तंडुलानां च धान्यानां पयसां तथा । वस्त्राणां भूषणानां च माषाणामोदनस्य च

tilānāṁ taṇḍulānāṁ ca dhānyānāṁ payasāṁ tathā vastrāṇāṁ bhūṣaṇānāṁ ca māṣāṇām odanasya ca

तिल, चावल, धान्य, दूध, वस्त्र, आभूषण, उड़द, तथा भात का,

श्लोक 40 (skanda.3.52.40)

दध्नां घृतानां वारीणां शाकानामप्युदश्विताम् । शुद्धानां शर्कराणां च सस्यानां मधुनां तथा

dadhnāṁ ghṛtānāṁ vārīṇāṁ śākānām apy udaśvitām śuddhānāṁ śarkarāṇāṁ ca sasyānāṁ madhunāṁ tathā

दही, घी, जल, शाक, तथा छाछ, शुद्ध शर्करा, अन्न, तथा मधु का,

श्लोक 41 (skanda.3.52.41)

मोदकानामपूपानामन्येषां दानमेव च । रामसेतौ द्विजाः प्रोक्तं सर्वाभीष्टप्रदायकम्

modakānām apūpānām anyeṣāṁ dānam eva ca rāmasetau dvijāḥ proktaṁ sarvābhīṣṭapradāyakam

तथा मोदकों, अपूपों, और अन्यों का भी दान — हे द्विजो! रामसेतु में यह सर्व-अभीष्ट देने वाला कहा गया है।

श्लोक 42 (skanda.3.52.42)

अतो दद्याद्रामसेतौ वित्तलोभविवर्जितः । दत्तं हुतं च तप्तं च जपश्च नियमादिकम्

ato dadyād rāmasetau vittalobhavivarjitaḥ dattaṁ hutaṁ ca taptaṁ ca japaś ca niyamādikam

अतः धन के प्रति लोभ त्यागकर रामसेतु में दान दे। यहाँ किया गया दान, हवन, तप, जप, तथा नियम आदि,

श्लोक 43 (skanda.3.52.43)

श्रीरामधनुषः कोटावनंतफलदं भवेत् । तेन वेदाश्च तुष्यंति तुष्यंति पितरस्तथा

śrīrāmadhanuṣaḥ koṭāv anantaphaladaṁ bhavet tena vedāś ca tuṣyanti tuṣyanti pitaras tathā

श्रीराम के धनुष के कोटि में अनंत फल देने वाला होता है। उससे वेद भी प्रसन्न होते हैं, तथा पितर भी प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 44 (skanda.3.52.44)

तुष्यंति मुनयः सर्वे ब्रह्माविष्णुः शिवस्तथा । नागाः किंपुरुषा यक्षाः सर्वे तुष्यंति निश्चितम्

tuṣyanti munayaḥ sarve brahmāviṣṇuḥ śivas tathā nāgāḥ kiṁpuruṣā yakṣāḥ sarve tuṣyanti niścitam

समस्त मुनि प्रसन्न होते हैं, ब्रह्मा, विष्णु, तथा शिव भी। नाग, किंपुरुष, यक्ष — सभी निश्चय ही प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 45 (skanda.3.52.45)

स्वयं च पूतो भवति धनुष्कोट्यवलोकनात् । स्ववंशजान्नरान्सर्वान्पावयेच्च पितामहान्

svayaṁ ca pūto bhavati dhanuṣkoṭyavalokanāt svavaṁśajān narān sarvān pāvayec ca pitāmahān

वह स्वयं भी धनुष्कोटि के दर्शन से पवित्र हो जाता है, तथा अपने वंश में उत्पन्न समस्त पुरुषों और पितामहों को भी पवित्र कर देता है।

श्लोक 46 (skanda.3.52.46)

तारयेच्च कुलं सर्वं धनुष्कोट्यवलोकनात् । रामस्य धनुषः कोट्या कृतरेवावगाहनात्

tārayec ca kulaṁ sarvaṁ dhanuṣkoṭyavalokanāt rāmasya dhanuṣaḥ koṭyā kṛtareva avagāhanāt

धनुष्कोटि के दर्शन से वह अपने संपूर्ण कुल का उद्धार कर देता है — राम के धनुष के कोटि में की गई डुबकी से ही।

श्लोक 47 (skanda.3.52.47)

पंचपातककोटीनां नाशः स्यात्तत्क्षणे ध्रुवम् । श्रीरामधनुषः कोट्या रेखां यः पश्यते कृताम्

pañcapātakakoṭīnāṁ nāśaḥ syāt tatkṣaṇe dhruvam śrīrāmadhanuṣaḥ koṭyā rekhāṁ yaḥ paśyate kṛtām

करोड़ों पंच-महापातकों का नाश उसी क्षण निश्चित हो जाता है — जो श्रीराम के धनुष के कोटि द्वारा खींची गई रेखा को देखता है।

श्लोक 48 (skanda.3.52.48)

अनेकक्लेशसंपूर्णं गर्भवासं न पश्यति । यत्र सीताऽनलं प्राप्ता तस्मिन्कुंडे निमज्जनात्

anekakleśasampūrṇaṁ garbhavāsaṁ na paśyati yatra sītānalaṁ prāptā tasmin kuṇḍe nimajjanāt

वह अनेक क्लेशों से भरे गर्भवास को नहीं देखता — उस कुंड में डुबकी लगाने से, जहाँ सीता अग्नि को प्राप्त हुई थीं।

श्लोक 49 (skanda.3.52.49)

भ्रूणहत्याशतं विप्रा नश्यति क्षणमात्रतः । यथा रामस्तथा सेतुर्यथा गंगा तथा हरिः

bhrūṇahatyāśataṁ viprā naśyati kṣaṇamātrataḥ yathā rāmas tathā setur yathā gaṅgā tathā hariḥ

हे विप्रो! सौ भ्रूणहत्याएँ क्षणमात्र में नष्ट हो जाती हैं। जैसे राम, वैसे ही सेतु; जैसे गंगा, वैसे ही हरि।

श्लोक 50 (skanda.3.52.50)

गंगे हरे रामसेतो त्विति संकीर्तयन्नरः । यत्र क्वापि बहिः स्नायात्तेन याति परां गतिम्

gaṅge hare rāmaseto tv iti saṅkīrtayan naraḥ yatra kvāpi bahiḥ snāyāt tena yāti parāṁ gatim

'हे गंगा! हे हरि! हे रामसेतु!' — इस प्रकार कीर्तन करते हुए मनुष्य कहीं भी बाहर स्नान करे, तो उससे भी वह परम गति को प्राप्त करता है।

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