ब्रह्म खण्ड · अध्याय 53
युधिष्ठिर के प्रश्न
श्लोक 1 (skanda.3.53.1)
श्रीगणेशाय नमः । तर्तुं संहृतिवारिधिं त्रिजगतां नौर्नाम यस्य प्रभोर्येनेदं सकलं विभाति सततं जातं स्थितं संसृतम् । यश्चैतन्यघनप्रमाण विधुरो वेदांतवेद्यो विभुस्तं वन्दे सहजप्रकाशममलं श्रीरामचन्द्रं परम्
śrīgaṇeśāya namaḥ tartuṁ saṁhṛtivāridhiṁ trijagatāṁ naurnāma yasya prabhoryenedaṁ sakalaṁ vibhāti satataṁ jātaṁ sthitaṁ saṁsṛtam yaścaitanyaghanapramāṇa vidhuro vedāṁtavedyo vibhustaṁ vande sahajaprakāśamamalaṁ śrīrāmacandraṁ param
श्रीगणेशजी को नमस्कार। मैं उन परम प्रभु श्रीरामचन्द्र को प्रणाम करता हूँ, जो तीनों लोकों के लिए संहार-सागर को पार करने की नौका के समान हैं; जिनके प्रभाव से यह सम्पूर्ण जगत सदा प्रकाशित होता है, उत्पन्न होता है, स्थित रहता है और लीन होता है; जो चैतन्यघन-स्वरूप, द्वैतरहित, वेदान्त द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापी तथा सहज, निर्मल प्रकाशवाले हैं।
श्लोक 2 (skanda.3.53.2)
दाराः पुत्रा धनं वा परिजनसहितो बंधुवर्गः प्रियो वा माता भ्राता पिता वा श्वशुरकुलजना भृत्यऐश्वर्य्यवित्ते । विद्या रूपं विमलभवनं यौवनं यौवतं वा सर्वे व्यर्थं मरणसमये धर्म एकः सहायः
dārāḥ putrā dhanaṁ vā parijanasahito baṁdhuvargaḥ priyo vā mātā bhrātā pitā vā śvaśurakulajanā bhṛtyaaiśvaryyavitte vidyā rūpaṁ vimalabhavanaṁ yauvanaṁ yauvataṁ vā sarve vyarthaṁ maraṇasamaye dharma ekaḥ sahāyaḥ
पत्नी, पुत्र अथवा धन, परिजनों सहित बंधु-वर्ग, प्रिय माता, भाई अथवा पिता, ससुराल-पक्ष के लोग, सेवक, ऐश्वर्य और वित्त; विद्या, रूप, निर्मल गृह, यौवन अथवा युवा पत्नी — ये सब मृत्यु के समय व्यर्थ हो जाते हैं। एकमात्र धर्म ही सहायक होता है।
श्लोक 3 (skanda.3.53.3)
नैमिषे निमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः । सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्रसममासत
naimiṣe nimiṣakṣetre ṛṣayaḥ śaunakādayaḥ satraṁ svargāya lokāya sahasrasamamāsata
नैमिष नामक निमेष-क्षेत्र में शौनक आदि ऋषियों ने स्वर्गलोक की प्राप्ति के लिए सहस्र वर्षों तक चलने वाला सत्र (यज्ञ) आरम्भ किया।
श्लोक 4 (skanda.3.53.4)
एकदा सूतमायांतं दृष्ट्वा तं शौनकादयः । परं हर्षं समाविष्टाः पपुर्नेत्रैः सुचेतसा । चित्राः श्रोतुं कथास्तत्र परिवव्रुस्तपस्विनः
ekadā sūtamāyāṁtaṁ dṛṣṭvā taṁ śaunakādayaḥ paraṁ harṣaṁ samāviṣṭāḥ papurnetraiḥ sucetasā citrāḥ śrotuṁ kathāstatra parivavrustapasvinaḥ
एक बार सूतजी को आते देखकर शौनक आदि परम हर्ष से भर गये; वे सुन्दर चित्तवाले अपने नेत्रों से मानो उन्हें पी रहे थे, और वहाँ अद्भुत कथाएँ सुनने के लिए तपस्वीजन उन्हें घेरकर बैठ गये।
श्लोक 5 (skanda.3.53.5)
अथ तेषूपविष्टेषु तपस्विषु महात्मसु । निर्दिष्टमासनं भेजे विनयाल्लोमहर्षणिः
atha teṣūpaviṣṭeṣu tapasviṣu mahātmasu nirdiṣṭamāsanaṁ bheje vinayāllomaharṣaṇiḥ
तदनन्तर जब वे महात्मा तपस्वी बैठ गये, तब लोमहर्षणि (सूतजी) ने विनयपूर्वक अपने लिए नियत आसन ग्रहण किया।
श्लोक 6 (skanda.3.53.6)
सुखासीनं च तं दृष्ट्वा विघ्नांतमुपलक्ष्य च । अथापृच्छंस्त ऋषयः काश्चित्प्रास्ताविकीः कथाः
sukhāsīnaṁ ca taṁ dṛṣṭvā vighnāṁtamupalakṣya ca athāpṛcchaṁsta ṛṣayaḥ kāścitprāstāvikīḥ kathāḥ
उन्हें सुखपूर्वक बैठा देखकर तथा विघ्न समाप्त हुआ जानकर ऋषियों ने कुछ प्रारम्भिक प्रश्न पूछे।
श्लोक 7 (skanda.3.53.7)
पुराणमखिलं तात पुरा तेऽधीतवान्पिता । कच्चित्त्वयापि तत्सर्वमधीतं लोमहर्षणे
purāṇamakhilaṁ tāta purā te'dhītavānpitā kaccittvayāpi tatsarvamadhītaṁ lomaharṣaṇe
हे तात! पहले तुम्हारे पिता ने सम्पूर्ण पुराण का अध्ययन किया था। हे लोमहर्षण! क्या तुमने भी वह सब अध्ययन किया है?
श्लोक 8 (skanda.3.53.8)
कथयस्व कथां सूत पुण्यां पापनिषूदिनीम् । श्रुत्वा यां याति विलयं पापं जन्मशतोद्भवम्
kathayasva kathāṁ sūta puṇyāṁ pāpaniṣūdinīm śrutvā yāṁ yāti vilayaṁ pāpaṁ janmaśatodbhavam
हे सूत! वह पुण्यमयी, पाप-नाशक कथा सुनाओ, जिसे सुनकर सौ जन्मों में उत्पन्न पाप भी नष्ट हो जाता है।
श्लोक 9 (skanda.3.53.9)
सूत उवाच । श्रीभारत्यंघ्रियुगलं गणनाथपदद्वयम् । सर्वेषां चैव देवानां नमस्कृत्य वदाम्यहम्
sūta uvāca śrībhāratyaṁghriyugalaṁ gaṇanāthapadadvayam sarveṣāṁ caiva devānāṁ namaskṛtya vadāmyaham
सूतजी बोले — श्री भारती (सरस्वती) के दोनों चरणों तथा गणनाथ (गणेश) के दोनों चरणों को, और समस्त देवताओं को नमस्कार करके मैं कहता हूँ।
श्लोक 10 (skanda.3.53.10)
शक्तींश्चैव वसूंश्चैव ग्रहान्यज्ञादिदेवताः । नमस्कृत्य शुभान्विप्रान्कविमुख्यांश्च सर्वशः
śaktīṁścaiva vasūṁścaiva grahānyajñādidevatāḥ namaskṛtya śubhānviprānkavimukhyāṁśca sarvaśaḥ
शक्तियों, वसुओं, ग्रहों तथा यज्ञादि देवताओं को नमस्कार करके, और समस्त शुभ विप्रों तथा श्रेष्ठ कवियों को सब प्रकार से नमस्कार करके —
श्लोक 11 (skanda.3.53.11)
अभीष्टदेवताश्चैव प्रणम्य गुरुसत्तमम् । नमस्कृत्य शुभान्देवान्रामादींश्च विशेषतः
abhīṣṭadevatāścaiva praṇamya gurusattamam namaskṛtya śubhāndevānrāmādīṁśca viśeṣataḥ
अपने इष्टदेवताओं तथा परम गुरु को प्रणाम करके, और विशेषतः श्रीराम आदि शुभ देवताओं को नमस्कार करके —
श्लोक 12 (skanda.3.53.12)
यान्स्मृत्वा विविधैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः । तेषां प्रसादाद्वक्ष्येऽहं तीर्थानां फलमुत्तमम् । सर्वेषां च नियंतारं धर्मात्मानं प्रणम्य च
yānsmṛtvā vividhaiḥ pāpairmucyate nātra saṁśayaḥ teṣāṁ prasādādvakṣye'haṁ tīrthānāṁ phalamuttamam sarveṣāṁ ca niyaṁtāraṁ dharmātmānaṁ praṇamya ca
जिनका स्मरण करने से मनुष्य नाना पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं — उन्हीं की कृपा से मैं तीर्थों का उत्तम फल कहूँगा, तथा सबके नियन्ता, धर्मात्मा धर्मदेव को प्रणाम करके —
श्लोक 13 (skanda.3.53.13)
धर्म्मारण्यपतिस्त्रिविष्टपपतिर्नित्यं भवानीपतिः पापाद्वः स्थिरभोगयोगसुलभो देवः स धर्मेश्वरः । सर्वेषां हृदयानि जीवकलया व्याप्य स्थितः सर्वदा ध्यात्वा यं न पुनर्विशंति मनुजाः संसारकारागृहम्
dharmmāraṇyapatistriviṣṭapapatirnityaṁ bhavānīpatiḥ pāpādvaḥ sthirabhogayogasulabho devaḥ sa dharmeśvaraḥ sarveṣāṁ hṛdayāni jīvakalayā vyāpya sthitaḥ sarvadā dhyātvā yaṁ na punarviśaṁti manujāḥ saṁsārakārāgṛham
वे धर्मेश्वर देव — जो धर्मारण्य के स्वामी, स्वर्ग के स्वामी, नित्य भवानीपति (शिव) हैं; जो पाप से मुक्त कर स्थिर भोग और योग सुलभ कराने वाले देव हैं; जो सदा जीव-कला से सबके हृदयों में व्याप्त होकर स्थित रहते हैं — जिनका ध्यान करने से मनुष्य पुनः संसार रूपी कारागृह में प्रवेश नहीं करते।
श्लोक 14 (skanda.3.53.14)
सूत उवाच । एकदा तु स धर्म्मो वै जगाम ब्रह्मसंसदि । तां सभां स समालोक्य ज्ञाननिष्ठोऽभवत्तदा
sūta uvāca ekadā tu sa dharmmo vai jagāma brahmasaṁsadi tāṁ sabhāṁ sa samālokya jñānaniṣṭho'bhavattadā
सूतजी बोले — एक बार धर्मदेव ब्रह्मा की सभा में गये; उस सभा को देखकर वे ज्ञाननिष्ठ हो गये।
श्लोक 15 (skanda.3.53.15)
देवैर्मुनिवरैः क्रांतां सभामालोक्य विस्मितः । देवैर्यक्षैस्तथा नागैः पन्नगैश्च तथाऽसुरैः
devairmunivaraiḥ krāṁtāṁ sabhāmālokya vismitaḥ devairyakṣaistathā nāgaiḥ pannagaiśca tathā'suraiḥ
देवों और श्रेष्ठ मुनियों से भरी हुई उस सभा को देखकर वे विस्मित हुए — देवों, यक्षों, नागों, सर्पों तथा असुरों से भी वह सभा व्याप्त थी —
श्लोक 16 (skanda.3.53.16)
ऋषिभिः सिद्धगंधर्वैः समाक्रांतोचितासना । ससुखा सा सभा ब्रह्मन्न शीता न च घर्म्मदा
ṛṣibhiḥ siddhagaṁdharvaiḥ samākrāṁtocitāsanā sasukhā sā sabhā brahmanna śītā na ca gharmmadā
ऋषियों, सिद्धों और गन्धर्वों से भरी हुई, उचित आसनोंवाली — हे ब्रह्मन्! वह सभा सुखदायी थी, न शीत देनेवाली और न ताप देनेवाली।
श्लोक 17 (skanda.3.53.17)
न क्षुधं न पिपासां च न ग्लानिं प्राप्नुवन्त्युत । नानारूपैरिव कृता मणिभिः सा सभा वरैः
na kṣudhaṁ na pipāsāṁ ca na glāniṁ prāpnuvantyuta nānārūpairiva kṛtā maṇibhiḥ sā sabhā varaiḥ
वहाँ न भूख लगती थी, न प्यास और न ग्लानि होती थी; वह सभा मानो नाना प्रकार के उत्तम मणियों से रची गयी थी।
श्लोक 18 (skanda.3.53.18)
स्तंभैश्च विधृता सा तु शाश्वती न च सक्षया । दिव्यैर्नानाविधैर्भावैर्भासद्भिरमितप्रभा
staṁbhaiśca vidhṛtā sā tu śāśvatī na ca sakṣayā divyairnānāvidhairbhāvairbhāsadbhiramitaprabhā
स्तम्भों से युक्त वह सभा शाश्वत और अक्षय थी, नाना प्रकार के दिव्य भावों से चमकती हुई, अपरिमित प्रभावाली थी।
श्लोक 19 (skanda.3.53.19)
अति चन्द्रं च सूर्य्यं च शिखिनं च स्वयंप्रभा । दीप्यते नाकपृष्ठस्था भर्त्सयंतीव भास्करम्
ati candraṁ ca sūryyaṁ ca śikhinaṁ ca svayaṁprabhā dīpyate nākapṛṣṭhasthā bhartsayaṁtīva bhāskaram
वह स्वयंप्रभ सभा स्वर्ग के शिखर पर स्थित होकर चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि से भी बढ़कर चमकती थी, मानो सूर्य को तिरस्कृत कर रही हो।
श्लोक 20 (skanda.3.53.20)
तस्याँ स भगवाञ्छास्ति विविधान्देवमानुषान् । स्वयमेकोऽनिशं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः
tasyām̐ sa bhagavāñchāsti vividhāndevamānuṣān svayameko'niśaṁ brahmā sarvalokapitāmahaḥ
उसमें वे भगवान् ब्रह्मा, समस्त लोकों के पितामह, अकेले ही निरन्तर नाना देवताओं और मनुष्यों पर शासन करते हैं।
श्लोक 21 (skanda.3.53.21)
उपतिष्ठंति चाप्येनं प्रजानां पतयः प्रभुम् । दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिः कश्यपः प्रभुः
upatiṣṭhaṁti cāpyenaṁ prajānāṁ patayaḥ prabhum dakṣaḥ pracetāḥ pulaho marīciḥ kaśyapaḥ prabhuḥ
प्रजापतिगण भी उन प्रभु की सेवा में उपस्थित रहते हैं — दक्ष, प्रचेता, पुलह, मरीचि तथा प्रभावशाली कश्यप —
श्लोक 22 (skanda.3.53.22)
भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च गौतमोऽथ तथांगिराः । पुलस्त्यश्च क्रतुश्चैव प्रह्लादः कर्द्दमस्तथा
bhṛguratrirvasiṣṭhaśca gautamo'tha tathāṁgirāḥ pulastyaśca kratuścaiva prahlādaḥ karddamastathā
भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम, अंगिरा, पुलस्त्य, क्रतु, प्रह्लाद तथा कर्दम भी वहाँ उपस्थित रहते हैं।
श्लोक 23 (skanda.3.53.23)
अथर्वांगिरसश्चैव वालखिल्या मरीचिपाः । मनोंऽतरिक्षं विद्याश्व वायुस्तेजो जलं मही
atharvāṁgirasaścaiva vālakhilyā marīcipāḥ manoṁ'tarikṣaṁ vidyāśva vāyustejo jalaṁ mahī
अथर्वांगिरस, वालखिल्य तथा मरीचिप भी वहाँ उपस्थित हैं; मन, अंतरिक्ष, विद्याएँ, वायु, तेज, जल और पृथ्वी भी वहाँ देवरूप में उपस्थित हैं।
श्लोक 24 (skanda.3.53.24)
शब्दस्पर्शौ तथा रूपं रसो गंधस्तथैव च । प्रकृतिश्च विकारश्च सदसत्कारणं तथा
śabdasparśau tathā rūpaṁ raso gaṁdhastathaiva ca prakṛtiśca vikāraśca sadasatkāraṇaṁ tathā
शब्द और स्पर्श, रूप, रस तथा गंध — तथा प्रकृति, विकार और सत्-असत् का कारण भी वहाँ मूर्तिमान् होकर उपस्थित हैं —
श्लोक 25 (skanda.3.53.25)
अगस्त्यश्च महातेजा मार्कंडेयश्च वीर्यवान् । जमदग्निर्भरद्वाजः संवर्तश्च्यवनस्तथा
agastyaśca mahātejā mārkaṁḍeyaśca vīryavān jamadagnirbharadvājaḥ saṁvartaścyavanastathā
— महातेजस्वी अगस्त्य, वीर्यवान् मार्कण्डेय, जमदग्नि, भरद्वाज, संवर्त तथा च्यवन भी वहाँ हैं।
श्लोक 26 (skanda.3.53.26)
दुर्वासाश्च महाभाग ऋष्यश्रृंगश्च धार्मिकः । सनत्कुमारो भगवान्योगाचार्य्यो महातपाः
durvāsāśca mahābhāga ṛṣyaśrṛṁgaśca dhārmikaḥ sanatkumāro bhagavānyogācāryyo mahātapāḥ
हे महाभाग! दुर्वासा तथा धार्मिक ऋष्यशृंग, और योगाचार्य भगवान् सनत्कुमार, जो महातपस्वी हैं, भी वहाँ हैं।
श्लोक 27 (skanda.3.53.27)
असितो देवलश्चैव जैगीषव्यश्च तत्त्ववित् । आयुर्वेदस्तथाष्टांगो गान्धर्वश्चैव तत्र हि
asito devalaścaiva jaigīṣavyaśca tattvavit āyurvedastathāṣṭāṁgo gāndharvaścaiva tatra hi
असित, देवल तथा तत्त्ववेत्ता जैगीषव्य, और अष्टांग आयुर्वेद तथा गान्धर्व-विद्या भी वहाँ उपस्थित हैं।
श्लोक 28 (skanda.3.53.28)
चंद्रमाः सह् नक्षत्रैरादित्यश्च गभस्तिमान् । वायवस्तंतवश्चैव संकल्पः प्राण एव च
caṁdramāḥ sah nakṣatrairādityaśca gabhastimān vāyavastaṁtavaścaiva saṁkalpaḥ prāṇa eva ca
नक्षत्रों सहित चन्द्रमा, तेजस्वी सूर्य, वायुगण, तन्तु (यज्ञ-सूत्र), संकल्प तथा प्राण भी वहाँ उपस्थित हैं —
श्लोक 29 (skanda.3.53.29)
मूर्तिमंतो महात्मानो महाव्रतपरायणाः । एते चान्ये च बहवो ब्रह्माणं समुपासिरे
mūrtimaṁto mahātmāno mahāvrataparāyaṇāḥ ete cānye ca bahavo brahmāṇaṁ samupāsire
ये सभी मूर्तिमान्, महान् व्रतों में तत्पर महात्मा, तथा और भी अनेक — ब्रह्माजी की उपासना करते हैं।
श्लोक 30 (skanda.3.53.30)
अर्थो धर्मश्च कामश्च हर्षो द्वेषस्तमो दमः । आयांति तस्यां सहिता गंधर्वाप्सरसां गणाः
artho dharmaśca kāmaśca harṣo dveṣastamo damaḥ āyāṁti tasyāṁ sahitā gaṁdharvāpsarasāṁ gaṇāḥ
अर्थ, धर्म और काम; हर्ष, द्वेष, तम तथा दम — गन्धर्वों और अप्सराओं के समूहों सहित वहाँ आते हैं।
श्लोक 31 (skanda.3.53.31)
शुक्राद्याश्व ग्रहाश्चैव ये चान्ये तत्समीपगाः । मंत्रा रथंतरं चैव हरिमान्वसुमानपि
śukrādyāśva grahāścaiva ye cānye tatsamīpagāḥ maṁtrā rathaṁtaraṁ caiva harimānvasumānapi
शुक्र आदि ग्रह तथा उनके निकटवर्ती अन्य गण; मन्त्र, रथन्तर साम, तथा हरिमान् और वसुमान् भी —
श्लोक 32 (skanda.3.53.32)
महितो विश्वकर्मा च वसवश्चैव सर्वशः । तथा पितृगणाः सर्वे सर्वाणि च हवींष्यथ
mahito viśvakarmā ca vasavaścaiva sarvaśaḥ tathā pitṛgaṇāḥ sarve sarvāṇi ca havīṁṣyatha
पूजित विश्वकर्मा तथा समस्त वसुगण; इसी प्रकार सभी पितृगण तथा समस्त हवि-पदार्थ भी वहाँ उपस्थित हैं।
श्लोक 33 (skanda.3.53.33)
ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदस्तथैव च । अथर्ववेदश्च तथा सर्वशास्त्राणि चैव ह
ṛgvedaḥ sāmavedaśca yajurvedastathaiva ca atharvavedaśca tathā sarvaśāstrāṇi caiva ha
ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद; अथर्ववेद और समस्त शास्त्र भी वहाँ मूर्तिमान् रूप में उपस्थित हैं —
श्लोक 34 (skanda.3.53.34)
इतिहासोपवेदाश्च वेदांगानि च सर्वशः । मेधा धृतिः स्मृतिश्चैव प्रज्ञा बुद्धिर्यशः समाः
itihāsopavedāśca vedāṁgāni ca sarvaśaḥ medhā dhṛtiḥ smṛtiścaiva prajñā buddhiryaśaḥ samāḥ
— इतिहास, उपवेद तथा सभी वेदांग; मेधा, धृति, स्मृति, प्रज्ञा, बुद्धि तथा यश भी वहाँ उपस्थित हैं।
श्लोक 35 (skanda.3.53.35)
कालचक्रं च तद्दिव्यं नित्यमक्षयमव्ययम् । यावन्त्यो देवपत्न्यश्च सर्वा एव मनोजवाः
kālacakraṁ ca taddivyaṁ nityamakṣayamavyayam yāvantyo devapatnyaśca sarvā eva manojavāḥ
वह दिव्य कालचक्र, जो नित्य, अक्षय तथा अव्यय है; तथा जितनी भी देवपत्नियाँ हैं, वे सब मन के समान वेगवाली — वहाँ उपस्थित हैं।
श्लोक 36 (skanda.3.53.36)
गार्हपत्या नाकचराः पितरो लोकविश्रुताः । सोमपा एकशृंगाश्च तथा सर्वे तपस्विनः
gārhapatyā nākacarāḥ pitaro lokaviśrutāḥ somapā ekaśṛṁgāśca tathā sarve tapasvinaḥ
गार्हपत्य अग्नि, स्वर्गचारी तथा लोकविख्यात पितर; सोमपा और एकशृंग नामक पितृगण, तथा समस्त तपस्वीजन भी वहाँ उपस्थित हैं।
श्लोक 37 (skanda.3.53.37)
नागाः सुपर्णाः पशवः पितामहमुपासते । स्थावरा जंगमाश्चापि महाभूतास्तथा परे
nāgāḥ suparṇāḥ paśavaḥ pitāmahamupāsate sthāvarā jaṁgamāścāpi mahābhūtāstathā pare
नाग, सुपर्ण (गरुड़ादि) तथा पशु भी पितामह की उपासना करते हैं; स्थावर और जंगम प्राणी, तथा अन्य महाभूत भी वहाँ उपस्थित हैं।
श्लोक 38 (skanda.3.53.38)
पुरंदरश्च देवेंद्रो वरुणो धनदस्तथा । महादेवः सहोमोऽत्र सदा गच्छति सर्वदः
puraṁdaraśca deveṁdro varuṇo dhanadastathā mahādevaḥ sahomo'tra sadā gacchati sarvadaḥ
पुरन्दर देवेन्द्र, वरुण तथा धनद (कुबेर); उमा सहित सर्वदाता महादेव भी सदा वहाँ जाते हैं।
श्लोक 39 (skanda.3.53.39)
गच्छंति सर्वदा देवा नारायणस्तथर्षयः । ऋषयो वालखिल्याश्च योनिजायोनिजास्तथा
gacchaṁti sarvadā devā nārāyaṇastatharṣayaḥ ṛṣayo vālakhilyāśca yonijāyonijāstathā
देवगण सदा वहाँ जाते हैं, और नारायण तथा ऋषिगण भी; योनिज और अयोनिज दोनों प्रकार के ऋषि तथा वालखिल्य भी।
श्लोक 40 (skanda.3.53.40)
यत्किंचित्रिषु लोकेषु दृश्यते स्थाणु जंगमम् । तस्यां सहोपविष्टायां तत्र ज्ञात्वा स धर्मवित्
yatkiṁcitriṣu lokeṣu dṛśyate sthāṇu jaṁgamam tasyāṁ sahopaviṣṭāyāṁ tatra jñātvā sa dharmavit
तीनों लोकों में जो कुछ भी स्थावर-जंगम दिखाई देता है, वह सब उस सभा में एकत्र उपस्थित था — यह जानकर धर्मवेत्ता धर्मदेव —
श्लोक 41 (skanda.3.53.41)
देवैर्मुनिवरैः क्रांतां समालोक्यातिविस्मितः । हर्षेण महता युक्तो रोमांचिततनूरुहः
devairmunivaraiḥ krāṁtāṁ samālokyātivismitaḥ harṣeṇa mahatā yukto romāṁcitatanūruhaḥ
देवों और श्रेष्ठ मुनियों से व्याप्त उस सभा को देखकर अत्यंत विस्मित हुए, महान् हर्ष से युक्त होकर उनके रोमांच खड़े हो गये।
श्लोक 42 (skanda.3.53.42)
तत्र धर्मो महातेजाः कथां पापप्रणाशिनीम् । वाच्यमानां तु शुश्राव व्यासेनामिततेजसा
tatra dharmo mahātejāḥ kathāṁ pāpapraṇāśinīm vācyamānāṁ tu śuśrāva vyāsenāmitatejasā
वहाँ महातेजस्वी धर्मदेव ने अपार तेजस्वी व्यासजी द्वारा कही जा रही उस पाप-नाशक कथा को सुना —
श्लोक 43 (skanda.3.53.43)
धर्मारण्यकथां दिव्यां तथैव सुमनोहराम् । धर्मार्थकाममोक्षाणां फलदात्रीं तथैव च
dharmāraṇyakathāṁ divyāṁ tathaiva sumanoharām dharmārthakāmamokṣāṇāṁ phaladātrīṁ tathaiva ca
धर्मारण्य की वह दिव्य तथा अत्यंत मनोहर कथा, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों का फल देनेवाली है —
श्लोक 44 (skanda.3.53.44)
पुत्रपौत्रप्रपौत्रादि फलदात्रीं तथैव च । धारणाच्छ्रवणाच्चापि पठनाच्चावलोकनात्
putrapautraprapautrādi phaladātrīṁ tathaiva ca dhāraṇācchravaṇāccāpi paṭhanāccāvalokanāt
तथा पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदि का फल देनेवाली — चाहे उसे धारण करने से हो, श्रवण करने से हो, पठन करने से हो अथवा अवलोकन मात्र से —
श्लोक 45 (skanda.3.53.45)
तां निशम्य सुविस्तीर्णां कथां ब्रह्मांडसंभवां प्रमोदोत्फुल्लनयनो ब्रह्माणमनुमत्य च
tāṁ niśamya suvistīrṇāṁ kathāṁ brahmāṁḍasaṁbhavāṁ pramodotphullanayano brahmāṇamanumatya ca
उस विस्तृत, ब्रह्माण्ड से उत्पन्न कथा को सुनकर, आनन्द से नेत्र खिल उठे, और ब्रह्माजी से अनुमति लेकर —
श्लोक 46 (skanda.3.53.46)
कृतकार्योपि धर्मात्मा गंतुकामस्तदाभवत् । नमस्कृत्य तदा धर्मो ब्रह्माणं स पितामहम्
kṛtakāryopi dharmātmā gaṁtukāmastadābhavat namaskṛtya tadā dharmo brahmāṇaṁ sa pitāmaham
अपना कार्य पूर्ण होने पर भी धर्मात्मा धर्मदेव तब जाने की इच्छा करने लगे; उन्होंने पितामह ब्रह्माजी को नमस्कार किया —
श्लोक 47 (skanda.3.53.47)
अनुज्ञातस्तदा तेन गतोऽसौ यमशासनम् । पितामहप्रसादाच्च श्रुत्वा पुण्यप्रदायिनीम्
anujñātastadā tena gato'sau yamaśāsanam pitāmahaprasādācca śrutvā puṇyapradāyinīm
उनकी अनुमति पाकर वे यमराज के अधिकार-क्षेत्र (यमलोक) को गये; और पितामह की कृपा से उस पुण्यदायिनी —
श्लोक 48 (skanda.3.53.48)
धर्मारण्यकथां दिव्यां पवित्रां पापनाशिनीम् । स गतोऽनुचरैः सार्द्धं ततः संयमिनीं प्रति
dharmāraṇyakathāṁ divyāṁ pavitrāṁ pāpanāśinīm sa gato'nucaraiḥ sārddhaṁ tataḥ saṁyaminīṁ prati
— दिव्य, पवित्र, पाप-नाशक धर्मारण्य-कथा सुनकर वे अपने अनुचरों के साथ संयमिनी (यमपुरी) की ओर गये।
श्लोक 49 (skanda.3.53.49)
अमात्यानुचरैः सार्धं प्रविष्टः स्वपुरं यमः । तत्रांतरे महातेजा नारदो मुनिपुंगवः
amātyānucaraiḥ sārdhaṁ praviṣṭaḥ svapuraṁ yamaḥ tatrāṁtare mahātejā nārado munipuṁgavaḥ
यमराज अपने मन्त्रियों और अनुचरों सहित अपनी पुरी में प्रविष्ट हुए; इसी बीच महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ नारदजी —
श्लोक 50 (skanda.3.53.50)
दुर्निरीक्ष्यः कृपायुक्तः समदर्शी तपोनिधिः । तपसा दग्धदेहोपि विष्णुभक्तिपरायणः
durnirīkṣyaḥ kṛpāyuktaḥ samadarśī taponidhiḥ tapasā dagdhadehopi viṣṇubhaktiparāyaṇaḥ
जिनकी ओर देखना कठिन है, जो कृपायुक्त, समदर्शी तथा तपोनिधि हैं; तप से जिनका शरीर दग्ध हो चुका है, फिर भी जो विष्णुभक्ति में परायण हैं —
श्लोक 51 (skanda.3.53.51)
सर्वगः सर्वविच्चैव नारदः सर्वदा शुचिः । वेदाध्ययनशीलश्च त्वागत स्तत्र संसदि
sarvagaḥ sarvaviccaiva nāradaḥ sarvadā śuciḥ vedādhyayanaśīlaśca tvāgata statra saṁsadi
सर्वत्र विचरण करनेवाले, सर्वज्ञ, सदा पवित्र तथा वेदाध्ययनशील नारदजी — वहाँ उस सभा में पधारे।
श्लोक 52 (skanda.3.53.52)
तं दृष्ट्वा सहसा धर्मो भार्यया सेवकैः सह । संमुखो हर्षसंयुक्तो गच्छन्नेव स सत्वरः
taṁ dṛṣṭvā sahasā dharmo bhāryayā sevakaiḥ saha saṁmukho harṣasaṁyukto gacchanneva sa satvaraḥ
उन्हें सहसा देखकर धर्मदेव अपनी पत्नी और सेवकों सहित हर्षित होकर शीघ्र ही उनके सम्मुख गये।
श्लोक 53 (skanda.3.53.53)
अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं कुलम् । अद्य मे सफलो धर्मस्त्वय्यायाते तपोधने
adya me saphalaṁ janma adya me saphalaṁ kulam adya me saphalo dharmastvayyāyāte tapodhane
धर्मदेव ने कहा — आज मेरा जन्म सफल हुआ, आज मेरा कुल सफल हुआ; हे तपोधन! आपके पधारने से आज मेरा धर्म भी सफल हो गया।
श्लोक 54 (skanda.3.53.54)
अर्घ्यपाद्यादिविधिना पूजां कृत्वा विधानतः । दंडवत्तं प्रणम्याथ विधिना चोपवेशितः
arghyapādyādividhinā pūjāṁ kṛtvā vidhānataḥ daṁḍavattaṁ praṇamyātha vidhinā copaveśitaḥ
अर्घ्य, पाद्य आदि की विधि से विधिपूर्वक पूजा करके, तथा दण्डवत् प्रणाम करके, उन्हें विधिपूर्वक आसन पर बैठाया।
श्लोक 55 (skanda.3.53.55)
आसने स्वे महादिव्ये रत्नकांचनभूषिते । चित्रार्पिता सभा सर्वा दीपा निर्वातगा इव
āsane sve mahādivye ratnakāṁcanabhūṣite citrārpitā sabhā sarvā dīpā nirvātagā iva
अपने ही महान् दिव्य, रत्न-स्वर्ण से विभूषित आसन पर — वह सारी सभा मानो चित्रित सी दिखती थी, वायुरहित स्थान में जलते दीपकों के समान स्थिर और उज्ज्वल।
श्लोक 56 (skanda.3.53.56)
विधाय कुशलप्रश्नं स्वागतेनाभिनंद्य तम् । प्रहर्षमतुलं लेभे धर्मारण्यकथां स्मरन्
vidhāya kuśalapraśnaṁ svāgatenābhinaṁdya tam praharṣamatulaṁ lebhe dharmāraṇyakathāṁ smaran
कुशल-प्रश्न करके तथा स्वागत से उनका अभिनन्दन करके, धर्मारण्य की कथा का स्मरण करते हुए उन्हें अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ।
श्लोक 57 (skanda.3.53.57)
नारदं पूजयित्वा तु प्रहृष्टेनांतरात्मना । हर्षितं तु यमं दृष्ट्वा नारदो विस्मिताननः
nāradaṁ pūjayitvā tu prahṛṣṭenāṁtarātmanā harṣitaṁ tu yamaṁ dṛṣṭvā nārado vismitānanaḥ
अत्यंत प्रसन्न अंतरात्मा से नारदजी की पूजा करके — किन्तु यमराज को इतना हर्षित देखकर नारदजी का मुख विस्मय से भर गया —
श्लोक 58 (skanda.3.53.58)
चिंतयामास मनसा किमिदं हर्षितो हरिः । अतिहर्षं च तं दृष्ट्वा यमराजस्वरूपिणम् । आश्चर्यमनसं चैव नारदः पृष्टवांस्तदा
ciṁtayāmāsa manasā kimidaṁ harṣito hariḥ atiharṣaṁ ca taṁ dṛṣṭvā yamarājasvarūpiṇam āścaryamanasaṁ caiva nāradaḥ pṛṣṭavāṁstadā
उन्होंने मन में सोचा — 'यह क्या है, कैसे यमराज इतने हर्षित हैं?' यमराज के स्वरूप को अत्यंत हर्षित देखकर आश्चर्यचकित मन से नारदजी ने तब पूछा —
श्लोक 59 (skanda.3.53.59)
नारद उवाच । किं दृष्टं भवताश्चर्य्यं किं वा लब्धं महत्पदम् । दुष्टस्त्वं दुष्टकर्मा च दुष्टात्मा क्रोधरूपधृक्
nārada uvāca kiṁ dṛṣṭaṁ bhavatāścaryyaṁ kiṁ vā labdhaṁ mahatpadam duṣṭastvaṁ duṣṭakarmā ca duṣṭātmā krodharūpadhṛk
नारदजी ने कहा — आपने क्या आश्चर्य देखा है, अथवा क्या महान् पद प्राप्त किया है? आप तो कठोर, कठोर-कर्मा तथा क्रोध-स्वरूप धारण करनेवाले माने जाते हैं —
श्लोक 60 (skanda.3.53.60)
पापिनां यमनं चैवमेतद्रूपं महत्तरम् । सौम्यरूपं कथं जातमेतन्मे संशयः प्रभो
pāpināṁ yamanaṁ caivametadrūpaṁ mahattaram saumyarūpaṁ kathaṁ jātametanme saṁśayaḥ prabho
पापियों का नियमन करना ही आपका यह बड़ा स्वरूप है; फिर यह सौम्य रूप कैसे उत्पन्न हुआ? हे प्रभो! यही मेरा संशय है।
श्लोक 61 (skanda.3.53.61)
अद्य त्वं हर्षसंयुक्तो दृश्यसे केन हेतुना । कथयस्व महाकाय हर्षस्यैव हि कारणम्
adya tvaṁ harṣasaṁyukto dṛśyase kena hetunā kathayasva mahākāya harṣasyaiva hi kāraṇam
आज आप किस कारण हर्षयुक्त दिखाई दे रहे हैं? हे महाकाय! आप मुझे अपने हर्ष का कारण बताइये।
श्लोक 62 (skanda.3.53.62)
धर्मराज उवाच । श्रूयतां ब्रह्मपुत्रैतत्कथयामि न संशयः । पुराहं ब्रह्मसदनं गतवानभिवंदितुम्
dharmarāja uvāca śrūyatāṁ brahmaputraitatkathayāmi na saṁśayaḥ purāhaṁ brahmasadanaṁ gatavānabhivaṁditum
धर्मराज ने कहा — हे ब्रह्मपुत्र! सुनिये, मैं यह निःसंदेह कहता हूँ। पूर्वकाल में मैं अभिवादन करने के लिए ब्रह्मलोक गया था।
श्लोक 63 (skanda.3.53.63)
तत्रासीनः सभामध्ये सर्वलोकैकपूजिते । नानाकथाः श्रुतास्तत्र धर्म्मवर्गसमन्विताः
tatrāsīnaḥ sabhāmadhye sarvalokaikapūjite nānākathāḥ śrutāstatra dharmmavargasamanvitāḥ
वहाँ सर्वलोक-पूजित सभा के मध्य बैठकर मैंने वहाँ धर्म-प्रधान अनेक कथाएँ सुनीं —
श्लोक 64 (skanda.3.53.64)
कथाः पुण्या धर्मयुता रम्या व्यासमुखाच्छ्रुताः । धर्मकामार्थसंयुक्ताः सर्वाघौघविनाशिनीः
kathāḥ puṇyā dharmayutā ramyā vyāsamukhācchrutāḥ dharmakāmārthasaṁyuktāḥ sarvāghaughavināśinīḥ
व्यासजी के मुख से सुनी गयीं वे पुण्यमयी, धर्मयुक्त, रम्य कथाएँ, जो धर्म, अर्थ और काम से संयुक्त तथा समस्त पापसमूह को नष्ट करनेवाली हैं —
श्लोक 65 (skanda.3.53.65)
याः श्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यंते ब्रह्महत्यया । तारयंति पितृगणाञ्छतमेकोत्तरं मुने
yāḥ śrutvā sarvapāpebhyo mucyaṁte brahmahatyayā tārayaṁti pitṛgaṇāñchatamekottaraṁ mune
जिन्हें सुनकर मनुष्य ब्रह्महत्या सहित सभी पापों से मुक्त हो जाता है, और हे मुने! वे एक सौ एक पीढ़ियों तक के पितृगण को तार देती हैं।
श्लोक 66 (skanda.3.53.66)
नारद उवाच । कीदृशी तत्कथा मे तां प्रशंस भवता श्रुताम् । कथां यम महाबाहो श्रोतुकामोस्म्यहं च ताम्
nārada uvāca kīdṛśī tatkathā me tāṁ praśaṁsa bhavatā śrutām kathāṁ yama mahābāho śrotukāmosmyahaṁ ca tām
नारदजी ने कहा — वह कथा कैसी है, जो आपने सुनी? उसका वर्णन कीजिये। हे महाबाहो यम! मैं भी वह कथा सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 67 (skanda.3.53.67)
यम उवाच । एकदा ब्रह्मलोकेऽहं नमस्कर्तुं पितामहम् । गतवानस्मि तं देशं कार्याकार्यविचारणे
yama uvāca ekadā brahmaloke'haṁ namaskartuṁ pitāmaham gatavānasmi taṁ deśaṁ kāryākāryavicāraṇe
यमराज ने कहा — एक बार मैं ब्रह्मलोक में पितामह को नमस्कार करने गया था, कार्य-अकार्य के विचार हेतु उस स्थान को गया था।
श्लोक 68 (skanda.3.53.68)
मया तत्राद्भुतं दृष्टं श्रुतं च मुनिसत्तम । धर्म्मारण्यकथां दिव्यां कृष्णद्वैपायनेरिताम्
mayā tatrādbhutaṁ dṛṣṭaṁ śrutaṁ ca munisattama dharmmāraṇyakathāṁ divyāṁ kṛṣṇadvaipāyaneritām
हे मुनिसत्तम! वहाँ मैंने अद्भुत वस्तु देखी और सुनी — कृष्णद्वैपायन (व्यासजी) द्वारा कही गयी धर्मारण्य की वह दिव्य कथा।
श्लोक 69 (skanda.3.53.69)
श्रुत्वा कथां महापुण्यां ब्रह्मन्ब्रह्मांडगां शुभाम् । गुणपूर्णां सत्ययुक्तां तेन हर्षेण हर्षितः
śrutvā kathāṁ mahāpuṇyāṁ brahmanbrahmāṁḍagāṁ śubhām guṇapūrṇāṁ satyayuktāṁ tena harṣeṇa harṣitaḥ
हे ब्रह्मन्! उस महापुण्य, शुभ, ब्रह्माण्डव्यापी, गुणपूर्ण तथा सत्ययुक्त कथा को सुनकर मैं उसी हर्ष से हर्षित हूँ।
श्लोक 70 (skanda.3.53.70)
अन्यच्चैव मुनिश्रेष्ठ तवागमनकारणम् । शुभाय च सुखायैव क्षेमाय च जयाय हि
anyaccaiva muniśreṣṭha tavāgamanakāraṇam śubhāya ca sukhāyaiva kṣemāya ca jayāya hi
और हे मुनिश्रेष्ठ! आपका आगमन भी इसका दूसरा कारण है — जो शुभ, सुख, क्षेम तथा विजय के लिए ही होता है।
श्लोक 71 (skanda.3.53.71)
आद्यास्मि कृतकृत्योऽहमद्याहं सुकृती मुने । धर्मोनामाद्य जातोऽहं तव पद्युग्मदर्शनात्
ādyāsmi kṛtakṛtyo'hamadyāhaṁ sukṛtī mune dharmonāmādya jāto'haṁ tava padyugmadarśanāt
आज मैं कृतकृत्य हो गया, हे मुने! आज मैं सुकृती हो गया; आपके दोनों चरणों के दर्शन से आज मानो मैं वास्तव में 'धर्म' नाम से उत्पन्न हुआ।
श्लोक 72 (skanda.3.53.72)
पूज्योऽहं च कृतार्थोहं धन्योहं चाद्य नारद । युष्मत्पादप्रसादाच्च पूज्योऽहं भुवनत्रये
pūjyo'haṁ ca kṛtārthohaṁ dhanyohaṁ cādya nārada yuṣmatpādaprasādācca pūjyo'haṁ bhuvanatraye
हे नारद! आज मैं पूज्य, कृतार्थ तथा धन्य हो गया हूँ; आपके चरणों की कृपा से मैं तीनों लोकों में पूज्य हो गया हूँ।
श्लोक 73 (skanda.3.53.73)
सूत उवाच । एवंविधैर्वचोभिश्च तोषितो मुनिसत्तमः । पप्रच्छ परया भक्त्या धर्मारण्यकथां शुभाम्
sūta uvāca evaṁvidhairvacobhiśca toṣito munisattamaḥ papraccha parayā bhaktyā dharmāraṇyakathāṁ śubhām
सूतजी बोले — ऐसे वचनों से संतुष्ट होकर उन मुनिश्रेष्ठ (नारद) ने परम भक्ति से उस शुभ धर्मारण्य-कथा के विषय में पूछा।
श्लोक 74 (skanda.3.53.74)
नारद उवाच । श्रुता व्यासमुखाद्धर्म्म धर्मारण्यकथा शुभा । तत्सर्वं हि कथय मे विस्तीर्णं च यथातथम्
nārada uvāca śrutā vyāsamukhāddharmma dharmāraṇyakathā śubhā tatsarvaṁ hi kathaya me vistīrṇaṁ ca yathātatham
नारदजी ने कहा — हे धर्म! व्यासजी के मुख से जो शुभ धर्मारण्य-कथा सुनी गयी, वह सब मुझे विस्तार से यथातथ्य कहिये।
श्लोक 75 (skanda.3.53.75)
यम उवाच । व्यग्रोऽहं सततं ब्रह्मन्प्राणिनां सुखदुःखिनाम् । तत्तत्कर्मानुसारेण गतिं दातुं सुखेतराम्
yama uvāca vyagro'haṁ satataṁ brahmanprāṇināṁ sukhaduḥkhinām tattatkarmānusāreṇa gatiṁ dātuṁ sukhetarām
यमराज ने कहा — हे ब्रह्मन्! मैं सदा सुखी-दुःखी प्राणियों को उनके-उनके कर्मों के अनुसार सुख अथवा दुःखरूप गति देने में व्यस्त रहता हूँ।
श्लोक 76 (skanda.3.53.76)
तथापि साधुसंगो हि धर्मायैव प्रजायते । इह लोके परत्रापि क्षेमाय च सुखाय च
tathāpi sādhusaṁgo hi dharmāyaiva prajāyate iha loke paratrāpi kṣemāya ca sukhāya ca
तथापि साधुओं का संग तो धर्म के लिए ही होता है, और इस लोक तथा परलोक दोनों में क्षेम और सुख के लिए ही होता है।
श्लोक 77 (skanda.3.53.77)
ब्रह्मणः सन्निधौ यञ्च श्रुतं व्यासमुखेरितम् । तत्सर्वं कथयिष्यामि मानुषाणां हिताय वै
brahmaṇaḥ sannidhau yañca śrutaṁ vyāsamukheritam tatsarvaṁ kathayiṣyāmi mānuṣāṇāṁ hitāya vai
ब्रह्माजी की उपस्थिति में व्यासजी के मुख से जो कुछ भी सुना गया, वह सब मैं मनुष्यों के हित के लिए कहूँगा।
श्लोक 78 (skanda.3.53.78)
सूत उवाच । यमेन कथितं सर्वं यच्छ्रुतं ब्रह्मसंसदि । आदिमध्यावसानं च सर्वं नैवात्र संशयः
sūta uvāca yamena kathitaṁ sarvaṁ yacchrutaṁ brahmasaṁsadi ādimadhyāvasānaṁ ca sarvaṁ naivātra saṁśayaḥ
सूतजी बोले — ब्रह्मसभा में जो कुछ सुना गया था, वह सब यमराज ने आदि से मध्य और अंत तक — बिना किसी संशय के — कह सुनाया।
श्लोक 79 (skanda.3.53.79)
कलिद्वापरयोर्मध्ये धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । गतोऽसौ नारदो मर्त्ये राज्यं धर्मसुतस्य वै
kalidvāparayormadhye dharmaputraṁ yudhiṣṭhiram gato'sau nārado martye rājyaṁ dharmasutasya vai
कलि और द्वापर युग के संधिकाल में वे नारदजी मर्त्यलोक में, धर्मपुत्र युधिष्ठिर के राज्य में गये —
श्लोक 80 (skanda.3.53.80)
आगतः श्रीहरेरंशो नारदः प्रत्यदृश्यत । ज्वलिताग्निप्रतीकाशो बालार्कसदृशेक्षणः
āgataḥ śrīhareraṁśo nāradaḥ pratyadṛśyata jvalitāgnipratīkāśo bālārkasadṛśekṣaṇaḥ
श्रीहरि के अंशस्वरूप नारदजी वहाँ पधारे और प्रकट हुए — वे प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी, उदीयमान सूर्य के समान नेत्रोंवाले थे।
श्लोक 81 (skanda.3.53.81)
सव्यापवृत्तं विपुलं जटामंडलमुद्वहन् । चंद्रांशुशुक्ले वसने वसानो रुक्मभूषणः
savyāpavṛttaṁ vipulaṁ jaṭāmaṁḍalamudvahan caṁdrāṁśuśukle vasane vasāno rukmabhūṣaṇaḥ
बायीं ओर घुमी हुई विशाल जटाओं को धारण किये, चन्द्रकिरण के समान श्वेत वस्त्र पहने, स्वर्ण-आभूषणों से सुसज्जित —
श्लोक 82 (skanda.3.53.82)
वीणां गृहीत्वा महतीं कक्षासक्तां सखीमिव । कृष्णाजिनोत्तरासंगो हेमयज्ञोपवीतवान्
vīṇāṁ gṛhītvā mahatīṁ kakṣāsaktāṁ sakhīmiva kṛṣṇājinottarāsaṁgo hemayajñopavītavān
अपनी महती नामक वीणा को बगल में सखी के समान दबाये, कृष्णमृगचर्म का उत्तरीय धारण किये, स्वर्णमय यज्ञोपवीत पहने —
श्लोक 83 (skanda.3.53.83)
दण्डी कमंडलुकरः साक्षाद्वह्निरिवापरः । भेत्ता जगति गुह्यानां विग्रहाणां गुहोपमः
daṇḍī kamaṁḍalukaraḥ sākṣādvahnirivāparaḥ bhettā jagati guhyānāṁ vigrahāṇāṁ guhopamaḥ
दण्ड धारण किये, हाथ में कमण्डलु लिये, मानो साक्षात् द्वितीय अग्नि के समान; जगत् में गुह्य रहस्यों को प्रकट करनेवाले, विग्रहों में गुह (कार्तिकेय) के समान —
श्लोक 84 (skanda.3.53.84)
महर्षिगणसंसिद्धो विद्वान्गांधर्ववेदवित् । वैरकेलिकलो विप्रो ब्राह्मः कलिरिवापरः
maharṣigaṇasaṁsiddho vidvāngāṁdharvavedavit vairakelikalo vipro brāhmaḥ kalirivāparaḥ
महर्षिगण में सिद्ध, विद्वान्, गान्धर्ववेद के ज्ञाता; वैर उत्पन्न करने की कला में निपुण ब्राह्मण, मानो साक्षात् द्वितीय कलि के समान —
श्लोक 85 (skanda.3.53.85)
देवगंधर्वलोकानामादिवक्ता सुनिग्रहः । गाता चतुर्णां वेदानामुद्गाता हरिसद्गुणान्
devagaṁdharvalokānāmādivaktā sunigrahaḥ gātā caturṇāṁ vedānāmudgātā harisadguṇān
देव और गन्धर्व-लोकों के आदि वक्ता, सुसंयमी; चारों वेदों के गायक, तथा हरि के सद्गुणों के उद्गाता।
श्लोक 86 (skanda.3.53.86)
स नारदोऽथ विप्रर्षिर्ब्रह्मलोकचरोऽव्ययः । आगतोऽथ पुरीं हर्षाद्धर्मराजेन पालिताम्
sa nārado'tha viprarṣirbrahmalokacaro'vyayaḥ āgato'tha purīṁ harṣāddharmarājena pālitām
वे नारद, विप्रर्षि, ब्रह्मलोकचारी अव्यय मुनि, तब हर्षपूर्वक धर्मराज (युधिष्ठिर) द्वारा रक्षित नगरी में पधारे।
श्लोक 87 (skanda.3.53.87)
अथ तत्रोपविष्टेषु राजन्येषु महात्मसु । महत्सु चोपविष्टेषु गंधर्वेषु च तत्र वै
atha tatropaviṣṭeṣu rājanyeṣu mahātmasu mahatsu copaviṣṭeṣu gaṁdharveṣu ca tatra vai
उस समय वहाँ महात्मा राजन्यगण बैठे हुए थे, तथा महापुरुष और गन्धर्वगण भी वहाँ बैठे हुए थे —
श्लोक 88 (skanda.3.53.88)
लोकाननुचरन्सर्वानागतः स महर्षिराट् । नारदः सुमहातेजा ऋषिभिः सहितस्तदा
lokānanucaransarvānāgataḥ sa maharṣirāṭ nāradaḥ sumahātejā ṛṣibhiḥ sahitastadā
समस्त लोकों में विचरण करते हुए वे महर्षिराज, अत्यंत तेजस्वी नारदजी, तब ऋषियों के साथ वहाँ पधारे।
श्लोक 89 (skanda.3.53.89)
तमागतमृषिं दृष्ट्वा नारदं सर्वधर्मवित् । सिंहासनात्समुत्थाय प्रययौ सन्मुखस्तदा
tamāgatamṛṣiṁ dṛṣṭvā nāradaṁ sarvadharmavit siṁhāsanātsamutthāya prayayau sanmukhastadā
उन नारद ऋषि को आया देखकर सर्वधर्मज्ञ युधिष्ठिर सिंहासन से उठकर तुरन्त उनके सम्मुख गये।
श्लोक 90 (skanda.3.53.90)
अभ्यवादयतं प्रीत्या विनयाव नतस्तदा । तदर्हमासनं तस्मै संप्रदाय यथाविधि
abhyavādayataṁ prītyā vinayāva natastadā tadarhamāsanaṁ tasmai saṁpradāya yathāvidhi
उन्होंने प्रेमपूर्वक अभिवादन किया और विनयपूर्वक नत हुए; तत्पश्चात् विधिपूर्वक उन्हें उपयुक्त आसन प्रदान किया।
श्लोक 91 (skanda.3.53.91)
गां चैवं मधुपर्कं च संप्रदायार्धमेव च । अर्चयामास रत्नैश्च सर्वकामैश्च धर्मवित्
gāṁ caivaṁ madhuparkaṁ ca saṁpradāyārdhameva ca arcayāmāsa ratnaiśca sarvakāmaiśca dharmavit
उन्होंने गौ, मधुपर्क तथा अर्ध्य निवेदित किया; धर्मज्ञ युधिष्ठिर ने रत्नों तथा समस्त वांछित वस्तुओं से उनकी पूजा की।
श्लोक 92 (skanda.3.53.92)
तुतोष च यथावञ्च पूजां प्राप्य च धर्मवित् । कुशली त्वं महाभाग तपसः कुशलं तव
tutoṣa ca yathāvañca pūjāṁ prāpya ca dharmavit kuśalī tvaṁ mahābhāga tapasaḥ kuśalaṁ tava
यथोचित पूजा पाकर धर्मज्ञ (नारद) संतुष्ट हुए और बोले — 'हे महाभाग! क्या आप कुशल हैं? आपकी तपस्या कुशलतापूर्वक चल रही है न?'
श्लोक 93 (skanda.3.53.93)
न कश्चिद्बाधते दुष्टो दैत्यो हि स्वर्गभूपतिम् । मुने कल्याणरूपस्त्वं नमस्कृतः सुरासुरैः । सर्व्वगः सर्ववेत्ता च ब्रह्मपुत्र कृपानिधे
na kaścidbādhate duṣṭo daityo hi svargabhūpatim mune kalyāṇarūpastvaṁ namaskṛtaḥ surāsuraiḥ sarvvagaḥ sarvavettā ca brahmaputra kṛpānidhe
'निश्चय ही कोई दुष्ट दैत्य इस स्वर्गसम राज्य के स्वामी को कष्ट नहीं पहुँचाता होगा। हे मुने! आप कल्याण-स्वरूप, देव-दानवों द्वारा नमस्कृत, सर्वगामी और सर्वज्ञ हैं, हे कृपानिधे ब्रह्मपुत्र!'
श्लोक 94 (skanda.3.53.94)
नारद उवाच । सर्वतः कुशलं मेद्य प्रसादाद्ब्रह्मणः सदा । कुशली त्वं महाभाग धर्मपुत्र युधिष्ठिर
nārada uvāca sarvataḥ kuśalaṁ medya prasādādbrahmaṇaḥ sadā kuśalī tvaṁ mahābhāga dharmaputra yudhiṣṭhira
नारदजी ने कहा — ब्रह्माजी की कृपा से आज मेरा सर्वत्र कुशल है। हे महाभाग धर्मपुत्र युधिष्ठिर! क्या आप कुशल हैं?
श्लोक 95 (skanda.3.53.95)
भ्रातृभिः सह राजेंद्र धर्मेषु रमते मनः । दारैः पुत्रैश्च भृत्यैश्च कुशलैर्गजवाजिभिः
bhrātṛbhiḥ saha rājeṁdra dharmeṣu ramate manaḥ dāraiḥ putraiśca bhṛtyaiśca kuśalairgajavājibhiḥ
हे राजेन्द्र! क्या भाइयों सहित आपका मन धर्म-कार्यों में रमण करता है? क्या पत्नी, पुत्र, सेवकगण तथा हाथी-घोड़े भी कुशल हैं?
श्लोक 96 (skanda.3.53.96)
औरसानिव पुत्रांश्च प्रजा धर्मेण धर्मज । पालयसि किमाश्चर्यं त्वया धन्या हि सा प्रजा
aurasāniva putrāṁśca prajā dharmeṇa dharmaja pālayasi kimāścaryaṁ tvayā dhanyā hi sā prajā
हे धर्मज! क्या आप प्रजा का पालन धर्मपूर्वक अपने ही पुत्रों के समान करते हैं? यदि हाँ, तो कोई आश्चर्य नहीं — क्योंकि वह प्रजा आपके कारण धन्य है।
श्लोक 97 (skanda.3.53.97)
पालनात्पोषणान्नॄणां धर्मो भवति वै ध्रुवम् । तत्तद्धर्मस्य भोक्ता त्वमित्येवं मनुरब्रवीत्
pālanātpoṣaṇānnṝṇāṁ dharmo bhavati vai dhruvam tattaddharmasya bhoktā tvamityevaṁ manurabravīt
'मनुष्यों के पालन और पोषण से ही धर्म निश्चय ही स्थिर होता है, और तुम उसी धर्म के फल के भोक्ता हो' — ऐसा मनु ने कहा था।
श्लोक 98 (skanda.3.53.98)
युधिष्ठिर उवाच । कुशलं मम राष्ट्रं च भवतामंघ्रिस्पर्शनात् । दर्शनेन महाभाग जातोऽहं गतकिल्बिषः
yudhiṣṭhira uvāca kuśalaṁ mama rāṣṭraṁ ca bhavatāmaṁghrisparśanāt darśanena mahābhāga jāto'haṁ gatakilbiṣaḥ
युधिष्ठिरजी ने कहा — आपके चरण-स्पर्श से मैं और मेरा राष्ट्र दोनों कुशल हैं। हे महाभाग! आपके दर्शन से ही मैं पापरहित हो गया हूँ।
श्लोक 99 (skanda.3.53.99)
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं सभाग्योऽहं धरातले । अद्याहं सुकृती जातो ह्मपुत्रे गृहागते
dhanyo'haṁ kṛtakṛtyo'haṁ sabhāgyo'haṁ dharātale adyāhaṁ sukṛtī jāto hmaputre gṛhāgate
मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ, इस धरातल पर सौभाग्यशाली हूँ; आज मैं वास्तव में पुण्यशाली हो गया, क्योंकि आप मेरे घर पधारे हैं।
श्लोक 100 (skanda.3.53.100)
कुत आगमनं ब्रह्मन्नद्य ते मुनिसत्तम । अनुग्रहार्थं साधूनां किं वा कार्येण केन च
kuta āgamanaṁ brahmannadya te munisattama anugrahārthaṁ sādhūnāṁ kiṁ vā kāryeṇa kena ca
हे ब्रह्मन्! हे मुनिसत्तम! आज आपका आगमन कहाँ से हुआ है? क्या यह साधुओं पर अनुग्रह करने के लिए है, अथवा किसी अन्य कार्य से?
श्लोक 101 (skanda.3.53.101)
नारद उवाच । आगतोऽहं नृपश्रेष्ठ सकाशाच्छमनस्य च । व्यासेनोक्तां ब्रह्मणोग्रे कथां पौराणिकीं शुभाम्
nārada uvāca āgato'haṁ nṛpaśreṣṭha sakāśācchamanasya ca vyāsenoktāṁ brahmaṇogre kathāṁ paurāṇikīṁ śubhām
नारदजी ने कहा — हे नृपश्रेष्ठ! मैं यमराज के पास से आया हूँ; व्यासजी द्वारा ब्रह्माजी के समक्ष कही गयी वह शुभ पौराणिक कथा —
श्लोक 102 (skanda.3.53.102)
धर्मारण्याश्रितां दिव्यां सर्वसंतापहारिणीम् । यां श्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते ब्रह्महत्यया
dharmāraṇyāśritāṁ divyāṁ sarvasaṁtāpahāriṇīm yāṁ śrutvā sarvapāpebhyo mucyate brahmahatyayā
— धर्मारण्य से सम्बन्धित वह दिव्य कथा, जो समस्त संतापों को हरनेवाली है, जिसे सुनकर मनुष्य ब्रह्महत्या सहित समस्त पापों से मुक्त हो जाता है —
श्लोक 103 (skanda.3.53.103)
हत्यायुतप्रशमनीं तापत्रयविनाशिनीम् । यां वै श्रुत्वातिभक्त्या च कठिनो मृदुतां भजेत्
hatyāyutapraśamanīṁ tāpatrayavināśinīm yāṁ vai śrutvātibhaktyā ca kaṭhino mṛdutāṁ bhajet
— जो दस हजार हत्याओं को शान्त करनेवाली तथा त्रिविध तापों का नाश करनेवाली है, जिसे अत्यंत भक्ति से सुनकर कठोर हृदयवाला भी कोमलता को प्राप्त होता है —
श्लोक 104 (skanda.3.53.104)
धर्मराजेन तां श्रुत्वा ममाग्रे च निवेदिताम् । तमपृच्छ्दमेयात्मा कथां धर्मविनोदिनीम्
dharmarājena tāṁ śrutvā mamāgre ca niveditām tamapṛcchdameyātmā kathāṁ dharmavinodinīm
— धर्मराज (यम) से उसे सुनकर तथा मेरे सामने कहलवाकर, मैंने उन अमेयात्मा से उस धर्म-विनोदिनी कथा के विषय में पूछा।
श्लोक 105 (skanda.3.53.105)
युधिष्ठिर उवाच । धर्मारण्याश्रितां पुण्यां कथां मे द्विजसत्तम । कथयस्व प्रसादेन लोकानां हितकाम्यया
yudhiṣṭhira uvāca dharmāraṇyāśritāṁ puṇyāṁ kathāṁ me dvijasattama kathayasva prasādena lokānāṁ hitakāmyayā
युधिष्ठिरजी ने कहा — हे द्विजसत्तम! लोकों के हित की कामना से कृपापूर्वक वह धर्मारण्य-सम्बन्धी पुण्य कथा मुझे भी सुनाइये।
श्लोक 106 (skanda.3.53.106)
नारद् उवाच । स्नानकालोयमस्माकं न कथावसरो मम । परंतु श्रूयतां राजन्नुपदेशं ददाम्यहम्
nārad uvāca snānakāloyamasmākaṁ na kathāvasaro mama paraṁtu śrūyatāṁ rājannupadeśaṁ dadāmyaham
नारदजी ने कहा — यह हमारे स्नान का समय है, कथा कहने का अवसर नहीं है। किन्तु हे राजन्! सुनिये, मैं आपको एक उपदेश देता हूँ —
श्लोक 107 (skanda.3.53.107)
मासानामुत्तमो माघः स्नानदानादिके तथा । तस्मिन्माघे च यः स्नाति सर्वपापैः प्रमुच्यते
māsānāmuttamo māghaḥ snānadānādike tathā tasminmāghe ca yaḥ snāti sarvapāpaiḥ pramucyate
महीनों में माघ स्नान-दानादि के लिए सर्वश्रेष्ठ है; जो उस माघ मास में स्नान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 108 (skanda.3.53.108)
स्नानार्थं याहि शीघ्रं त्वं गंगायां नृपतेऽधुना । व्यासस्यागमनं चाद्य भविष्यति नृपोत्तम
snānārthaṁ yāhi śīghraṁ tvaṁ gaṁgāyāṁ nṛpate'dhunā vyāsasyāgamanaṁ cādya bhaviṣyati nṛpottama
हे नृपते! अब आप शीघ्र गंगा में स्नान के लिए जाइये; और हे नृपोत्तम! आज व्यासजी का आगमन भी होनेवाला है।
श्लोक 109 (skanda.3.53.109)
तं पृच्छस्व महाभाग श्रावयिष्यति ते शुभम् । तीर्थानां चैव सर्वेषां फलं पुण्यं यदद्भुतम्
taṁ pṛcchasva mahābhāga śrāvayiṣyati te śubham tīrthānāṁ caiva sarveṣāṁ phalaṁ puṇyaṁ yadadbhutam
हे महाभाग! आप उन्हीं से पूछिये; वे आपको समस्त तीर्थों के उस अद्भुत, शुभ पुण्यफल को सुनायेंगे।
श्लोक 110 (skanda.3.53.110)
भूतं भव्यं भविष्यं च उत्तमाधममध्यमाः । वाचयिष्यति तत्सर्वमितिहाससमुद्भवम्
bhūtaṁ bhavyaṁ bhaviṣyaṁ ca uttamādhamamadhyamāḥ vācayiṣyati tatsarvamitihāsasamudbhavam
भूत, वर्तमान और भविष्य; उत्तम, अधम और मध्यम — इतिहास से उत्पन्न वह सब कुछ वे कह सुनायेंगे।
श्लोक 111 (skanda.3.53.111)
धर्मारण्यस्य सकलं वृत्तं यद्यत्पुरातनम् । व्यासः सत्यवतीपुत्रो वदिष्यति च तेऽखिलम्
dharmāraṇyasya sakalaṁ vṛttaṁ yadyatpurātanam vyāsaḥ satyavatīputro vadiṣyati ca te'khilam
धर्मारण्य का सम्पूर्ण प्राचीन वृत्तान्त जो कुछ भी है — सत्यवती-पुत्र व्यासजी वह सब आपको बतायेंगे।
श्लोक 112 (skanda.3.53.112)
सूत उवाच । एवमुक्त्वा विधेः पुत्रस्तत्रैवांतरधीयत । तस्मिन्गते स नृपतिः क्रीडते सचिवैः सह
sūta uvāca evamuktvā vidheḥ putrastatraivāṁtaradhīyata tasmingate sa nṛpatiḥ krīḍate sacivaiḥ saha
सूतजी बोले — ऐसा कहकर ब्रह्मपुत्र नारदजी वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके जाने के बाद वह राजा मन्त्रियों के साथ विनोद करने लगा।
श्लोक 113 (skanda.3.53.113)
एतस्मिन्नंतरे तत्र प्राप्तः सत्यवतीसुतः । विज्ञापयामास तदा विदुरः पांडवस्य हि
etasminnaṁtare tatra prāptaḥ satyavatīsutaḥ vijñāpayāmāsa tadā viduraḥ pāṁḍavasya hi
इसी बीच वहाँ सत्यवती-पुत्र (व्यासजी) पधारे; तब विदुरजी ने पाण्डव (युधिष्ठिर) को उनके आगमन की सूचना दी।
श्लोक 114 (skanda.3.53.114)
सूत उवाच । आगतं तु मुनिं श्रुत्वा सर्वे हर्षसमाकुलाः । समुत्तस्थुर्हि भीमाद्याः सह् धर्मेण सर्वशः
sūta uvāca āgataṁ tu muniṁ śrutvā sarve harṣasamākulāḥ samuttasthurhi bhīmādyāḥ sah dharmeṇa sarvaśaḥ
सूतजी बोले — मुनि का आगमन सुनकर सभी हर्ष से भर गये; भीम आदि सभी धर्मराज सहित तुरन्त उठ खड़े हुए।
श्लोक 115 (skanda.3.53.115)
तदा हि सन्मुखो भूत्वा मुमुदे नतकन्धरः । दंडवत्तं प्रणम्याथ भ्रातृभिः सहितस्तदा
tadā hi sanmukho bhūtvā mumude natakandharaḥ daṁḍavattaṁ praṇamyātha bhrātṛbhiḥ sahitastadā
तब सम्मुख होकर, नत मस्तक हो, वे आनन्दित हुए; तत्पश्चात् भाइयों सहित उन्होंने दण्डवत् प्रणाम किया।
श्लोक 116 (skanda.3.53.116)
मधुपर्केण विधिना पूजां कृत्वा सुशोभनाम् । सिंहासने समावेश्य पप्रच्छानामयं तदा
madhuparkeṇa vidhinā pūjāṁ kṛtvā suśobhanām siṁhāsane samāveśya papracchānāmayaṁ tadā
मधुपर्क द्वारा विधिपूर्वक सुन्दर पूजा करके तथा उन्हें सिंहासन पर बिठाकर, तब उन्होंने उनका कुशल-क्षेम पूछा।
श्लोक 117 (skanda.3.53.117)
ततः पुण्यां कथां दिव्यां श्रावयामास धर्मवित् । कथांते मुनिशार्दूलं वचनं चेदमब्रवीत्
tataḥ puṇyāṁ kathāṁ divyāṁ śrāvayāmāsa dharmavit kathāṁte muniśārdūlaṁ vacanaṁ cedamabravīt
तब व्यासजी ने उस पुण्य, दिव्य कथा को सुनाया; कथा के अंत में युधिष्ठिर ने उस मुनिश्रेष्ठ से यह वचन कहा —
श्लोक 118 (skanda.3.53.118)
युधिष्ठिर उवाच । त्वत्प्रसादान्मया ब्रह्मञ्छ्रुतास्तु प्रवराः कथाः । आपद्धर्म्मा राजधर्मा मोक्षधर्म्मा ह्यनेकशः
yudhiṣṭhira uvāca tvatprasādānmayā brahmañchrutāstu pravarāḥ kathāḥ āpaddharmmā rājadharmā mokṣadharmmā hyanekaśaḥ
युधिष्ठिरजी ने कहा — हे ब्रह्मन्! आपकी कृपा से मैंने अनेक प्रकार से आपद्धर्म, राजधर्म तथा मोक्षधर्म सम्बन्धी श्रेष्ठ कथाएँ सुनी हैं —
श्लोक 119 (skanda.3.53.119)
पुराणानां च धर्माश्च व्रतानि बहुशस्तथा । तीर्थान्यनेकरूपाणि सर्वाण्यायतनानि च
purāṇānāṁ ca dharmāśca vratāni bahuśastathā tīrthānyanekarūpāṇi sarvāṇyāyatanāni ca
— तथा पुराणों के धर्म, अनेक प्रकार के व्रत, नाना रूपों वाले तीर्थ, और समस्त पवित्र स्थान मैंने सुने हैं।
श्लोक 120 (skanda.3.53.120)
इदानीं श्रोतुमिच्छामि धर्मारण्यकथां शुभाम् । श्रुत्वा यां हि विनश्येत पापं ब्रह्मवधादिकम्
idānīṁ śrotumicchāmi dharmāraṇyakathāṁ śubhām śrutvā yāṁ hi vinaśyeta pāpaṁ brahmavadhādikam
अब मैं वह शुभ धर्मारण्य-कथा सुनना चाहता हूँ, जिसे सुनकर ब्रह्महत्या आदि पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 121 (skanda.3.53.121)
धर्म्मारण्यस्थतीर्थानां श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । कस्येदं स्थापितं स्थानं कस्मादेतद्विनिर्मितम्
dharmmāraṇyasthatīrthānāṁ śrotumicchāmi tattvataḥ kasyedaṁ sthāpitaṁ sthānaṁ kasmādetadvinirmitam
मैं धर्मारण्य में स्थित तीर्थों को यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ — यह स्थान किसके द्वारा स्थापित किया गया, तथा किससे यह निर्मित हुआ?
श्लोक 122 (skanda.3.53.122)
रक्षितं पालितं केन कस्मिन्कालेऽथ निर्मितम् । किंकिं त्वत्राभवत्पूर्वं शंशैतत्पृच्छतो मम
rakṣitaṁ pālitaṁ kena kasminkāle'tha nirmitam kiṁkiṁ tvatrābhavatpūrvaṁ śaṁśaitatpṛcchato mama
यह किसके द्वारा रक्षित और पालित हुआ, तथा किस काल में इसका निर्माण हुआ? यहाँ पूर्वकाल में क्या-क्या हुआ था? मेरे इस संशय को दूर कीजिये।
श्लोक 123 (skanda.3.53.123)
भूतं भव्यं भविष्यञ्च तस्मिन्स्थाने च यद्भवेत् । तत्सर्वं कथयस्वाद्य तीर्थानां च यथा स्थितिः
bhūtaṁ bhavyaṁ bhaviṣyañca tasminsthāne ca yadbhavet tatsarvaṁ kathayasvādya tīrthānāṁ ca yathā sthitiḥ
उस स्थान में जो कुछ भूत, वर्तमान और भविष्य में हुआ, हो रहा है अथवा होगा — वह सब आज मुझे बताइये, तथा तीर्थों की स्थिति भी बताइये।