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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 54

धर्मारण्य की महिमा

अध्याय 53अध्याय-सूचीअध्याय 55

श्लोक 1 (skanda.3.54.1)

व्यास उवाच । पृथ्वीपुरंध्यास्तिलकं ललाटे लक्ष्मीलतायाः स्फुटमालवालम् । वाग्देवताया जलकेलिरम्यं नोहेरकं संप्रति वर्णयामि

vyāsa uvāca pṛthvīpuraṁdhyāstilakaṁ lalāṭe lakṣmīlatāyāḥ sphuṭamālavālam vāgdevatāyā jalakeliramyaṁ noherakaṁ saṁprati varṇayāmi

व्यासजी ने कहा — मैं अब उस नोहेरक (धर्मारण्य) का वर्णन करता हूँ, जो पृथ्वीरूपी नारी के मस्तक का तिलक है, लक्ष्मीरूपी लता की प्रकट क्यारी है, तथा वाग्देवी (सरस्वती) की जलक्रीड़ा के समान रमणीय है।

श्लोक 2 (skanda.3.54.2)

साधु पृष्टं त्वया राजन्वाराणस्यधिकाधिकम् । धर्मारण्यं नृपश्रेष्ठ श्रृणुष्वावहितो भृशम्

sādhu pṛṣṭaṁ tvayā rājanvārāṇasyadhikādhikam dharmāraṇyaṁ nṛpaśreṣṭha śrṛṇuṣvāvahito bhṛśam

हे राजन्! तुमने अच्छा प्रश्न पूछा है — वाराणसी से भी अधिक महत्त्व वाले स्थान के विषय में। हे नृपश्रेष्ठ! अत्यंत सावधान होकर धर्मारण्य का वर्णन सुनो।

श्लोक 3 (skanda.3.54.3)

सर्वतीर्थानि तत्रैव ऊषरं तेन कथ्यते । ब्रह्मविष्णुमहेशाद्यैरिंद्राद्यैः परिसेवितम्

sarvatīrthāni tatraiva ūṣaraṁ tena kathyate brahmaviṣṇumaheśādyairiṁdrādyaiḥ parisevitam

समस्त तीर्थ वहीं विद्यमान हैं, इसीलिए उसे 'ऊषर' कहा जाता है; वह ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि तथा इन्द्र आदि देवताओं द्वारा सेवित है।

श्लोक 4 (skanda.3.54.4)

लोकपालैश्च दिक्पालैर्मातृभिः शिवशक्तिभिः । गंधर्वैश्वाप्सरोभिश्च सेवितं यज्ञकर्मभिः

lokapālaiśca dikpālairmātṛbhiḥ śivaśaktibhiḥ gaṁdharvaiśvāpsarobhiśca sevitaṁ yajñakarmabhiḥ

वह लोकपालों, दिक्पालों, मातृकाओं, शिव-शक्तियों, गन्धर्वों, अप्सराओं तथा यज्ञ-कर्मों द्वारा सेवित है।

श्लोक 5 (skanda.3.54.5)

भूतवेतालशाकिनीग्रहदेवाधिदेवतैः । ऋतुभिर्मासपक्षैश्च सेव्यमानं सुरासुरेः

bhūtavetālaśākinīgrahadevādhidevataiḥ ṛtubhirmāsapakṣaiśca sevyamānaṁ surāsureḥ

वह भूत, बेताल, शाकिनी, ग्रहों के अधिष्ठाता देवता, ऋतुओं, मासों, पक्षों तथा देव-दानवों द्वारा सेवित है।

श्लोक 6 (skanda.3.54.6)

तदाद्यं च नृपस्थानं सर्वसौख्यप्रदुं तथा । यज्ञैश्च बहुभिश्चैव सेवितं मुनिसत्तमैः

tadādyaṁ ca nṛpasthānaṁ sarvasaukhyapraduṁ tathā yajñaiśca bahubhiścaiva sevitaṁ munisattamaiḥ

वह सर्वप्रथम राजस्थान है, समस्त सुखों का दाता है; अनेक यज्ञों तथा श्रेष्ठ मुनियों द्वारा वह सेवित है।

श्लोक 7 (skanda.3.54.7)

सिंहव्याघ्रैर्द्विपैश्चैव पक्षिभिर्विविधैस्तथा । गोमहिष्यादिभिश्चैव सारसैर्मृगशूकरैः

siṁhavyāghrairdvipaiścaiva pakṣibhirvividhaistathā gomahiṣyādibhiścaiva sārasairmṛgaśūkaraiḥ

सिंह, व्याघ्र, हाथी तथा नाना प्रकार के पक्षी; गाय, भैंस आदि, सारस, मृग तथा शूकर —

श्लोक 8 (skanda.3.54.8)

सेवितं नृपशार्दूल श्वापदैवैर्विविधैरपि । तत्र ये निधनं प्राप्ताः पक्षिणः कीटकादयः

sevitaṁ nṛpaśārdūla śvāpadaivairvividhairapi tatra ye nidhanaṁ prāptāḥ pakṣiṇaḥ kīṭakādayaḥ

हे नृपशार्दूल! वह नाना प्रकार के हिंसक पशुओं द्वारा भी सेवित है; वहाँ जो पक्षी, कीट आदि मृत्यु को प्राप्त होते हैं —

श्लोक 9 (skanda.3.54.9)

पशवः श्वापदाश्चैव जलस्थलचराश्च ये । खेचरा भूचराश्चैव डाकिन्यो राक्षसास्तथा

paśavaḥ śvāpadāścaiva jalasthalacarāśca ye khecarā bhūcarāścaiva ḍākinyo rākṣasāstathā

पशु और हिंसक जन्तु, जल तथा स्थल में विचरण करनेवाले, आकाशचारी और भूचारी, तथा डाकिनी और राक्षस भी —

श्लोक 10 (skanda.3.54.10)

एकोत्तरशतैः सार्द्धं मुक्तिस्तेषां हि शाश्वती । ते सर्वे विष्णुलोकांश्च प्रयांत्येव न संशयः

ekottaraśataiḥ sārddhaṁ muktisteṣāṁ hi śāśvatī te sarve viṣṇulokāṁśca prayāṁtyeva na saṁśayaḥ

उन सबको एक सौ एक पीढ़ियों सहित शाश्वत मुक्ति प्राप्त होती है; वे सभी निश्चय ही विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 11 (skanda.3.54.11)

संतारयति पूर्वज्ञान्दश पूर्वान्दशापरान् । यवव्रीहितिलैः सर्पिर्बिल्वपत्रैश्च दूर्वया

saṁtārayati pūrvajñāndaśa pūrvāndaśāparān yavavrīhitilaiḥ sarpirbilvapatraiśca dūrvayā

जो जौ, चावल, तिल, घी, बिल्वपत्र तथा दूर्वा से श्राद्धादि करता है, वह अपने से पूर्व की दस तथा पश्चात् की दस पीढ़ियों को तार देता है —

श्लोक 12 (skanda.3.54.12)

गुडैश्चैवोदकैर्नाथ तत्र पिंडं करोति यः । उद्धरेत्सप्त गोत्राणि कुलमेकोत्तरं शतम्

guḍaiścaivodakairnātha tatra piṁḍaṁ karoti yaḥ uddharetsapta gotrāṇi kulamekottaraṁ śatam

हे नाथ! जो वहाँ गुड़ और जल से पिण्डदान करता है, वह सात गोत्रों को, अर्थात् एक सौ एक कुलों को उद्धार देता है।

श्लोक 13 (skanda.3.54.13)

वृक्षैरनेकधा युंक्ते लतागुल्मैः सुशोभितम् । सदा पुण्यप्रदं तच्च सदा फलसमन्वितम्

vṛkṣairanekadhā yuṁkte latāgulmaiḥ suśobhitam sadā puṇyapradaṁ tacca sadā phalasamanvitam

वह नाना प्रकार के वृक्षों से युक्त, लता-गुल्मों से सुशोभित है; वह सदा पुण्यप्रद तथा सदा फल से सम्पन्न रहता है।

श्लोक 14 (skanda.3.54.14)

निर्वैरं निर्भयं चैव धर्मारण्यं च भूपते । गोव्याघ्रैः क्रीड्यते तत्र तथा मार्जारमूषकैः

nirvairaṁ nirbhayaṁ caiva dharmāraṇyaṁ ca bhūpate govyāghraiḥ krīḍyate tatra tathā mārjāramūṣakaiḥ

हे भूपते! धर्मारण्य वैररहित और भयरहित है; वहाँ गाय और व्याघ्र साथ खेलते हैं, तथा बिल्ली और चूहा भी —

श्लोक 15 (skanda.3.54.15)

भेकोऽहिना क्रीडते च मानुषा राक्षसैः सह । निर्भयं वसते तत्र धर्म्मारण्यं च भूतले

bheko'hinā krīḍate ca mānuṣā rākṣasaiḥ saha nirbhayaṁ vasate tatra dharmmāraṇyaṁ ca bhūtale

मेंढक सर्प के साथ खेलता है, तथा मनुष्य राक्षसों के साथ रहते हैं; इस धरातल पर धर्मारण्य में मनुष्य निर्भय होकर वास करता है।

श्लोक 16 (skanda.3.54.16)

महानंदमयं दिव्यं पावनात्पावनं परम् । कलकंठः कलोत्कंठमनुगुंजति कुंजगः

mahānaṁdamayaṁ divyaṁ pāvanātpāvanaṁ param kalakaṁṭhaḥ kalotkaṁṭhamanuguṁjati kuṁjagaḥ

वह महान् आनन्दमय, दिव्य तथा पावनों में भी परम पावन है; वहाँ कुंजों में रहनेवाला मधुरकण्ठ कोकिल मधुर स्वर में गुंजार करता है —

श्लोक 17 (skanda.3.54.17)

ध्यानस्थः श्रोष्यति तदा पारावत्येति वार्य्यते । केकः कोकीं परित्यज्य मौनं तिष्ठति तद्भयात्

dhyānasthaḥ śroṣyati tadā pārāvatyeti vāryyate kekaḥ kokīṁ parityajya maunaṁ tiṣṭhati tadbhayāt

ध्यानस्थ मनुष्य वहाँ उसका स्वर सुनता है; पारावत (कबूतर) को भी रोका जाता है; मयूर अपनी मादा को छोड़कर उसी भय से मौन रहता है।

श्लोक 18 (skanda.3.54.18)

चकोरश्चंद्रिकाभोक्ता नक्तव्रतमिवास्थितः । पठंति सारिकाः सारं शुकं संबोधयत्यहो

cakoraścaṁdrikābhoktā naktavratamivāsthitaḥ paṭhaṁti sārikāḥ sāraṁ śukaṁ saṁbodhayatyaho

चन्द्रिका का पान करनेवाला चकोर मानो रात्रि-व्रत में स्थित रहता है; मैनाएँ सार-तत्त्व का पाठ करती हैं तथा तोते को पुकारती हैं — कैसा आश्चर्य है!

श्लोक 19 (skanda.3.54.19)

अपारवारसंसारसिंधुपारप्रदः शिवः । आलस्येनापि यो यायाद्गृहाद्धर्मवनं प्रति

apāravārasaṁsārasiṁdhupārapradaḥ śivaḥ ālasyenāpi yo yāyādgṛhāddharmavanaṁ prati

शिव अपार संसार-सागर से पार उतारने वाले हैं; जो व्यक्ति अपने घर से आलस्यवश भी धर्मवन की ओर जाता है —

श्लोक 20 (skanda.3.54.20)

अश्वमेधाधिको धर्मस्तस्य स्याच्च पदेपदे । शापानुग्रहसंयुक्ता ब्राह्मणास्तत्र संति वै

aśvamedhādhiko dharmastasya syācca padepade śāpānugrahasaṁyuktā brāhmaṇāstatra saṁti vai

— उसे प्रत्येक पग पर अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक धर्म प्राप्त होता है। वहाँ शाप और अनुग्रह दोनों की शक्ति से युक्त ब्राह्मण निवास करते हैं।

श्लोक 21 (skanda.3.54.21)

अष्टादशसहस्राणि पुण्यकार्येषु निर्मिताः । षट्त्रिंशत्तु सहस्राणि भृत्यास्ते वणिजो भुवि

aṣṭādaśasahasrāṇi puṇyakāryeṣu nirmitāḥ ṣaṭtriṁśattu sahasrāṇi bhṛtyāste vaṇijo bhuvi

अठारह सहस्र ब्राह्मण वहाँ पुण्य-कार्यों के लिए स्थापित किये गये; तथा छत्तीस सहस्र भूतल पर उनके सेवक और वणिक् थे।

श्लोक 22 (skanda.3.54.22)

द्विजभक्तिसमायुक्ता ब्रह्मण्यास्ते त्वयोनिजाः । पुराणज्ञाः सदाचारा धार्मिकाः शुद्धबुद्धयः । स्वर्गे देवाः प्रशंसंति धर्म्मारण्यनिवासिनः

dvijabhaktisamāyuktā brahmaṇyāste tvayonijāḥ purāṇajñāḥ sadācārā dhārmikāḥ śuddhabuddhayaḥ svarge devāḥ praśaṁsaṁti dharmmāraṇyanivāsinaḥ

वे द्विज-भक्ति से युक्त, ब्राह्मण-प्रेमी, कुछ अयोनिज, पुराणों के ज्ञाता, सदाचारी, धार्मिक तथा शुद्धबुद्धि थे — स्वर्ग में देवता भी धर्मारण्य-निवासियों की प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 23 (skanda.3.54.23)

युधिष्ठिर उवाच । धर्मारण्येति त्रिदशैः कदा नाम प्रतिष्ठितम् । पावनं भूतले जातं कस्मात्तेन विनिर्मितम्

yudhiṣṭhira uvāca dharmāraṇyeti tridaśaiḥ kadā nāma pratiṣṭhitam pāvanaṁ bhūtale jātaṁ kasmāttena vinirmitam

युधिष्ठिरजी ने कहा — देवताओं द्वारा 'धर्मारण्य' नाम कब स्थापित किया गया? भूतल पर उत्पन्न यह पावन स्थान किससे तथा किसके द्वारा निर्मित हुआ?

श्लोक 24 (skanda.3.54.24)

तीर्थभूतं हि कस्माच्च कारणात्तद्वदस्व मे । ब्राह्मणाः कतिसं ख्याकाः केन वै स्थापिताः पुरा

tīrthabhūtaṁ hi kasmācca kāraṇāttadvadasva me brāhmaṇāḥ katisaṁ khyākāḥ kena vai sthāpitāḥ purā

वह तीर्थ किस कारण से बना, यह मुझे बताइये। वहाँ कितनी संख्या में ब्राह्मण थे, तथा उन्हें पूर्वकाल में किसने स्थापित किया?

श्लोक 25 (skanda.3.54.25)

अष्टादशसहस्राणि किमर्थं स्थापितानि वै । कस्मिन्नंशे समुत्पन्ना ब्राह्मणा ब्रह्म सत्तमाः

aṣṭādaśasahasrāṇi kimarthaṁ sthāpitāni vai kasminnaṁśe samutpannā brāhmaṇā brahma sattamāḥ

अठारह सहस्र ब्राह्मण किसलिए स्थापित किये गये? वे ब्रह्मसत्तम ब्राह्मण किस अंश से उत्पन्न हुए?

श्लोक 26 (skanda.3.54.26)

सर्वविद्यासु निष्णाता वेदवेदांगपारगाः । ऋग्वेदेषु च निष्णाता यजुर्वेदकृतश्रमाः

sarvavidyāsu niṣṇātā vedavedāṁgapāragāḥ ṛgvedeṣu ca niṣṇātā yajurvedakṛtaśramāḥ

सर्वविद्याओं में निष्णात, वेद-वेदांगों के पारंगत; ऋग्वेद में निष्णात तथा यजुर्वेद में परिश्रम किये हुए —

श्लोक 27 (skanda.3.54.27)

सामवेदांगपारज्ञास्त्रैविद्या धर्म वित्तमाः । तपोनिष्ठा शुभाचाराः सत्यव्रतपरायणाः

sāmavedāṁgapārajñāstraividyā dharma vittamāḥ taponiṣṭhā śubhācārāḥ satyavrataparāyaṇāḥ

सामवेद तथा उसके अंगों के पारज्ञ, त्रैविद्य, धर्म के सर्वोत्तम ज्ञाता; तपोनिष्ठ, शुभाचारी तथा सत्यव्रत में परायण —

श्लोक 28 (skanda.3.54.28)

मासोपवासैः कृशितास्तथा चांद्रायणादिभिः । सदाचाराश्च ब्रह्मण्याः केन नित्यो पजीविनः । तत्सर्वमादितः कृत्स्नं ब्रूहि मे वदतां वर

māsopavāsaiḥ kṛśitāstathā cāṁdrāyaṇādibhiḥ sadācārāśca brahmaṇyāḥ kena nityo pajīvinaḥ tatsarvamāditaḥ kṛtsnaṁ brūhi me vadatāṁ vara

मासोपवास तथा चान्द्रायण आदि व्रतों से कृश, सदाचारी तथा ब्राह्मण-प्रेमी — वे सदा किस साधन से जीविका चलाते थे? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! यह सब आदि से सम्पूर्ण रूप से मुझे बताइये।

श्लोक 29 (skanda.3.54.29)

दानवास्तत्र दैतेया भूतवेतालसंभवाः । राक्षसाश्च पिशाचाश्च उद्वेजंते कथं न तान्

dānavāstatra daiteyā bhūtavetālasaṁbhavāḥ rākṣasāśca piśācāśca udvejaṁte kathaṁ na tān

वहाँ दानव, दैत्य, भूत-बेताल से उत्पन्न प्राणी, राक्षस तथा पिशाच भी रहते हैं — फिर वे लोगों को उद्विग्न क्यों नहीं करते?

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