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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 55

धर्मराज की तपस्या में विघ्न

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56

श्लोक 1 (skanda.3.55.1)

व्यास उवाच । श्रूयतां नृपशार्दूल कथां पौराणिकीं शुभाम् । यां श्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः

vyāsa uvāca śrūyatāṁ nṛpaśārdūla kathāṁ paurāṇikīṁ śubhām yāṁ śrutvā sarvapāpebhyo mucyate nātra saṁśayaḥ

व्यासजी ने कहा — हे नृपशार्दूल! यह शुभ पौराणिक कथा सुनिये, जिसे सुनकर मनुष्य निःसंदेह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.3.55.2)

एकदा धर्मराजो वै तपस्तेपे सुदुष्करम् । ब्रह्मविष्णुमहेशाद्यैर्जलवर्षांतपादिषाट्

ekadā dharmarājo vai tapastepe suduṣkaram brahmaviṣṇumaheśādyairjalavarṣāṁtapādiṣāṭ

एक बार धर्मराज ने अत्यंत दुष्कर तपस्या की, वर्षा, धूप, ताप आदि सहन करते हुए, मानो ब्रह्मा-विष्णु-महेश आदि के समान।

श्लोक 3 (skanda.3.55.3)

आदौ त्रेतायुगे राजन्वर्षाणामयुतत्रयम् । मध्येवनं तपस्यंतमशोकतरुमूलगम्

ādau tretāyuge rājanvarṣāṇāmayutatrayam madhyevanaṁ tapasyaṁtamaśokatarumūlagam

हे राजन्! त्रेतायुग के आरम्भ में तीस हजार वर्षों तक, वन के मध्य अशोक वृक्ष के मूल में बैठकर वे तपस्या करते रहे —

श्लोक 4 (skanda.3.55.4)

शुष्कस्नायुपिनद्धास्थिसंचयं निश्चलाकृतिम् । वल्मीककीटिकाकोटिशोषिताशेषशोणितम्

śuṣkasnāyupinaddhāsthisaṁcayaṁ niścalākṛtim valmīkakīṭikākoṭiśoṣitāśeṣaśoṇitam

— सूखी नसों से बँधी हड्डियों का समूह-सा उनका निश्चल शरीर हो गया, दीमकों और चींटियों के करोड़ों समूहों ने उनका समस्त रक्त सुखा दिया था —

श्लोक 5 (skanda.3.55.5)

निर्मांसकीकसचयं स्फटिकोपलनिश्चलम् । शंखकुदेंदुतहिनमहाशंखलसच्छ्रियम्

nirmāṁsakīkasacayaṁ sphaṭikopalaniścalam śaṁkhakudeṁdutahinamahāśaṁkhalasacchriyam

— मांसरहित, हड्डियों का ढेर, स्फटिक-शिला के समान निश्चल; शंख, कुन्द-पुष्प, चन्द्रमा तथा हिम के समान उज्ज्वल कान्तिवाला।

श्लोक 6 (skanda.3.55.6)

सत्त्वावलंबितप्राणमायुःशेषेण रक्षितम् । निश्वासोच्छ्वास पवनवृत्तिसूचितजीवितम्

sattvāvalaṁbitaprāṇamāyuḥśeṣeṇa rakṣitam niśvāsocchvāsa pavanavṛttisūcitajīvitam

उनके प्राण केवल सत्त्व के सहारे टिके थे, शेष आयु से ही रक्षित थे; उनका जीवित होना केवल श्वास-प्रश्वास की गति से ही सूचित होता था।

श्लोक 7 (skanda.3.55.7)

निमेषोन्मेषसंचारपशुनीकृतजन्तुकम् । पिशंगितस्फुरद्रश्मिनेत्रदीपितदिङ्मुखम्

nimeṣonmeṣasaṁcārapaśunīkṛtajantukam piśaṁgitasphuradraśminetradīpitadiṅmukham

उनकी पलकों के खुलने-मुँदने मात्र से हिंसक प्राणी भी पशुवत् वश में हो जाते थे; उनके पिंगल, चमकती किरणोंवाले नेत्र दिशाओं को भी प्रकाशित करते थे।

श्लोक 8 (skanda.3.55.8)

तत्तपोग्निशिखादाव चुंबितम्लानकाननम् । तच्छांत्युदसुधावर्षसंसिक्ताखिलभूरुहम

tattapogniśikhādāva cuṁbitamlānakānanam tacchāṁtyudasudhāvarṣasaṁsiktākhilabhūruhama

उनके तपरूपी अग्नि की ज्वालाओं ने चारों ओर के वन को मुरझा दिया; किन्तु उनकी शान्ति के अमृत-वर्षा ने समस्त वृक्षों को पुनः सींच दिया।

श्लोक 9 (skanda.3.55.9)

साक्षात्तपस्यंतमिव तपो धृत्वा नराकृतिम् । निराकृतिं निराकाशं कृत्वा भक्तिं च कांचनम्

sākṣāttapasyaṁtamiva tapo dhṛtvā narākṛtim nirākṛtiṁ nirākāśaṁ kṛtvā bhaktiṁ ca kāṁcanam

वे मानो साक्षात् तपस्या ही मनुष्य-रूप धारण कर तपस्या कर रहे हों; अपने मन को निराकार, निराकाश तथा स्वर्णिम भक्ति से युक्त करके —

श्लोक 10 (skanda.3.55.10)

कुरंगशावैर्गणशो भ्रमद्भिः परिवारितम् । निनादभीषणास्यैश्च वनजैः परिरक्षितम्

kuraṁgaśāvairgaṇaśo bhramadbhiḥ parivāritam ninādabhīṣaṇāsyaiśca vanajaiḥ parirakṣitam

— मृगशावकों के झुंडों से घिरे हुए, तथा भयंकर गर्जनवाले वन्य-प्राणियों द्वारा सुरक्षित।

श्लोक 11 (skanda.3.55.11)

एतादृशं महाभीमं दृष्ट्वा देवाः सवासवाः । ध्यायंतं च महादेवं सर्वेषां चाभयप्रदम्

etādṛśaṁ mahābhīmaṁ dṛṣṭvā devāḥ savāsavāḥ dhyāyaṁtaṁ ca mahādevaṁ sarveṣāṁ cābhayapradam

उन्हें इस प्रकार अत्यंत भयंकर देखकर देवगण इन्द्र सहित, सबको अभय देनेवाले महादेव का ध्यान करते हुए —

श्लोक 12 (skanda.3.55.12)

ब्रह्माद्या दैवता सर्वे कैलासं प्रति जग्मिरे । पारिजाततरुच्छायामासीनं च सहोमया

brahmādyā daivatā sarve kailāsaṁ prati jagmire pārijātatarucchāyāmāsīnaṁ ca sahomayā

— ब्रह्मा आदि सभी देवता कैलास की ओर गये, जहाँ उमा सहित शिव पारिजात वृक्ष की छाया में विराजमान थे।

श्लोक 13 (skanda.3.55.13)

नदिर्भृंगिर्महाकालस्तथान्ये च महागणाः । स्कन्दस्वामी च भगवान्गणपश्च तथैव च । तत्र देवाः सब्रह्माद्याः स्वस्वस्थानेषु तस्थिरे

nadirbhṛṁgirmahākālastathānye ca mahāgaṇāḥ skandasvāmī ca bhagavāngaṇapaśca tathaiva ca tatra devāḥ sabrahmādyāḥ svasvasthāneṣu tasthire

नन्दी, भृंगी, महाकाल तथा अन्य महान् गण, भगवान् स्कन्द-स्वामी तथा गणपति भी वहाँ थे — वहाँ ब्रह्मा आदि सभी देवता अपने-अपने स्थान पर स्थित हुए।

श्लोक 14 (skanda.3.55.14)

ब्रह्मोवाच ।। । नमोस्त्वनंतरूपाय नीलश्च नमोऽस्तु ते । अविज्ञातस्वरूपाय कैवल्यायामृताय च

brahmovāca namostvanaṁtarūpāya nīlaśca namo'stu te avijñātasvarūpāya kaivalyāyāmṛtāya ca

ब्रह्माजी ने कहा — हे अनन्तरूप! आपको नमस्कार हो, हे नीलकण्ठ! आपको नमस्कार हो; अज्ञातस्वरूप, कैवल्यस्वरूप तथा अमृतस्वरूप आपको नमस्कार —

श्लोक 15 (skanda.3.55.15)

नांतं देवा विजानंति यस्य तस्मै नमोनमः । यं न वाचः प्रशंसंति नमस्तस्मै चिदात्मने

nāṁtaṁ devā vijānaṁti yasya tasmai namonamaḥ yaṁ na vācaḥ praśaṁsaṁti namastasmai cidātmane

— जिनका अंत देवता भी नहीं जानते, उन्हें बारम्बार नमस्कार; जिनकी वाणी भी प्रशंसा नहीं कर सकती, उन चिदात्मस्वरूप को नमस्कार —

श्लोक 16 (skanda.3.55.16)

योगिनो यं हृदः कोशे प्रणिधानेन निश्चलाः । ज्योतीरूपं प्रपश्यति तस्मै श्रीब्रह्मणे नमः

yogino yaṁ hṛdaḥ kośe praṇidhānena niścalāḥ jyotīrūpaṁ prapaśyati tasmai śrībrahmaṇe namaḥ

— हृदय की कोश में स्थिर योगीजन ध्यान द्वारा जिन्हें ज्योतिस्वरूप में देखते हैं, उन श्रीब्रह्म को नमस्कार।

श्लोक 17 (skanda.3.55.17)

कालात्पराय कालाय स्वेच्छया पुरुषाय च । गुणत्रयस्वरूपाय नमः प्रकृतिरूपिणे

kālātparāya kālāya svecchayā puruṣāya ca guṇatrayasvarūpāya namaḥ prakṛtirūpiṇe

काल से परे तथा काल-स्वरूप, स्वेच्छा से पुरुष-रूप धारण करनेवाले, त्रिगुणस्वरूप तथा प्रकृतिस्वरूप आपको नमस्कार।

श्लोक 18 (skanda.3.55.18)

विष्णवे सत्त्वरूपाय रजोरूपाय वेधसे । तमोरूपाय रुद्राय स्थितिसर्गांतकारिणे

viṣṇave sattvarūpāya rajorūpāya vedhase tamorūpāya rudrāya sthitisargāṁtakāriṇe

सत्त्वस्वरूप विष्णु, रजःस्वरूप ब्रह्मा, तथा स्थिति-सृष्टि-संहार के कर्ता तमःस्वरूप रुद्र — इन तीनों रूपों में आपको नमस्कार।

श्लोक 19 (skanda.3.55.19)

नमो बुद्धिस्वरूपाय त्रिधाहंकाररूपिणे । पंचतन्मात्ररूपाय नमः प्रकृतिरूपिणे

namo buddhisvarūpāya tridhāhaṁkārarūpiṇe paṁcatanmātrarūpāya namaḥ prakṛtirūpiṇe

बुद्धिस्वरूप, त्रिविध अहंकाररूप, पंचतन्मात्रारूप तथा प्रकृतिस्वरूप आपको नमस्कार।

श्लोक 20 (skanda.3.55.20)

नमो नमः स्वरूपाय पंचबुद्धींद्रियात्मने । क्षित्यादिपंचरूपाय नमस्ते विषयात्मने

namo namaḥ svarūpāya paṁcabuddhīṁdriyātmane kṣityādipaṁcarūpāya namaste viṣayātmane

पंच ज्ञानेन्द्रियस्वरूप, पृथ्वी आदि पंचमहाभूतरूप तथा विषयस्वरूप आपको बारम्बार नमस्कार।

श्लोक 21 (skanda.3.55.21)

नमो ब्रह्मांडरूपाय तदंतर्वर्तिने नमः । अर्वाचीनपराचीनविश्वरूपाय ते नमः

namo brahmāṁḍarūpāya tadaṁtarvartine namaḥ arvācīnaparācīnaviśvarūpāya te namaḥ

ब्रह्माण्डरूप तथा उसके अन्तर्वर्ती आपको नमस्कार; भूत और भविष्य के विश्वरूप आपको नमस्कार।

श्लोक 22 (skanda.3.55.22)

अनित्यनित्यरूपाय सदसत्पतये नमः । नमस्ते भक्तकृपया स्वेच्छावि ष्कृतविग्रह

anityanityarūpāya sadasatpataye namaḥ namaste bhaktakṛpayā svecchāvi ṣkṛtavigraha

अनित्य-नित्य दोनों रूपों वाले, सत्-असत् के स्वामी आपको नमस्कार; हे भक्तों पर कृपा करके अपनी इच्छा से विग्रह प्रकट करनेवाले! आपको नमस्कार।

श्लोक 23 (skanda.3.55.23)

तव निश्वसितं वेदास्तव वेदोऽखिलं जगत् । विश्वाभूतानि ते पादः शिरो द्यौः समवर्तत

tava niśvasitaṁ vedāstava vedo'khilaṁ jagat viśvābhūtāni te pādaḥ śiro dyauḥ samavartata

वेद आपका ही निःश्वास हैं, सम्पूर्ण जगत् आपका ही प्रकट वेद है; समस्त प्राणी आपके चरण हैं, द्युलोक आपका मस्तक बना —

श्लोक 24 (skanda.3.55.24)

नाभ्या आसीदंतरिक्षं लोमानि च वनस्पतिः । चंद्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यस्तव प्रभो

nābhyā āsīdaṁtarikṣaṁ lomāni ca vanaspatiḥ caṁdramā manaso jātaścakṣoḥ sūryastava prabho

आपकी नाभि से अंतरिक्ष उत्पन्न हुआ, रोमों से वनस्पति; हे प्रभो! आपके मन से चन्द्रमा तथा नेत्र से सूर्य उत्पन्न हुआ।

श्लोक 25 (skanda.3.55.25)

त्वमेव सर्वं त्वयि देव सर्वं सर्वस्तुति स्तव्य इह त्वमेव । ईश त्वया वास्यमिदं हि सर्वं नमोऽस्तु भूयोऽपि नमो नमस्ते

tvameva sarvaṁ tvayi deva sarvaṁ sarvastuti stavya iha tvameva īśa tvayā vāsyamidaṁ hi sarvaṁ namo'stu bhūyo'pi namo namaste

हे देव! आप ही सब कुछ हैं, आप में ही सब कुछ है, यहाँ सभी स्तुतियों के योग्य आप ही हैं। हे ईश! यह सब कुछ आपसे ही व्याप्त है; आपको नमस्कार, बारम्बार नमस्कार, नमस्कार।

श्लोक 26 (skanda.3.55.26)

इति स्तुत्वा महादेवं निपेतुर्दंडवत्क्षितौ । प्रत्युवाच तदा शंभुर्वरदोऽस्मि किमिच्छति

iti stutvā mahādevaṁ nipeturdaṁḍavatkṣitau pratyuvāca tadā śaṁbhurvarado'smi kimicchati

इस प्रकार महादेव की स्तुति करके वे भूमि पर दण्डवत् गिर पड़े; तब शम्भु ने उत्तर दिया — 'मैं वरदाता हूँ, वह क्या चाहता है?'

श्लोक 27 (skanda.3.55.27)

महादेव उवाच । कथं व्यग्राः सुराः सर्वे बृहस्पतिपुरोगमाः । तत्समाचक्ष्व मां ब्रह्मन्भवतां दुःखकारणम्

mahādeva uvāca kathaṁ vyagrāḥ surāḥ sarve bṛhaspatipurogamāḥ tatsamācakṣva māṁ brahmanbhavatāṁ duḥkhakāraṇam

महादेव ने कहा — बृहस्पति सहित समस्त देवगण इतने व्याकुल क्यों हैं? हे ब्रह्मन्! मुझे अपने दुःख का कारण बताइये।

श्लोक 28 (skanda.3.55.28)

ब्रह्मोवाच ।। । नीलकंठ महादेव दुःखनाशाभयप्रद । शृणु त्वं दुःखमस्माकं भवतो यद्वदाम्यहम्

brahmovāca nīlakaṁṭha mahādeva duḥkhanāśābhayaprada śṛṇu tvaṁ duḥkhamasmākaṁ bhavato yadvadāmyaham

ब्रह्माजी ने कहा — हे नीलकण्ठ महादेव! हे दुःखनाशक, अभयदाता! आप सुनिये, हमारा जो दुःख है, वह मैं आपसे कहता हूँ।

श्लोक 29 (skanda.3.55.29)

धर्मराजोऽपि धर्मात्मा तपस्तेपे सुदुःसहम् । न जानेऽसौ किमिच्छति देवानां पदमुत्तमम्

dharmarājo'pi dharmātmā tapastepe suduḥsaham na jāne'sau kimicchati devānāṁ padamuttamam

धर्मात्मा धर्मराज ने अत्यंत दुःसह तपस्या की है; हम नहीं जानते, वह देवताओं का उत्तम पद तो नहीं चाहता।

श्लोक 30 (skanda.3.55.30)

तेन त्रस्तास्तत्तपसा सर्व इंद्रपुरोगमाः । भवतोंघ्रौ चिरेणैव मनस्तेन समर्पितम् । तमुत्थापय देवेश किमिच्छति स धर्मराट्

tena trastāstattapasā sarva iṁdrapurogamāḥ bhavatoṁghrau cireṇaiva manastena samarpitam tamutthāpaya deveśa kimicchati sa dharmarāṭ

उस तपस्या से इन्द्र सहित समस्त देवता भयभीत हैं; उसका मन बहुत समय से आपके ही चरणों में समर्पित है। हे देवेश! उसे उठाइये — जानिये कि वह धर्मराज क्या चाहता है।

श्लोक 31 (skanda.3.55.31)

ईश्वर उवाच । भवतां नास्ति नु भयं धर्मात्सत्यं ब्रवीम्यहम्

īśvara uvāca bhavatāṁ nāsti nu bhayaṁ dharmātsatyaṁ bravīmyaham

ईश्वर ने कहा — निश्चय ही धर्म से तुम्हें कोई भय नहीं है, मैं सत्य कहता हूँ।

श्लोक 32 (skanda.3.55.32)

तत उत्थाय ते सर्वे देवाः सह दिवौकसः । रुद्रं प्रदक्षिणीकृत्य नमस्कृत्वा पुनःपुनः

tata utthāya te sarve devāḥ saha divaukasaḥ rudraṁ pradakṣiṇīkṛtya namaskṛtvā punaḥpunaḥ

तब वे सभी देवगण, स्वर्गवासियों सहित उठकर, रुद्र की प्रदक्षिणा करके बारम्बार नमस्कार करके —

श्लोक 33 (skanda.3.55.33)

इन्द्रेण सहिताः सर्वे कैलात्पुनरागताः । स्वस्वस्थाने तदा शीघ्रं गताः सर्वे दिवौकसः

indreṇa sahitāḥ sarve kailātpunarāgatāḥ svasvasthāne tadā śīghraṁ gatāḥ sarve divaukasaḥ

— इन्द्र सहित सभी कैलास से पुनः लौट आये; तब सभी स्वर्गवासी शीघ्र ही अपने-अपने स्थान को गये।

श्लोक 34 (skanda.3.55.34)

इन्द्रोऽपि वै सुधर्मायां गतवान्प्रभुरीश्वरः । न निद्रां लब्धवांस्तत्र न सुखं न च निर्वृतिम्

indro'pi vai sudharmāyāṁ gatavānprabhurīśvaraḥ na nidrāṁ labdhavāṁstatra na sukhaṁ na ca nirvṛtim

इन्द्र भी अपनी सुधर्मा सभा में गये; किन्तु वहाँ उन्हें न निद्रा मिली, न सुख और न शान्ति।

श्लोक 35 (skanda.3.55.35)

मनसा चिंतयामास विघ्नं मे समुपस्थितम् । अवाप महतीं चितां तदा देवः शचीपतिः

manasā ciṁtayāmāsa vighnaṁ me samupasthitam avāpa mahatīṁ citāṁ tadā devaḥ śacīpatiḥ

उन्होंने मन में सोचा — 'मेरे सामने एक विघ्न उपस्थित हो गया है'; तब शचीपति देव महान् चिन्ता में पड़ गये।

श्लोक 36 (skanda.3.55.36)

मम स्थानं पराहर्तुं स्तपस्तेपे सुदुश्चरम् । सर्वान्देवान्समाहूय इदं वचनमब्रवीत्

mama sthānaṁ parāhartuṁ stapastepe suduścaram sarvāndevānsamāhūya idaṁ vacanamabravīt

(उन्होंने सोचा —) 'वह मेरे पद को छीनने के लिए ही यह अत्यंत दुश्चर तप कर रहा है'; तब समस्त देवताओं को बुलाकर उन्होंने यह वचन कहा —

श्लोक 37 (skanda.3.55.37)

इन्द्र उवाच । शृण्वंतु देवताः सर्वा मम दुःखस्य कारणम् । दुःखेन मम यल्लब्धं तत्किं वा प्रार्थयेद्यमः । बृहस्पतिः समालोक्य सर्वान्दे वानथाब्रवीत्

indra uvāca śṛṇvaṁtu devatāḥ sarvā mama duḥkhasya kāraṇam duḥkhena mama yallabdhaṁ tatkiṁ vā prārthayedyamaḥ bṛhaspatiḥ samālokya sarvānde vānathābravīt

इन्द्र ने कहा — समस्त देवगण मेरे दुःख का कारण सुनें। मैंने जो दुःख सहकर प्राप्त किया, क्या धर्मराज उसी की कामना कर रहे हैं? यह देखकर बृहस्पति ने तब सभी देवताओं से कहा —

श्लोक 38 (skanda.3.55.38)

बृहस्पतिरुवाच ।। । तपसे नास्ति सामर्थ्यं विघ्नं कर्तुं दिवौकसः । उर्वश्याद्या समाहूय संप्रेष्यंतां च तत्र वै

bṛhaspatiruvāca tapase nāsti sāmarthyaṁ vighnaṁ kartuṁ divaukasaḥ urvaśyādyā samāhūya saṁpreṣyaṁtāṁ ca tatra vai

बृहस्पति ने कहा — हे स्वर्गवासियो! इस तप में विघ्न डालने की हममें सामर्थ्य नहीं है। उर्वशी आदि को बुलाकर वहाँ भेजा जाये।

श्लोक 39 (skanda.3.55.39)

तासामाकारणार्थाय प्रतिद्वारं प्रतस्थिवान् । स गत्वा ताः समादाय सभायां शीघ्रमाययौ

tāsāmākāraṇārthāya pratidvāraṁ pratasthivān sa gatvā tāḥ samādāya sabhāyāṁ śīghramāyayau

उन्हें बुलाने के लिए वह उनके-उनके द्वार पर गया; उन्हें साथ लेकर वह शीघ्र ही सभा में आ गया।

श्लोक 40 (skanda.3.55.40)

आगतास्ता हरिः प्राह महत्कार्यमुपस्थितम् । गच्छन्तु त्वरिताः सर्वा धर्मारण्यं प्रति द्रुतम्

āgatāstā hariḥ prāha mahatkāryamupasthitam gacchantu tvaritāḥ sarvā dharmāraṇyaṁ prati drutam

उनके आने पर इन्द्र ने कहा — 'एक महान् कार्य उपस्थित हुआ है। तुम सब शीघ्र ही धर्मारण्य की ओर जाओ —'

श्लोक 41 (skanda.3.55.41)

यत्र वै धर्मराजोसौ तपश्चक्रे सुदुष्करम् । हास्यभावकटाक्षैश्च गीतनृत्यादिभिस्तथा

yatra vai dharmarājosau tapaścakre suduṣkaram hāsyabhāvakaṭākṣaiśca gītanṛtyādibhistathā

— 'जहाँ वह धर्मराज अत्यंत दुष्कर तपस्या कर रहा है; हास्य, कटाक्ष, गीत-नृत्य आदि के द्वारा —'

श्लोक 42 (skanda.3.55.42)

तं लोभयध्वं यमिनं तपःस्थानाच्च्युतिर्भवेत् । देवस्य वचनं श्रुत्वा तथा अप्सरसां गणाः

taṁ lobhayadhvaṁ yaminaṁ tapaḥsthānāccyutirbhavet devasya vacanaṁ śrutvā tathā apsarasāṁ gaṇāḥ

— 'उस संयमी को लुभाओ, जिससे वह अपने तपस्या-स्थान से च्युत हो जाये।' देव (इन्द्र) के वचन सुनकर अप्सराओं के समूह —

श्लोक 43 (skanda.3.55.43)

मिथः संरेभिरे कर्तुं विचार्य च परस्परम् । धर्मारण्यं प्रतस्थेसावुर्वशी स्वर्वरांगना

mithaḥ saṁrebhire kartuṁ vicārya ca parasparam dharmāraṇyaṁ pratasthesāvurvaśī svarvarāṁganā

— आपस में परामर्श करके विचार-विमर्श किया; और स्वर्ग की श्रेष्ठ सुन्दरी उर्वशी धर्मारण्य की ओर चल पड़ी।

श्लोक 44 (skanda.3.55.44)

तुष्टुवुः पुष्पवर्षाश्च ससृजुस्तच्छिरस्यमी । ततस्तु देवैर्विप्रैश्च स्तूयमानः समंततः

tuṣṭuvuḥ puṣpavarṣāśca sasṛjustacchirasyamī tatastu devairvipraiśca stūyamānaḥ samaṁtataḥ

उन्होंने उसकी स्तुति की तथा उसके सिर पर पुष्पवर्षा की; तब चारों ओर से देवों और विप्रों द्वारा स्तुत होती हुई —

श्लोक 45 (skanda.3.55.45)

निर्ययौ परमप्रीत्या वनं परमपावनम् । बिल्वार्कखदिराकीर्णं कपित्थधवसंकुलम्

niryayau paramaprītyā vanaṁ paramapāvanam bilvārkakhadirākīrṇaṁ kapitthadhavasaṁkulam

— वह परम प्रसन्नता से उस परम पावन वन की ओर चली, जो बिल्व, आक तथा खदिर के वृक्षों से आच्छादित, तथा कैथा और धव के वृक्षों से भरा था —

श्लोक 46 (skanda.3.55.46)

न सूर्यो भाति तत्रैव महांधकार संयुतम् । निर्जनं निर्मनुष्यं च बहुयोजनमायतम्

na sūryo bhāti tatraiva mahāṁdhakāra saṁyutam nirjanaṁ nirmanuṣyaṁ ca bahuyojanamāyatam

— जहाँ सूर्य भी नहीं चमकता था, जो घोर अंधकार से युक्त था; जनरहित, मनुष्यरहित, अनेक योजन तक विस्तृत था।

श्लोक 47 (skanda.3.55.47)

मृगैः सिंहैर्वृतं घोरेरन्यैश्चापि वनेचरैः । पुष्पितैः पादपैः कीर्णं सुमनोहरशाद्वलम्

mṛgaiḥ siṁhairvṛtaṁ ghoreranyaiścāpi vanecaraiḥ puṣpitaiḥ pādapaiḥ kīrṇaṁ sumanoharaśādvalam

— हिरणों, भयंकर सिंहों तथा अन्य वनचर प्राणियों से घिरा, पुष्पित वृक्षों से भरा, अत्यंत मनोहर घास के मैदानोंवाला।

श्लोक 48 (skanda.3.55.48)

विपुलं मधुरानादैर्नादितं विहगैस्तथा । पुंस्कोकिलनिनादाढ्यं झिल्लीकगणनादितम्

vipulaṁ madhurānādairnāditaṁ vihagaistathā puṁskokilaninādāḍhyaṁ jhillīkagaṇanāditam

विशाल, पक्षियों की मधुर ध्वनियों से गुंजित, नर कोकिल की कूक से समृद्ध, तथा झींगुरों के समूह की ध्वनि से गूँजता हुआ।

श्लोक 49 (skanda.3.55.49)

प्रवृद्धविकटैर्वृक्षैः सुखच्छायैः समावृतम् ।। । वृक्षैराच्छादिततलं लक्ष्म्या परमया युतम्

pravṛddhavikaṭairvṛkṣaiḥ sukhacchāyaiḥ samāvṛtam vṛkṣairācchāditatalaṁ lakṣmyā paramayā yutam

विशाल, विकट वृक्षों से आच्छादित, सुखद छायावाला; वृक्षों से ढकी भूमिवाला, परम शोभा से युक्त।

श्लोक 50 (skanda.3.55.50)

नापुष्पः पादपः कश्चिन्नाफलो नापि कंटकी । षट्पदैरप्यनाकीर्णं नास्मिन्वै काननेभवेत्

nāpuṣpaḥ pādapaḥ kaścinnāphalo nāpi kaṁṭakī ṣaṭpadairapyanākīrṇaṁ nāsminvai kānanebhavet

उस वन में कोई भी वृक्ष पुष्परहित नहीं था, न फलरहित और न केवल काँटेदार; और कोई भी वृक्ष भ्रमरों से रहित नहीं था।

श्लोक 51 (skanda.3.55.51)

विहंगैर्नादितं पुष्पैरलंकृतमतीव हि । सर्वर्तुकुसमैर्वृक्षैः सुखच्छायैः समावृतम्

vihaṁgairnāditaṁ puṣpairalaṁkṛtamatīva hi sarvartukusamairvṛkṣaiḥ sukhacchāyaiḥ samāvṛtam

पक्षियों से गुंजित, अत्यंत पुष्पों से अलंकृत; सभी ऋतुओं के पुष्पोंवाले, सुखद छायावाले वृक्षों से आच्छादित।

श्लोक 52 (skanda.3.55.52)

मारुताकलितास्तत्र द्रुमाः कुसुमशाखिनः । पुष्पवृष्टिं विचित्रां तु विसृजंति च पादपाः

mārutākalitāstatra drumāḥ kusumaśākhinaḥ puṣpavṛṣṭiṁ vicitrāṁ tu visṛjaṁti ca pādapāḥ

वहाँ हवा से हिलते हुए पुष्पित वृक्ष विचित्र पुष्पवर्षा कर रहे थे।

श्लोक 53 (skanda.3.55.53)

दिवस्पृशोऽथ संपुष्टाः पक्षिभिर्मधुरस्वनैः । विरेजुः पादपास्तत्र सुगन्धकुसुमैर्वृताः

divaspṛśo'tha saṁpuṣṭāḥ pakṣibhirmadhurasvanaiḥ virejuḥ pādapāstatra sugandhakusumairvṛtāḥ

आकाश को स्पर्श करते हुए, मधुर-स्वर पक्षियों से समृद्ध, सुगन्धित पुष्पों से आच्छादित वे वृक्ष वहाँ शोभा पा रहे थे।

श्लोक 54 (skanda.3.55.54)

तिष्ठंति च प्रवालेषु पुष्पभारावनादिषु । रुवंति मधुरालापाः षट्पदा मधुलिप्सवः

tiṣṭhaṁti ca pravāleṣu puṣpabhārāvanādiṣu ruvaṁti madhurālāpāḥ ṣaṭpadā madhulipsavaḥ

पुष्पों के भार से झुकी नयी कोंपलों पर मधु-लोलुप भ्रमर बैठकर मधुर गुंजार कर रहे थे।

श्लोक 55 (skanda.3.55.55)

तत्र प्रदेशांश्च बहूनामोदांकुरमंडितान् । लतागृह परिक्षिप्तान्मनसः प्रीतिवर्द्धनान्

tatra pradeśāṁśca bahūnāmodāṁkuramaṁḍitān latāgṛha parikṣiptānmanasaḥ prītivarddhanān

वहाँ उसने सुगन्धित अंकुरों से सज्जित, लतागृहों से घिरे तथा मन को आनन्दित करनेवाले अनेक स्थान देखे —

श्लोक 56 (skanda.3.55.56)

संपश्यंती महातेजा बभूव मुदिता तदा । परस्पराश्लिष्टशाखैः पादपैः कुसमाचितैः

saṁpaśyaṁtī mahātejā babhūva muditā tadā parasparāśliṣṭaśākhaiḥ pādapaiḥ kusamācitaiḥ

— उन्हें देखती हुई वह महातेजस्विनी उर्वशी प्रसन्न हुई, जहाँ पुष्पों से लदे वृक्षों की शाखाएँ परस्पर आलिंगन कर रही थीं।

श्लोक 57 (skanda.3.55.57)

अशोभत वनं तत्तु महेंद्रध्वजसन्निभैः । सुखशीतसुगन्धी च पुष्परेणुवहोऽनिलः

aśobhata vanaṁ tattu maheṁdradhvajasannibhaiḥ sukhaśītasugandhī ca puṣpareṇuvaho'nilaḥ

वह वन इन्द्रध्वज के समान वृक्षों से शोभित था; तथा सुखद, शीतल एवं सुगन्धित वायु पुष्प-पराग को लिये हुए बह रही थी।

श्लोक 58 (skanda.3.55.58)

एवंगुणसमायुक्तं ददर्श सा वनं तदा । तदा सूर्योद्भवां तत्र पवित्रां परिशोभिताम्

evaṁguṇasamāyuktaṁ dadarśa sā vanaṁ tadā tadā sūryodbhavāṁ tatra pavitrāṁ pariśobhitām

उसने तब ऐसे गुणों से युक्त उस वन को देखा; तथा वहाँ सूर्य से उत्पन्न, अत्यंत शोभायमान पवित्र नदी को भी देखा।

श्लोक 59 (skanda.3.55.59)

आश्रमप्रवरं तत्र ददर्श च मनोरमम् । पतिभिर्वालखिल्यैश्च वृतं मुनिगणा वृतम्

āśramapravaraṁ tatra dadarśa ca manoramam patibhirvālakhilyaiśca vṛtaṁ munigaṇā vṛtam

वहाँ उसने एक अति उत्तम, मनोरम आश्रम देखा, जो वालखिल्य ऋषियों तथा उनकी पत्नियों से घिरा था, तथा मुनिगणों से भी घिरा था।

श्लोक 60 (skanda.3.55.60)

अग्न्यगारैश्च बहुभिर्वृक्षशाखावलंबितैः । धूगम्रपानकणैस्तत्र दिग्वासोयतिभिस्तथा

agnyagāraiśca bahubhirvṛkṣaśākhāvalaṁbitaiḥ dhūgamrapānakaṇaistatra digvāsoyatibhistathā

अनेक अग्निशालाओं से युक्त, वृक्षों की शाखाओं से आवृत; वहाँ धूम्र तथा हवि-कणों के बीच दिगम्बर यतिगण भी निवास करते थे।

श्लोक 61 (skanda.3.55.61)

पाल्या वन्या मृगास्तत्र सौम्या भूयो बभूविरे । मार्जारा मूषकैस्तत्र सर्पैश्च नकुलास्तथा

pālyā vanyā mṛgāstatra saumyā bhūyo babhūvire mārjārā mūṣakaistatra sarpaiśca nakulāstathā

वहाँ वन्य पशु मानो पाले हुए के समान सौम्य हो गये थे; वहाँ बिल्लियाँ चूहों के साथ तथा नेवले सर्पों के साथ रहते थे।

श्लोक 62 (skanda.3.55.62)

मृगशावैस्तथा सिंहाः सत्त्वरूपा बभूविरे । परस्परं चिक्रीडुस्ते यथा चैव सहोदराः । दूराद्ददर्श च वनं तत्र देवोऽब्रवीत्तदा

mṛgaśāvaistathā siṁhāḥ sattvarūpā babhūvire parasparaṁ cikrīḍuste yathā caiva sahodarāḥ dūrāddadarśa ca vanaṁ tatra devo'bravīttadā

और सिंह मृगशावकों के साथ सौम्य स्वभाव के हो गये थे; वे परस्पर सहोदर भाइयों के समान क्रीड़ा करते थे। दूर से उस वन को देखकर तब देवराज इन्द्र ने कहा —

श्लोक 63 (skanda.3.55.63)

इन्द्र उवाच । अयं च खलु धर्मराड् तपस्तुग्रेवतिष्ठते । मम राज्याभिकांक्षोऽसावतोर्थे यत्यतामिह

indra uvāca ayaṁ ca khalu dharmarāḍ tapastugrevatiṣṭhate mama rājyābhikāṁkṣo'sāvatorthe yatyatāmiha

इन्द्र ने कहा — यही वह धर्मराज है, जो उग्र तपस्या में लीन है; वह मेरे राज्य की कामना करता है — अतः यहाँ प्रयत्न किया जाये।

श्लोक 64 (skanda.3.55.64)

तपोविघ्नं प्रकुर्वंतु ममाज्ञा तत्र गम्यताम् । इन्द्रस्य वचनं श्रुत्वा उर्वशी च तिलोत्तमा

tapovighnaṁ prakurvaṁtu mamājñā tatra gamyatām indrasya vacanaṁ śrutvā urvaśī ca tilottamā

'वे उसके तप में विघ्न डालें — यही मेरी आज्ञा है; वहाँ जाया जाये।' इन्द्र के वचन सुनकर उर्वशी, तिलोत्तमा —

श्लोक 65 (skanda.3.55.65)

सुकेशी मंजुघोषा च घृताची मेनका तथा । विश्वाची चैव रंभा च प्रम्लोचा चारुभाषिणी

sukeśī maṁjughoṣā ca ghṛtācī menakā tathā viśvācī caiva raṁbhā ca pramlocā cārubhāṣiṇī

— सुकेशी, मंजुघोषा, घृताची, मेनका, विश्वाची, रम्भा तथा मधुरभाषिणी प्रम्लोचा —

श्लोक 66 (skanda.3.55.66)

पूर्वचित्तिः सुरूपा च अनुम्लोचा यशस्विनी । एताश्चान्याश्च बहुशस्तत्र संस्था व्यचिंतयन्

pūrvacittiḥ surūpā ca anumlocā yaśasvinī etāścānyāśca bahuśastatra saṁsthā vyaciṁtayan

— पूर्वचित्ति, सुन्दरी तथा यशस्विनी अनुम्लोचा — ये तथा अन्य अनेक अप्सराएँ वहाँ एकत्र होकर विचार करने लगीं।

श्लोक 67 (skanda.3.55.67)

परस्परं विलोक्यैव शंकमाना भयेन हि । यमश्चैव तथा शक्र उभौ वायतनं हि वः

parasparaṁ vilokyaiva śaṁkamānā bhayena hi yamaścaiva tathā śakra ubhau vāyatanaṁ hi vaḥ

वे परस्पर एक-दूसरे को देखती हुई भय से शंकित थीं — क्योंकि यम और इन्द्र दोनों ही उनके आश्रय हैं।

श्लोक 68 (skanda.3.55.68)

एवं विचार्य बहुधा वर्द्धनी नाम भारत । सर्वासामप्सरसां श्रेष्ठा सर्वाभरणभूषिता

evaṁ vicārya bahudhā varddhanī nāma bhārata sarvāsāmapsarasāṁ śreṣṭhā sarvābharaṇabhūṣitā

हे भारत! इस प्रकार बहुत विचार करने के बाद, वर्धनी नामक अप्सरा, जो सभी अप्सराओं में श्रेष्ठ तथा सभी आभूषणों से विभूषित थी —

श्लोक 69 (skanda.3.55.69)

उवाचैवोर्वशी तत्र किं खिद्यसि शुभानने । देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं मायारूपबलेन च । वर्णधर्मो यथा भूयात्करिष्ये पाकशासन

uvācaivorvaśī tatra kiṁ khidyasi śubhānane devānāṁ kāryasiddhyarthaṁ māyārūpabalena ca varṇadharmo yathā bhūyātkariṣye pākaśāsana

उर्वशी ने वहाँ कहा — 'हे शुभानने! तुम क्यों दुःखी हो? देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए मैं अपने माया-रूप के बल से यह कार्य करूँगी, जिससे इन्द्र का प्रयोजन सिद्ध हो।'

श्लोक 70 (skanda.3.55.70)

इन्द्र उवाच । साधुसाधु महाभागे वर्द्धनी नाम सुव्रता । शीघ्रं गच्छ स्वयं भद्रे कुरु कार्यं कृशोदरि

indra uvāca sādhusādhu mahābhāge varddhanī nāma suvratā śīghraṁ gaccha svayaṁ bhadre kuru kāryaṁ kṛśodari

इन्द्र ने कहा — 'साधु, साधु! हे महाभागे, सुव्रते वर्धनी! हे भद्रे, कृशोदरि! तुम स्वयं शीघ्र जाओ और यह कार्य सम्पन्न करो।'

श्लोक 71 (skanda.3.55.71)

धीराणामवने शक्ता नान्या सुभ्रु त्वया विना । वर्द्धनी च तथेत्युक्त्वा गता यत्र स धर्मराट्

dhīrāṇāmavane śaktā nānyā subhru tvayā vinā varddhanī ca tathetyuktvā gatā yatra sa dharmarāṭ

'हे सुभ्रु! धैर्यवानों को विचलित करने में तुम्हारे बिना कोई अन्य समर्थ नहीं है।' वर्धनी 'ऐसा ही होगा' कहकर वहाँ गयी, जहाँ वह धर्मराज था।

श्लोक 72 (skanda.3.55.72)

महता भूषणेनैव रूपं कृत्वा मनोरमम् । कुंकुमैः कज्जलैर्वस्त्रैर्भूषणैश्चैव भूषिता

mahatā bhūṣaṇenaiva rūpaṁ kṛtvā manoramam kuṁkumaiḥ kajjalairvastrairbhūṣaṇaiścaiva bhūṣitā

अत्यंत आभूषणों से मनोहर रूप धारण करके, कुंकुम, काजल, वस्त्र तथा आभूषणों से सुसज्जित होकर —

श्लोक 73 (skanda.3.55.73)

कुसुमं च तथा वस्त्रं किंकिणीकटिराजिता । झणत्कारैस्तथा कष्टैर्भूषिता च पदद्वये

kusumaṁ ca tathā vastraṁ kiṁkiṇīkaṭirājitā jhaṇatkāraistathā kaṣṭairbhūṣitā ca padadvaye

— पुष्प तथा वस्त्र धारण किये, कमर में किंकिणी से सुशोभित, तथा दोनों चरणों में झनझनाती नूपुरों से अलंकृत —

श्लोक 74 (skanda.3.55.74)

नानाभूषणभूषाढ्या नानाचंदनचर्चिता । नानाकुसुम मालाढ्या दुकूलेनावृता शुभा

nānābhūṣaṇabhūṣāḍhyā nānācaṁdanacarcitā nānākusuma mālāḍhyā dukūlenāvṛtā śubhā

— नाना आभूषणों से सज्जित, नाना प्रकार के चन्दन से लिप्त, नाना पुष्पों की मालाओं से सुशोभित, वह शुभ अप्सरा दुकूल वस्त्र धारण किये हुए थी।

श्लोक 75 (skanda.3.55.75)

प्रगृह्य वीणां संशुद्धां करे सर्वांगसुन्दरी । नर्तनं त्रिविधं तत्र चक्रे लोकमनोरमम्

pragṛhya vīṇāṁ saṁśuddhāṁ kare sarvāṁgasundarī nartanaṁ trividhaṁ tatra cakre lokamanoramam

हाथ में एक शुद्ध वीणा लेकर वह सर्वांगसुन्दरी वहाँ त्रिविध नृत्य करने लगी, जो सारे संसार को मोहित करनेवाला था।

श्लोक 76 (skanda.3.55.76)

तारस्वरेण मधुरैर्वंशनादेन मिश्रितम्

tārasvareṇa madhurairvaṁśanādena miśritam

— उच्च तथा मधुर स्वर में बाँसुरी की ध्वनि से मिश्रित —

श्लोक 77 (skanda.3.55.77)

मूर्च्छनातालसंयुक्तं तंत्रीलयसमन्वितम् । क्षणेन सहसा देवो धर्मराजो जितात्मवान् । विमनाः स तदा जातो धर्मराजो नृपात्मजः

mūrcchanātālasaṁyuktaṁ taṁtrīlayasamanvitam kṣaṇena sahasā devo dharmarājo jitātmavān vimanāḥ sa tadā jāto dharmarājo nṛpātmajaḥ

— स्वरलहरी और ताल से युक्त, वीणा की लय से समन्वित — क्षणभर में सहसा वे जितात्मा देव धर्मराज, वह नृपपुत्र, तब विचलित-मन हो गये।

श्लोक 78 (skanda.3.55.78)

युधिष्ठिर उवाच । आश्चर्यं परमं ब्रह्मञ्जातं मे ब्रह्मसत्तम । कथं ब्रह्मोपपन्नस्य तपश्छेदो बभूव ह

yudhiṣṭhira uvāca āścaryaṁ paramaṁ brahmañjātaṁ me brahmasattama kathaṁ brahmopapannasya tapaśchedo babhūva ha

युधिष्ठिरजी ने कहा — हे ब्रह्मन्! हे ब्रह्मसत्तम! मुझे परम आश्चर्य हुआ है। ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की तपस्या भला कैसे भंग हो गयी?

श्लोक 79 (skanda.3.55.79)

धर्मे धरा च नाकश्च धर्मे पातालमेव च । धर्मे चंद्रार्कमापश्च धर्मे च पवनोऽनलः

dharme dharā ca nākaśca dharme pātālameva ca dharme caṁdrārkamāpaśca dharme ca pavano'nalaḥ

धर्म में ही पृथ्वी और स्वर्ग स्थित हैं, धर्म में ही पाताल भी; धर्म में ही चन्द्र-सूर्य और जल, धर्म में ही वायु और अग्नि —

श्लोक 80 (skanda.3.55.80)

धर्मे चैवाखिलं विश्वं स धर्मो व्यग्रतां कथम् । गतः स्वामिंस्तद्वैयग्र्यं तथ्यं कथय सुव्रत

dharme caivākhilaṁ viśvaṁ sa dharmo vyagratāṁ katham gataḥ svāmiṁstadvaiyagryaṁ tathyaṁ kathaya suvrata

— और धर्म में ही सम्पूर्ण विश्व स्थित है। फिर वही धर्म व्याकुलता को कैसे प्राप्त हुआ? हे स्वामिन्! हे सुव्रत! उस व्याकुलता का सत्य कारण बताइये।

श्लोक 81 (skanda.3.55.81)

व्यास उवाच । पतनं साहसानां च नरकस्यैव कारणम् । योनिकुण्डमिदं सृष्टं कुंभीपाकसमं भुवि

vyāsa uvāca patanaṁ sāhasānāṁ ca narakasyaiva kāraṇam yonikuṇḍamidaṁ sṛṣṭaṁ kuṁbhīpākasamaṁ bhuvi

व्यासजी ने कहा — दुःसाहसी पुरुषों का पतन ही नरक का कारण है; यह योनि-कुण्ड पृथ्वी पर कुंभीपाक नरक के समान ही रचा गया है।

श्लोक 82 (skanda.3.55.82)

नेत्ररज्ज्वा दृढं बद्ध्वा धर्षयंति मनस्विनः । कुचरूपैर्महादंडैस्ताड्यमानमचेतसम्

netrarajjvā dṛḍhaṁ baddhvā dharṣayaṁti manasvinaḥ kucarūpairmahādaṁḍaistāḍyamānamacetasam

अपनी नेत्ररूपी रस्सी से दृढ़ता से बाँधकर वे मनस्वी पुरुषों को भी वश में कर लेती हैं; उनके स्तनरूपी महादण्डों की चोट से मनुष्य अचेत हो जाता है —

श्लोक 83 (skanda.3.55.83)

कृत्वा वै पातयंत्याशु नरकं नृपसत्तम । मोहनं सर्वभूतानां नारी चैवं विनिर्मिता

kṛtvā vai pātayaṁtyāśu narakaṁ nṛpasattama mohanaṁ sarvabhūtānāṁ nārī caivaṁ vinirmitā

— और इस प्रकार करके हे नृपसत्तम! वे शीघ्र ही नरक में गिरा देती हैं; नारी इस प्रकार समस्त प्राणियों को मोहित करनेवाली बनायी गयी है।

श्लोक 84 (skanda.3.55.84)

तावद्धंत मनःस्थैर्यं श्रुतं सत्यमनाकुलम् । यावन्मत्तांगनाग्रे न वागुरेव सुचेतसा म्

tāvaddhaṁta manaḥsthairyaṁ śrutaṁ satyamanākulam yāvanmattāṁganāgre na vāgureva sucetasā m

अफसोस! मन की स्थिरता, शास्त्रज्ञान तथा सत्य तभी तक अव्याकुल रहते हैं, जब तक सुचेता पुरुषों के लिए भी मदमत्त स्त्री के सामने वे फंदे के समान नहीं बन जाते।

श्लोक 85 (skanda.3.55.85)

तावत्तपोभिवृद्धिस्तु तावद्दानं दया दमः । तावत्स्वाध्यायवृत्तं च तावच्छौचं धृतं व्रतम्

tāvattapobhivṛddhistu tāvaddānaṁ dayā damaḥ tāvatsvādhyāyavṛttaṁ ca tāvacchaucaṁ dhṛtaṁ vratam

तभी तक तप की वृद्धि होती है, तभी तक दान, दया और दम रहते हैं; तभी तक स्वाध्याय, शौच, धृति तथा व्रत भी स्थिर रहते हैं —

श्लोक 86 (skanda.3.55.86)

यावत्त्रस्तमृगीदृष्टिं चपलां न विलोकयेत् । तावन्माता पिता तावद्धाता तावत्ससुहृज्जनः

yāvattrastamṛgīdṛṣṭiṁ capalāṁ na vilokayet tāvanmātā pitā tāvaddhātā tāvatsasuhṛjjanaḥ

— जब तक मनुष्य भयभीत मृगनयनी के चंचल कटाक्ष को नहीं देखता। तभी तक माता, पिता, तभी तक रक्षक तथा तभी तक बन्धु-मित्रगण भी अपने रहते हैं —

श्लोक 87 (skanda.3.55.87)

तावल्लज्जा भयं तावत्स्वाचारस्तावदेव हि । ज्ञानमौदार्यमैश्वर्यं तावदेव हि भासते । यावन्मत्तांगनापाशैः पातितो नैव बन्धनैः

tāvallajjā bhayaṁ tāvatsvācārastāvadeva hi jñānamaudāryamaiśvaryaṁ tāvadeva hi bhāsate yāvanmattāṁganāpāśaiḥ pātito naiva bandhanaiḥ

— तभी तक लज्जा, भय तथा सदाचार रहते हैं; तभी तक ज्ञान, उदारता तथा ऐश्वर्य भी शोभा पाते हैं — जब तक मनुष्य मदमत्त स्त्री के पाश-बन्धनों में गिराया नहीं जाता।

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