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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 56

धर्मेश्वर वर

अध्याय 55अध्याय-सूचीअध्याय 57

श्लोक 1 (skanda.3.56.1)

व्यास उवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि धर्मराजस्य चेष्टितम् । यच्छ्रुत्वा यमदूतानां न भयं विद्यते क्वचित्

vyāsa uvāca ataḥ paraṁ pravakṣyāmi dharmarājasya ceṣṭitam yacchrutvā yamadūtānāṁ na bhayaṁ vidyate kvacit

व्यासजी ने कहा — इसके पश्चात् मैं धर्मराज की चेष्टा (कथा) कहूँगा, जिसे सुनकर यमदूतों का भय कहीं भी नहीं रहता।

श्लोक 2 (skanda.3.56.2)

धर्मराजेन सा दृष्टा वर्द्धनी च वराप्सरा । महत्यरण्ये का ह्येषा सुन्दरांग्यतिसुन्दरी

dharmarājena sā dṛṣṭā varddhanī ca varāpsarā mahatyaraṇye kā hyeṣā sundarāṁgyatisundarī

धर्मराज ने उस श्रेष्ठ अप्सरा वर्धनी को देखा। उन्होंने सोचा — 'इस विशाल वन में यह सुन्दरांगी, अत्यंत सुन्दरी कौन है?'

श्लोक 3 (skanda.3.56.3)

निर्मानुषवनं चेदं सिंहव्याघ्रभयानकम् । आश्चर्यं परमं ज्ञात्वा धर्मराजोऽब्रवीदिदम्

nirmānuṣavanaṁ cedaṁ siṁhavyāghrabhayānakam āścaryaṁ paramaṁ jñātvā dharmarājo'bravīdidam

'यह वन मनुष्यरहित है, सिंह-व्याघ्रों से भयानक है।' इसे परम आश्चर्य जानकर धर्मराज ने यह कहा —

श्लोक 4 (skanda.3.56.4)

धर्मराज उवाच । कस्मात्त्वं मानिनि ह्येका वने चरसि निर्जने । कस्मात्स्थानात्समायाता कस्य पत्नी सुशोभने

dharmarāja uvāca kasmāttvaṁ mānini hyekā vane carasi nirjane kasmātsthānātsamāyātā kasya patnī suśobhane

धर्मराज ने कहा — हे मानिनी! तुम अकेली इस निर्जन वन में क्यों विचरण कर रही हो? हे सुशोभने! तुम कहाँ से आयी हो, तथा किसकी पत्नी हो?

श्लोक 5 (skanda.3.56.5)

सुता त्वं कस्य वामोरु अतिरूपवती शुभा । मानुषी वाथ गंधर्वी अमरी वाथ किंनरी

sutā tvaṁ kasya vāmoru atirūpavatī śubhā mānuṣī vātha gaṁdharvī amarī vātha kiṁnarī

हे वामोरु! तुम अत्यंत रूपवती, शुभा — किसकी पुत्री हो? क्या तुम मानुषी हो, अथवा गंधर्वी, देवी अथवा किन्नरी हो?

श्लोक 6 (skanda.3.56.6)

अप्सरा पक्षिणी वाथ अथवा वनदेवता । राक्षसी वा खेचरी वा कस्य भार्या च तद्वद

apsarā pakṣiṇī vātha athavā vanadevatā rākṣasī vā khecarī vā kasya bhāryā ca tadvada

क्या तुम अप्सरा हो, अथवा पक्षिणी, अथवा वनदेवता? क्या तुम राक्षसी हो, अथवा खेचरी? यह भी बताओ, तुम किसकी पत्नी हो।

श्लोक 7 (skanda.3.56.7)

सत्यं च वद मे सुभ्रूरित्याहार्कसुतस्तदा । किमिच्छसि त्वया भद्रे किं कार्यं वा वदात्र वै

satyaṁ ca vada me subhrūrityāhārkasutastadā kimicchasi tvayā bhadre kiṁ kāryaṁ vā vadātra vai

'हे सुभ्रु! मुझे सत्य कहो' — इस प्रकार तब सूर्यपुत्र (यम) ने कहा। 'हे भद्रे! तुम क्या चाहती हो? यहाँ तुम्हारा क्या प्रयोजन है, वह बताओ।'

श्लोक 8 (skanda.3.56.8)

यदिच्छसि त्वं वामोरु ददामि तव वांछितम्

yadicchasi tvaṁ vāmoru dadāmi tava vāṁchitam

'हे वामोरु! जो तुम चाहती हो, वह तुम्हें प्रदान करता हूँ।'

श्लोक 9 (skanda.3.56.9)

वर्द्धन्युवाच ।। । धर्मे तिष्ठति सर्वं वै स्थावरं जंगमं विभो । स धर्मो दुष्करं कर्म कस्मात्त्वं कुरुषेऽनघ

varddhanyuvāca dharme tiṣṭhati sarvaṁ vai sthāvaraṁ jaṁgamaṁ vibho sa dharmo duṣkaraṁ karma kasmāttvaṁ kuruṣe'nagha

वर्धनी ने कहा — हे विभो! समस्त स्थावर-जंगम धर्म में ही स्थित है। हे अनघ! आप स्वयं धर्म होकर यह दुष्कर कर्म क्यों कर रहे हैं?

श्लोक 10 (skanda.3.56.10)

यम उवाच । ईशानस्य च यद्रूपं द्रष्टुमिच्छामि भामिनि । तेनाहं तपसा युक्तः शिवया सह शंकरम्

yama uvāca īśānasya ca yadrūpaṁ draṣṭumicchāmi bhāmini tenāhaṁ tapasā yuktaḥ śivayā saha śaṁkaram

यम ने कहा — हे भामिनि! मैं ईशान के स्वरूप का दर्शन करना चाहता हूँ; इसीलिए इस तप में लगा हूँ, ताकि शिवा सहित शंकर का दर्शन कर सकूँ।

श्लोक 11 (skanda.3.56.11)

यशः प्राप्स्ये सुखं प्राप्स्ये करोमि च सुदुष्करम् । युगेयुगे मम ख्यातिर्भवेदिति मतिर्मम

yaśaḥ prāpsye sukhaṁ prāpsye karomi ca suduṣkaram yugeyuge mama khyātirbhavediti matirmama

'मुझे यश प्राप्त होगा, सुख प्राप्त होगा, और यह दुष्कर तप मैं इसलिए कर रहा हूँ कि युग-युग में मेरी ख्याति बनी रहे' — यही मेरा विचार है।

श्लोक 12 (skanda.3.56.12)

कल्पे कल्पे महाकल्पे भूयः ख्यातिर्भवेदिति । एतस्मात्कारणात्सुभ्रूस्तप्यते परमं तपः

kalpe kalpe mahākalpe bhūyaḥ khyātirbhavediti etasmātkāraṇātsubhrūstapyate paramaṁ tapaḥ

'कल्प-कल्प में, महाकल्प में भी मेरी ख्याति पुनः-पुनः बनी रहे' — इसी कारण से, हे सुभ्रु! यह परम तप किया जा रहा है।

श्लोक 13 (skanda.3.56.13)

कस्मात्त्वमागता भद्रे कथयस्व यथातथा । किं कार्यं कस्य हेतुश्च सत्यमाख्यातुमर्हसि

kasmāttvamāgatā bhadre kathayasva yathātathā kiṁ kāryaṁ kasya hetuśca satyamākhyātumarhasi

हे भद्रे! तुम यहाँ किसलिए आयी हो, यह यथार्थ रूप से बताओ। तुम्हारा क्या प्रयोजन है, तथा किस कारण से, यह सत्य कहना तुम्हें उचित है।

श्लोक 14 (skanda.3.56.14)

वर्द्धन्युवाच ।। । तपसैव त्वया धर्म भयभीतो दिवस्पतिः । तेनाहं नोदिता चात्र तपोवि घ्नस्य कांक्षया

varddhanyuvāca tapasaiva tvayā dharma bhayabhīto divaspatiḥ tenāhaṁ noditā cātra tapovi ghnasya kāṁkṣayā

वर्धनी ने कहा — हे धर्म! आपकी तपस्या से ही स्वर्ग के स्वामी भयभीत हो गये हैं; इसीलिए मुझे यहाँ आपके तप में विघ्न डालने की इच्छा से भेजा गया है।

श्लोक 15 (skanda.3.56.15)

इन्द्रासनभयाद्भीता हरिणा हरिसन्निधौ । प्रेषिताहं महाभाग सत्यं हि प्रवदाम्यहम्

indrāsanabhayādbhītā hariṇā harisannidhau preṣitāhaṁ mahābhāga satyaṁ hi pravadāmyaham

हे महाभाग! इन्द्रासन के भय से भयभीत होकर इन्द्र ने ही, इन्द्र की सभा में, मुझे भेजा है; मैं आपसे सत्य ही कह रही हूँ।

श्लोक 16 (skanda.3.56.16)

सूत उवाच । सत्यवाक्येन च तदा तोषितो रविनंदनः । उवाचैनां महाभाग्यो वरदोहं प्रयच्छ मे

sūta uvāca satyavākyena ca tadā toṣito ravinaṁdanaḥ uvācaināṁ mahābhāgyo varadohaṁ prayaccha me

सूतजी बोले — उसके सत्यवचन से प्रसन्न होकर महाभाग्यशाली सूर्यपुत्र ने उससे कहा — 'मैं वरदाता हूँ, मुझसे माँगो।'

श्लोक 17 (skanda.3.56.17)

यमोऽहं सर्वभूतानां दुष्टानां कर्मकारिणाम् । धर्म रूपो हि सर्वेषां मनुजानां जितात्मनाम्

yamo'haṁ sarvabhūtānāṁ duṣṭānāṁ karmakāriṇām dharma rūpo hi sarveṣāṁ manujānāṁ jitātmanām

'मैं समस्त दुष्ट, दुष्कर्मी प्राणियों के लिए यम हूँ; किन्तु जितात्मा समस्त मनुष्यों के लिए मैं साक्षात् धर्मस्वरूप हूँ।'

श्लोक 18 (skanda.3.56.18)

स धर्मोऽहं वरारोहे ददामि तव दुर्लभम् । तत्सर्वं प्रार्थय त्वं मे शीघ्रं चाप्सरसां वरे

sa dharmo'haṁ varārohe dadāmi tava durlabham tatsarvaṁ prārthaya tvaṁ me śīghraṁ cāpsarasāṁ vare

'हे वरारोहे! मैं वही धर्म हूँ, तुम्हें दुर्लभ वर दूँगा; हे अप्सराओं में श्रेष्ठे! तुम शीघ्र ही मुझसे वह सब माँग लो।'

श्लोक 19 (skanda.3.56.19)

वर्द्धन्युवाच ।। । इन्द्रस्थाने सदा रम्ये सुस्थिरत्वं प्रयच्छ मे । स्वामिन्धर्मभृतां श्रेष्ठ लोकानां च हिताय वै

varddhanyuvāca indrasthāne sadā ramye susthiratvaṁ prayaccha me svāmindharmabhṛtāṁ śreṣṭha lokānāṁ ca hitāya vai

वर्धनी ने कहा — हे स्वामिन्! हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ! मुझे इन्द्र के सदा रमणीय स्थान में स्थिरता प्रदान कीजिये, लोकों के हित के लिए भी।

श्लोक 20 (skanda.3.56.20)

यम उवाच । एवमस्त्विति तां प्राह चान्यं वरय सत्वरम् । ददामि वरमुत्कृष्टं गानेन तोषितोस्म्यहम्

yama uvāca evamastviti tāṁ prāha cānyaṁ varaya satvaram dadāmi varamutkṛṣṭaṁ gānena toṣitosmyaham

यम ने कहा — 'ऐसा ही हो,' उन्होंने उससे कहा, 'और शीघ्र ही एक और वर माँगो; तुम्हारे गान से प्रसन्न होकर मैं उत्कृष्ट वर देता हूँ।'

श्लोक 21 (skanda.3.56.21)

वर्द्धन्युवाच ।। । अस्मिन्स्थाने महाक्षेत्रे मम तीर्थं महामते । भूयाच्च सर्वपापघ्नं मन्नाम्नेति च विश्रुतम्

varddhanyuvāca asminsthāne mahākṣetre mama tīrthaṁ mahāmate bhūyācca sarvapāpaghnaṁ mannāmneti ca viśrutam

वर्धनी ने कहा — हे महामते! इस महाक्षेत्र में मेरे नाम का एक तीर्थ हो, जो समस्त पापों का नाशक तथा मेरे ही नाम से विख्यात हो।

श्लोक 22 (skanda.3.56.22)

तत्र दत्तं हुतं तप्तं पठितं वाऽक्षयं भवेत् । पञ्चरात्रं निषेवेत वर्द्धमानं सरोवर म्

tatra dattaṁ hutaṁ taptaṁ paṭhitaṁ vā'kṣayaṁ bhavet pañcarātraṁ niṣeveta varddhamānaṁ sarovara m

वहाँ दिया गया, हवन किया गया, तप किया गया अथवा पढ़ा गया — सब अक्षय हो जाये; वर्धमान नामक सरोवर की पाँच रात्रि तक सेवा की जाये।

श्लोक 23 (skanda.3.56.23)

पूर्वजास्तस्य तुष्येरंस्तर्प्यमाणा दिनेदिने । तथेत्युक्त्वा तु तां धर्मो मौनमाचष्ट संस्थितः । त्रिःपरिक्रम्य तं धर्मं नमस्कृत्य दिवं ययौ

pūrvajāstasya tuṣyeraṁstarpyamāṇā dinedine tathetyuktvā tu tāṁ dharmo maunamācaṣṭa saṁsthitaḥ triḥparikramya taṁ dharmaṁ namaskṛtya divaṁ yayau

'उसके पूर्वज प्रतिदिन तर्पण से संतुष्ट हों।' 'ऐसा ही हो' कहकर धर्मदेव मौन होकर स्थिर हो गये। उस धर्म की तीन बार परिक्रमा करके तथा नमस्कार करके वह स्वर्ग को चली गयी।

श्लोक 24 (skanda.3.56.24)

वर्द्धन्युवाच ।। । मा भयं कुरु देवेश यमस्यार्कसुतस्य च । अयं स्वार्थपरो धर्म यशसे च समाचरेत्

varddhanyuvāca mā bhayaṁ kuru deveśa yamasyārkasutasya ca ayaṁ svārthaparo dharma yaśase ca samācaret

वर्धनी ने इन्द्र से कहा — हे देवेश! सूर्यपुत्र यम से भय मत कीजिये; यह धर्म तो स्वार्थपरता से तथा यश के लिए ही ऐसा आचरण करता है।

श्लोक 25 (skanda.3.56.25)

व्यास उवाच । वर्द्धनी पूजिता तेन शक्रेण च शुभानना । साधुसाधु महाभागे देवकार्य कृतं त्वया

vyāsa uvāca varddhanī pūjitā tena śakreṇa ca śubhānanā sādhusādhu mahābhāge devakārya kṛtaṁ tvayā

व्यासजी ने कहा — शुभमुखी वर्धनी का इन्द्र ने सम्मान किया — 'साधु, साधु! हे महाभागे! तुमने देवकार्य सम्पन्न किया है।'

श्लोक 26 (skanda.3.56.26)

निर्भयत्वं वरागेहे सुखवासश्च ते सदा । यशः सौख्यं श्रियं रम्यां प्राप्स्यसि त्वं शुभानने

nirbhayatvaṁ varāgehe sukhavāsaśca te sadā yaśaḥ saukhyaṁ śriyaṁ ramyāṁ prāpsyasi tvaṁ śubhānane

'तुम्हारे उत्तम निवास में निर्भयता तथा सदा सुखद वास होगा; हे शुभानने! तुम यश, सुख तथा रमणीय सम्पत्ति प्राप्त करोगी।'

श्लोक 27 (skanda.3.56.27)

तथेति देवास्तामूचुर्निर्भयानंदचेतसा । नमस्कृत्य च शक्रं सा गता स्थानं स्वकं शुभम्

tatheti devāstāmūcurnirbhayānaṁdacetasā namaskṛtya ca śakraṁ sā gatā sthānaṁ svakaṁ śubham

'ऐसा ही हो,' निर्भय तथा आनन्दित मन से देवताओं ने उससे कहा। इन्द्र को नमस्कार करके वह अपने शुभ स्थान को गयी।

श्लोक 28 (skanda.3.56.28)

सूत उवाच । गतेप्सरसि राजेन्द्र धर्मस्तस्थौ यथाविधि । तपस्तेपे महाघोरं विश्वस्योद्वेगदायकम्

sūta uvāca gatepsarasi rājendra dharmastasthau yathāvidhi tapastepe mahāghoraṁ viśvasyodvegadāyakam

सूतजी बोले — हे राजेन्द्र! अप्सरा के चले जाने पर धर्मदेव विधिपूर्वक स्थिर रहे; उन्होंने अत्यंत घोर तप किया, जो सम्पूर्ण विश्व को उद्विग्न करनेवाला था।

श्लोक 29 (skanda.3.56.29)

पंचाग्निसा धनं शुक्रे मासि सूर्येण तापिते । चक्रे सुदुःसहं राजन्देवैरपि दुरासदम्

paṁcāgnisā dhanaṁ śukre māsi sūryeṇa tāpite cakre suduḥsahaṁ rājandevairapi durāsadam

सूर्य से तपे हुए ग्रीष्म मास में उन्होंने पंचाग्नि-साधना की; हे राजन्! उन्होंने वह किया जो अत्यंत दुःसह तथा देवताओं के लिए भी दुष्प्राप्य था।

श्लोक 30 (skanda.3.56.30)

ततो वर्षशते पूर्णे अन्तको मौनमास्थितः । काष्ठभूत इभवातस्थौ वल्मीकशतसंवृतः

tato varṣaśate pūrṇe antako maunamāsthitaḥ kāṣṭhabhūta ibhavātasthau valmīkaśatasaṁvṛtaḥ

तत्पश्चात् सौ वर्ष पूर्ण होने पर अन्तक (यम) मौन धारण किये रहे; काष्ठवत् निश्चल होकर वे सैकड़ों वल्मीकों (दीमक-टीलों) से आच्छादित होकर खड़े रहे।

श्लोक 31 (skanda.3.56.31)

नानापक्षिगणैस्तत्र कृतनीडैः स धर्मराट् । उपविष्टे व्रतं राजन्दृश्यते नैव कुत्रचित्

nānāpakṣigaṇaistatra kṛtanīḍaiḥ sa dharmarāṭ upaviṣṭe vrataṁ rājandṛśyate naiva kutracit

वहाँ नाना प्रकार के पक्षियों के झुंडों ने उन पर घोंसले बना लिये; हे राजन्! अपने व्रत में बैठे हुए वे धर्मराज कहीं भी दिखायी नहीं देते थे।

श्लोक 32 (skanda.3.56.32)

संस्मरंतोऽथ देवेश मुमापतिमनिंदितम् । ततो देवाः सगन्धर्वा यक्षाश्चोद्विग्नमानसाः । कैलासशिखरं भूय आजग्मुः शिवसन्निधौ

saṁsmaraṁto'tha deveśa mumāpatimaniṁditam tato devāḥ sagandharvā yakṣāścodvignamānasāḥ kailāsaśikharaṁ bhūya ājagmuḥ śivasannidhau

वे निरन्तर उमापति निष्कलंक शिव का स्मरण करते रहे। तब गन्धर्वों तथा यक्षों सहित देवगण, उद्विग्न मन से पुनः कैलास शिखर पर शिव के समीप गये।

श्लोक 33 (skanda.3.56.33)

देवा ऊचुः । त्राहित्राहि महादेव श्रीकण्ठ जगतः पते । त्राहि नो भूतभव्येश त्राहि नो वृषभध्वज । दयालुस्त्वं कृपानाथ निर्विघ्नं कुरु शंकर

devā ūcuḥ trāhitrāhi mahādeva śrīkaṇṭha jagataḥ pate trāhi no bhūtabhavyeśa trāhi no vṛṣabhadhvaja dayālustvaṁ kṛpānātha nirvighnaṁ kuru śaṁkara

देवताओं ने कहा — हे महादेव! हे श्रीकण्ठ! हे जगत्पते! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। हे भूत-भव्येश! हे वृषभध्वज! हमारी रक्षा कीजिये। हे शंकर! आप दयालु तथा कृपानाथ हैं, हमें निर्विघ्न कीजिये।

श्लोक 34 (skanda.3.56.34)

ईश्वर उवाच । केनापराधिता देवाः केन वा मानमर्द्दिताः । मर्त्ये स्वर्गेऽथवा नागे शीघ्रं कथय ताचिरम्

īśvara uvāca kenāparādhitā devāḥ kena vā mānamardditāḥ martye svarge'thavā nāge śīghraṁ kathaya tāciram

ईश्वर ने कहा — हे देवगण! किसने तुम्हारा अपराध किया है, अथवा किसने तुम्हारे मान का मर्दन किया है — मृत्युलोक में, स्वर्ग में अथवा नागलोक में? शीघ्र, बिना विलम्ब के बताओ।

श्लोक 35 (skanda.3.56.35)

अनेनैव त्रिशूलेन खट्वांगेनाथवा पुनः । अथ पाशुपतेनैव निहनिष्यामि तं रणे । शीघ्रं वै वदतास्माक मत्रागमनकारणम्

anenaiva triśūlena khaṭvāṁgenāthavā punaḥ atha pāśupatenaiva nihaniṣyāmi taṁ raṇe śīghraṁ vai vadatāsmāka matrāgamanakāraṇam

इसी त्रिशूल से, अथवा खट्वांग से, अथवा पाशुपतास्त्र से ही मैं उसे युद्ध में मार डालूँगा। शीघ्र ही मुझसे यहाँ आने का कारण बताओ।

श्लोक 36 (skanda.3.56.36)

देवा ऊचुः ।। । कृपासिन्धो हि देवेश जगदानन्दकारक । न भयं मानुषादद्य न ना गाद्देवदानवात्

devā ūcuḥ kṛpāsindho hi deveśa jagadānandakāraka na bhayaṁ mānuṣādadya na nā gāddevadānavāt

देवताओं ने कहा — हे कृपासिन्धो! हे देवेश! हे जगदानन्दकारक! आज हमें न किसी मनुष्य से भय है, न नाग से, न देव से, न दानव से।

श्लोक 37 (skanda.3.56.37)

मर्त्यलोके महादेव प्रेतनाथो महाकृतिः । आत्मकार्यं महाघोरं क्लेशयेदिति निश्चयः

martyaloke mahādeva pretanātho mahākṛtiḥ ātmakāryaṁ mahāghoraṁ kleśayediti niścayaḥ

हे महादेव! मृत्युलोक में महाकाय प्रेतनाथ (यम) अपने-आपको महाघोर कष्ट देकर एक भयंकर कार्य में जुटे हैं, यह निश्चित है —

श्लोक 38 (skanda.3.56.38)

उग्रेण तपसा कृत्वा क्लिश्यदात्मानमात्मना । तेनात्र वयमुद्विग्ना देवाः सर्वे सदाशिव । शरणं त्वामनुप्राप्ता यदिच्छसि कुरुष्व तत्

ugreṇa tapasā kṛtvā kliśyadātmānamātmanā tenātra vayamudvignā devāḥ sarve sadāśiva śaraṇaṁ tvāmanuprāptā yadicchasi kuruṣva tat

— उग्र तप द्वारा वे स्वयं अपने-आपको कष्ट दे रहे हैं। हे सदाशिव! इसी से हम सभी देवगण उद्विग्न हैं; हम आपकी शरण में आये हैं — जैसी आपकी इच्छा हो, वैसा कीजिये।

श्लोक 39 (skanda.3.56.39)

सूत उवाच । देवानां वचनं श्रुत्वा वृषारूढो वृषध्वजः । आयुधान्परिसंगृह्य कवचं सुमनोहरम् । गतवानथ तं देशं यत्र धर्मो व्यवस्थितः

sūta uvāca devānāṁ vacanaṁ śrutvā vṛṣārūḍho vṛṣadhvajaḥ āyudhānparisaṁgṛhya kavacaṁ sumanoharam gatavānatha taṁ deśaṁ yatra dharmo vyavasthitaḥ

सूतजी बोले — देवताओं के वचन सुनकर वृषभध्वज बैल पर आरूढ़ होकर, अपने अस्त्र-शस्त्र तथा अत्यंत सुन्दर कवच धारण करके, उस स्थान को गये जहाँ धर्मदेव स्थित थे।

श्लोक 40 (skanda.3.56.40)

ईश्वर उवाच । अनेन तपसा धर्म संतुष्टं मम मानसम् । वरं ब्रूहि वरं ब्रूहि वरं ब्रूहीत्युवाच ह

īśvara uvāca anena tapasā dharma saṁtuṣṭaṁ mama mānasam varaṁ brūhi varaṁ brūhi varaṁ brūhītyuvāca ha

ईश्वर ने कहा — हे धर्म! इस तप से मेरा मन अत्यंत संतुष्ट हुआ है। 'वर माँगो, वर माँगो, वर माँगो' — ऐसा उन्होंने कहा।

श्लोक 41 (skanda.3.56.41)

इच्छसे त्वं यथा कामा न्यथा ते मनसि स्थितान् । यंयं प्रार्थयसे भद्र ददामि तव सांप्रतम्

icchase tvaṁ yathā kāmā nyathā te manasi sthitān yaṁyaṁ prārthayase bhadra dadāmi tava sāṁpratam

'जैसी भी इच्छाएँ तुम्हारे मन में स्थित हैं, हे भद्र! तुम जो-जो माँगोगे, वह मैं अभी तुम्हें प्रदान करूँगा।'

श्लोक 42 (skanda.3.56.42)

सूत उवाच । एवं संभाषमाणं तु दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् । वल्मीकादुत्थितो राजन्गृहीत्वा करसंपुटम् । तुष्टाव वचनैः शुद्धैर्लोकनाथमरिंदम्

sūta uvāca evaṁ saṁbhāṣamāṇaṁ tu dṛṣṭvā devaṁ maheśvaram valmīkādutthito rājangṛhītvā karasaṁpuṭam tuṣṭāva vacanaiḥ śuddhairlokanāthamariṁdam

सूतजी बोले — हे राजन्! महेश्वर को इस प्रकार बोलते देखकर, वल्मीक से उठकर, हाथ जोड़कर उन्होंने शत्रु-नाशक लोकनाथ की शुद्ध वचनों से स्तुति की।

श्लोक 43 (skanda.3.56.43)

धर्म उवाच । ईश्वराय नमस्तुभ्यं नमस्ते योगरूपिणे । नमस्ते तेजोरूपाय नीलकंठ नमोऽस्तु ते

dharma uvāca īśvarāya namastubhyaṁ namaste yogarūpiṇe namaste tejorūpāya nīlakaṁṭha namo'stu te

धर्मदेव ने कहा — हे ईश्वर! आपको नमस्कार, हे योगस्वरूप! आपको नमस्कार; हे तेजस्वरूप! हे नीलकण्ठ! आपको नमस्कार हो।

श्लोक 44 (skanda.3.56.44)

ध्यातॄणामनुरूपाय भक्तिगम्याय ते नमः । नमस्ते ब्रह्मरूपाय विष्णुरूप नमोऽ स्तु ते

dhyātṝṇāmanurūpāya bhaktigamyāya te namaḥ namaste brahmarūpāya viṣṇurūpa namo' stu te

ध्यान करनेवालों के अनुरूप रूप धारण करनेवाले, भक्ति से ही प्राप्य आपको नमस्कार; ब्रह्मरूप आपको नमस्कार, विष्णुरूप आपको नमस्कार हो।

श्लोक 45 (skanda.3.56.45)

नमः स्थूलाय सूक्ष्माय अणुरूपाय वै नमः । नमस्ते कामरूपाय सृष्टिस्थित्यंतकारिणे

namaḥ sthūlāya sūkṣmāya aṇurūpāya vai namaḥ namaste kāmarūpāya sṛṣṭisthityaṁtakāriṇe

स्थूल को नमस्कार, सूक्ष्म को नमस्कार, अणुरूप को भी नमस्कार; इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले तथा सृष्टि-स्थिति-प्रलय के कर्ता आपको नमस्कार।

श्लोक 46 (skanda.3.56.46)

नमो नित्याय सौम्याय मृडाय हरये नमः । आतपाय नमस्तुभ्यं नमः शीतकराय च

namo nityāya saumyāya mṛḍāya haraye namaḥ ātapāya namastubhyaṁ namaḥ śītakarāya ca

नित्य, सौम्य तथा मृड को नमस्कार, हरि को नमस्कार; आतप-स्वरूप आपको नमस्कार तथा शीतल किरणोंवाले स्वरूप को भी नमस्कार।

श्लोक 47 (skanda.3.56.47)

सृष्टिरूप नमस्तुभ्यं लोकपाल नमोऽस्तु ते । नम उग्राय भीमाय शांत रूपाय ते नमः

sṛṣṭirūpa namastubhyaṁ lokapāla namo'stu te nama ugrāya bhīmāya śāṁta rūpāya te namaḥ

हे सृष्टिरूप! आपको नमस्कार, हे लोकपाल! आपको नमस्कार; उग्र तथा भीम रूप को नमस्कार, शान्तरूप आपको नमस्कार।

श्लोक 48 (skanda.3.56.48)

नमश्चानंतरूपाय विश्वरूपाय ते नमः । नमो भस्मांगलिप्ताय नमस्ते चंद्रशेखर । नमोऽस्तु पंचवक्त्राय त्रिनेत्राय नमोऽस्तु ते

namaścānaṁtarūpāya viśvarūpāya te namaḥ namo bhasmāṁgaliptāya namaste caṁdraśekhara namo'stu paṁcavaktrāya trinetrāya namo'stu te

अनंतरूप को नमस्कार, विश्वरूप आपको नमस्कार; भस्म से अंगोंवाले को नमस्कार, हे चन्द्रशेखर! आपको नमस्कार; पंचमुख को नमस्कार, त्रिनेत्र आपको नमस्कार हो।

श्लोक 49 (skanda.3.56.49)

नमस्ते व्यालभूषाय कक्षापटधराय च । नमोंऽधकविनाशाय दक्षपापापहारिणे । कामनिर्द्दाहिने तुभ्यं त्रिपुरारे नमोऽस्तु ते

namaste vyālabhūṣāya kakṣāpaṭadharāya ca namoṁ'dhakavināśāya dakṣapāpāpahāriṇe kāmanirddāhine tubhyaṁ tripurāre namo'stu te

सर्पों से विभूषित तथा कक्षा-वस्त्र धारण करनेवाले आपको नमस्कार; अंधकासुर के विनाशक, दक्ष के पाप के हरणकर्ता को नमस्कार; काम को भस्म करनेवाले, हे त्रिपुरारि! आपको नमस्कार हो।

श्लोक 50 (skanda.3.56.50)

चत्वारिंशच्च नामानि मयोक्तानि च यः पठेत् । शुचिर्भूत्वा त्रिकालं तु पठेद्वा शृणुयादपि

catvāriṁśacca nāmāni mayoktāni ca yaḥ paṭhet śucirbhūtvā trikālaṁ tu paṭhedvā śṛṇuyādapi

जो पवित्र होकर मेरे द्वारा कहे गये इन चालीस नामों को त्रिकाल पढ़े, अथवा सुने भी —

श्लोक 51 (skanda.3.56.51)

गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च सुरापो गुरुत ल्पगः । ब्रह्महा हेमहारी च ह्यथवा वृषलीपतिः

goghnaścaiva kṛtaghnaśca surāpo guruta lpagaḥ brahmahā hemahārī ca hyathavā vṛṣalīpatiḥ

— गोहत्यारा, कृतघ्न, सुरापायी, गुरुपत्नीगामी, ब्रह्महत्यारा, स्वर्ण-चोर, अथवा शूद्रा-पति —

श्लोक 52 (skanda.3.56.52)

स्त्रीबालघातकश्चैव पापी चानृतभाषणः । अनाचारी तथा स्तेयी परदाराभिगस्तथा । अकार्यकारी कृत्यघ्नो ब्रह्मद्विड्वाडवाधमः

strībālaghātakaścaiva pāpī cānṛtabhāṣaṇaḥ anācārī tathā steyī paradārābhigastathā akāryakārī kṛtyaghno brahmadviḍvāḍavādhamaḥ

— स्त्री-बालक का हत्यारा, पापी, असत्यभाषी, अनाचारी, चोर, परस्त्रीगामी, अकार्यकारी, सत्कर्मनाशक, ब्रह्मद्वेषी तथा नीच ब्राह्मण —

श्लोक 53 (skanda.3.56.53)

सूत उवाच । इत्येवं बहुभिर्वाक्यैर्धर्मराजेन वै मुहुः । ईडितोऽपि महद्भक्त्या प्रणम्य शिरसा स्वयम्

sūta uvāca ityevaṁ bahubhirvākyairdharmarājena vai muhuḥ īḍito'pi mahadbhaktyā praṇamya śirasā svayam

सूतजी बोले — इस प्रकार धर्मराज द्वारा बारम्बार अनेक वचनों से महती भक्ति से स्तुति किये जाने पर, तथा स्वयं सिर झुककर प्रणाम करने पर —

श्लोक 54 (skanda.3.56.54)

तुष्टः शंभुस्तदा तस्मा उवाचेदं वचः शुभम् । वरं वृणु महाभाग यत्ते मनसि वर्त्तते

tuṣṭaḥ śaṁbhustadā tasmā uvācedaṁ vacaḥ śubham varaṁ vṛṇu mahābhāga yatte manasi varttate

— प्रसन्न होकर शम्भु ने तब उनसे यह शुभ वचन कहा — 'हे महाभाग! जो तुम्हारे मन में है, वह वर माँग लो।'

श्लोक 55 (skanda.3.56.55)

यम उवाच । यदि तुष्टोऽसि देवेश दयां कृत्वा ममोपरि । तं कुरुष्व महाभाग त्रैलोक्यं सचराचरम्

yama uvāca yadi tuṣṭo'si deveśa dayāṁ kṛtvā mamopari taṁ kuruṣva mahābhāga trailokyaṁ sacarācaram

यम ने कहा — हे देवेश! यदि आप मुझ पर दया करके प्रसन्न हैं, तो हे महाभाग! सचराचर त्रैलोक्य को ऐसा कर दीजिये —

श्लोक 56 (skanda.3.56.56)

मन्नाम्ना स्थानमेतद्धि ख्यातं लोके भवेदिति । अच्छेद्यं चाप्यभेद्यं च पुण्यं पापप्रणाशनम्

mannāmnā sthānametaddhi khyātaṁ loke bhavediti acchedyaṁ cāpyabhedyaṁ ca puṇyaṁ pāpapraṇāśanam

— कि यह स्थान लोक में मेरे ही नाम से विख्यात हो; वह अच्छेद्य, अभेद्य, पुण्यमय तथा पाप-नाशक हो।

श्लोक 57 (skanda.3.56.57)

स्थानं कुरु महादेव यदि तुष्टोऽसि मे भव । शिवेन स्थानकं दत्तं काशीतुल्यं तदा नृप । तद्दत्त्वा च पुनः प्राह अन्यं वरय सत्तम

sthānaṁ kuru mahādeva yadi tuṣṭo'si me bhava śivena sthānakaṁ dattaṁ kāśītulyaṁ tadā nṛpa taddattvā ca punaḥ prāha anyaṁ varaya sattama

'हे महादेव! यह स्थान ऐसा बना दीजिये, यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझ पर कृपा कीजिये।' हे राजन्! तब शिव ने काशी के समान वह स्थान प्रदान किया; उसे देकर उन्होंने पुनः कहा — 'हे सत्तम! अन्य वर माँगो।'

श्लोक 58 (skanda.3.56.58)

धर्म उवाच । यदि तुष्टोऽसि देवेश दयां कृत्वा ममोपरि । तं कुरुष्व महाभाग त्रैलोक्यं सचराचरम् । वरेणैवं यथा ख्यातिं गमिष्यामि युगेयुगे

dharma uvāca yadi tuṣṭo'si deveśa dayāṁ kṛtvā mamopari taṁ kuruṣva mahābhāga trailokyaṁ sacarācaram vareṇaivaṁ yathā khyātiṁ gamiṣyāmi yugeyuge

धर्मदेव ने कहा — हे देवेश! यदि आप मुझ पर दया करके प्रसन्न हैं, तो हे महाभाग! ऐसा वर दीजिये, जिससे सचराचर त्रैलोक्य में मेरी ख्याति युग-युग में बनी रहे।

श्लोक 59 (skanda.3.56.59)

ईश्वर उवाच । ब्रूहि कीनाश तत्सर्वं प्रकरोमि तवेप्सितम् । तपसा तोषितोऽहं वै ददामि वरमीप्सितम्

īśvara uvāca brūhi kīnāśa tatsarvaṁ prakaromi tavepsitam tapasā toṣito'haṁ vai dadāmi varamīpsitam

ईश्वर ने कहा — हे कीनाश! वह सब कहो, मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा। तुम्हारे तप से प्रसन्न होकर मैं वांछित वर देता हूँ।

श्लोक 60 (skanda.3.56.60)

यम उवाच । यदि मे वांछितं देव ददासि तर्हि शंकर । अस्मिन्स्थाने महाक्षेत्रे मन्नामा भव सर्वदा

yama uvāca yadi me vāṁchitaṁ deva dadāsi tarhi śaṁkara asminsthāne mahākṣetre mannāmā bhava sarvadā

यम ने कहा — हे देव! यदि आप मेरी इच्छा पूर्ण करते हैं, तो हे शंकर! इस महाक्षेत्र में सदा मेरे ही नाम से रहिये।

श्लोक 61 (skanda.3.56.61)

धर्मारण्यमिति ख्यातिस्त्रैलोक्ये सचराचरे । यथा संजायते देव तथा कुरु महेश्वर

dharmāraṇyamiti khyātistrailokye sacarācare yathā saṁjāyate deva tathā kuru maheśvara

हे देव! जिस प्रकार 'धर्मारण्य' की ख्याति सचराचर त्रैलोक्य में फैले, हे महेश्वर! वैसा ही कीजिये।

श्लोक 62 (skanda.3.56.62)

ईश्वर उवाच । धर्मारण्यमिदं ख्यातं सदा भूयाद्युगेयुगे । त्वन्नाम्ना स्थापितं देव ख्यातिमेतद्गमिष्यति । अथान्यदपि यत्किंचित्करोम्येष वदस्व तत

īśvara uvāca dharmāraṇyamidaṁ khyātaṁ sadā bhūyādyugeyuge tvannāmnā sthāpitaṁ deva khyātimetadgamiṣyati athānyadapi yatkiṁcitkaromyeṣa vadasva tata

ईश्वर ने कहा — यह सदा युग-युग में 'धर्मारण्य' नाम से विख्यात हो; हे देव! तुम्हारे नाम से स्थापित होकर यह उस ख्याति को प्राप्त करेगा। अब और भी जो कुछ करना हो, वह बताओ।

श्लोक 63 (skanda.3.56.63)

यम उवाच । योजनद्वयविस्तीर्णं मन्नाम्ना तीर्थमुत्तमम् । मुक्तेश्च शाश्वतं स्थानं पावनं सर्वदेहिनाम्

yama uvāca yojanadvayavistīrṇaṁ mannāmnā tīrthamuttamam mukteśca śāśvataṁ sthānaṁ pāvanaṁ sarvadehinām

यम ने कहा — दो योजन विस्तृत, मेरे नाम का एक उत्तम तीर्थ हो — जो समस्त प्राणियों के लिए मुक्ति का शाश्वत तथा पवित्र स्थान हो।

श्लोक 64 (skanda.3.56.64)

मक्षिकाः कीटकाश्चैव पशुपक्षिमृगादयः । पतंगा भूतवेताला पिशाचोरगराक्षसाः

makṣikāḥ kīṭakāścaiva paśupakṣimṛgādayaḥ pataṁgā bhūtavetālā piśācoragarākṣasāḥ

मक्खियाँ, कीट, पशु-पक्षी-मृगादि; पतंगे, भूत-बेताल, पिशाच, सर्प तथा राक्षस —

श्लोक 65 (skanda.3.56.65)

नारी वाथ नरो वाथ मत्क्षेत्रे धर्मसंज्ञके । त्यजते यः प्रियान्प्राणान्मुक्तिर्भवतु शाश्वती

nārī vātha naro vātha matkṣetre dharmasaṁjñake tyajate yaḥ priyānprāṇānmuktirbhavatu śāśvatī

— स्त्री हो अथवा पुरुष, जो कोई भी धर्म नामक मेरे क्षेत्र में अपने प्रिय प्राणों का त्याग करे, उसे शाश्वत मुक्ति प्राप्त हो।

श्लोक 66 (skanda.3.56.66)

एवमस्त्विति सर्वोपि देवा ब्रह्मादयस्तथा । पुष्पवृष्टिं प्रकुर्वाणाः परं हर्षमवा्प्नुयुः

evamastviti sarvopi devā brahmādayastathā puṣpavṛṣṭiṁ prakurvāṇāḥ paraṁ harṣamavāpnuyuḥ

'ऐसा ही हो,' यह कहकर ब्रह्मा आदि सभी देवगण पुष्पवर्षा करते हुए परम हर्ष को प्राप्त हुए।

श्लोक 67 (skanda.3.56.67)

देवदुंदुभयो नेदुर्गंधर्वपतयो जगुः । ववुः पुण्यास्तथा वाता ननृतुश्चाप्सरो गणाः

devaduṁdubhayo nedurgaṁdharvapatayo jaguḥ vavuḥ puṇyāstathā vātā nanṛtuścāpsaro gaṇāḥ

दिव्य दुन्दुभियाँ बज उठीं, गन्धर्वपतियों ने गान किया, पुण्य वायु बहने लगी, तथा अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे।

श्लोक 68 (skanda.3.56.68)

सूत उवाच । यमेन तपसा भक्त्या तोषितो हि सदाशिवः । उवाच वचनं देवं रम्यं साधुमनोरमम्

sūta uvāca yamena tapasā bhaktyā toṣito hi sadāśivaḥ uvāca vacanaṁ devaṁ ramyaṁ sādhumanoramam

सूतजी बोले — यम की तपस्या तथा भक्ति से प्रसन्न होकर सदाशिव ने उन देव से रमणीय, साधु तथा मनोहर वचन कहे।

श्लोक 69 (skanda.3.56.69)

अनुज्ञां देहि मे तात यथा गच्छामि सत्वरम् । कैलासं पर्वतश्रेष्ठं देवानां हितकाम्यया

anujñāṁ dehi me tāta yathā gacchāmi satvaram kailāsaṁ parvataśreṣṭhaṁ devānāṁ hitakāmyayā

शिव ने कहा — 'हे तात! मुझे अनुमति दो, ताकि मैं देवताओं के हित की कामना से शीघ्र ही कैलास पर्वत को जा सकूँ।'

श्लोक 70 (skanda.3.56.70)

यम उवाच । न मे स्थानं परित्यक्तुं त्वया युक्तं महेश्वर । कैलासादधिकं देव जायते वचनादिदम्

yama uvāca na me sthānaṁ parityaktuṁ tvayā yuktaṁ maheśvara kailāsādadhikaṁ deva jāyate vacanādidam

यम ने कहा — हे महेश्वर! आपके लिए मेरे स्थान को त्यागना उचित नहीं है; हे देव! इस वचन से ही यह स्थान कैलास से भी अधिक हो जाता है।

श्लोक 71 (skanda.3.56.71)

शिव उवाच । साधु प्रोक्तं त्वया युक्तमेकांशेनात्र मे स्थितिः । न मया त्यजितं साधु स्थानं तव सुनिर्मलम्

śiva uvāca sādhu proktaṁ tvayā yuktamekāṁśenātra me sthitiḥ na mayā tyajitaṁ sādhu sthānaṁ tava sunirmalam

शिव ने कहा — तुमने उचित और अच्छी बात कही है; अपने एक अंश से मेरी स्थिति यहाँ रहेगी। अच्छा, मैंने तुम्हारे इस अत्यंत निर्मल स्थान को नहीं त्यागा।

श्लोक 72 (skanda.3.56.72)

विश्वेश्वरं महालिंगं मन्नाम्नात्र भविष्यति । एवमुक्त्वा महादेवस्तत्रैवांतरधीयत

viśveśvaraṁ mahāliṁgaṁ mannāmnātra bhaviṣyati evamuktvā mahādevastatraivāṁtaradhīyata

'विश्वेश्वर नामक एक महालिंग यहाँ मेरे ही नाम से स्थापित होगा।' ऐसा कहकर महादेव वहीं अन्तर्धान हो गये।

श्लोक 73 (skanda.3.56.73)

शिवस्य वचनात्तत्र तदा लिंगं तदद्भुतम् । तं दृष्ट्वा च सुरैस्तत्र यथानामानुकीर्त्तनम्

śivasya vacanāttatra tadā liṁgaṁ tadadbhutam taṁ dṛṣṭvā ca suraistatra yathānāmānukīrttanam

शिव के वचन से वहाँ तब वह अद्भुत लिंग प्रकट हुआ; उसे देखकर वहाँ देवताओं ने अपने-अपने नाम के अनुसार —

श्लोक 74 (skanda.3.56.74)

स्वंस्वं लिंगं तदा सृष्टं धर्मारण्ये सुरोत्तमैः । यस्य देवस्य यल्लिंगं तन्नाम्ना परिकीर्तितम्

svaṁsvaṁ liṁgaṁ tadā sṛṣṭaṁ dharmāraṇye surottamaiḥ yasya devasya yalliṁgaṁ tannāmnā parikīrtitam

— धर्मारण्य में श्रेष्ठ देवताओं ने तब अपना-अपना लिंग स्थापित किया; जिस देवता का जो लिंग था, वह उसी नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 75 (skanda.3.56.75)

सूत उवाच । धर्मेण स्थापितं लिंगं धर्मेश्वरमुपस्थितम् । स्मरणात्पूजनात्तस्य सर्वपापैः प्रमुच्यते

sūta uvāca dharmeṇa sthāpitaṁ liṁgaṁ dharmeśvaramupasthitam smaraṇātpūjanāttasya sarvapāpaiḥ pramucyate

सूतजी बोले — धर्मदेव द्वारा स्थापित 'धर्मेश्वर' लिंग वहाँ विद्यमान है; उसके स्मरण तथा पूजन से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 76 (skanda.3.56.76)

यद्ब्रह्म योगिनां गम्यं सर्वेषां हृदये स्थितम् । तिष्ठते यस्य लिंगं तु स्वयंभुवमिति स्थितम्

yadbrahma yogināṁ gamyaṁ sarveṣāṁ hṛdaye sthitam tiṣṭhate yasya liṁgaṁ tu svayaṁbhuvamiti sthitam

जो ब्रह्म योगियों के लिए गम्य है, तथा सबके हृदय में स्थित है — जिसका लिंग वहाँ स्वयंभू के नाम से स्थित है।

श्लोक 77 (skanda.3.56.77)

भूतनाथं च संपूज्य व्याधिभिर्मुच्यते जनः । धर्मवापीं ततश्चैव चक्रे तत्र मनोरमाम्

bhūtanāthaṁ ca saṁpūjya vyādhibhirmucyate janaḥ dharmavāpīṁ tataścaiva cakre tatra manoramām

भूतनाथ की पूजा करने से मनुष्य रोगों से मुक्त हो जाता है। तत्पश्चात् उन्होंने वहाँ एक मनोरम बावली, धर्मवापी, भी बनवायी।

श्लोक 78 (skanda.3.56.78)

आहत्य कोटितीर्थानां जलं वाप्यां मुमोच ह । यमतीर्थस्वरूपं च स्नानं कृत्वा मनोरमम्

āhatya koṭitīrthānāṁ jalaṁ vāpyāṁ mumoca ha yamatīrthasvarūpaṁ ca snānaṁ kṛtvā manoramam

उन्होंने करोड़ों तीर्थों का जल लाकर उस बावली में डाला; तथा वहाँ यमतीर्थ-स्वरूप उस मनोरम जल में स्नान करके —

श्लोक 79 (skanda.3.56.79)

स्नानार्थं देवतानां च ऋषीणां भावितात्मनाम् । तत्र स्नात्वा च पीत्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते

snānārthaṁ devatānāṁ ca ṛṣīṇāṁ bhāvitātmanām tatra snātvā ca pītvā ca sarvapāpaiḥ pramucyate

— वह देवताओं तथा भावितात्मा ऋषियों के स्नान के लिए हो गयी। वहाँ स्नान करके तथा जल पीकर मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 80 (skanda.3.56.80)

धर्मवाप्यां नरः स्नात्वा दृष्ट्वा धर्मेश्वरं शिवम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो न मातुर्गर्भमाविशेत्

dharmavāpyāṁ naraḥ snātvā dṛṣṭvā dharmeśvaraṁ śivam mucyate sarvapāpebhyo na māturgarbhamāviśet

धर्मवापी में स्नान करके तथा धर्मेश्वर शिव का दर्शन करके मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और पुनः माता के गर्भ में प्रवेश नहीं करता।

श्लोक 81 (skanda.3.56.81)

तत्र स्नात्वा नरो यस्तु करोति यमतर्पणम् । व्याधिदोषविनाशार्थं क्लेशदोषोप शांतये । यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चांतकाय च । वैवस्वताय कालाय दध्नाय परमेष्ठिने

tatra snātvā naro yastu karoti yamatarpaṇam vyādhidoṣavināśārthaṁ kleśadoṣopa śāṁtaye yamāya dharmarājāya mṛtyave cāṁtakāya ca vaivasvatāya kālāya dadhnāya parameṣṭhine

वहाँ स्नान करके जो मनुष्य यम-तर्पण करता है, व्याधि-दोष के नाश तथा क्लेश-दोष की शान्ति के लिए — यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, दध्न तथा परमेष्ठी को —

श्लोक 82 (skanda.3.56.82)

वृकोदराय वृकाय दक्षिणेशाय ते नमः । नीलाय चित्रगुप्ताय चित्र वैचित्र ते नमः

vṛkodarāya vṛkāya dakṣiṇeśāya te namaḥ nīlāya citraguptāya citra vaicitra te namaḥ

— वृकोदर, वृक तथा दक्षिणेश को नमस्कार; नील, चित्रगुप्त, चित्र तथा वैचित्र को नमस्कार —

श्लोक 83 (skanda.3.56.83)

यमार्थं तर्पणं यो वै धर्मवाप्यां करिष्यति । साक्षतैर्नामभिश्चैतैस्तस्य नोपद्रवो भवेत्

yamārthaṁ tarpaṇaṁ yo vai dharmavāpyāṁ kariṣyati sākṣatairnāmabhiścaitaistasya nopadravo bhavet

— जो कोई भी धर्मवापी में अक्षत तथा इन नामों के साथ यम के लिए तर्पण करेगा, उसे कोई उपद्रव नहीं होगा।

श्लोक 84 (skanda.3.56.84)

एकांतरस्तृतीयस्तु ज्वरश्चातुर्थिकस्तथा । वेलायां जायते यस्तु ज्वरः शीतज्वरस्तथा

ekāṁtarastṛtīyastu jvaraścāturthikastathā velāyāṁ jāyate yastu jvaraḥ śītajvarastathā

एकांतर ज्वर, तृतीयक ज्वर, चातुर्थिक ज्वर, अथवा नियत समय पर आनेवाला ज्वर, तथा शीत-ज्वर भी —

श्लोक 85 (skanda.3.56.85)

पीडयन्ति न चैतस्य यस्यैवो मतिरीदृशी । रेवत्यादिग्रहा दोषा डाकिनी शाकिनी तथा

pīḍayanti na caitasya yasyaivo matirīdṛśī revatyādigrahā doṣā ḍākinī śākinī tathā

— ऐसी बुद्धिवाले व्यक्ति को ये पीड़ित नहीं करते; रेवती आदि ग्रहों के दोष, डाकिनी तथा शाकिनी भी —

श्लोक 86 (skanda.3.56.86)

धनधान्यसमृद्धिः स्यात्संततिर्वर्धते सदा । भूतेश्वरं तु संपूज्य सुस्नातो विजितेंद्रियः

dhanadhānyasamṛddhiḥ syātsaṁtatirvardhate sadā bhūteśvaraṁ tu saṁpūjya susnāto vijiteṁdriyaḥ

— नहीं सताते। उसके धन-धान्य की समृद्धि होती है, संतान सदा बढ़ती है; भलीभाँति स्नान करके तथा जितेन्द्रिय होकर भूतेश्वर की पूजा करके —

श्लोक 87 (skanda.3.56.87)

सांगं रुद्रजपं कृत्वा व्याधिदोषात्प्रमुच्यते । अमावास्यां सोमदिने व्यतीपाते च वैधृतौ । संक्रांतौ ग्रहणे चैव तत्र श्राद्धं स्मृतं नृणाम्

sāṁgaṁ rudrajapaṁ kṛtvā vyādhidoṣātpramucyate amāvāsyāṁ somadine vyatīpāte ca vaidhṛtau saṁkrāṁtau grahaṇe caiva tatra śrāddhaṁ smṛtaṁ nṛṇām

— तथा सांग रुद्र-जप करके मनुष्य व्याधि-दोष से मुक्त हो जाता है। अमावस्या, सोमवार, व्यतीपात, वैधृति, संक्रान्ति तथा ग्रहणकाल में वहाँ किया गया श्राद्ध मनुष्यों के लिए विशेष फलदायी कहा गया है।

श्लोक 88 (skanda.3.56.88)

श्राद्धं कृतं तेन समाः सहस्रं निरस्य चैतत्पितरस्त्वदंति । पानीयमेवापि तिलैर्विमिश्रितं ददाति यो वै प्रथितो मनुष्यः

śrāddhaṁ kṛtaṁ tena samāḥ sahasraṁ nirasya caitatpitarastvadaṁti pānīyamevāpi tilairvimiśritaṁ dadāti yo vai prathito manuṣyaḥ

वहाँ किये गये श्राद्ध को पितृगण एक सहस्र वर्षों तक ग्रहण करते हैं, अन्य को त्यागकर; और जो प्रसिद्ध मनुष्य तिलमिश्रित जल भी वहाँ अर्पित करता है —

श्लोक 89 (skanda.3.56.89)

एकविंशतिवारैस्तु गयायां पिंडदानतः । धर्मेश्वरे सकृद्दत्तं पितॄणां चाक्षयं भवेत्

ekaviṁśativāraistu gayāyāṁ piṁḍadānataḥ dharmeśvare sakṛddattaṁ pitṝṇāṁ cākṣayaṁ bhavet

— वह गया में इक्कीस बार पिण्डदान करने के समान फलदायी है। धर्मेश्वर में एक बार भी दिया गया दान पितरों के लिए अक्षय हो जाता है।

श्लोक 90 (skanda.3.56.90)

धर्मेशात्पश्चिमे भागे विश्वेश्वरांतरेपि वा । धर्मवापीति विख्याता स्वर्गसोपानदायिनी

dharmeśātpaścime bhāge viśveśvarāṁtarepi vā dharmavāpīti vikhyātā svargasopānadāyinī

धर्मेश के पश्चिम भाग में, अथवा विश्वेश्वर के मध्य में भी, धर्मवापी नाम से विख्यात वह बावली स्वर्ग की सीढ़ी प्रदान करनेवाली है।

श्लोक 91 (skanda.3.56.91)

धर्मेण निर्मिता पूर्वं शिवार्थं धर्मबुद्धिना । तत्र स्नात्वा च पीत्वा च तर्पिताः पितृदेवताः

dharmeṇa nirmitā pūrvaṁ śivārthaṁ dharmabuddhinā tatra snātvā ca pītvā ca tarpitāḥ pitṛdevatāḥ

यह पूर्वकाल में धर्मबुद्धि धर्मदेव द्वारा शिव के लिए निर्मित की गयी थी; वहाँ स्नान करके तथा जल पीकर पितृगण और देवगण तृप्त होते हैं।

श्लोक 92 (skanda.3.56.92)

शमीपत्रप्रमाणं तु पिंडं दद्याच्च यो नरः । धर्मवाप्यां महापुण्यां गर्भवासं न चाप्नुयात्

śamīpatrapramāṇaṁ tu piṁḍaṁ dadyācca yo naraḥ dharmavāpyāṁ mahāpuṇyāṁ garbhavāsaṁ na cāpnuyāt

जो मनुष्य महापुण्यमयी धर्मवापी में शमी-पत्र के बराबर भी पिण्ड अर्पित करता है, वह पुनः गर्भवास को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 93 (skanda.3.56.93)

कुम्भीपाकान्महारौद्राद्रौरवान्नरकात्पुनः । अंधतामिस्रकाद्राजन्मुच्यते नात्र संशयः

kumbhīpākānmahāraudrādrauravānnarakātpunaḥ aṁdhatāmisrakādrājanmucyate nātra saṁśayaḥ

हे राजन्! वह कुंभीपाक, महारौद्र रौरव तथा अंधतामिस्र नरक से मुक्त हो जाता है — इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 94 (skanda.3.56.94)

सूत उवाच । एकवर्षं तर्पणीयं धर्मवाप्यां नरोत्तमः । ऋतौ मासे च पक्षे च विपरीतं च जायते

sūta uvāca ekavarṣaṁ tarpaṇīyaṁ dharmavāpyāṁ narottamaḥ ṛtau māse ca pakṣe ca viparītaṁ ca jāyate

सूतजी बोले — श्रेष्ठ मनुष्य को एक वर्ष तक धर्मवापी में तर्पण करना चाहिए; परिस्थितिभेद से यह फल एक ऋतु, एक मास अथवा एक पक्ष में भी प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 95 (skanda.3.56.95)

बर्हिषदोऽग्निष्वात्ताश्च आज्यपाः सोमपास्तथा । तृप्तिं प्रयांति परमां वाप्यां वै तर्पणेन तु

barhiṣado'gniṣvāttāśca ājyapāḥ somapāstathā tṛptiṁ prayāṁti paramāṁ vāpyāṁ vai tarpaṇena tu

बर्हिषद्, अग्निष्वात्त, आज्यप तथा सोमप पितृ-गण उस बावली में तर्पण से परम तृप्ति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 96 (skanda.3.56.96)

कुरुक्षेत्रादि क्षेत्राणि अयोध्यादिपुरस्तथा । पुष्कराद्यानि सर्वाणि मुक्तिनामानि संति वै

kurukṣetrādi kṣetrāṇi ayodhyādipurastathā puṣkarādyāni sarvāṇi muktināmāni saṁti vai

कुरुक्षेत्र आदि क्षेत्र, अयोध्या आदि नगर, तथा पुष्कर आदि समस्त तीर्थ — ये सब मुक्ति देनेवाले कहे गये हैं।

श्लोक 97 (skanda.3.56.97)

तानि सर्वाणि तुल्यानि धर्मकूपोऽधिको भवेत् । मन्त्रो वेदास्तथा यज्ञा दानानि च व्रतानि च

tāni sarvāṇi tulyāni dharmakūpo'dhiko bhavet mantro vedāstathā yajñā dānāni ca vratāni ca

वे सभी परस्पर समान हैं; किन्तु धर्मकूप उनसे भी अधिक है। मन्त्र, वेद, यज्ञ, दान तथा व्रत —

श्लोक 98 (skanda.3.56.98)

अक्षयाणि प्रजायंते दत्त्वा जप्त्वा नरेश्वर । अभिचाराश्च ये चान्ये सुसिद्धाथर्ववेदजाः

akṣayāṇi prajāyaṁte dattvā japtvā nareśvara abhicārāśca ye cānye susiddhātharvavedajāḥ

— हे नरेश्वर! वहाँ दिये गये अथवा जपे गये अक्षय हो जाते हैं। तथा अथर्ववेद से उत्पन्न जो भी अन्य सुसिद्ध अभिचार-कर्म हैं —

श्लोक 99 (skanda.3.56.99)

ते सर्वे सिद्धिमायांति तस्मिन्स्थाने कृता अपि । आदितीर्थं नृपश्रेष्ठ काजेशैरुपसेवितम्

te sarve siddhimāyāṁti tasminsthāne kṛtā api āditīrthaṁ nṛpaśreṣṭha kājeśairupasevitam

— वे सब उस स्थान में किये जाने पर भी सिद्धि को प्राप्त होते हैं। हे नृपश्रेष्ठ! यह आदि-तीर्थ है, जो काजेश देवताओं द्वारा सेवित है।

श्लोक 100 (skanda.3.56.100)

सिद्धिस्थानं सुसौम्यं च ब्रह्माद्यैरपि सेवि तम् । कृते तु युगपर्यंतं त्रेतायां लक्षपञ्चकम्

siddhisthānaṁ susaumyaṁ ca brahmādyairapi sevi tam kṛte tu yugaparyaṁtaṁ tretāyāṁ lakṣapañcakam

यह सिद्धिस्थान अत्यंत सौम्य है, ब्रह्मा आदि द्वारा भी सेवित है। कृतयुग में इसका फल सम्पूर्ण युग तक, त्रेतायुग में पाँच लाख वर्षों तक —

श्लोक 101 (skanda.3.56.101)

द्वापरे लक्षमेकं तु दिनैकेन फलं कलौ । एतदुक्तं मया ब्रह्मन्धर्मारण्यस्य वर्णनम् । फलं चैवात्र सर्वं हि उक्तं द्वैपायनेन तु

dvāpare lakṣamekaṁ tu dinaikena phalaṁ kalau etaduktaṁ mayā brahmandharmāraṇyasya varṇanam phalaṁ caivātra sarvaṁ hi uktaṁ dvaipāyanena tu

— द्वापरयुग में एक लाख वर्षों तक, तथा कलियुग में एक ही दिन में फल मिलता है। हे ब्रह्मन्! यह मैंने आपको धर्मारण्य का वर्णन कहा है; तथा इसका सम्पूर्ण फल स्वयं द्वैपायन द्वारा ही कहा गया है।

श्लोक 102 (skanda.3.56.102)

सूत उवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि धर्मवाक्यं मनोरमम् । देवानां हितकामाय आज्ञाप्य च यदुक्तवान्

sūta uvāca ataḥ paraṁ pravakṣyāmi dharmavākyaṁ manoramam devānāṁ hitakāmāya ājñāpya ca yaduktavān

सूतजी बोले — इसके पश्चात् मैं धर्मदेव के मनोरम वचन कहूँगा, जो उन्होंने देवताओं के हित की कामना से आज्ञा के रूप में कहे थे।

श्लोक 103 (skanda.3.56.103)

धर्म उवाच । अस्मिन्क्षेत्रे प्रकुर्वंति विष्णुमायाविमोहिताः । पारदार्यं महादुष्टं स्वर्णस्तेयादिकं तथा

dharma uvāca asminkṣetre prakurvaṁti viṣṇumāyāvimohitāḥ pāradāryaṁ mahāduṣṭaṁ svarṇasteyādikaṁ tathā

धर्मदेव ने कहा — इस क्षेत्र में विष्णु की माया से मोहित लोग परस्त्रीगमन जैसा महादुष्ट कर्म, तथा स्वर्ण-चोरी आदि भी करते हैं —

श्लोक 104 (skanda.3.56.104)

अन्यच्च विकृतं सर्वं कुर्वाणो नरकं व्रजेत् । अन्यक्षेत्रे कृतं पापं धर्मारण्ये विनश्यति

anyacca vikṛtaṁ sarvaṁ kurvāṇo narakaṁ vrajet anyakṣetre kṛtaṁ pāpaṁ dharmāraṇye vinaśyati

— और जो भी अन्य विकृत कर्म करता है, वह नरक को जाता है। अन्य क्षेत्र में किया गया पाप धर्मारण्य में आकर नष्ट हो जाता है —

श्लोक 105 (skanda.3.56.105)

धर्मारण्ये कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति । यथा पुण्यं तथा पापं यत्किंचिच्च शुभाशुभम्

dharmāraṇye kṛtaṁ pāpaṁ vajralepo bhaviṣyati yathā puṇyaṁ tathā pāpaṁ yatkiṁcicca śubhāśubham

— किन्तु धर्मारण्य में स्वयं किया गया पाप वज्रलेप के समान अमिट हो जाता है। जैसे पुण्य होता है, वैसे ही पाप — जो कुछ भी शुभ-अशुभ होता है —

श्लोक 106 (skanda.3.56.106)

तत्सर्वं वर्द्धते नित्यं वर्षाणि शतमित्युत । कामिनां कामदं पुण्य योगिनां मुक्तिदायकम्

tatsarvaṁ varddhate nityaṁ varṣāṇi śatamityuta kāmināṁ kāmadaṁ puṇya yogināṁ muktidāyakam

— वह सब निरन्तर सौ वर्षों तक बढ़ता रहता है। यह स्थान कामी पुरुषों के लिए काम-प्रदायक पुण्य है, तथा योगियों के लिए मुक्तिदायक है।

श्लोक 107 (skanda.3.56.107)

सिद्धानां सिद्धिदं प्रोक्तं धर्मारण्यं तु सर्वदा । अपुत्रो लभते पुत्रान्निर्धनो धनवान्भवेत्

siddhānāṁ siddhidaṁ proktaṁ dharmāraṇyaṁ tu sarvadā aputro labhate putrānnirdhano dhanavānbhavet

धर्मारण्य सिद्धों को सदा सिद्धि देनेवाला कहा गया है; निपुत्र पुत्र प्राप्त करता है, निर्धन धनवान् हो जाता है।

श्लोक 108 (skanda.3.56.108)

एतदाख्यानकं पुण्यं धर्मेण कथितं पुरा । यः शृणोति नरो भक्त्या नारी वा श्रावयेत्तु यः । गोसहस्रफलं तस्य अंते हरिपुरं ब्रजेत्

etadākhyānakaṁ puṇyaṁ dharmeṇa kathitaṁ purā yaḥ śṛṇoti naro bhaktyā nārī vā śrāvayettu yaḥ gosahasraphalaṁ tasya aṁte haripuraṁ brajet

यह पुण्य आख्यान पूर्वकाल में धर्मदेव द्वारा कहा गया था; जो पुरुष अथवा स्त्री इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, अथवा जो इसे सुनाता है, उसे सहस्र गौओं के दान का फल प्राप्त होता है, तथा अंत में वह हरिधाम को जाता है।

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