ब्रह्म खण्ड · अध्याय 57
सदाचार-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.3.57.1)
व्यास उवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि धर्मारण्यनिवासिना । यत्कार्यं पुरुषेणेह गार्हस्थ्यमनुतिष्ठता
vyāsa uvāca ataḥ paraṁ pravakṣyāmi dharmāraṇyanivāsinā yatkāryaṁ puruṣeṇeha gārhasthyamanutiṣṭhatā
व्यासजी बोले — अब इसके आगे मैं यह बताऊँगा कि धर्मारण्य में निवास करने वाले, गृहस्थाश्रम का पालन करने वाले पुरुष को यहाँ क्या करना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.3.57.2)
धर्मारण्येषु ये जाता ब्राह्मणाः शुद्धवंशजाः । अष्टादशसहस्राश्च काजेशैश्च विनिर्मिताः
dharmāraṇyeṣu ye jātā brāhmaṇāḥ śuddhavaṁśajāḥ aṣṭādaśasahasrāśca kājeśaiśca vinirmitāḥ
धर्मारण्य में उत्पन्न जो शुद्ध वंश वाले ब्राह्मण हैं, वे अठारह सहस्र की संख्या में काजेश देवताओं द्वारा रचे गये हैं।
श्लोक 3 (skanda.3.57.3)
सदाचाराः पवित्राश्च ब्राह्मणा ब्रह्मवित्तमाः । तेषां दर्शनमात्रेण महापापैर्विमुच्यते
sadācārāḥ pavitrāśca brāhmaṇā brahmavittamāḥ teṣāṁ darśanamātreṇa mahāpāpairvimucyate
वे ब्राह्मण सदाचारी, पवित्र तथा ब्रह्मज्ञान में श्रेष्ठ हैं; उनके मात्र दर्शन से ही मनुष्य महापापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 4 (skanda.3.57.4)
युधिष्ठिर उवाच । पाराशर्य समाख्याहि सदाचारं च मे प्रभो । आचाराद्धर्ममाप्नोति आचाराल्लभते फलम् । आचाराच्छ्रियमाप्नोति तदाचारं वदस्व मे
yudhiṣṭhira uvāca pārāśarya samākhyāhi sadācāraṁ ca me prabho ācārāddharmamāpnoti ācārāllabhate phalam ācārācchriyamāpnoti tadācāraṁ vadasva me
युधिष्ठिर बोले — हे पाराशर्य! हे प्रभो! मुझे सदाचार के विषय में बताइये। आचार से मनुष्य धर्म प्राप्त करता है, आचार से फल पाता है, आचार से ही श्री (सम्पत्ति) प्राप्त करता है — अतः वह आचार मुझसे कहिये।
श्लोक 5 (skanda.3.57.5)
व्यास उवाच । स्थावराः कृमयोऽब्जाश्च पक्षिणः पशवो नराः । क्रमेण धार्मिकास्त्वेत एतेभ्यो धार्मिकाः सुराः
vyāsa uvāca sthāvarāḥ kṛmayo'bjāśca pakṣiṇaḥ paśavo narāḥ krameṇa dhārmikāstveta etebhyo dhārmikāḥ surāḥ
व्यासजी बोले — स्थावर (जड़ पदार्थ), कृमि, जलजीव, पक्षी, पशु और मनुष्य — ये क्रमशः अधिकाधिक धर्मशील हैं, और इनसे भी अधिक धर्मशील देवता हैं।
श्लोक 6 (skanda.3.57.6)
सहस्रभागात्प्रथमे द्वितीयानुक्रमास्तथा । सर्व एते महाभागाः पापान्मुक्तिसमाश्रयाः
sahasrabhāgātprathame dvitīyānukramāstathā sarva ete mahābhāgāḥ pāpānmuktisamāśrayāḥ
प्रथम की अपेक्षा दूसरे में धर्म सहस्रगुणा क्रम से बढ़ता जाता है; ये सभी महाभाग्यशाली प्राणी पाप से मुक्ति के आश्रयभूत हैं।
श्लोक 7 (skanda.3.57.7)
चतुर्णामपि भूतानां प्राणिनोऽतीव चोत्तमाः । प्राणिकेभ्योऽपि मुनिश्रेष्ठाः सर्वे बुद्ध्युपजीविनः
caturṇāmapi bhūtānāṁ prāṇino'tīva cottamāḥ prāṇikebhyo'pi muniśreṣṭhāḥ sarve buddhyupajīvinaḥ
चारों प्रकार की उत्पत्ति वाले प्राणियों में भी बुद्धिजीवी प्राणी अत्यंत श्रेष्ठ होते हैं, और उन बुद्धिजीवी प्राणियों में भी मुनिजन सर्वश्रेष्ठ हैं।
श्लोक 8 (skanda.3.57.8)
मतिमद्भ्यो नराः श्रेष्ठास्तेभ्यः श्रेष्ठास्तु वाडवाः । विप्रेभ्योऽपि च विद्वांसो विद्वद्भ्यः कृतबुद्धयः
matimadbhyo narāḥ śreṣṭhāstebhyaḥ śreṣṭhāstu vāḍavāḥ viprebhyo'pi ca vidvāṁso vidvadbhyaḥ kṛtabuddhayaḥ
बुद्धिमान प्राणियों में मनुष्य श्रेष्ठ हैं, मनुष्यों में भी ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं; ब्राह्मणों में भी विद्वान श्रेष्ठ हैं, और विद्वानों में भी परिपक्व बुद्धि वाले श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 9 (skanda.3.57.9)
कृतधीभ्योऽपि कर्तारः कर्तृभ्यो ब्रह्मतत्पराः । न तेभ्योऽभ्यधिकः कश्चित्त्रिषु लोकेषु भारत
kṛtadhībhyo'pi kartāraḥ kartṛbhyo brahmatatparāḥ na tebhyo'bhyadhikaḥ kaścittriṣu lokeṣu bhārata
मतिमानों से भी श्रेष्ठ कर्म करने वाले हैं, और कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ वे हैं जो ब्रह्म में तत्पर हैं। हे भारत! तीनों लोकों में उनसे अधिक श्रेष्ठ कोई नहीं है।
श्लोक 10 (skanda.3.57.10)
अन्योन्यपूजकास्ते वै तपोविद्याविशेषतः । ब्राह्मणो ब्रह्मणा सृष्टः सर्वभूतेश्वरो यतः
anyonyapūjakāste vai tapovidyāviśeṣataḥ brāhmaṇo brahmaṇā sṛṣṭaḥ sarvabhūteśvaro yataḥ
वे परस्पर एक-दूसरे की पूजा करते हैं, विशेषतः तप और विद्या के अनुसार; क्योंकि ब्राह्मण ब्रह्मा द्वारा रचा गया है, इसलिए वह समस्त प्राणियों का स्वामी है।
श्लोक 11 (skanda.3.57.11)
अतो जगत्स्थितं सर्वं ब्राह्मणोऽर्हति नापरः । सदाचारो हि सर्वार्हो नाचाराद्विच्युतः पुनः
ato jagatsthitaṁ sarvaṁ brāhmaṇo'rhati nāparaḥ sadācāro hi sarvārho nācārādvicyutaḥ punaḥ
इसलिए इस सम्पूर्ण संसार में स्थित सब कुछ के योग्य ब्राह्मण ही है, अन्य कोई नहीं; क्योंकि सदाचार ही सर्वथा आदरणीय है, और उससे च्युत हुआ पुरुष पुनः वैसा आदर नहीं पाता।
श्लोक 12 (skanda.3.57.12)
तस्माद्विप्रेण सततं भाव्यमाचारशीलिना । विद्वेषरागरहिता अनुतिष्ठन्ति यं मुने
tasmādvipreṇa satataṁ bhāvyamācāraśīlinā vidveṣarāgarahitā anutiṣṭhanti yaṁ mune
इसलिए ब्राह्मण को सदा सदाचार-शील बने रहना चाहिए, जिसका पालन राग-द्वेष से रहित सज्जन करते हैं, हे मुने!
श्लोक 13 (skanda.3.57.13)
सद्धि यस्तं सदाचारं धर्ममूलं विदुर्बुधाः । लक्षणैः परिहीनोऽपि सम्यगाचारतत्परः
saddhi yastaṁ sadācāraṁ dharmamūlaṁ vidurbudhāḥ lakṣaṇaiḥ parihīno'pi samyagācāratatparaḥ
क्योंकि विद्वान जन उस सदाचार को ही धर्म का मूल जानते हैं; भले ही कोई पुरुष शास्त्रोक्त लक्षणों से रहित हो, यदि वह भलीभाँति आचार में तत्पर है तो वह श्रेष्ठ ही है।
श्लोक 14 (skanda.3.57.14)
श्रद्दालुरनसूयुश्च नरो जीवेत्समाः शतम् । श्रुतिस्मृतिभ्यामुदितं स्वेषुस्वेषु च कर्मसु
śraddāluranasūyuśca naro jīvetsamāḥ śatam śrutismṛtibhyāmuditaṁ sveṣusveṣu ca karmasu
श्रद्धावान और असूयारहित मनुष्य, श्रुति-स्मृति द्वारा अपने-अपने कर्मों में कहे गये आचार का पालन करते हुए, सौ वर्ष तक जीवित रहता है।
श्लोक 15 (skanda.3.57.15)
सदाचारं निषेवेत धर्ममूलमतंद्रितः । दुराचाररतो लोके गर्हणीयः पुमान्भवेत्
sadācāraṁ niṣeveta dharmamūlamataṁdritaḥ durācārarato loke garhaṇīyaḥ pumānbhavet
मनुष्य को अनालस्य होकर धर्म के मूल स्वरूप सदाचार का पालन करना चाहिए; जो दुराचार में रत रहता है, वह संसार में निंदनीय पुरुष होता है।
श्लोक 16 (skanda.3.57.16)
व्याधिभिश्चाभिभूयेत सदाल्पायुः सुदुःखभाक् । त्याज्यं कर्म पराधीनं कार्यमात्मवशं सदा
vyādhibhiścābhibhūyeta sadālpāyuḥ sudukhabhāk tyājyaṁ karma parādhīnaṁ kāryamātmavaśaṁ sadā
वह सदा रोगों से पीड़ित, अल्पायु और अत्यंत दुःखी रहता है। पराधीन कर्म का त्याग कर सदा अपने वश में रहने वाला कार्य ही करना चाहिए।
श्लोक 17 (skanda.3.57.17)
दुःखी यतः पराधीनः सदैवात्मवशः सुखी । यस्मिन्कर्मण्यंतरात्मा क्रियमाणे प्रसीदति
duḥkhī yataḥ parādhīnaḥ sadaivātmavaśaḥ sukhī yasminkarmaṇyaṁtarātmā kriyamāṇe prasīdati
क्योंकि जो पराधीन है वह सदा दुखी रहता है, और जो स्ववश है वह सुखी रहता है। जिस कर्म को करते समय अंतरात्मा प्रसन्न होती है —
श्लोक 18 (skanda.3.57.18)
तदेव कर्म कर्त्तव्यं विपरीतं न च क्वचित् । प्रथमं धर्म्मसर्वस्वं प्रोक्तं यन्नियमा यमाः
tadeva karma karttavyaṁ viparītaṁ na ca kvacit prathamaṁ dharmasarvasvaṁ proktaṁ yanniyamā yamāḥ
— वही कर्म करना चाहिए, इसके विपरीत कभी नहीं। सबसे पहले धर्म के सम्पूर्ण सारस्वरूप यम और नियम कहे गये हैं।
श्लोक 19 (skanda.3.57.19)
अतस्तेष्वेव वै यत्नः कर्तव्यो धर्ममिच्छता । सत्यं क्षमार्तवं ध्यानमानृशंस्यमहिंसनम्
atasteṣveva vai yatnaḥ kartavyo dharmamicchatā satyaṁ kṣamārtavaṁ dhyānamānṛśaṁsyamahiṁsanam
अतः जो धर्म की इच्छा रखता है, उसे इन्हीं यमों में प्रयत्न करना चाहिए — सत्य, क्षमा, सरलता, ध्यान, निर्दयता का अभाव तथा अहिंसा —
श्लोक 20 (skanda.3.57.20)
दमः प्रसादो माधुर्यं मृदुतेति यमा दश । शौचं स्नानं तपो दानं मौनेज्याध्ययनं व्रतम्
damaḥ prasādo mādhuryaṁ mṛduteti yamā daśa śaucaṁ snānaṁ tapo dānaṁ maunejyādhyayanaṁ vratam
— संयम, प्रसन्नता, मधुरता तथा कोमलता — ये दस यम हैं। शौच, स्नान, तप, दान, मौन, यज्ञ, अध्ययन, व्रत —
श्लोक 21 (skanda.3.57.21)
उपोषणोपस्थदंडो दशैते नियमाः स्मृताः । कामं क्रोधं दमं मोहं मात्सर्यं लोभमेव च
upoṣaṇopasthadaṇḍo daśaite niyamāḥ smṛtāḥ kāmaṁ krodhaṁ damaṁ mohaṁ mātsaryaṁ lobhameva ca
— उपवास और इन्द्रिय-संयम — ये दस नियम कहे गये हैं। काम, क्रोध, दम, मोह, मत्सर तथा लोभ —
श्लोक 22 (skanda.3.57.22)
अमून्षड्वैरिणो जित्वा सर्वत्र विजयी भवेत् । शनैः संचिनुयाद्धर्मं वल्मीकं शृंगवान्यथा
amūnṣaḍvairiṇo jitvā sarvatra vijayī bhavet śanaiḥ saṁcinuyāddharmaṁ valmīkaṁ śṛṅgavānyathā
इन छह शत्रुओं को जीतकर मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है। जैसे दीमक धीरे-धीरे बाँबी को ऊँचा बनाती है, वैसे ही धीरे-धीरे धर्म का संचय करना चाहिए।
श्लोक 23 (skanda.3.57.23)
परपीडामकुर्वाणः पर लोकसहायिनम् । धर्म एव सहायी स्यादमुत्र परिरक्षितः
parapīḍāmakurvāṇaḥ paralokasahāyinam dharma eva sahāyī syādamutra parirakṣitaḥ
किसी को कष्ट न देते हुए, परलोक में सहायक होने वाले धर्म का ही संचय करे; वही धर्म वहाँ रक्षित होकर सहायक होता है।
श्लोक 24 (skanda.3.57.24)
पितृमातृसुतभ्रातृयोषिद्बंधुजनाधिकः । जायते चैकलः प्राणी म्रियते च तथैकलः
pitṛmātṛsutabhrātṛyoṣidbaṁdhujanādhikaḥ jāyate caikalaḥ prāṇī mriyate ca tathaikalaḥ
पिता, माता, पुत्र, भाई, स्त्री और बंधुजनों से युक्त होने पर भी प्राणी अकेला ही जन्म लेता है, और अकेला ही मरता है।
श्लोक 25 (skanda.3.57.25)
एकलः सुकृतं भुंक्ते भुंक्ते दुष्कृतमेकलः । देहे पंचत्वमापन्ने त्यक्त्वैकं काष्ठलोष्टवत्
ekalaḥ sukṛtaṁ bhuṁkte bhuṁkte duṣkṛtamekalaḥ dehe pañcatvamāpanne tyaktvaikaṁ kāṣṭhaloṣṭavat
अकेला ही वह अपने पुण्य को भोगता है और अकेला ही अपने पाप को भोगता है। शरीर के पंचत्व को प्राप्त होने पर, काठ या मिट्टी के ढेले के समान उसे अकेला छोड़कर सब चले जाते हैं।
श्लोक 26 (skanda.3.57.26)
बांधवा विमुखा यांति धर्मो यांतमनु व्रजेत् । अतः संचिनुयाद्धर्म्ममत्राऽमुत्र सहायिनम्
bāṁdhavā vimukhā yāṁti dharmo yāṁtamanu vrajet ataḥ saṁcinuyāddharmamatrāmutra sahāyinam
बन्धुजन मुँह मोड़कर लौट जाते हैं, किन्तु धर्म जाते हुए जीव के पीछे-पीछे चला जाता है। अतः इस लोक और परलोक दोनों में सहायक धर्म का ही संचय करना चाहिए।
श्लोक 27 (skanda.3.57.27)
धर्मं सहायिनं लब्ध्वा संतरेद्दुस्तरं तमः । संबंधानाचारेन्नित्यमुत्तमैरुत्तमैः सुधीः
dharmaṁ sahāyinaṁ labdhvā saṁtareddustaraṁ tamaḥ saṁbaṁdhānācarennityamuttamairuttamaiḥ sudhīḥ
धर्म को सहायक पाकर मनुष्य दुस्तर अंधकार को पार कर जाता है। बुद्धिमान पुरुष सदा उत्तम-से-उत्तम लोगों के साथ ही संबंध रखे —
श्लोक 28 (skanda.3.57.28)
अधमानधमांस्त्यक्त्वा कुलमुत्कर्षतां नयेत् । उत्तमानुत्तमानेव गच्छेद्धीनांश्च वर्जयेत् । ब्राह्मणः श्रेष्ठतामेति प्रत्यवायेन शूद्रताम्
adhamānadhamāṁstyaktvā kulamutkarṣatāṁ nayet uttamānuttamāneva gacchedhīnāṁśca varjayet brāhmaṇaḥ śreṣṭhatāmeti pratyavāyena śūdratām
— नीच और अत्यंत नीच लोगों को त्यागकर अपने कुल को उन्नति की ओर ले जाये। श्रेष्ठतम लोगों के ही निकट जाये और हीन लोगों का त्याग करे — इस प्रकार ब्राह्मण श्रेष्ठता को प्राप्त होता है, और विपरीत आचरण से शूद्रता को प्राप्त होता है।
श्लोक 29 (skanda.3.57.29)
अनध्ययनशीलं च सदाचारविलंघिनम् । सालसं च दुरन्नादं ब्राह्मणं बाधतेंऽतकः
anadhyayanaśīlaṁ ca sadācāravilaṁghinam sālasaṁ ca durannādaṁ brāhmaṇaṁ bādhateṁtakaḥ
जो ब्राह्मण अध्ययनहीन है, सदाचार का उल्लंघन करता है, आलसी है, तथा निषिद्ध अन्न खाता है — उसे मृत्यु शीघ्र सताती है।
श्लोक 30 (skanda.3.57.30)
अतोऽभ्यस्येत्प्रयत्नेन सदाचारं सदा द्विजः । तीर्थान्यप्यभिलष्यंति सदाचारिसमागमम्
ato'bhyasyetprayatnena sadācāraṁ sadā dvijaḥ tīrthānyapyabhilaṣyaṁti sadācārisamāgamam
अतः द्विज को सदा प्रयत्नपूर्वक सदाचार का अभ्यास करना चाहिए; तीर्थ भी सदाचारी पुरुष के समागम की अभिलाषा रखते हैं।
श्लोक 31 (skanda.3.57.31)
रजनीप्रांतयामार्द्धं ब्राह्मः समय उच्यते । स्वहितं चिंतयेत्प्राज्ञस्तस्मिंश्चोत्थाय सर्वदा
rajanīprāṁtayāmārddhaṁ brāhmaḥ samaya ucyate svahitaṁ ciṁtayetprājñastasmiṁścotthāya sarvadā
रात्रि के अंतिम याम का आधा भाग ब्राह्म-मुहूर्त कहलाता है; बुद्धिमान पुरुष को सदा उस समय उठकर अपने हित का चिंतन करना चाहिए।
श्लोक 32 (skanda.3.57.32)
गजास्यं संस्मरेदादौ तत ईशं सहांबया । श्रीरंगं श्रीसमेतं तु ब्रह्माणं कमलोद्भवम्
gajāsyaṁ saṁsmaredādau tata īśaṁ sahāṁbayā śrīraṁgaṁ śrīsametaṁ tu brahmāṇaṁ kamalodbhavam
सबसे पहले गजानन का स्मरण करे, फिर अंबिका सहित ईश्वर का, तथा श्री सहित श्रीरंग का, और कमल से उत्पन्न ब्रह्मा का।
श्लोक 33 (skanda.3.57.33)
इंद्रादीन्सकलान्देवान्वसिष्ठादीन्मुनीनपि । गंगायाः सरितः सर्वाः श्रीशैलायखिलान्गिरीन्
iṁdrādīnsakalāndevānvasiṣṭhādīnmunīnapi gaṁgāyāḥ saritaḥ sarvāḥ śrīśailāyakhilāṁgirīn
इन्द्र आदि समस्त देवताओं का, वसिष्ठ आदि मुनियों का, गंगा आदि समस्त नदियों का, तथा श्रीशैल आदि समस्त पर्वतों का भी स्मरण करे।
श्लोक 34 (skanda.3.57.34)
क्षीरोदादीन्समुद्रांश्च मानसादिसरांसि च । वनानि नंदनादीनि धेनूः कामदुघादयः
kṣīrodādīnsamudrāṁśca mānasādisarāṁsi ca vanāni naṁdanādīni dhenūḥ kāmadughādayaḥ
क्षीरसागर आदि समुद्रों का, मानसरोवर आदि सरोवरों का, नंदनवन आदि वनों का, तथा कामधेनु आदि गौओं का भी स्मरण करे।
श्लोक 35 (skanda.3.57.35)
कल्पवृक्षादिवृक्षांश्च धातून्कांचनमुख्यतः । दिव्यस्त्रीरुर्वशीमुख्याः प्रह्रादावद्यान्हरेः प्रियान्
kalpavṛkṣādivṛkṣāṁśca dhātūnkāṁcanamukhyataḥ divyastrīrurvaśīmukhyāḥ prahrādāvadyānhareḥ priyān
कल्पवृक्ष आदि वृक्षों का, स्वर्ण आदि मुख्य धातुओं का, उर्वशी आदि दिव्य स्त्रियों का, तथा प्रह्लाद आदि हरि के प्रिय भक्तों का भी स्मरण करे।
श्लोक 36 (skanda.3.57.36)
जननीचरणौ स्मृत्वा सर्वतीर्थोक्त्तमोत्तमौ । पितरं च गुरूंश्चापि हदि ध्यात्वा प्रसन्नधीः
jananīcaraṇau smṛtvā sarvatīrthoktamottamau pitaraṁ ca gurūṁścāpi hadi dhyātvā prasannadhīḥ
माता के दोनों चरणों का स्मरण करके, जो समस्त तीर्थों में उत्तम कहे गये हैं, तथा पिता और गुरुजनों का भी हृदय में ध्यान करके, प्रसन्नचित्त होकर —
श्लोक 37 (skanda.3.57.37)
ततश्चावश्यकं कर्त्तुं नैर्ऋतीं दिशमाव्रजेत् । ग्रामाद्धनुःशतं गच्छेन्नगराच्च चतुर्गुणम्
tataścāvaśyakaṁ karttuṁ nairṛtīṁ diśamāvrajet grāmāddhanuḥśataṁ gacchennagarācca caturguṇam
— फिर आवश्यक कार्य के लिए नैऋत्य दिशा में जाये। गाँव से सौ धनुष तथा नगर से उससे चार गुना दूर जाना चाहिए।
श्लोक 38 (skanda.3.57.38)
तृणैराच्छाद्य वसुधां शिरः प्रावृत्य वाससा । कर्णोपवीत उदग्वक्त्रो दिवसे संध्ययोरपि
tṛṇairācchādya vasudhāṁ śiraḥ prāvṛtya vāsasā karṇopavīta udagvaktro divase saṁdhyayorapi
भूमि को घास से ढककर, सिर को वस्त्र से ढककर, यज्ञोपवीत को कान पर चढ़ाकर, दिन में और दोनों संध्याओं के समय उत्तर की ओर मुख करके बैठे।
श्लोक 39 (skanda.3.57.39)
विण्मूत्रे विसृजेन्मौनी निशायां दक्षिणामुखः । न तिष्ठन्नाशु नो विप्र गोवन्ह्यनिलसंमुखः
viṇmūtre visṛjenmaunī niśāyāṁ dakṣiṇāmukhaḥ na tiṣṭhannāśu no vipra govahnyanilasaṁmukhaḥ
मौन रहकर मल-मूत्र का त्याग करे, रात्रि में दक्षिण की ओर मुख करके। हे विप्र! खड़े होकर, शीघ्रता से, तथा गौ, अग्नि और वायु के सम्मुख होकर कभी न करे।
श्लोक 40 (skanda.3.57.40)
न फालकृष्टे भूभागे न रथ्यासेव्यभूतले । नालोकयेद्दिशो भागञ्ज्योतिश्चक्रं नभो मलम्
na phālakṛṣṭe bhūbhāge na rathyāsevyabhūtale nālokayeddiśo bhāgañjyotiścakraṁ nabho malam
न जोते हुए खेत में, न मार्ग पर चलने योग्य भूमि पर मल-मूत्र त्याग करे; तथा दिशाओं की ओर, ज्योतिष्चक्र की ओर, आकाश की ओर देखते हुए मलत्याग न करे।
श्लोक 41 (skanda.3.57.41)
वामेन पाणिना शिश्नं धृत्वोत्तिष्ठेत्प्रयत्नवान् । अथो मृदं समादद्याज्जंतुकर्क्करवर्जिताम्
vāmena pāṇinā śiśnaṁ dhṛtvottiṣṭhetprayatnavān atho mṛdaṁ samādadyājjaṁtukarkaravarjitām
बायें हाथ से लिंग को पकड़कर सावधानीपूर्वक उठे, फिर कीड़े और कंकड़ रहित मिट्टी ले।
श्लोक 42 (skanda.3.57.42)
विहाय मूषकोत्खातां चोच्छिष्टां केशसंकुलाम् । गुह्ये दद्यान्मृदं चैकां प्रक्षाल्य चांबुना ततः
vihāya mūṣakotkhātāṁ cocchiṣṭāṁ keśasaṁkulām guhye dadyānmṛdaṁ caikāṁ prakṣālya cāṁbunā tataḥ
चूहे द्वारा खोदी गयी, जूठी और बालों से भरी मिट्टी को छोड़कर, गुह्य अंग पर एक बार मिट्टी लगाकर उसे जल से धो ले।
श्लोक 43 (skanda.3.57.43)
पुनर्वामकरेणेति पंचधा क्षालयेद्गुदम् । एकैक पादयोर्दद्यात्तिस्रः पाण्योर्मृदस्तथा
punarvāmakareṇeti pañcadhā kṣālayedgudam ekaika pādayordadyāttisraḥ pāṇyormṛdastathā
फिर बायें हाथ से पाँच बार गुदा को धोये; प्रत्येक पैर पर एक-एक बार तथा दोनों हाथों पर तीन-तीन बार मिट्टी लगाये।
श्लोक 44 (skanda.3.57.44)
इत्थं शौचं गृही कुर्याद्गंधलेपक्षयावधि । क्रमाद्वैगुण्यतः कुर्याद्ब्रह्मचर्यादिषु त्रिषु
itthaṁ śaucaṁ gṛhī kuryādgaṁdhalepakṣayāvadhi kramādvaiguṇyataḥ kuryādbrahmacaryādiṣu triṣu
इस प्रकार गृहस्थ को तब तक शुद्धि करनी चाहिए जब तक दुर्गंध और लेप नष्ट न हो जाये। ब्रह्मचर्य आदि तीन आश्रमों में क्रमशः दुगुनी-दुगुनी मात्रा में यह करे।
श्लोक 45 (skanda.3.57.45)
दिवाविहितशौचाच्च रात्रावर्द्धं समाचरेत् । परग्रामे तदर्धं च पथि तस्यार्धमेव च
divāvihitaśaucācca rātrāvarddhaṁ samācaret paragrāme tadardhaṁ ca pathi tasyārdhameva ca
दिन में विहित शुद्धि से रात्रि में आधी करे; दूसरे गाँव में उससे आधी, और मार्ग में उससे भी आधी।
श्लोक 46 (skanda.3.57.46)
तदर्धं रोगिणां चापि सुस्थे न्यूनं न कारयेत् । अपि सर्वनदीतोयैर्मृत्कूटैश्चाप्यगोपमैः
tadardhaṁ rogiṇāṁ cāpi susthe nyūnaṁ na kārayet api sarvanadītoyairmṛtkūṭaiścāpyagopamaiḥ
रोगियों के लिए भी उससे आधी करे, किन्तु स्वस्थ मनुष्य के लिए उससे कम न करे — चाहे वह सभी नदियों के जल और पर्वत के समान मिट्टी के ढेरों से ही क्यों न हो।
श्लोक 47 (skanda.3.57.47)
आपातमाचरेच्छौचं भावदुष्टो न शुद्धिभाक् । आर्द्रधात्रीफलोन्माना मृदः शौचे प्रकीर्तिताः
āpātamācarecchaucaṁ bhāvaduṣṭo na śuddhibhāk ārdradhātrīphalonmānā mṛdaḥ śaucе prakīrtitāḥ
जो केवल दिखावे के लिए शुद्धि करता है और जिसका भाव दूषित है, वह शुद्धि का भागी नहीं होता। शुद्धि में मिट्टी की मात्रा गीले आँवले के फल के बराबर बतायी गयी है।
श्लोक 48 (skanda.3.57.48)
सर्वाश्चाहुतयोऽप्येवं ग्रासाश्चांद्रायणेपि च । प्रागास्य उदगास्यो वा सूपविष्टः शुचौ भुवि
sarvāścāhutayo'pyevaṁ grāsāścāṁdrāyaṇepi ca prāgāsya udagāsyo vā sūpaviṣṭaḥ śucau bhuvi
इसी प्रकार सभी आहुतियों तथा चांद्रायण व्रत के ग्रासों की भी मात्रा जाननी चाहिए। पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके, शुद्ध भूमि पर भलीभाँति बैठकर —
श्लोक 49 (skanda.3.57.49)
उपस्पृशेद्विहीनाभिस्तुषांगारास्थिभस्मभिः । अतिस्वच्छाभिरद्भिश्च यावद्धृद्गाभिरत्वरः
upaspṛśedvihīnābhistuṣāṁgārāsthibhasmabhiḥ atisvacchābhiradbhiśca yāvaddhṛdgābhiratvaraḥ
बिना जल्दी किये, भूसी, अंगारे, हड्डी और राख से रहित अत्यंत निर्मल जल से, जब तक वह हृदय तक पहुँच न जाये, आचमन करे।
श्लोक 50 (skanda.3.57.50)
ब्राह्मणो ब्रह्मतीर्थेन दृष्टिपूताभिराचमेत् । कण्ठगाभिर्नृपः शुध्येत्तालुगाभिस्तथोरुजः
brāhmaṇo brahmatīrthena dṛṣṭipūtābhirācamet kaṇṭhagābhirnṛpaḥ śudhyettālugābhistathorujaḥ
ब्राह्मण ब्रह्म-तीर्थ से, दृष्टि से शुद्ध किये गये जल से आचमन करे; राजा (क्षत्रिय) कण्ठ तक पहुँचे जल से शुद्ध होता है, तथा वैश्य तालु तक पहुँचे जल से।
श्लोक 51 (skanda.3.57.51)
स्त्रीशूद्रावाथ संस्पर्शमात्रेणापि विशुध्यतः । शिरः शब्दं सकंठं वा जले मुक्तशिखोऽपि वा
strīśūdrāvātha saṁsparśamātreṇāpi viśudhyataḥ śiraḥ śabdaṁ sakaṁṭhaṁ vā jale muktaśikho'pi vā
स्त्री और शूद्र मात्र स्पर्श से ही शुद्ध हो जाते हैं। जल में सिर के साथ शब्द करते हुए, अथवा कण्ठ तक डुबोकर, अथवा शिखा खोलकर भी आचमन कर सकता है।
श्लोक 52 (skanda.3.57.52)
अक्षालितपदद्वंद्व आचांतोऽप्यशुचिर्मतः । त्रिः पीत्वांबु विशुद्ध्यर्थं ततः खानि विशोधयेत्
akṣālitapadadvaṁdva ācāṁto'pyaśucirmataḥ triḥ pītvāṁbu viśuddhyarthaṁ tataḥ khāni viśodhayet
जिसके दोनों पैर धोये नहीं गये हों, वह आचमन करने पर भी अशुद्ध ही माना जाता है। शुद्धि के लिए तीन बार जल पीकर फिर शरीर के छिद्रों को शुद्ध करे।
श्लोक 53 (skanda.3.57.53)
अंगुष्ठमूलदेशेन ह्यधरोष्ठौ परिमृजेत् । स्पृष्ट्वा जलेन हृदयं समस्ताभिः शिरः स्पृशेत्
aṁguṣṭhamūladeśena hyadharoṣṭhau parimṛjet spṛṣṭvā jalena hṛdayaṁ samastābhiḥ śiraḥ spṛśet
अंगूठे के मूल भाग से दोनों होठों को पोंछे; जल से हृदय का स्पर्श करके, फिर सभी अंगुलियों से सिर का स्पर्श करे।
श्लोक 54 (skanda.3.57.54)
अंगुल्यग्रैस्तथा स्कन्धौ सांबु सर्व्वत्र संस्पृशेत् । आचांतः पुनराचामेत्कृत्वा रथ्योपसर्पणम्
aṁgulyagraistathā skandhau sāṁbu sarvatra saṁspṛśet ācāṁtaḥ punarācāmetkṛtvā rathyopasarpaṇam
उंगलियों के अग्रभाग से दोनों कंधों तथा जल से शरीर के सभी अंगों का स्पर्श करे। एक बार आचमन करने के बाद, यदि मार्ग पर चलना पड़े, तो पुनः आचमन करे।
श्लोक 55 (skanda.3.57.55)
स्नात्वा भुक्त्वा पयः पीत्वा प्रारंभे शुभकर्मणाम् । सुप्त्वा वासः परीधाय दृष्ट्वा तथाप्यमंगलम्
snātvā bhuktvā payaḥ pītvā prāraṁbhe śubhakarmaṇām suptvā vāsaḥ parīdhāya dṛṣṭvā tathāpyamaṁgalam
स्नान करने के बाद, भोजन करने के बाद, दूध पीने के बाद, शुभ कर्मों के आरंभ में, सोकर उठने के बाद, वस्त्र पहनने के बाद, तथा कोई अशुभ वस्तु देखने के बाद भी आचमन करे।
श्लोक 56 (skanda.3.57.56)
प्रमादादशुचि स्मृत्वा द्विराचांतः शुचिर्भवेत् । दंतधावनं प्रकुर्वीत यथोक्त धर्मशास्त्रतः । आचांतोऽप्यशुचिर्यस्मादकृत्वा दंतधावनम्
pramādādaśuci smṛtvā dvirācāṁtaḥ śucirbhavet daṁtadhāvanaṁ prakurvīta yathokta dharmaśāstrataḥ ācāṁto'pyaśuciryasmādakṛtvā daṁtadhāvanam
— असावधानी से अशुद्ध हुआ स्मरण होने पर दो बार आचमन करने से शुद्ध हो जाता है। धर्मशास्त्र में कहे अनुसार दन्तधावन करना चाहिए, क्योंकि दन्तधावन किये बिना आचमन करने पर भी मनुष्य अशुद्ध ही रहता है।
श्लोक 57 (skanda.3.57.57)
प्रतिपद्दर्शषष्ठीषु नवम्यां रविवासरे । दंतानां काष्ठसंयोगो दहेदासप्तमं कुलम्
pratipaddarśaṣaṣṭhīṣu navamyāṁ ravivāsare daṁtānāṁ kāṣṭhasaṁyogo dahedāsaptamaṁ kulam
प्रतिपदा, अमावस्या, षष्ठी, नवमी तथा रविवार के दिन दाँतों में काष्ठ (दतुअन) का प्रयोग सात पीढ़ियों तक के कुल को जला डालता है।
श्लोक 58 (skanda.3.57.58)
अलाभे दंतकाष्ठानां निषिद्धे वाथ वासरे । गंडूषा द्वादश ग्राह्या मुखस्य परिशुद्धये
alābhe daṁtakāṣṭhānāṁ niṣiddhe vātha vāsare gaṇḍūṣā dvādaśa grāhyā mukhasya pariśuddhaye
यदि दतुअन न मिले अथवा निषिद्ध दिन हो, तो मुख की पूर्ण शुद्धि के लिए बारह बार कुल्ला करना चाहिए।
श्लोक 59 (skanda.3.57.59)
कनिष्ठाग्रपरीमाणं सत्वचं निर्व्रणारुजम् । द्वादशांगुलमानं च सार्द्रं स्याद्दंतधावनम्
kaniṣṭhāgraparīmāṇaṁ satvacaṁ nirvraṇārujam dvādaśāṁgulamānaṁ ca sārdraṁ syāddaṁtadhāvanam
दतुअन की मोटाई कनिष्ठिका उंगली के अग्रभाग के बराबर हो, उसकी छाल रहित न हो, वह क्षतरहित हो, तथा उसकी लम्बाई बारह अंगुल और गीली होनी चाहिए।
श्लोक 60 (skanda.3.57.60)
एकेकांगुलमानं तच्चर्वयेद्दंतधावनम् । प्रातः स्नानं चरित्वा च शुद्ध्यै तीर्थे विशेषतः
ekekāṁgulamānaṁ taccarvayeddaṁtadhāvanam prātaḥ snānaṁ caritvā ca śuddhyai tīrthe viśeṣataḥ
उस दतुअन को एक-एक अंगुल करके चबाये। इसके पश्चात् शुद्धि के लिए, विशेषतः तीर्थ में, प्रातः स्नान करे।
श्लोक 61 (skanda.3.57.61)
प्रातः स्नानाद्यतः शुद्ध्येत्कायोऽयं मलिनः सदा । यन्मलं नवभिश्छिद्रैः स्रवत्येव दिवानिशम्
prātaḥ snānādyataḥ śuddhyetkāyo'yaṁ malinaḥ sadā yanmalaṁ navabhiśchidraiḥ sravatyeva divāniśam
प्रातः स्नान से यह सदा मलिन रहने वाला शरीर शुद्ध होता है, जिसका मल नौ छिद्रों से दिन-रात बहता ही रहता है।
श्लोक 62 (skanda.3.57.62)
उत्साहमेधासौभाग्यरूपसंपत्प्रवर्द्धकम् । प्राजापत्यसमं प्राहुस्तन्महाघविनाशकृत्
utsāhamedhāsaubhāgyarūpasaṁpatpravarddhakam prājāpatyasamaṁ prāhustanmahāghavināśakṛt
यह स्नान उत्साह, बुद्धि, सौभाग्य, रूप और सम्पत्ति को बढ़ाने वाला है; इसे प्राजापत्य व्रत के समान कहा गया है, तथा यह महापाप का नाश करने वाला है।
श्लोक 63 (skanda.3.57.63)
प्रातः स्नानं हरेत्पापमलक्ष्मीं ग्लानिमेव च । अशुचित्वं च दुःस्वप्नं तुष्टिं पुष्टिं प्रयच्छति
prātaḥ snānaṁ haretpāpamalakṣmīṁ glānimeva ca aśucitvaṁ ca duḥsvapnaṁ tuṣṭiṁ puṣṭiṁ prayacchati
प्रातः स्नान पाप, दरिद्रता तथा ग्लानि को दूर करता है, अपवित्रता और दुःस्वप्न को भी दूर करता है, और संतोष तथा पुष्टि प्रदान करता है।
श्लोक 64 (skanda.3.57.64)
नोपसर्पंति वै दुष्टाः प्रातस्नायिजनं क्वचित् । दृष्टादृष्टफलं यस्मात्प्रातःस्नानं समाचरेत्
nopasarpaṁti vai duṣṭāḥ prātasnāyijanaṁ kvacit dṛṣṭādṛṣṭaphalaṁ yasmātprātaḥsnānaṁ samācaret
जो प्रातः स्नान करता है, दुष्ट शक्तियाँ उसके निकट कभी नहीं आतीं। चूँकि प्रातः स्नान के फल दृष्ट और अदृष्ट दोनों प्रकार के होते हैं, इसलिए इसे अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 65 (skanda.3.57.65)
प्रसंगतः स्नानविधिं प्रवक्ष्यामि नृपोत्तमाः । विधिस्नानं यतः प्राहुः स्नानाच्छतगुणोत्तरम्
prasaṁgataḥ snānavidhiṁ pravakṣyāmi nṛpottamāḥ vidhisnānaṁ yataḥ prāhuḥ snānācchataguṇottaram
हे नृपश्रेष्ठ! इस प्रसंग में मैं स्नान की विधि बताऊँगा, क्योंकि विधिपूर्वक किया गया स्नान साधारण स्नान से सौ गुना श्रेष्ठ कहा गया है।
श्लोक 66 (skanda.3.57.66)
विशुद्धां मृदमादाय बर्हिषस्तिलगोमयम् । शुचौ देशे परिस्थाप्य ह्याचम्य स्नानमाचरेत्
viśuddhāṁ mṛdamādāya barhiṣastilagomayam śucau deśe paristhāpya hyācamya snānamācaret
शुद्ध मिट्टी, कुशा, तिल तथा गोबर लेकर उन्हें पवित्र स्थान पर रखे, फिर आचमन करके स्नान करे।
श्लोक 67 (skanda.3.57.67)
उपग्रही बद्धशिखो जलमध्ये समाविशेत् । स्वशाखोक्तविधानेन स्नानं कुर्याद्यथाविधि
upagrahī baddhaśikho jalamadhye samāviśet svaśākhoktavidhānena snānaṁ kuryādyathāvidhi
इन वस्तुओं को साथ लिये हुए, शिखा बाँधकर जल के मध्य में प्रवेश करे, तथा अपनी शाखा में कहे गये विधान के अनुसार यथाविधि स्नान करे।
श्लोक 68 (skanda.3.57.68)
स्नात्वेत्थं वस्त्रमापीड्य गृह्णीयाद्धौतवाससी । आचम्य च ततः कुर्यात्प्रातःसंध्यां कुशान्वितः
snātvetthaṁ vastramāpīḍya gṛhṇīyāddhautavāsasī ācamya ca tataḥ kuryātprātaḥsaṁdhyāṁ kuśānvitaḥ
इस प्रकार स्नान करके वस्त्र को निचोड़कर धुले हुए दो वस्त्र धारण करे। फिर आचमन करके, कुश हाथ में लेकर प्रातःसंध्या करे।
श्लोक 69 (skanda.3.57.69)
प्राणायामांश्चरन्विप्रो नियम्य मानसं दृढम् । अहोरात्रकृतैः पापैर्मुक्तो भवति तत्क्षणात्
prāṇāyāmāṁścaranvipro niyamya mānasaṁ dṛḍham ahorātrakṛtaiḥ pāpairmukto bhavati tatkṣaṇāt
प्राणायाम करता हुआ ब्राह्मण, अपने मन को दृढ़तापूर्वक संयत करके, दिन-रात में किये गये पापों से उसी क्षण मुक्त हो जाता है।
श्लोक 70 (skanda.3.57.70)
दश द्वादशसंख्या वा प्राणायामाः कृता यदि । नियम्य मानसं तेन तदा तप्तं महत्तपः
daśa dvādaśasaṁkhyā vā prāṇāyāmāḥ kṛtā yadi niyamya mānasaṁ tena tadā taptaṁ mahattapaḥ
यदि दस या बारह प्राणायाम मन को संयत करके किये जायें, तो उससे महान् तप किया हुआ माना जाता है।
श्लोक 71 (skanda.3.57.71)
सव्याहृतिप्रणवकाः प्राणायामास्तु षोडश । अपि भ्रूणहनं मासात्पुनंत्यहरहः कृताः
savyāhṛtipraṇavakāḥ prāṇāyāmāstu ṣoḍaśa api bhrūṇahanaṁ māsātpunaṁtyaharahaḥ kṛtāḥ
व्याहृति और प्रणव सहित सोलह प्राणायाम, यदि प्रतिदिन किये जायें, तो एक मास में भ्रूणहत्या करने वाले को भी शुद्ध कर देते हैं।
श्लोक 72 (skanda.3.57.72)
यथा पार्थिवधातूनां दह्यते धमनान्मलाः । तथेंद्रियैः कृता दोषा ज्वाल्यंते प्राणसंयमात्
yathā pārthivadhātūnāṁ dahyate dhamanānmalāḥ tatheṁdriyaiḥ kṛtā doṣā jvālyaṁte prāṇasaṁyamāt
जैसे धातुओं को गलाने से उनकी मलिनता जल जाती है, वैसे ही प्राणायाम से इन्द्रियों द्वारा किये गये दोष भस्म हो जाते हैं।
श्लोक 73 (skanda.3.57.73)
एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः । गायत्र्यास्तु परं नास्ति पावनं च नृपोत्तम
ekākṣaraṁ paraṁ brahma prāṇāyāmaḥ paraṁ tapaḥ gāyatryāstu paraṁ nāsti pāvanaṁ ca nṛpottama
एकाक्षर (ॐ) ही परब्रह्म है, प्राणायाम ही परम तप है; हे नृपोत्तम! गायत्री से बढ़कर कोई पवित्र करने वाली वस्तु नहीं है।
श्लोक 74 (skanda.3.57.74)
कर्मणा मनसा वाचा यद्रात्रौ कुरुते त्वघम् । उत्तिष्ठन्पूर्वसंध्यायां प्राणायामैर्विशोधयेत्
karmaṇā manasā vācā yadrātrau kurute tvagham uttiṣṭhanpūrvasaṁdhyāyāṁ prāṇāyāmairviśodhayet
रात्रि में कर्म, मन और वाणी से जो पाप किया जाता है, उसे प्रातःकाल उठकर प्रातःसंध्या में प्राणायामों द्वारा शुद्ध करे।
श्लोक 75 (skanda.3.57.75)
यदह्ना कुरुते पापं मनोवाक्कायकर्मभिः । आसीनः पश्चिमां संध्यां प्राणायामैर्व्यपोहति । पश्चिमां तु समासीनो मलं हंति दिवाकृतम्
yadahnā kurute pāpaṁ manovākkāyakarmabhiḥ āsīnaḥ paścimāṁ saṁdhyāṁ prāṇāyāmairvyapohati paścimāṁ tu samāsīno malaṁ haṁti divākṛtam
दिन में मन, वाणी और शरीर के कर्मों से जो पाप किया जाता है, उसे बैठकर, सायं संध्या में प्राणायामों द्वारा दूर करे; सायंकाल बैठकर किया गया प्राणायाम दिन में किये गये मल का नाश करता है।
श्लोक 76 (skanda.3.57.76)
नोपतिष्ठेत्तु यः पूर्व्वां नोपास्ते यस्तु पश्चिमाम् । स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद्द्विजकर्मणः
nopatiṣṭhettu yaḥ pūrvāṁ nopāste yastu paścimām sa śūdravadbahiṣkāryaḥ sarvasmāddvijakarmaṇaḥ
जो न प्रातःसंध्या करता है और न सायंसंध्या की उपासना करता है, वह शूद्र के समान समस्त द्विज-कर्मों से बहिष्कृत करने योग्य है।
श्लोक 77 (skanda.3.57.77)
अपां समीपमासाद्य नित्यकर्म समाचरेत् । तत आचमनं कुर्याद्यथाविध्यनुपूर्वशः
apāṁ samīpamāsādya nityakarma samācaret tata ācamanaṁ kuryādyathāvidhyanupūrvaśaḥ
जल के समीप जाकर नित्यकर्म का पालन करे, फिर विधिपूर्वक क्रमशः आचमन करे।
श्लोक 78 (skanda.3.57.78)
आपोहिष्ठेति तिसृभिर्मार्जनं तु ततश्चरेत् । भूमौ शिरसि चाकाश आकाशे भुवि मस्तके
āpohiṣṭheti tisṛbhirmārjanaṁ tu tataścaret bhūmau śirasi cākāśa ākāśe bhuvi mastake
'आपो हि ष्ठा' इस मंत्र की तीन ऋचाओं से मार्जन करे — भूमि पर, सिर पर, आकाश में; फिर आकाश में, भूमि पर, मस्तक पर।
श्लोक 79 (skanda.3.57.79)
मस्तके च तथाकाशं भूमौ च नवधा क्षिपेत् । भूमिशब्देन चरणावाकाशं हृदयं स्मृतम् । शिरस्येव शिरःशब्दो मार्जनं तैरुदाहृतम्
mastake ca tathākāśaṁ bhūmau ca navadhā kṣipet bhūmiśabdena caraṇāvākāśaṁ hṛdayaṁ smṛtam śirasyeva śiraḥśabdo mārjanaṁ tairudāhṛtam
इस प्रकार सिर पर, आकाश में और भूमि पर नौ बार जल छिड़के। 'भूमि' शब्द से दोनों चरण, 'आकाश' शब्द से हृदय, तथा 'शिर' शब्द से सिर ही समझा जाता है — इन शब्दों से मार्जन कहा गया है।
श्लोक 80 (skanda.3.57.80)
वारुणादपि चाग्नेयाद्वायव्यादपि चेंद्रतः । मंत्रस्थानादपि परं ब्राह्मं स्नानमिदं परम् । ब्राह्मस्नानेन यः स्नातः स बाह्याभ्यंतरं शुचिः
vāruṇādapi cāgneyādvāyavyādapi ceṁdrataḥ maṁtrasthānādapi paraṁ brāhmaṁ snānamidaṁ param brāhmasnānena yaḥ snātaḥ sa bāhyābhyaṁtaraṁ śuciḥ
वारुण, आग्नेय, वायव्य तथा इन्द्र-संबंधी स्नान से भी, तथा मंत्र-स्नान से भी बढ़कर यह ब्राह्म-स्नान श्रेष्ठ है। जो ब्राह्म-स्नान से स्नान करता है, वह बाह्य और आभ्यंतर दोनों प्रकार से शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 81 (skanda.3.57.81)
सर्वत्र चार्हतामेति देवपूजादिकर्मणि । नक्तंदिनं निमज्ज्याप्सु कैवर्ताः किमु पावनाः
sarvatra cārhatāmeti devapūjādikarmaṇi naktaṁdinaṁ nimajjyāpsu kaivartāḥ kimu pāvanāḥ
वह सर्वत्र देवपूजा आदि कर्मों में योग्यता को प्राप्त होता है। रात-दिन जल में डूबे रहने वाले धीवर भला कहाँ पवित्र होते हैं?
श्लोक 82 (skanda.3.57.82)
शतशोऽपि तथा स्नाता न शुद्धा भावदूषिताः । अंतःकरणशुद्धांश्च तान्विभूतिः पवित्रयेत्
śataśo'pi tathā snātā na śuddhā bhāvadūṣitāḥ aṁtaḥkaraṇaśuddhāṁśca tānvibhūtiḥ pavitrayet
जिनका भाव दूषित है, वे सैकड़ों बार स्नान करके भी शुद्ध नहीं होते; किन्तु जिनका अंतःकरण शुद्ध है, उन्हें भस्म भी पवित्र कर देती है।
श्लोक 83 (skanda.3.57.83)
किं पावनाः प्रकीर्त्यंते रासभा भस्मधूसराः । स स्नातः सर्वतीर्थेषु मलैः सर्वैर्विवर्जितः
kiṁ pāvanāḥ prakīrtyaṁte rāsabhā bhasmadhūsarāḥ sa snātaḥ sarvatīrtheṣu malaiḥ sarvairvivarjitaḥ
क्या राख से धूसरित गधे पवित्र कहलाते हैं? जो सब प्रकार के मल से रहित हो जाता है, वही समस्त तीर्थों में स्नान किये हुए के समान है।
श्लोक 84 (skanda.3.57.84)
तेन क्रतुशतैरिष्टं चेतो यस्येह निर्मलम् । तदेव निर्मलं चेतो यथा स्यात्तन्मुने शृणु
tena kratuśatairiṣṭaṁ ceto yasyeha nirmalam tadeva nirmalaṁ ceto yathā syāttanmune śṛṇu
जिसका चित्त इस लोक में निर्मल है, उसने मानो सैकड़ों यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया। हे मुने! वह चित्त किस प्रकार निर्मल हो, वह सुनो।
श्लोक 85 (skanda.3.57.85)
विश्वेशश्चेत्प्रसन्नः स्यात्तदा स्यान्नान्यथा क्वचित् । तस्माच्चेतो विशुद्ध्यर्थं काशीनाथं समाश्रयेत्
viśveśaścetprasannaḥ syāttadā syānnānyathā kvacit tasmāccetо viśuddhyarthaṁ kāśīnāthaṁ samāśrayet
यदि विश्वेश्वर प्रसन्न हों, तभी वह निर्मल हो सकता है, अन्यथा कदापि नहीं। अतः चित्त की शुद्धि के लिए काशीनाथ की शरण ले।
श्लोक 86 (skanda.3.57.86)
इदं शरीरमुत्सृज्य परं ब्रह्माधिगच्छति । द्रुपदांतं ततो जप्त्वा जलमादाय पाणिना
idaṁ śarīramutsṛjya paraṁ brahmādhigacchati drupadāṁtaṁ tato japtvā jalamādāya pāṇinā
इस शरीर को त्यागकर वह परब्रह्म को प्राप्त होता है। फिर 'द्रुपदादिव' आदि मंत्र का जप करके, हाथ में जल लेकर —
श्लोक 87 (skanda.3.57.87)
कुयादृतं च मंत्रेण विधिज्ञस्त्वघमर्षणम् । निमज्ज्याप्सु च यो विद्वाञ्जपेत्त्रिरघमर्षणम्
kuryādṛtaṁ ca maṁtreṇa vidhijñastvaghamarṣaṇam nimajjyāpsu ca yo vidvāñjapettriraghamarṣaṇam
विधि जानने वाला 'ऋतं च' इस मंत्र से अघमर्षण करे। जो विद्वान जल में डुबकी लगाकर अघमर्षण मंत्र का तीन बार जप करता है —
श्लोक 88 (skanda.3.57.88)
जले वापि स्थले वापि यः कुर्यादघमर्षणम् । तस्याघौघो विनश्येत यथा सूर्योदये तमः
jale vāpi sthale vāpi yaḥ kuryādaghamarṣaṇam tasyāghaugho vinaśyeta yathā sūryodaye tamaḥ
जो जल में अथवा स्थल पर अघमर्षण करता है, उसका पापसमूह नष्ट हो जाता है, जैसे सूर्योदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है।
श्लोक 89 (skanda.3.57.89)
गायत्रीं शिरसा हीनां महाव्याहृतिपूर्व्विकाम् । प्रणवाद्यां जपंस्तिष्ठन्क्षिपेदंभोंजलित्रयम्
gāyatrīṁ śirasā hīnāṁ mahāvyāhṛtipūrvikām praṇavādyāṁ japaṁstiṣṭhankṣipedaṁbhoṁjalitrayam
शिरोमंत्र रहित, महाव्याहृतियों से युक्त तथा प्रणव से आरंभ होने वाली गायत्री का जप करते हुए खड़े होकर तीन अंजलि जल छोड़े।
श्लोक 90 (skanda.3.57.90)
तेन वज्रोदकेनाशु मंदेहा नाम राक्षसाः । सूर्यतेजः प्रलोपंते शैला इव विवस्वतः
tena vajrodakenāśu maṁdehā nāma rākṣasāḥ sūryatejaḥ pralopaṁte śailā iva vivasvataḥ
उस वज्र-जल से मंदेह नामक राक्षस, सूर्य के तेज से पर्वतों की भाँति शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 91 (skanda.3.57.91)
सहायार्थं च सूर्यस्य यो द्विजो नांजलित्रयम् । क्षिपेन्मंदेहनाशाय सोपि मंदेहतां व्रजेत्
sahāyārthaṁ ca sūryasya yo dvijo nāṁjalitrayam kṣipenmaṁdehanāśāya sopi maṁdehatāṁ vrajet
जो द्विज सूर्य की सहायता के लिए मंदेह के नाश हेतु तीन अंजलि जल नहीं छोड़ता, वह स्वयं भी मंदेह जैसी दशा को प्राप्त होता है।
श्लोक 92 (skanda.3.57.92)
प्रातस्तावज्जपंस्तिष्ठेद्यावत्सूर्यस्य दर्शनम् । उपविष्टो जपेत्सायमृक्षाणामाविलोकनात्
prātastāvajjapaṁstiṣṭhedyāvatsūryasya darśanam upaviṣṭo japetsāyamṛkṣāṇāmāvilokanāt
प्रातःकाल जब तक सूर्य का दर्शन न हो, तब तक खड़े होकर जप करे; सायंकाल तारों के दिखायी देने तक बैठकर जप करे।
श्लोक 93 (skanda.3.57.93)
काललोपो न कर्त्तव्यो द्विजेन स्वहितेप्सुना । अर्द्धोदयास्तसमये तस्माद्वज्रोदकं क्षिपेत्
kālalopo na karttavyo dvijena svahitepsunā ardhodayāstasamaye tasmādvajrodakaṁ kṣipet
अपना हित चाहने वाले द्विज को समय का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। अतः सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के आधे समय पर ही वज्र-जल का प्रक्षेपण करे।
श्लोक 94 (skanda.3.57.94)
विधिनापि कृता संध्या कालातीता ऽफला भवेत् । अयमेव हि दृष्टांतो वंध्यास्त्रीमैथुनं यथा
vidhināpi kṛtā saṁdhyā kālātītā'phalā bhavet ayameva hi dṛṣṭāṁto vaṁdhyāstrīmaithunaṁ yathā
यदि विधिपूर्वक भी संध्या की जाये किन्तु समय बीत जाने पर, तो वह निष्फल हो जाती है। इसका उदाहरण है वंध्या स्त्री के साथ मैथुन के समान।
श्लोक 95 (skanda.3.57.95)
जले वामकरं कृत्वा या संध्याऽऽचरिता द्विजैः । वृषली सा परिज्ञेया रक्षोगणमुदावहा
jale vāmakaraṁ kṛtvā yā saṁdhyācaritā dvijaiḥ vṛṣalī sā parijñeyā rakṣogaṇamudāvahā
जल में बायाँ हाथ रखकर द्विजों द्वारा जो संध्या की जाती है, वह वृषली के समान जाननी चाहिए, जो राक्षसगणों को हर्ष प्रदान करने वाली है।
श्लोक 96 (skanda.3.57.96)
उपस्थानं ततः कुर्याच्छाखोक्तविधिना ततः । सहस्रकृत्वो गायत्र्याः शतकृत्वोथवा पुनः
upasthānaṁ tataḥ kuryācchākhoktavidhinā tataḥ sahasrakṛtvo gāyatryāḥ śatakṛtvothavā punaḥ
फिर अपनी शाखा में कहे गये विधान के अनुसार उपस्थान करे — गायत्री का सहस्र बार, अथवा शतबार जप करे।
श्लोक 97 (skanda.3.57.97)
दशकृत्वोऽथ देव्यै च कुर्यात्सौरीमुपस्थितिम् । सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्
daśakṛtvo'tha devyai ca kuryātsaurīmupasthitim sahasraparamāṁ devīṁ śatamadhyāṁ daśāvarām
अथवा दस बार जप कर, देवी के समक्ष सूर्य-संबंधी उपस्थान करे। उस देवी की उपासना अधिकतम सहस्र बार, मध्यम रूप से शत बार, और न्यूनतम दस बार करनी चाहिए।
श्लोक 98 (skanda.3.57.98)
गायत्रीं यो जपेद्विप्रो न स पापैः प्रलिप्यते । रक्तचंदनमिश्राभिरद्भिश्च कुसुमैः कुशैः
gāyatrīṁ yo japedvipro na sa pāpaiḥ pralipyate raktacaṁdanamiśrābhiradbhiśca kusumaiḥ kuśaiḥ
जो ब्राह्मण गायत्री का जप करता है, वह पापों से लिप्त नहीं होता। रक्तचन्दन मिश्रित जल से, पुष्पों तथा कुशों से —
श्लोक 99 (skanda.3.57.99)
वेदोक्तैरागमोक्तैर्वा मंत्रैरर्घं प्रदापयेत् । अर्चितः सविता येन तेन त्रैलोक्यमर्च्चितम्
vedoktairāgamoktairvā maṁtrairarghaṁ pradāpayet arcitaḥ savitā yena tena trailokyamarccitam
वेदोक्त अथवा आगमोक्त मंत्रों से अर्घ्य अर्पित करे। जिसने सूर्य की पूजा कर ली, उसने मानो तीनों लोकों की पूजा कर ली।
श्लोक 100 (skanda.3.57.100)
अर्चितः सविता दत्ते सुतान्पशुवसूनि च । व्याधीन्हरेद्ददात्यायुः पूरयेद्वांछितान्यपि
arcitaḥ savitā datte sutānpaśuvasūni ca vyādhīnharedadadātyāyuḥ pūrayedvāṁchitānyapi
पूजित हुआ सूर्य पुत्र, पशु तथा धन प्रदान करता है; वह रोगों को हरता है, आयु देता है, और सभी अभीष्ट कामनाओं को भी पूर्ण करता है।
श्लोक 101 (skanda.3.57.101)
अयं हि रुद्र आदित्यो हरिरेष दिवाकरः । रविर्हिरण्यरूपोऽसौ त्रयीरूपोऽयमर्यमा
ayaṁ hi rudra ādityo harireṣa divākaraḥ ravirhiraṇyarūpo'sau trayīrūpo'yamaryamā
यह आदित्य ही रुद्र है, यह दिवाकर ही हरि है; यह रवि स्वर्णरूप है, यह अर्यमा त्रयी का स्वरूप है।
श्लोक 102 (skanda.3.57.102)
ततस्तु तर्पणं कुर्यात्स्वशाखोक्तविधानतः । ब्रह्मादीनखिलान्देवान्मरीच्यादींस्तथा मुनीन्
tatastu tarpaṇaṁ kuryātsvaśākhoktavidhānataḥ brahmādīnakhilāndevānmarīcyādīṁstathā munīn
फिर अपनी शाखा में कहे गये विधान के अनुसार तर्पण करे — ब्रह्मा आदि समस्त देवताओं का, तथा मरीचि आदि मुनियों का भी।
श्लोक 103 (skanda.3.57.103)
चंदनागुरुकर्प्पूरगंधवत्कुसमैरपि । तर्पयेच्छुचिभिस्तोयैस्तृप्यंत्विति समुच्चरेत्
caṁdanāgurukarppūragaṁdhavatkusamairapi tarpayecchucibhistoyaistṛpyaṁtviti samuccaret
चन्दन, अगुरु, कर्पूर तथा सुगन्धित पुष्पों सहित शुद्ध जल से तर्पण करे, तथा 'तृप्यन्तु' यह उच्चारण करे।
श्लोक 104 (skanda.3.57.104)
सनकादीन्मनुष्यांश्च निवीती तर्पयेद्यवैः । अंगुष्ठद्वयमध्ये तु कृत्वा दर्भानृजून्द्विजः
sanakādīnmanuṣyāṁśca nivītī tarpayedyavaiḥ aṁguṣṭhadvayamadhye tu kṛtvā darbhānṛjūndvijaḥ
निवीत होकर सनक आदि तथा मनुष्यों को यव से तर्पण करे। द्विज दोनों अंगूठों के मध्य सीधे कुश रखकर —
श्लोक 105 (skanda.3.57.105)
कव्यवाडनलादींश्च पितॄन्दिव्यान्प्रतर्प्पयेत् । प्राचीनावीतिको दर्भैर्द्विगुणैस्तिलमिश्रितैः
kavyavāḍanalādīṁśca pitṝndivyānpratarppayet prācīnāvītiko darbhairdviguṇaistilamiśritaiḥ
कव्यवाहन अग्नि आदि दिव्य पितरों का तर्पण करे। यज्ञोपवीत को दायें कंधे पर रखकर, दुगुने कुश तथा तिल मिश्रित जल से —
श्लोक 106 (skanda.3.57.106)
रवौ शुक्ले त्रयोदश्यां सप्तम्यां निशि संध्ययोः । श्रेयोर्थी ब्राह्मणो जातु न कुर्यात्तिलतर्प्पणम्
ravau śukle trayodaśyāṁ saptamyāṁ niśi saṁdhyayoḥ śreyorthī brāhmaṇo jātu na kuryāttilatarppaṇam
रविवार को, शुक्ल त्रयोदशी को, सप्तमी को, रात्रि में तथा दोनों संध्याओं में, कल्याण चाहने वाले ब्राह्मण को कभी तिल-तर्पण नहीं करना चाहिए।
श्लोक 107 (skanda.3.57.107)
यदि कुर्यात्ततः कुर्याच्छुक्लैरेव तिलैः कृती । चतुर्दश यमान्पश्चात्तर्पयेन्नाम उच्चरन्
yadi kuryāttataḥ kuryācchuklaireva tilaiḥ kṛtī caturdaśa yamānpaścāttarpayennāma uccaran
यदि करना ही पड़े, तो कुशल पुरुष श्वेत तिलों से ही करे। इसके बाद नाम लेकर चौदह यमों का तर्पण करे।
श्लोक 108 (skanda.3.57.108)
ततः स्वगोत्रमुच्चार्य तर्पयेत्स्वान्पितॄन्मुदा । सव्यजानुनिपातेन पितृतीर्थेन वाग्यतः
tataḥ svagotramuccārya tarpayetsvānpitṝnmudā savyajānunipātena pitṛtīrthena vāgyataḥ
फिर अपना गोत्र उच्चारण कर, आनंदपूर्वक अपने पितरों का तर्पण करे — बायें घुटने को झुकाकर, पितृ-तीर्थ से, मौन रहकर।
श्लोक 109 (skanda.3.57.109)
एकैकमंजलिं देवा द्वौद्वौ तु सनकादिकाः । पितरस्त्रीन्प्रवांछंति स्त्रिय एकैकमंजलिम्
ekaikamaṁjaliṁ devā dvaudvau tu sanakādikāḥ pitarastrīnpravāṁchaṁti striya ekaikamaṁjalim
देवता एक-एक अंजलि चाहते हैं, सनक आदि दो-दो अंजलि, पितर तीन-तीन अंजलि, तथा स्त्रियाँ एक-एक अंजलि चाहती हैं।
श्लोक 110 (skanda.3.57.110)
अंगुल्यग्रेण वै दैवमार्षमंगुलिमूलगम् । ब्राह्ममंगुष्ठमूले तु पाणिमध्ये प्रजापतेः
aṁgulyagreṇa vai daivamārṣamaṁgulimūlagam brāhmamaṁguṣṭhamūle tu pāṇimadhye prajāpateḥ
अंगुलियों के अग्रभाग से देव-तीर्थ, अंगुलियों के मूल भाग से ऋषि-तीर्थ, अंगूठे के मूल में ब्रह्म-तीर्थ, तथा हथेली के मध्य में प्रजापति-तीर्थ होता है।
श्लोक 111 (skanda.3.57.111)
मध्येंगुष्ठप्रदेशिन्योः पित्र्यं तीर्थं प्रचक्षते । आब्रह्मस्तंबपर्यंतं देवर्षिपितृमानवाः
madhyeṁguṣṭhapradeśinyoḥ pitryaṁ tīrthaṁ pracakṣate ābrahmastaṁbaparyaṁtaṁ devarṣipitṛmānavāḥ
अंगूठे और तर्जनी के मध्य में पितृ-तीर्थ कहा जाता है। ब्रह्मा से लेकर तृण तक — देवता, ऋषि, पितर तथा मनुष्य —
श्लोक 112 (skanda.3.57.112)
तृप्यंतु सर्व्वे पितरो मातृमातामहादयः । अन्ये च मंत्राः प्रोक्ता ये वेदोक्ताः पुराणसंभवाः
tṛpyaṁtu sarve pitaro mātṛmātāmahādayaḥ anye ca maṁtrāḥ proktā ye vedoktāḥ purāṇasaṁbhavāḥ
— सब तृप्त हों। माता, नाना आदि सभी पितर तृप्त हों। इसके अतिरिक्त जो अन्य वेदोक्त तथा पुराणोक्त मंत्र कहे गये हैं —
श्लोक 113 (skanda.3.57.113)
सांगं च तर्प्पणं कुर्यात्पितॄणां च सुखप्रदम् । अग्निकार्यं ततः कृत्वा वेदाभ्यासं ततश्चरेत्
sāṁgaṁ ca tarppaṇaṁ kuryātpitṝṇāṁ ca sukhapradam agnikāryaṁ tataḥ kṛtvā vedābhyāsaṁ tataścaret
— उन सबसे सांगोपांग तर्पण करे, जो पितरों को सुख देने वाला है। फिर अग्निकार्य करके, वेद का अभ्यास करे।
श्लोक 114 (skanda.3.57.114)
श्रुत्यभ्यासः पंचधा स्यात्स्वीकारोऽर्थविचारणम् । अभ्यासश्च तपश्चापि शिष्येभ्यः प्रतिपादनम्
śrutyabhyāsaḥ paṁcadhā syātsvīkāro'rthavicāraṇam abhyāsaśca tapaścāpi śiṣyebhyaḥ pratipādanam
श्रुति का अभ्यास पाँच प्रकार का होता है — ग्रहण, अर्थ-विचार, अभ्यास, तप, तथा शिष्यों को उपदेश।
श्लोक 115 (skanda.3.57.115)
लब्धस्य प्रतिपालार्थमलब्धस्य च लब्धये । प्रातःकृत्यमिदं प्रोक्तं द्विजातीनां नृपोत्तम
labdhasya pratipālārthamalabdhasya ca labdhaye prātaḥkṛtyamidaṁ proktaṁ dvijātīnāṁ nṛpottama
प्राप्त की हुई विद्या की रक्षा के लिए तथा अप्राप्त की प्राप्ति के लिए यह किया जाता है। हे नृपोत्तम! यह द्विजों का प्रातःकृत्य कहा गया है।
श्लोक 116 (skanda.3.57.116)
अथवा प्रातरुत्थाय कृत्वावश्यकमेव च । शौचाचमनमादाय भक्षयेद्दन्तधावनम्
athavā prātarutthāya kṛtvāvaśyakameva ca śaucācamanamādāya bhakṣayeddantadhāvanam
अथवा प्रातःकाल उठकर, आवश्यक कार्य करके, शौच और आचमन के पश्चात् दन्तधावन करे।
श्लोक 117 (skanda.3.57.117)
विशोध्य सर्वगात्राणि प्रातःसंध्यां समाचरेत् । वेदार्थानधिगच्छेद्वै शास्त्राणि विविधान्यपि
viśodhya sarvagātrāṇi prātaḥsaṁdhyāṁ samācaret vedārthānadhigacchedvai śāstrāṇi vividhānyapi
सम्पूर्ण अंगों को शुद्ध करके प्रातःसंध्या करे, तथा वेद के अर्थों को और नाना शास्त्रों को भी ग्रहण करे।
श्लोक 118 (skanda.3.57.118)
अध्यापयेच्छुचीञ्छिष्यान्हितान्मेधासमन्वितान् । उपेयादीश्वरं चापि योगक्षेमादिसिद्धये
adhyāpayecchucīñchiṣyānhitānmedhāsamanvitān upeyādīśvaraṁ cāpi yogakṣemādisiddhaye
पवित्र, हितैषी तथा बुद्धिमान शिष्यों को पढ़ाये, और योगक्षेम आदि की सिद्धि के लिए ईश्वर की उपासना भी करे।
श्लोक 119 (skanda.3.57.119)
ततो मध्याह्नसिद्ध्यर्थं पूर्वोक्तं स्नानमाचरेत् । स्नात्वा माध्याह्निकीं संध्यामुपासीत विचक्षणः
tato madhyāhnasiddhyarthaṁ pūrvoktaṁ snānamācaret snātvā mādhyāhnikīṁ saṁdhyāmupāsīta vicakṣaṇaḥ
फिर मध्याह्न-कर्म की सिद्धि के लिए पूर्वोक्त स्नान करे। स्नान करके विचक्षण पुरुष माध्याह्निक संध्या की उपासना करे।
श्लोक 120 (skanda.3.57.120)
देवतां परिपूज्याथ नैमित्तिकं विधिं चरेत् । पवनाग्निं समुज्ज्वाल्य वैश्वदेवं समाचरेत्
devatāṁ paripūjyātha naimittikaṁ vidhiṁ caret pavanāgniṁ samujjvālya vaiśvadevaṁ samācaret
देवता की समुचित पूजा करके नैमित्तिक विधि का पालन करे। वायु द्वारा अग्नि को प्रज्वलित कर वैश्वदेव करे।
श्लोक 121 (skanda.3.57.121)
निष्पावान्कोद्रवान्माषान्कलापांश्चणकांस्त्यजेत् । तैलपक्वमपक्वान्नं सर्वं लवणयुक्त्यजेत्
niṣpāvānkodravānmāṣānkalāpāṁścaṇakāṁstyajet tailapakvamapakvānnaṁ sarvaṁ lavaṇayuktyajet
वैश्वदेव में निष्पाव, कोदो, उड़द, कलाय तथा चने का त्याग करे; तेल में पकाया अन्न, कच्चा अन्न, तथा नमक मिला हुआ सब कुछ भी त्याग दे।
श्लोक 122 (skanda.3.57.122)
आढक्यन्नं मसूरान्नं वर्तुलधान्यसंभवम् । भुक्तशेषं पर्युषितं वैश्वदेवे विवर्जयेत्
āḍhakyannaṁ masūrānnaṁ vartuladhānyasaṁbhavam bhuktaśeṣaṁ paryuṣitaṁ vaiśvadeve vivarjayet
अरहर से बना अन्न, मसूर से बना अन्न, गोल धान्य से बना अन्न, भोजन का उच्छिष्ट भाग, तथा बासी अन्न — इन सबका वैश्वदेव में त्याग करे।
श्लोक 123 (skanda.3.57.123)
दर्भपाणिः समाचम्य प्राणायामं विधाय च । पृषोदिवीति मंत्रेण पर्य्युक्षणमथाचरेत्
darbhapāṇiḥ samācamya prāṇāyāmaṁ vidhāya ca pṛṣodivīti maṁtreṇa paryyukṣaṇamathācaret
हाथ में कुश लेकर आचमन करे और प्राणायाम करे, फिर 'पृषदाज्यम्' इत्यादि मंत्र से पात्रों का प्रोक्षण करे।
श्लोक 124 (skanda.3.57.124)
प्रदक्षिणं च पर्युक्ष्य द्विः परिस्तीर्य वै कुशान् । रापोर्द्ध(?) देवमन्त्रेण कुर्याद्वह्निं स्वसंमुखे
pradakṣiṇaṁ ca paryukṣya dviḥ paristīrya vai kuśān rāpordha(?) devamantreṇa kuryādvahniṁ svasaṁmukhe
प्रदक्षिणक्रम से प्रोक्षण करके, दो बार कुश बिछाकर, राओर्ध(?) देवमंत्र से अग्नि को अपने सम्मुख स्थापित करे।
श्लोक 125 (skanda.3.57.125)
वैश्वानरं समभ्यर्च्य गन्धपुष्पाक्षतैस्तथा । स्वशाखोक्तप्रकारेण होमं कुर्याद्विचक्षणः
vaiśvānaraṁ samabhyarcya gaṁdhapuṣpākṣataistathā svaśākhoktaprakāreṇa homaṁ kuryādvicakṣaṇaḥ
गंध, पुष्प तथा अक्षतों से वैश्वानर अग्नि की पूजा करके, विचक्षण पुरुष अपनी शाखा में कहे गये प्रकार से हवन करे।
श्लोक 126 (skanda.3.57.126)
अध्वगः क्षीणवृत्तिश्च विद्यार्थी गुरुपोषकः । यतिश्च ब्रह्मचारी च षडेते धर्मभिक्षकाः
adhvagaḥ kṣīṇavṛttiśca vidyārthī gurupoṣakaḥ yatiśca brahmacārī ca ṣaḍete dharmabhikṣakāḥ
यात्री, जिसकी वृत्ति क्षीण हो गयी हो, विद्यार्थी, गुरु का पोषण करने वाला, संन्यासी तथा ब्रह्मचारी — ये छह धर्म से भिक्षा माँगने वाले हैं।
श्लोक 127 (skanda.3.57.127)
अतिथिः पांथिको ज्ञेयोऽनूचानः श्रुतिपारगः । मान्यावेतौ गृहस्थानां ब्रह्मलोकमभीप्सताम्
atithiḥ pāṁthiko jñeyo'nūcānaḥ śrutipāragaḥ mānyāvetau gṛhasthānāṁ brahmalokamabhīpsatām
अतिथि को यात्री जानना चाहिए, तथा जो वेदपारंगत हो वह अनूचान है — जो गृहस्थ ब्रह्मलोक की कामना रखते हैं, उनके लिए ये दोनों आदरणीय हैं।
श्लोक 128 (skanda.3.57.128)
अपि श्वपाके शुनि वा नैवान्नं निष्फलं भवेत् । अत्रार्थिनि समायाते पात्रापात्रं न चिंतयेत्
api śvapāke śuni vā naivānnaṁ niṣphalaṁ bhavet atrārthini samāyāte pātrāpātraṁ na ciṁtayet
चाण्डाल को अथवा कुत्ते को भी दिया गया अन्न कभी निष्फल नहीं होता। जब कोई याचक आ जाये, तब पात्र-अपात्र का विचार न करे।
श्लोक 129 (skanda.3.57.129)
शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम् । काकानां च कृमीणां च बहिरन्नं किरेद्भुवि
śunāṁ ca patitānāṁ ca śvapacāṁ pāparogiṇām kākānāṁ ca kṛmīṇāṁ ca bahirannaṁ kiredbhuvi
कुत्तों, पतितों, चाण्डालों, पापरोगियों, कौओं तथा कीड़ों के लिए घर के बाहर भूमि पर अन्न बिखेरे।
श्लोक 130 (skanda.3.57.130)
ऐन्द्रवारुणवायव्याः सौम्या वै नैर्ऋताश्च ये । प्रतिगृह्णंत्विमं पिंडं काका भूमौ मयार्पितम्
aiṁdravāruṇavāyavyāḥ saumyā vai nairṛtāśca ye pratigṛhṇaṁtvimaṁ piṁḍaṁ kākā bhūmau mayārpitam
इन्द्र, वरुण, वायु, सोम तथा निर्ऋति के काक-गण इस अन्न-पिंड को ग्रहण करें, जिसे मैंने भूमि पर अर्पित किया है।
श्लोक 131 (skanda.3.57.131)
इत्थं भूतबलिं कृत्वा कालं गोदोहमात्रकम् । प्रतीक्ष्यातिथिमायातं विशद्भोज्यगृहं ततः
itthaṁ bhūtabaliṁ kṛtvā kālaṁ godohamātrakam pratīkṣyātithimāyātaṁ viśadbhojyagṛhaṁ tataḥ
इस प्रकार भूत-बलि करके, गाय दुहने के बराबर समय तक आगन्तुक अतिथि की प्रतीक्षा करे, फिर भोजनगृह में प्रवेश करे।
श्लोक 132 (skanda.3.57.132)
अदत्त्वा वायसबलिं नित्यश्राद्धं समाचरेत् । नित्यश्राद्धे स्वसामर्थ्यात्त्रीन्द्वावेकमथापि वा
adattvā vāyasabaliṁ nityaśrāddhaṁ samācaret nityaśrāddhe svasāmarthyāttrīndvāvekamathāpi vā
काकबलि दिये बिना नित्यश्राद्ध न करे। नित्यश्राद्ध में अपनी सामर्थ्य के अनुसार तीन, दो, अथवा एक ब्राह्मण को भोजन कराये।
श्लोक 133 (skanda.3.57.133)
भोजयेत्पितृयज्ञार्थं दद्यादुद्धत्य वारि च । नित्यश्राद्धं दैवहीनं नियमादिविवर्जितम्
bhojayetpitṛyajñārthaṁ dadyāduddhatya vāri ca nityaśrāddhaṁ daivahīnaṁ niyamādivivarjitam
पितृयज्ञ के निमित्त भोजन कराये तथा जल हाथ में लेकर अर्पित करे। नित्यश्राद्ध देव-भाग से रहित तथा नियम आदि से भी रहित होता है।
श्लोक 134 (skanda.3.57.134)
दक्षिणारहितं त्वेतद्दातृभोक्तृसुतृप्तिकृत् । पितृयज्ञं विधायेत्थं स्वस्थबुद्धिरनातुरः
dakṣiṇārahitaṁ tvetaddātṛbhoktṛsutṛptikṛt pitṛyajñaṁ vidhāyetthaṁ svasthabuddhiranāturaḥ
यह दक्षिणा से रहित होता है, किन्तु देने वाले और खाने वाले दोनों को भलीभाँति तृप्त करने वाला है। इस प्रकार पितृयज्ञ करके, स्वस्थचित्त तथा रोगरहित होकर —
श्लोक 135 (skanda.3.57.135)
अदुष्टासनमध्यास्य भुंजीत शिशुभिः सह । सुगन्धिः सुमनाः स्रग्वी शुचिवासोद्वयान्वितः
aduṣṭāsanamadhyāsya bhuṁjīta śiśubhiḥ saha sugaṁdhiḥ sumanāḥ sragvī śucivāsodvayānvitaḥ
— निर्दोष आसन पर बैठकर बालकों के साथ भोजन करे — सुगंधित, प्रसन्नचित्त, माला पहने हुए, दो शुद्ध वस्त्रों से युक्त होकर।
श्लोक 136 (skanda.3.57.136)
प्रागास्य उदगास्यो वा भुंजीत पितृसेवितम् । विधायान्नमनग्नं तदुपरिष्टादधस्तथा
prāgāsya udagāsyo vā bhuṁjīta pitṛsevitam vidhāyānnamanagnaṁ tadupariṣṭādadhastathā
पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके, पितरों द्वारा सेवित अन्न को खाये, उसे बिना जलाये, ऊपर और नीचे यथाविधि रखकर।
श्लोक 137 (skanda.3.57.137)
आपोशानविधानेन कृत्वाश्नीयात्सुधीर्द्विजः । भूमौ बलित्रयं कुर्यादपो दद्यात्तदोपरि
āpośānavidhānena kṛtvāśnīyātsudhīrdvijaḥ bhūmau balitrayaṁ kuryādapo dadyāttadopari
बुद्धिमान द्विज आपोशन-विधि करके भोजन करे। भूमि पर तीन बार बलि दे, तथा उसके ऊपर जल भी अर्पित करे।
श्लोक 138 (skanda.3.57.138)
सकृच्चाप उपस्पृश्य प्राणाद्याहुतिपंचकम् । दद्याजठरकुंडाग्नौ दर्भपाणिः प्रसन्नधीः
sakṛccāpa upaspṛśya prāṇādyāhutipaṁcakam dadyājaṭharakuṁḍāgnau darbhapāṇiḥ prasannadhīḥ
एक बार जल का स्पर्श करके, प्रसन्नचित्त होकर, कुश हाथ में लिये हुए, प्राण आदि पाँच आहुतियाँ उदर-रूपी अग्निकुंड में अर्पित करे।
श्लोक 139 (skanda.3.57.139)
दर्भपाणिस्तु यो भुंक्ते तस्य दोषो न विद्यते । केशकीटादिसंभूतस्तदश्नीयात्सदर्भकः
darbhapāṇistu yo bhuṁkte tasya doṣo na vidyate keśakīṭādisaṁbhūtastadaśnīyātsadarbhakaḥ
जो कुश हाथ में लेकर भोजन करता है, उसे कोई दोष नहीं लगता। यदि बाल, कीड़े आदि से दूषित अन्न हो, तो भी कुशधारी उसे खा सकता है।
श्लोक 140 (skanda.3.57.140)
ततो मौनेन भुञ्जीत न कुर्याद्दंतघर्षणम् । प्रक्षालितव्यहस्तस्य दक्षिणांगुष्ठमूलतः
tato maunena bhuñjīta na kuryāddaṁtagharṣaṇam prakṣālitavyahastasya dakṣiṇāṁguṣṭhamūlataḥ
फिर मौन रहकर भोजन करे, दाँतों को न बजाये। भोजन के बाद दायें अंगूठे के मूल भाग से हाथ धोना चाहिए।
श्लोक 141 (skanda.3.57.141)
रौरवेऽपुण्यनिलये अधोलोकनिवासिनाम् । उच्छिष्टोदकमिच्छूनामक्षय्यमुपतिष्ठताम्
raurave'puṇyanilaye adholokanivāsinām ucchiṣṭodakamicchūnāmakṣayyamupatiṣṭhatām
रौरव नामक अपुण्य निवासस्थान में रहने वाले, तथा अधोलोक में निवास करने वाले प्राणी, जो जूठे जल की इच्छा रखते हुए प्रतीक्षा करते हैं, उन्हें वह अक्षय होकर प्राप्त होता है।
श्लोक 142 (skanda.3.57.142)
पुनराचम्य मेधावी शुचिर्भूत्वा प्रयत्नतः । मुखशुद्धिं ततः कृत्वा पुराणश्रवणादिभिः
punarācamya medhāvī śucirbhūtvā prayatnataḥ mukhaśuddhiṁ tataḥ kṛtvā purāṇaśravaṇādibhiḥ
फिर बुद्धिमान पुरुष पुनः आचमन करके, यत्नपूर्वक शुद्ध होकर, मुख की शुद्धि करे, तत्पश्चात् पुराण-श्रवण आदि करे।
श्लोक 143 (skanda.3.57.143)
अतिवाह्य दिवाशेषं ततः संध्यां समाचरेत् । गृहेषु प्राकृता संध्या गोष्टे दशगुणा स्मृता
ativāhya divāśeṣaṁ tataḥ saṁdhyāṁ samācaret gṛheṣu prākṛtā saṁdhyā goṣṭhe daśaguṇā smṛtā
इस प्रकार शेष दिन बिताकर संध्या करे। घर में की गयी संध्या साधारण फल देती है, गौशाला में की गयी संध्या दस गुना फलदायी मानी गयी है।
श्लोक 144 (skanda.3.57.144)
नद्यामयुतसंख्या स्यादनंता शिवसन्निधौ । अनृतं मद्यगन्धं च दिवामैथुनमेव च । पुनाति वृषलस्थानं संध्या बहिरुपासिता
nadyāmayutasaṁkhyā syādanaṁtā śivasannidhau anṛtaṁ madyagaṁdhaṁ ca divāmaithunameva ca punāti vṛṣalasthānaṁ saṁdhyā bahirupāsitā
नदी में की गयी संध्या दस-हजार गुना, और शिव के समीप की गयी संध्या अनंत फलदायी होती है। असत्य भाषण, मद्य की गंध, तथा दिन में मैथुन — इन सबसे उत्पन्न वृषलपन को भी बाहर बैठकर की गयी संध्या शुद्ध कर देती है।
श्लोक 145 (skanda.3.57.145)
उद्देशतः समाख्यात एष नित्यतनो विधिः । इत्थं समाचरन्विप्रो नावसीदति कर्हिचित्
uddeśataḥ samākhyāta eṣa nityatano vidhiḥ itthaṁ samācaranvipro nāvasīdati karhicit
इस प्रकार संक्षेप में यह नित्यकर्म की विधि कही गयी। इस प्रकार आचरण करने वाला ब्राह्मण कभी भी संकट में नहीं पड़ता।