ब्रह्म खण्ड · अध्याय 58
सदाचार-लक्षण-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.3.58.1)
व्यास उवाच । उपकाराय साधूनां गृहस्थाश्रमवासिनाम् । यथा च क्रियते धर्मो यथावत्कथयामि ते
vyāsa uvāca upakārāya sādhūnāṁ gṛhasthāśramavāsinām yathā ca kriyate dharmo yathāvatkathayāmi te
व्यासजी बोले — गृहस्थाश्रम में रहने वाले साधु पुरुषों के उपकार के लिए, जिस प्रकार धर्म का आचरण किया जाता है, वह मैं यथावत् तुमसे कहता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.3.58.2)
वत्स गार्हस्थ्यमास्थाय नरः सर्वमिदं जगत् । पुष्णाति तेन लोकांश्च स जयत्यभिवांछितान्
vatsa gārhasthyamāsthāya naraḥ sarvamidaṁ jagat puṣṇāti tena lokāṁśca sa jayatyabhivāṁchitān
हे वत्स! गृहस्थाश्रम में स्थित होकर मनुष्य इस समस्त जगत् का पोषण करता है, और इस प्रकार वह समस्त इच्छित लोकों को जीत लेता है।
श्लोक 3 (skanda.3.58.3)
पितरो मुनयो देवा भूतानि मनुजास्तथा । क्रिमिकीटपतंगाश्च वयांसि पितरोऽसुराः
pitaro munayo devā bhūtāni manujāstathā krimikīṭapataṁgāśca vayāṁsi pitaro'surāḥ
पितर, मुनि, देवता, भूत, मनुष्य, कृमि-कीट-पतंग, पक्षी तथा असुर —
श्लोक 4 (skanda.3.58.4)
गृहस्थमुपजीवंति ततस्तृप्तिं प्रयांति च । मुखं वास्य निरीक्षंते अपो नो दास्यतीति च
gṛhasthamupajīvaṁti tatastṛptiṁ prayāṁti ca mukhaṁ vāsya nirīkṣaṁte apo no dāsyatīti ca
— सभी गृहस्थ पर निर्भर रहकर तृप्ति को प्राप्त होते हैं, और उसके मुख की ओर देखते हैं कि यह हमें जल देगा या नहीं।
श्लोक 5 (skanda.3.58.5)
सर्वस्याधारभूता ये वत्स धेनुस्त्रयीमयी । अस्यां प्रतिष्ठितं विश्वं विश्वहेतुश्च या मता
sarvasyādhārabhūtā ye vatsa dhenustrayīmayī asyāṁ pratiṣṭhitaṁ viśvaṁ viśvahetuśca yā matā
हे वत्स! सबका आधार बनी हुई वह गौ त्रयीमयी है; इसी में सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है, और यह विश्व का हेतु भी मानी जाती है।
श्लोक 6 (skanda.3.58.6)
ऋक्पृष्ठासौ यजुःसंध्या सामकुक्षिपयोधरा । इष्टापूर्तविषाणा च साधुसूक्ततनूरुहा
ṛkpṛṣṭhāsau yajuḥsaṁdhyā sāmakukṣipayodharā iṣṭāpūrtaviṣāṇā ca sādhusūktatanūruhā
उसकी पीठ ऋग्वेद है, उसकी संधियाँ यजुर्वेद हैं, उसका उदर और स्तन सामवेद हैं, उसके सींग इष्टापूर्त हैं, तथा उसके शरीर के रोम सुन्दर सूक्त हैं।
श्लोक 7 (skanda.3.58.7)
शांति पुष्टिशकृन्मूत्रा वर्णपादप्रतिष्ठिता । उपजीव्यमाना जगतां पदक्रमजटाघनैः
śāṁti puṣṭiśakṛnmūtrā varṇapādapratiṣṭhitā upajīvyamānā jagatāṁ padakramajaṭāghanaiḥ
उसका गोबर और मूत्र शांति और पुष्टि प्रदान करने वाले हैं, वह वर्णों के अनुसार अपने पैरों पर प्रतिष्ठित है, और संसार उसकी चाल के क्रम तथा उसके सघन रोमों से जीविका पाता है।
श्लोक 8 (skanda.3.58.8)
स्वाहाकारस्वधाकारौ वषट्कारश्च पुत्रक । हन्तकारस्तथैवान्यस्तस्याः स्तनचतुष्टयम्
svāhākārasvadhākārau vaṣaṭkāraśca putraka hantakārastathaivānyastasyāḥ stanacatuṣṭayam
हे पुत्रक! स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कार तथा हन्तकार — ये उसके चार स्तन हैं।
श्लोक 9 (skanda.3.58.9)
स्वाहाकारस्तनं देवाः पितरश्च स्वधामयम् । मुनयश्च वषट्कारं देवभूतसुरेश्वराः
svāhākārastanaṁ devāḥ pitaraśca svadhāmayam munayaśca vaṣaṭkāraṁ devabhūtasureśvarāḥ
देवता स्वाहाकार-स्तन से, पितर स्वधाकार-स्तन से, तथा देव-भूत-असुरों के स्वामी मुनिजन वषट्कार-स्तन से —
श्लोक 10 (skanda.3.58.10)
हन्तकारं मनुष्याश्च पिबंति सततं स्तनम् । एवमध्यापयेदेव वेदानां प्रत्यहं त्रयीम्
hantakāraṁ manuṣyāśca pibaṁti satataṁ stanam evamadhyāpayedeva vedānāṁ pratyahaṁ trayīm
— तथा मनुष्य हन्तकार-स्तन से सदा दूध पीते हैं। इस प्रकार प्रतिदिन वेदत्रयी का अध्यापन करना चाहिए।
श्लोक 11 (skanda.3.58.11)
तेषामुच्छेदकर्त्ता यः पुरुषोऽनंतपापकृत् । स तमस्यंधतामिस्रे नरके हि निमज्जति
teṣāmucchedakarttā yaḥ puruṣo'naṁtapāpakṛt sa tamasyaṁdhatāmisre narake hi nimajjati
जो पुरुष इनका उच्छेद करता है, वह अनंत पाप का कर्ता है; वह अंधतामिस्र नामक अंधकारमय नरक में डूब जाता है।
श्लोक 12 (skanda.3.58.12)
यस्त्वेनां मानवो धेनुं स्वर्वत्सैरमरादिभिः । पूजयत्युचिते काले स स्वर्गायोपपद्यते
yastvenāṁ mānavo dhenuṁ svarvatsairamarādibhiḥ pūjayatyucite kāle sa svargāyopapadyate
जो मनुष्य इस गौ को स्वर्ग के वत्सों तथा देवताओं आदि सहित उचित समय पर पूजता है, वह स्वर्ग को प्राप्त होता है।
श्लोक 13 (skanda.3.58.13)
तस्मात्पुत्र मनुष्येण देवर्षि पितृमानवाः । भूतानि चानुदिवसं पोष्याणि स्वतनुर्यथा
tasmātputra manuṣyeṇa devarṣi pitṛmānavāḥ bhūtāni cānudivasaṁ poṣyāṇi svatanuryathā
अतः हे पुत्र! मनुष्य को गोत, ऋषि, पितर, मनुष्य तथा भूतों का प्रतिदिन पोषण करना चाहिए, जैसे अपने शरीर का करता है।
श्लोक 14 (skanda.3.58.14)
तस्मात्स्नातः शुचिर्भूत्वा देवर्षिपितृतर्पणम् । यज्ञस्यांते तथैवाद्भिः काले कुर्यात्समाहितः
tasmātsnātaḥ śucirbhūtvā devarṣipitṛtarpaṇam yajñasyāṁte tathaivādbhiḥ kāle kuryātsamāhitaḥ
अतः स्नान कर शुद्ध होकर, यज्ञ के अंत में जल से देव-ऋषि-पितरों का तर्पण उचित समय पर एकाग्रचित्त होकर करना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.3.58.15)
सुमनोगन्धपुष्पैश्च देवानभ्यर्च्य मानवः । ततोग्नेस्तर्पणं कुर्याद्द्याच्चापि बलींस्तथा
sumanogandhapuṣpaiśca devānabhyarcya mānavaḥ tatognestarpaṇaṁ kuryāddyāccāpi baliṁstathā
फूलों तथा सुगंधित द्रव्यों से देवताओं की पूजा करके मनुष्य फिर अग्नि का तर्पण करे, और बलियाँ भी अर्पित करे।
श्लोक 16 (skanda.3.58.16)
नक्तंचरेभ्यो भूतेभ्यो बलिमाकाशतो हरेत् । पितॄणां निर्वपेत्तद्वद्दक्षिणाभिमुखस्ततः
naktaṁcarebhyo bhūtebhyo balimākāśato haret pitṝṇāṁ nirvapettadvaddakṣiṇābhimukhastataḥ
रात्रिचर भूतों के लिए आकाश की ओर बलि फेंके; फिर दक्षिण की ओर मुख करके उसी प्रकार पितरों के लिए भी अर्पित करे।
श्लोक 17 (skanda.3.58.17)
गृहस्थस्तत्परो भूत्वा समाहितमानसः । ततस्तोयमुपादाय तेष्वेवार्पणसत्क्रियाम्
gṛhasthastatparo bhūtvā samāhitamānasaḥ tatastoyamupādāya teṣvevārpaṇasatkriyām
गृहस्थ उसमें तत्पर होकर, चित्त को एकाग्र कर, फिर जल लेकर उन्हीं देवताओं आदि को अर्पित करने की सत्क्रिया —
श्लोक 18 (skanda.3.58.18)
स्थानेषु निक्षिपेत्प्राज्ञो नाम्ना तूदिश्य देवताः । एवं बलिं गृहे दत्त्वा गृहे गृहपतिः शुचिः
sthāneṣu nikṣipetprājño nāmnā tūdiśya devatāḥ evaṁ baliṁ gṛhe dattvā gṛhe gṛhapatiḥ śuciḥ
— वह विद्वान पुरुष उन देवताओं का नाम लेकर उचित स्थानों पर अर्पित करे। इस प्रकार घर में बलि देकर, गृहस्वामी शुद्ध होकर —
श्लोक 19 (skanda.3.58.19)
आचम्य च ततः कुर्यात्प्राज्ञो द्वारावलोकनम् । मुहूर्तस्याष्टमं भागमुदीक्षेतातिथिं ततः
ācamya ca tataḥ kuryātprājño dvārāvalokanam muhūrtasyāṣṭamaṁ bhāgamudīkṣetātithiṁ tataḥ
— फिर आचमन करके, विद्वान पुरुष द्वार की ओर देखे, तथा मुहूर्त के आठवें भाग तक अतिथि की प्रतीक्षा करे।
श्लोक 20 (skanda.3.58.20)
अतिथिं तत्र संप्राप्तमर्घ्यपाद्योदकेन च । बुभुक्षुमागतं श्रांतं याचमानमकिंचनम्
atithiṁ tatra saṁprāptamarghyapādyodakena ca bubhukṣumāgataṁ śrāṁtaṁ yācamānamakiṁcanam
उस समय आये हुए अतिथि को अर्घ्य और पाद्य-जल से सत्कार करे, चाहे वह भूखा, थका, याचक अथवा निर्धन ही क्यों न हो।
श्लोक 21 (skanda.3.58.21)
ब्राह्मणं प्राहुरतिथिं संपूज्य शक्तितो बुधैः । न पृछेत्तत्राचरणं स्वाध्यायं चापि पंडितः
brāhmaṇaṁ prāhuratithiṁ saṁpūjya śaktito budhaiḥ na pṛchettatrācaraṇaṁ svādhyāyaṁ cāpi paṇḍitaḥ
वे विद्वान लोग कहते हैं कि ब्राह्मण अतिथि की यथाशक्ति पूजा करनी चाहिए। पंडित को उससे उसका आचरण अथवा स्वाध्याय नहीं पूछना चाहिए।
श्लोक 22 (skanda.3.58.22)
शोभनाशोभनाकारं तं मन्येत प्रजापतिम् । अनित्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते
śobhanāśobhanākāraṁ taṁ manyeta prajāpatim anityaṁ hi sthito yasmāttasmādatithirucyate
चाहे वह शुभ रूप वाला हो अथवा अशुभ रूप वाला, उसे प्रजापति के समान माने; क्योंकि वह अनित्य रूप से ठहरता है, इसलिए उसे 'अतिथि' कहा जाता है।
श्लोक 23 (skanda.3.58.23)
तस्मै दत्त्वा तु यो भुंक्ते स तु भुंक्तेऽमृतं नरः । अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रति निवर्तते
tasmai dattvā tu yo bhuṁkte sa tu bhuṁkte'mṛtaṁ naraḥ atithiryasya bhagnāśo gṛhātprati nivartate
जो पुरुष अतिथि को देकर स्वयं भोजन करता है, वह अमृत का भोग करता है। जिसके घर से अतिथि निराश होकर लौटता है —
श्लोक 24 (skanda.3.58.24)
स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति । अपि वा शाकदानेन यद्वा तोयप्रदानतः । पूजयेत्तं नरः भक्त्या तेनैवातो विमुच्यते
sa dattvā duṣkṛtaṁ tasmai puṇyamādāya gacchati api vā śākadānena yadvā toyapradānataḥ pūjayettaṁ naraḥ bhaktyā tenaivāto vimucyate
— वह अतिथि अपना पाप उसे देकर तथा उसका पुण्य लेकर चला जाता है। चाहे साग के दान से हो अथवा जल के दान से ही, मनुष्य को भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिए; उतने मात्र से ही वह पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 25 (skanda.3.58.25)
युधिष्ठिर उवाच । विवाहा ब्राह्मदैवार्षाः प्राजापत्यासुरौ तथा । गांधर्वो राक्षसश्चापि पैशाचोष्टम उच्यते
yudhiṣṭhira uvāca vivāhā brāhmadaivārṣāḥ prājāpatyāsurau tathā gāṁdharvo rākṣasaścāpi paiśācoṣṭama ucyate
युधिष्ठिर बोले — ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य तथा आसुर विवाह — इसी प्रकार गांधर्व, राक्षस, तथा पैशाच नामक आठवाँ विवाह कहा जाता है।
श्लोक 26 (skanda.3.58.26)
एतेषां च विधिं ब्रूहि तथा कार्यं च तत्त्वतः । गृहस्थानां तथा धर्मान्ब्रूहि मे त्वं विशेषतः
eteṣāṁ ca vidhiṁ brūhi tathā kāryaṁ ca tattvataḥ gṛhasthānāṁ tathā dharmānbrūhi me tvaṁ viśeṣataḥ
इनकी विधि और वास्तविक कर्तव्य मुझे बतायें, तथा गृहस्थों के धर्मों को भी विशेष रूप से मुझसे कहें।
श्लोक 27 (skanda.3.58.27)
पराशर उवाच । स ब्राह्मो वरमाहूय यत्र कन्या स्वलंकृता । दीयते तत्सुतः पूयात्पुरुषानेकविंशतिम्
parāśara uvāca sa brāhmo varamāhūya yatra kanyā svalaṁkṛtā dīyate tatsutaḥ pūyātpuruṣānekaviṁśatim
पराशरजी बोले — जहाँ सुसज्जित कन्या को वर बुलाकर दिया जाता है, वह ब्राह्म विवाह है; इससे उत्पन्न पुत्र इक्कीस पीढ़ियों को पवित्र करता है।
श्लोक 28 (skanda.3.58.28)
यज्ञस्थायर्त्विजे दैवस्तज्जः पाति चतुर्दश । वरादादाय गोद्वन्द्वमार्षस्तज्जः पुनाति षट्
yajñasthāyartvije daivastajjaḥ pāti caturdaśa varādādāya godvandvamārṣastajjaḥ punāti ṣaṭ
यज्ञ में स्थित पुरोहित को कन्या देने पर वह दैव विवाह है, उससे उत्पन्न पुत्र चौदह पीढ़ियों की रक्षा करता है। वर से गौओं की एक जोड़ी लेकर कन्या देने पर वह आर्ष विवाह है, उससे उत्पन्न पुत्र छह पीढ़ियों को पवित्र करता है।
श्लोक 29 (skanda.3.58.29)
सहोभौ चरतां धर्मं प्राजापत्यः स ईरितः । वरवध्वोः स्वेच्छय्रा च गांधर्वोऽन्योन्यमैत्रतः । प्रसह्य कन्याहरणाद्राक्षसो निन्दितः सताम्
sahobhau caratāṁ dharmaṁ prājāpatyaḥ sa īritaḥ varavadhvoḥ svecchayā ca gāṁdharvo'nyonyamaitrataḥ prasahya kanyāharaṇādrākṣaso niṁditaḥ satām
'तुम दोनों साथ मिलकर धर्म का आचरण करो' — इस वचन के साथ किया गया विवाह प्राजापत्य कहा जाता है। वर-वधू की अपनी इच्छा से, परस्पर प्रेम से किया गया विवाह गांधर्व है। बलपूर्वक कन्या का हरण करके किया गया विवाह राक्षस है, जो सज्जनों द्वारा निंदित है।
श्लोक 30 (skanda.3.58.30)
छलेन कन्याहरणात्पैशाचो गर्हितोऽष्टमः । प्रायः क्षत्रविशोरुक्ता गांधर्वासुरराक्षसाः
chalena kanyāharaṇātpaiśāco garhito'ṣṭamaḥ prāyaḥ kṣatraviśorktā gāṁdharvāsurarākṣasāḥ
छल से कन्या का हरण करके किया गया विवाह निंदित पैशाच नामक आठवाँ विवाह है। गांधर्व, आसुर तथा राक्षस विवाह प्रायः क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के लिए कहे गये हैं।
श्लोक 31 (skanda.3.58.31)
अष्टमस्त्वेष पापिष्ठः पापिष्ठानां च संभवः । सवर्णया करो ग्राह्यो धार्यः क्षत्रियया शरः
aṣṭamastveṣa pāpiṣṭhaḥ pāpiṣṭhānāṁ ca saṁbhavaḥ savarṇayā karo grāhyo dhāryaḥ kṣatriyayā śaraḥ
यह आठवाँ विवाह अत्यंत पापपूर्ण है, और अत्यंत पापी संतानों को जन्म देने वाला है। समान वर्ण की कन्या के साथ विवाह में उसका हाथ ग्रहण किया जाता है, क्षत्रिय कन्या के साथ बाण धारण किया जाता है।
श्लोक 32 (skanda.3.58.32)
प्रतोदो वैश्यया धार्यो वासोंतः शूद्रया तथा । असवर्णा स्वेष विधिः स्मृतौ दृष्टश्च वेदने
pratodo vaiśyayā dhāryo vāsoṁtaḥ śūdrayā tathā asavarṇā sveṣa vidhiḥ smṛtau dṛṣṭaśca vedane
वैश्य कन्या के साथ चाबुक धारण किया जाता है, तथा शूद्र कन्या के साथ वस्त्र का छोर पकड़ा जाता है। भिन्न वर्ण की कन्याओं के लिए यह विधि स्मृति में देखी गयी है, और वेद में भी वर्णित है।
श्लोक 33 (skanda.3.58.33)
सवर्णाभिस्तु सर्वाभिः पाणिर्ग्राह्यस्त्वयं विधिः । धर्म्ये विवाहे जायंते धर्म्याः पुत्राः शतायुषः
savarṇābhistu sarvābhiḥ pāṇirgrāhyastvayaṁ vidhiḥ dharmye vivāhe jāyaṁte dharmyāḥ putrāḥ śatāyuṣaḥ
किन्तु समान वर्ण की सभी कन्याओं के साथ हाथ ही ग्रहण करना यह विधि है। धर्मपूर्ण विवाह में धर्मशील, सौ वर्ष की आयु वाले पुत्र उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 34 (skanda.3.58.34)
अधर्म्याद्धर्म्मरहिता मंदभाग्यधनायुषः । कृतकालाभिगमने धर्मोयं गृहिणः परः
adharmyāddharmarahitā maṁdabhāgyadhanāyuṣaḥ kṛtakālābhigamane dharmoyaṁ gṛhiṇaḥ paraḥ
अधर्मपूर्ण विवाह से धर्महीन, दुर्भाग्यशाली, अल्पधन तथा अल्पायु वाले पुत्र उत्पन्न होते हैं। ऋतुकाल में ही पत्नी के पास जाना गृहस्थ का सर्वोत्तम धर्म है।
श्लोक 35 (skanda.3.58.35)
स्त्रीणां वरमनुस्मृत्य यथाकाम्यथवा भवेत् । दिवाभिगमनं पुंसामनायुष्यं परं मतम्
strīṇāṁ varamanusmṛtya yathākāmyathavā bhavet divābhigamanaṁ puṁsāmanāyuṣyaṁ paraṁ matam
स्त्रियों के लिए यह मनोवांछित समय माना गया है; किन्तु पुरुषों के लिए दिन में पत्नी के पास जाना अत्यंत आयु घटाने वाला माना गया है।
श्लोक 36 (skanda.3.58.36)
श्राद्धार्हः सर्वपर्वाणि न गंतव्यानि धीमता । तत्र गछन्स्त्रियं मोहार्द्धर्मात्प्रच्यवते परात्
śrāddhārhaḥ sarvaparvāṇi na gaṁtavyāni dhīmatā tatra gachanstriyaṁ mohārddharmātpracyavate parāt
बुद्धिमान पुरुष को श्राद्ध के योग्य सभी पर्वों में पत्नी के पास नहीं जाना चाहिए। मोहवश ऐसा करने वाला परम धर्म से च्युत हो जाता है।
श्लोक 37 (skanda.3.58.37)
ऋतुकालाभिगामी यः स्वदारनिरतश्च यः । स सदा ब्रह्मचारी हि विज्ञेयः स गृहाश्रमी
ṛtukālābhigāmī yaḥ svadāraniratasca yaḥ sa sadā brahmacārī hi vijñeyaḥ sa gṛhāśramī
जो पुरुष केवल ऋतुकाल में ही अपनी पत्नी के पास जाता है और अपनी ही पत्नी में संतुष्ट रहता है, वह गृहस्थाश्रमी होते हुए भी सदा ब्रह्मचारी ही जानना चाहिए।
श्लोक 38 (skanda.3.58.38)
आर्षे विवाहे गोद्वंद्वं यदुक्तं तत्र शस्यते । शुल्कमण्वपि कन्यायाः कन्याविक्रयपापकृत्
ārṣe vivāhe godvaṁdvaṁ yaduktaṁ tatra śasyate śulkamaṇvapi kanyāyāḥ kanyāvikrayapāpakṛt
आर्ष विवाह में जो गौओं का जोड़ा दिया जाना कहा गया है, वही प्रशंसनीय है। कन्या के लिए तनिक भी शुल्क लेना कन्या-विक्रय के समान पापपूर्ण है।
श्लोक 39 (skanda.3.58.39)
अपत्यविक्रयात्कल्पं वसेद्विट्कृमिभोजने । अतो नाण्वपि कन्याया उपजीव्यं नरैर्धनम्
apatyavikrayātkalpaṁ vasedviṭkṛmibhojane ato nāṇvapi kanyāyā upajīvyaṁ narairdhanam
संतान के विक्रय के फलस्वरूप मनुष्य को एक कल्प तक विष्ठा के कीड़ों के भोजन में रहना पड़ता है। अतः कन्या से प्राप्त तनिक भी धन पुरुषों को जीविका के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए।
श्लोक 40 (skanda.3.58.40)
तत्र तुष्टा महालक्ष्मीर्निवसेद्दानवारिणा । वाणिज्यं नीचसेवा च वेदानध्ययनं तथा
tatra tuṣṭā mahālakṣmīrnivasedadānavāriṇā vāṇijyaṁ nīcasevā ca vedānadhyayanaṁ tathā
जहाँ कन्यादान के जल से संतुष्ट होकर महालक्ष्मी निवास करती है। वाणिज्य, नीच की सेवा, तथा वेद का अनध्ययन —
श्लोक 41 (skanda.3.58.41)
कुविवाहः क्रियालोपः कुले पतनहेतवः । कुर्याद्वैवाहिके चाग्नौ गृह्यकर्म्मान्वहं गृही
kuvivāhaḥ kriyālopaḥ kule patanahetavaḥ kuryādvaivāhike cāgnau gṛhyakarmānvahaṁ gṛhī
— एक विवाह, कर्तव्यों का लोप — ये सभी कुल के पतन के कारण हैं। गृहस्थ को विवाह के अग्नि में प्रतिदिन गृह्य-कर्म करना चाहिए।
श्लोक 42 (skanda.3.58.42)
पञ्चयज्ञक्रियां चापि पक्तिं दैनंदिनीमपि । गृहस्थाश्रमिणः पञ्चसूनाकर्म दिनेदिने
pañcayajñakriyāṁ cāpi paktiṁ dainaṁdinīmapi gṛhasthāśramiṇaḥ pañcasūnākarma dinedine
गृहस्थाश्रमी को पंचयज्ञ की क्रिया, तथा प्रतिदिन का भोजन-पाक — इन सबमें प्रतिदिन पंचसूना-कर्म घटित होता है।
श्लोक 43 (skanda.3.58.43)
कुण्डनी पेषणी चुल्ली ह्युदकुम्भी तु मार्जनी । तासां च पंचसूनानां निराकरणहेतवः । क्रतवः पंच निर्द्दिष्टा गृहिश्रेयोभिवर्द्धनाः
kuṇḍanī peṣaṇī cullī hyudakumbhī tu mārjanī tāsāṁ ca pañcasūnānāṁ nirākaraṇahetavaḥ kratavaḥ pañca nirddiṣṭā gṛhiśreyobhivarddhanāḥ
ओखली, चक्की, चूल्हा, जल-कुम्भ तथा झाड़ू — ये पाँच सूना हैं। इनके निवारण के लिए ही गृहस्थ के कल्याण को बढ़ाने वाले पाँच यज्ञ बताये गये हैं।
श्लोक 44 (skanda.3.58.44)
पठनं ब्रह्मयज्ञः स्यात्तर्पणं च पितृक्रतुः । होमो दैवो बलिर्भौत आतिथ्यं नृक्रतुः क्रमात्
paṭhanaṁ brahmayajñaḥ syāttarpaṇaṁ ca pitṛkratuḥ homo daivo balirbhauta ātithyaṁ nṛkratuḥ kramāt
वेदपाठ ब्रह्मयज्ञ है, तर्पण पितृयज्ञ है, होम देवयज्ञ है, बलि भूतयज्ञ है, और अतिथि-सत्कार क्रमशः मनुष्ययज्ञ है।
श्लोक 45 (skanda.3.58.45)
वैश्वदेवांतरे प्राप्तः सूर्योढो वातिथिः स्मृतः । अतिथेरादितोप्येते भोज्या नात्र विचारणा
vaiśvadevāṁtare prāptaḥ sūryoḍho vātithiḥ smṛtaḥ atitherāditopyete bhojyā nātra vicāraṇā
वैश्वदेव के मध्य में जो अतिथि आ जाये, वह सूर्योढ कहा जाता है। अतिथि को सबसे पहले भोजन कराना चाहिए, इसमें कोई विचार नहीं।
श्लोक 46 (skanda.3.58.46)
पितृदेवमनुष्येभ्यो दत्त्वाश्नात्यमृतं गृही । अदत्त्वान्नं च यो भुंक्ते केवलं स्वोदरंभरिः
pitṛdevamanuṣyebhyo dattvāśnātyamṛtaṁ gṛhī adattvānnaṁ ca yo bhuṁkte kevalaṁ svodaraṁbhariḥ
पितरों, देवताओं और मनुष्यों को देकर भोजन करने वाला गृहस्थ अमृत का भोजन करता है। जो बिना दिये अन्न खाता है, वह केवल अपना पेट भरने वाला ही है।
श्लोक 47 (skanda.3.58.47)
वैश्वदेवेन ये हीना आतिथ्येन विवर्जिताः । सर्वे ते वृषला ज्ञेयाः प्राप्तवेदा अपि द्विजाः
vaiśvadevena ye hīnā ātithyena vivarjitāḥ sarve te vṛṣalā jñeyāḥ prāptavedā api dvijāḥ
जो वैश्वदेव से रहित हैं और अतिथि-सत्कार से वंचित हैं, वे सभी शूद्र के समान जानने चाहिए, चाहे वे द्विज ही क्यों न हों और वेद ही क्यों न पढ़े हों।
श्लोक 48 (skanda.3.58.48)
अकृत्वा वैश्वदेवं तु भुञ्जते ये द्विजाधमाः । इह लोकेन्नहीनाः स्युः काकयोनिं व्रजंत्यथो
akṛtvā vaiśvadevaṁ tu bhuñjate ye dvijādhamāḥ iha lokennahīnāḥ syuḥ kākayoniṁ vrajaṁtyatho
जो नीच द्विज वैश्वदेव किये बिना भोजन करते हैं, वे इस लोक में अन्नहीन रहते हैं, और मरकर कौवे की योनि को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 49 (skanda.3.58.49)
वेदोक्तं विदितं कर्म्म नित्यं कुर्यादतंद्रितः । यदि कुर्याद्यथाशक्ति प्राप्नुयात्सद्गतिं पराम्
vedoktaṁ viditaṁ karma nityaṁ kuryādataṁdritaḥ yadi kuryādyathāśakti prāpnuyātsadgatiṁ parām
वेद में कहे गये ज्ञात कर्म को अनालस्य होकर नित्य करना चाहिए। यदि यथाशक्ति करे, तो परम सद्गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 50 (skanda.3.58.50)
षष्ठ्यष्टम्योर्वसेत्पापं तैले मांसे सदैव हि । चतुर्दश्यां पञ्चदश्यां तथैव च क्षुरे भगे
ṣaṣṭhyaṣṭamyorvasetpāpaṁ taile māṁse sadaiva hi caturdaśyāṁ pañcadaśyāṁ tathaiva ca kṣure bhage
षष्ठी और अष्टमी को, सदा तेल और मांस में, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा को, तथा क्षुरकर्म और स्त्री-संभोग में सदा पाप निवास करता है।
श्लोक 51 (skanda.3.58.51)
उदयन्तं न वीक्षेत नास्तं यंतं न मस्तके । न राहुणोपस्पृष्टं च नांडस्थं वीक्षयेद्रविम्
udayaṁtaṁ na vīkṣeta nāstaṁ yaṁtaṁ na mastake na rāhuṇopaspṛṣṭaṁ ca nāṁḍasthaṁ vīkṣayedravim
उगते हुए सूर्य को न देखे, अस्त होते हुए को भी न देखे, सिर के ऊपर स्थित सूर्य को भी न देखे; राहु से ग्रसित सूर्य को तथा जल में प्रतिबिंबित सूर्य को भी न देखे।
श्लोक 52 (skanda.3.58.52)
न वीक्षेतात्मनो रूपमप्सु धावेन्न कर्दमे । न नग्नां स्त्रियमीक्षेत न नग्नो जलमाविशेत्
na vīkṣetātmano rūpamapsu dhāvenna kardame na nagnāṁ striyamīkṣeta na nagno jalamāviśet
जल में अपने रूप को न देखे, कीचड़ में न दौड़े, नग्न स्त्री को न देखे, तथा नग्न होकर जल में प्रवेश न करे।
श्लोक 53 (skanda.3.58.53)
देवतायतनं विप्रं धेनुं मधु मृदं तथा । जातिवृद्धं वयोवृद्धं विद्यावृद्धं तथैव च
devatāyatanaṁ vipraṁ dhenuṁ madhu mṛdaṁ tathā jātivṛddhaṁ vayovṛddhaṁ vidyāvṛddhaṁ tathaiva ca
देवमंदिर, ब्राह्मण, गौ, मधु, मिट्टी, कुलीनता में वृद्ध, आयु में वृद्ध, तथा विद्या में वृद्ध — इन सबका —
श्लोक 54 (skanda.3.58.54)
अश्वत्थं चैत्यवृक्षं च गुरुं जलभृतं घटम् । सिद्धान्नं दधिसिद्धार्थं गच्छन्कुर्यात्प्रदक्षिणम्
aśvatthaṁ caityavṛkṣaṁ ca guruṁ jalabhṛtaṁ ghaṭam siddhānnaṁ dadhisiddhārthaṁ gacchankuryātpradakṣiṇam
— पीपल का वृक्ष, चैत्य-वृक्ष, गुरु, जल से भरा घड़ा, पका हुआ अन्न, दही, तथा सफेद सरसों — इन सबकी परिक्रमा करते हुए मार्ग में जाना चाहिए।
श्लोक 55 (skanda.3.58.55)
रजस्वलां न सेवेत नाश्नीयात्सह भार्यया । एकवासा न भुञ्जीत न भुञ्जीतोत्कटासने
rajasvalāṁ na seveta nāśnīyātsaha bhāryayā ekavāsā na bhuñjīta na bhuñjītotkaṭāsane
रजस्वला स्त्री का सेवन न करे, पत्नी के साथ बैठकर भोजन न करे, एक ही वस्त्र में भोजन न करे, तथा ऊँचे आसन पर बैठकर भोजन न करे।
श्लोक 56 (skanda.3.58.56)
नाशुचिं स्त्रियमीक्षेत तेजस्कामो द्विजोत्तमः । असंतर्प्य पितॄन्देवान्नाद्यादन्नं च कुत्रचित्
nāśuciṁ striyamīkṣeta tejaskāmo dvijottamaḥ asaṁtarpya pitṝndevānnādyādannaṁ ca kutracit
तेज की कामना करने वाले श्रेष्ठ द्विज को अशुद्ध स्त्री को नहीं देखना चाहिए। पितरों और देवताओं को तृप्त किये बिना कहीं भी अन्न नहीं खाना चाहिए।
श्लोक 57 (skanda.3.58.57)
पक्वान्नं चापि नो मांसं दीर्घकालं जिजीविषुः । न मूत्रणं व्रजे कुर्यान्न वल्मीके न भस्मनि
pakvānnaṁ cāpi no māṁsaṁ dīrghakālaṁ jijīviṣuḥ na mūtraṇaṁ vraje kuryānna valmīke na bhasmani
दीर्घ जीवन की इच्छा रखने वाला बासी अन्न तथा मांस न खाये। गोशाला में, बाँबी पर, तथा राख पर मूत्र-त्याग न करे।
श्लोक 58 (skanda.3.58.58)
न गत्तेंषु ससत्त्वेषु न तिष्ठन्न व्रजन्नपि । ब्राह्मणं सूर्यमग्निं च चंद्रऋक्षगुरूनपि
na gatteṣu sasattveṣu na tiṣṭhanna vrajannapi brāhmaṇaṁ sūryamagniṁ ca caṁdrarkṣagurūnapi
जीवधारी प्राणियों के गड्ढों में, न खड़े होकर और न चलते हुए भी मल-मूत्र त्याग न करे। ब्राह्मण, सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा गुरुजनों को —
श्लोक 59 (skanda.3.58.59)
अभिपश्यन्न कुर्वीत मलमूत्रविसर्जनम् । मुखेनोपधमेन्नाग्निं नग्नां नेक्षेत योषितम्
abhipaśyanna kurvīta malamūtravisarjanam mukhenopadhamennāgniṁ nagnāṁ nekṣeta yoṣitam
— इन्हें देखते हुए मल-मूत्र का त्याग न करे। मुख से अग्नि को न फूँके, तथा नग्न स्त्री को न देखे।
श्लोक 60 (skanda.3.58.60)
नांघ्री प्रतापयेदग्नौ न वस्तु अशुचि क्षिपेत् । प्राणिहिंसां न कुर्वीत नाश्नीयात्संध्ययोर्द्वयोः
nāṁghrī pratāpayedagnau na vastu aśuci kṣipet prāṇihiṁsāṁ na kurvīta nāśnīyātsaṁdhyayordvayoḥ
पैरों को अग्नि में न तपाये, अशुद्ध वस्तु उसमें न डाले। प्राणी की हिंसा न करे, तथा दोनों संध्याओं में भोजन न करे।
श्लोक 61 (skanda.3.58.61)
न संविशेच्च संध्यायां प्रातः सायं क्वचिद्बुधः । नाचक्षीत धयंतीं गां नेंद्रचापं प्रदर्शयेत्
na saṁviśecca saṁdhyāyāṁ prātaḥ sāyaṁ kvacidbudhaḥ nācakṣīta dhayaṁtīṁ gāṁ neṁdracāpaṁ pradarśayet
बुद्धिमान पुरुष प्रातः और सायं संध्या के समय कभी न सोये। दूध पीती हुई गाय की ओर संकेत न करे, तथा इन्द्रधनुष को दिखाकर न बताये।
श्लोक 62 (skanda.3.58.62)
नैकः सुप्यात्क्वचिच्छून्ये न शयानं प्रबोधयेत् । पंथानं नैकलो यायान्न वार्य्यंजलिना पिबेत्
naikaḥ supyātkvaciccūnye na śayānaṁ prabodhayet paṁthānaṁ naikalo yāyānna vāryyaṁjalinā pibet
किसी सूने स्थान में अकेला न सोये, सोये हुए व्यक्ति को न जगाये। मार्ग पर अकेला न चले, तथा अंजलि में जल न पीये।
श्लोक 63 (skanda.3.58.63)
न दिवोद्धृतसारं च भक्षयेद्दधि नो निशि । स्त्रीधर्मिणी नाभिवदेन्नाद्यादातृप्ति रात्रिषु
na divoddhṛtasāraṁ ca bhakṣayeddadhi no niśi strīdharmiṇī nābhivadennādyādātṛpti rātriṣu
दिन में निकाला गया मक्खन-रहित दही रात में न खाये। रजस्वला स्त्री से बात न करे, तथा रात्रि में तृप्ति से अधिक भोजन न करे।
श्लोक 64 (skanda.3.58.64)
तौर्यत्रिकप्रियो न स्यात्कांस्ये पादौ न धावयेत् । श्राद्धं कृत्वा परश्राद्धे योऽश्नीयाज्ज्ञानवर्जितः
tauryatrikapriyo na syātkāṁsye pādau na dhāvayet śrāddhaṁ kṛtvā paraśrāddhe yo'śnīyājjñānavarjitaḥ
गीत-वाद्य-नृत्य में अत्यधिक आसक्त न हो, कांसे के पात्र में पैर न धोये। जो स्वयं श्राद्ध करके, ज्ञानशून्य होकर दूसरे के श्राद्ध में भोजन करता है —
श्लोक 65 (skanda.3.58.65)
दातुः श्राद्धफलं नास्ति भोक्ता किल्बिषभुग्भवेत् । न धारयेदन्यभुक्तं वासश्चोपानहावपि
dātuḥ śrāddhaphalaṁ nāsti bhoktā kilbiṣabhugbhavet na dhārayedanyabhuktaṁ vāsaścopānahāvapi
— उस श्राद्ध का फल दाता को नहीं मिलता, और खाने वाला पाप का भागी होता है। दूसरे के पहने हुए वस्त्र तथा जूते भी धारण न करे।
श्लोक 66 (skanda.3.58.66)
न भिन्नभाजनेऽश्नीयान्नासीताग्न्यादिदूषिते । आरोहणं गवां पृष्ठे प्रेतधूमं सरित्तटम्
na bhinnabhājane'śnīyānnāsītāgnyādidūṣite ārohaṇaṁ gavāṁ pṛṣṭhe pretadhūmaṁ sarittaṭam
टूटे हुए पात्र में भोजन न करे, अग्नि आदि से दूषित स्थान पर न बैठे। गाय की पीठ पर सवारी करना, चिता का धुआँ, तथा नदी-तट —
श्लोक 67 (skanda.3.58.67)
बालातपं दिवास्वापं त्यजेद्दीर्घं जिजीविषुः । स्नात्वा न मार्जयेद्गात्रं विसृजेन्न शिखां पथि
bālātapaṁ divāsvāpaṁ tyajeddīrghaṁ jijīviṣuḥ snātvā na mārjayedgātraṁ visṛjenna śikhāṁ pathi
— (इनसे बचना चाहिए)। दीर्घ जीवन की इच्छा रखने वाला बाल-सूर्य की धूप तथा दिन में सोना त्याग दे। स्नान करने के बाद शरीर को न पोंछे, तथा मार्ग में शिखा न खोले।
श्लोक 68 (skanda.3.58.68)
हस्तौ शिरो न धुनुयान्नाकर्षेदासनं पदा । करेण नो मृजेद्गात्रं स्नानवस्त्रेण वा पुनः
hastau śiro na dhunuyānnākarṣedāsanaṁ padā kareṇa no mṛjedgātraṁ snānavastreṇa vā punaḥ
हाथों से सिर को न झटके, पैर से आसन को न खींचे। हाथ से अथवा स्नान के वस्त्र से भी शरीर को न पोंछे।
श्लोक 69 (skanda.3.58.69)
शुनोच्छिष्टं भवेद्गात्रं पुनः स्नानेन शुध्यति । नोत्पाटयेल्लोमनखं दशनेन कदाचन
śunocchiṣṭaṁ bhavedgātraṁ punaḥ snānena śudhyati notpāṭayellomanakhaṁ daśanena kadācana
यदि कुत्ते ने शरीर को जूठा कर दिया हो, तो पुनः स्नान करने से वह शुद्ध होता है। दाँतों से बाल अथवा नाखून कभी न काटे।
श्लोक 70 (skanda.3.58.70)
करजैः करजच्छेदं विवर्जयेच्छुभाय तु । यदायत्यां त्यजेत्तन्न कुर्यात्कर्म प्रयत्नतः
karajaiḥ karajacchedaṁ vivarjayecchubhāya tu yadāyatyāṁ tyajettanna kuryātkarma prayatnataḥ
शुभ की इच्छा से नाखूनों को नाखूनों से न काटे। जिस कर्म को भविष्य में त्यागना पड़े, उसे प्रयत्नपूर्वक आरंभ ही न करे।
श्लोक 71 (skanda.3.58.71)
अद्वारेण न गन्तव्यं स्ववेश्मापि कदाचन । क्रीडेन्नाज्ञैः सहासीत न धर्म्मघ्नैर्न रोगिभिः
advāreṇa na gaṁtavyaṁ svaveśmāpi kadācana krīḍennājñaiḥ sahāsīta na dharmaghnairna rogibhiḥ
अपने ही घर में भी द्वार के बिना कभी प्रवेश न करे। मूर्खों के साथ न खेले, तथा धर्मघातियों और रोगियों के साथ न बैठे।
श्लोक 72 (skanda.3.58.72)
न शयीत क्वचिन्नग्नः पाणौ भुंजीत नैव च । आर्द्रपादकरास्योऽश्नन्दीर्घकालं न जीवति
na śayīta kvacinnagnaḥ pāṇau bhuṁjīta naiva ca ārdrapādakarāsyo'śnandīrghakālaṁ na jīvati
कभी नग्न होकर न सोये, तथा हाथ में लेकर भोजन न करे। गीले पैर, हाथ और मुख के साथ भोजन करने वाला दीर्घ जीवन नहीं पाता।
श्लोक 73 (skanda.3.58.73)
संविशेन्नार्द्रचरणो नोच्छिष्टः क्वचिदाव्रजेत् । शयनस्थो न चाश्नीयान्न पिबेच्च जलं द्विजः
saṁviśennārdracaraṇo nocchiṣṭaḥ kvacidāvrajet śayanastho na cāśnīyānna pibecca jalaṁ dvijaḥ
गीले पैर लिये हुए न सोये, तथा जूठे मुख से कहीं न जाये। द्विज को लेटे-लेटे न भोजन करना चाहिए और न जल पीना चाहिए।
श्लोक 74 (skanda.3.58.74)
सोपानत्को नोपविशेन्न जलं चोत्थितः पिबेत् । सर्व्वमम्लमयं नाद्यादारोग्यस्याभिलाषुकः
sopānatko nopaviśenna jalaṁ cotthitaḥ pibet sarvamamlamayaṁ nādyādārogyasyābhilāṣukaḥ
जूते पहनकर न बैठे, तथा खड़े होकर जल न पीये। स्वास्थ्य की कामना करने वाला सब प्रकार की खट्टी वस्तुएँ न खाये।
श्लोक 75 (skanda.3.58.75)
न निरीक्षेत विण्मूत्रे नोच्छिष्टः संस्पृशेच्छिरः । नाधितिष्ठेत्तुषांगारभस्मकेशकपालिकाः
na nirīkṣeta viṇmūtre nocchiṣṭaḥ saṁspṛśecchiraḥ nādhitiṣṭhettuṣāṁgārabhasmakeśakapālikāḥ
अपने ही मल-मूत्र को न देखे, तथा जूठे मुख से सिर को स्पर्श न करे। भूसी, अंगारे, राख, बाल तथा खोपड़ी पर पैर न रखे।
श्लोक 76 (skanda.3.58.76)
पतितैः सह संवासः पतनायैव जायते । दद्यादासनं मंचं न शूद्राय कदाचन
patitaiḥ saha saṁvāsaḥ patanāyaiva jāyate dadyādāsanaṁ maṁcaṁ na śūdrāya kadācana
पतितों के साथ निवास करना पतन के लिए ही होता है। शूद्र को कभी आसन अथवा शय्या न दे।
श्लोक 77 (skanda.3.58.77)
ब्राह्मण्याद्धीयते विप्रः शूद्रो धर्माच्च हीयते । धर्मोपदेशः शूद्राणां स्वश्रेयः प्रतिघातयेत्
brāhmaṇyāddhīyate vipraḥ śūdro dharmācca hīyate dharmopadeśaḥ śūdrāṇāṁ svaśreyaḥ pratighātayet
ऐसा करने से ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व से च्युत होता है, तथा शूद्र भी धर्म से च्युत होता है। शूद्रों को धर्मोपदेश देना अपने ही कल्याण को नष्ट करता है।
श्लोक 78 (skanda.3.58.78)
द्विजशुश्रूषणं धर्म्मः शूद्राणां हि परो मतः । कण्डूयनं हि शिरसः पाणिभ्यां न शुभं मतम्
dvijaśuśrūṣaṇaṁ dharmaḥ śūdrāṇāṁ hi paro mataḥ kaṇḍūyanaṁ hi śirasaḥ pāṇibhyāṁ na śubhaṁ matam
द्विजों की सेवा ही शूद्रों का सर्वोत्तम धर्म माना गया है। दोनों हाथों से सिर खुजलाना शुभ नहीं माना जाता।
श्लोक 79 (skanda.3.58.79)
आदिशेद्वैदिकं मंत्रं न शूद्राय कदाचन । ब्राह्मण्या दीयते विप्रः शूद्रो धर्म्माच्च हीयते
ādiśedvaidikaṁ maṁtraṁ na śūdrāya kadācana brāhmaṇyā dīyate vipraḥ śūdro dharmāccа hīyate
शूद्र को वैदिक मंत्र कभी न सिखाये। ऐसा करने पर ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व से गिरता है, और शूद्र भी धर्म से गिरता है।
श्लोक 80 (skanda.3.58.80)
आताडनं कराभ्यां च क्रोशनं केशलुंचनम् । अशास्त्रवर्तनं भूयो लुब्धात्कृत्वा प्रतिग्रहम्
ātāḍanaṁ karābhyāṁ ca krośanaṁ keśaluṁcanam aśāstravartanaṁ bhūyo lubdhātkṛtvā pratigraham
दोनों हाथों से पीटना, चिल्लाना, बाल नोचना, तथा शास्त्र-विरुद्ध आचरण करना, और लोभी व्यक्ति से दान ग्रहण करना —
श्लोक 81 (skanda.3.58.81)
ब्राह्मणः स च वै याति नरकानेकविंशतिम् । अकालमेघस्तनिते वर्षर्तौ पांसुवर्षणे
brāhmaṇaḥ sa ca vai yāti narakānekaviṁśatim akālameghastanite varṣartau pāṁsuvarṣaṇe
— इन सबसे वह ब्राह्मण भी इक्कीस नरकों को प्राप्त होता है। असमय के मेघ-गर्जन में, वर्षा ऋतु में जब धूल की वर्षा हो —
श्लोक 82 (skanda.3.58.82)
महाबालध्वनौ रात्रावनध्यायाः प्रकीर्तिताः । उल्कापाते च भूकंपे दिग्दाहे मध्यरात्रिषु
mahābāladhvanau rātrāvanadhyāyāḥ prakīrtitāḥ ulkāpāte ca bhūkaṁpe digdāhe madhyarātriṣu
— महान् बाल-ध्वनि होने पर, रात्रि में, ये सब वेदाध्ययन के अयोग्य काल कहे गये हैं। उल्कापात में, भूकम्प में, दिग्दाह में, आधी रात में —
श्लोक 83 (skanda.3.58.83)
मध्ययोर्वृषलोपान्ते राज्यहारे च सूतके । दशाष्टकासु भूतायां श्राद्धाहे प्रतिपद्यपि
madhyayorvṛṣalopāṁte rājyahāre ca sūtake daśāṣṭakāsu bhūtāyāṁ śrāddhāhe pratipadyapi
— मध्याह्न और मध्यरात्रि के निकट, शूद्र के निकट, राज्य-परिवर्तन में, सूतक में, दशाह्न और अष्टका के दिनों में, भूताष्टमी में, श्राद्ध के दिन तथा प्रतिपदा को भी —
श्लोक 84 (skanda.3.58.84)
पूर्णिमायां तथाष्टम्यां विड्वरे राष्ट्रविप्लवे । उपाकर्मणि चोत्सर्गे कल्पादिषु युगादिषु
pūrṇimāyāṁ tathāṣṭamyāṁ viḍvare rāṣṭraviplave upākarmaṇi cotsarge kalpādiṣu yugādiṣu
— पूर्णिमा को, अष्टमी को, शूद्र के भय के समय, राष्ट्र में विप्लव होने पर, उपाकर्म तथा उत्सर्ग के दिन, कल्प के आरंभ में, युग के आरंभ में —
श्लोक 85 (skanda.3.58.85)
आरण्यकमधीत्यापि बाणसाम्नोरपि ध्वनौ । अनध्यायेषु चैतेषु चाधीयीत न वै क्वचित्
āraṇyakamadhītyāpi bāṇasāmnorapi dhvanau anadhyāyeṣu caiteṣu cādhīyīta na vai kvacit
— आरण्यक के अध्ययन के समय भी, तथा बाण और साम के वाद्यों की ध्वनि होने पर — इन सब अनध्ययन-कालों में कभी भी वेदाध्ययन न करे।
श्लोक 86 (skanda.3.58.86)
भूताष्टम्योः पञ्चदश्योर्ब्रह्मचारी सदा भवेत् । अनायुष्यकरं चेह परदारोपसर्पणम् । तस्मात्तद्दूरतस्त्याज्य वैरिणां चोपसेवनम्
bhūtāṣṭamyoḥ pañcadaśyorbrahmacārī sadā bhavet anāyuṣyakaraṁ ceha paradāropasarpaṇam tasmāttaddūratastyājya vairiṇāṁ copasevanam
भूताष्टमी तथा पूर्णिमा के दिनों में सदा ब्रह्मचारी बना रहे। परायी स्त्री के पास जाना इस लोक में आयु घटाने वाला है; अतः उससे दूर रहना चाहिए, तथा शत्रुओं की सेवा का भी त्याग करना चाहिए।
श्लोक 87 (skanda.3.58.87)
पूर्वर्द्धिभिः परित्यक्तमात्मानं नावमानयेत् । सदोद्यमवतां यस्माच्छ्रियो विद्या न दुर्लभाः
pūrvarddhibhiḥ parityaktamātmānaṁ nāvamānayet sadodyamavatāṁ yasmācchriyo vidyā na durlabhāḥ
पूर्व की सम्पन्नता से रहित हुए स्वयं को कभी अपमानित न माने; क्योंकि जो सदा उद्यमशील रहते हैं, उनके लिए सम्पत्ति और विद्या दुर्लभ नहीं हैं।
श्लोक 88 (skanda.3.58.88)
सत्यं ब्रूयात्प्रियं बूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मो विधीयते
satyaṁ brūyātpriyaṁ brūyānna brūyātsatyamapriyam priyaṁ ca nānṛtaṁ brūyādeṣa dharmo vidhīyate
सत्य बोले, प्रिय बोले, अप्रिय सत्य न बोले; तथा प्रिय होने पर भी असत्य न बोले — यही धर्म बताया गया है।
श्लोक 89 (skanda.3.58.89)
वाचोवेगं मनावेगं जिह्वावेगं च वर्जयेत् । गुह्यजान्यपि लोमानि तत्स्पर्शादशुचिर्भवेत
vācovegaṁ manāvegaṁ jihvāvegaṁ ca varjayet guhyajānyapi lomāni tatsparśādaśucirbhaveta
वाणी के वेग, मन के वेग तथा जिह्वा के वेग को रोके। गुह्य अंगों से उत्पन्न रोमों को छूने से भी मनुष्य अशुद्ध हो जाता है।
श्लोक 90 (skanda.3.58.90)
पादधौतोदकं मूत्रमुच्छिष्टान्युदकानि च । निष्ठीवनं च श्लेष्माणं दूराद्दूरं विनिःक्षिपेत
pādadhautodakaṁ mūtramucchiṣṭānyudakāni ca iṣṭhīvanaṁ ca śleṣmāṇaṁ dūrāddūraṁ viniḥkṣipeta
पैर धोने का जल, मूत्र, जूठा जल, थूक तथा कफ — इन्हें दूर, बहुत दूर जाकर ही फेंकना चाहिए।
श्लोक 91 (skanda.3.58.91)
अहर्न्निशं श्रुतेर्जाप्याच्छौचाचारनिषेवणात । अद्रोहवत्या बुद्ध्या च पूर्वजन्म स्मरेद्द्विजः
aharnniśaṁ śruterjāpyācchaucācāraniṣevaṇāta adrohavatyā buddhyā ca pūrvajanma smaredvijaḥ
दिन-रात वेद के जप द्वारा, तथा शौच और सदाचार के पालन से, और द्रोहरहित बुद्धि से द्विज अपने पूर्वजन्म का स्मरण कर सकता है।
श्लोक 92 (skanda.3.58.92)
वृद्धान्प्रयत्नाद्वंदेत दद्यात्तेषां स्वमासनम । विनम्रकन्धरो भूयादनुयायात्ततश्च तान्
vṛddhānprayatnādvaṁdeta dadyāttteṣāṁ svamāsanam vinamrakaṁdharo bhūyādanuyāyāttataśca tān
वृद्धजनों को यत्नपूर्वक प्रणाम करे, उन्हें अपना आसन दे, विनम्र होकर सिर झुकाये, और उनके पीछे-पीछे चले।
श्लोक 93 (skanda.3.58.93)
श्रुतिभूदेवदेवानां नृपसाधुतपस्विनाम् । पतिव्रतानां नारीणां निन्दां कुर्यान्न कर्हिचित्
śrutibhūdevadevānāṁ nṛpasādhutapasvinām pativratānāṁ nārīṇāṁ nindāṁ kuryānna karhicit
श्रुति के, ब्राह्मणों के, देवताओं के, राजाओं के, साधुओं के, तपस्वियों के, तथा पतिव्रता स्त्रियों के — इनकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 94 (skanda.3.58.94)
उद्धृत्य पञ्चमृत्पिंडान्स्नायात्परजलाशये । श्रद्धया पात्रमासाद्य यत्किंचिद्दीयते वसु
uddhṛtya pañcamṛtpiṇḍānsnāyātparajalāśaye śraddhayā pātramāsādya yatkiṁciddīyate vasu
पराये जलाशय में स्नान करते समय पाँच मिट्टी के ढेले निकाल लेने चाहिए। श्रद्धापूर्वक सुयोग्य पात्र को पाकर जो कुछ भी धन दिया जाता है —
श्लोक 95 (skanda.3.58.95)
देशे काले च विधिना तदानंत्याय कल्पते । भूप्रदो मण्डलाधीशः सर्वत्र सुखितोऽन्नदः
deśe kāle ca vidhinā tadānaṁtyāya kalpate bhūprado maṇḍalādhīśaḥ sarvatra sukhito'nnadaḥ
— उचित देश, काल और विधि के साथ दिया जाने पर वह अक्षय फल देता है। भूमि का दान देने वाला मण्डलों का स्वामी बनता है, और अन्नदान देने वाला सर्वत्र सुखी होता है।
श्लोक 96 (skanda.3.58.96)
तोयदाता सुरूपः स्यात्पुष्टश्चान्नप्रदो भवेत । प्रदीपदो निर्मलाक्षो गोदातार्यमलोकभाक्
toyadātā surūpaḥ syātpuṣṭaścānnaprado bhaveta pradīpado nirmalākṣo godātāryamalokabhāk
जलदान देने वाला सुन्दर रूप पाता है, तथा अन्नदाता पुष्ट होता है। दीपदान देने वाला निर्मल नेत्र पाता है, और गौदान करने वाला अर्यमा के लोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 97 (skanda.3.58.97)
स्वर्णदाता च दीर्घायुस्तिलदः स्याच्च सुप्रजः । वेश्मदोऽत्युच्चसौधेशो वस्त्रदश्चन्द्रलोकभाक्
svarṇadātā ca dīrghāyustiladaḥ syācca suprajaḥ veśmado'tyuccasaudheśo vastradaścaṁdralokabhāk
स्वर्णदान करने वाला दीर्घायु होता है, तथा तिल-दान करने वाला उत्तम संतान पाता है। भवन-दान करने वाला ऊँचे प्रासाद का स्वामी बनता है, और वस्त्र-दान करने वाला चन्द्रलोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 98 (skanda.3.58.98)
हयप्रदो दिव्यदेहो लक्ष्मीवान्वृषभप्रदः । सुभार्यः शिबिकादाता सुपर्यंकप्रदोऽपि च
hayaprado divyadeho lakṣmīvānvṛṣabhapradaḥ subhāryaḥ śibikādātā suparyaṁkaprado'pi ca
घोड़े का दान देने वाला दिव्य देह पाता है, बैल का दान देने वाला लक्ष्मीवान होता है, पालकी का दान देने वाला उत्तम पत्नी पाता है, और उत्तम शय्या का दान देने वाला भी सुखी होता है।
श्लोक 99 (skanda.3.58.99)
श्रद्धया प्रतिगृह्णाति श्रद्धया यः प्रयच्छति । स्वर्गिणौ तावुभौ स्यातां पततोऽश्रद्धया त्वधः
śraddhayā pratigṛhṇāti śraddhayā yaḥ prayacchati svargiṇau tāvubhau syātāṁ pattato'śraddhayā tvadhaḥ
जो श्रद्धा से ग्रहण करता है तथा जो श्रद्धा से देता है, वे दोनों स्वर्ग को प्राप्त होते हैं; किन्तु श्रद्धारहित होकर करने से दोनों नीचे गिर जाते हैं।
श्लोक 100 (skanda.3.58.100)
अनृतेन क्षरेद्यज्ञस्तपो विस्मयतः क्षरेत् । क्षरेत्कीर्तिर्विनादानमायुर्विप्रापमानतः
anṛtena kṣaredyajñastapo vismayataḥ kṣaret kṣaretkīrtirvinādānamāyurviprāpamānataḥ
असत्य भाषण से यज्ञ का फल क्षीण हो जाता है, अहंकार से तप क्षीण हो जाता है; बिना दान के कीर्ति क्षीण होती है, और ब्राह्मण के अपमान से आयु क्षीण होती है।
श्लोक 101 (skanda.3.58.101)
गंधं पुष्पं कुशा गावः शाकं मांसं पयो दधि । मणिमत्स्यगहं धान्यं ग्राह्यमेतदुपस्थितम्
gaṁdhaṁ puṣpaṁ kuśā gāvaḥ śākaṁ māṁsaṁ payo dadhi maṇimatsyagahaṁ dhānyaṁ grāhyametadupasthitam
गंध, पुष्प, कुश, गौ, साग, मांस, दूध, दही, मणि, मछली, घर, तथा धान्य — जब ये स्वयं आकर उपस्थित हों, तब ग्रहण करने योग्य हैं।
श्लोक 102 (skanda.3.58.102)
मधूदकं फलं मूलमेधांस्यभयदक्षिणा । अभ्युद्यतानि ग्राह्याणि त्वेतान्यपि निकृष्टतः
madhūdakaṁ phalaṁ mūlamedhāṁsyabhayadakṣiṇā abhyudyatāni grāhyāṇi tvetānyapi nikṛṣṭataḥ
मधु, जल, फल, मूल, यज्ञोपकरण, अभय-दान, तथा दक्षिणा — ये सब स्वयं दिये जाने पर ग्रहण करने योग्य हैं, चाहे देने वाला निम्न कुल का ही क्यों न हो।
श्लोक 103 (skanda.3.58.103)
दासनापितगोपालकुलमित्रार्द्धसीरिणः । भोज्यान्नाः शूद्रवर्गेमी तथात्मविनिवेदकः
dāsanāpitagopālakulamitrārddhasīriṇaḥ bhojyānnāḥ śūdravargemī tathātmavinivedakaḥ
दास, नाई, गोपालक, कुल-मित्र, आधे पर खेती करने वाला, तथा स्वयं को समर्पित कर देने वाला — इनके अन्न को शूद्र-वर्ग में भी खाया जा सकता है।
श्लोक 104 (skanda.3.58.104)
इत्थमाचारधर्मोयं धर्मारण्यनिवासिनाम् । श्रुतिस्मृत्युक्तधर्मोऽयं युधिष्ठिर निवेदितः
itthamācāradharmoyaṁ dharmāraṇyanivāsinām śrutismṛtyuktadharmo'yaṁ yudhiṣṭhira niveditaḥ
इस प्रकार धर्मारण्य-निवासियों के आचार-धर्म का वर्णन किया गया। हे युधिष्ठिर! श्रुति और स्मृति में कहा गया यह धर्म तुमसे निवेदित किया गया।