Skip to main content

ब्रह्म खण्ड · अध्याय 59

धर्माचार-वर्णन

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

श्लोक 1 (skanda.3.59.1)

व्यास उवाच । संप्राप्य धर्मवाप्यां च यः कुर्यात्पितृतर्पणम् । तृप्तिं प्रयांति पितरो यावदिंद्राश्चतुर्दश

vyāsa uvāca saṁprāpya dharmavāpyāṁ ca yaḥ kuryātpitṛtarpaṇam tṛptiṁ prayāṁti pitaro yāvadiṁdrāścaturdaśa

व्यासजी बोले — जो व्यक्ति धर्मवापी में पहुँचकर पितरों का तर्पण करता है, उसके पितर चौदह इन्द्रों के काल तक तृप्त रहते हैं।

श्लोक 2 (skanda.3.59.2)

पितरश्चात्र पूज्याश्च स्वर्गता ये च पूर्वजाः । पिंडांश्च निर्वपेत्तेषां प्राप्येमां मुक्तिदायिकाम्

pitaraścātra pūjyāśca svargatā ye ca pūrvajāḥ piṁḍāṁśca nirvapetteṣāṁ prāpyemāṁ muktidāyikām

यहाँ पितरों की पूजा करनी चाहिए तथा जो पूर्वज स्वर्ग को प्राप्त हो चुके हैं, इस मुक्तिदायिनी भूमि को पाकर उनके लिए पिण्डदान करना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.3.59.3)

त्रेतायां पंच दिवसैर्द्वापरे त्रिदिनेन तु । एकचित्तेन यो विप्राः पिंडं दद्यात्कलौ युगे

tretāyāṁ paṁca divasairdvāpare tridinena tu ekacittena yo viprāḥ piṁḍaṁ dadyātkalau yuge

त्रेतायुग में पाँच दिनों में और द्वापर में तीन दिनों में जो फल मिलता है, हे विप्रो! कलियुग में एकाग्रचित्त होकर पिण्डदान करने वाले को वही फल तुरंत मिल जाता है।

श्लोक 4 (skanda.3.59.4)

लोलुपा मानवा लोके संप्राप्ते तु कलौ युगे । परदाररता लोकाः स्त्रियोऽतिचपलाः पुनः

lolupā mānavā loke saṁprāpte tu kalau yuge paradāraratā lokāḥ striyo'ticapalāḥ punaḥ

कलियुग के आने पर संसार में मनुष्य लोलुप हो जाते हैं, लोग परस्त्रीरत हो जाते हैं और स्त्रियाँ अत्यंत चंचल हो जाती हैं।

श्लोक 5 (skanda.3.59.5)

परद्रोहरताः सर्वे नरनारीनपुंसकाः । परनिन्दापरा नित्यं परच्छिद्रोपदर्शकाः

paradroharatāḥ sarve naranārīnapuṁsakāḥ paranindāparā nityaṁ paracchidropadarśakāḥ

सभी नर, नारी और नपुंसक परद्रोह में रत हो जाते हैं, सदा दूसरों की निन्दा में लगे रहते हैं और दूसरों के दोष दिखाने वाले होते हैं।

श्लोक 6 (skanda.3.59.6)

परोद्वेगकरा नूनं कलहा मित्रभेदिनः । सर्वे ते शुद्धतां यांति काजेशाः स्वयमब्रुवन्

parodvegakarā nūnaṁ kalahā mitrabhedinaḥ sarve te śuddhatāṁ yāṁti kājeśāḥ svayamabruvan

निश्चय ही दूसरों को उद्विग्न करने वाले, कलहप्रिय और मित्रों में भेद कराने वाले — वे सभी भी यहाँ आकर शुद्धता को प्राप्त होते हैं, यह काजेश देवताओं ने स्वयं कहा है।

श्लोक 7 (skanda.3.59.7)

एतदुक्तं महाभाग धर्मारण्यस्य वर्णनम् । फलं चैवात्र सर्वं हि यदुक्तं शूलपाणिना

etaduktaṁ mahābhāga dharmāraṇyasya varṇanam phalaṁ caivātra sarvaṁ hi yaduktaṁ śūlapāṇinā

हे महाभाग! यह धर्मारण्य का वर्णन कहा गया, तथा यहाँ का समस्त फल भी वही है जो शूलपाणि (शिव) ने कहा है।

श्लोक 8 (skanda.3.59.8)

वाङ्मनः कायशुद्धाश्च परदारपराङ्मुखाः । अद्रोहाश्च समाः क्रुद्धा मातापितृपरायणाः

vāṅmanaḥ kāyaśuddhāśca paradāraparāṅmukhāḥ adrohāśca samāḥ kruddhā mātāpitṛparāyaṇāḥ

वाणी, मन और शरीर से शुद्ध, परस्त्री से विमुख, द्रोहरहित, क्रोध में भी समभाव रखने वाले तथा माता-पिता के परायण —

श्लोक 9 (skanda.3.59.9)

अलौल्या लोभरहिता दानधर्मपरायणाः । आस्तिकाश्चैव धर्मज्ञाः स्वामिभक्तिरताश्च ये

alaulyā lobharahitā dānadharmaparāyaṇāḥ āstikāścaiva dharmajñāḥ svāmibhaktiratāśca ye

लोलुपतारहित, लोभरहित, दान-धर्म में परायण, आस्तिक, धर्मज्ञ तथा स्वामिभक्ति में रत —

श्लोक 10 (skanda.3.59.10)

पतिव्रता तु या नारी पतिशुश्रूषणे रता । अहिंसका आतिथेयाः स्वधर्मनिरताः सदा

pativratā tu yā nārī patiśuśrūṣaṇe ratā ahiṁsakā ātitheyāḥ svadharmaniratāḥ sadā

तथा जो नारी पतिव्रता है और पति की सेवा में रत रहती है; जो अहिंसक हैं, अतिथि-सत्कार करने वाले हैं और सदा अपने स्वधर्म में निरत रहते हैं —

श्लोक 11 (skanda.3.59.11)

शौनक उवाच । शृणु सूत महाभाग सर्वधर्मविदांवर । गृहस्थानां सदाचारः श्रुतश्च त्वन्मुखान्मया

śaunaka uvāca śṛṇu sūta mahābhāga sarvadharmavidāṁvara gṛhasthānāṁ sadācāraḥ śrutaśca tvanmukhānmayā

शौनकजी बोले — हे सूतजी! हे महाभाग! हे सर्वधर्मविदों में श्रेष्ठ! मैंने आपके मुख से गृहस्थों का सदाचार सुना। हे सूतपुत्र! अब मेरे मन की एक अभीष्ट बात है, वह मुझे बताइए।

श्लोक 12 (skanda.3.59.12)

एकं मनेप्सितं मेद्य तत्कथयस्व सूतज । पतिव्रतानां सर्वासां लक्षणं कीदृशं वद

ekaṁ manepsitaṁ medya tatkathayasva sūtaja pativratānāṁ sarvāsāṁ lakṣaṇaṁ kīdṛśaṁ vada

सभी पतिव्रता स्त्रियों के लक्षण कैसे होते हैं, यह मुझे बताइए।

श्लोक 13 (skanda.3.59.13)

सूत उवाच । पतिव्रता गृहे यस्य सफलं तस्य जीवनम् । यस्यांगच्छायया तुल्या यत्कथा पुण्यकारिणी

sūta uvāca pativratā gṛhe yasya saphalaṁ tasya jīvanam yasyāṁgacchāyayā tulyā yatkathā puṇyakāriṇī

सूतजी बोले — जिसके घर में पतिव्रता स्त्री है, उसका जीवन सफल है; जिसकी देह-छाया भी शुभ है, जिसकी कथा भी पुण्यकारिणी है।

श्लोक 14 (skanda.3.59.14)

पतिव्रतास्त्वरुंधत्या सावित्र्याप्यनसूयया । शांडिल्या चैव सत्या च लक्ष्म्या च शतरूपया

pativratāstvaruṁdhatyā sāvitryāpyanasūyayā śāṁḍilyā caiva satyā ca lakṣmyā ca śatarūpayā

पतिव्रता स्त्रियाँ अरुंधती, सावित्री, अनसूया, शांडिली, सती, लक्ष्मी और शतरूपा के समान हैं।

श्लोक 15 (skanda.3.59.15)

मेनया च सुनीत्या च संज्ञया स्वाहया समाः । पतिव्रतानां धर्मा हि मुनिना च प्रकीर्तिताः

menayā ca sunītyā ca saṁjñayā svāhayā samāḥ pativratānāṁ dharmā hi muninā ca prakīrtitāḥ

मेना, सुनीति, संज्ञा और स्वाहा के समान — पतिव्रताओं के धर्म मुनि (व्यास) द्वारा वर्णित किये गये हैं।

श्लोक 16 (skanda.3.59.16)

भुंक्ते भुक्ते स्वामिनि च तिष्ठ ति त्वनुतिष्ठति । विनिद्रिते या निद्राति प्रथमं परिबुध्यति

bhuṁkte bhukte svāmini ca tiṣṭha ti tvanutiṣṭhati vinidrite yā nidrāti prathamaṁ paribudhyati

वह पति के भोजन कर लेने पर भोजन करती है, पति के खड़े होने पर खड़ी होती है, उसका अनुसरण करती है; पति के सो जाने पर ही सोती है और सबसे पहले जाग जाती है।

श्लोक 17 (skanda.3.59.17)

अनलंकृतमात्मानं देशांते भर्तरि स्थिते । कार्यार्थं प्रोषिते क्वापि सर्व्वमंड नवर्जिता

analaṁkṛtamātmānaṁ deśāṁte bhartari sthite kāryārthaṁ proṣite kvāpi sarvvamaṁḍa navarjitā

पति के परदेश में होने पर वह स्वयं को अनलंकृत रखती है; पति के किसी कार्यवश कहीं बाहर जाने पर वह समस्त श्रृंगार से रहित रहती है।

श्लोक 18 (skanda.3.59.18)

भर्तुर्नाम न गृह्णाति ह्यायुषोऽस्य हि वृद्धये । पुरुषांतरनामापि न गृह्णति कदाचन

bharturnāma na gṛhṇāti hyāyuṣo'sya hi vṛddhaye puruṣāṁtaranāmāpi na gṛhṇati kadācana

वह पति की आयु की वृद्धि के लिए उसका नाम नहीं लेती, तथा किसी अन्य पुरुष का नाम भी कभी नहीं लेती।

श्लोक 19 (skanda.3.59.19)

आकृष्टापि च नाक्रोशेत्ताडितापि प्रसीदति । इदं कुरु कृतं स्वामिन्मन्यतामिति वक्ति च

ākṛṣṭāpi ca nākrośettāḍitāpi prasīdati idaṁ kuru kṛtaṁ svāminmanyatāmiti vakti ca

खींचे जाने पर भी वह क्रोध नहीं करती, मारे जाने पर भी प्रसन्न रहती है, और कहती है — "हे स्वामी! यह कीजिए, हो गया, आप प्रसन्न रहें।"

श्लोक 20 (skanda.3.59.20)

आहूता गृहकार्याणि त्यक्त्वा गच्छति सत्वरम् । किमर्थं व्याहृता नाथ स प्रसादो विधीयताम्

āhūtā gṛhakāryāṇi tyaktvā gacchati satvaram kimarthaṁ vyāhṛtā nātha sa prasādo vidhīyatām

बुलाए जाने पर वह घर के कामकाज छोड़कर तुरंत जाती है और कहती है — "हे नाथ! किसलिए बुलाया गया? वह आज्ञा दीजिए।"

श्लोक 21 (skanda.3.59.21)

न चिरं तिष्ठति द्वारि न द्वारमुपसेवते । अदातव्यं स्वयं किंचित्कर्हिचिन्न ददात्यपि

na ciraṁ tiṣṭhati dvāri na dvāramupasevate adātavyaṁ svayaṁ kiṁcitkarhicinna dadātyapi

वह द्वार पर अधिक देर तक नहीं ठहरती, न ही द्वार का बार-बार सेवन करती है; वह स्वयं कभी भी ऐसी कोई वस्तु नहीं देती जो देने योग्य न हो।

श्लोक 22 (skanda.3.59.22)

पूजोपकरणं सर्वम नुक्ता साधयेत्स्वयम् । नियमोदकबर्हींषि यत्र पुष्पाक्षतादिकम्

pūjopakaraṇaṁ sarvama nuktā sādhayetsvayam niyamodakabarhīṁṣi yatra puṣpākṣatādikam

बिना कहे ही वह पूजा की समस्त सामग्री स्वयं तैयार करती है — नियम का जल, कुश, तथा जहाँ पुष्प-अक्षत आदि चाहिए, वह सब।

श्लोक 23 (skanda.3.59.23)

प्रतीक्षमाणा च वरं यथाकालोचितं हि यत् । तदुपस्थापयेत्सर्वमनुद्वि ग्नातिहृष्टवत्

pratīkṣamāṇā ca varaṁ yathākālocitaṁ hi yat tadupasthāpayetsarvamanudvi gnātihṛṣṭavat

उचित समय की प्रतीक्षा करते हुए, जो कुछ उस समय के अनुकूल हो, वह सब बिना उद्विग्न हुए, अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक प्रस्तुत कर देती है।

श्लोक 24 (skanda.3.59.24)

सेवते भर्त्तुरुच्छिष्टमिष्टमन्नं फलादिकम् । दूरतो वर्ज्जयेदेषा समाजोत्सवदर्शनम्

sevate bhartturucchiṣṭamiṣṭamannaṁ phalādikam dūrato varjjayedeṣā samājotsavadarśanam

वह पति के भोजन का उच्छिष्ट भाग — इष्ट अन्न, फल आदि — ग्रहण करती है; तथा समाज और उत्सवों को देखने से दूर ही रहती है।

श्लोक 25 (skanda.3.59.25)

न गच्छेत्तीर्थयात्रादिविवाहप्रेक्षणा दिषु । सुखसुप्तं सुखासीनं रममाणं यदृच्छया

na gacchettīrthayātrādivivāhaprekṣaṇā diṣu sukhasuptaṁ sukhāsīnaṁ ramamāṇaṁ yadṛcchayā

वह अकेले तीर्थयात्रा, विवाह, तमाशे आदि देखने नहीं जाती; सुखपूर्वक सोए हुए, सुखासीन अथवा स्वेच्छा से रमण करते हुए पति को कभी विचलित नहीं करती।

श्लोक 26 (skanda.3.59.26)

अंतरायेऽपि कार्येषु पतिं नोत्थापयेत्क्वचित् । स्त्रीधर्मिणी त्रिरात्रं तु स्वमुखं नैव दर्शयेत्

aṁtarāye'pi kāryeṣu patiṁ notthāpayetkvacit strīdharmiṇī trirātraṁ tu svamukhaṁ naiva darśayet

यदि कोई कार्य भी बाधा डाले, तो भी वह पति को कभी नहीं उठाती; तथा रजस्वला होने पर तीन रात्रि तक अपना मुख भी नहीं दिखाती।

श्लोक 27 (skanda.3.59.27)

स्ववाक्यं श्रावयेन्नापि यावत्स्नात्वा न शुध्यति । सुस्नाता भर्तृवदनमीक्षेतान्यस्य न क्वचित् । अथवा मनसि ध्यात्वा पतिं भानुं विलोकयेत्

svavākyaṁ śrāvayennāpi yāvatsnātvā na śudhyati susnātā bhartṛvadanamīkṣetānyasya na kvacit athavā manasi dhyātvā patiṁ bhānuṁ vilokayet

जब तक स्नान करके शुद्ध नहीं हो जाती, तब तक वह अपनी वाणी भी नहीं सुनाती; भलीभाँति स्नान करने पर वह पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का मुख नहीं देखती, अथवा मन में पति का ध्यान करके सूर्य को देखती है।

श्लोक 28 (skanda.3.59.28)

हरिद्रां कुकुमं चैव सिंदूरं कज्जलं तथा । कूर्पासकं च तांबूलं मांगल्याभरणं शुभम्

haridrāṁ kukumaṁ caiva siṁdūraṁ kajjalaṁ tathā kūrpāsakaṁ ca tāṁbūlaṁ māṁgalyābharaṇaṁ śubham

हल्दी, कुमकुम, सिंदूर तथा काजल, चोली, ताम्बूल और शुभ मांगल्य आभूषण —

श्लोक 29 (skanda.3.59.29)

केशसंस्कारकं चैव करकर्णादिभूषणम् । भर्तुरायुष्यमिच्छंती दूरयेन्न पतिव्रता

keśasaṁskārakaṁ caiva karakarṇādibhūṣaṇam bharturāyuṣyamicchaṁtī dūrayenna pativratā

तथा केश-श्रृंगार, हाथ-कान आदि के आभूषण — पति की आयु की कामना करती हुई पतिव्रता इन्हें कभी दूर नहीं करती।

श्लोक 30 (skanda.3.59.30)

भर्तृविद्वेषिणीं नारीं नैषा संभाषते क्वचित् । नैकाकिनी क्वचिद्भूयान्न नग्ना स्नाति च क्वचित्

bhartṛvidveṣiṇīṁ nārīṁ naiṣā saṁbhāṣate kvacit naikākinī kvacidbhūyānna nagnā snāti ca kvacit

वह किसी भी ऐसी स्त्री से बात नहीं करती जो उसके पति से द्वेष रखती हो; वह कहीं भी अकेली नहीं रहती और न ही कभी नग्न होकर स्नान करती है।

श्लोक 31 (skanda.3.59.31)

नोलूखले न मुशले न वर्द्धन्यां दृषद्यपि । न यंत्रके न देहल्यां सती चोपविशेत्क्वचित्

nolūkhale na muśale na varddhanyāṁ dṛṣadyapi na yaṁtrake na dehalyāṁ satī copaviśetkvacit

सती स्त्री कभी भी ओखली पर, मूसल पर, चक्की के पाट पर अथवा शिला पर नहीं बैठती; न यंत्र पर और न ही देहली पर बैठती है।

श्लोक 32 (skanda.3.59.32)

विना व्यवायसमयात्प्रागल्भ्यं न क्वचिच्चरेत । यत्रयत्र रुचिर्भर्तुस्तत्र प्रेमवती सदा

vinā vyavāyasamayātprāgalbhyaṁ na kvaciccareta yatrayatra rucirbhartustatra premavatī sadā

संभोग के उचित समय के अतिरिक्त वह कभी भी उद्दंडता का आचरण नहीं करती; जहाँ-जहाँ पति की रुचि हो, वहाँ वह सदा प्रेमपूर्वक रहती है।

श्लोक 33 (skanda.3.59.33)

इदमेव व्रतं स्त्रीणामयमेव परो वृषः । इयमेव च पूजा च भर्तुर्वाक्यं न लंघयेत्

idameva vrataṁ strīṇāmayameva paro vṛṣaḥ iyameva ca pūjā ca bharturvākyaṁ na laṁghayet

यही स्त्रियों का व्रत है, यही सबसे बड़ा धर्म है; यही पूजा है — पति के वचन का उल्लंघन कभी नहीं करना चाहिए।

श्लोक 34 (skanda.3.59.34)

क्लीबं वा दुरवस्थं वा व्याधितं वृद्धमेव वा । सुस्थिरं दुःस्थिरं वापि पतिमेकं न लंघयेत्

klībaṁ vā duravasthaṁ vā vyādhitaṁ vṛddhameva vā susthiraṁ duḥsthiraṁ vāpi patimekaṁ na laṁghayet

चाहे वह नपुंसक हो, दुरवस्था में हो, रोगी हो अथवा वृद्ध हो; चाहे सुस्थिर हो या अस्थिर — वह अपने एक पति की कभी अवहेलना न करे।

श्लोक 35 (skanda.3.59.35)

सर्पिर्लव(?)णहिंग्वादिक्षयेऽपि व पति व्रता । पतिं नास्तीति न ब्रूयादायसीषु न भोजयेत्

sarpirlava(?)ṇahiṁgvādikṣaye'pi va pati vratā patiṁ nāstīti na brūyādāyasīṣu na bhojayet

घी, नमक(?), हींग आदि की कमी होने पर भी पतिव्रता पति से "नहीं है" ऐसा न कहे, और न ही उसे लोहे के बर्तनों में भोजन कराए।

श्लोक 36 (skanda.3.59.36)

तीर्थस्नानार्थिनी चैव पतिपादोदकं पिबेत् । शंकरादपि वा विष्णोः पतिरेवाधि कः स्त्रियः

tīrthasnānārthinī caiva patipādodakaṁ pibet śaṁkarādapi vā viṣṇoḥ patirevādhi kaḥ striyaḥ

तीर्थस्नान की इच्छा रखने वाली स्त्री को पति के चरणों का जल पीना चाहिए; स्त्री के लिए पति ही शंकर और विष्णु से भी बड़ा है।

श्लोक 37 (skanda.3.59.37)

व्रतोपवामनियमं पतिमुल्लंघ्य या चरेत् । आयुष्यं हरते भर्तुर्मृता निरयमृच्छति

vratopavāmaniyamaṁ patimullaṁghya yā caret āyuṣyaṁ harate bharturmṛtā nirayamṛcchati

जो स्त्री पति की अवहेलना करके व्रत-उपवास-नियम का पालन करती है, वह पति की आयु का हरण करती है और मरने पर नरक को प्राप्त होती है।

श्लोक 38 (skanda.3.59.38)

उक्ता प्रत्युत्तरं दद्यान्नारी या क्रोधत त्परा । सरमा जायते ग्रामे शृगाली निर्जने वने

uktā pratyuttaraṁ dadyānnārī yā krodhata tparā saramā jāyate grāme śṛgālī nirjane vane

जो स्त्री, कुछ कहे जाने पर क्रोधपूर्वक उत्तर देती है और सदा क्रोध में तत्पर रहती है, वह गाँव में कुतिया और निर्जन वन में सियारिन बनकर जन्म लेती है।

श्लोक 39 (skanda.3.59.39)

स्त्रीणां हि परमश्चैको नियमः समुदाहृतः । अभ्यर्च्य चरणौ भतुर्भो क्तव्यं कृतनिश्चया

strīṇāṁ hi paramaścaiko niyamaḥ samudāhṛtaḥ abhyarcya caraṇau bhaturbho ktavyaṁ kṛtaniścayā

स्त्रियों के लिए एक ही सर्वोच्च नियम बताया गया है — पति के चरणों की पूजा करके ही दृढ़ निश्चय से भोजन करना चाहिए।

श्लोक 40 (skanda.3.59.40)

उच्चासनं न सेवेत न व्रजेत्परवेश्मसु । तत्र पारुष्यवाक्यानि ब्रूयान्नैव कदाचन

uccāsanaṁ na seveta na vrajetparaveśmasu tatra pāruṣyavākyāni brūyānnaiva kadācana

वह ऊँचे आसन का सेवन न करे, न पराए घर जाए; तथा वहाँ कठोर वचन कभी न बोले।

श्लोक 41 (skanda.3.59.41)

गुरूणां सन्निधौ वापि नोच्चैर्ब्रूयान्नवाहयेत्

gurūṇāṁ sannidhau vāpi noccairbrūyānnavāhayet

गुरुजनों की उपस्थिति में भी वह ऊँचे स्वर में न बोले और न कोई शोर मचाए।

श्लोक 42 (skanda.3.59.42)

या भर्तारं परित्यज्य रहश्चरति दुर्मतिः । उलूकी जायते क्रूरा वृक्षकोटरशायिनी

yā bhartāraṁ parityajya rahaścarati durmatiḥ ulūkī jāyate krūrā vṛkṣakoṭaraśāyinī

जो दुर्बुद्धि स्त्री पति को छोड़कर गुप्त रूप से विचरण करती है, वह क्रूर उल्लूनी बनकर वृक्ष की कोटर में रहने वाली होती है।

श्लोक 43 (skanda.3.59.43)

ताडिता ताडयेच्चेत्तं सा व्याघ्री वृषदंशिका । कटाक्षयति याऽन्यं वै केकराक्षी तु सा भवेत्

tāḍitā tāḍayeccettaṁ sā vyāghrī vṛṣadaṁśikā kaṭākṣayati yā'nyaṁ vai kekarākṣī tu sā bhavet

यदि मारे जाने पर वह पलटकर मारती है, तो वह बाघिन अथवा छछूंदर बनती है; और जो किसी अन्य पुरुष पर कटाक्ष करती है, वह भेंगी आँखों वाली बनती है।

श्लोक 44 (skanda.3.59.44)

या भर्तारं परित्यज्य मिष्टमश्नाति केवलम् । ग्रामे सा सूकरी भूयाद्वल्गुली वाथ विङ्भुजा

yā bhartāraṁ parityajya miṣṭamaśnāti kevalam grāme sā sūkarī bhūyādvalgulī vātha viṅbhujā

जो स्त्री पति को छोड़कर अकेली मिष्टान्न खाती है, वह गाँव में सूअरी अथवा चमगादड़ या विष्ठा खाने वाली बनती है।

श्लोक 45 (skanda.3.59.45)

हुन्त्वंकृत्याप्रियं ब्रूते मूका सा जायते खलु । या सपत्नीं सदैर्ष्येत दुर्भगा सा पुनःपुनः । दृष्टिं विलुप्य भर्तुर्या कंचिदन्यं समीक्षते

huntvaṁkṛtyāpriyaṁ brūte mūkā sā jāyate khalu yā sapatnīṁ sadairṣyeta durbhagā sā punaḥpunaḥ dṛṣṭiṁ vilupya bharturyā kaṁcidanyaṁ samīkṣate

जो कठोर और अप्रिय वचन बोलती है, वह निश्चय ही गूंगी बनकर जन्म लेती है; जो सौत से सदा ईर्ष्या रखती है, वह बार-बार दुर्भाग्यशालिनी बनती है; और जो पति की दृष्टि बचाकर किसी अन्य पुरुष को देखती है —

श्लोक 46 (skanda.3.59.46)

काणा च विमुखा वापि कुरूपापि च जायते । बाह्यादायांतमालोक्य त्वरिता च जलासनैः । तांबूलैर्व्यजनैश्चैव पादसंवाहनादिभिः

kāṇā ca vimukhā vāpi kurūpāpi ca jāyate bāhyādāyāṁtamālokya tvaritā ca jalāsanaiḥ tāṁbūlairvyajanaiścaiva pādasaṁvāhanādibhiḥ

— वह काणी, विमुख अथवा कुरूप बनकर जन्म लेती है। किन्तु जो स्त्री बाहर से आते हुए पति को देखकर तुरंत जल, आसन, ताम्बूल, पंखा तथा पैर दबाने आदि से सेवा करती है —

श्लोक 47 (skanda.3.59.47)

तथैव चारुवचनैः स्वेदसंनोदनैः परैः । या प्रियं प्रीणयेत्प्रीता त्रिलोकी प्रीणिता तया । मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता सुतं सुतः

tathaiva cāruvacanaiḥ svedasaṁnodanaiḥ paraiḥ yā priyaṁ prīṇayetprītā trilokī prīṇitā tayā mitaṁ dadāti hi pitā mitaṁ bhrātā sutaṁ sutaḥ

— तथा मधुर वचनों से और पसीना पोंछने आदि उपायों से जो स्त्री प्रसन्नतापूर्वक अपने प्रिय पति को प्रसन्न करती है, उससे तीनों लोक प्रसन्न होते हैं। पिता सीमित देता है, भाई सीमित देता है, पुत्र भी सीमित देता है —

श्लोक 48 (skanda.3.59.48)

अमितस्य हि दातारं भर्तारं का न पूजयेत् । भर्ता देवो गुरुर्भर्ता धर्मतीर्थव्रतानि च । तस्मात्सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत्

amitasya hi dātāraṁ bhartāraṁ kā na pūjayet bhartā devo gururbhartā dharmatīrthavratāni ca tasmātsarvaṁ parityajya patimekaṁ samarcayet

— किन्तु पति असीमित देने वाला है; कौन स्त्री उसकी पूजा न करे? पति ही देवता है, पति ही गुरु है, तथा धर्म, तीर्थ और व्रत भी वही है। इसलिए सब कुछ त्यागकर केवल पति की ही आराधना करनी चाहिए।

श्लोक 49 (skanda.3.59.49)

जीवहीनो यथा देही क्षणादशुचितां व्रजेत् । भर्तृहीना तथा योषित्सुस्नाताप्यशुचिः सदा

jīvahīno yathā dehī kṣaṇādaśucitāṁ vrajet bhartṛhīnā tathā yoṣitsusnātāpyaśuciḥ sadā

जैसे जीवरहित शरीर क्षणभर में अशुद्ध हो जाता है, वैसे ही पतिहीन स्त्री भलीभाँति स्नान करने पर भी सदैव अशुद्ध रहती है।

श्लोक 50 (skanda.3.59.50)

अमंगलेभ्यः सर्वेभ्यो विधवा स्यादमंगला । विधवादर्शनात्सिद्धिः क्वापि जातु न जायते

amaṁgalebhyaḥ sarvebhyo vidhavā syādamaṁgalā vidhavādarśanātsiddhiḥ kvāpi jātu na jāyate

सभी अमंगल वस्तुओं में विधवा सबसे अधिक अमंगल है; विधवा के दर्शन से कहीं भी कभी सिद्धि नहीं मिलती।

श्लोक 51 (skanda.3.59.51)

विहाय मातरं चैकां सर्वा मंगलवर्जिताः । तदाशिषमपि प्राज्ञस्त्यजेदाशीविषोपमाम्

vihāya mātaraṁ caikāṁ sarvā maṁgalavarjitāḥ tadāśiṣamapi prājñastyajedāśīviṣopamām

अपनी माता को छोड़कर, शेष सभी विधवाएँ मंगल से रहित मानी गई हैं; बुद्धिमान पुरुष को उनका आशीर्वाद भी सर्प के विष के समान त्याग देना चाहिए।

श्लोक 52 (skanda.3.59.52)

कन्याविवाहसमये वाचयेयुरिति द्विजाः । भर्तुः सहचरी भूयाज्जीवतो ऽजीवतोपि वा

kanyāvivāhasamaye vācayeyuriti dvijāḥ bhartuḥ sahacarī bhūyājjīvato 'jīvatopi vā

कन्या के विवाह के समय द्विजों को यह पाठ कराना चाहिए — "यह पति की सहचरी बने, चाहे वह जीवित हो या न हो।"

श्लोक 53 (skanda.3.59.53)

अनुव्रजन्ती भर्तारं गृहात्पितृवनं मुदा । पदेपदेश्वमेधस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम्

anuvrajantī bhartāraṁ gṛhātpitṛvanaṁ mudā padepadeśvamedhasya phalaṁ prāpnotyasaṁśayam

जो स्त्री घर से पितृवन तक हर्षपूर्वक पति का अनुसरण करती है, वह प्रत्येक पग पर निःसंदेह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करती है।

श्लोक 54 (skanda.3.59.54)

व्यालग्राही यथा व्यालं बलादुद्धरते बिलात् । एवमुत्क्रम्य दूतेभ्यः पतिं स्वर्गं व्रजेत्सती

vyālagrāhī yathā vyālaṁ balāduddharate bilāt evamutkramya dūtebhyaḥ patiṁ svargaṁ vrajetsatī

जैसे सँपेरा बलपूर्वक बिल से सर्प को निकाल लेता है, वैसे ही सती स्त्री यमदूतों को लांघकर पति को स्वर्ग ले जाती है।

श्लोक 55 (skanda.3.59.55)

यमदूताः पलायंते तामालोक्य पतिव्रताम् । तपनस्तप्यते नूनं दहनोपि च दह्यते

yamadūtāḥ palāyaṁte tāmālokya pativratām tapanastapyate nūnaṁ dahanopi ca dahyate

उस पतिव्रता को देखकर यमदूत भाग जाते हैं; सूर्य निश्चय ही तप्त हो उठता है और अग्नि भी और अधिक जलने लगती है।

श्लोक 56 (skanda.3.59.56)

कंपंते सर्वतेजांसि दृष्ट्वा पातिव्रतं महः । यावत्स्वलोमसंख्यास्ति तावत्कोट्ययुतानि च

kaṁpaṁte sarvatejāṁsi dṛṣṭvā pātivrataṁ mahaḥ yāvatsvalomasaṁkhyāsti tāvatkoṭyayutāni ca

उसकी पातिव्रत्य की महिमा को देखकर सभी तेज कांप उठते हैं; उसके शरीर में जितने भी रोम हैं, उतने ही करोड़ों वर्षों के बराबर पुण्य होता है।

श्लोक 57 (skanda.3.59.57)

भर्त्रा स्वर्गसुखं भुंक्ते रममाणा पतिव्रता । धन्या सा जननी लोके धन्योऽसौ जनकः पुनः

bhartrā svargasukhaṁ bhuṁkte ramamāṇā pativratā dhanyā sā jananī loke dhanyo'sau janakaḥ punaḥ

पतिव्रता स्त्री पति के साथ रमण करते हुए स्वर्ग-सुख भोगती है; संसार में धन्य है वह माता और धन्य है वह पिता भी।

श्लोक 58 (skanda.3.59.58)

धन्यः स च पतिः श्रीमान्येषां गेहे पतिव्रता । पितृवंश्या मातृवंश्याः पतिवंश्यास्त्रयस्त्रयः । पतिव्रतायाः पुण्येन स्वर्गसौख्यानि भुंजते

dhanyaḥ sa ca patiḥ śrīmānyeṣāṁ gehe pativratā pitṛvaṁśyā mātṛvaṁśyāḥ pativaṁśyāstrayastrayaḥ pativratāyāḥ puṇyena svargasaukhyāni bhuṁjate

धन्य है वह श्रीमान् पति जिसके घर में पतिव्रता स्त्री है। पितृवंश, मातृवंश तथा पतिवंश — ये तीनों वंश पतिव्रता के पुण्य से स्वर्ग के सुख भोगते हैं।

श्लोक 59 (skanda.3.59.59)

शीलभंगेन दुर्वृत्ताः पातयंति कुलत्रयम् । पितुर्मातुस्तथा पत्युरिहारमुत्र च दुःखिताः

śīlabhaṁgena durvṛttāḥ pātayaṁti kulatrayam piturmātustathā patyurihāramutra ca duḥkhitāḥ

शील भंग करने से दुष्ट स्त्रियाँ पिता, माता तथा पति — इन तीनों कुलों का पतन करती हैं, और स्वयं इस लोक और परलोक दोनों में दुःखी होती हैं।

श्लोक 60 (skanda.3.59.60)

पतिव्रतायाश्चरणो यत्रयत्र स्पृशेद्भुवम् । सा तीर्थभूमिर्म्मान्येति नात्र भारोऽस्ति पावनः

pativratāyāścaraṇo yatrayatra spṛśedbhuvam sā tīrthabhūmirmmānyeti nātra bhāro'sti pāvanaḥ

जहाँ-जहाँ पतिव्रता स्त्री का चरण भूमि का स्पर्श करता है, वह भूमि तीर्थ मानी जाती है, इसमें पवित्रता का कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 61 (skanda.3.59.61)

बिभ्यत्पतिव्रतास्पर्शं कुरुते भानुमानपि । सोमो गन्धर्व एवापि स्वपावित्र्याय नान्यथा

bibhyatpativratāsparśaṁ kurute bhānumānapi somo gandharva evāpi svapāvitryāya nānyathā

सूर्य भी पतिव्रता के स्पर्श से भयभीत रहता है; चन्द्रमा और गंधर्व भी अपनी पवित्रता के लिए अन्यथा आचरण नहीं करते।

श्लोक 62 (skanda.3.59.62)

आपः पतिव्रतास्पर्शमभिलष्यंति सर्वदा । गायत्र्याघविनाशो नो पातिव्रत्येन साऽघनुत्

āpaḥ pativratāsparśamabhilaṣyaṁti sarvadā gāyatryāghavināśo no pātivratyena sā'ghanut

जल सदैव पतिव्रता के स्पर्श की कामना करते हैं; गायत्री का पापनाश करने का सामर्थ्य भी उतना नहीं, जितना पातिव्रत्य से पाप का नाश होता है।

श्लोक 63 (skanda.3.59.63)

गृहेगृहे न किं नार्य्यो रूपलावण्यगर्विताः । परं विश्वेशभक्त्यैव लभ्यते स्त्री पति व्रता

gṛhegṛhe na kiṁ nāryyo rūpalāvaṇyagarvitāḥ paraṁ viśveśabhaktyaiva labhyate strī pati vratā

क्या हर घर में रूप-लावण्य से गर्वित स्त्रियाँ नहीं होतीं? किन्तु विश्वेश (शिव) की भक्ति से ही सच्ची पतिव्रता स्त्री प्राप्त होती है।

श्लोक 64 (skanda.3.59.64)

भार्या मूलं गृहस्थस्य भार्या मूलं सुखस्य च । भार्या धर्मफलायैव भार्या संतानवृद्धये

bhāryā mūlaṁ gṛhasthasya bhāryā mūlaṁ sukhasya ca bhāryā dharmaphalāyaiva bhāryā saṁtānavṛddhaye

पत्नी गृहस्थ का मूल है, पत्नी सुख का मूल है; पत्नी धर्मफल के लिए है, पत्नी संतान-वृद्धि के लिए है।

श्लोक 65 (skanda.3.59.65)

परलोकस्त्वयं लोको जीयते भार्यया द्वयम् । देवपित्रतिथीनां च तृप्तिः स्याद्भार्यया गृहे । गृहस्थः स तु विज्ञेयो गृहे यस्य पतिव्रता

paralokastvayaṁ loko jīyate bhāryayā dvayam devapitratithīnāṁ ca tṛptiḥ syādbhāryayā gṛhe gṛhasthaḥ sa tu vijñeyo gṛhe yasya pativratā

यह लोक और परलोक — दोनों पत्नी द्वारा ही जीते जाते हैं; घर में पत्नी के द्वारा ही देवता, पितर और अतिथियों की तृप्ति होती है। वही सच्चा गृहस्थ जानना चाहिए जिसके घर में पतिव्रता स्त्री हो।

श्लोक 66 (skanda.3.59.66)

यथा गंगावगाहेन शरीरं पावनं भवेत् । तथा पतिव्रतां दृष्ट्वा सदनं पावनं भवेत्

yathā gaṁgāvagāhena śarīraṁ pāvanaṁ bhavet tathā pativratāṁ dṛṣṭvā sadanaṁ pāvanaṁ bhavet

जैसे गंगा में स्नान करने से शरीर पवित्र हो जाता है, वैसे ही पतिव्रता को देखने मात्र से घर पवित्र हो जाता है।

श्लोक 67 (skanda.3.59.67)

पर्यंकशायिनी नारी विधवा पातयेत्पतिम् । तस्माद्भूशयनं कार्य्यं पतिसौख्यसमीहया

paryaṁkaśāyinī nārī vidhavā pātayetpatim tasmādbhūśayanaṁ kāryyaṁ patisaukhyasamīhayā

पलंग पर सोने वाली विधवा स्त्री अपने पति का पतन कराती है; इसलिए पति के सुख की कामना से उसे भूमि पर शयन करना चाहिए।

श्लोक 68 (skanda.3.59.68)

नैवांगोद्वर्त्तनं कार्य्यं स्त्रिया विधवया क्वचित् । गन्धद्रव्यस्य संभोगो नैव कार्य्यस्तया क्वचित्

naivāṁgodvarttanaṁ kāryyaṁ striyā vidhavayā kvacit gandhadravyasya saṁbhogo naiva kāryyastayā kvacit

विधवा स्त्री को कभी भी अंगों पर उबटन नहीं लगाना चाहिए; तथा उसे सुगंधित द्रव्यों का प्रयोग भी कभी नहीं करना चाहिए।

श्लोक 69 (skanda.3.59.69)

तर्प्पणं प्रत्यहं कार्यं भर्तुः कुशतिलोदकैः । तत्पितुस्तत्पितुश्चापि नामगोत्रादिपूर्वकम्

tarppaṇaṁ pratyahaṁ kāryaṁ bhartuḥ kuśatilodakaiḥ tatpitustatpituścāpi nāmagotrādipūrvakam

प्रतिदिन कुश, तिल और जल से पति का तर्पण करना चाहिए, तथा उसके पिता एवं पितामह का भी नाम-गोत्र सहित तर्पण करना चाहिए।

श्लोक 70 (skanda.3.59.70)

विष्णोः संपूजनं कार्यं पतिबुद्ध्या न चान्यथा । पतिमेव सदा ध्यायेद्विष्णुरूपधरं हरिम्

viṣṇoḥ saṁpūjanaṁ kāryaṁ patibuddhyā na cānyathā patimeva sadā dhyāyedviṣṇurūpadharaṁ harim

विष्णु की पूजा पति की बुद्धि से ही करनी चाहिए, अन्यथा नहीं; वह सदा पति को ही विष्णुरूपधारी हरि मानकर उनका ध्यान करे।

श्लोक 71 (skanda.3.59.71)

यद्यदिष्टतमं लोके यद्यत्पत्युः समीहितम् । तत्तद्गुणवते देयं पतिप्रीणनकाम्यया

yadyadiṣṭatamaṁ loke yadyatpatyuḥ samīhitam tattadguṇavate deyaṁ patiprīṇanakāmyayā

लोक में जो-जो अत्यंत प्रिय हो, जो-जो पति को अभीष्ट हो, वह सब पति को प्रसन्न करने की कामना से गुणवान ब्राह्मणों को देना चाहिए।

श्लोक 72 (skanda.3.59.72)

वैशाखे कार्त्तिके मासे विशेषनियमांश्चरेत् । स्नानं दानं तीर्थयात्रां पुराणश्रवणं मुहुः

vaiśākhe kārttike māse viśeṣaniyamāṁścaret snānaṁ dānaṁ tīrthayātrāṁ purāṇaśravaṇaṁ muhuḥ

वैशाख और कार्तिक मास में विशेष नियमों का पालन करना चाहिए — स्नान, दान, तीर्थयात्रा तथा बार-बार पुराण-श्रवण।

श्लोक 73 (skanda.3.59.73)

वैशाखे जलकुम्भाश्च कार्त्तिके घृतदीपिकाः । माघे धान्यतिलोत्सर्गः स्वर्गलोके विशिष्यते

vaiśākhe jalakumbhāśca kārttike ghṛtadīpikāḥ māghe dhānyatilotsargaḥ svargaloke viśiṣyate

वैशाख में जल के घड़े, कार्तिक में घी के दीपक, तथा माघ में धान्य और तिल का दान — ये स्वर्गलोक में विशेष रूप से श्रेष्ठ माने जाते हैं।

श्लोक 74 (skanda.3.59.74)

प्रपा कार्या च वैशाखे देवे देया गलंतिका । उशीरं व्यजनं छत्रं सूक्ष्मवासांसि चंदनम्

prapā kāryā ca vaiśākhe deve deyā galaṁtikā uśīraṁ vyajanaṁ chatraṁ sūkṣmavāsāṁsi caṁdanam

वैशाख में प्याऊ बनवानी चाहिए तथा देवता को जलपूर्ण घट अर्पित करना चाहिए; इसके साथ खस, पंखा, छाता, सूक्ष्म वस्त्र तथा चंदन दान करना चाहिए।

श्लोक 75 (skanda.3.59.75)

सकर्पूरं च तांबूलं पुष्पदानं तथैव च । जलपात्राण्यनेकानि तथा पुष्पगृहाणि च

sakarpūraṁ ca tāṁbūlaṁ puṣpadānaṁ tathaiva ca jalapātrāṇyanekāni tathā puṣpagṛhāṇi ca

कपूर सहित ताम्बूल तथा पुष्पदान भी; अनेक जल-पात्र तथा पुष्प-गृह (फूलों के मंडप) भी —

श्लोक 76 (skanda.3.59.76)

पानानि च विचित्राणि द्राक्षारंभाफलानि च । देयानि द्विजमुख्येभ्यः पतिर्मे प्रीयतामिति

pānāni ca vicitrāṇi drākṣāraṁbhāphalāni ca deyāni dvijamukhyebhyaḥ patirme prīyatāmiti

विविध पेय पदार्थ, अंगूर, केले आदि फल — ये सब प्रमुख ब्राह्मणों को यह कहते हुए देने चाहिए कि "मेरे पति प्रसन्न हों"।

श्लोक 77 (skanda.3.59.77)

ऊर्ज्जे यवान्नमश्नीयादेकान्नमथवा पुनः । वृन्ताकं सूरणं चैव शूकशिंबीं च वर्जयेत्

ūrjje yavānnamaśnīyādekānnamathavā punaḥ vṛntākaṁ sūraṇaṁ caiva śūkaśiṁbīṁ ca varjayet

ऊर्ज (कार्तिक) मास में जौ का भोजन करना चाहिए अथवा एक ही अन्न ग्रहण करना चाहिए; बैंगन, सूरन तथा फली वाली शिंबी का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 78 (skanda.3.59.78)

कार्त्तिके वर्जयेत्तैलं कांस्यं चापि विवर्जयेत् । कार्त्तिके मौननियमे चारुघण्टां प्रदापयेत्

kārttike varjayettailaṁ kāṁsyaṁ cāpi vivarjayet kārttike maunaniyame cārughaṇṭāṁ pradāpayet

कार्तिक में तेल का त्याग करे तथा कांस्य के पात्रों का भी त्याग करे; कार्तिक में मौनव्रत रखते हुए सुंदर घंटी का दान कराए।

श्लोक 79 (skanda.3.59.79)

पत्रभोजी कांस्यपात्रं घृतपूर्णं प्रयच्छति । भूमिशय्याव्रते देया शय्या श्लक्ष्णा सतूलिका

patrabhojī kāṁsyapātraṁ ghṛtapūrṇaṁ prayacchati bhūmiśayyāvrate deyā śayyā ślakṣṇā satūlikā

पत्तल पर भोजन करते हुए घी से भरा कांस्य-पात्र दान करे; भूमि-शयन व्रत में मुलायम रुई की शय्या दान करनी चाहिए।

श्लोक 80 (skanda.3.59.80)

फलत्यागे फलं देयं रसत्यागे च तद्रसः । धान्यत्यागे च तद्धान्यमथवा शालयः स्मृताः । धेनुं दद्यात्प्रयत्ने न सालंकारा सकांचनाम्

phalatyāge phalaṁ deyaṁ rasatyāge ca tadrasaḥ dhānyatyāge ca taddhānyamathavā śālayaḥ smṛtāḥ dhenuṁ dadyātprayatne na sālaṁkārā sakāṁcanām

फल का त्याग करने पर फल का दान करे, रस का त्याग करने पर रस का दान करे; धान्य त्याग करने पर वही धान्य अथवा चावल का दान करना कहा गया है। प्रयत्नपूर्वक आभूषण और स्वर्ण सहित गौ का दान करे।

श्लोक 81 (skanda.3.59.81)

एकतः सर्वदानानि दीपदानं तथैकतः । कार्त्तिके दीपदानस्य कलां नार्हंति षोडशीम्

ekataḥ sarvadānāni dīpadānaṁ tathaikataḥ kārttike dīpadānasya kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm

एक ओर समस्त दान और दूसरी ओर दीपदान — कार्तिक मास के दीपदान की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं होते।

श्लोक 82 (skanda.3.59.82)

इत्यादिविधवानां च नियमाः संप्रकीर्तिताः । तेषां फलमिदं राजन्नान्येषां च कदाचन

ityādividhavānāṁ ca niyamāḥ saṁprakīrtitāḥ teṣāṁ phalamidaṁ rājannānyeṣāṁ ca kadācana

इस प्रकार विधवाओं के नियमों का वर्णन किया गया है; हे राजन्! यह फल उन्हीं का है, अन्य किसी का कदापि नहीं।

श्लोक 83 (skanda.3.59.83)

धर्मवापीं समासाद्य दानं दद्याद्विचक्षणः । कोटिधा वर्द्धते नित्यं ब्रह्मणो वचनं यथा

dharmavāpīṁ samāsādya dānaṁ dadyādvicakṣaṇaḥ koṭidhā varddhate nityaṁ brahmaṇo vacanaṁ yathā

बुद्धिमान पुरुष धर्मवापी को प्राप्त कर वहाँ दान करे; ब्रह्मा के वचनानुसार वह दान सदा करोड़ों गुना बढ़ता है।

श्लोक 84 (skanda.3.59.84)

तिलधेनुं च यो दयाद्धर्मेश्वरपुरः स्थितः । तिलसंख्यानि वर्षाणि स्वर्गे लोके महीयते

tiladhenuṁ ca yo dayāddharmeśvarapuraḥ sthitaḥ tilasaṁkhyāni varṣāṇi svarge loke mahīyate

जो व्यक्ति धर्मेश्वर के समक्ष खड़े होकर तिल की गौ का दान करता है, वह तिलों की संख्या के बराबर वर्षों तक स्वर्गलोक में महिमामंडित होता है।

श्लोक 85 (skanda.3.59.85)

धर्मक्षेत्रे तु संप्राप्य श्राद्धं कुर्यादतंद्रितः । तस्य संवत्सरं यावत्तृप्ताः स्युः पितरो धुवम्

dharmakṣetre tu saṁprāpya śrāddhaṁ kuryādataṁdritaḥ tasya saṁvatsaraṁ yāvattṛptāḥ syuḥ pitaro dhuvam

धर्मक्षेत्र में पहुँचकर आलस्यरहित होकर श्राद्ध करना चाहिए; ऐसा करने से उसके पितर निश्चय ही एक वर्ष तक तृप्त रहते हैं।

श्लोक 86 (skanda.3.59.86)

ये चान्ये पूर्वजाः स्वर्गे ये चान्ये नरकौकसः । ये च तिर्यक्त्वमापन्ना ये च भूतादिसंस्थिताः

ye cānye pūrvajāḥ svarge ye cānye narakaukasaḥ ye ca tiryaktvamāpannā ye ca bhūtādisaṁsthitāḥ

तथा जो अन्य पूर्वज स्वर्ग में हैं, जो नरकवासी हैं, जो पशु-योनि को प्राप्त हैं, और जो भूत आदि योनियों में स्थित हैं —

श्लोक 87 (skanda.3.59.87)

तान्सर्वान्धर्मकूपे वै श्राद्धं कुर्याद्यथाविधि । अत्र प्रकिरणं यत्तु मनुष्यैः क्रियते भुवि । तेन ते तृप्तिमायांति ये पिशाचत्वमागताः

tānsarvāndharmakūpe vai śrāddhaṁ kuryādyathāvidhi atra prakiraṇaṁ yattu manuṣyaiḥ kriyate bhuvi tena te tṛptimāyāṁti ye piśācatvamāgatāḥ

— उन सभी के लिए धर्मकूप में विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। यहाँ भूमि पर मनुष्यों द्वारा जो अन्न आदि बिखेरा जाता है, उससे जो प्रेत-योनि को प्राप्त हैं, वे तृप्त होते हैं।

श्लोक 88 (skanda.3.59.88)

येषां तु स्नानवस्त्रोत्थं भूमौ पतति पुत्रक । तेन ये तरुतां प्राप्तास्तेषां तृप्तिः प्रजायते

yeṣāṁ tu snānavastrotthaṁ bhūmau patati putraka tena ye tarutāṁ prāptāsteṣāṁ tṛptiḥ prajāyate

हे पुत्र! स्नान के वस्त्र से जो जल भूमि पर गिरता है, उससे जो वृक्ष-योनि को प्राप्त हैं, उनकी तृप्ति होती है।

श्लोक 89 (skanda.3.59.89)

या वै यवानां कणिकाः पतंति धरणीतले । ताभिराप्यायनं तेषां ये तु देवत्वमागताः

yā vai yavānāṁ kaṇikāḥ pataṁti dharaṇītale tābhirāpyāyanaṁ teṣāṁ ye tu devatvamāgatāḥ

जो जौ के कण भूमि पर गिरते हैं, उनसे उन जीवों की तृप्ति होती है जो देवत्व को प्राप्त हैं।

श्लोक 90 (skanda.3.59.90)

उद्धृतेष्यथ पिंडेषु यावान्नकणिका भुवि । ताभिराप्यायनं तेषां ये च पातालमागताः

uddhṛteṣyatha piṁḍeṣu yāvānnakaṇikā bhuvi tābhirāpyāyanaṁ teṣāṁ ye ca pātālamāgatāḥ

पिण्डों के उठाए जाने पर जो अन्न-कण भूमि पर गिरते हैं, उनसे उन जीवों की तृप्ति होती है जो पाताल को प्राप्त हैं।

श्लोक 91 (skanda.3.59.91)

ये वा वर्णाश्रमाचारक्रियालोपा ह्यसंस्कृताः । विपन्नास्ते भवंत्यत्र संमार्जनजलाशिनः

ye vā varṇāśramācārakriyālopā hyasaṁskṛtāḥ vipannāste bhavaṁtyatra saṁmārjanajalāśinaḥ

जो वर्णाश्रम के आचार और क्रियाओं का लोप करने से असंस्कृत रह जाते हैं, वे मरने पर यहाँ झाड़ू के जल को पीने वाले प्रेत बनते हैं।

श्लोक 92 (skanda.3.59.92)

भुक्त्वा वाचमनं यच्च जलं पतति भूतले । ब्राह्मणानां तथैवान्ये तेन तृप्तिं प्रयांति वै

bhuktvā vācamanaṁ yacca jalaṁ patati bhūtale brāhmaṇānāṁ tathaivānye tena tṛptiṁ prayāṁti vai

भोजन के पश्चात् ब्राह्मणों के आचमन का जो जल भूमि पर गिरता है, उससे भी अन्य प्रेतगण तृप्ति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 93 (skanda.3.59.93)

एवं यो यजमानश्च यच्च तेषां द्विजन्मनाम् । क्वचिज्जलान्नविक्षेपः शुचिरस्पृष्ट एव च

evaṁ yo yajamānaśca yacca teṣāṁ dvijanmanām kvacijjalānnavikṣepaḥ śuciraspṛṣṭa eva ca

इस प्रकार यजमान द्वारा तथा उन द्विजों द्वारा जो भी शुद्ध और अस्पृष्ट जल-अन्न का विक्षेपण कहीं होता है —

श्लोक 94 (skanda.3.59.94)

ये चान्ये नरके जातास्तत्र योन्यंतरं गताः । प्रयांत्याप्यायनं वत्स सम्यक्छ्राद्धक्रियावताम्

ye cānye narake jātāstatra yonyaṁtaraṁ gatāḥ prayāṁtyāpyāyanaṁ vatsa samyakchrāddhakriyāvatām

हे वत्स! जो अन्य नरक में उत्पन्न हैं तथा जो अन्य योनियों को प्राप्त हैं, वे सम्यक् श्राद्धकर्ता की क्रिया से तृप्ति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 95 (skanda.3.59.95)

अन्यायोपार्जितैर्द्रव्यैः श्राद्धं यत्क्रियते नरैः । तृप्यंति तेन चण्डालपुल्कसादिषु योनिषु

anyāyopārjitairdravyaiḥ śrāddhaṁ yatkriyate naraiḥ tṛpyaṁti tena caṇḍālapulkasādiṣu yoniṣu

मनुष्यों द्वारा अन्यायपूर्वक अर्जित धन से जो श्राद्ध किया जाता है, उससे चांडाल-पुल्कस आदि नीच योनियों में उत्पन्न लोग ही तृप्त होते हैं।

श्लोक 96 (skanda.3.59.96)

एवमाप्यायिता वत्स तेन चानेक बांधवाः । श्राद्धं कर्तुमशक्तिश्चेच्छाकैरपि हि जायते

evamāpyāyitā vatsa tena cāneka bāṁdhavāḥ śrāddhaṁ kartumaśaktiścecchākairapi hi jāyate

हे वत्स! इस प्रकार अनेक बंधुजन तृप्त होते हैं। यदि श्राद्ध करने में असमर्थता हो, तो शाक (साग-सब्जी) से भी वह संपन्न हो सकता है।

श्लोक 97 (skanda.3.59.97)

तस्माच्छ्राद्धं नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि । कुरुते कुर्वतः श्राद्धं कुलं क्वचिन्न सीदति

tasmācchrāddhaṁ naro bhaktyā śākairapi yathāvidhi kurute kurvataḥ śrāddhaṁ kulaṁ kvacinna sīdati

इसलिए मनुष्य भक्तिपूर्वक विधिपूर्वक शाक से भी श्राद्ध करे; श्राद्ध करने वाले का कुल कभी दुःखी नहीं होता।

श्लोक 98 (skanda.3.59.98)

पापं यदि कृतं सर्वं पापं च वर्द्धते ध्रुवम् । कुर्वाणो नरके घोरे पच्यते नात्र संशयः

pāpaṁ yadi kṛtaṁ sarvaṁ pāpaṁ ca varddhate dhruvam kurvāṇo narake ghore pacyate nātra saṁśayaḥ

यदि सारा पाप ही किया हो, तो वह पाप भी यहाँ निश्चय ही बढ़ता है; ऐसा करने वाला घोर नरक में पकाया जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 99 (skanda.3.59.99)

यथा पुण्यं तथा पापं कृतं कर्म शुभाशुभम् । तत्सर्वं वर्द्धते नूनं धर्मारण्ये नृपोत्तम

yathā puṇyaṁ tathā pāpaṁ kṛtaṁ karma śubhāśubham tatsarvaṁ varddhate nūnaṁ dharmāraṇye nṛpottama

जैसा पुण्य, वैसा ही पाप — जो भी शुभ या अशुभ कर्म किया गया हो, हे नृपोत्तम! वह सब धर्मारण्य में निश्चय ही बढ़ जाता है।

श्लोक 100 (skanda.3.59.100)

कामिकं कामदं देवं योगिनां मुक्तिदायकम् । सिद्धानां सिद्धिदं प्रोक्तं धर्मारण्यं तु सर्वदा

kāmikaṁ kāmadaṁ devaṁ yogināṁ muktidāyakam siddhānāṁ siddhidaṁ proktaṁ dharmāraṇyaṁ tu sarvadā

धर्मारण्य को सदैव कामनाशीलों के लिए कामनापूर्ण करने वाला, योगियों के लिए मुक्तिदायक देव, तथा सिद्धों के लिए सिद्धिदायक कहा गया है।

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60