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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 60

विष्णु-समागम

अध्याय 59अध्याय-सूचीअध्याय 61

श्लोक 1 (skanda.3.60.1)

युधिष्ठिर उवाच । धर्मारण्यकथां पुण्यां श्रुत्वा तृप्तिर्न मे विभो । यदायदा कथयसि तदा प्रोत्सहते मनः । अतः परं किमभवत्परं कौतूहलं हि मे

yudhiṣṭhira uvāca dharmāraṇyakathāṁ puṇyāṁ śrutvā tṛptirna me vibho yadāyadā kathayasi tadā protsahate manaḥ ataḥ paraṁ kimabhavatparaṁ kautūhalaṁ hi me

युधिष्ठिर बोले — हे विभो! धर्मारण्य की पुण्य कथा सुनकर भी मुझे तृप्ति नहीं होती; जब-जब आप कहते हैं, तब-तब मेरा मन और उत्साहित हो जाता है। इसके आगे क्या हुआ? मुझे बड़ा कौतूहल है।

श्लोक 2 (skanda.3.60.2)

व्यास उवाच । शृणु पार्थ महापुण्यां कथां स्कंदपुराणजाम् । स्थाणुनोक्तां च स्कंदाय धर्मारण्योद्भवां शुभाम्

vyāsa uvāca śṛṇu pārtha mahāpuṇyāṁ kathāṁ skaṁdapurāṇajām sthāṇunoktāṁ ca skaṁdāya dharmāraṇyodbhavāṁ śubhām

व्यासजी बोले — हे पार्थ! सुनो, यह महापुण्य कथा स्कंदपुराण से उत्पन्न है, जो स्थाणु (शिव) द्वारा स्कंद को कही गई थी, धर्मारण्य से उत्पन्न शुभ कथा है।

श्लोक 3 (skanda.3.60.3)

सर्वतीर्थस्य फलदां सर्वोपद्रवनाशिनीम् । कैलासशिखरासीनं देवदेवं जगद्गुरुम् । पंचवक्त्रं दशभुजं त्रिनेत्रं शूलपाणिनम्

sarvatīrthasya phaladāṁ sarvopadravanāśinīm kailāsaśikharāsīnaṁ devadevaṁ jagadgurum paṁcavaktraṁ daśabhujaṁ trinetraṁ śūlapāṇinam

यह कथा समस्त तीर्थों के फल को देने वाली तथा समस्त उपद्रवों का नाश करने वाली है। कैलास शिखर पर विराजमान देवाधिदेव जगद्गुरु — पाँच मुख, दस भुजा, तीन नेत्र वाले, शूलपाणि —

श्लोक 4 (skanda.3.60.4)

कपालखटवांगकरं नागयज्ञोपवीतिनम् । गणैः परिवृतं तत्र सुरासुरनमस्कृतम्

kapālakhaṭavāṁgakaraṁ nāgayajñopavītinam gaṇaiḥ parivṛtaṁ tatra surāsuranamaskṛtam

— कपाल और खट्वांग हाथ में धारण करने वाले, सर्प का यज्ञोपवीत धारण करने वाले; वहाँ गणों से घिरे हुए, देवताओं और असुरों द्वारा नमस्कृत।

श्लोक 5 (skanda.3.60.5)

नानारूपगुणैर्गीतं नारदप्रमुखैर्युतम् । गंधर्वैश्चाप्सरोभिश्च सेवितं तमुमापतिम् । तत्रस्थं च महादेवं प्रणिपत्याब्रवीत्सुतः

nānārūpaguṇairgītaṁ nāradapramukhairyutam gaṁdharvaiścāpsarobhiśca sevitaṁ tamumāpatim tatrasthaṁ ca mahādevaṁ praṇipatyābravītsutaḥ

विविध रूपों और गुणों से गायी जाने वाली महिमा वाले, नारद आदि से युक्त, गंधर्वों और अप्सराओं द्वारा सेवित उस उमापति महादेव को वहाँ स्थित देखकर पुत्र (स्कंद) ने प्रणाम करके कहा।

श्लोक 6 (skanda.3.60.6)

स्कंद उवाच । स्वामिन्निंद्रादयो देवा ब्रह्माद्याश्चैव सर्वशः । तव द्वारे समायातान्त्वद्दर्शनैकलालसाः । किमाज्ञापयसे देव करवाणि तवाग्रतः

skaṁda uvāca svāminniṁdrādayo devā brahmādyāścaiva sarvaśaḥ tava dvāre samāyātāntvaddarśanaikalālasāḥ kimājñāpayase deva karavāṇi tavāgrataḥ

स्कंद बोले — हे स्वामिन्! इन्द्र आदि देवता तथा ब्रह्मा आदि सभी आपके दर्शन की एकमात्र लालसा से आपके द्वार पर आये हैं। हे देव! आप क्या आज्ञा देते हैं? मैं आपके सम्मुख क्या करूँ?

श्लोक 7 (skanda.3.60.7)

व्यास उवाच । स्कंदस्य वचनं श्रुत्वा आसनादुत्थितो हरः । वृषभं न समारूढो गंतुकामोऽभवत्तदा

vyāsa uvāca skaṁdasya vacanaṁ śrutvā āsanādutthito haraḥ vṛṣabhaṁ na samārūḍho gaṁtukāmo'bhavattadā

व्यासजी बोले — स्कंद के वचन सुनकर हर (शिव) आसन से उठ खड़े हुए; वृषभ पर आरूढ़ हुए बिना ही वे तब जाने के इच्छुक हो गये।

श्लोक 8 (skanda.3.60.8)

गतुकामं शिवं दृष्ट्वा स्कंदो वाक्यमथाब्रवीत्

gatukāmaṁ śivaṁ dṛṣṭvā skaṁdo vākyamathābravīt

शिव को जाने के लिए उत्सुक देखकर स्कंद ने तब यह वचन कहा।

श्लोक 9 (skanda.3.60.9)

स्कंद उवाच । किं कार्यं देव देवानां यत्त्वमाहूयसे त्वरम् । वृषं त्यक्त्वा कृपासिंधो कृपास्ति यदि मे वद

skaṁda uvāca kiṁ kāryaṁ deva devānāṁ yattvamāhūyase tvaram vṛṣaṁ tyaktvā kṛpāsiṁdho kṛpāsti yadi me vada

स्कंद बोले — हे देव! देवताओं का ऐसा कौन-सा कार्य है, जिसके लिए आपको इतनी शीघ्रता से बुलाया गया, कि आप वृषभ को भी छोड़कर चल दिये? हे कृपासिंधो! यदि मुझ पर कृपा है तो बताइए।

श्लोक 10 (skanda.3.60.10)

देवदानव युद्धं वा किं कार्यं वा महत्तरम्

devadānava yuddhaṁ vā kiṁ kāryaṁ vā mahattaram

क्या देव-दानवों का युद्ध है, अथवा कोई और बड़ा कार्य है?

श्लोक 11 (skanda.3.60.11)

शिव उवाच । शृणुष्वैकाग्रमनसा येनाहं व्यग्रचेतसः । अस्ति स्थानं महापुण्यं धर्म्मारण्यं च भूतले

śiva uvāca śṛṇuṣvaikāgramanasā yenāhaṁ vyagracetasaḥ asti sthānaṁ mahāpuṇyaṁ dharmmāraṇyaṁ ca bhūtale

शिव बोले — एकाग्रचित्त होकर सुनो, जिस कारण मैं व्यग्रचित्त हूँ। पृथ्वी पर धर्मारण्य नामक एक महापुण्य स्थान है।

श्लोक 12 (skanda.3.60.12)

तत्रापि गंतुकामोऽहं देवैः सह षडाननः

tatrāpi gaṁtukāmo'haṁ devaiḥ saha ṣaḍānanaḥ

हे षडानन! मैं भी वहाँ देवताओं के साथ जाने का इच्छुक हूँ।

श्लोक 13 (skanda.3.60.13)

स्कंद उवाच । तत्र गत्वा महादेव किं करिष्यसि सांप्रतम् । तन्मे ब्रूहि जगन्नाथ कृत्यं सर्वमशेषतः

skaṁda uvāca tatra gatvā mahādeva kiṁ kariṣyasi sāṁpratam tanme brūhi jagannātha kṛtyaṁ sarvamaśeṣataḥ

स्कंद बोले — हे महादेव! वहाँ जाकर अभी आप क्या करेंगे? हे जगन्नाथ! वह समस्त कार्य मुझे पूर्णतः बताइए।

श्लोक 14 (skanda.3.60.14)

शिव उवाच । श्रूयतां वचनं पुत्र मनसोल्हादकारणम् । आदितः सर्व्ववृत्तानां सृष्टि स्थितिकरं महत्

śiva uvāca śrūyatāṁ vacanaṁ putra manasolhādakāraṇam āditaḥ sarvvavṛttānāṁ sṛṣṭi sthitikaraṁ mahat

शिव बोले — हे पुत्र! मन को आह्लादित करने वाला यह वचन सुनो — आदि से लेकर समस्त वृत्तांतों की सृष्टि और स्थिति करने वाली महान कथा।

श्लोक 15 (skanda.3.60.15)

परंतु प्रलये जाते सर्वतस्तमसा वृतम् । आसीदेकं तदा ब्रह्म निर्गुणं बीजमव्ययम्

paraṁtu pralaye jāte sarvatastamasā vṛtam āsīdekaṁ tadā brahma nirguṇaṁ bījamavyayam

किन्तु प्रलय होने पर सब कुछ चारों ओर से अंधकार से आवृत हो गया था; तब केवल एक निर्गुण ब्रह्म ही अव्यय बीज रूप में विद्यमान था।

श्लोक 16 (skanda.3.60.16)

निर्मितं वै गुणैरादौ मह द्द्रव्यं प्रचक्ष्यते

nirmitaṁ vai guṇairādau maha ddravyaṁ pracakṣyate

आरंभ में गुणों द्वारा जो निर्मित हुआ, वह महत्तत्त्व कहलाता है।

श्लोक 17 (skanda.3.60.17)

महाकल्पे च संप्राप्ते चराचरे क्षयं गते । जलरूपी जगन्नाथो रममाणस्तु लीलया

mahākalpe ca saṁprāpte carācare kṣayaṁ gate jalarūpī jagannātho ramamāṇastu līlayā

महाकल्प के आने पर तथा चराचर जगत् के नष्ट हो जाने पर, जल-रूपधारी जगन्नाथ लीलापूर्वक वहाँ क्रीड़ा करने लगे।

श्लोक 18 (skanda.3.60.18)

चिरकाले गते सोपि पृथिव्यादिसुतत्त्वकैः । वृक्षमुत्पादयामासायुतशाखामनोरमम्

cirakāle gate sopi pṛthivyādisutattvakaiḥ vṛkṣamutpādayāmāsāyutaśākhāmanoramam

दीर्घकाल बीतने पर उन्होंने पृथ्वी आदि सूक्ष्म तत्त्वों से दस हजार शाखाओं वाला एक सुंदर वृक्ष उत्पन्न किया।

श्लोक 19 (skanda.3.60.19)

फलैर्विशालैराकीर्णं स्कंधकांडादिशोभितम् । फलौघाढ्यो जटायुक्तो न्यग्रो धो विटपो महान्

phalairviśālairākīrṇaṁ skaṁdhakāṁḍādiśobhitam phalaughāḍhyo jaṭāyukto nyagro dho viṭapo mahān

विशाल फलों से भरा हुआ, स्कंध और शाखाओं से सुशोभित, फलों के समूह से समृद्ध और जटाओं से युक्त वह महान न्यग्रोध (बरगद) वृक्ष था।

श्लोक 20 (skanda.3.60.20)

बालभावं ततः कृत्वा वासुदेवो जनार्द्दनः । शेतेऽसौ वटपत्रेषु विश्वं निर्मातुमुत्सुकः

bālabhāvaṁ tataḥ kṛtvā vāsudevo janārddanaḥ śete'sau vaṭapatreṣu viśvaṁ nirmātumutsukaḥ

तत्पश्चात् बाल रूप धारण कर वासुदेव जनार्दन उस वटवृक्ष के पत्तों पर शयन करने लगे, विश्व की रचना करने के लिए उत्सुक।

श्लोक 21 (skanda.3.60.21)

सनाभिकमले विष्णो र्जातो ब्रह्मा हि लोककृत् । सर्वं जलमयं पश्यन्नानाकारमरूपकम्

sanābhikamale viṣṇo rjāto brahmā hi lokakṛt sarvaṁ jalamayaṁ paśyannānākāramarūpakam

विष्णु की नाभि-कमल से लोकों की रचना करने वाले ब्रह्मा उत्पन्न हुए; उन्होंने सब कुछ जलमय, अनेक आकारों से रहित तथा निराकार देखा।

श्लोक 22 (skanda.3.60.22)

तं दृष्ट्वा सहसोद्वेगाद्ब्रह्मा लोकपितामहः । इदमाह तदा पुत्र किं करो मीति निश्चितम्

taṁ dṛṣṭvā sahasodvegādbrahmā lokapitāmahaḥ idamāha tadā putra kiṁ karo mīti niścitam

यह देखकर लोकपितामह ब्रह्मा सहसा उद्विग्न होकर बोले — हे पुत्र! मैं निश्चित रूप से क्या करूँ?

श्लोक 23 (skanda.3.60.23)

खे जजान ततो वाणी देवात्सा चाशरीरिणी । तपस्तप विधे धातर्यथा मे दर्शनं भवेत्

khe jajāna tato vāṇī devātsā cāśarīriṇī tapastapa vidhe dhātaryathā me darśanaṁ bhavet

तब आकाश से वह अशरीरी दिव्य वाणी उत्पन्न हुई — "हे विधे! हे धातः! तप करो, जिससे तुम्हें मेरा दर्शन प्राप्त हो।"

श्लोक 24 (skanda.3.60.24)

तच्छ्रुत्वा वचनं तत्र ब्रह्मा लोकपितामहः । प्रातप्यत तपो घोरं परमं दुष्करं महत्

tacchrutvā vacanaṁ tatra brahmā lokapitāmahaḥ prātapyata tapo ghoraṁ paramaṁ duṣkaraṁ mahat

उस वचन को सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा ने वहाँ घोर, परम दुष्कर और महान तप किया।

श्लोक 25 (skanda.3.60.25)

प्रहसन्स तदा बालरूपेण कमलापतिः । उवाच मधुरां वाचं कृपालुर्बाल लीलया

prahasansa tadā bālarūpeṇa kamalāpatiḥ uvāca madhurāṁ vācaṁ kṛpālurbāla līlayā

तब मुस्कुराते हुए, बाल रूप में स्थित कमलापति (विष्णु) ने कृपापूर्वक बाल-लीला से मधुर वाणी में कहा।

श्लोक 26 (skanda.3.60.26)

श्रीविष्णुरुवाच । पुत्र त्वं विधिना चाद्य कुरु ब्रह्मांडगोलके । पातालं भूतलं चैव सिंधुसागरकाननम्

śrīviṣṇuruvāca putra tvaṁ vidhinā cādya kuru brahmāṁḍagolake pātālaṁ bhūtalaṁ caiva siṁdhusāgarakānanam

श्री विष्णु बोले — हे पुत्र! अब तुम विधिपूर्वक ब्रह्मांड के गोले में पाताल, भूतल तथा सिंधु-सागर-वन का निर्माण करो।

श्लोक 27 (skanda.3.60.27)

वृक्षाश्च गिरयो द्विपदाः पशवस्तथा । पक्षिणश्चैव गंधर्वाः सिद्धा यक्षाश्च राक्षसाः

vṛkṣāśca girayo dvipadāḥ paśavastathā pakṣiṇaścaiva gaṁdharvāḥ siddhā yakṣāśca rākṣasāḥ

तथा वृक्ष, पर्वत, द्विपद (मनुष्य) और पशु; पक्षी, गंधर्व, सिद्ध, यक्ष तथा राक्षस।

श्लोक 28 (skanda.3.60.28)

श्वापदाद्याश्च ये जीवाश्चतुराशीतियोनयः । उद्भिज्जाः स्वेदजाश्चैव जरायुजास्तथांडजाः

śvāpadādyāśca ye jīvāścaturāśītiyonayaḥ udbhijjāḥ svedajāścaiva jarāyujāstathāṁḍajāḥ

तथा हिंस्र पशु आदि जो चौरासी लाख योनियों वाले जीव हैं; उद्भिज्ज (पौधों से उत्पन्न), स्वेदज (पसीने से उत्पन्न), जरायुज (गर्भ से उत्पन्न) तथा अंडज (अंडे से उत्पन्न)।

श्लोक 29 (skanda.3.60.29)

एकविंशतिलक्षाणि एकैकस्य च योनयः । कुरु त्वं सकलं चाशु इत्युक्त्वांतरधीयत । ब्रह्मणा निर्मितं सर्वं ब्रह्मांडं च यथोदितम्

ekaviṁśatilakṣāṇi ekaikasya ca yonayaḥ kuru tvaṁ sakalaṁ cāśu ityuktvāṁtaradhīyata brahmaṇā nirmitaṁ sarvaṁ brahmāṁḍaṁ ca yathoditam

प्रत्येक योनि की इक्कीस लाख संख्या है; तुम शीघ्र ही यह सब रचो। ऐसा कहकर वे अंतर्धान हो गए। तब ब्रह्मा द्वारा जैसा कहा गया था, वैसा ही समस्त ब्रह्मांड निर्मित किया गया।

श्लोक 30 (skanda.3.60.30)

यस्मिन्पितामहो जज्ञे प्रभुरेकः प्रजापतिः । स्थाणुः सुरगुरुर्भानुः प्रचेताः परमेष्ठिनः

yasminpitāmaho jajñe prabhurekaḥ prajāpatiḥ sthāṇuḥ suragururbhānuḥ pracetāḥ parameṣṭhinaḥ

जिसमें पितामह, एकमात्र प्रभु प्रजापति उत्पन्न हुए; स्थाणु, सुरगुरु (बृहस्पति), भानु, प्रचेता तथा परमेष्ठी भी।

श्लोक 31 (skanda.3.60.31)

यथा दक्षो दक्षपुत्रा स्तथा सप्तर्षयश्च ये । ततः प्रजानां पतयः प्राभवन्नेकविंशतिः

yathā dakṣo dakṣaputrā stathā saptarṣayaśca ye tataḥ prajānāṁ patayaḥ prābhavannekaviṁśatiḥ

जैसे दक्ष उत्पन्न हुए, वैसे ही दक्ष के पुत्र तथा सप्तर्षि भी उत्पन्न हुए; तत्पश्चात् प्रजा के इक्कीस स्वामी (प्रजापति) उत्पन्न हुए।

श्लोक 32 (skanda.3.60.32)

पुरुषश्चाप्रमेयश्च एवं वंश्यर्षयो विदुः । विश्वेदेवास्तथादित्या वसव श्चाश्विनावपि

puruṣaścāprameyaśca evaṁ vaṁśyarṣayo viduḥ viśvedevāstathādityā vasava ścāśvināvapi

तथा पुरुष और अप्रमेय — इस प्रकार उस वंश के ऋषि जाने जाते हैं। विश्वेदेव, आदित्यगण, वसुगण तथा दोनों अश्विनीकुमार भी।

श्लोक 33 (skanda.3.60.33)

यक्षाः पिशाचाः साध्याश्च पितरो गुह्यकास्तथा । ततः प्रसूता विद्वांसो ह्यष्टौ ब्रह्मर्षयोऽमलाः

yakṣāḥ piśācāḥ sādhyāśca pitaro guhyakāstathā tataḥ prasūtā vidvāṁso hyaṣṭau brahmarṣayo'malāḥ

यक्ष, पिशाच, साध्य, पितर तथा गुह्यक भी; तत्पश्चात् आठ विद्वान और निर्मल ब्रह्मर्षि उत्पन्न हुए।

श्लोक 34 (skanda.3.60.34)

राजर्षयश्च बहवः सर्वे समुदिता गुणैः । द्यौरापः पृथिवी वायुरंतरिक्षं दिशस्तथा

rājarṣayaśca bahavaḥ sarve samuditā guṇaiḥ dyaurāpaḥ pṛthivī vāyuraṁtarikṣaṁ diśastathā

तथा बहुत से राजर्षि, सभी गुणों से संपन्न। द्यौ (आकाश), जल, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष तथा दिशाएँ भी।

श्लोक 35 (skanda.3.60.35)

संवत्सरार्तवो मासाः पक्षाहोरात्रयः क्रमात् । कलाकाष्ठामुहूर्तादि निमे षादि लवास्तथा

saṁvatsarārtavo māsāḥ pakṣāhorātrayaḥ kramāt kalākāṣṭhāmuhūrtādi nime ṣādi lavāstathā

संवत्सर, ऋतुएँ, मास, पक्ष तथा अहोरात्र क्रमशः; कला, काष्ठा, मुहूर्त आदि तथा निमेष आदि लव भी।

श्लोक 36 (skanda.3.60.36)

ग्रहचक्रं सनक्षत्रं युगा मन्वन्तरादयः । यच्चान्यदपि तत्सर्वं संभूतं लोकसाक्षिकम्

grahacakraṁ sanakṣatraṁ yugā manvantarādayaḥ yaccānyadapi tatsarvaṁ saṁbhūtaṁ lokasākṣikam

ग्रहचक्र, नक्षत्रों सहित, युग तथा मन्वंतर आदि; और जो कुछ अन्य भी है, वह सब लोक-साक्षी के रूप में उत्पन्न हुआ।

श्लोक 37 (skanda.3.60.37)

यदिदं दृश्यते चक्रं किंचि त्स्थावरजंगमम् । पुनः संक्षिप्यते पुत्र जगत्प्राप्ते युगक्षये

yadidaṁ dṛśyate cakraṁ kiṁci tsthāvarajaṁgamam punaḥ saṁkṣipyate putra jagatprāpte yugakṣaye

यह जो कुछ भी चराचर चक्र दिखाई देता है, हे पुत्र! युग के क्षय होने पर जगत् के प्राप्त होने पर वह पुनः समेट लिया जाता है।

श्लोक 38 (skanda.3.60.38)

यथर्तावृतुलिंगानि नामरूपाणि पर्यये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा वत्स युगादिकम्

yathartāvṛtuliṁgāni nāmarūpāṇi paryaye dṛśyante tāni tānyeva tathā vatsa yugādikam

जैसे ऋतु के परिवर्तन में वे ही चिह्न, नाम-रूप बार-बार दिखाई देते हैं, वैसे ही हे वत्स! युग आदि का भी क्रम है।

श्लोक 39 (skanda.3.60.39)

शिव उवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम् । ब्रह्मणश्च तथा पुत्र वंशस्यैवानुकीर्तनम्

śiva uvāca ataḥ paraṁ pravakṣyāmi kathāṁ paurāṇikīṁ śubhām brahmaṇaśca tathā putra vaṁśasyaivānukīrtanam

शिव बोले — इसके आगे मैं शुभ पौराणिक कथा कहूँगा, तथा हे पुत्र! ब्रह्मा के वंश का ही वर्णन करूँगा।

श्लोक 40 (skanda.3.60.40)

ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षयः । मरीचिरत्र्यंगिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः

brahmaṇo mānasāḥ putrā viditāḥ ṣaṇmaharṣayaḥ marīciratryaṁgirasau pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ

ब्रह्मा के मानस पुत्र छह महर्षियों के रूप में जाने जाते हैं — मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु।

श्लोक 41 (skanda.3.60.41)

मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपाच्चरमाः प्रजाः । प्रजज्ञिरे महाभागा दक्षकन्यास्त्रयोदश

marīceḥ kaśyapaḥ putraḥ kaśyapāccaramāḥ prajāḥ prajajñire mahābhāgā dakṣakanyāstrayodaśa

मरीचि से कश्यप पुत्र उत्पन्न हुए, कश्यप से समस्त प्रजाएँ उत्पन्न हुईं। दक्ष की तेरह महाभागा कन्याएँ —

श्लोक 42 (skanda.3.60.42)

अदितिर्दितिर्दनुः काला दनायुः सिंहिका तथा । क्रोधा प्रोवा वसिष्ठा च विनता कपिला तथा

aditirditirdanuḥ kālā danāyuḥ siṁhikā tathā krodhā provā vasiṣṭhā ca vinatā kapilā tathā

अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु तथा सिंहिका; क्रोधा, प्रोवा, वसिष्ठा, विनता तथा कपिला भी —

श्लोक 43 (skanda.3.60.43)

कण्डूश्चैव सुनेत्रा च कश्यपाय ददौ तदा । अदित्यां द्वादशादित्याः संजाता हि शुभाननाः

kaṇḍūścaiva sunetrā ca kaśyapāya dadau tadā adityāṁ dvādaśādityāḥ saṁjātā hi śubhānanāḥ

— तथा कंदू और सुनेत्रा भी, दक्ष ने तब कश्यप को दीं। अदिति से बारह आदित्य, सुंदर मुख वाले, उत्पन्न हुए।

श्लोक 44 (skanda.3.60.44)

सूर्याद्वै धर्मराड् जज्ञे ते नेदं निर्मितं पुरा । धर्मेण निर्मितं दृष्ट्वा धर्मारण्यमनुत्तमम् । धर्मारण्यमिति प्रोक्तं यन्मया स्कन्द पुण्यदम्

sūryādvai dharmarāḍ jajñe te nedaṁ nirmitaṁ purā dharmeṇa nirmitaṁ dṛṣṭvā dharmāraṇyamanuttamam dharmāraṇyamiti proktaṁ yanmayā skanda puṇyadam

सूर्य से धर्मराज उत्पन्न हुए; इससे पूर्व यह स्थान निर्मित नहीं था। धर्म द्वारा निर्मित इस अनुपम धर्मारण्य को देखकर इसे "धर्मारण्य" कहा गया — हे स्कंद! यह मैंने तुम्हें पुण्यदायक कथा बताई।

श्लोक 45 (skanda.3.60.45)

स्कन्द उवाच । धर्मारण्यस्य चाख्यानं परमं पावनं तथा । श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं कथयस्व महेश्वर

skanda uvāca dharmāraṇyasya cākhyānaṁ paramaṁ pāvanaṁ tathā śrotumicchāmi tatsarvaṁ kathayasva maheśvara

स्कंद बोले — हे महेश्वर! धर्मारण्य की वह परम पावन कथा मैं संपूर्ण रूप से सुनना चाहता हूँ, वह सब मुझे बताइए।

श्लोक 46 (skanda.3.60.46)

ईश्वर उवाच । इन्द्राद्याः सकला देवा अन्वयुर्ब्रह्मणा सह । अहं वै तत्र यास्यामि क्षेत्रं पापनिषूदनम्

īśvara uvāca indrādyāḥ sakalā devā anvayurbrahmaṇā saha ahaṁ vai tatra yāsyāmi kṣetraṁ pāpaniṣūdanam

ईश्वर बोले — इन्द्र आदि समस्त देवता ब्रह्मा के साथ चल पड़े; मैं भी उस पापनाशक क्षेत्र में जाऊँगा।

श्लोक 47 (skanda.3.60.47)

स्कन्द उवाच । अहमप्यागमिष्यामि तं द्रष्टुं शशिशे खर

skanda uvāca ahamapyāgamiṣyāmi taṁ draṣṭuṁ śaśiśe khara

स्कंद बोले — हे शशिशेखर! मैं भी उसे देखने के लिए आऊँगा।

श्लोक 48 (skanda.3.60.48)

सूत उवाच । ततः स्कन्दस्तथा रुद्रः सूर्यश्चैवानिलोऽनलः । सिद्धाश्चैव सगन्धर्वास्तथैवाप्सरसः शुभाः

sūta uvāca tataḥ skandastathā rudraḥ sūryaścaivānilo'nalaḥ siddhāścaiva sagandharvāstathaivāpsarasaḥ śubhāḥ

सूतजी बोले — तब स्कंद, रुद्र, सूर्य, वायु, अग्नि, सिद्धगण, गंधर्वों सहित तथा शुभ अप्सराएँ भी —

श्लोक 49 (skanda.3.60.49)

पिशाचा गुह्यकाः सर्व इन्द्रो वरुण एव च । नागाः सर्वाः समाजग्मुः शुक्रो वाचस्पतिस्तथा

piśācā guhyakāḥ sarva indro varuṇa eva ca nāgāḥ sarvāḥ samājagmuḥ śukro vācaspatistathā

— पिशाच, सभी गुह्यक, इन्द्र तथा वरुण भी; सभी नागगण इकट्ठे हुए, तथा शुक्र और वाचस्पति (बृहस्पति) भी।

श्लोक 50 (skanda.3.60.50)

ग्रहाः सर्वे सनक्षत्रा वसवोऽष्टौ ध्रुवा दयः । अंतरिक्षचराः सर्वे ये चान्ये नगवासिनः

grahāḥ sarve sanakṣatrā vasavo'ṣṭau dhruvā dayaḥ aṁtarikṣacarāḥ sarve ye cānye nagavāsinaḥ

सभी ग्रह नक्षत्रों सहित, ध्रुव आदि आठों वसु; अंतरिक्ष में विचरण करने वाले सभी तथा जो अन्य पर्वतवासी हैं।

श्लोक 51 (skanda.3.60.51)

ब्रह्मादयः सुराः सर्वे वैकुण्ठं परया मुदा । मन्त्रणार्थं तदा ब्रह्मा विष्णवेऽमितते जसे

brahmādayaḥ surāḥ sarve vaikuṇṭhaṁ parayā mudā mantraṇārthaṁ tadā brahmā viṣṇave'mitate jase

ब्रह्मा आदि सभी देवता अत्यंत हर्षपूर्वक वैकुंठ की ओर गये; तब ब्रह्मा ने परामर्श के लिए अमित तेजस्वी विष्णु के पास जाने का विचार किया।

श्लोक 52 (skanda.3.60.52)

गत्वा तस्मिंश्च वैकुण्ठे ब्रह्मा लोकपितामहः । ध्यात्वा मुहूर्तमाचष्ट विष्णुं प्रति सुहर्षितः

gatvā tasmiṁśca vaikuṇṭhe brahmā lokapitāmahaḥ dhyātvā muhūrtamācaṣṭa viṣṇuṁ prati suharṣitaḥ

और उस वैकुंठ में जाकर लोकपितामह ब्रह्मा ने क्षणभर ध्यान करके अत्यंत हर्षित होकर विष्णु से कहा।

श्लोक 53 (skanda.3.60.53)

ब्रह्मोवाच । कृष्ण कृष्ण महाबाहो कृपालो परमेश्वर । स्रष्टा त्वं चैव हर्ता त्वं त्वमेव जगतः पिता

brahmovāca kṛṣṇa kṛṣṇa mahābāho kṛpālo parameśvara sraṣṭā tvaṁ caiva hartā tvaṁ tvameva jagataḥ pitā

ब्रह्मा बोले — हे कृष्ण! हे कृष्ण! हे महाबाहो! हे कृपालु! हे परमेश्वर! आप ही सृष्टिकर्ता हैं और आप ही संहारकर्ता हैं, आप ही जगत् के पिता हैं।

श्लोक 54 (skanda.3.60.54)

नमस्ते विष्णवे सौम्य नमस्ते गरुडध्वज । नमस्ते कम लाकांत नमस्तेब्रह्मरूपिणे

namaste viṣṇave saumya namaste garuḍadhvaja namaste kama lākāṁta namastebrahmarūpiṇe

हे विष्णु! हे सौम्य! आपको नमस्कार है। हे गरुड़ध्वज! आपको नमस्कार है। हे कमलाकांत! आपको नमस्कार है। हे ब्रह्मरूपधारी! आपको नमस्कार है।

श्लोक 55 (skanda.3.60.55)

नमस्ते मत्स्यरूपाय विश्वरूपाय वै नमः । नमस्ते दैत्यनाशाय भक्तानामभयाय च

namaste matsyarūpāya viśvarūpāya vai namaḥ namaste daityanāśāya bhaktānāmabhayāya ca

हे मत्स्यरूपधारी! आपको नमस्कार है। हे विश्वरूप! आपको नमस्कार है। हे दैत्यनाशक! हे भक्तों के अभयदाता! आपको नमस्कार है।

श्लोक 56 (skanda.3.60.56)

कंसघ्नाय नमस्तेस्तु बलदैत्यजिते नमः । ब्रह्मणैवं स्तुतश्चासीत्प्रत्यक्षोऽसौ जनार्द्दनः

kaṁsaghnāya namastestu baladaityajite namaḥ brahmaṇaivaṁ stutaścāsītpratyakṣo'sau janārddanaḥ

हे कंसघातक! आपको नमस्कार हो। हे बलशाली दैत्य के विजेता! आपको नमस्कार है। इस प्रकार ब्रह्मा द्वारा स्तुति किये जाने पर वे जनार्दन साक्षात् प्रकट हो गये।

श्लोक 57 (skanda.3.60.57)

पीतांबरो घनश्यामो नागारिकृतवाहनः । चतुर्भुजो महा तेजाः शंखचक्रगदाधरः

pītāṁbaro ghanaśyāmo nāgārikṛtavāhanaḥ caturbhujo mahā tejāḥ śaṁkhacakragadādharaḥ

पीतांबरधारी, घनश्याम, गरुड़ को वाहन बनाने वाले; चतुर्भुज, महातेजस्वी, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले।

श्लोक 58 (skanda.3.60.58)

स्तूयमानः सुरैः सर्वैः स देवोऽमितविक्रमः । विद्याधरैस्तथा नागैः स्तूयमानश्च सर्वशः

stūyamānaḥ suraiḥ sarvaiḥ sa devo'mitavikramaḥ vidyādharaistathā nāgaiḥ stūyamānaśca sarvaśaḥ

सभी देवताओं द्वारा स्तुत होते हुए वे अमित पराक्रमी देव, तथा विद्याधरों और नागों द्वारा भी सब ओर से स्तुत होते हुए।

श्लोक 59 (skanda.3.60.59)

उत्तस्थौ स तदा देवो भास्करामितदीप्तिमान् । कोटिरत्नप्रभाभास्वन्मुकुटादिविभूषितः

uttasthau sa tadā devo bhāskarāmitadīptimān koṭiratnaprabhābhāsvanmukuṭādivibhūṣitaḥ

वह देव तब उठकर खड़े हुए, सूर्य के समान अमित तेजस्वी; करोड़ों रत्नों की प्रभा से देदीप्यमान मुकुट आदि से विभूषित।

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