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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 75

ज्ञातिभेद वर्णन (लोहासुर-कथा)

अध्याय 74अध्याय-सूचीअध्याय 76

श्लोक 1 (skanda.3.75.1)

व्यास उवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि ब्रह्मणा यत्कृतं पुरा तत्सर्वं कथयाम्यद्य शृणुष्वैकाग्रमानसः

vyāsa uvāca ataḥ paraṁ pravakṣyāmi brahmaṇā yat kṛtaṁ purā tat sarvaṁ kathayāmy adya śṛṇuṣv aikāgramānasaḥ

व्यास जी ने कहा — अब इसके पश्चात् मैं वह सब कहूँगा जो ब्रह्मा जी ने पूर्वकाल में किया था; वह सब आज मैं बताता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 2 (skanda.3.75.2)

देवानां दानवानां च वैराद्युद्धं बभूव ह तस्मिन्युद्धे महादुष्टे देवाः संक्लिष्टमानसाः

devānāṁ dānavānāṁ ca vairād yuddhaṁ babhūva ha tasmin yuddhe mahāduṣṭe devāḥ saṁkliṣṭamānasāḥ

देवताओं और दानवों के बीच शत्रुता से युद्ध छिड़ गया। उस अत्यंत भीषण युद्ध में देवताओं का मन अत्यंत क्लेशित हो उठा।

श्लोक 3 (skanda.3.75.3)

बभूवुस्तत्र सोद्वेगा ब्रह्माणं शरणं ययुः

babhūvus tatra sodvegā brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ

वे वहाँ अत्यंत व्याकुल हो उठे और ब्रह्मा जी की शरण में गये।

श्लोक 4 (skanda.3.75.4)

देवा ऊचुः । ब्रह्मन्केन प्रकारेण दैत्यानां वधमेव च करोम्यद्य उपायं हि कथ्यतां शीघ्रमेव मे

devā ūcuḥ brahman kena prakāreṇa daityānāṁ vadham eva ca karomy adya upāyaṁ hi kathyatāṁ śīghram eva me

देवताओं ने कहा — हे ब्रह्मन्! किस उपाय से हम दैत्यों का वध कर सकें, वह उपाय हमें शीघ्र ही बता दीजिए।

श्लोक 5 (skanda.3.75.5)

ब्रह्मोवाच । मया हि शंकरेणैव विष्णुना हि तथा पुरा यमस्य तपसा तुष्टैर्धर्मारण्यं विनिर्मितम्

brahmovāca mayā hi śaṁkareṇaiva viṣṇunā hi tathā purā yamasya tapasā tuṣṭair dharmāraṇyaṁ vinirmitam

ब्रह्मा जी ने कहा — पूर्वकाल में मैंने, शंकर ने और विष्णु ने — यम की तपस्या से संतुष्ट होकर — धर्मारण्य का निर्माण किया था।

श्लोक 6 (skanda.3.75.6)

तत्र यद्दीयते दानं यज्ञं वा तप उत्तमम् तत्सर्वं कोटिगुणितं भवेदिति न संशयः

tatra yad dīyate dānaṁ yajñaṁ vā tapa uttamam tat sarvaṁ koṭiguṇitaṁ bhaved iti na saṁśayaḥ

वहाँ जो भी दान दिया जाता है, यज्ञ या उत्तम तप किया जाता है, वह सब करोड़गुना फलदायी होता है — इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 7 (skanda.3.75.7)

पापं वा यदि वा पुण्यं सर्वं कोटि गुणं भवेत् तस्माद्दैत्यैर्न धर्षितं कदाचिदपि भोः सुराः

pāpaṁ vā yadi vā puṇyaṁ sarvaṁ koṭi guṇaṁ bhavet tasmād daityair na dharṣitaṁ kadācid api bhoḥ surāḥ

चाहे पाप हो या पुण्य, वहाँ सब कुछ करोड़गुना हो जाता है; इसीलिए, हे सुरो, वह स्थान दैत्यों द्वारा कभी भी आक्रांत नहीं हो सका है।

श्लोक 8 (skanda.3.75.8)

श्रुत्वा तु ब्रह्मणो वाक्यं देवाः सर्वे सविस्मयाः ब्रह्माणं त्वग्रतः कृत्वा धर्मारण्यमुपाययुः

śrutvā tu brahmaṇo vākyaṁ devāḥ sarve savismayāḥ brahmāṇaṁ tv agrataḥ kṛtvā dharmāraṇyam upāyayuḥ

ब्रह्मा जी का यह वचन सुनकर सभी देवता विस्मित हो उठे, और ब्रह्मा जी को आगे करके धर्मारण्य की ओर चल पड़े।

श्लोक 9 (skanda.3.75.9)

सत्रं तत्र समारभ्य सहस्राब्दमनुत्तमम् वृत्वाऽऽचार्यं चांगिरसं मार्कंण्डेयं तथैव च

satraṁ tatra samārabhya sahasrābdam anuttamam vṛtvācāryaṁ cāṅgirasaṁ mārkaṇḍeyaṁ tathaiva ca

वहाँ उन्होंने एक हज़ार वर्षों तक चलने वाला सर्वोत्तम सत्र-यज्ञ आरंभ किया, तथा आंगिरस को और उसी प्रकार मार्कण्डेय को आचार्य वरण किया।

श्लोक 10 (skanda.3.75.10)

अत्रिं च कश्यपं चैव होता कृत्वा महामतिः जमदग्निं गौतमं च अध्वर्युत्वं न्यवेदयन्

atriṁ ca kaśyapaṁ caiva hotā kṛtvā mahāmatiḥ jamadagniṁ gautamaṁ ca adhvaryutvaṁ nyavedayan

अत्रि और कश्यप को होता बनाकर, महामति ब्रह्मा ने जमदग्नि और गौतम को अध्वर्यु पद पर नियुक्त किया।

श्लोक 11 (skanda.3.75.11)

भरद्वाजं वसिष्ठं तु प्रत्यध्वर्युत्वमादिशन् नारदं चैव वाल्मीकिं नोदना याकरोत्तदा

bharadvājaṁ vasiṣṭhaṁ tu pratyadhvaryutvam ādiśan nāradaṁ caiva vālmīkiṁ nodanāyā akarot tadā

भरद्वाज और वसिष्ठ को प्रत्यध्वर्यु के पद पर नियुक्त किया, तथा नारद और वाल्मीकि को यज्ञ की प्रेरणा (उद्गाता) का कार्य सौंपा।

श्लोक 12 (skanda.3.75.12)

ब्रह्मासने च ब्रह्माणं स्थापयामासुरादरात् क्रोशचतुष्कमात्रां च वेदिं कृत्वा सुरैस्ततः

brahmāsane ca brahmāṇaṁ sthāpayāmāsur ādarāt krośacatuṣkamātrāṁ ca vediṁ kṛtvā surais tataḥ

आदरपूर्वक ब्रह्मा जी को ब्रह्मासन पर बिठाया गया, और तत्पश्चात् देवताओं ने चार कोस विस्तार वाली यज्ञ-वेदी बनायी।

श्लोक 13 (skanda.3.75.13)

द्विजाः सर्वे समाहूता यज्ञस्यार्थे हि जापकाः ऋग्यजुःसामाथर्वान्वै वेदानुद्गिरयंति ये

dvijāḥ sarve samāhūtā yajñasyārthe hi jāpakāḥ ṛgyajuḥsāmātharvān vai vedān udgirayanti ye

यज्ञ के लिए ऋग्, यजुः, साम और अथर्व — इन चारों वेदों का उच्चारण करने वाले सभी जपकर्ता द्विज बुलाये गये।

श्लोक 14 (skanda.3.75.14)

गणनाथं शंभुसुतं कार्त्तिकेयं तथैव च इन्द्रं वज्रधरं चैव जयंतं चन्द्रसूनुकम्

gaṇanāthaṁ śaṁbhusutaṁ kārttikeyaṁ tathaiva ca indraṁ vajradharaṁ caiva jayantaṁ candrasūnukam

शंभु-पुत्र गणनाथ (गणेश) को, कार्तिकेय को, वज्रधारी इन्द्र को, तथा चन्द्र-पुत्र जयंत को —

श्लोक 15 (skanda.3.75.15)

चत्वारो द्वारपालाश्च देवाः शूरा विनिर्मिताः ततो राक्षोघ्नमंत्रेण हूयते हव्यवाहनः

catvāro dvārapālāś ca devāḥ śūrā vinirmitāḥ tato rākṣoghnamantreṇa hūyate havyavāhanaḥ

इन चार वीर देवताओं को द्वारपाल के रूप में नियुक्त किया गया। तत्पश्चात् राक्षस-नाशक मंत्र से अग्नि में आहुति दी गयी।

श्लोक 16 (skanda.3.75.16)

तिलांश्च यवमिश्रांश्च मध्वाज्येन च मिश्रितान् जुहुवुस्ते तदा देवा वेदमंत्रैर्नरेश्वर

tilāṁś ca yavamiśrāṁś ca madhvājyena ca miśritān juhuvus te tadā devā vedamantrair nareśvara

हे नरेश्वर! उन देवताओं ने तब वेद-मंत्रों के साथ तिल और जौ को मधु और घी से मिलाकर हवन किया।

श्लोक 17 (skanda.3.75.17)

आघारावाज्यभागौ च हुत्वा चैव ततः परम् द्राक्षेक्षुपूगनारिंग जंबीरं बीजपूरकम्

āghārāvājyabhāgau ca hutvā caiva tataḥ param drākṣekṣupūganāriṁga jaṁbīraṁ bījapūrakam

आघार और आज्यभाग की आहुतियाँ देने के पश्चात्, फिर अंगूर, ईख, सुपारी, नारंगी, नीबू और बिजौरा —

श्लोक 18 (skanda.3.75.18)

उत्तरतो नालिकेरं दाडिमं च यथाक्रमम् मध्वाज्यं पयसा युक्तं कृशरशर्करायुतम्

uttarato nālikeraṁ dāḍimaṁ ca yathākramam madhvājyaṁ payasā yuktaṁ kṛśaraśarkarāyutam

तत्पश्चात् क्रमशः नारियल और अनार, दूध-मिश्रित मधु-घृत, तथा शक्कर-मिश्रित खिचड़ी की आहुतियाँ दीं।

श्लोक 19 (skanda.3.75.19)

तंडुलैः शतपत्रैश्च यज्ञे वाचं नियम्य च विचिंत्य च महाभागाः कृत्वा यज्ञं सदक्षिणम्

taṇḍulaiḥ śatapatraiś ca yajñe vācaṁ niyamya ca vicintya ca mahābhāgāḥ kṛtvā yajñaṁ sadakṣiṇam

चावल और कमल-पत्रों से भी हवन किया गया; उस महान् यज्ञ में वाणी को संयत रखते हुए, विचारपूर्वक उन महाभाग देवताओं ने दक्षिणा सहित यज्ञ सम्पन्न किया।

श्लोक 20 (skanda.3.75.20)

उत्तमं च शुभं स्तोमं कृत्वा हर्षमुपाययुः अवारितान्नमददन्दीनांधकृपणेष्वपि

uttamaṁ ca śubhaṁ stomaṁ kṛtvā harṣam upāyayuḥ avāritānnam adadan dīnāndhakṛpaṇeṣv api

उत्तम एवं शुभ स्तोत्र-पाठ करके वे हर्षित हुए, और दीन, अंधे तथा दरिद्र जनों को भी बिना रोक-टोक के अन्न दिया।

श्लोक 21 (skanda.3.75.21)

ब्राह्मणेभ्यो विशेषेण दत्तमन्नं यथेप्सितम् पायसं शर्करायुक्तं साज्यशाकसमन्वितम्

brāhmaṇebhyo viśeṣeṇa dattam annaṁ yathepsitam pāyasaṁ śarkarāyuktaṁ sājyaśākasamanvitam

ब्राह्मणों को विशेष रूप से उनकी इच्छानुसार भोजन दिया गया — शक्कर-मिश्रित खीर, घृत-युक्त शाक आदि सहित।

श्लोक 22 (skanda.3.75.22)

मंडका वटकाः पूपास्तथा वै वेष्टिकाः शुभाः सहस्रमोदकाश्चापि फेणिका घुर्घुरादयः

maṇḍakā vaṭakāḥ pūpās tathā vai veṣṭikāḥ śubhāḥ sahasramodakāś cāpi pheṇikā ghurghurādayaḥ

मण्डक, वटक, पूए, तथा शुभ वेष्टिका (पूरी जैसे व्यंजन), हज़ारों मोदक, फेनी और घुर्घुरा आदि मिष्ठान्न भी परोसे गये।

श्लोक 23 (skanda.3.75.23)

ओदनश्च तथा दाली आढकीसंभवा शुभा तथा वै मुद्गदाली च पर्पटा वटिका तथा

odanaś ca tathā dālī āḍhakīsaṁbhavā śubhā tathā vai mudgadālī ca parpaṭā vaṭikā tathā

भात, अरहर की शुभ दाल, मूँग की दाल, तथा पापड़ और वड़ियाँ भी परोसी गईं।

श्लोक 24 (skanda.3.75.24)

प्रलेह्यानि विचित्राणि युक्तास्त्र्यूषणसंचयैः कुल्माषा वेल्लकाश्चैव कोमला वालकाः शुभाः

pralehyāni vicitrāṇi yuktās tryūṣaṇasaṁcayaiḥ kulmāṣā vellakāś caiva komalā vālakāḥ śubhāḥ

त्रिकटु (सोंठ-मिर्च-पीपल) से युक्त विविध चटनियाँ, उबले हुए चने, वेल्लक तथा कोमल शुभ वालक-व्यंजन भी परोसे गये।

श्लोक 25 (skanda.3.75.25)

कर्कटिकाश्चार्द्रयुता मरिचेन समन्विताः एवंविधानि चान्नानि शाकानि विविधानि च

karkaṭikāś cārdrayutā maricena samanvitāḥ evaṁvidhāni cānnāni śākāni vividhāni ca

अदरक और काली मिर्च से युक्त ककड़ियाँ भी परोसी गयीं — इस प्रकार के अनेकानेक अन्न और विविध शाक (परोसे गये)।

श्लोक 26 (skanda.3.75.26)

भोजयित्वा द्विजान्सर्वान्धर्मारण्य निवासिनः अष्टादशसहस्राणि सपुत्रांश्च तदा नृप

bhojayitvā dvijān sarvān dharmāraṇyanivāsinaḥ aṣṭādaśasahasrāṇi saputrāṁś ca tadā nṛpa

हे राजन्! धर्मारण्य में निवास करने वाले अठारह हज़ार द्विजों को उनके पुत्रों सहित भोजन कराया गया।

श्लोक 27 (skanda.3.75.27)

प्रतिदिनं तदा देवा भोजयंति स्म वाडवान् एवं वर्षसहस्रं वै कृत्वा यज्ञं तदामराः

pratidinaṁ tadā devā bhojayanti sma vāḍavān evaṁ varṣasahasraṁ vai kṛtvā yajñaṁ tadāmarāḥ

देवता प्रतिदिन उन ब्राह्मणों को भोजन कराते रहे। इस प्रकार एक हज़ार वर्षों तक यज्ञ करते हुए, तब अमर देवगण —

श्लोक 28 (skanda.3.75.28)

कृत्वा दैत्यवधं राजन्निर्भयत्वमवाप्नुयुः स्वर्गं जग्मुस्ते सहसा देवाः सर्वे मरुद्गणाः

kṛtvā daityavadhaṁ rājan nirbhayatvam avāpnuyuḥ svargaṁ jagmus te sahasā devāḥ sarve marudgaṇāḥ

हे राजन्! दैत्यों का वध करके निर्भयता प्राप्त कर ली, और उसके पश्चात् सभी देवगण तथा मरुद्गण तुरंत स्वर्ग को चले गये।

श्लोक 29 (skanda.3.75.29)

तथैवाप्सरसः सर्वा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः कैलासशिखरं रम्यं वैकुंठं विष्णुवल्लभम्

tathaivāpsarasaḥ sarvā brahmaviṣṇumaheśvarāḥ kailāsaśikharaṁ ramyaṁ vaikuṇṭhaṁ viṣṇuvallabham

इसी प्रकार सभी अप्सराएँ भी चली गयीं, और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर क्रमशः रम्य कैलास-शिखर और विष्णु-प्रिय वैकुण्ठ को गये —

श्लोक 30 (skanda.3.75.30)

ब्रह्मलोकं महापुण्यं प्राप्य सर्वे दिवौकसः परं हर्षमुपाजग्मुः प्राप्य नंदनमुत्तम्

brahmalokaṁ mahāpuṇyaṁ prāpya sarve divaukasaḥ paraṁ harṣam upājagmuḥ prāpya nandanam uttamam

और अत्यंत पवित्र ब्रह्मलोक को — इस प्रकार सभी देवगण अपने-अपने लोकों को प्राप्त होकर तथा उत्तम नंदनवन को पाकर परम हर्ष को प्राप्त हुए।

श्लोक 31 (skanda.3.75.31)

स्वेस्वे स्थाने स्थिरीभूत्वा तस्थुः सर्वे हि निर्भयाः

sveve sthāne sthirībhūtvā tasthuḥ sarve hi nirbhayāḥ

सब देवगण अपने-अपने स्थान पर स्थिर होकर निर्भय होकर रहने लगे।

श्लोक 32 (skanda.3.75.32)

ततः कालेन महता कृताख्ययुगपर्यये लोहासुरो मदोन्मत्तो ब्रह्मवेषधरः सदा

tataḥ kālena mahatā kṛtākhyayugaparyaye lohāsuro madonmatto brahmaveṣadharaḥ sadā

इसके बहुत काल पश्चात्, कृतयुग के परिवर्तन के समय, मदोन्मत्त लोहासुर नामक दैत्य — जो सदा ब्राह्मण-वेष धारण किये रहता था —

श्लोक 33 (skanda.3.75.33)

आगत्य सर्वान्विप्रांश्च धर्षयेद्धर्मवित्तमान् शूद्रांश्च वणिजश्चैव दंडघातेन ताडयेत्

āgatya sarvān viprāṁś ca dharṣayed dharmavittamān śūdrāṁś ca vaṇijaś caiva daṇḍaghātena tāḍayet

वहाँ आकर धर्मज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को उत्पीड़ित करने लगा, और शूद्रों तथा वणिकों को भी डंडे से मारता रहता।

श्लोक 34 (skanda.3.75.34)

विध्वंसयेच्च यज्ञादीन्होमद्रव्याणि भक्षयेत् वेदिका दीर्घिका दृष्ट्वा कश्मलेन प्रदूषयेत्

vidhvaṁsayec ca yajñādīn homadravyāṇi bhakṣayet vedikā dīrghikā dṛṣṭvā kaśmalena pradūṣayet

वह यज्ञों को विध्वंस करता, हवन-सामग्री को भक्षण कर जाता, और यज्ञ-वेदियों तथा जलाशयों को देखकर उन्हें मल-मूत्र से दूषित कर देता।

श्लोक 35 (skanda.3.75.35)

मूत्रोत्सर्गपुरीषेण दूषयेत्पुण्यभूमिकाः गहनेन तथा राजन्स्त्रियो दूषयते हि सः

mūtrotsargapurīṣeṇa dūṣayet puṇyabhūmikāḥ gahanena tathā rājan striyo dūṣayate hi saḥ

मूत्र-मल त्यागकर वह पवित्र भूमियों को दूषित कर देता; और हे राजन्, वह घोर बलपूर्वक स्त्रियों को भी भ्रष्ट कर देता था।

श्लोक 36 (skanda.3.75.36)

ततस्ते वाडवाः सर्वे लोहासुरभयातुराः प्रनष्टाः सपरीवारा गतास्ते वै दिशो दश

tatas te vāḍavāḥ sarve lohāsurabhayāturāḥ pranaṣṭāḥ saparīvārā gatās te vai diśo daśa

तब लोहासुर के भय से पीड़ित होकर वे सभी ब्राह्मण अपने परिवारों सहित भाग खड़े हुए, और दसों दिशाओं में चले गये।

श्लोक 37 (skanda.3.75.37)

वणिजस्ते भयोद्विग्ना विप्राननुययुर्नृप महाभयेन संभीता दूरं गत्वा विमृश्य च

vaṇijas te bhayodvignā viprān anuyayur nṛpa mahābhayena saṁbhītā dūraṁ gatvā vimṛśya ca

हे राजन्! भय से व्याकुल हुए वे वणिक भी ब्राह्मणों के पीछे-पीछे चल पड़े; महाभय से भयभीत होकर, दूर तक जाकर उन्होंने विचार किया —

श्लोक 38 (skanda.3.75.38)

सह शूद्रैद्विजैः सर्व एकीभूत्वा गतास्तदा मुक्तारण्यं पुण्यतमं निर्जनं हि ययुश्च ते

saha śūdrair dvijaiḥ sarva ekībhūtvā gatās tadā muktāraṇyaṁ puṇyatamaṁ nirjanaṁ hi yayuś ca te

और शूद्रों के साथ मिलकर, सब द्विज एक होकर चल पड़े, तथा वे अत्यंत पवित्र किंतु निर्जन मुक्तारण्य वन में जा पहुँचे।

श्लोक 39 (skanda.3.75.39)

निवासं कारयामासुर्नातिदूरे नरेश्वर वजिङ्नाम्ना हि तद्ग्रामं वासयामासुरेव ते

nivāsaṁ kārayāmāsur nātidūre nareśvara vajiṅnāmnā hi tadgrāmaṁ vāsayāmāsur eva te

हे नरेश्वर! उन्होंने वहाँ से अधिक दूर नहीं, अपना निवास स्थापित किया, और उस गाँव को 'वजिङ्' नाम से बसाया।

श्लोक 40 (skanda.3.75.40)

लोहासुरभयाद्राजन्विप्र नाम्ना विनिर्मितम् शंभुना वणिजा यस्मात्तस्मात्तन्नामधारणम्

lohāsurabhayād rājan vipra nāmnā vinirmitam śaṁbhunā vaṇijā yasmāt tasmāt tannāmadhāraṇam

हे राजन्! लोहासुर के भय से जो निर्मित हुआ, वह विप्र-नामधारी हुआ; चूँकि शंभु (शिवभक्त) वणिक ने उसे बसाया, इसलिए उसका वह नाम पड़ा।

श्लोक 41 (skanda.3.75.41)

शंभुग्राममिति ख्यातं लोके विख्यातिमागतम् अथ केचिद्भयान्नष्टा वणिजः प्रथमं तदा

śaṁbhugrāmam iti khyātaṁ loke vikhyātim āgatam atha kecid bhayān naṣṭā vaṇijaḥ prathamaṁ tadā

वह लोक में 'शंभुग्राम' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तत्पश्चात् कुछ वणिक जो पहले ही भय से भाग निकले थे —

श्लोक 42 (skanda.3.75.42)

ते नातिदूरे गत्वा वै मंडलं चक्रुरुत्तमम् विप्रागमनकांक्षास्ते तत्र वासमकल्पयन्

te nātidūre gatvā vai maṇḍalaṁ cakrur uttamam viprāgamanakāṅkṣās te tatra vāsam akalpayan

वे अधिक दूर न जाकर, वहीं एक उत्तम मंडल बना बैठे, तथा ब्राह्मणों के आगमन की आशा में वहीं निवास स्थापित कर लिया।

श्लोक 43 (skanda.3.75.43)

मंडलेति च नाम्ना वै ग्रामं कृत्वा न्यवीवसन् विप्रसार्थपरिभ्रष्टाः केचित्तु वणिजस्तदा

maṇḍaleti ca nāmnā vai grāmaṁ kṛtvā nyavīvasan viprasārthaparibhraṣṭāḥ kecit tu vaṇijas tadā

उस गाँव का नाम 'मंडल' रखकर वे वहाँ बस गये। इधर कुछ अन्य वणिक, जो ब्राह्मणों के साथ के समूह से बिछड़ गये थे —

श्लोक 44 (skanda.3.75.44)

अन्यमार्गे गता ये वै लोहासुरभयार्दिताः धर्मारण्यान्नाति दूरे गत्वा चिंतामुपाययुः

anyamārge gatā ye vai lohāsurabhayārditāḥ dharmāraṇyān nāti dūre gatvā cintām upāyayuḥ

लोहासुर के भय से पीड़ित होकर जो अन्य मार्ग से गये, वे धर्मारण्य से अधिक दूर न जाकर चिंतामग्न हो उठे —

श्लोक 45 (skanda.3.75.45)

कस्मिन्मार्गे वयं प्राप्ताः कस्मिन्प्राप्ता द्विजातयः इति चिंतां परं प्राप्ता वासं तत्र त्वकारयन्

kasmin mārge vayaṁ prāptāḥ kasmin prāptā dvijātayaḥ iti cintāṁ paraṁ prāptā vāsaṁ tatra tv akārayan

हम किस मार्ग पर आ पहुँचे हैं, और द्विजगण किस मार्ग से गये होंगे — इस प्रकार गहन चिंता में पड़कर उन्होंने वहीं निवास बना लिया।

श्लोक 46 (skanda.3.75.46)

अन्यमार्गे गता यस्मात्तस्मात्तन्नामसंभवम् ग्रामं निवासयामासुरडालंजमिति क्षितौ

anyamārge gatā yasmāt tasmāt tannāmasaṁbhavam grāmaṁ nivāsayāmāsur aḍālaṁjam iti kṣitau

चूँकि वे अन्य मार्ग से गये थे, इसीलिए इसी कारण से पृथ्वी पर उन्होंने अपने गाँव का नाम 'अडालंज' रखकर वहीं निवास स्थापित किया।

श्लोक 47 (skanda.3.75.47)

यस्मिन्ग्रामे निवासी यो यत्संज्ञश्च वणिग्भवेत् तस्य ग्रामस्य तन्नाम ह्यभवत्पृथिवीपते

yasmin grāme nivāsī yo yatsaṁjñaś ca vaṇigbhavet tasya grāmasya tannāma hy abhavat pṛthivīpate

हे पृथ्वीपते! जिस-जिस गाँव में जो वणिक निवास करता था, उसी के नाम पर उस गाँव का नाम पड़ जाता था।

श्लोक 48 (skanda.3.75.48)

वणिजश्च तथा विप्रा मोहं प्राप्ता भयार्दिताः तस्मान्मोहेतिसंज्ञास्ते राजन्सर्वे निरब्रुवन्

vaṇijaś ca tathā viprā mohaṁ prāptā bhayārditāḥ tasmān moheti saṁjñās te rājan sarve nirabruvan

हे राजन्! भय से पीड़ित होकर वणिक और विप्र दोनों ही मोह को प्राप्त हो गये थे; इसीलिए उन सबने अपने आप को 'मोहे' (मोहेरक) नाम से पुकारा।

श्लोक 49 (skanda.3.75.49)

एवं प्रनषणं नष्टास्ते गताश्च दिशो दिश धर्मारण्ये न तिष्ठंति वाडवा वणिजोऽपि वा

evaṁ pranaṣaṇaṁ naṣṭās te gatāś ca diśo diśa dharmāraṇye na tiṣṭhanti vāḍavā vaṇijo 'pi vā

इस प्रकार भाग-भागकर वे भिन्न-भिन्न दिशाओं में चले गये; अब धर्मारण्य में न तो ब्राह्मण रहे, न ही वणिक।

श्लोक 50 (skanda.3.75.50)

उद्वसं हि तदा जातं धर्मारण्यं च दुर्लभम् भूषणं सर्वतीर्थानां कृतं लोहासुरेण तत्

udvasaṁ hi tadā jātaṁ dharmāraṇyaṁ ca durlabham bhūṣaṇaṁ sarvatīrthānāṁ kṛtaṁ lohāsureṇa tat

धर्मारण्य — जो समस्त तीर्थों का आभूषण था — उजाड़ और सुनसान हो गया; लोहासुर ने उसे इस दुर्दशा तक पहुँचा दिया।

श्लोक 51 (skanda.3.75.51)

नष्टद्विजं नष्टतीर्थं स्थानं कृत्वा हि दानवः परां मुदमवाप्यैव जगाम स्वालयं ततः इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां तृतीये ब्रह्मखण्डे पूर्वभागे धर्मारण्यमाहात्म्ये ज्ञातिभेदवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः

naṣṭadvijaṁ naṣṭatīrthaṁ sthānaṁ kṛtvā hi dānavaḥ parāṁ mudam avāpyaiva jagāma svālayaṁ tataḥ iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṁ saṁhitāyāṁ tṛtīye brahmakhaṇḍe pūrvabhāge dharmāraṇyamāhātmye jñātibhedavarṇanaṁ nāma trayoviṁśo 'dhyāyaḥ

उस स्थान को द्विज-रहित और तीर्थ-रहित बनाकर वह दानव परम आनंद प्राप्तकर अपने घर लौट गया। इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराण की एक लाख इक्यासी हज़ार श्लोकों वाली संहिता के तृतीय ब्रह्मखण्ड के पूर्वभाग में, धर्मारण्य-माहात्म्य के अंतर्गत, ज्ञातिभेद-वर्णन नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

अध्याय 74अध्याय-सूचीअध्याय 76