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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 79

बलाहकोपाख्यान वर्णन

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80

श्लोक 1 (skanda.3.79.1)

सूत उवाच । तत्र तस्य समीपस्थं मार्कंडेनोपलक्षितम् तीर्थं गोवत्ससंज्ञं तु सर्वत्र भुवि संश्रुतम्

sūta uvāca tatra tasya samīpasthaṁ mārkaṇḍenopalakṣitam tīrthaṁ govatsasaṁjñaṁ tu sarvatra bhuvi saṁśrutam

सूत जी ने कहा — उसके समीप ही मार्कण्डेय द्वारा चिह्नित 'गोवत्स' नामक तीर्थ है, जो सारी पृथ्वी पर प्रसिद्ध है।

श्लोक 2 (skanda.3.79.2)

तत्रावतीर्य गोवत्सस्वरूपेणांबिकापतिः स्वयंभूलिंगरूपेण संस्थितो जगतां पतिः

tatrāvatīrya govatsasvarūpeṇāṁbikāpatiḥ svayaṁbhūliṅgarūpeṇa saṁsthito jagatāṁ patiḥ

वहाँ अंबिका के पति (शिव), जगत् के स्वामी, गोवत्स (बछड़े) के रूप में अवतीर्ण होकर स्वयंभू लिंग-रूप में स्थित हुए।

श्लोक 3 (skanda.3.79.3)

आसीद्बलाहकोनाम रुद्रभक्तो महाबलः आखेटकसमायुक्तो नृपः परपुरंजयः

āsīd balāhako nāma rudrabhakto mahābalaḥ ākheṭakasamāyukto nṛpaḥ parapuraṁjayaḥ

वहाँ बलाहक नामक एक महाबली राजा था, जो रुद्र का परम भक्त था, शिकार का शौकीन था, और शत्रुओं के नगरों को जीतने वाला था।

श्लोक 4 (skanda.3.79.4)

मृगयूथे स्थितं दृष्ट्वा गोवत्सं तत्पदातिना उक्तो राजा मया दृष्टं कौतुकं नृपसत्तम

mṛgayūthe sthitaṁ dṛṣṭvā govatsaṁ tatpadātinā ukto rājā mayā dṛṣṭaṁ kautukaṁ nṛpasattama

एक दिन उसके एक पैदल सैनिक ने मृग-समूह में खड़े एक बछड़े को देखा, और राजा से कहा — 'हे राजश्रेष्ठ! मैंने एक अद्भुत वस्तु देखी है —'

श्लोक 5 (skanda.3.79.5)

गोवत्सो मृगयूथस्य दृष्टो मध्यस्थितो मया तेषामेवानुरक्तोऽसौ जनन्या रहितस्तथा

govatso mṛgayūthasya dṛṣṭo madhyasthito mayā teṣām evānurakto 'sau jananyā rahitas tathā

'— मैंने मृगों के झुंड के बीचोंबीच खड़ा एक बछड़ा देखा है, जो उन्हीं के साथ रहने में रत है, यद्यपि उसकी अपनी माता वहाँ नहीं है।'

श्लोक 6 (skanda.3.79.6)

द्रष्टुं तु कौतुकं राजा तं पदातिं पुरः स्थितम् उवाच दर्शयस्वेति गोवत्सं च समाविशत्

draṣṭuṁ tu kautukaṁ rājā taṁ padātiṁ puraḥ sthitam uvāca darśayasveti govatsaṁ ca samāviśat

उस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए राजा ने अपने सामने खड़े उस पैदल सैनिक से कहा — 'मुझे दिखाओ' — और उस बछड़े के पास जा पहुँचा।

श्लोक 7 (skanda.3.79.7)

गत्वाटवीं तदा राज्ञो दर्शितः स पदातिना पदातिभिर्मृगानीकं दुद्राव त्रासितं यदा

gatvāṭavīṁ tadā rājño darśitaḥ sa padātinā padātibhir mṛgānīkaṁ dudrāva trāsitaṁ yadā

वन में जाकर उस पैदल सैनिक ने राजा को वह बछड़ा दिखाया। जब पैदल सैनिकों से भयभीत होकर मृगों का झुंड भाग खड़ा हुआ —

श्लोक 8 (skanda.3.79.8)

पीलुगुल्मं प्रति गतं गोवत्सः प्रस्थितस्तदा राजा तद्धरणाकांक्षो प्राविशद्गुल्ममादरात्

pīlugulmaṁ prati gataṁ govatsaḥ prasthitas tadā rājā taddharaṇākāṅkṣo prāviśad gulmam ādarāt

— तब वह बछड़ा भी एक पीलु-झाड़ी की ओर भाग गया। उसे पकड़ने की इच्छा से राजा भी सावधानी से उस झाड़ी में घुसा।

श्लोक 9 (skanda.3.79.9)

तत्र स्थितं स गोवत्समपश्यन्नृपतिः स्वयम् यावद्गृह्णाति तं तावल्लिंगं जातं समुज्वलम्

tatra sthitaṁ sa govatsam apaśyan nṛpatiḥ svayam yāvad gṛhṇāti taṁ tāval liṅgaṁ jātaṁ samujvalam

राजा ने स्वयं वहाँ खड़े उस बछड़े को देखा; परंतु जैसे ही उसने उसे पकड़ना चाहा, वह तत्काल एक तेजोमय शिवलिंग में परिणत हो गया।

श्लोक 10 (skanda.3.79.10)

तं दृष्ट्वा विस्मितो राजा किमेतदित्यचिंतयत् यावच्चिंतयते ह्येवं देहं त्यक्त्वा दिवं गतः

taṁ dṛṣṭvā vismito rājā kim etad ity acintayat yāvac cintayate hy evaṁ dehaṁ tyaktvā divaṁ gataḥ

यह देखकर राजा विस्मित होकर सोचने लगा — 'यह क्या है?' — और वह इसी विचार में था कि तभी अपनी देह त्यागकर वह स्वर्ग को चला गया।

श्लोक 11 (skanda.3.79.11)

अत्रांतरे गगनतले समंततः श्रूयते सुरजयकारगर्जितम् पपात पुष्पवृष्टिरंबराद्राजा गतः शिवभुवनं च तत्क्षणात्

atrāntare gaganatale samantataḥ śrūyate surajayakāragarjitam papāta puṣpavṛṣṭir aṁbarād rājā gataḥ śivabhuvanaṁ ca tatkṣaṇāt

इसी बीच आकाश में चारों ओर देवताओं की जय-जयकार गूँज उठी, आकाश से पुष्पवृष्टि हुई, और राजा उसी क्षण शिवलोक को प्राप्त हो गया।

श्लोक 12 (skanda.3.79.12)

तावत्पश्यति तन्नाभ्यं गोवत्सं बालकं स्थितम् नूनमेष महादेवो वत्सरूपी महेश्वरः

tāvat paśyati tannābhyaṁ govatsaṁ bālakaṁ sthitam nūnam eṣa mahādevo vatsarūpī maheśvaraḥ

इसी बीच (सैनिकों ने) उस लिंग के मध्य में एक बालक-रूप बछड़ा खड़ा देखा — 'निश्चय ही यह महादेव ही बछड़े के रूप में हैं, यह महेश्वर हैं।'

श्लोक 13 (skanda.3.79.13)

तमानेतुं समुद्युक्तो राजा तमुज्जहार च तदा तद्देव लिंगं तु नोत्तिष्ठति कथंचन तदा देवाः सहानेन प्रार्थयामासुरीश्वरम्

tam ānetuṁ samudyukto rājā tam ujjahāra ca tadā tad deva liṅgaṁ tu nottiṣṭhati kathaṁcana tadā devāḥ sahānena prārthayāmāsur īśvaram

उसे लाने के लिए उद्यत होकर राजा ने उसे उठाना चाहा, किंतु वह दिव्य लिंग किसी भी प्रकार वहाँ से उठ न सका। तब देवताओं ने उसके साथ मिलकर ईश्वर से प्रार्थना की —

श्लोक 14 (skanda.3.79.14)

देवा ऊचुः । भगवन्सर्वदेवेश स्थातव्यं भवता विभो शुक्लेन लिंगरूपेण सर्वलोकहितैषिणा

devā ūcuḥ bhagavan sarvadeveśa sthātavyaṁ bhavatā vibho śuklena liṅgarūpeṇa sarvalokahitaiṣiṇā

देवताओं ने कहा — 'हे भगवन्! हे सर्वदेवेश! हे विभो! आप समस्त लोकों के हित की कामना करते हुए इस श्वेत लिंग-रूप में यहीं स्थिर रहें।'

श्लोक 15 (skanda.3.79.15)

श्रीमहादेव उवाच । स्थास्याम्यहं सदैवात्र लिंगरूपेण देवताः यस्माद्भाद्रपदे मासि कृष्णपक्षे कुहू दिने

śrīmahādeva uvāca sthāsyāmy ahaṁ sadaivātra liṅgarūpeṇa devatāḥ yasmād bhādrapade māsi kṛṣṇapakṣe kuhū dine

श्री महादेव ने कहा — 'हे देवगण! मैं सदा ही यहाँ लिंग-रूप में स्थित रहूँगा। जो भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन —'

श्लोक 16 (skanda.3.79.16)

तथा तद्दिवसे तत्र स्नानं कृत्वा विधानतः लिंगं ये पूजयिष्यंति न तेषां विद्यते भयम्

tathā taddivase tatra snānaṁ kṛtvā vidhānataḥ liṅgaṁ ye pūjayiṣyanti na teṣāṁ vidyate bhayam

'— उस दिन विधिपूर्वक स्नान कर इस लिंग की पूजा करेंगे, उन्हें कोई भय नहीं रहेगा।'

श्लोक 17 (skanda.3.79.17)

ऋते च पिंडदानेन पूर्वजाः शाश्वतीः समाः रौरवे नरके घोरे कुंभीपाके च ये गताः

ṛte ca piṇḍadānena pūrvajāḥ śāśvatīḥ samāḥ raurave narake ghore kuṁbhīpāke ca ye gatāḥ

जो पूर्वज घोर रौरव नरक और कुम्भीपाक नरक में पड़े हों, वे भी बिना पिण्डदान के ही चिरकाल तक (मुक्त रहेंगे) —

श्लोक 18 (skanda.3.79.18)

अनेकनरकस्थाश्च तिर्यग्योनिगताश्च ये सकृत्पिंडप्रदानेन स्यात्ते षामक्षया गतिः

anekanarakasthāś ca tiryagyonigatāś ca ye sakṛt piṇḍapradānena syāt teṣām akṣayā gatiḥ

— तथा जो अनेक नरकों में पड़े हैं अथवा पशु-पक्षी योनि को प्राप्त हुए हैं, उन सबको भी एक ही बार पिण्ड-प्रदान से अक्षय गति प्राप्त हो जाएगी।

श्लोक 19 (skanda.3.79.19)

ततो बलाहको राजा सर्वदेवसमन्वितः स्थापयामास तल्लिंगं सर्वदेवसमीपतः

tato balāhako rājā sarvadevasamanvitaḥ sthāpayāmāsa tal liṅgaṁ sarvadevasamīpataḥ

तब राजा बलाहक ने समस्त देवताओं सहित उस लिंग की स्थापना समस्त देवताओं के निकट की।

श्लोक 20 (skanda.3.79.20)

चकार बहुदानानि लोकानां हितकाम्यया यावदर्चयते ह्येवं रुद्रोऽपि स्वयमागतः

cakāra bahudānāni lokānāṁ hitakāmyayā yāvad arcayate hy evaṁ rudro 'pi svayam āgataḥ

लोकों के हित की कामना से उसने अनेक दान किये; और जब वह इस प्रकार पूजा कर रहा था, तभी रुद्र स्वयं वहाँ प्रकट हो गये।

श्लोक 21 (skanda.3.79.21)

रुद्र उवाच । अस्यां रात्रौ तु मनुजाः श्रद्धाभक्तिसमन्विताः येर्चयिष्यंति देवेशं तेषां पुण्यमनंतकम्

rudra uvāca asyāṁ rātrau tu manujāḥ śraddhābhaktisamanvitāḥ ye 'rcayiṣyanti deveśaṁ teṣāṁ puṇyam anantakam

रुद्र ने कहा — इस रात्रि में जो मनुष्य श्रद्धा-भक्तिपूर्वक देवेश की पूजा करेंगे, उनका पुण्य अनंत होगा।

श्लोक 22 (skanda.3.79.22)

जागरं ये करिष्यंति गीतशास्त्रपुरःसरम् उद्धरिष्यंति ते मर्त्याः कुलमेकोत्तरं शतम्

jāgaraṁ ye kariṣyanti gītaśāstrapuraḥsaram uddhariṣyanti te martyāḥ kulam ekottaraṁ śatam

जो गीत-शास्त्र के साथ रात्रि-जागरण करेंगे, वे मनुष्य अपने इक्यासी पीढ़ी के कुल का उद्धार कर देंगे।

श्लोक 23 (skanda.3.79.23)

तावद्गर्ज्जंति तीर्थानि नैमिषं पुष्करं गया प्रयागं च प्रभासं च द्वारका मथुराऽर्बुदः

tāvad garjanti tīrthāni naimiṣaṁ puṣkaraṁ gayā prayāgaṁ ca prabhāsaṁ ca dvārakā mathurārbudaḥ

उतने ही (माहात्म्य के साथ) नैमिष, पुष्कर, गया, प्रयाग, प्रभास, द्वारका, मथुरा और अर्बुद — ये तीर्थ भी गर्जना करते (अपना गौरव घोषित करते) हैं —

श्लोक 24 (skanda.3.79.24)

यावन्न दृश्यते लिंगं गोवत्सं परमाद्भुतम्। यदा हि कुरुते भावं गोवत्सगमनं प्रति

yāvan na dṛśyate liṅgaṁ govatsaṁ paramādbhutam yadā hi kurute bhāvaṁ govatsagamanaṁ prati

— जब तक इस परम अद्भुत गोवत्स-लिंग का दर्शन नहीं होता। परंतु जब कोई इस गोवत्स-तीर्थ की यात्रा का संकल्प करता है —

श्लोक 25 (skanda.3.79.25)

स्ववंशजास्तदा सर्वे नृत्यंति हर्षिता ध्रुवम्

svavaṁśajās tadā sarve nṛtyanti harṣitā dhruvam

तभी उसके कुल में जन्मे सभी (पितर) निश्चय ही हर्षित होकर नृत्य करने लगते हैं।

श्लोक 26 (skanda.3.79.26)

सूत उवाच । यच्चान्यदद्भुतं तत्र वृत्तांतं शृणु त द्विजाः येन वै श्रुतमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत्

sūta uvāca yac cānyad adbhutaṁ tatra vṛttāntaṁ śṛṇu tad dvijāḥ yena vai śrutamātreṇa sarvapāpakṣayo bhavet

सूत जी ने कहा — हे द्विजो! वहाँ का एक और अद्भुत वृत्तांत सुनो, जिसे सुनने मात्र से समस्त पापों का नाश हो जाता है।

श्लोक 27 (skanda.3.79.27)

यदा वै स्थापितं लिंगं सर्वदेवैः पुरातनम् विष्णोः प्रतिष्ठानगुणात्सर्वेषां च दिवौक साम्

yadā vai sthāpitaṁ liṅgaṁ sarvadevaiḥ purātanam viṣṇoḥ pratiṣṭhānaguṇāt sarveṣāṁ ca divaukasām

जब यह प्राचीन लिंग समस्त देवताओं द्वारा स्थापित किया गया था — विष्णु की प्रतिष्ठा-शक्ति से तथा समस्त देवगणों की शक्ति से —

श्लोक 28 (skanda.3.79.28)

अणुमात्रप्रमाणेन प्रत्यहं समवर्द्धत ततस्ते मनुजा देवा भीतास्तं शरणं ययुः

aṇumātrapramāṇena pratyahaṁ samavardhata tataste manujā devā bhītās taṁ śaraṇaṁ yayuḥ

— तब वह प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा (कण-भर) बढ़ने लगा। इससे भयभीत होकर वे मनुष्य और देवगण उसी की शरण में गये।

श्लोक 29 (skanda.3.79.29)

देवा ऊचुः । वृद्धिं संहर देवेश लोका नां स्वस्ति तद्भवेत् एवमुक्ते ततो लिंगाद्वागुवाचाशरीरिणी

devā ūcuḥ vṛddhiṁ saṁhara deveśa lokānāṁ svasti tad bhavet evam ukte tato liṅgād vāg uvācāśarīriṇī

देवताओं ने कहा — 'हे देवेश! अपनी वृद्धि को रोकिए, इसी में लोकों का कल्याण है।' ऐसा कहे जाने पर उस लिंग से एक अशरीरी वाणी बोल उठी —

श्लोक 30 (skanda.3.79.30)

शिववाण्युवाच । हे लोका मा भयं वोऽस्तु उपायः श्रूयतामयम् कश्चिच्चंडालमानीय मत्पुरः स्थाप्यतां धुवम्

śivavāṇy uvāca he lokā mā bhayaṁ vo 'stu upāyaḥ śrūyatām ayam kaścic caṇḍālam ānīya matpuraḥ sthāpyatāṁ dhruvam

शिव-वाणी ने कहा — 'हे लोगो! भयभीत न हो, इसका उपाय सुनो — कोई एक चांडाल लाकर निश्चय ही मेरे सामने खड़ा कर दिया जाए।'

श्लोक 31 (skanda.3.79.31)

चंडालांश्च समानीय दधुर्देवस्य ते पुरः। तथापि तस्य वृद्धिस्तु नैव निर्वर्तते पुनः

caṇḍālāṁś ca samānīya dadhur devasya te puraḥ tathāpi tasya vṛddhis tu naiva nirvartate punaḥ

उन्होंने चांडालों को लाकर देवता के सामने खड़ा कर दिया, फिर भी उसकी वृद्धि रुकी नहीं।

श्लोक 32 (skanda.3.79.32)

वागुवाच । कर्म्मणा यस्तु चंडालः सोऽग्रे मे स्थाप्यतां जनाः तच्छ्रुत्वा महदाश्चर्यं मतिं चकुर्विलोचने

vāg uvāca karmaṇā yas tu caṇḍālaḥ so 'gre me sthāpyatāṁ janāḥ tac chrutvā mahad āścaryaṁ matiṁ cakur vilocane

वाणी ने पुनः कहा — 'हे लोगो! जो कर्म से चांडाल हो, उसे ही मेरे सामने खड़ा करो।' यह सुनकर सब लोग महान् आश्चर्यचकित नेत्रों से विचार करने लगे —

श्लोक 33 (skanda.3.79.33)

मार्गमाणास्तदा ते तु ग्रामाणि च पुराणि च कञ्चित्कर्मरतं पापं ददृशुर्ब्राह्मणब्रुवम्

mārgamāṇās tadā te tu grāmāṇi ca purāṇi ca kañcit karmarataṁ pāpaṁ dadṛśur brāhmaṇabruvam

फिर गाँवों और नगरों में खोज करते हुए उन्होंने एक ऐसे पापी को देखा, जो ब्राह्मण कहलाता था किंतु पापपूर्ण कर्मों में लिप्त था।

श्लोक 34 (skanda.3.79.34)

वृषभान्भारसंयुक्तान्मध्याह्नेवाहयत्तु सः क्षुत्तृट्श्रमपरीतांश्च दुर्बलान्क्रूरमानसः

vṛṣabhān bhārasaṁyuktān madhyāhne 'vāhayat tu saḥ kṣuttṛṭśramaparītāṁś ca durbalān krūramānasaḥ

वह क्रूर-मन वाला व्यक्ति दोपहर में भार से लदे बैलों को हाँकता था, जो भूख, प्यास और थकान से क्षीण और दुर्बल हो चुके थे।

श्लोक 35 (skanda.3.79.35)

अस्नात्वापि पर्युषितं भक्षयंतीह वै द्विजाः तं समादाय देवेशं जग्मुर्यत्र जगद्गुरुः

asnātvāpi paryuṣitaṁ bhakṣayantīha vai dvijāḥ taṁ samādāya deveśaṁ jagmur yatra jagadguruḥ

बिना स्नान किये ही वह बासी अन्न खा लेता था — इस प्रकार वह ब्राह्मणोचित आचार से गिरा हुआ था। उसे लेकर वे जगद्गुरु देवेश के पास पहुँचे।

श्लोक 36 (skanda.3.79.36)

देवालयाग्रभूमौ तं स्थापयासुरादृताः भस्मी बभूव सहसा गोवत्साग्रे निरूपितः

devālayāgrabhūmau taṁ sthāpayāsur ādṛtāḥ bhasmī babhūva sahasā govatsāgre nirūpitaḥ

उन्होंने आदरपूर्वक उसे मंदिर के सामने की भूमि पर खड़ा कर दिया। गोवत्स-लिंग के सामने खड़ा किये जाते ही वह अचानक भस्म हो गया।

श्लोक 37 (skanda.3.79.37)

चंडालस्थल इत्येष प्रसिद्धोसौऽभवत्क्षितौ तत्र स्थितैर्न चाद्यापि प्रासादो दश्यते हि सः

caṇḍālasthala ity eṣa prasiddho 'sāv abhavat kṣitau tatra sthitair na cādyāpi prāsādo dṛśyate hi saḥ

इस प्रकार वह स्थान पृथ्वी पर 'चांडालस्थल' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वहाँ खड़े होने वाले लोगों को आज भी वह (गोवत्स का) मंदिर दिखायी नहीं देता।

श्लोक 38 (skanda.3.79.38)

तदाप्रभृति तल्लिंगं साम्यभावमुपागतम् धौतपाप्मा गतस्तीर्थं द्विजो लिंगनिरीक्षिणात्

tadāprabhṛti tal liṅgaṁ sāmyabhāvam upāgatam dhautapāpmā gatas tīrthaṁ dvijo liṅganirīkṣiṇāt

तब से लेकर वह लिंग स्थिरभाव को प्राप्त हो गया (उसकी वृद्धि रुक गयी)। जो द्विज इस तीर्थ में जाकर लिंग का दर्शन करता है, वह पापों से धुल जाता है।

श्लोक 39 (skanda.3.79.39)

प्रत्यहं पूजयामास गोवत्सं गत किल्बिषः विशेषात्कृष्णपक्षस्य चतुर्द्दश्यां समागतः

pratyahaṁ pūjayāmāsa govatsaṁ gatakilbiṣaḥ viśeṣāt kṛṣṇapakṣasya caturddaśyāṁ samāgataḥ

जो प्रतिदिन गोवत्स की पूजा करता है, वह पापरहित हो जाता है, विशेषकर कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को यहाँ आने वाला।

श्लोक 40 (skanda.3.79.40)

एतत्तदद्भुतं तस्य देवस्य च त्रिशूलिनः शृणुयाद्यो नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते

etat tad adbhutaṁ tasya devasya ca triśūlinaḥ śṛṇuyād yo naro bhaktyā sarvapāpaiḥ pramucyate

यह त्रिशूलधारी उस देव का अद्भुत चरित्र है; जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 41 (skanda.3.79.41)

भूत उवाच । गोवत्समिति विख्यातं नराणां पुण्यदं परम् अनेकजन्मपापघ्नं मार्कंडेयेन भाषितम्

bhūta uvāca govatsam iti vikhyātaṁ narāṇāṁ puṇyadaṁ param anekajanmapāpaghnaṁ mārkaṇḍeyena bhāṣitam

भूत (गण) ने कहा — यह 'गोवत्स' नाम से विख्यात तीर्थ मनुष्यों को परम पुण्य प्रदान करने वाला है, अनेक जन्मों के पापों का नाश करने वाला है — यह मार्कण्डेय ने ही कहा था।

श्लोक 42 (skanda.3.79.42)

तत्र तीर्थे सकृत्स्नानं रुद्रलोकप्रदं नृणाम् पापदेहविशुद्धयर्थं पापेनोपहतात्मनाम्

tatra tīrthe sakṛt snānaṁ rudralokapradaṁ nṛṇām pāpadehaviśuddhyarthaṁ pāpenopahatātmanām

उस तीर्थ में एक बार भी स्नान करना मनुष्यों को रुद्रलोक प्रदान करता है — पापों से आहत आत्मा वालों की पापमयी देह की शुद्धि के लिए यह विशेष रूप से फलदायी है।

श्लोक 43 (skanda.3.79.43)

कूपे तर्पणतश्चैव श्राद्धतश्चैव तृप्तता भाद्रपदे विशे षेण पक्षस्यांते भवेत्कलौ

kūpe tarpaṇataś caiva śrāddhataś caiva tṛptatā bhādrapade viśeṣeṇa pakṣasyānte bhavet kalau

यहाँ के कूप में तर्पण और श्राद्ध करने से पितरों की तृप्ति होती है, विशेषकर कलियुग में भाद्रपद पक्ष के अंत में।

श्लोक 44 (skanda.3.79.44)

एकविंशतिवारांस्तु गयायां तर्पणे कृते पितॄणां परमा तृप्तिः सकृद्वै गंगकूपके

ekaviṁśativārāṁs tu gayāyāṁ tarpaṇe kṛte pitṝṇāṁ paramā tṛptiḥ sakṛd vai gaṅgakūpake

गया में इक्कीस बार तर्पण करने से पितरों को जो परम तृप्ति मिलती है, वही यहाँ गंगकूप में एक ही बार तर्पण करने से प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 45 (skanda.3.79.45)

तस्मिन्गोवत्ससामीप्ये तिष्ठते गंगकूपकः तस्मिंस्तिलोदकेनापि सद्गतिं यांति तर्पिताः

tasmin govatsasāmīpye tiṣṭhate gaṅgakūpakaḥ tasmiṁs tilodakenāpi sadgatiṁ yānti tarpitāḥ

गोवत्स-लिंग के समीप ही गंगकूप स्थित है; वहाँ केवल तिल-जल से भी तर्पण किये गये पितर सद्गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 46 (skanda.3.79.46)

पितरो नरकाद्वापि सुपुण्येन सुमेधसा गोप्रदानं प्रशंसंति तस्मिंस्तीर्थे मुनीश्वराः

pitaro narakād vāpi supuṇyena sumedhasā gopradānaṁ praśaṁsanti tasmin tīrthe munīśvarāḥ

पितर नरक से भी उस उत्तम पुण्य और बुद्धि द्वारा (उद्धरित हो जाते हैं); महामुनि उस तीर्थ में गो-दान की विशेष प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 47 (skanda.3.79.47)

विप्राय स्वर्णदानं तु रुद्रलोके नयेन्नरम् सरस्वतीशिवक्षेत्रे गंगा च गंगकूपके

viprāya svarṇadānaṁ tu rudraloke nayen naram sarasvatīśivakṣetre gaṅgā ca gaṅgakūpake

ब्राह्मण को स्वर्ण-दान करना मनुष्य को रुद्रलोक तक पहुँचाता है; इस शिवक्षेत्र में सरस्वती, तथा गंगकूप में गंगा भी विद्यमान हैं।

श्लोक 48 (skanda.3.79.48)

एकस्थमेतत्त्रितयं स्वर्गापवर्गकारणम् सेवितं चर्षिभिः सिद्धैस्तीर्थं सर्वत्र विश्रुतम्

ekasthametat tritayaṁ svargāpavargakāraṇam sevitaṁ carṣibhiḥ siddhais tīrthaṁ sarvatra viśrutam

एक ही स्थान पर स्थित यह त्रिवेणी स्वर्ग और मोक्ष दोनों का कारण है; यह तीर्थ ऋषियों और सिद्धों द्वारा सेवित तथा सर्वत्र विख्यात है।

श्लोक 49 (skanda.3.79.49)

पीलुयुग्मं स्थितं तत्र तत्तीर्थं मुनिसेवितम् स्नानात्स्वर्गप्रदं चैव पानात्पापविशुद्धिदम्

pīluyugmaṁ sthitaṁ tatra tattīrthaṁ muniseivitam snānāt svargapradaṁ caiva pānāt pāpaviśuddhidam

वहाँ पीलु का जोड़ा भी स्थित है, वह तीर्थ मुनियों द्वारा सेवित है — स्नान करने से स्वर्ग देने वाला, और उसका जल पान करने से पापों से शुद्धि देने वाला है।

श्लोक 50 (skanda.3.79.50)

कीर्त्तनात्पुण्यजननं सेवनान्मुक्तिदं परम् तद्वै पश्यंति ये भक्त्या ब्रह्महा यदि मातृहा

kīrtanāt puṇyajananaṁ sevanān muktidaṁ param tad vai paśyanti ye bhaktyā brahmahā yadi mātṛhā

इसके कीर्तन से पुण्य उत्पन्न होता है, इसकी उपासना से परम मुक्ति मिलती है; जो भी इसे भक्तिपूर्वक देखता है — चाहे वह ब्रह्महत्यारा हो या मातृहत्यारा —

श्लोक 51 (skanda.3.79.51)

बालघाती च गोघ्नश्च ये च स्त्रीशूद्रघातकाः गरदाश्चाग्निदाश्चैव गुरुद्रोहरताश्च ये

bālaghātī ca goghnaś ca ye ca strīśūdraghātakāḥ garadāś cāgnidāś caiva gurudroharatāś ca ye

— चाहे वह बालक-हत्यारा हो, गोहत्यारा हो, स्त्री या शूद्र का हत्यारा हो, विषदाता हो, घर जलाने वाला हो, अथवा गुरु से द्रोह करने वाला हो —

श्लोक 52 (skanda.3.79.52)

तपस्विनिन्दकाश्चैव कूटसाक्ष्यं करोति यः वक्ता च परदोषस्य परस्य गुणलोपकः

tapasvinindakāś caiva kūṭasākṣyaṁ karoti yaḥ vaktā ca paradoṣasya parasya guṇalopakaḥ

— अथवा तपस्वियों की निंदा करने वाला, झूठी गवाही देने वाला, दूसरों के दोष बखानने वाला और दूसरों के गुणों को छिपाने वाला —

श्लोक 53 (skanda.3.79.53)

सर्वपापमयोऽप्यत्र मुच्यते लिंगदर्शनात् इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां तृतीये ब्रह्मखण्डे धर्मारण्यमाहात्म्ये बलाहकोपाख्यानवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः

sarvapāpamayo 'py atra mucyate liṅgadarśanāt iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṁ saṁhitāyāṁ tṛtīye brahmakhaṇḍe dharmāraṇyamāhātmye balāhakopākhyānavarṇanaṁ nāma saptaviṁśo 'dhyāyaḥ

— चाहे वह कितना भी पापपूर्ण क्यों न हो, इस लिंग के दर्शन मात्र से वह मुक्त हो जाता है। इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराण की एक लाख इक्यासी हज़ार श्लोकों वाली संहिता के तृतीय ब्रह्मखण्ड में, धर्मारण्य-माहात्म्य के अंतर्गत, बलाहकोपाख्यान-वर्णन नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80